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Lalitadevi Kavacham: ललितादेवीकवचम्

Lalitadevi Kavacham: ललितादेवीकवचम् अथ ते कवचं देव्या वक्ष्ये नवरतात्मकम् ।येन देवासुरनरजयी स्यात्साधकः सदा ॥ ८९-२३॥ सर्वतः सर्वदाऽऽत्मानं ललिता पातु सर्वगा ।कामेशी पुरतः पातु भगमाली त्वनन्तरम् ॥ ८९-२४॥ दिशं पातु तथा दक्षपार्श्वं मे पातु सर्वदा ।नित्यक्लिन्नाथ भेरुण्डा दिशं मे पातु कौणपीम् ॥ ८९-२५॥ तथैव पश्चिमं भागं रक्षताद्वह्निवासिनी ।महावज्रेश्वरी नित्या वायव्ये मां सदावतु ॥ ८९-२६॥ वामपार्श्वं सदा पातु इतीमेलरिता ततः ।माहेश्वरी दिशं पातु त्वरितं सिद्धिदायिनी ॥ ८९-२७॥ पातु मामूर्ध्वतः शश्चद्दैवताकुलसुन्दरी ।अधो नीलपताकाख्या विजया सर्वतश्च माम् ॥ ८९-२८॥ करोतु मे मङ्गलानि सर्वदा सर्वमङ्गला ।देहन्द्रियमनः प्राणाञ्ज्वालामालिनिविग्रहा ॥ ८९-२९॥ पालयत्वनिशं चित्ता चित्तं मे सर्वदावतु ।कामात्क्रोधात्तथा लोभान्मोहान्मानान्मदादपि ॥ ८९-३०॥ पापान्मां सर्वतः शोकात्सङ्क्षयात्सर्वतः सदा ।असत्यात्क्रूरचिन्तातो हिंसातश्चौरतस्तथा ।स्तैमित्याच्च सदा पान्तु प्रेरयन्त्यः शुभं प्रति ॥ ८९-३१॥ नित्याः षोडश मां पान्तु गजारूढाः स्वशक्तिभिः ।तथा हयसमारूढाः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥ ८९-३२॥ सिंहारूढास्तथा पान्तु पान्तु ऋक्षगता अपि ।रथारूढाश्च मां पान्तु सर्वतः सर्वदा रणे ॥ ८९-३३॥ तार्क्ष्यारूढाश्च मां पान्तु तथा व्योमगताश्च ताः ।भूतगाः सर्वगाः पान्तु पान्तु देव्यश्च सर्वदा ॥ ८९-३४॥ भूतप्रेतपिशाचाश्च परकृत्यादिकान् गदान् ।द्रावयन्तु स्वशक्तीनां भूषणैरायुधैर्मम ॥ ८९-३५॥ गजाश्वद्वीपिपञ्चास्यतार्क्ष्यारूढाखिलायुधाः ।असङ्ख्याः शक्तयो देव्यः पान्तु मां सर्वतः सदा ॥ ८९-३६॥ सायं प्रातर्जपन्नित्याकवचं सर्वरक्षकम् ।कदाचिन्नाशुभं पश्येत्सर्वदाऽऽनन्दमास्थितः ॥ ८९-३७॥ इत्येतत्कवचं प्रोक्तं ललितायाः शुभावहम् ।यस्य सन्धारणान्मर्त्यो निर्भयो विजयी सुखी ॥ ८९-३८॥ इति नारदपुराणे पूर्वभगे एकोननवतितमाध्यायान्तर्गतं ललिता कवचं समाप्तम् । बृहन्नारदीयपुराण । पूर्वभाग । अध्याय ८९/२३-३८॥

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Maa Chandraghanta

Maa Chandraghanta:मां चंद्रघंटा का मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Maa Chandraghanta देवी पार्वती का विवाहित रूप हैं। भगवान शिव से विवाह के बाद देवी महागौरी ने अपने माथे को आधा चंद्र से सजाना शुरू किया और जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चंद्रघंटा के नाम से जाना जाने लगा। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि शुक्र ग्रह देवी चंद्रघंटा द्वारा शासित है। देवी चंद्रघंटा बाघिन पर सवार हैं। वह अपने माथे पर अर्ध-गोलाकार चंद्रमा (चंद्र) पहनती है। उनके माथे पर अर्धचंद्र घंटी (घंटी) की तरह दिखता है और इसी वजह से उन्हें चंद्र-घण्टा के नाम से जाना जाता है। माँ को दस हाथों से चित्रित किया गया है। देवी चंद्रघंटा अपने चार बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार और कमंडल रखती हैं और पांचवें बाएं हाथ को वरद मुद्रा में रखती हैं। वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल का फूल, तीर, धनुष और जप माला धारण करती है और पांचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती है। देवी पार्वती का यह रूप शांत और अपने भक्तों के कल्याण के लिए है। इस रूप में देवी चंद्रघंटा अपने सभी हथियारों के साथ युद्ध के लिए तैयार हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके माथे पर चंद्र-घंटी की आवाज उनके भक्तों से सभी प्रकार की बुरी आत्माओं को दूर कर देती है। Maa Chandraghanta Mantra: मंत्र  ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥ Om Devi Chandraghantayai Namah॥ Maa Chandraghanta प्रार्थना  पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥ Pindaja Pravararudha Chandakopastrakairyuta।Prasadam Tanute Mahyam Chandraghanteti Vishruta॥ Maa Chandraghanta स्तुति  या देवी सर्वभू‍तेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Chandraghanta Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Maa Chandraghanta ध्यान  वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhitalabhaya Chandrardhakritashekharam।Simharudha Chandraghanta Yashasvinim॥Manipura Sthitam Tritiya Durga Trinetram।Khanga, Gada, Trishula, Chapashara, Padma Kamandalu Mala Varabhitakaram॥Patambara Paridhanam Mriduhasya Nanalankara Bhushitam।Manjira, Hara, Keyura, Kinkini, Ratnakundala Manditam॥Praphulla Vandana Bibadhara Kanta Kapolam Tugam Kucham।Kamaniyam Lavanyam Kshinakati Nitambanim॥ Maa Chandraghanta स्तोत्र  आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥ Apaduddharini Tvamhi Adya Shaktih Shubhparam।Animadi Siddhidatri Chandraghante Pranamamyaham॥Chandramukhi Ishta Datri Ishtam Mantra Swarupinim।Dhanadatri, Anandadatri Chandraghante Pranamamyaham॥Nanarupadharini Ichchhamayi Aishwaryadayinim।Saubhagyarogyadayini Chandraghante Pranamamyaham॥ Maa Chandraghanta कवच  रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम्॥बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम्।स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम॥कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च।न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम्॥ Rahasyam Shrinu Vakshyami Shaiveshi Kamalanane।Shri Chandraghantasya Kavacham Sarvasiddhidayakam॥Bina Nyasam Bina Viniyogam Bina Shapoddha Bina Homam।Snanam Shauchadi Nasti Shraddhamatrena Siddhidam॥Kushishyam Kutilaya Vanchakaya Nindakaya Cha।Na Datavyam Na Datavyam Na Datavyam Kadachitam॥ Maa Chandraghanta आरती  जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥मन की मालक मन भाती हो। चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥हर बुधवार को तुझे ध्याये। श्रद्दा सहित तो विनय सुनाए॥मूर्ति चन्द्र आकार बनाए। शीश झुका कहे मन की बाता॥पूर्ण आस करो जगत दाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा॥कर्नाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी॥भक्त की रक्षा करो भवानी।

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Navratri 3rd day Maa Chandraghanta puja vidhi aarti: नवरात्रि के तीसरे दिन होती है मां चंद्रघंटा की पूजा, नोट कर लें पूजन विधि और आरती

Maa Chandraghanta puja vidhi: चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है और इसका तीसरा दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप, मां चंद्रघंटा को समर्पित है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और ममतामयी है, जो अपने भक्तों को सुख-समृद्धि और शांति प्रदान करता है। इस बार द्वितीया और तृतीया नवरात्रि व्रत एक ही दिन किए जाएंगे। Maa Chandraghanta: मां चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का एक अर्धचंद्र स्थित है, जिससे उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। यह नाम उनके दिव्य रूप को दर्शाता है, जिसमें एक अद्वितीय तेज और ममता समाहित है। उनका स्वरूप अत्यंत अलौकिक और भव्य माना जाता है। वे शांतिपूर्ण होने के साथ-साथ उनकी शक्ति भी अद्वितीय है, जो हर क्षेत्र में सफलता और समृद्धि प्रदान करती है। मां ने अपने भक्तों के दुखों को दूर करने के लिए हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा धारण कर रखे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता चंद्रघंटा को राक्षसों का वध करने वाली देवी भी कहा जाता है। पूजा का महत्व और लाभ नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की विशेष पूजा करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, जीवन में खुशहाली आती है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। पूजा के फलस्वरूप, लोग आपको अधिक सम्मान देने लगते हैं। मां चंद्रघंटा की पूजा से न केवल भौतिक सुख में वृद्धि होती है, बल्कि समाज में आपका प्रभाव भी बढ़ता है। उनकी आराधना से जीवन के सभी पहलुओं में सफलता प्राप्त होती है। Maa Chandraghanta puja vidhi: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि मां चंद्रघंटा को प्रसन्न करने के लिए इन विधियों का पालन करें: 1. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें: सुबह जल्दी उठें और स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनें। 2. वस्त्र और फूल अर्पित करें: पूजा में मां को लाल और पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें। Maa Chandraghanta मां चंद्रघंटा को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए पूजा में पीले रंग के फूलों का प्रयोग करें। लाल और पीले गेंदे के फूल चढ़ाने का विशेष महत्व है, क्योंकि ये मां की ममता और शक्ति का प्रतीक हैं। 3. कुमकुम और अक्षत: इसके बाद मां को कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। 4. गंध, धूप, पुष्प: मां चंद्रघंटा को सिंदूर, अक्षत, गंध, धूप और पुष्प अर्पित करें। 5. भोग अर्पित करें: मां चंद्रघंटा Maa Chandraghanta को पीले रंग की मिठाई और दूध से बनी खीर का भोग अर्पित करें। खीर का भोग अर्पित करना सर्वोत्तम माना जाता है, और मां को विशेष रूप से केसर की खीर बहुत पसंद है। इसके अतिरिक्त, आप लौंग, इलायची, पंचमेवा और दूध से बनी मिठाइयां भी मां को भोग के रूप में अर्पित कर सकते हैं। भोग में मिसरी और पेड़े भी जरूर रखें। 6. मंत्र जाप करें: पूजा के दौरान मां के मंत्रों का जाप करें। मां की अराधना “ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः” का जप करके की जाती है। 7. दुर्गा सप्तशती और आरती: साथ ही दुर्गा सप्तशती और अंत में मां चंद्रघंटा की आरती का पाठ भी करें। नवरात्रि के हर दिन नियम से दुर्गा चालीसा और दुर्गा आरती करें। 8. सूर्योदय से पहले पूजा: विशेष रूप से, इस दिन सूर्योदय से पहले पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इस समय मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इन सभी विधियों को विधिपूर्वक करने से मां चंद्रघंटा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। मां चंद्रघंटा का पूजा मंत्र: Maa Chandraghanta puja Mantra • पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्द्रघण्टेति विश्रुता।। • वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्। सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥ • मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्। रंग, गदा, त्रिशूल,चापचर,पदम् कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥ मां चंद्रघंटा की आरती:Maa Chandraghanta Arti जय मां चंद्रघंटा Maa Chandraghanta सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम। चंद्र समान तुम शीतल दाती। चंद्र तेज किरणों में समाती। क्रोध को शांत करने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली। मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो। सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली। हर बुधवार जो तुझे ध्याये। श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं। मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योत जलाएं। शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता। कांची पुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटू महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी। इस प्रकार, चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा करके आप उनके आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि ला सकते हैं। Sindoor Tritiya 2025 Date And Time: सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि, पूजा का समय, अनुष्ठान और महत्व

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Ashwin Chandra Darshan 2025 date : चंद्र दर्शन कब है, पूजन विधि,महत्व

Ashwin Chandra Darshan: चंद्र दर्शन अमावस्या के उपरांत चंद्र देव के पुनः आगमन एवं उनके दर्शन की परंपरा है। हिंदू धर्म में सूर्य दर्शन की ही तरह चंद्र दर्शन का भी अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इस दिन श्रद्धालु चंद्र देव की पूजा एवं विशेष प्रार्थना करते हैं। अमावस्या के तुरंत बाद चंद्रमा का दर्शन करना अत्यंत शुभ माना गया है। पुराणों में चंद्र देव को पूजनीय देवताओं में से एक माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंद्रमा को मन का निर्देशक माना जाता है। चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव की पूजा अर्चना करना मानसिक शांति के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है, Chandra Darshan इसलिए हिंदू धर्म में इस तिथि का विशेष महत्व है। तो चलिए जानते हैं कि वैशाख मास में चंद्रदर्शन कब है, और इस तिथि का महत्व व अनुष्ठान क्या हैं:- Chandra Darshan Kab Manaya Jayega: चंद्र दर्शन कब मनाया जायेगा? अमावस्या के बाद अगले दिन या दूसरे दिन को चन्द्र दर्शन दिवस कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास का चंद्रदर्शन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर 23 सितम्बर 2025, मंगलवार को मनाया जायेगा। चंद्र दर्शन का समय 05:53 पी एम से 06:33 पी एम तक रहेगा। जिसकी कुल अवधि 00 घण्टा 40 मिनट्स होगी। Kyo Manate Hai Chandra Darshan:क्यों मनाते हैं चंद्र दर्शन? चंद्रमा ‘नवग्रहों’ में से एक ग्रह है और पृथ्वी पर जनजीवन को प्रभावित करता है। Chandra Darshan ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति पर चंद्र देव का आशीर्वाद रहता है, उसे सफलता और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए भक्त, सुख-समृद्धि की कामना करते हुए पूजा व व्रत रखते हैं। चंद्र दर्शन का महत्व:Importance of Chandra Darshan अमावस्या के बाद अगले दिन या दूसरे दिन को चन्द्र दर्शन दिवस कहा जाता है। यह पूजा कई मायनों में लाभकारी और कल्याणकारी मानी जाती है। चंद्र दर्शन के दिन चंद्रमा की पूजा से मन को शांति मिलती है। साथ ही जीवन में सफलता के अनेक रास्ते खुलते हैं, साथ ही सद्बुद्धि की भी प्राप्ति होती है। वहीं जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा निम्न या अशुभ स्थिति में मौजूद होता है उन्हें अपने जीवन में तमाम परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। Chandra Darshan इसलिए कहा जाता है कि ऐसी कुंडली वाले लोग यदि चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देवता की उपासना के साथ व्रत रखते हैं तो चंद्र से उत्पन्न होने वाले उनके ग्रह दोष शांत हो जाते हैं। चंद्र दर्शन पूजन विधि:Chandra Darshan Puja Vidhi अगर आप चंद्र दर्शन तिथि के दिन चंद्र देव की कृपा प्राप्त प्राप्ति के लिए चंद्र देव की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करना चाहते हैं तो यह आपके लिए है। इस पूजा को करने से चंद्र देव की कृपा और आशीष आप पर बना रहता है। तो चलिए विस्तार पूर्वक इस पूजा विधि के बारे में जानते हैं। चंद्र तिथि के दिन सुबह उठकर चंद्र देव का स्मरण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद स्नान आदि कार्यों से निवृत होकर पूरे विधि-विधान से घर के मंदिर में पूजा-पाठ करें। पूजा के समय चंद्र दर्शन की व्रत कथा अवश्य सुनें। इसके बाद पूरा दिन फलाहार करके व्रत रखें। शास्त्रों के अनुसार, चंद्र दर्शन की तिथि के दिन, शाम के समय चंद्र देव की पूजा की जाती है। चंद्र देव को सबसे पहले अर्घ्य दें, इसके बाद उन्हें पुष्प, दीप, नैवेद्य, रोली और अक्षत अर्पित करें और चंद्र देवता को खीर का प्रसाद अर्पित करें। चंद्र भगवान की पूजा करते समय इस मंत्र का जाप करें- “ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृत तत्वाय धीमहि, तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्” चंद्रमा की विधिवत पूजा अर्चना करने के बाद व्रत का पारण करें। चंद्र दर्शन पर दान देना भी एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, इसके बिना आपका व्रत संपूर्ण नहीं होता है। What to do on the day of Chandra Darshan:चंद्र दर्शन के दिन क्या करें? इस दिन ब्राह्मणों को कपड़े, चावल और चीनी समेत अन्य चीजों का दान करना फलदायी माना जाता है। साथ ही व्रत रखने वाले उपासक इस बात का ध्यान रखें कि चंद्र देव के दर्शन और उनकी पूजा के बाद ही व्रत का पारण करें। इससे आपके जीवन में जीवन में शीतलता और शांति आएगी। जल में अपनी छाया देखकर चंद्र देव पर जल अर्पित करें। इससे मानसिक विकारों से मुक्ति मिल सकती है और मन शांत होता है। यदि आपकी माता का स्वास्थ्य ख़राब रहता है, तो चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव शतावरी की जड़ अर्पित करें। इससे उन्हें स्वास्थ्य लाभ हो सकता है. सौभाग्य की प्राप्ति के लिए चंद्र देव को चांदी का सिक्का अर्पित करें और उसे अपनी तिजोरी में रखें। इससे सौभाग्य व समृद्धि में वृद्धि होती है। What not to do on the day of Chandra Darshan:चंद्र दर्शन के दिन क्या न करें? इस दिन किसी की बुराई न करें, किसी को अपशब्द न कहें और किसी का दिल न दुखाएं चंद्र दर्शन के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए, इससे चंद्रमा की कृपा कम होती है। इस दिन वाद-विवाद या लड़ाई-झगड़े से बचना चाहिए। चंद्र दर्शन के दिन मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन चोरी या अन्य अपराधों से बचना चाहिए। Sindoor Tritiya 2025 Date And Time: सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि, पूजा का समय, अनुष्ठान और महत्व

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Sindoor Tritiya 2025

Sindoor Tritiya 2025 Date And Time: सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि, पूजा का समय, अनुष्ठान और महत्व

Sindoor Tritiya 2025:शारदीय नवरात्रि का तृतीया दिन देवी पार्वती के माँ चंद्रघंटा रूप को समर्पित है, यही तृतीया दिवस सिंदूर तृतीया पर्व के नाम से प्रसिद्ध है। हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ला तृतीया तिथि को सिंदूर तृतीया मनायी जाती है। सिंदूर को सुहाग की निशानी माना जाता है। विवाहित होकर भी सिंदूर न लगाना अशुभ माना जाता है। सिंदूर तृतीया के दिन माता रानी को सिंदूर चढ़ाने से सुहागिन स्त्रियों के सौभाग्य में वृद्धि होती है। सिंदूर को देवी पूजा की विशेष सामग्रियों मे शामिल किया जाता है। सिंदूर तृतीया Sindoor Tritiya 2025 को भक्तों द्वारा नवरात्रि पर्व के तीसरे दिन मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर, भक्त देवी के तीसरे रूप की पूजा करते हैं, जिसका नाम देवी चंद्रघंटा है। उत्तर भारत के राज्यों में, यह दिन काफी महत्व रखता है। सिंदूर तृतीया Sindoor Tritiya 2025 का अनुष्ठान नवरात्रि के दौरान किया जाता है क्योंकि नवरात्रि का अवसर इस त्योहार के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है। सिंदूर (सिंदूर या लाल पाउडर) विभिन्न हिंदू अनुष्ठानों की सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण चीजों में से एक है और देवी दुर्गा की पूजा करते समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। दक्षिण भारत के राज्यों में, सिंदूर तृतीया की रस्म नवरात्रि उत्सव के पहले तीन दिनों के समापन का प्रतीक है। देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद Sindoor Tritiya 2025 Date:सिंदूर तृतीया उत्सव 2025 तिथि Sindoor Tritiya 2025: सिंदूर तृतीया पर्व 24 सितम्बर, 2025 को मनाया जायेगा । सिन्दूर तृतीया पूजा विधि:Sindoor Tritiya Puja Method Sindoor Tritiya 2025 सिन्दूर तृतीया शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन यानी हिंदू कैलेंडर के अनुसार तृतीया तिथि को मनाई जाती है। यह दिन देवी के नौ रूपों में से तीसरे माता देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। सिन्दूर तृतीया के दिन माता रानी को सिन्दूर चढ़ाने से विवाहित महिलाओं का सौभाग्य बढ़ता है, घर में सुख-शांति आती है और जीवन की परेशानियां दूर होती हैं। सिन्दूर देवी पूजा की विशेष वस्तुओं में शामिल है। Sindoor Tritiya 2025 सिन्दूर तृतीया के दिन लाखों महिलाएं बड़ी धूमधाम से माता रानी की पूजा करती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं। सिन्दूर तृतीया का महत्व:Significance of Sindoor Tritiya हिंदू कैलेंडर के अनुसार, सिन्दूर तृतीया तृतीया तिथि यानी कि नवरात्रि के तीसरे दिन मनाई जाती है। सिन्दूर तृतीया को महा तृतीया नवरात्रि दुर्गा पूजा, सौभाग्य तीज और गौरी तीज जैसे नामों से भी जाना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं माता को सिन्दूर लगाने के बाद बचे हुए सिन्दूर को प्रसाद के रूप में अपने पास रख लेती हैं। कहा जाता है कि उसी सिन्दूर से घर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक चिन्ह बनाना चाहिए जिससे घर में शांति और समृद्धि बनी रहे। यह दिन माता चंद्रघंटा के विवाहित रूप में माता पार्वती का प्रतिनिधित्व करता है।

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Durga Sahasranama Stotram:दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम्

Durga Sahasranama Stotram:दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ॥ श्रीः ॥ ॥ श्री दुर्गायै नमः ॥ ॥ अथ श्री दुर्गासहस्रनामस्तोत्रम् ॥ नारद उवाच – कुमार गुणगम्भीर देवसेनापते प्रभो । सर्वाभीष्टप्रदं पुंसां सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १॥ गुह्याद्गुह्यतरं स्तोत्रं भक्तिवर्धकमञ्जसा । मङ्गलं ग्रहपीडादिशान्तिदं वक्तुमर्हसि ॥ २॥ स्कन्द उवाच – श‍ृणु नारद देवर्षे लोकानुग्रहकाम्यया । यत्पृच्छसि परं पुण्यं तत्ते वक्ष्यामि कौतुकात् ॥ ३॥ माता मे लोकजननी हिमवन्नगसत्तमात् । मेनायां ब्रह्मवादिन्यां प्रादुर्भूता हरप्रिया ॥ ४॥ महता तपसाऽऽराध्य शङ्करं लोकशङ्करम् । स्वमेव वल्लभं भेजे कलेव हि कलानिधिम् ॥ ५॥ नगानामधिराजस्तु हिमवान् विरहातुरः । स्वसुतायाः परिक्षीणे वसिष्ठेन प्रबोधितः ॥ ६॥ त्रिलोकजननी सेयं प्रसन्ना त्वयि पुण्यतः । प्रादुर्भूता सुतात्वेन तद्वियोगं शुभं त्यज ॥ ७॥ बहुरूपा च दुर्गेयं बहुनाम्नी सनातनी । सनातनस्य जाया सा पुत्रीमोहं त्यजाधुना ॥ ८॥ इति प्रबोधितः शैलः तां तुष्टाव परां शिवाम् । तदा प्रसन्ना सा दुर्गा पितरं प्राह नन्दिनी ॥ ९॥ मत्प्रसादात्परं स्तोत्रं हृदये प्रतिभासताम् । तेन नाम्नां सहस्रेण पूजयन् काममाप्नुहि ॥ १०॥ इत्युक्त्वान्तर्हितायां तु हृदये स्फुरितं तदा । नाम्नां सहस्रं दुर्गायाः पृच्छते मे यदुक्तवान् ॥ ११॥ मङ्गलानां मङ्गलं तद् दुर्गानाम सहस्रकम् । सर्वाभीष्टप्रदां पुंसां ब्रवीम्यखिलकामदम् ॥ १२॥ दुर्गादेवी समाख्याता हिमवानृषिरुच्यते । छन्दोनुष्टुप् जपो देव्याः प्रीतये क्रियते सदा ॥ १३॥ ऋषिच्छन्दांसि – अस्य श्रीदुर्गास्तोत्रमहामन्त्रस्य । हिमवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । दुर्गाभगवती देवता । श्रीदुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । श्रीभगवत्यै दुर्गायै नमः । देवीध्यानम् ॐ ह्रीं कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां शङ्खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् । सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ॥ श्री जयदुर्गायै नमः । ॐ शिवाऽथोमा रमा शक्तिरनन्ता निष्कलाऽमला । शान्ता माहेश्वरी नित्या शाश्वता परमा क्षमा ॥ १॥ अचिन्त्या केवलानन्ता शिवात्मा परमात्मिका । अनादिरव्यया शुद्धा सर्वज्ञा सर्वगाऽचला ॥ २॥ एकानेकविभागस्था मायातीता सुनिर्मला । महामाहेश्वरी सत्या महादेवी निरञ्जना ॥ ३॥ काष्ठा सर्वान्तरस्थाऽपि चिच्छक्तिश्चात्रिलालिता । सर्वा सर्वात्मिका विश्वा ज्योतीरूपाऽक्षराऽमृता ॥ ४॥ शान्ता प्रतिष्ठा सर्वेशा निवृत्तिरमृतप्रदा । व्योममूर्तिर्व्योमसंस्था व्योमाधाराऽच्युताऽतुला ॥ ५॥ अनादिनिधनाऽमोघा कारणात्मकलाकुला । ऋतुप्रथमजाऽनाभिरमृतात्मसमाश्रया ॥ ६॥ प्राणेश्वरप्रिया नम्या महामहिषघातिनी । प्राणेश्वरी प्राणरूपा प्रधानपुरुषेश्वरी ॥ ७॥ सर्वशक्तिकलाऽकामा महिषेष्टविनाशिनी । सर्वकार्यनियन्त्री च सर्वभूतेश्वरेश्वरी ॥ ८॥ अङ्गदादिधरा चैव तथा मुकुटधारिणी । सनातनी महानन्दाऽऽकाशयोनिस्तथेच्यते ॥ ९॥ चित्प्रकाशस्वरूपा च महायोगेश्वरेश्वरी । महामाया सुदुष्पारा मूलप्रकृतिरीशिका ॥ १०॥ संसारयोनिः सकला सर्वशक्तिसमुद्भवा । संसारपारा दुर्वारा दुर्निरीक्षा दुरासदा ॥ ११॥ प्राणशक्तिश्च सेव्या च योगिनी परमाकला । महाविभूतिर्दुर्दर्शा मूलप्रकृतिसम्भवा ॥ १२॥ अनाद्यनन्तविभवा परार्था पुरुषारणिः । सर्गस्थित्यन्तकृच्चैव सुदुर्वाच्या दुरत्यया ॥ १३॥ शब्दगम्या शब्दमाया शब्दाख्यानन्दविग्रहा । प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ॥ १४॥ पुराणी चिन्मया पुंसामिष्टदा पुष्टिरूपिणी । पूतान्तरस्था कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता ॥ १५॥ जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिस्वरूपिणी । वाञ्छाप्रदाऽनवच्छिन्नप्रधानानुप्रवेशिनी ॥ १६॥ क्षेत्रज्ञाऽचिन्त्यशक्तिस्तु प्रोच्यतेऽव्यक्तलक्षणा । मलापवर्जिताऽऽनादिमाया त्रितयतत्त्विका ॥ १७॥ प्रीतिश्च प्रकृतिश्चैव गुहावासा तथोच्यते । महामाया नगोत्पन्ना तामसी च ध्रुवा तथा ॥ १८॥ व्यक्ताऽव्यक्तात्मिका कृष्णा रक्ता शुक्ला ह्यकारणा । प्रोच्यते कार्यजननी नित्यप्रसवधर्मिणी ॥ १९॥ सर्गप्रलयमुक्ता च सृष्टिस्थित्यन्तधर्मिणी । ब्रह्मगर्भा चतुर्विंशस्वरूपा पद्मवासिनी ॥ २०॥ अच्युताह्लादिका विद्युद्ब्रह्मयोनिर्महालया । महालक्ष्मी समुद्भावभावितात्मामहेश्वरी ॥ २१॥ महाविमानमध्यस्था महानिद्रा सकौतुका । सर्वार्थधारिणी सूक्ष्मा ह्यविद्धा परमार्थदा ॥ २२॥ अनन्तरूपाऽनन्तार्था तथा पुरुषमोहिनी । अनेकानेकहस्ता च कालत्रयविवर्जिता ॥ २३॥ ब्रह्मजन्मा हरप्रीता मतिर्ब्रह्मशिवात्मिका । ब्रह्मेशविष्णुसम्पूज्या ब्रह्माख्या ब्रह्मसंज्ञिता ॥ २४॥ व्यक्ता प्रथमजा ब्राह्मी महारात्रीः प्रकीर्तिता । ज्ञानस्वरूपा वैराग्यरूपा ह्यैश्वर्यरूपिणी ॥ २५॥ धर्मात्मिका ब्रह्ममूर्तिः प्रतिश्रुतपुमर्थिका । अपांयोनिः स्वयम्भूता मानसी तत्त्वसम्भवा ॥ २६॥ ईश्वरस्य प्रिया प्रोक्ता शङ्करार्धशरीरिणी । भवानी चैव रुद्राणी महालक्ष्मीस्तथाऽम्बिका ॥ २७॥ महेश्वरसमुत्पन्ना भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी । सर्वेश्वरी सर्ववन्द्या नित्यमुक्ता सुमानसा ॥ २८॥ महेन्द्रोपेन्द्रनमिता शाङ्करीशानुवर्तिनी । ईश्वरार्धासनगता माहेश्वरपतिव्रता ॥ २९॥ संसारशोषिणी चैव पार्वती हिमवत्सुता । परमानन्ददात्री च गुणाग्र्या योगदा तथा ॥ ३०॥ ज्ञानमूर्तिश्च सावित्री लक्ष्मीः श्रीः कमला तथा । अनन्तगुणगम्भीरा ह्युरोनीलमणिप्रभा ॥ ३१॥ सरोजनिलया गङ्गा योगिध्येयाऽसुरार्दिनी । सरस्वती सर्वविद्या जगज्ज्येष्ठा सुमङ्गला ॥ ३२॥ वाग्देवी वरदा वर्या कीर्तिः सर्वार्थसाधिका । वागीश्वरी ब्रह्मविद्या महाविद्या सुशोभना ॥ ३३॥ ग्राह्यविद्या वेदविद्या धर्मविद्याऽऽत्मभाविता । स्वाहा विश्वम्भरा सिद्धिः साध्या मेधा धृतिः कृतिः ॥ ३४॥ सुनीतिः संकृतिश्चैव कीर्तिता नरवाहिनी । पूजाविभाविनी सौम्या भोग्यभाग् भोगदायिनी ॥ ३५॥ शोभावती शाङ्करी च लोला मालाविभूषिता । परमेष्ठिप्रिया चैव त्रिलोकीसुन्दरी माता ॥ ३६॥ नन्दा सन्ध्या कामधात्री महादेवी सुसात्त्विका । महामहिषदर्पघ्नी पद्ममालाऽघहारिणी ॥ ३७॥ विचित्रमुकुटा रामा कामदाता प्रकीर्तिता । पिताम्बरधरा दिव्यविभूषण विभूषिता ॥ ३८॥ दिव्याख्या सोमवदना जगत्संसृष्टिवर्जिता । निर्यन्त्रा यन्त्रवाहस्था नन्दिनी रुद्रकालिका ॥ ३९॥ आदित्यवर्णा कौमारी मयूरवरवाहिनी । पद्मासनगता गौरी महाकाली सुरार्चिता ॥ ४०॥ अदितिर्नियता रौद्री पद्मगर्भा विवाहना । विरूपाक्षा केशिवाहा गुहापुरनिवासिनी ॥ ४१॥ महाफलाऽनवद्याङ्गी कामरूपा सरिद्वरा । भास्वद्रूपा मुक्तिदात्री प्रणतक्लेशभञ्जना ॥ ४२॥ कौशिकी गोमिनी रात्रिस्त्रिदशारिविनाशिनी । बहुरूपा सुरूपा च विरूपा रूपवर्जिता ॥ ४३॥ भक्तार्तिशमना भव्या भवभावविनाशिनी । सर्वज्ञानपरीताङ्गी सर्वासुरविमर्दिका ॥ ४४॥ पिकस्वनी सामगीता भवाङ्कनिलया प्रिया । दीक्षा विद्याधरी दीप्ता महेन्द्राहितपातिनी ॥ ४५॥ सर्वदेवमया दक्षा समुद्रान्तरवासिनी । अकलङ्का निराधारा नित्यसिद्धा निरामया ॥ ४६॥ कामधेनुबृहद्गर्भा धीमती मौननाशिनी । निःसङ्कल्पा निरातङ्का विनया विनयप्रदा ॥ ४७॥ ज्वालामाला सहस्राढ्या देवदेवी मनोमया । सुभगा सुविशुद्धा च वसुदेवसमुद्भवा ॥ ४८॥ महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी भक्तिगम्या परावरा । ज्ञानज्ञेया परातीता वेदान्तविषया मतिः ॥ ४९॥ दक्षिणा दाहिका दह्या सर्वभूतहृदिस्थिता । योगमाया विभागज्ञा महामोहा गरीयसी ॥ ५०॥ सन्ध्या सर्वसमुद्भूता ब्रह्मवृक्षाश्रयाऽदितिः । बीजाङ्कुरसमुद्भूता महाशक्तिर्महामतिः ॥ ५१॥ ख्यातिः प्रज्ञावती संज्ञा महाभोगीन्द्रशायिनी । हींकृतिः शङ्करी शान्तिर्गन्धर्वगणसेविता ॥ ५२॥ वैश्वानरी महाशूला देवसेना भवप्रिया । महारात्री परानन्दा शची दुःस्वप्ननाशिनी ॥ ५३॥ ईड्या जया जगद्धात्री दुर्विज्ञेया सुरूपिणी । गुहाम्बिका गणोत्पन्ना महापीठा मरुत्सुता ॥ ५४॥ हव्यवाहा भवानन्दा जगद्योनिः प्रकीर्तिता । जगन्माता जगन्मृत्युर्जरातीता च बुद्धिदा ॥ ५५॥ सिद्धिदात्री रत्नगर्भा रत्नगर्भाश्रया परा । दैत्यहन्त्री स्वेष्टदात्री मङ्गलैकसुविग्रहा ॥ ५६॥ पुरुषान्तर्गता चैव समाधिस्था तपस्विनी । दिविस्थिता त्रिनेत्रा च सर्वेन्द्रियमनोधृतिः ॥ ५७॥ सर्वभूतहृदिस्था च तथा संसारतारिणी । वेद्या ब्रह्मविवेद्या च महालीला प्रकीर्तिता ॥ ५८॥ ब्राह्मणिबृहती ब्राह्मी ब्रह्मभूताऽघहारिणी । हिरण्मयी महादात्री संसारपरिवर्तिका ॥ ५९॥ सुमालिनी सुरूपा च भास्विनी धारिणी तथा । उन्मूलिनी सर्वसभा सर्वप्रत्ययसाक्षिणी ॥ ६०॥ सुसौम्या चन्द्रवदना ताण्डवासक्तमानसा । सत्त्वशुद्धिकरी शुद्धा मलत्रयविनाशिनी ॥ ६१॥ जगत्त्त्रयी जगन्मूर्तिस्त्रिमूर्तिरमृताश्रया । विमानस्था विशोका च शोकनाशिन्यनाहता ॥ ६२॥ हेमकुण्डलिनी काली पद्मवासा सनातनी । सदाकीर्तिः सर्वभूतशया देवी सतांप्रिया ॥ ६३॥ ब्रह्ममूर्तिकला चैव कृत्तिका कञ्जमालिनी । व्योमकेशा क्रियाशक्तिरिच्छाशक्तिः परागतिः ॥ ६४॥ क्षोभिका खण्डिकाभेद्या भेदाभेदविवर्जिता । अभिन्ना भिन्नसंस्थाना वशिनी वंशधारिणी ॥ ६५॥ गुह्यशक्तिर्गुह्यतत्त्वा सर्वदा सर्वतोमुखी । भगिनी च निराधारा निराहारा प्रकीर्तिता ॥ ६६॥ निरङ्कुशपदोद्भूता चक्रहस्ता विशोधिका । स्रग्विणी पद्मसम्भेदकारिणी परिकीर्तिता ॥ ६७॥ परावरविधानज्ञा महापुरुषपूर्वजा । परावरज्ञा विद्या च विद्युज्जिह्वा जिताश्रया ॥ ६८॥ विद्यामयी सहस्राक्षी सहस्रवदनात्मजा । सहस्ररश्मिःसत्वस्था महेश्वरपदाश्रया ॥ ६९॥ ज्वालिनी सन्मया व्याप्ता चिन्मया पद्मभेदिका । महाश्रया महामन्त्रा महादेवमनोरमा ॥ ७०॥ व्योमलक्ष्मीः सिंहरथा चेकितानाऽमितप्रभा । विश्वेश्वरी भगवती सकला कालहारिणी ॥ ७१॥ सर्ववेद्या सर्वभद्रा गुह्या दूढा गुहारणी । प्रलया योगधात्री च गङ्गा विश्वेश्वरी तथा ॥ ७२॥ कामदा कनका कान्ता कञ्जगर्भप्रभा तथा । पुण्यदा कालकेशा च भोक्त्त्री पुष्करिणी तथा ॥ ७३॥ सुरेश्वरी भूतिदात्री भूतिभूषा प्रकीर्तिता । पञ्चब्रह्मसमुत्पन्ना परमार्थाऽर्थविग्रहा ॥ ७४॥ वर्णोदया भानुमूर्तिर्वाग्विज्ञेया मनोजवा । मनोहरा महोरस्का तामसी वेदरूपिणी ॥ ७५॥ वेदशक्तिर्वेदमाता वेदविद्याप्रकाशिनी । योगेश्वरेश्वरी माया महाशक्तिर्महामयी ॥ ७६॥ विश्वान्तःस्था वियन्मूर्तिर्भार्गवी सुरसुन्दरी । सुरभिर्नन्दिनी विद्या

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Rishikrita Katyayani Stutih: ऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः

Rishikrita Katyayani Stutih: ऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः अन्य दुर्गाध्यानानि । ॥ कात्यायनी ॥ कात्यायनी दशभुजा देवी ही महिषासुर मर्दिनी है । प्रथम कल्पमें उग्रचण्डा रूप में, द्वितीय कल्प में १६ भुजा भद्रकाली रूप मेंतथा तृतीय कल्प में कात्यायनी ने दश भुजा रूप धारण करकेमहिषासुर का वध किया । कात्यायनी मुनि के द्वारा स्तुति करने परबिल्व वृक्ष के पास देवी प्रकट हुई थी । आश्विन कृष्णा १४ कोभगवती प्रकट हुई थी । शुक्ला सप्तमी को देवी की तेजोमयी मूर्तिने शोभनरूप धारण किया । अष्टमी को समलङ्कृत की गई तथानवमी को उपहारों से पूजित हुई एवं उसने महिषासुर का वध कियातथा दशमी को देवी विदा हुई (इति कालिका पुराणे) । नमस्कार ध्यान ।चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।कात्यायनी शुभं दद्याद् देवि दानव घातिनी ॥ कात्यायनी गायत्री –ॐ कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारी धीमहि तन्नो दुर्गेः प्रचोदयात् । कात्यायनी ध्यानम् ।चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी ॥ देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद, प्रसीद। मातर्जगतोऽखिलस्य ।प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ॥ कात्यायनीस्तुतिः ऋषिकृता ॥ (महाकाल संहितायाम्)जगदम्ब जयानन्ते सर्वेकसाक्षिणि ।सङ्कटोद्धारिणि शिवे भक्तानामभयङ्करे ॥ समस्त जगताधारभूते ब्रह्मस्वरूपिणि ।विधीश हरि शक्रादि देवा विदित वैभवे ॥ सृष्टि स्थिति प्रलयकृत् त्रिगुणात्मक विग्रहे ।परापरेशि प्रणतमनुज-प्राणदायिनि ॥ मदुपास्यतया ख्यातनाम्नि त्रिभुवनेश्वरि ।कात्यायनि जगद्वन्द्ये महाकालि नमोस्तुते ॥ मत्प्राणरक्षणकृते भीनाशय दिवौकसाम् ।स्वरूपं दर्शयामुष्मै विल्ववृक्षाद् विनिःसृता ॥ दशभुजा कात्यायनी ध्यानम् ।जटाजूटसमायुक्तामर्धेन्दुकृत लक्षणाम् ।नेत्रत्रयसमायुक्तां पद्मेन्दुसदृशाननाम् ॥ अतसीपुष्पवर्णाभां सुप्रतिष्ठां सुलोचनाम् ।नवयौवन सम्पन्नां सर्वाभरणभूषिताम् ॥ सुचारुदशनां तद्वत्पीनोन्नतपयोधराम् ।त्रिभङ्गस्थान संस्थानां महिषासुरमर्दिनीम् ॥ त्रिशूलं दक्षिणे दद्यात् खड्गं चक्रं क्रमादधः ।तीक्ष्णं बाणं तथा शक्तिं वामतोऽपि निबोधत ॥ खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुश मूर्ध्वतः ।घण्टां वा परशुं चापि वामतः सन्निवेशयेत् ॥ अधस्तान्महिषं तद्वधि शिरस्कं प्रदर्शयेत् ।शिरश्चेदोद्भवं तद्वद्दानवं खड्गपाणिनम् ॥ ॥ षोडशभुजा दुर्गा ध्यानम् ॥ महिषासुर मर्दिनी षोडशभुजा दुर्गा भद्रकाली ही है । क्षीरोदस्योत्तरे तीरे विभ्रती विपुलां तनुम् ।अतसीपुष्पवर्णाभा ज्वलत्काञ्चनकुण्डलाम् ॥ जटाजूटमखण्डेन्दुमुकुटत्रय भूषिता ।नागहारेण सहिता स्वर्णहार विभूषिता ॥ शूलं खड्गं च शङ्ख च चक्रं बाणं तथैव च ।शक्तिं वज्रं च दण्डं च नित्यं दक्षिणबाहुभिः ॥ विभ्रती सततं देवी विकाशिनयनोज्ज्वला ।खेटकं चर्म चापं च पाशञ्चाङ्कुशमेव च ॥ घण्टां परशुं मुशलं विभ्रतो वामपाणिभिः ।सिंहस्था नयनै रक्तवर्णैस्त्रिभिरभिज्ज्वला ॥ शूलेन महिषं भित्त्वा तिष्ठती परमेश्वरी ।वामपादेन चाक्रम्य तत्र देवी जगन्मयी ॥ अष्टादशभुजा दुर्गा ध्यानम् ।अष्टादशभुजा दुर्गा उग्रचण्ड स्वरूपा है ।कल्पभेद महिषासुरमर्दिनि का महालक्ष्मी स्वरूपा भेद भी यही है । ध्यानम् ।अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुःकुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ॥। १॥ शूलं पाश सुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मी सरोजस्थिताम् ॥ २॥ अन्यच्च ।ततो ध्यायेन्महालक्ष्मी महिषासुरमर्दिनीम् ।समस्तदेवता तेजोजातां पद्मासन स्थिताम् ॥ अष्टादशभुजामक्षमालां पद्मं च शायकान् ।खड्गं वज्रं गदां चक्रं दक्षहस्ते कमण्डलुम् ॥ खड्गं च दधतीं वामे शक्तिं च परशुं धनुः ।चर्मदण्डौ सुरापात्रं घण्टां पाशं त्रिशूलकम् ॥ अष्टादशभुजा ध्यानम् ।धम्मिल्लसंयतकचा विधोश्चाधोमुखीं कलाम् ।केशान्ते तिलकस्योद्धे दधती सुमनोहरा ॥ मणिकुण्डल सन्धृष्टगण्डा मुकुटमण्डिता ।सज्ज्योतिः कर्णपूराभ्यां कर्णावापूर्य सङ्गता ॥ ससुवर्णमणिमाणिक्य नागहार विराजिता ।सदासुधिभिः पद्मैरम्लानैरति सुन्दरी ॥ मालां विभर्ति ग्रीवायां रत्नकेयूरधारिणी ।मृणालायत वृत्तैस्तु बाहुभिः कोमलै शुभैः ॥ राजन्ती कञ्जुकोपेता पीनोन्नत पयोधरा ।क्षीणमध्या पीतवस्त्रा त्रिवलोमध्यभूषिता ॥ अष्टादशभुजैका तु दक्षे मुण्डं च खेटकम् ।आदर्शं तर्जनीं चाप ध्वजं डमरुकं चर्मं च ॥ पाशं वामे विभ्रती च शक्ति मुद्गर शूलकम् ।वज्र खड्गाङ्कुश शरांश्चक्रं देवी शलाकया ॥ सिंहोस्योपरि तिष्ठन्ती व्याघ्रचर्मणि कौशिकी ।विभ्रती रूपममतुलं ससुरासुर मोहनम् ॥ (अस्त्रों का क्रम पुरश्चर्यार्णव में अधूरा है अतः अस्त्रक्रमअग्निपुराण में से दिया है ।) वैकृति रहस्य में अस्त्रों का क्रम इस प्रकार से है । अक्षमाला च कमलं वाणोऽसि कुलिशं गदा ।चक्रं त्रिशूलं परशुः शङ्खो घण्टा च पाशकः ॥ शक्तिर्दण्डश्चर्म चापं पानपात्रं कमण्डलुः ।अलङ्कृतभुजामेभिरायुधैः कमलासनम् ॥ इसी तरह मध्यम चरित में १८ भुजा का ध्यान अलग है । इति कात्यायनीऋषिकृता कात्यायनीस्तुतिः समाप्ता ।

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Brahmacharini Mantra

माँ ब्रह्मचारिणी के मंत्र: Devi Brahmacharini Mantra

माँ ब्रह्मचारिणी के मंत्र के बारे में:About the mantra of Mother Brahmacharini Brahmacharini Mantra: मां दुर्गा के नौ अवतारों में दूसरे अवतार को मां ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है। मां दुर्गा के इस अवतार की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। ब्रह्मचारिणी का शाब्दिक अर्थ है, ‘तप का आचरण करने वाली।’ मां के इस स्वरूप की पूजा से अनंत फल की प्राप्ति होती है। मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। कठिन संघर्षों में भी साधक का मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता है। मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से साधक को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। Devi Brahmacharini Mantra: मां ब्रह्मचारिणी के स्वयं सिद्ध बीज मंत्र मां ब्रह्मचारिणी Brahmacharini Mantra के स्वयं सिद्ध बीज मंत्र का अर्थ होता है देवी ब्रह्मचारिणी की शक्ति और ऊर्जा का आह्वान करना। भक्त यदि इस मंत्र का जाप करते हैं तो भक्त को मानसिक शांति और साधना में सफलता मिलती है, साथ ही जीवन के कठिन दौर में दृढ़ता और संतुलन मिलता है। मंत्र: ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:। अर्थ: इस मंत्र का अर्थ है मैं मां अम्बिका (देवी पार्वती) को शक्ति और समृद्धि के प्रतीक रूप में नमन करता हूं। यह मंत्र देवी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए जपा जाता है। मां ब्रह्मचारिणी का पूजन मंत्र मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम: अर्थ: एक शक्तिशाली मंत्र है जो मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है, इस मंत्र का उच्चारण मां ब्रह्मचारिणी Brahmacharini Mantra से आशीर्वाद प्राप्त करने और जीवन में संयम, तपस्या, और ज्ञान का विकास करने के लिए किया जाता है। जाप विधि नवरात्रि ( Navratri ) के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:’ मंत्र का जाप करने से मां का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस मंत्र को 108 बार जाप करना चाहिए, मंत्र जाप करते समय यज्ञ में घी की आहुति देने से विशेष फल मिलता है। दधानां करपद्माभ्याम् अक्षमाला कमंडलु। देवी प्रसिदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥ अर्थ: जो देवी अपने दोनों हाथों में जपमाला और कमंडलु धारण करती हैं, वह देवी ब्रह्मचारिणी मुझ पर कृपा करें। आप सर्वश्रेष्ठ और अद्वितीय हैं। यह मंत्र देवी ब्रह्मचारिणी की स्तुति है, जो संयम और तपस्या का प्रतीक हैं। मां दुर्गा के दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का है। मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अलौकिक है। Brahmacharini Mantra मां के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल है। मां दुर्गा का यह दूसरा स्वरूप भक्तों को अनन्त फल देने वाला है। मां के इस स्वरूप की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है और वो कभी भी जीवन में कठिन संघर्षों से नहीं हारता है। नवरात्रि में मां दुर्गा के सभी स्वरूपों की पूजा के लिए अलग-अलग बीज मंत्र होते हैं। मान्यता है कि अगर साधक नवरात्रि के 9 दिनों तक शुद्ध मन से मां दुर्गा को समर्पित इन मंत्रों का जाप करता है तो उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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Brahmacharini

Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद

Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार , संयम की वृद्धि होती है। जीवन की कठिन समय मे भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता है। देवी अपने साधकों की मलिनता, दुर्गणों व दोषों को खत्म करती है। देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि तथा विजय की प्राप्ति होती है।  Maa Brahmacharini: मां ब्रह्मचारिणी  दूसरे नवरात्र में मां के Devi Brahmacharini ब्रह्मचारिणी एवं तपश्चारिणी रूप को पूजा जाता है। जो साधक मां के इस रूप की पूजा करते हैं उन्हें तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है और जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं उसे पूरा करके ही रहते हैं।  क्या चढ़ाएं प्रसाद  मां भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए मां को शक्कर का भोग प्रिय है। ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। Devi Brahmacharini देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ज्योर्तिमय है। ये मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरी शक्ति हैं। तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इनके अन्य नाम हैं। इनकी पूजा करने से सभी काम पूरे होते हैं, Devi Brahmacharini Puja Vidhi रुकावटें दूर हो जाती हैं और विजय की प्राप्ति होती है। इसके अलावा हर तरह की परेशानियां भी खत्म होती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। Devi Brahmacharini Puja Vidh: ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा विधि देवी ब्रह्मचारिणी Devi Brahmacharini की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर Brahmacharini Puja Vidhi उनका ध्यान करें और  प्रार्थना करते हुए नीचे लिखा मंत्र बोलें। श्लोक दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु| देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा || ध्यान मंत्र वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्। जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥ गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥ परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल,अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें।  देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं।  इसके अलावा कमल का फूल भी देवी मां को चढ़ाएं और इन मंत्रों से प्रार्थना करें। 1. या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। 2. दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। इसके बाद देवी मां को प्रसाद चढ़ाएं और आचमन करवाएं। प्रसाद के बाद पान सुपारी भेंट करें और प्रदक्षिणा करें यानी 3 बार अपनी ही जगह खड़े होकर  घूमें। प्रदक्षिणा के बाद घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। इन सबके बाद क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद बांट दें। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ : हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं।

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Vishwakarma Puja

Vishwakarma Puja 2025 Date And Time: विश्वकर्मा पूजा तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि – जानें सब कुछ

Vishwakarma Puja:हर साल भाद्रपद मास में सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने पर विश्वकर्मा पूजा (Vishwakarma Puja 2025) मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो औजारों, मशीनों, कारखानों और वाहनों से जुड़ा काम करते हैं। इस दिन भगवान विश्वकर्मा, जो दुनिया के पहले इंजीनियर और वास्तुकार माने जाते हैं, की विशेष पूजा की जाती है। आइए जानते हैं विश्वकर्मा पूजा 2025 की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, इसका महत्व और पूजा की विधि के बारे में। विश्वकर्मा पूजा 2025 कब है? (Vishwakarma Puja 2025 Date) हर साल की तरह, इस बार भी विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। यह तिथि तब निर्धारित होती है जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। सूर्य देव 16 सितंबर, मंगलवार की रात 1 बजकर 47 मिनट पर या 17 सितंबर की देर रात 1 बजकर 54 मिनट पर सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करेंगे। सनातन धर्म में उदया तिथि का विशेष महत्व होने के कारण, विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को ही मनाई जाएगी। विश्वकर्मा पूजा 2025 का शुभ मुहूर्त (Vishwakarma Puja 2025 Shubh Muhurat) विश्वकर्मा पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं, जिनमें आप अपनी सुविधा के अनुसार पूजा कर सकते हैं: • सबसे उत्तम समय (नवभारत टाइम्स के अनुसार): सुबह 10 बजकर 43 मिनट से शुरू होकर दोपहर के 12 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। • पुण्य काल (जागरण के अनुसार): सुबह 05 बजकर 36 मिनट से लेकर दिन में 11 बजकर 44 मिनट तक है। इस दौरान स्नान-ध्यान और दान-पुण्य किया जा सकता है। • महा पुण्य काल (जागरण के अनुसार): सुबह 05 बजकर 36 मिनट से सुबह 07 बजकर 39 मिनट तक है। यह महा पुण्य काल 2 घंटे 3 मिनट का होगा। • एकादशी तिथि: आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 17 सितंबर को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर शुरू होगी और इसी दिन देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर समाप्त होगी। साधक अपनी सुविधा अनुसार इस दौरान स्नान-ध्यान कर विश्वकर्मा जी की पूजा कर सकते हैं। विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Importance of Vishwakarma Puja) हिंदू धर्म में विश्वकर्मा पूजा Vishwakarma Puja का बेहद विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला इंजीनियर और वास्तुकार कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने ही इंद्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्ग लोक और लंका जैसे स्थानों का निर्माण किया था। इतना ही नहीं, भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र भी तैयार किया था। माना जाता है कि जिन घरों, कारखानों, फैक्ट्री आदि में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है, वहां सदैव माता लक्ष्मी का वास बना रहता है और कारोबार में मुनाफा होता है। जो लोग लैपटॉप या मोबाइल से काम करते हैं, उन्हें भी यह पूजा जरूर करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से काम में तरक्की होती है। इस पूजा से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है और विश्वकर्मा जी की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। विश्वकर्मा पूजा की विधि (Vishwakarma Puja Vidhi) विश्वकर्मा पूजा के दिन विधि-विधान से पूजा करने का खास महत्व है। यहाँ पूजा की सरल विधि दी गई है: 1. स्वच्छता: सुबह उठकर अपनी मशीनों, औजारों और वाहनों को अच्छी तरह साफ कर लें। 2. मशीनों को बंद करें: इसके बाद, सभी मशीनों को बंद कर दें। 3. भगवान की स्थापना: भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति को अपनी मशीन या कार्यस्थल के पास स्थापित करें। 4. संयुक्त पूजा: भगवान विश्वकर्मा और अपनी मशीनों/औजारों की एक साथ विधि-विधान से पूजा करें। 5. वाहन पूजा: अपने वाहनों की पूजा भी अवश्य करें। 6. भोग लगाएं: भगवान विश्वकर्मा को मिष्ठान का भोग और प्रसाद जरूर चढ़ाएं। 7. दान-पुण्य: इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को आवश्यकतानुसार सामान दान करना बहुत शुभ माना जाता है। 8. घरेलू मशीनें: अपने घर की छोटी-छोटी मशीनों की भी पूजा करने का महत्व होता है। शुभ योग (Shubh Yog on Vishwakarma Puja 2025) विश्वकर्मा पूजा के दिन कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इस दिन शिव और परिघ योग के साथ-साथ शिववास योग का भी निर्माण होगा। इन शुभ योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। विश्वकर्मा पूजा बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में धूमधाम से मनाई जाती है। इस पावन अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की कृपा से आपके जीवन में सुख, समृद्धि और उन्नति आए।

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Maa Saraswati

Maa Saraswati: मंत्र, वंदना, आरती और नाम

Maa Saraswati: ज्ञान, संगीत, कला, ज्ञान और विद्या की हिंदू देवी हैं। वह सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की त्रिमूर्ति का हिस्सा है। यह त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमशः ब्रह्मांड को बनाने, बनाए रखने और नष्ट करने (पुनर्जीवित करने) में मदद करती है। देवी भागवत के अनुसार, देवी सरस्वती भगवान ब्रह्मा की पत्नी हैं। वह भगवान ब्रह्मा के निवास ब्रह्मपुर में रहती है। देवी सरस्वती का जन्म ब्रह्मा जी के मुख से हुआ था। इसलिए वह संगीत और ज्ञान सहित वाणी की देवी बन गईं। ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा देवी सरस्वती की सुंदरता से इतने मोहक थे कि वह उनसे शादी करना चाहते थे और कई धार्मिक ग्रंथों में देवी सरस्वती को भगवान ब्रह्मा की पत्नी के रूप में वर्णित किया गया है। देवी सरस्वती के पति होने के कारण, भगवान ब्रह्मा को वागीश के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है वाणी और ध्वनि का स्वामी। देवी सरस्वती को एक शांत और सुखदायक चेहरे के साथ शुद्ध सफेद कपड़े पहने एक सुंदर महिला के रूप में दर्शाया गया है। अधिकांश प्रतिमाओं में, उन्हें एक खिले हुए सफेद कमल के फूल पर बैठे हुए वीणा बजाते हुए चित्रित किया गया है। अधिकांश छवियों में एक हंस और एक मोर उनके साथ होते हैं और कुछ छवियों में वह एक हंस पर चढ़ती है। उन्हें चार हाथों से चित्रित किया गया है। वह अपने दो हाथों में एक माला और एक किताब रखती है जबकि शेष दो हाथों से वीणा बजाती है। देवी सरस्वती की कृपया पाने के लिए श्रद्धा व विश्वास के साथ दोपहर के समय उनका मंत्र उच्चारण करना चाहिए जिससे आपकी प्रत्येक इच्छाएं पूरी हो जाती हैं । Maa Saraswati के मंत्र: 1. Maa Saraswati Ekakshar Mantra ऐं॥ Aim॥ 2. Maa Saraswati Dvyakshar Mantra ऐं लृं॥ Aim Lrim॥ 3. Maa Saraswati Tryakshar Mantra ऐं रुं स्वों॥ Aim Rum Svom॥ 4. Maa Saraswati Dashakshar Mantra वद वद वाग्वादिनी स्वाहा॥ Vad Vad Vagvadini Svaha॥ 5. Maa Saraswati Mantra ॐ ऐं नमः॥ Om Aim Namah॥ 6. Maa Saraswati Mantra ॐ ऐं क्लीं सौः॥ Om Aim Kleem Sauh॥ 7. Mahasaraswati Mantra ॐ ऐं महासरस्वत्यै नमः॥ Om Aim Mahasarasvatyai Namah॥ 8. Maa Saraswati Mantra ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः॥ Om Aim Hreem Shreem Vagdevyai sarasvatyai Namah॥ 9. Maa Saraswati Mantra ॐ अर्हं मुख कमल वासिनी पापात्म क्षयम्कारीवद वद वाग्वादिनी सरस्वती ऐं ह्रीं नमः स्वाहा॥ Om Arham Mukha Kamala Vasini Papatma KshayamkariVad Vad Vagvadini Saraswati Aim Hreem Namah Svaha॥ 10. Shri Saraswati Puranokta Mantra या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Vidyarupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ 11. Saraswati Gayatri Mantra ॐ ऐं वाग्देव्यै विद्महे कामराजाय धीमहि।तन्नो देवी प्रचोदयात्॥ Om Aim Vagdevyai Vidmahe Kamarajaya Dhimahi।Tanno Devi Prachodayat॥ Maa Saraswati की वंदना सरस्वती या कुंडेंदु देवी सरस्वती को समर्पित सबसे प्रसिद्ध स्तुति है और प्रसिद्ध सरस्वती स्तोत्रम का हिस्सा है। सरस्वती पूजा के दौरान वसंत पंचमी की पूर्व संध्या पर इसका पाठ किया जाता है। या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥ या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥१॥ जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ॥1॥ शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं। वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌॥ हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌। वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥२॥ शुक्लवर्ण वाली,संपूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अंधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूं ॥2॥ Maa Saraswati की आरती ओइम् जय वीणे वाली, मैया जय वीणे वालीऋद्धि-सिद्धि की रहती, हाथ तेरे तालीऋषि मुनियों की बुद्धि को, शुद्ध तू ही करतीस्वर्ण की भाँति शुद्ध, तू ही माँ करती॥ 1 ॥ ज्ञान पिता को देती, गगन शब्द से तूविश्व को उत्पन्न करती, आदि शक्ति से तू॥ 2 ॥ हंस-वाहिनी दीज, भिक्षा दर्शन कीमेरे मन में केवल, इच्छा तेरे दर्शन की॥ 3 ॥ ज्योति जगा कर नित्य, यह आरती जो गावेभवसागर के दुख में, गोता न कभी खावे॥ 4 ॥ देवी सरस्वती हिंदू धर्म में ज्ञान, शिक्षा, कला और करियर की देवी हैं। वह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की पत्नी हैं। सफेद पोशाक पहने, हंस या सफेद कमल पर विराजमान और वीणा, पुस्तक और माला लिए हुए देवी सरस्वती का दिव्य रूप राजसी, शांत और विस्मयकारी है। यहाँ देवी सरस्वती के नामों की सूची उनके अर्थ के साथ दी गई है। Maa Saraswati के नाम (उनका अर्थ) नाम  अर्थ सरस्वती ज्ञान की देवी महाभद्र: परम शुभ महामाया वह जो ब्रह्मांड को भ्रम से ढँक लेता है वरप्रदा दयालु जो वरदान देता है पद्माक्षी कमल की आँख वाला पद्मावक्त्रगा जिसका मुख कमल जैसा है शिवानुजः वह जो भगवान शिव की बहन है पुस्तकभृत जिसके हाथ में किताब है ज्ञानमुद्रा वह जो अपनी उंगलियों में ज्ञान का प्रतीक दिखाता है कामरूप जिसने इच्छानुसार भिन्न-भिन्न रूप धारण कर लिए महाविद्या वह जो सभी प्रकार का ज्ञान देता है महापताका नाशिनी सभी कष्टों का नाश करने वाले महाश्रय जो प्राणियों को परम शरण देता है मालिनी जो सुंदर माला पहनता है महोत्साह: सबसे उत्साही दिव्यंग एक शुभ शरीर वाला सुरवंदिता जो देवताओं द्वारा सुशोभित है महानकुशा जो अच्छा वहन करता है अरबी रोटी एक पीले रंग के साथ विमला दोषरहित विश्व एक सार्वभौमिक रूप वाला विद्यानमाला एक देदीप्यमान माला के साथ चंद्रिका एक चमकदार चांदनी के साथ चंद्रवदन जिसका मुख चन्द्रमा के समान तेज है चंद्रलेखा विभूति जो माथे पर अर्धचंद्र धारण करती है सावित्री प्रकाश की किरण सुरसा सबसे आकर्षक दिव्यलंकारभुशिता मनमोहक गहनों वाला एक वाग्देविक वाणी की देवी वसुधा जो पृथ्वी का अवतार है महाभद्र: सबसे शुभ महाबाला एक सर्वोच्च शक्ति के साथ भारती वाणी की देवी भामा पूर्णता की पहचान ब्राह्मी ब्रह्मा की

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Brahmacharini Mantra

Maa Brahmacharini Mantra, stotra, stuti, kavacha: मंत्र, प्रार्थना, स्तुति, ध्यान, स्तोत्र, कवच और आरती

Brahmacharini Mantra:भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए Maa Brahmacharini ने घोर तपस्या की थी। उन्होंने कठोर तपस्या की और जिसके कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया। ऐसा कहा जाता है कि Brahmacharini Mantra भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए अपनी तपस्या के दौरान उन्होंने फूलों और फलों के आहार और जमींन पर सोते हुए पर हज़ारों साल बिताए। Brahmacharini Mantra इसके अलावा, उन्होंने भीषण गर्मी, कठोर सर्दियों और तूफानी बारिश में खुले स्थान पर रहने के दौरान सख्त उपवास का पालन किया। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार हज़ारों वर्षों तक बिल्वपत्र के आहार पर उन्होंने तपस्या की और भगवान शंकर को पाने की प्रार्थना की थी। बाद में उन्होंने बिल्वपत्र खाना भी बंद कर दिया और बिना अन्न-जल के अपनी तपस्या जारी रखी। Brahmacharini Mantra जब उन्होंने बिल्व पत्र खाना छोड़ दिया तो उन्हें अपर्णा के नाम से जाना गया।  Maa Brahmacharini Mantra की कृपया पाने के लिए जानें Maa Brahmacharini Mantra ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥ Om Devi Brahmacharinyai Namah॥ Maa Brahmacharini Prarthana दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥ Dadhana Kara Padmabhyamakshamala Kamandalu।Devi Prasidatu Mayi Brahmacharinyanuttama॥ Maa Brahmacharini Stuti या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ Ya Devi Sarvabhuteshu Maa Brahmacharini Rupena Samsthita।Namastasyai Namastasyai Namastasyai Namo Namah॥ Dhyana वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ Vande Vanchhitalabhaya Chandrardhakritashekharam।Japamala Kamandalu Dhara Brahmacharini Shubham॥Gauravarna Swadhishthanasthita Dwitiya Durga Trinetram।Dhawala Paridhana Brahmarupa Pushpalankara Bhushitam॥Parama Vandana Pallavaradharam Kanta Kapola Pina।Payodharam Kamaniya Lavanayam Smeramukhi Nimnanabhi Nitambanim॥ Stotra तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥शङ्करप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥ Tapashcharini Tvamhi Tapatraya Nivaranim।Brahmarupadhara Brahmacharini Pranamamyaham॥Shankarapriya Tvamhi Bhukti-Mukti Dayini।Shantida Jnanada Brahmacharini Pranamamyaham॥ Kavacha त्रिपुरा में हृदयम् पातु ललाटे पातु शङ्करभामिनी।अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥पञ्चदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।अङ्ग प्रत्यङ्ग सतत पातु ब्रह्मचारिणी। Tripura Mein Hridayam Patu Lalate Patu Shankarabhamini।Arpana Sadapatu Netro, Ardhari Cha Kapolo॥Panchadashi Kanthe Patu Madhyadeshe Patu Maheshwari॥Shodashi Sadapatu Nabho Griho Cha Padayo।Anga Pratyanga Satata Patu Brahmacharini। Aarti जय अम्बे ब्रह्मचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता॥ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो॥ब्रह्म मन्त्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सरल संसारा॥जय गायत्री वेद की माता। जो जन जिस दिन तुम्हें ध्याता॥कमी कोई रहने ना पाए। उसकी विरति रहे ठिकाने॥जो तेरी महिमा को जाने। रद्रक्षा की माला ले कर॥जपे जो मन्त्र श्रद्धा दे कर। आलस छोड़ करे गुणगाना॥माँ तुम उसको सुख पहुँचाना। ब्रह्मचारिणी तेरो नाम॥पूर्ण करो सब मेरे काम। भक्त तेरे चरणों का पुजारी॥रखना लाज मेरी महतारी।

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