क्या आप भी हैं कर्ज के बोझ से परेशान! इन उपायों को जरूर अपनाएं

कहा जाता है जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए, पर क्या आपको लगता है आज के इस महंगाई के दौर में ऐसा संभव है. कहीं न कहीं ज्यादातर लोग कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं. उन्हें किसी न किसी वजह से कर्ज या लोन लेना ही पड़ता है और वे इसे चुकाने में संघर्ष का सामना करने रहते हैं. कर्ज को चुकाने के कारण मनुष्य की आर्थिक स्थिति कमजोर हो जाती है. कभी-कभी व्यक्ति इस कर्ज या लोन की वजह से मानसिक तनाव महसूस करlता है. कर्ज की चिंता में मानसिक तनाव इस कदर बढ़ जाता है कि व्यक्ति आत्मघाती कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटता. इस वजह से वो अपना ही नहीं पूरे परिवार का नुकसान कर बैठता है. अगर कड़ी मेहनत के बावजूद आप भी कर्ज से परेशान हैं या उससे मुक्ति मिलने में दिक्कत आ रही है तो इसके लिए ज्योतिष उपाय कर सकते हैं. हम आपको कुछ ऐसे ज्योतिष उपाय बताने जा रहे हैं, जिन्हें फॉलो करके कर्ज से मुक्ति पाने में काफी हद तक मदद मिल सकती है. इतना ही नहीं इन उपायों से दूसरी समस्याओं का समाधान भी मिल सकता है. जानें उन उपायों के बारे में… मंगलवार को ये करें पूजा-पाठ में काफी शक्ति होती है. हर मंगलवार को मंदिर जाएं और हनुमान जी की उपासना करें. उन्हें तेल और पीला सिंदूर लगाएं और हनुमान चालीसा का पाठ भी करें. भगवान शिव की उपासना सोमवार को शिवलिंग पर दूध और जल से अभिषेक करें. मंदिर में ही ऋणमुक्तेश्वर मंत्र ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नमः मंत्र का जाप करें. इस मंत्र का 108 बार जाप करना जरूरी माना जाता है. गाय को ये खिलाएं बुधवार के दिन गाय को खाना खिलाएं. दाल उबालकर उसमें घी मिलाएं और गाय को अपने हाथों से खिलाएं. इससे भी कर्ज से मुक्ति मिलने के आसार बन सकते हैं. मछलियों को आटे की गोली हफ्ते में किसी भी दिन मछलियों को आटे की गोली खिलाएं. इससे आपको मानसिक तनाव कम महसूस होगा और कर्ज को चुकाने में हिम्मत भी मिलेगी. वास्तु टिप ये जरूरी है कि आपके घर में वास्तु दोष न हो. ईशान कोण को साफ और स्वच्छ रखें. ऐसा करने से बरकत होगी और कर्ज का बोझ भी कम होने लगेगा.

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करियर में इंस्टेंट ग्रोथ के लिए वास्तु के इन नियमों का रोजाना करें पालन

पिछले साल से, लॉकडाउन ने लगभग हर व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर भारी असर डाला है, लेकिन एक चीज जिसने इस पूरे साल हम सभी को अत्यधिक तनाव में रखा है, वो है हमारा करियर. प्रत्येक प्रश्न का सही उत्तर वास्तु द्वारा किया गया सर्वोत्तम कार्य है. वास्तु के अनुसार, कुछ ऐसे टिप्स और ट्रिक्स हैं जो आपके चुने हुए रास्ते पर आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं. वास्तु शास्त्र डिजाइन और निर्माण के लिए एक प्राचीन भारतीय विज्ञान है जो प्रकृति के विभिन्न तत्वों को संतुलित करके हमारे जीवन के कई क्षेत्रों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करता है. इसलिए ये बेहद फायदेमंद होता है. अब बात पर आते हैं. नीचे 5 वास्तु टिप्स दिए गए हैं जो तुरंत करियर ग्रोथ सुनिश्चित करते हैं : 1. काम के लिए लैपटॉप और स्मार्टफोन का उपयोग करते समय, आपको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें किस दिशा में रखा गया है. इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को दक्षिण-पूर्व कोने में रखना करियर के विकास के लिए अच्छा है. इसके अलावा, आपको ये सुनिश्चित करना चाहिए कि तार और केबल अलग हो गए हैं और टेबलटॉप पर दिखाई नहीं दे रहे हैं. 2. आप कैसे बैठते हैं और कैसे काम करते हैं ये आपके करियर के विकास को निर्धारित करता है. इसलिए, आपको क्रॉस लेग्स के साथ बैठने से बचना चाहिए क्योंकि ये आपके करियर में प्रगति को बाधित करता है. कार्यालय में एक उच्च पीठ की कुर्सी पर बैठना करियर में अच्छी वृद्धि सुनिश्चित करता है और घर से काम करते हुए भी उचित अनुशासन के साथ काम करना विकास की कुंजी है. 3. वर्क फ्रॉम होम अब एक सामान्य प्रथा है और इससे घर पर कार्यस्थलों का निर्माण हुआ है. सर्वोत्तम परिणामों को सुनिश्चित करने के लिए, आपको ये सुनिश्चित करना चाहिए कि आपका गृह कार्यालय/कार्यस्थल बेडरूम के बगल में नहीं है. इसके अलावा, एक चौकोर/आयताकार कार्यालय डेस्क होना बहुत अच्छा होगा. सर्कुलर डेस्क से बचना चाहिए. 4. शक्तिशाली क्रिस्टल का उपयोग करने से ऊर्जा का स्तर अधिक होता है और ये कार्य कुशलता में वृद्धि से भी संबंधित है. ऑफिस में क्वार्ट्ज क्रिस्टल रखने से बेहतर मौके मिलते हैं. अपने डेस्क पर बांस का पौधा रखना भी फायदेमंद साबित होगा. 5. वास्तु विज्ञान के अनुसार, सोते समय सिर पूर्व दिशा में रखने से करियर में अच्छी ग्रोथ होती है. ये एकाग्रता के स्तर में सुधार और बेहतर मानसिक ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है. उत्तर दिशा में बैठकर काम करना उचित है. सुनिश्चित करें कि आपकी पीठ पर एक ठोस दीवार है. ये आपको ग्राउंडेड रखेगा. जिस स्थान पर आप काम करने बैठते हैं, उसके पीछे खिड़की नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे आप भ्रमित और विचलित रहेंगे. अंत में, ब्रह्मांड और उसके जादू में विश्वास रखें. शुद्ध इरादों के साथ इन युक्तियों का पालन करें और आप निश्चित रूप से अच्छे परिणाम देखेंगे. नोट- यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.

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महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् – अयि गिरिनन्दिनि (Mahishasura Mardini Stotram – Aigiri Nandini)

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुतेगिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥ सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरतेत्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरतेदनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरतेशिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपतेरिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥ अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृतेचतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥ अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरेत्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥ अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशतेसमरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥ धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटकेकनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुकेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥ सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरतेकृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥ जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुतेझणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥ अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुतेश्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥ सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरतेविरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललितेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥ अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपतेत्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥ कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललतेसकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥ करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमतेमिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥ कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचेप्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचेजितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥ विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुतेकृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥ पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवेअयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥ कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥ तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयतेकिमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥ अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमेअयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

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दुर्गा सप्तशती सिद्ध सम्पुट मंत्र (Durga Saptashati Siddha Samput Mantra)

सामूहिक कल्याण के लिये मंत्र –देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्यानिश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूत्‍‌र्या ।तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यांभक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ विश्‍व के अशुभ तथा भय का विनाश करने के लिये मंत्र –यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तोब्रह्मा हरश्‍च न हि वक्तुमलं बलं च ।सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनायनाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥ ❀ विश्‍व की रक्षा के लिये मंत्र –या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीःपापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जातां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्‍वम् ॥ ❀ विश्‍व के अभ्युदय के लिये मंत्र –विश्‍वेश्‍वरि त्वं परिपासि विश्‍वंविश्‍वात्मिका धारयसीति विश्‍वम् ।विश्‍वेशवन्द्या भवती भवन्तिविश्‍वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥ ❀ विश्‍वव्यापी विपत्तियों के नाश के लिये मंत्र –देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।प्रसीद विश्‍वेश्‍वरि पाहि विश्‍वं त्वमीश्‍वरी देवि चराचरस्य ॥ ❀ विश्‍व के पाप-ताप-निवारण के लिये मंत्र –देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यंयथासुरवधादधुनैव सद्यः ।पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशुउत्पातपाकजनितांश्‍च महोपसर्गान् ॥ ❀ विपत्ति-नाश के लिये मंत्र –शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ विपत्तिनाश और शुभ की प्राप्ति के लिये मंत्र –करोतु सा नः शुभहेतुरीश्‍वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः । ❀ भय-नाश के लिये मंत्र –सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् ।पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ।त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ पाप-नाश के लिये मंत्र [10]हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव ॥ ❀ रोग-नाश के लिये मंत्र –रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ❀ महामारी-नाश के लिये मंत्र –जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ ❀ आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिये मंत्र –देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ❀ सुलक्षणा पत्‍‌नी की प्राप्ति के लिये –पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥ ❀ बाधा-शान्ति के लिये मंत्र –सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्‍वरि ।एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ❀ सर्वविध अभ्युदय के लिये मंत्र –ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषांतेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः ।धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारायेषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ ❀ दारिद्र्यदुःखादिनाश के लिये मंत्र –दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोःस्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्यासर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता ॥ ❀ रक्षा पाने के लिये मंत्र –शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके ।घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ ❀ समस्त विद्याओं की और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिये मंत्र –विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाःस्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्काते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥ ❀ सब प्रकार के कल्याण के लिये मंत्र [20]सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ शक्ति-प्राप्ति के लिये मंत्र –सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये मंत्र –प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्‍वार्तिहारिणि ।त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥ ❀ विविध उपद्रवों से बचने के लिये मंत्र –रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्‍च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र ।दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्‍वम् ❀ बाधामुक्त होकर धन-पुत्रादि की प्राप्ति के लिये मंत्र –सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः ।मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥ ❀ भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति के लिये मंत्र –विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् ।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ❀ पापनाश तथा भक्ति की प्राप्ति के लिये मंत्र –नतेभ्यः सर्वदा भक्त्‍‌या चण्डिके दुरितापहे ।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ❀ स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिये मंत्र –सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी ।त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥ ❀ स्वर्ग और मुक्ति के लिये मंत्र –सर्वस्य बुद्धिरुपेण जनस्य हृदि संस्थिते ।स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ मोक्ष की प्राप्ति के लिये मंत्र –त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्याविश्‍वस्य बीजं परमासि माया ।सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥ ❀ स्वप्न में सिद्धि-असिद्धि जानने के लिये मंत्र –दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके ।मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय ॥ दुर्गा सप्तशती के 30 सिद्ध सम्पुट मंत्र।

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संकट मोचन हनुमानाष्टक (Sankatmochan Hanuman Ashtak)

श्री हनुमंत लाल की पूजा आराधना में हनुमान चालीसा, बजरंग बाण और संकटमोचन अष्टक का पाठ बहुत ही प्रमुख माने जाते हैं। संकट मोचन हनुमान अष्टक का नियमित पाठ करने से भक्तों पर आये गंभीर संकट का भी निवारण हो जाता है। ॥ हनुमानाष्टक ॥बाल समय रवि भक्षी लियो तब,तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।ताहि सों त्रास भयो जग को,यह संकट काहु सों जात न टारो ।देवन आनि करी बिनती तब,छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।को नहीं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥ बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,जात महाप्रभु पंथ निहारो ।चौंकि महामुनि साप दियो तब,चाहिए कौन बिचार बिचारो ।कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥ अंगद के संग लेन गए सिय,खोज कपीस यह बैन उचारो ।जीवत ना बचिहौ हम सो जु,बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।हेरी थके तट सिन्धु सबे तब,लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥ रावण त्रास दई सिय को सब,राक्षसी सों कही सोक निवारो ।ताहि समय हनुमान महाप्रभु,जाए महा रजनीचर मरो ।चाहत सीय असोक सों आगि सु,दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥ बान लाग्यो उर लछिमन के तब,प्राण तजे सूत रावन मारो ।लै गृह बैद्य सुषेन समेत,तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।आनि सजीवन हाथ दिए तब,लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥ रावन जुध अजान कियो तब,नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,मोह भयो यह संकट भारो Iआनि खगेस तबै हनुमान जु,बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥ बंधू समेत जबै अहिरावन,लै रघुनाथ पताल सिधारो ।देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि,देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।जाये सहाए भयो तब ही,अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥ काज किये बड़ देवन के तुम,बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।कौन सो संकट मोर गरीब को,जो तुमसे नहिं जात है टारो ।बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,जो कछु संकट होए हमारो ॥ ८ ॥ ॥ दोहा ॥लाल देह लाली लसे,अरु धरि लाल लंगूर ।वज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर ॥

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दत्तात्रेय स्तोत्रम् (Dattatreya Strotam)

॥ श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् ॥जटाधरं पाण्डुराङ्गं शूलहस्तं कृपानिधिम् ।सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ॥ विनियोग –अस्य श्रीदत्तात्रेयस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् नारदऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीदत्तपरमात्मा देवता ।श्रीदत्तप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ स्तोत्रम् –जगदुत्पत्तिकर्त्रे च स्थितिसंहार हेतवे ।भवपाशविमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १॥ जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च ।दिगम्बरदयामूर्ते दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ २॥ कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च ।वेदशास्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ३॥ र्हस्वदीर्घकृशस्थूल-नामगोत्र-विवर्जित ।पञ्चभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ४॥ यज्ञभोक्ते च यज्ञाय यज्ञरूपधराय च ।यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ५॥ आदौ ब्रह्मा मध्य विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः ।मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ६॥ भोगालयाय भोगाय योगयोग्याय धारिणे ।जितेन्द्रियजितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ७॥ दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूपध्राय च ।सदोदितपरब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ८॥ जम्बुद्वीपमहाक्षेत्रमातापुरनिवासिने ।जयमानसतां देव दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ९॥ भिक्षाटनं गृहे ग्रामे पात्रं हेममयं करे ।नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १०॥ ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले ।प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ११॥ अवधूतसदानन्दपरब्रह्मस्वरूपिणे ।विदेहदेहरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १२॥ सत्यंरूपसदाचारसत्यधर्मपरायण ।सत्याश्रयपरोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १३॥ शूलहस्तगदापाणे वनमालासुकन्धर ।यज्ञसूत्रधरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १४॥ क्षराक्षरस्वरूपाय परात्परतराय च ।दत्तमुक्तिपरस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १५॥ दत्त विद्याढ्यलक्ष्मीश दत्त स्वात्मस्वरूपिणे ।गुणनिर्गुणरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १६॥ शत्रुनाशकरं स्तोत्रं ज्ञानविज्ञानदायकम् ।सर्वपापं शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १७॥ इदं स्तोत्रं महद्दिव्यं दत्तप्रत्यक्षकारकम् ।दत्तात्रेयप्रसादाच्च नारदेन प्रकीर्तितम् ॥ १८॥॥ इति श्रीनारदपुराणे नारदविरचितं दत्तात्रेयस्तोत्रं सुसम्पूर्णम् ॥

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अन्नपूर्णा स्तोत्रम् (Annapoorna Stotram)

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरीनिर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥ नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरीमुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥ योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरीचन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥ कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करीकौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥ दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरीलीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥ उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरीवेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥ आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरीकाश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥ देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरीवामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥ चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरीचन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥ क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरीसाक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥ माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥– श्री शङ्कराचार्य कृतं

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“वेदो में बताया है, कि मन की शक्ति अपार है। लोग उस से लाभ लेना नहीं जानते।”

“वेदो में बताया है, कि मन की शक्ति अपार है। लोग उस से लाभ लेना नहीं जानते।” आपने बहुत से वीडियोस में देखा होगा, कि “उस विकलांग व्यक्ति के हाथ नहीं हैं, अथवा पांव नहीं हैं, अथवा आंखें नहीं हैं, अथवा और कोई अंग स्वस्थ नहीं है। फिर भी वह बहुत विशेष योग्यताएं रखता है। यहां तक कि ओलंपिक जैसे ऊंचे खेलों तक भी वह पुरस्कार लेता है। और भी अनेक क्षेत्रों में बहुत अच्छी ऊंची प्रगति कर लेता है। विश्व कीर्तिमान में भी उसका नाम आ जाता है।” इस सबका कारण क्या है? “मन की विचित्र शक्तियां। मन में बहुत अधिक विचित्र शक्तियां हैं।”संसार के लोग उन शक्तियों को नहीं जानते। उनका लाभ उठाना नहीं जानते। “इसलिए सब कुछ होते हुए भी अर्थात शरीर के अंग स्वस्थ होते हुए भी, धन संपत्ति, उत्तम परिवार होते हुए भी, अपने आलस्य प्रमाद पुरुषार्थ हीनता आदि दोषों के कारण शिकायतें करते रहते हैं, कि भगवान ने मुझे यह नहीं दिया, वह नहीं दिया इत्यादि।”और सृजनात्मक कार्य कुछ नहीं करते, जिससे कि उनकी विशेष उन्नति नहीं हो पाती, और बस शिकायतें ही चलती रहती हैं।इसके अतिरिक्त अनेक बार जीवन में कुछ समस्याएं भी आ जाती हैं। “कभी व्यक्ति रोगी हो जाता है, कभी कोई उस पर झूठा आरोप लगा देता है, उसे अपमानित करता है, कभी दुर्घटना हो जाती है, आदि आदि अनेक आपत्तियां आने पर भी व्यक्ति उन समस्याओं का समाधान ढूंढने में परिश्रम नहीं करता, शिकायतें ही करता रहता है। यह जीवनशैली अच्छी नहीं है।”ईश्वर ने आपको बहुत कुछ दिया है। जैसे कि, “अच्छे-अच्छे माता-पिता दिए हैं। विद्वान गुरुजन दिए हैं। आपका शरीर स्वस्थ है, बलवान है। आपके मित्र संबंधी भी अच्छे हैं, बहुत सहयोग करते हैं। स्वास्थ्य भी आपका अच्छा है। खाना-पीना सारी सुविधाएं पूरी हैं। बस एक मन में कमजोरी है। आपका मन ढीला है।” मन को बलवान बनाएं। उत्साह उत्पन्न करें। “ईश्वर ने जो आपको सुविधाएं दी हैं, उन सुविधाओं की सूची बनाएं। कागज पर लिखें, कि ईश्वर ने आपको क्या-क्या दिया है?” जैसा कि कुछ सुविधाएं मैंने ऊपर लिखी हैं, ये सारी सुविधाएं; और इसके अलावा और भी जो ईश्वर ने आपको सुविधाएं दी हैं, उन सब को लिखकर एक सूची बनाएं।“उस सूची को 100 दिन तक प्रतिदिन, दिन में तीन बार पढ़ें। आपके अंदर उत्साह भर जाएगा। आपका मन प्रफुल्लित, बलवान हो जाएगा। इस प्रकार से अपने मन को बलवान बनाएं।” “सुबह शाम बैठकर ईश्वर का ध्यान करें। गायत्री मंत्र से ईश्वर की स्तुति प्रार्थना करें। उससे और शक्ति मांगें। विद्या बल बुद्धि मांगें। आपके अंदर मन की विचित्र शक्तियां जाग जाएंगी, और आप बहुत कुछ कर डालेंगे। यदि आपने अपने मन को इस प्रकार से बलवान बना लिया, और समस्याओं से लड़ने का विचार ठान लिया, तो कोई समस्या आपके सामने टिक नहीं पाएगी, सब की सब भाग खड़ी होंगी।”

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आप के नाम में छुपा है राम का नाम

आप के नाम में छुपा है राम का नाम अदभुत गणितज्ञ “श्री.तुलसीदासजी से एक भक्त ने पूछा कि महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?..तुलसीदास बोले :- ” हां “भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ???तुलसीदास :- ” हां अवश्य ” ….तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!!तुलसीदास जी ने कहा , “”अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.””हर नाम के अंत में राम का ही नाम है. इसे समझने के लिए तुम्हे एक “सूत्रश्लोक ” बताता हूं .यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!!भक्त :-” कौनसा सूत्र महाराज ?” तुलसीदास :- यह सूत्र है …||”नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || “ इस सूत्र के अनुसार★ अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें…१)उस गिनती को (चतुर्गुण) ४ से गुणाकार करें.२) उसमें (पंचतत्व मिलन) ५ मिला लें.३) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें.४)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) ८ से विभाजित करें .*”” संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!! …यह २ ही “राम” है। यह २ अंक ही ” राम ” अक्षर हैं… ★विश्वास नहीं हों रहा है ना???चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं …आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!!★ उदा. ..निरंजन… ४ अक्षर१) ४ से गुणा करिए ४x४=१६२)५ जोड़िए १६+५=२१३) दुगने करिए २१×२=४२४)८ से विभाजन करने पर ४२÷८= ५ पूर्ण अंक , शेष २ !!!शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे २ अर्थात् – “राम” !!! विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है!!!★1) चतुर्गुण अर्थात् ४ पुरुषार्थ :- धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष !!!★2) पंचतत्व अर्थात् ५ पंचमहाभौतिक :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश!!!★3) द्विगुण प्रमाण अर्थात् २ माया व ब्रह्म !!!★4) अष्ट सो भागे अर्थात् ८ * आठ प्रकार की लक्ष्मी (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योगलक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति. ★अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष २ ही प्राप्त होगा …इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!!

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क्यों लिया देवी माँ ने भ्रामरी देवी और शाकंभरी माता का अवतार?

देवताओं की सहायता के लिए देवी ने अनेक अवतार लिए। भ्रामरी देवी का अवतार लेकर देवी ने अरुण नामक दैत्य से देवताओं की रक्षा की। इसकी कथा इस प्रकार है- पूर्व समय की बात है। अरुण नामक दैत्य ने कठोर नियमों का पालन कर भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव प्रकट हुए और अरुण से वर मांगने को कहा। अरुण ने वर मांगा कि कोई युद्ध में मुझे नहीं मार सके न किसी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु हो, स्त्री-पुरुष के लिए मैं अवध्य रहूं और न ही दो व चार पैर वाला प्राणी मेरा वध कर सके। साथ ही मैं देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकूं। ब्रह्माजी ने उसे यह सारे वरदान दे दिए। वर पाकर अरुण ने देवताओं से स्वर्ग छीनकर उस पर अपना अधिकार कर लिया। सभी देवता घबराकर भगवान शंकर के पास गए। तभी आकाशवाणी हुई कि सभी देवता देवी भगवती की उपासना करें, वे ही उस दैत्य को मारने में सक्षम हैं। आकाशवाणी सुनकर सभी देवताओं ने देवी की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर देवी ने देवताओं को दर्शन दिए। उनके छह पैर थे। वे चारों ओर से असंख्य भ्रमरों (एक विशेष प्रकार की बड़ी मधुमक्खी) से घिरी थीं। उनकी मुट्ठी भी भ्रमरों से भरी थी। पूर्व समय की बात है। अरुण नामक दैत्य ने कठोर नियमों का पालन कर भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव प्रकट हुए और अरुण से वर मांगने को कहा। अरुण ने वर मांगा कि कोई युद्ध में मुझे नहीं मार सके न किसी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु हो, स्त्री-पुरुष के लिए मैं अवध्य रहूं और न ही दो व चार पैर वाला प्राणी मेरा वध कर सके। साथ ही मैं देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकूं। ब्रह्माजी ने उसे यह सारे वरदान दे दिए। वर पाकर अरुण ने देवताओं से स्वर्ग छीनकर उस पर अपना अधिकार कर लिया। सभी देवता घबराकर भगवान शंकर के पास गए। तभी आकाशवाणी हुई कि सभी देवता देवी भगवती की उपासना करें, वे ही उस दैत्य को मारने में सक्षम हैं। आकाशवाणी सुनकर सभी देवताओं ने देवी की घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर देवी ने देवताओं को दर्शन दिए। उनके छह पैर थे। वे चारों ओर से असंख्य भ्रमरों (एक विशेष प्रकार की बड़ी मधुमक्खी) से घिरी थीं। उनकी मुट्ठी भी भ्रमरों से भरी थी। दानवों के उत्पात से त्रस्त भक्तों ने जब कई वर्षों तक सूखा एवं अकाल से ग्रस्त होकर देवी से प्रार्थना की तब देवी ऐसे अवतार में प्रकट हुई, जिनकी हजारों आखें थी। अपने भक्तों को इस हाल में देखकर देवी की इन हजारों आंखों से नौ दिनों तक लगातार आंसुओं की बारिश हुई, जिससे पूरी पृथ्वी पर हरियाली छा गई तथा जीवन रस से परिपूर्ण हो गया। यही देवी शताक्षी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई एवं इन्ही देवी ने कृपा करके अपने अंगों से कई प्रकार की शाक, फल एवं वनस्पतियों को प्रकट किया। इसलिए उनका नाम शाकंभरी प्रसिद्ध हुआ। पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शाकंभरी नवरात्रि का आरंभ होता है, जो पौष पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस दिन शाकंभरी जयंती का पर्व मनाया जाता है।मान्यता के अनुसार इस दिन असहायों को अन्न, शाक(कच्ची सब्जी), फल व जल का दान करने से अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति होती हैं व देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं।

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पौराणिक वृतांत- एक राक्षस ‘गयासुर’ के कारण गया बना है मोक्ष स्‍थली

बिहार की राजधानी पटना से करीब 104 किलोमीटर की दूरी पर बसा है गया जिला। धार्मिक दृष्टि से गया न सिर्फ हिन्दूओं के लिए बल्कि बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए भी आदरणीय है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे महात्मा बुद्ध का ज्ञान क्षेत्र मानते हैं जबकि हिन्दू गया को मुक्तिक्षेत्र और मोक्ष प्राप्ति का स्थान मानते हैं।इसलिए हर दिन देश के अलग-अलग भागों से नहीं बल्कि विदेशों में भी बसने वाले हिन्दू आकर गया में आकर अपने परिवार के मृत व्यकित की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान करते दिख जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते है की गया को मोक्ष स्थली का दर्ज़ा एक राक्षस गयासुर के कारण मिला है? आज हम आपको गयासुर से संबंधित वही पौराणिक वृतांत बता रह है। पुराणों के अनुसार गया में एक राक्षस हुआ ज‌िसका नाम था गयासुर। गयासुर को उसकी तपस्या के कारण वरदान म‌िला था क‌ि जो भी उसे देखेगा या उसका स्पर्श करगे उसे यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। ऐसा व्यक्त‌ि सीधे व‌िष्‍णुलोक जाएगा। इस वरदान के कारण यमलोक सूना होने लगा। इससे परेशान होकर यमराज ने जब ब्रह‍्मा, व‌िष्णु और शिव से यह कहा क‌ि गयासुर के कारण अब पापी व्यक्त‌ि भी बैकुंठ जाने लगा है इसल‌िए कोई उपाय क‌िज‌िए। यमराज की स्‍थ‌ित‌ि को समझते हुए ब्रह‍्मा जी ने गयासुर से कहा क‌ि तुम परम पव‌ित्र हो इसल‌िए देवता चाहते हैं क‌ि हम आपकी पीठ पर यज्ञ करें। गयासुर इसके ल‌िए तैयार हो गया। गयासुर के पीठ पर सभी देवता और गदा धारण कर व‌िष्‍णु स्‍थ‌ित हो गए। गयासुर के शरीर को स्‍थ‌िर करने के ल‌िए इसकी पीठ पर एक बड़ा सा श‌िला भी रखा गया था। यह श‌िला आज प्रेत श‌िला कहलाता है।गयासुर के इस समर्पण से व‌िष्‍णु भगवान ने वरदान द‌िया क‌ि अब से यह स्‍थान जहां तुम्हारे शरीर पर यज्ञ हुआ है वह गया के नाम से जाना जाएगा। यहां पर प‌िंडदान और श्राद्ध करने वाले को पुण्य और प‌िंडदान प्राप्त करने वाले को मुक्त‌ि म‌िल जाएगी। यहां आकर आत्मा को भटकना नहीं पड़ेगा।

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इस कारण देवर्षि नारद को बनना पड़ा था एक बार बंदर !

 श्री नारद बड़े ही तपस्वी और ज्ञानी ऋषि हुए जिनके ज्ञान और तप की माता पार्वती भी प्रशंसक थीं। तब ही एक दिन माता पार्वती श्री शिव से नारद मुनि के ज्ञान की तारीफ करने लगीं। शिव ने पार्वती जी को बताया कि नारद बड़े ही ज्ञानी हैं। लेकिन किसी भी चीज का अंहकार अच्छा नहीं होता है। एक बार नारद को इसी अहंकार (घमंड) के कारण बंदर बनना पड़ा था। यह सुनकर माता पार्वती को बहुत आश्चर्य हुआ । उन्होंने श्री शिव भगवान से पूरा कारण जानना चाहा। तब श्री शिव ने बतलाया। इस संसार में कोई कितना ही बड़ा ज्ञानी हो, लेकिन श्री हरि जो चाहते हैं वो उसे बनना ही पड़ता है। नारद को एक बार अपने इसी तप और बुद्धि का अहंकार (घमंड) हो गया था । इसलिए नारद को सबक सिखाने के लिए श्री विष्णु को एक युक्ति सूझी। हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थीं। वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यन्त सुहावनी लगी। वहां पर के पर्वत, नदी और वन को देख कर उनके हृदय में श्री हरि विष्णु की भक्ति अत्यन्त बलवती हो उठी और वे वहीं बैठ कर तपस्या में लीन हो गए । नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से उनका स्वर्ग नहीं छीन लें। इंद्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिये कामदेव को उनके पास भेज दिया। वहां पहुंच कर कामदेव ने अपनी माया से वसंत ऋतु को उत्पन्न कर दिया। पेड़ और पत्ते पर रंग-बिरंगे फूल खिल गए कोयले कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल.मंद.सुगंध सुहावनी हवा चलने लगी। रंभा आदि अप्सराएं नाचने लगीं। किन्तु कामदेव की किसी भी माया का नारद मुनि पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। तब कामदेव को डर सताने लगा कि कहीं नारद मुझे शाप न दे दें। इसलिए उन्होंने श्री नारद से क्षमा मांगी। नारद मुनि को थोड़ा भी क्रोध नहीं आया और उन्होंने कामदेव को क्षमा कर दिया। कामदेव वापस अपने लोक में चले गए। कामदेव के चले जाने पर नारद मुनि के मन में अहंकार (घमंड) हो गया कि मैंने कामदेव को जीत लिया। वहां से वे शिव जी के पास चले गए और उन्हें अपने कामदेव को हारने का हाल कह सुनाया। भगवान शिव समझ गए कि नारद को अहंकार हो गया है। शंकरजी ने सोचा कि यदि इनके अहंकार की बात विष्णु जी जान गए तो नारद के लिए अच्छा नहीं होगा। इसलिए उन्होंने नारद से कहा कि तुमने जो बात मुझे बताई है उसे श्री हरि को मत बताना। नारद जी को शिव जी की यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने सोचा कि आज तो मैने कामदेव को हराया है और ये भी किसी को नहीं बताऊं । नारद जी क्षीरसागर पह़ुंचे गए और शिव जी के मना करने के बाद भी सारी कथा उन्हें सुना दी। भगवान विष्णु समझ गए कि आज तो नारद को अहंकार (घमंड) ने घेर लिया है। अपने भक्त के अहंकार को वे सह नहीं पाते इसलिए उन्होंने अपने मन में सोचा कि मैं ऐसा उपाय करूंगा कि नारद का घमंड भी दूर हो जाए और मेरी लीला भी चलती रहे। नारद जी जब श्री विष्णु से विदा होकर चले तो उनका अभिमान और भी बढ़ गया। इधर श्री हरि ने अपनी माया से नारद जी के रास्ते में एक बड़े ही सुन्दर नगर को बना दिया । उस नगर में शीलनिधि नाम का वैभवशाली राजा रहता था। उस राजा की विश्व मोहिनी नाम की बहुत ही सुंदर बेटी थी, जिसके रूप को देख कर लक्ष्मी भी मोहित हो जाएं। विश्व मोहिनी स्वयंवर करना चाहती थी इसलिए कईं राजा उस नगर में आए हुए थे।

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