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DurgAsUktam: दुर्गासूक्तम्

DurgAsUktam: दुर्गासूक्तम् ॥ अथ दुर्गा सूक्तम् ॥ ॐ जातवेदसे सुनवाम सोम मरातीयतो निदहाति वेदः ।स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरिताऽत्यग्निः ॥ १॥ तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनींकर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीꣳ शरणमहंप्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः ॥ २॥ अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्थ्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा ।पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शंयोः ॥ ३॥ विश्वानि नो दुर्गहा जातवेदः सिन्धुन्न नावा दुरिताऽतिपर्षि ।अग्ने अत्रिवन्मनसा गृणानोऽस्माकं बोध्यविता तनूनाम् ॥ ४॥ पृतना जितꣳ सहमानमुग्रमग्निꣳ हुवेम परमाथ्सधस्थात् ।स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा क्षामद्देवो अति दुरितात्यग्निः ॥ ५॥ प्रत्नोषि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सथ्सि ।स्वाञ्चाग्ने तनुवं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमायजस्व ॥ ६॥ गोभिर्जुष्टमयुजो निषिक्तन्तवेन्द्र विष्णोरनुसंचरेम ।नाकस्य पृष्ठमभि संवसानो वैष्णवीं लोक इह मादयन्ताम् ॥ ७॥ ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि । तन्नो दुर्गिः प्रचोदयात् ॥ ॥ इति दुर्गा सूक्तम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ तैत्तिरीयारण्यकम् ४, प्रपाठकः १०, अनुवाकः २

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Shri Durgamba Stotram:श्रीदुर्गाम्बास्तोत्रम्

Shri Durgamba Stotram:श्रीदुर्गाम्बास्तोत्रम् ज्ञानमात्रावशेषाया निष्पप्रपञ्चा निरङ्कुशा ।चिदानन्दघनात्यच्छा दुर्गाम्बां तां उपास्महे ॥ १॥ मन्त्राणां मातृका देवि ज्ञानानां ज्ञानरूपिणी ।ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥ २॥ यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ।दुर्गात्सन्त्रायते यस्मात् देवी दुर्गेति कथ्यते ॥ ३॥ प्रपद्ये शरणं देवि दुराचारविधातिनीम् ।नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥ ४॥ इति श्रीसमर्थरामदासानुग्रहित श्रीरामपदपङ्कजभृङ्गायमानश्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यवरभगवताश्रीश्रीधरस्वामिनाविरचितं श्रीदुर्गाम्बास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Dream interpretation according to astrology: सपने में आसमानी बिजली देखना: शुभ या अशुभ? जानें स्वप्न शास्त्र का रहस्य !

Dream interpretation according to astrology: क्या आपने कभी रात को सोते समय सपने में आसमानी बिजली गिरते हुए देखी है? सपनों की दुनिया बड़ी अजीब होती है जहाँ जो मिलता है वो खो जाता है और जो जाता है वो मिलने वाला होता है। कई बार ऐसे सपने मन में उत्सुकता या डर पैदा करते हैं कि आखिर इनका हमारे वास्तविक जीवन से क्या संबंध है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, रात की गहरी नींद में आने वाले हमारे सपने हमारे दिन भर किए गए कार्यों, मन में उठे विचारों या किसी दबी हुई इच्छा का परिणाम होते हैं। ऐसी मान्यता है कि ब्रह्म मुहूर्त में देखा गया स्वप्न अपना फल ज़रूर देता है। स्वप्न शास्त्र astrology के विशेषज्ञों के अनुसार, सपने में आसमानी बिजली देखना अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का संकेत हो सकता है। आइए जानते हैं विस्तार से कि इन सपनों का आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। Dream interpretation according to astrology:सपने में आसमानी बिजली गिरते देखने के शुभ संकेत अगर आपने सपने में आसमानी बिजली गिरते देखी है, तो यह कई मामलों में एक शुभ संकेत माना जाता है। • व्यापार में बड़ा फायदा: यह आपके कारोबार में बड़ी सफलता और astrology फायदे की उम्मीद दर्शाता है। आपकी वित्तीय परेशानियाँ दूर हो सकती हैं और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा से आप कर्ज मुक्त भी हो सकते हैं। • कार्य में सफलता और पदोन्नति: यह कार्य में सफलता पाने का संकेत है। यदि आप लंबे समय से नौकरी की तलाश में हैं या काम में पदोन्नति (प्रमोशन) पाना चाहते हैं, तो आपकी यह इच्छा जल्द ही पूरी हो सकती है। • आसमान में बिजली चमकना: यदि आप सपने में आसमान में astrology बिजली चमकते हुए देखते हैं (केवल चमक, बिना गिरने या कड़कने की आवाज़ के), तो यह व्यापार-व्यवसाय में बड़ी सफलता मिलने की पूर्व सूचना है। सपने में आसमानी बिजली या संबंधित घटनाएँ देखने के अशुभ संकेत हालांकि, कुछ स्थितियों में सपने में बिजली देखना अशुभ भी हो सकता है। • परिवार में अशुभ घटना या परेशानी: यदि आप सपने में बिजली गिरते हुए देखते हैं, तो इसका अर्थ हो सकता है कि आपके परिवार में कोई अशुभ घटना घटने वाली है। यह विपत्ति आने, जीवन में बहुत सारी परेशानियों का सामना करने और धन हानि होने की संभावना को भी दर्शाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, सपने में बिजली गिरते देखना अशुभ समाचार मिलने की संभावना को दर्शाता है। • बिजली कड़कने की आवाज़ सुनना: यदि आपको सपने में बिजली कड़कने की आवाज़ सुनाई देती है, तो इसे बिल्कुल अच्छा नहीं माना जाता है। इसका अर्थ है कि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य बहुत बड़ी मुसीबत में फंसने वाला है, astrology जिस कारण उन्हें आर्थिक संकट से भी गुज़रना पड़ सकता है। यह सपना लोगों से धोखा मिलने का संकेत भी देता है और आपको सावधानीपूर्वक रहने तथा हर किसी पर विश्वास न करने की सलाह देता है। • रिश्तों में धोखाधड़ी: यदि आप रात में सोते समय बिजली कड़कते हुए सपने में देखते हैं, तो यह सावधान होने का संकेत होता है। यह रिश्ते में धोखाधड़ी के संकेत माने जाते हैं, जिसका अर्थ है कि आपको किसी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए, astrology बल्कि अपने आसपास के रिश्तों से सचेत रहना चाहिए। • बिजली से करंट लगना: यदि सपने में आपको बिजली से करंट लगने का दृश्य दिखाई दे, तो यह एक अशुभ स्वप्न माना जाता है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में कोई खास दोस्त या घर का कोई सदस्य आपको धोखा दे सकता है। यह सपना नज़दीकी लोगों से सावधान रहने की सीख देता है। निष्कर्ष सपने में आसमानी बिजली देखने के विभिन्न अर्थ हो सकते हैं। यह आपके जीवन में आने वाले astrology शुभ बदलावों और सफलताओं का संकेत भी हो सकता है, वहीं यह कुछ संभावित चुनौतियों और परेशानियों की ओर भी इशारा कर सकता है। सपनों के इन संकेतों को समझकर आप अपने जीवन में आने वाली परिस्थितियों के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकते हैं।

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Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde: श्रीमद्भागवत गीता: मानसिक शांति, ऊर्जा और जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता के लिए क्यों पढ़नी चाहिए रोज़ाना ?

Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde: क्या आप अपने जीवन में मानसिक शांति, सकारात्मकता और उद्देश्य की स्पष्टता की तलाश में हैं? श्रीमद्भागवत गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है। यह जीवन जीने की कला सीखने का एक ज़रिया है। भगवान श्री कृष्ण ने यह ग्रंथ कुरुक्षेत्र युद्ध के समय अर्जुन को दिया था, जिसमें धर्म और कर्म के महत्व के साथ-साथ मानसिक संतुलन, सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास बढ़ाने के उपाय भी शामिल हैं। आज के तेज़ और तनावपूर्ण जीवन में, जब लोग अक्सर उलझन और चिंता में फंसे रहते हैं, रोज़ Bhagwat Geeta गीता का पाठ करना मानसिक शांति और जीवन की दिशा समझने का सबसे आसान तरीका बन सकता है। आइए, भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से जानते हैं कि नियमित रूप से भगवद गीता का अध्ययन करने से हमारे जीवन में कौन-कौन से चमत्कारी बदलाव आते हैं। Bhagwat Geeta Padhne Ke Fayde:भगवद गीता पढ़ने के चमत्कारी लाभ: जीवन बदल जाएगा! भगवद गीता का रोज़ाना पाठ करने से कई मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं: 1. मानसिक शांति और नियंत्रण जो व्यक्ति रोज़ाना गीता का पाठ करता है, उसका मन स्थिर और शांत रहता है। चाहे जीवन में कितनी भी परेशानियां आएं, वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण बनाए रख सकता है। गीता Bhagwat Geeta पढ़ने से व्यक्ति खुद को समझना सीखता है और परिस्थितियों के अनुसार सही फैसले लेने में सक्षम होता है। यह आदत धीरे-धीरे व्यक्ति की सोच को साफ़ और तार्किक बनाती है, जिससे जीवन में उलझन कम होती है। 2. क्रोध और बुराई से मुक्ति गीता पढ़ने वाले व्यक्ति को क्रोध, ईर्ष्या, लालच और मोह के बंधनों से छुटकारा मिलता है। जब व्यक्ति इन नकारात्मक भावनाओं से मुक्त हो जाता है, तो उसके जीवन में सुख और संतोष बढ़ता है। गीता में बताई गई बातें व्यक्ति को यह सिखाती हैं कि किस तरह हर परिस्थिति में संयम बनाए रखा जाए और अपने अंदर की बुराई पर विजय पाई जाए। 3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार और आत्मबल में वृद्धि भगवद गीता पढ़ने से न सिर्फ नकारात्मक ऊर्जा ख़त्म होती है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी बढ़ता है। व्यक्ति का आत्मबल मज़बूत होता है, वह साहसी बनता है और अपने जीवन के कर्तव्यों को निभाने में निडर बन जाता है। गीता पढ़ना जीवन में एक नैतिक और मानसिक ताक़त का स्रोत बन जाता है। 4. तनाव और चिंता से राहत आज के जीवन में तनाव और चिंता आम बात हो गई है। गीता पढ़ने से व्यक्ति को जीवन के सही और गलत का ज्ञान मिलता है। उसे समझ आता है कि किस स्थिति में क्या करना चाहिए और कैसे खुद को मानसिक रूप से शांत रखा जाए। रोज़ गीता का पाठ करने से व्यक्ति अंदर से मज़बूत होता है और वह किसी भी संकट का सामना धैर्य और समझदारी से कर सकता है। 5. जीवन में उद्देश्य की स्पष्टता गीता पढ़ने से व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को समझता है। वह जानता है कि हर काम का महत्व क्या है और कैसे अपने कर्मों के अनुसार जीवन को सही दिशा दी जा सकती है। यह ज्ञान व्यक्ति को न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि उसे जीवन में स्थायी संतोष भी प्रदान करता है। निष्कर्ष श्रीमद्भागवत गीता Bhagwat Geeta सिर्फ एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक है जो हमें मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा, क्रोध और चिंता से मुक्ति, और जीवन के उद्देश्य की स्पष्टता प्रदान करती है। Bhagwat Geeta इसे रोज़ाना पढ़ने से आप अपने अंदर एक गहरा बदलाव महसूस करेंगे और जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक धैर्य और समझदारी से कर पाएंगे।

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Bhagavad Gita: श्रीमद्भागवत गीता जीवन बदलने वाले चमत्कारी लाभ और पाठ के सही नियम – पूर्ण ज्ञान की कुंजी

Bhagavad Gita: क्या आप अपने जीवन में शांति, स्पष्टता और सकारात्मकता की तलाश में हैं? सनातन धर्म का एक अमूल्य रत्न, श्रीमद्भागवत गीता, आपको इन सभी की प्राप्ति में मदद कर सकती है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक अद्भुत दर्शन है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को प्रदान किया था। Bhagavad Gita आज, यह केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनियाभर में लोग गीता के पाठ से लाभ उठा रहे हैं। आइए जानते हैं कि रोजाना Bhagavad Gita गीता पढ़ने से आपको कौन से चमत्कारी लाभ मिल सकते हैं और इसे सही तरीके से पढ़ने के नियम क्या हैं, ताकि आप इसके गूढ़ ज्ञान को आत्मसात कर सकें। Bhagavad Gita: गीता पाठ के अद्भुत लाभ: जब आप इसे जीवन में उतारते हैं:Amazing benefits of reading Geeta: When you implement it in life श्रीमद्भागवत गीता का नियमित अध्ययन आपके जीवन को कई तरह से सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। यह आपको आंतरिक शांति और स्पष्टता प्रदान करती है। 1. मन की शांति और स्थिरता: जो व्यक्ति नियमित रूप से भगवत गीता का पाठ करता है, Bhagavad Gita उसका मन हमेशा शांत रहता है। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मन पर काबू पाने की क्षमता रखता है। गीता आपको अपने मन को अपनी इच्छानुसार किसी भी कार्य में लगाने की शक्ति देती है। 2. क्रोध, लालच और मोह से मुक्ति: रोजाना गीता का अध्ययन करने वाले लोग कामवासना, क्रोध, लालच और मोह-माया जैसे बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। इन सबसे मुक्ति पाकर व्यक्ति का जीवन सुखमय तरीके से व्यतीत होता है। 3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार और आत्मबल में वृद्धि: प्रतिदिन Bhagavad Gita भगवत गीता का पाठ करने से जीवन से सभी नकारात्मक ऊर्जाएँ दूर होने लगती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। इतना ही नहीं, गीता पढ़ने से व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है और वह साहसी व निडर बनकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ता रहता है। 4. तनाव से मुक्ति और सही-गलत का ज्ञान: गीता पढ़ने वाला व्यक्ति सच और झूठ, ईश्वर और जीव के ज्ञान को प्राप्त करता है। उसे अच्छे और बुरे की समझ आ जाती है। भगवत गीता का पाठ करने से व्यक्ति को तनाव से भी मुक्ति मिलती है। 5. कर्म और जीवन का गहरा दर्शन: गीता हमें यह ज्ञान देती है कि व्यक्ति को केवल अपने काम और कर्म पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, यह भी समझाती है कि हमारे कर्मों का फल हमें निश्चित ही प्राप्त होगा। Bhagavad Gita गीता हमें जीवन क्या है, इसे कैसे जीना चाहिए, आत्मा और परमात्मा का मिलन कैसे होता है, और अच्छे-बुरे की समझ क्यों ज़रूरी है, जैसे गूढ़ सवालों के जवाब भी देती है। पितृ पक्ष में क्यों करते हैं गीता के अध्याय का पाठ, जानिए – कुल 16 दिन का होता है पितृ पक्ष Bhagavad Gita: गीता पढ़ने का सही तरीका और नियम: पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति के लिए गीता का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए इसे केवल एक बार पढ़ना पर्याप्त नहीं है; बल्कि इसे समझने के चार स्तरों से गुजरना पड़ता है। ज्ञान प्राप्ति के चार स्तर: 1. श्रवण या पठन ज्ञान: पहले आप पढ़ते या सुनते हैं। 2. मनन ज्ञान: फिर, पढ़े-सुने ज्ञान के बारे में चिंतन और मनन करते हैं। 3. निदिध्यासन ज्ञान: यदि वह ज्ञान आपको ठीक और उपयोगी लगता है, तब आप उसका अभ्यास कर उसे अपने जीवन में उतारते हैं। 4. अनुभव ज्ञान: आखिर में, उस ज्ञान का प्रतिफल आपको मिलता है। यदि आप गीता पढ़कर उसके उपदेशों को जीवन में नहीं उतारते हैं, तो उसका फल कैसे मिलेगा? जब हम Bhagavad Gita गीता के उपदेशों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो निश्चित ही सुपरिणाम सामने आते हैं। कितनी बार पढ़ें गीता? ज्ञान की गहराई: आप जितनी बार गीता का पाठ करेंगे, आपको कुछ नया सीखने को मिलेगा। पहली बार: आप इसे एक अंधे व्यक्ति के रूप में पढ़ते हैं, केवल रिश्तों की समझ मिलती है। दूसरी बार: मन में सवाल जागृत होते हैं कि ऐसा क्यों हुआ। तीसरी बार: आप इसके अर्थ को समझने लगते हैं, हर व्यक्ति अपने तरीके से समझता है। चौथी बार: आप हर एक पात्र से जुड़ी भावनाओं को समझ पाते हैं। पांचवी बार: पूरा कुरुक्षेत्र आपके मन में खड़ा हो जाता है, अलग-अलग कल्पनाएँ होती हैं। छठवीं बार: आप भगवान को अपने सामने अनुभव करने लगते हैं, मानो भगवान स्वयं आपको बता रहे हों। आठवीं बार: आपको पूर्णतः अहसास हो जाता है कि कृष्ण कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही हैं और हम उनके भीतर। पाठ के महत्वपूर्ण नियम: शुभ समय: भगवत गीता पढ़ने के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है, Bhagavad Gita क्योंकि इस समय मन, मस्तिष्क और वातावरण में शांति व सकारात्मकता होती है। मन की स्थिति: गीता का पाठ हमेशा स्नान के बाद और शांत चित्त मन से ही करना चाहिए। एकाग्रता: पाठ करते समय बीच-बीच में इधर-उधर की बातें नहीं करनी चाहिए और न ही किसी कार्य के लिए बार-बार उठना चाहिए। स्थान: साफ-सफाई वाले स्थान और ज़मीन पर आसन बिछाकर ही गीता का पाठ करना चाहिए। सम्मान: गीता के प्रत्येक अध्याय को शुरू करने से पहले और बाद में भगवान श्रीकृष्ण और गीता के चरण कमलों को स्पर्श करना चाहिए। श्लोक और भावार्थ: क्या पढ़ें और कैसे? गीता गहरा ज्ञान और अर्थ रखने वाली एक आध्यात्मिक पुस्तक है जो मूल रूप से संस्कृत भाषा में है। Bhagavad Gita आज यह कई अनुवादित भाषाओं में उपलब्ध है, लेकिन संस्कृत के अर्थ न समझने के कारण कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि गीता को श्लोक समेत पढ़ना चाहिए या केवल भावार्थ पढ़ना काफी है। गहराई से जुड़ने के लिए: वैसे तो गीता का भावार्थ भी पढ़ने और समझने के लिए काफी है, Bhagavad Gita लेकिन अगर आप उन्हें संस्कृत के श्लोकों के साथ पढ़ते हैं, तो आप गीता से और गहराई से जुड़ पाएंगे। संस्कृत उच्चारण के लाभ: जिस प्रकार संस्कृत के मंत्रों के जाप के अपने फायदे हैं, ठीक वैसे ही गीता के श्लोकों के पाठ के भी अपने मायने और फायदे हैं। संस्कृत भाषा का उच्चारण

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Shri mahAchaNDyaShTottarashatanAmAvalI:श्रीमहाचण्ड्यष्टोत्तरशतनामावली

Shri mahAchaNDyaShTottarashatanAmAvalI:श्रीमहाचण्ड्यष्टोत्तरशतनामावली ॐ अस्यश्री महाचण्डी महामन्त्रस्य दीर्घतमा ऋषिः ककुप्छन्दः श्री महाचण्डिका दुर्गा देवता ॥ ह्रां – ह्रीं इत्यादिना न्यासमाचरेत्ध्यानम्शशलाञ्छनसम्युतां त्रिनेत्रांवरचक्राभयशङ्खशूलपाणिम् ।असिखेटकधारिणीं महेशीं त्रिपुरारातिवधूं शिवांस्मरामि ॥ मन्त्रः – ॐ ह्रीं श्च्यूं मं दुं दुर्गायै नमः ॐ ॥ ॥अथ महाचण्डी नामावलिः॥ ॐ चण्डिकायै नमः ।ॐ मङ्गलायै नमः ।ॐ सुशीलायै नमः ।ॐ परमार्थप्रबोधिन्यै नमः ।ॐ दक्षिणायै नमः ।ॐ दक्षिणामूर्त्यै नमः ।ॐ सुदक्षिणायै नमः ।ॐ हविःप्रियायै नमः ।ॐ योगिन्यै नमः ।ॐ योगाङ्गायै नमः । १०ॐ धनुःशालिन्यै नमः ।ॐ योगपीठधरायै नमः ।ॐ मुक्तायै नमः ।ॐ मुक्तानां परमा गत्यै नमः ।ॐ नारसिम्ह्यै नमः ।ॐ सुजन्मने नमः ।ॐ मोक्षदायै नमः ।ॐ दूत्यै नमः ।ॐ साक्षिण्यै नमः ।ॐ दक्षायै नमः । २०ॐ दक्षिणायै नमः ।ॐ सुदक्षायै नमः ।ॐ कोटिरूपिण्यै नमः ।ॐ क्रतुस्वरूपिण्यै नमः ।ॐ कात्यायन्यै नमः ।ॐ स्वस्थायै नमः ।ॐ कविप्रियायै नमः ।ॐ सत्यग्रामायै नमः ।ॐ बहिःस्थितायै नमः ।ॐ काव्यशक्त्यै नमः । ३०ॐ काव्यप्रदायै नमः ।ॐ मेनापुत्र्यै नमः ।ॐ सत्यायै नमः ।ॐ परित्रातायै नमः ।ॐ मैनाकभगिन्यै नमः ।ॐ सौदामिन्यै नमः ।ॐ सदामायायै नमः ।ॐ सुभगायै नमः ।ॐ कृत्तिकायै नमः ।ॐ कालशायिन्यै नमः । ४०ॐ रक्तबीजवधायै नमः ।ॐ दृप्तायै नमः ।ॐ सन्तपायै नमः ।ॐ बीजसन्तत्यै नमः ।ॐ जगज्जीवायै नमः ।ॐ जगद्बीजायै नमः ।ॐ जगत्त्रयहितैषिण्यै नमः ।ॐ स्वामिकरायै नमः ।ॐ चन्द्रिकायै नमः ।ॐ चन्द्रायै नमः । ५०ॐ साक्षात्स्वरूपिण्यै नमः ।ॐ षोडशकलायै नमः ।ॐ एकपादायै नमः ।ॐ अनुबन्धायै नमः ।ॐ यक्षिण्यै नमः ।ॐ धनदार्चितायै नमः ।ॐ चित्रिण्यै नमः ।ॐ चित्रमायायै नमः ।ॐ विचित्रायै नमः ।ॐ भुवनेश्वर्यै नमः । ६०ॐ चामुण्डायै नमः ।ॐ मुण्डहस्तायै नमः ।ॐ चण्डमुण्डवधायै नमः ।ॐ उद्धतायै नमः ।ॐ अष्टम्यै नमः ।ॐ एकादश्यै नमः ।ॐ पूर्णायै नमः ।ॐ नवम्यै नमः ।ॐ चतुर्दश्यै नमः ।ॐ अमावास्यै नमः । ७०ॐ कलशहस्तायै नमः ।ॐ पूर्णकुम्भधरायै नमः ।ॐ धरित्र्यै नमः ।ॐ अभिरामायै नमः ।ॐ भैरव्यै नमः ।ॐ गम्भीरायै नमः ।ॐ भीमायै नमः ।ॐ त्रिपुरभैरव्यै नमः ।ॐ महचण्डायै नमः ।ॐ महामुद्रायै नमः । ८०ॐ महाभैरवपूजितायै नमः ।ॐ अस्थिमालाधारिण्यै नमः ।ॐ करालदर्शनायै नमः ।ॐ कराल्यै नमः ।ॐ घोरघर्घरनाशिन्यै नमः ।ॐ रक्तदन्त्यै नमः ।ॐ ऊर्ध्वकेशायै नमः ।ॐ बन्धूककुसुमाक्षतायै नमः ।ॐ कदम्बायै नमः ।ॐ पलाशायै नमः । ९०ॐ कुङ्कुमप्रियायै नमः ।ॐ कान्त्यै नमः ।ॐ बहुसुवर्णायै नमः ।ॐ मातङ्ग्यै नमः ।ॐ वरारोहायै नमः ।ॐ मत्तमातङ्गगामिन्यै नमः ।ॐ हम्सगतायै नमः ।ॐ हम्सिन्यै नमः ।ॐ हम्सोज्वलायै नमः ।ॐ शङ्खचक्राङ्कितकरायै नमः । १००ॐ कुमार्यै नमः ।ॐ कुटिलालकायै नमः ।ॐ मृगेन्द्रवाहिन्यै नमः ।ॐ देव्यै नमः ।ॐ दुर्गायै नमः ।ॐ वर्धिन्यै नमः ।ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः ।ॐ महाचण्डिकायै नमः । १०८ ॥ॐ॥

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Devistuti ShakrAdaya or Mahishantakarisuktam:शक्रादयकृता देवीस्तुतिः अथवा महिषन्तकरीसूक्तम्

Devistuti ShakrAdaya or Mahishantakarisuktam:शक्रादयकृता देवीस्तुतिः अथवा महिषन्तकरीसूक्तम् दुर्गा सप्तशत्यान्तर्गतम् ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ऋषिरुवाच ॥ १॥ शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या । तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥ २॥ देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या । तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ ३॥ यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च । सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥ ४॥ या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः । श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥ ५॥ किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत् किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि । किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥ ६॥ हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषै- र्न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा । सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूत- मव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥ ७॥ यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन तृप्तिं प्रयाति सकलेषु मखेषु देवि । स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतु- रुच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥ ८॥ या मुक्तिहेतुरविचन्त्यमहाव्रता त्वं अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः । मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ॥ ९॥ शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान- मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् । देवी त्रयी भगवती भवभावनाय वार्त्ता च सर्वजगतां परमार्त्ति हन्त्री ॥ १०॥ मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा । श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥ ११॥ ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र- बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् । अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥ १२॥ दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकराल- मुद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः । प्राणान्मुमोच महिषस्तदतीव चित्रं कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥ १३॥ देवि प्रसीद परमा भवती भवाय सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि । विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेत- न्नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥ १४॥ ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः । धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ १५॥ धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्मा- ण्यत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति । स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादा- ल्लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥ १६॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ १७॥ एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । सङ्ग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेति नूनमहितान्विनिहंसि देवि ॥ १८॥ दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् । लोकान्प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥ १९॥ खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् । यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड- योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥ २०॥ दुर्वृत्तवृत्तशमन्ं तव देवि शीलं रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः । वीर्यं च हन्त्रि हृतदेवपराक्रमाणां वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥ २१॥ केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र । चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥ २२॥ त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा । नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त- मस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥ २३॥ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ २४॥ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे । भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ २५॥ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥ २६॥ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्रानि तेऽम्बिके । करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान्रक्ष सर्वतः ॥ २७॥ ऋषिरुवाच ॥ २८॥ एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः । अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥ २९॥ भक्त्या समस्तैस्त्रिदशैर्दिव्यैर्धूपैस्तु धूपिता । प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥ ३०॥ देव्युवाच ॥ ३१॥ व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छतम् ॥ ३२॥ देवा उचुः ॥ ३३॥ भगवत्या कृतं सर्वं न किञ्चिदवशिष्यते । यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ॥ ३४॥ यदि चापि वरो देयस्त्वयाऽस्माकं महेश्वरि । संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ॥ ३५॥ यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने ॥ ३६॥ तस्य वित्तर्द्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् । वृद्धयेऽस्मत्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥ ३७॥ ऋषिरुवाच ॥ ३८॥ इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथाऽत्मनः । तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥ ३९॥ इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा । देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥ ४०॥ पुनश्च गौरीदेहात्सा समुद्भूता यथाभवत् । वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ४१॥ रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी । तच्छृणुष्व मयाऽऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ ४२॥ इति श्री मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शक्रादिस्तुतिर्नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥

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Shri Durganama Shodashi: श्रीदुर्गानामषोडशी

Shri Durganama Shodashi: श्रीदुर्गानामषोडशी दुर्गा नारायणीशाना विष्णुमाया शिवा सती ।नित्या सत्या भगवती शर्वाणी सर्वमङ्गळा ।अम्बिका वैष्णवी गौरी पार्वती च सनातनी ॥ एषा नाम्नां षोडशिका श्रीदुर्गायाः प्रियङ्करी ।कीर्तनादाशु सुखदा सर्वोपद्रवनाशिनी ।ॐ दुर्गायै नमः । नारायण्यै नमः । ईशानायै नमः । विष्णुमायायैनमः । शिवायै नमः । सत्यै नमः । नित्यायै नमः । सत्यायै नमः ।भगवत्यै नमः । शर्वाण्यै नमः । सर्वमङ्गळायै नमः । अम्बिकायैनमः । वैष्णव्यै नमः । गौर्यै नमः । पार्वत्यै नमः । सनातन्यै नमः । इति श्रीदुर्गानामषोडशी समाप्ता ।

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ShrIdurgAsaptashlokI: श्रीदुर्गासप्तश्लोकी

ShrIdurgAsaptashlokI: श्रीदुर्गासप्तश्लोकी । अथ सप्तश्लोकी दुर्गा ।शिव उवाचदेवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥ देव्युवाचश‍ृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम् ।मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥ ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमहामन्त्रस्य नारायण ऋषिः ।अनुष्टुभादीनि छन्दांसि । श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः ।श्रीदूर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकी दुर्गापाठे विनियोगः ॥ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ १॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ २॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ३॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ४॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ ५॥ रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ६॥ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ॥ ७॥ ॥ इति दुर्गासप्तश्लोकी सम्पूर्णा ॥

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DevIkShamApaNastotram: देवीक्षमापणस्तोत्रम्

devIkShamApaNastotram: देवीक्षमापणस्तोत्रम् श्रीगणेशाय नमः ।अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।दासोऽयमिति मां मत्त्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥ १॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥ २॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ ३॥ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् ।यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥ ४॥ सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके ।इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ५॥ अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम् ।तत्सर्वं क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ ६॥ कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे ।गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥ ७॥ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वप्रसादात्सुरेश्वरि ॥ ८॥ ॥ इति देवीक्षमापणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Vishwakarma Jayanti

Vishwakarma Jayanti: विश्वकर्मा पूजा 2025: कब है भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती? जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि !

Vishwakarma Jayanti: सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का पहला वास्तुकार (आर्किटेक्ट) और शिल्पकार माना जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, इन्होंने भगवान ब्रह्मा के सातवें पुत्र के रूप में ब्रह्मांड के निर्माण में उनकी सहायता की थी। Vishwakarma Jayanti यह पर्व मुख्य रूप से कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने औजारों और मशीनों की पूजा करके भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह त्योहार उस दिन मनाया जाता है जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है, जिसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। आइए, जानते हैं विश्वकर्मा पूजा 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि के बारे में। Vishwakarma Jayanti 2025 date and auspicious time:विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा पूजा हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, विश्वकर्मा पूजा 2025 इस दिन मनाई जाएगी: विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 Vishwakarma Jayanti ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य देव 17 सितंबर 2025 को देर रात 01 बजकर 54 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 01 बजकर 55 मिनट पर) सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करेंगे। सनातन धर्म में उदया तिथि का मान होता है, इसलिए 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। Auspicious time of puja:पूजा के शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा Vishwakarma Jayanti पूजा के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जिनमें पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। • पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से दिन में 11 बजकर 44 मिनट तक • महा पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से सुबह 07 बजकर 39 मिनट तक (अवधि: 02 घंटे 03 मिनट) • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजकर 18 मिनट से 03 बजकर 07 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 24 मिनट से शाम 06 बजकर 47 मिनट तक • निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक Vishwakarma Puja 2025 Rahukaal Timings:विश्वकर्मा पूजा 2025 राहुकाल का समय Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन राहुकाल का समय दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से 01 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राहुकाल में पूजा या कोई भी शुभ कार्य करने से शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए इस समय से पहले या बाद में पूजा करना चाहिए। विश्वकर्मा पूजा पर बन रहे शुभ योग Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन शिव और परिघ योग समेत कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। परिघ योग के बाद शिव योग का संयोग बनेगा, और इसके साथ ही शिववास योग का भी निर्माण होगा। इन शुभ योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Significance) सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा की पूजा का विशेष महत्व है: • सृष्टि के निर्माता: भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला वास्तुकार और शिल्पकार माना जाता है। Vishwakarma Jayanti उन्होंने ब्रह्मांड के निर्माण में ब्रह्मा जी की सहायता की थी। • सुख और सौभाग्य: धार्मिक मान्यता है कि शिल्पकार विश्वकर्मा जी की पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। • सभी सुखों की प्राप्ति: भगवान विश्वकर्मा की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। • कार्य बाधाओं से मुक्ति: उनकी आराधना करने से काम में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं। • कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा: ऐसा माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा से कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। • व्यापार में तरक्की: उनकी कृपा से कारोबार में तरक्की मिलती है। • घर-परिवार में खुशहाली: भगवान विश्वकर्मा की पूजा से घर-परिवार में खुशहाली आती है। •औजारों और मशीनों की पूजा: यह त्योहार कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा अपने औजारों और मशीनों की पूजा करने के लिए मनाया जाता है, ताकि वे निर्बाध रूप से कार्य कर सकें। विश्वकर्मा पूजा 2025 पूजन विधि (Puja Vidhi) भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधिपूर्वक करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है: 1. प्रातःकाल स्नान: पूजा करने से पहले, व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए। 2. सफाई: स्नान के बाद, अपने घर, कार्यस्थल, औजारों और मशीनों की अच्छी तरह से सफाई करें। 3. मूर्ति/चित्र स्थापना: एक चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। 4. पूजन सामग्री अर्पित करें: भगवान को फूल, धूप, दीप, चंदन, फल और प्रसाद अर्पित करें। 5. मंत्र जाप: भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद पाने के लिए उनके मंत्र ‘ॐ विश्वकर्मणे नमः’ का जाप अवश्य करें। मान्यता है कि इस मंत्र का जाप करने से पूजा का फल और अधिक बढ़ जाता है। 6. प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद, प्रसाद सभी में बांटकर स्वयं भी ग्रहण करें। निष्कर्ष Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा 2025 शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन न केवल हमारे औजारों और मशीनों के प्रति आदर भाव जगाता है, बल्कि हमें कार्य में कुशलता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने में भी मदद करता है। Vishwakarma Jayanti विधि-विधान से पूजा करके हम भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सफलता तथा खुशहाली ला सकते हैं। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

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Indira Ekadashi

Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

Indira Ekadashi: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और इनमें इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi 2025) का स्थान अत्यंत पवित्र है। यह व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली यह एकमात्र एकादशी है, जो इसे पितरों के उद्धार और मोक्ष के लिए समर्पित एक खास अवसर बनाती है। Indira Ekadashi इस दिन भगवान लक्ष्मी नारायण जी की विधिवत पूजा करने और व्रत रखने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि पितरों को भी नरक की यातनाओं से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए, इंदिरा एकादशी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व को विस्तार से जानते हैं। इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त:Date and auspicious time of Indira Ekadashi 2025 वैदिक पंचांग के अनुसार, इंदिरा एकादशी 2025: इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 एकादशी तिथि प्रारंभ: 17 सितंबर को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 16 सितंबर 2025 को मध्य रात्रि 12:21 बजे से शुरू होने का भी उल्लेख है) एकादशी तिथि समाप्त: 17 सितंबर को देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर सनातन धर्म में उदया तिथि मान्य है, जिसके अनुसार सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसलिए, Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। पूजा के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of puja • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • लाभ मुहूर्त (सुबह): सुबह 05:32 बजे से 07:04 बजे तक • अमृत मुहूर्त (सुबह): सुबह 07:04 बजे से 08:36 बजे तक • शुभ मुहूर्त (दोपहर): सुबह 10:08 बजे से 11:40 बजे तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:18 बजे से दोपहर 03:07 बजे तक • लाभ मुहूर्त (शाम): शाम 04:15 बजे से 05:47 बजे तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:24 बजे से शाम 06:47 बजे तक (अन्य स्रोत में 05:45 बजे से 06:10 बजे तक) • चर मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 10:11 बजे से 11:40 बजे तक • निशिता मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 11:16 बजे से 12:03 बजे तक इंदिरा एकादशी पारण का समय:Time of Indira Ekadashi Paran • इंदिरा एकादशी का पारण 18 सितंबर 2025 को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: सुबह 06 बजकर 07 मिनट से सुबह 08 बजकर 34 मिनट तक (अन्य स्रोत में 05:33 बजे से 07:04 बजे तक) इस दौरान साधक स्नान-ध्यान कर लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करें और अन्न व धन का दान कर व्रत खोलें। इंदिरा एकादशी का महत्व: Significance of Indira Ekadashi सनातन धर्म में Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का खास महत्व है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और पितृ पक्ष में पड़ने के कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। • पितरों को मोक्ष: धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि उनके पितरों को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। • पितृ दोष का निवारण: जिन व्यक्तियों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है, क्योंकि यह दोष को शांत करने में मदद करता है। इसे श्राद्ध एकादशी भी कहा जाता है, और इस दिन पितरों का श्राद्ध व तर्पण अत्यंत शुभ माना गया है। • पापों से मुक्ति: नारद मुनि ने राजा इंद्रसेन को बताया था कि यह व्रत न केवल पितरों को मुक्ति दिलाता है, बल्कि व्रत करने वाले के स्वयं के पापों का भी नाश करता है। • सुख-समृद्धि: मान्यता है कि इस व्रत को करने से साधक को जीवन में सुख-समृद्धि मिलती है और सभी सुखों को भोगकर वह बैकुंठ धाम को जाता है। • अश्वमेध यज्ञ के समान फल: शास्त्रों में कहा गया है कि Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। • अकाल मृत्यु से मुक्ति: मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों को भी मुक्ति मिल जाती है। इंदिरा एकादशी की पूजा विधि:Puja Vidhi of Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी Indira Ekadashi का व्रत दशमी तिथि से ही शुरू हो जाता है और द्वादशी तिथि तक चलता है। 1. दशमी तिथि के दिन: • एक समय भोजन: दशमी के दिन भक्त केवल एक समय सात्विक भोजन करते हैं। मांसाहारी भोजन, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज किया जाता है। • ब्रह्मचर्य का पालन: दशमी की रात से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। • पितृ तर्पण (वैकल्पिक): यदि संभव हो तो दशमी के दिन दोपहर में नदी या पवित्र सरोवर में पितरों के लिए तर्पण किया जा सकता है। इसमें जल और काले तिल से पितरों को अर्घ्य दिया जाता है। • घर की शुद्धि: घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें। 2. एकादशी तिथि के दिन • प्रातःकाल स्नान: सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान करें। • व्रत का संकल्प: स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें। संकल्प लेते समय कहें कि “मैं इंदिरा एकादशी का व्रत अपने पितरों को मोक्ष दिलाने और अपने पापों का नाश करने के लिए कर रहा/रही हूं।” • भगवान शालिग्राम की पूजा: भगवान शालिग्राम (विष्णु का एक रूप) या भगवान विष्णु की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं। पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य (फल, मिठाई) अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम या ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। • इंदिरा एकादशी व्रत कथा श्रवण: एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। • पितृ तर्पण: इस दिन दोपहर में पितरों के लिए विशेष तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। Indira Ekadashi इसमें जल, दूध, काले तिल और कुश से पितरों को तर्पण दिया जाता है। • ब्राह्मण भोजन: यदि संभव हो, तो ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा दें। • रात्रि जागरण: रात में जागरण कर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें और उनकी कथाएं सुनें। 3. द्वादशी तिथि के दिन (पारण) • प्रातःकाल पूजा: सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की पुनः पूजा करें। • ब्राह्मण को भोजन और दान: पारण से पहले ब्राह्मणों को भोजन कराएं

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