Chhath Puja 2025

Chhath Puja 2025 Date And Time: छठ पूजा नहाय-खाए से उषा अर्घ्य तक, जानें 4 दिनों के शुभ मुहूर्त और महत्व

Chhath Puja 2025: कार्तिक माह का सबसे बड़ा और लोक आस्था का महापर्व ‘छठ पूजा’ (Chhath Puja 2025) इस वर्ष 25 अक्टूबर से 28 अक्टूबर 2025 तक मनाया जाएगा. यह चार दिवसीय पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है. मान्यता है कि छठी मैया (जो ब्रह्मा जी की मानस पुत्री या प्रकृति का छठा अंश मानी जाती हैं) की पूजा करने से परिवार की रक्षा, स्वास्थ्य, सफलता और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है. यह कठिन व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और दिल्ली में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. Chhath Puja 2025 इस दौरान व्रती लगातार 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं, जिसमें वे पानी तक ग्रहण नहीं करते. आइए जानते हैं Chhath Puja 2025 छठ पूजा 2025 के चार दिनों का विस्तृत शेड्यूल, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि: छठ पूजा 2025 का 4 दिवसीय संपूर्ण शेड्यूल छठ पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक चलता है. 1. प्रथम दिन: नहाय-खाए (Nahaye Khaye 2025) तिथि: शनिवार, 25 अक्टूबर 2025 सूर्योदय: सुबह 6 बजकर 28 मिनट (दिल्ली में) सूर्यास्त: शाम 5 बजकर 42 मिनट (दिल्ली में) यह Chhath Puja 2025 छठ पूजा का पहला दिन है. इस दिन व्रती घर, नदी या तालाब में स्नान करते हैं और घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है. व्रती इस दिन सिर्फ एक बार ही भोजन ग्रहण करते हैं और तला हुआ खाना पूर्ण रूप से वर्जित होता है. यह खाना कांसे या मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता है. 2. दूसरा दिन: खरना और लोहंडा (Kharna 2025) तिथि: रविवार, 26 अक्टूबर 2025 सूर्योदय: सुबह 6 बजकर 29 मिनट सूर्यास्त: शाम 5 बजकर 41 मिनट (दिल्ली में) खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है. इस दिन व्रती दिन भर बिना जल और अन्न के उपवास रखते हैं. शाम को सूर्यास्त के समय, चावल, गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाई जाती है. Chhath Puja 2025 इस खीर और पूड़ी का प्रसाद ग्रहण करने के बाद, व्रती अगले 36 घंटों के लिए निर्जला व्रत (पानी की एक बूँद भी ग्रहण न करना) धारण कर लेते हैं. 3. तीसरा दिन: षष्ठी – संध्या अर्घ्य (Sandhya Arghya 2025) तिथि: सोमवार, 27 अक्टूबर 2025 सूर्योदय: सुबह 6 बजकर 30 मिनट सूर्यास्त: शाम 5 बजकर 40 मिनट (दिल्ली में) यह Chhath Puja 2025 छठ पूजा का मुख्य दिन है. इस दिन व्रती नदी या तालाब के घाटों पर इकट्ठा होते हैं. शाम को, डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. पूजा के लिए बांस की टोकरी (दउरा) में ठेकुआ, कचवनिया (चावल के लड्डू), फल, नारियल और गन्ना जैसे पारंपरिक प्रसाद सजाए जाते हैं. इस पर्व में पवित्रता (शुचिता) का खास ध्यान रखा जाता है. 4. चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण (Usha Arghya 2025) तिथि: मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025 सूर्योदय: सुबह 6 बजकर 30 मिनट (दिल्ली में) सूर्यास्त: शाम 5 बजकर 39 मिनट यह छठ पूजा का अंतिम दिन है. व्रती सूर्योदय से पहले घाट पर पहुँचते हैं और उगते हुए सूर्य को दूसरा और अंतिम अर्घ्य देते हैं. Chhath Puja 2025 सांध्य अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से बदल दिया जाता है, हालांकि फल (कन्द, मूल, फलादि) वही रहते हैं. अर्घ्य और पूजा-अर्चना समाप्त होने के बाद, प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है. छठ पूजा का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसका गहरा वैज्ञानिक महत्व भी है। 1. विषहरण (Detoxification): 36 घंटे के लंबे निर्जला उपवास से शरीर का पूर्ण विषहरण (detoxification) होता है, जिससे मन और शरीर पर सकारात्मक जैव-रासायनिक परिवर्तन होते हैं. 2. सौर ऊर्जा का अवशोषण: छठ पूजा में सूर्यास्त और सूर्योदय के समय अर्घ्य देने की परंपरा है क्योंकि इस समय मनुष्य सुरक्षित रूप से सौर-ऊर्जा को प्राप्त कर सकते हैं. Chhath Puja 2025 प्राचीन काल में ऋषि-मुनि भी भोजन और पानी के बजाय सीधे सूर्य से जीवन के लिए आवश्यक ऊर्जा अवशोषित करने के लिए इसी तरह की प्रक्रिया का उपयोग करते थे. 3. प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार: सूर्य के प्रकाश का सुरक्षित विकिरण फंगल और जीवाणु संक्रमण को ठीक करता है, रक्त प्रवाह में अवशोषित ऊर्जा श्वेत रक्त कोशिकाओं (White Blood Cells) के कार्य में सुधार करती है, और हार्मोन के स्राव को संतुलित करती है.

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Shri Sita Lakshmi Stotram: श्रीसीतालक्ष्मीस्तोत्रम्

Shri Sita Lakshmi Stotram: श्रीसीतालक्ष्मीस्तोत्रम् ॐ श्रीरामजयम् ।ॐ सद्गुरुश्रीत्यागराजस्वामिने नमो नमः । ॐ भूमिपुत्र्यै च विद्महे । रामपत्न्यै च धीमहि ।तन्नः सीता प्रचोदयात् ॥ सीता श्रीरामसज्जाया सानन्दवाक्स्वरूपिणी ।सा सम्पूर्णसुमाङ्गल्या ज्वलदग्निशुचिस्फुरा ॥ १॥ (१) मदम्बा श्रीमहालक्ष्मीर्मच्चित्तविलसत्प्रभा ।क्षमागुण्यातिसान्त्वा मा सहजस्थितसद्गुणा ॥ २॥ क्षपानाथप्रभारूपा चन्द्रार्कमुखमण्डला ।सानसीविग्रहाभासा चारुसारप्रभासिनी ॥ ३॥ पदकोकनदात्नाभा पदाम्बुजसुलक्षणा । (२)पदपावित्र्यलक्षण्या पदाश्रितसुरक्षणा ॥ ४॥ कराम्भोजाभयादात्री स्मिताम्भोरुहलोचनी ।करुणामयवीक्षण्या नयनाब्जविमोचनी ॥ ५॥ सौन्दर्यदेवता सीता क्ष्मापुत्री जनकात्मजा ।शिवचापलघूद्धारा कोमला शक्तिशालिनी ॥ ६॥ श्रीरामतन्मया सीता रामपत्नी लसच्छविः ।कल्याणरामसाराध्या सीता भव्यसुरूपिणी ॥ ७॥ वैदेही मृदुसद्वाणी ऐहिकापरपूरणी ।रामप्रेष्ठा महाराज्ञी पूर्णसद्भक्तिकारिणी ॥ ८॥ रामनामसुधापाना नामसारप्रमोदिता ।नामसद्ध्यानसँल्लीना दहराकाशदर्शना ॥ ९॥ श्रीरामपूर्णसच्चित्ता श्रीरामानन्यचिन्तना ।श्रीरामकीर्तिसम्मूला रामेण सह चारिणी ॥ १०॥ रामावतारसम्पूर्णा रामायणसुबीजता । (३)श्रीरामाभिन्नदिव्याभा साक्षात् ब्रह्मस्वरूपिणी ॥ ११॥ सुस्वराजितमाधुर्या सङ्गीतमृदुलस्वरा ।श्रीत्यागब्रह्मसङ्गीता गुरुस्वामिसुकीर्तिता ॥ १२॥ त्यागराजगुरुस्वामिशिष्यापुष्पासुसंस्तुता ।बालालापस्तुतिप्रीता पुत्रीपुष्पाबहुप्रिया ॥ १३॥ मयेति कीर्तिते मातर्मच्चित्तं परिपूरय ।चित्तप्रसादनं मातः कुरु मे भक्तिवर्धनम् ॥ १४॥ मङ्गलं रामसत्यै च सीतालक्ष्म्यै सुमङ्गलम् ।मङ्गलं मम मात्रे च महालक्ष्म्यै सुमङ्गलम् ॥ १५॥ सीतास्तोत्रं सुसम्पूर्णं सीतानुग्रहकारकम् ।सीतानुग्रहसम्भावं सर्वमङ्गलदायकम् ॥ १६॥ इति सद्गुरुश्रीत्यागराजस्वामिनः शिष्यया भक्तया पुष्पया कृतंश्रीसीतालक्ष्मीस्तोत्रं गुरौ समर्पितम् ।ॐ शुभमस्तु ।

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Lakshmihayagriva PrabodhikastutiH:लक्ष्मीहयग्रीवप्राबोधिकस्तुतिः

Lakshmihayagriva PrabodhikastutiH:लक्ष्मीहयग्रीवप्राबोधिकस्तुतिः ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् ।आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥ विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपं विज्ञानविश्राणनबद्धदीक्षम् ।दयानिधिं देहभृतां शरण्यं देवं हयग्रीवमहं प्रपद्ये ॥ १॥ प्राची सन्ध्या काचिदन्तर्निशायाः प्रज्ञादृष्टेरञ्जनश्रीरपूर्वा ।वक्त्री वेदान्भातु मे वाजिवक्त्रा वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ २॥ कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमान्हिकम् ॥ ३॥ वीर सौम्य विबुध्यस्व कौसल्यानन्दवर्धन ।जगद्धिसर्वं स्वपिति त्वयि सुप्ते नरोत्तम ॥ ४॥ यामिन्यपैति यदुनायक मुञ्च निद्रा- मुन्मेषपृच्छति नवोन्मिषितेन विश्वम् ।जातस्स्वयं खलु जगद्धितमेव कर्तुं धर्मप्रवर्तनधिया धरणीतलेऽस्मिन् ॥ ५॥ सुखाय सुप्रातमिदं तवास्तु जगत्पते जागृहि नन्दसूनो ।अम्भोजमन्तश्शयमञ्जुतारारोलम्बमुन्मीलतु लोचनं ते ॥ ६॥ करुणावरुणालयाम्बुजश्रीस्फुरणाहङ्कृतिहारिलोचनश्रीः ।चरणाब्जनतार्तिभारहारिंस्तव भूयातुरगास्य सुप्रभातम् ॥ १॥ पुरःप्रबुद्धाम्बुधिराजकन्यामुखाब्जनिश्वासमिवानुकुर्वन् ।मरुत्सुगन्धिः प्रतिवाति मन्दं हयाननस्तात्तव सुप्रभातम् ॥ २॥ त्वद्दीप्तया प्रविमलया जितः किलासावाहोस्वित्तव दयितामुखाम्बुजेन ।पाश्चात्ये पतति पयोनिधौ सुधांशुर्भूयात्ते सपदि हयास्य सुप्रभातम् ॥ ३॥ वरदानकृतिन् स्मरदार्ततरद्विरदाघहृतिस्फुरदादरण ।इति सन्मतयो यतयः प्रवदन्त्यधुना मधुनाशन जागृहि भोः ॥ ४॥ समर्चने ते कृतकौतुकेन सजीकृतं शोणमणीन्द्रपीठम् ।हंसेन किं सान्ध्यमहो विभाति हयास्य भूयात्तव सुप्रभातम् ॥ ५॥ हरिर्हरिर्हरिरिति मञ्जुभाषितं द्विजावलेस्सपदि निशम्य कौतुकात् ।द्विजव्रजोऽप्यनुवदतीव कूजितैर्हयाननानघगुण जागृहि प्रभो ॥ ६॥ प्राचीं वधू सपदि मित्रकरग्रहार्थं सन्ध्यावधूस्स्वरुचिकुङ्कुमपङ्कसान्दैः ।प्रालेयमङ्गलजलैरभिषिञ्चतीव श्रीमन् हयास्य भवतात्तव सुप्रभातम् ॥ ७॥ कुमुदवनं विमुच्य नवपङ्कजषण्डमिमाः ।सपदि समाश्रयन्ति मुदिता भ्रमरावलयः ॥ भुवि निखिलोऽपि चाश्रयति सश्रियमेव जनो ।हयवदनाद्य जागृहि हरे करुणैकनिधे ॥ ८॥ फुल्लत्पङ्कजरत्नपात्रनिवहानासाद्य हृद्यश्रियःसौगन्ध्याढ्यमरन्ददिव्यसलिलैरापूरितानादरात् ।हंसास्त्वामिव पूजयन्ति विरुतव्याजात्पठन्तो मनून्सुस्नातास्सरसीषु वाहमुख ते सुप्रातरस्तु प्रभो ॥ ९॥ उच्चलन्मधुकरौघमञ्जुलं पद्ममुल्लसति पूजनाय ते ।धूपपात्रमिव हंससज्जितं सुप्रभातमिह ते हयानन ॥ १०॥ इन्दीवराणामिव कान्तिरद्य मन्दीभवन्ती व्यपयातु निद्रा ।फुल्लत्विदं पद्ममिवाक्षियुग्मं हयास्य ते सम्प्रति सुप्रभातम् ॥ ११॥ एते, वेत्रहतित्रुटत्पटुमहाकोटीरकोटीमणि-श्रेणीभिस्तव मन्दिरस्य ददतो द्वाराय नीराजनम् ।काक्षन्ति प्रतिबोधकालमिह ते सर्वेऽपि लोकाधिपाःतानेतान्करुणावलोकनलवैर्धन्यान्विधेहि प्रभो ॥ १२॥ अक्षीणे मयि तिष्ठ किं विहरसे सङ्क्षीयमाणे मुहु-र्बिम्बेऽस्मिन्निति देवदेव नितरां त्वत्प्रार्थनायागतम् ।चान्द्रम्बिम्बमिदं वदन्ति हि परं मोदार्पणं दर्पणंदृष्टिं न्यस्य कृपानिधेऽत्र भगवन्प्राबोधिकीं श्रीपते ॥ १३॥ निद्राशेषकषायितैस्सुललितैरुद्यद्दयाप्यायितै-र्दिव्यापाङ्गझरैस्त्वदर्चनकृते द्वार्यत्र बद्धाञ्जलीन् ।आचार्यान्निगमान्तदेशिकमुखानाधत्स्व सुस्नापितान् ।सुप्रातं तुरगास्य तेऽस्तु करुणासिन्धो दिनं श्रीपते ॥ १४॥ इदं कुम्भद्वन्द्वं घुसृणमसृणस्मेरसलिलम्प्रतीहारे लक्ष्मीस्तनयुगमनोहारि लसति ।इयं गौस्सद्वत्सा परिजनसमूहोऽपि निभृतोदिनं सुप्रातं ते भवतु करुणाब्धे हयमुख ॥ १५॥ रविमण्डलीमिदानीमुदयमहीभृत्तवाभिषेकार्थम् ।कनककलशीमिव वहत्यस्तु हयग्रीव सुप्रभातं ते ॥ १६॥ अनुचित इव सेवने त्वदीये प्रमदभरादिह पञ्चमं विहाय ।विदधति किल वैणिकाश्च गान हयवदनाद्य तवास्तु सुप्रभातम् ॥ १७॥ पिकनिकरमदविधूननगानमनोहरमुदारसुकुमारम् ।धन्यं कन्याद्वन्द्वं त्वां नीराजयति जागृहि हयास्य ॥ १८॥ काहलडिण्डिममण्डलमर्दलपणवाद्यहृद्यवाद्यानाम् ।संस्पर्ध एव निनदा जृम्भन्ते तुरगवदन बुध्यस्व ॥ १९॥ तव तनुरुचिसाधर्म्यात्संहृष्टे नर्तनं किलातनुतः ।द्वारभुवि चामरे द्वे हयवदन तवास्तु सुप्रभातमिह ॥ २०॥ त्वत्पादाम्भोजयुग्मं परिचरितुमना मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिस्सन्श्रीकृष्णब्रह्मतन्त्राग्रिमपदकलिजित्संयमी त्वां स्तवीति ।त्वत्सेवायै समुद्यन्निरवधिकमहानन्दथुस्तिष्ठतीहश्रीमान्कृष्णावनीन्द्रो हयवदन तव श्रीश सुप्रातरस्तु ॥ २१॥ जयजय नित्यसूक्तिललनामणिमौलिमणेजयजय भक्तसंहतिभवाब्धिमहातरणे ।जयजय वेदमौलिगुरुभाग्यदयाजलधेजयजय वाजिवक्त्र परकालयतीन्द्रनिधे ॥ २२॥ इति श्रीकृष्णब्रह्मतन्त्रपरकालयतीन्द्रकृतिषुश्रीहयग्रीवप्राबोधिकस्तुतिस्समाप्ता ॥

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ShrIlakShmIhayavadanaratnamAlAstotram:श्रीलक्ष्मीहयवदनरत्नमालास्तोत्रम्

shrIlakShmIhayavadanaratnamAlAstotram:श्रीलक्ष्मीहयवदनरत्नमालास्तोत्रम् ॥ श्रीः ॥ श्रीलक्ष्मीहयवदनपरब्रह्मणे नमः ।श्रीमते श्रीकृष्णब्रह्मतन्त्रपरकालयतीन्द्रमहादेशिकाय नमः ।श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मे नारायणाख्याने हयशिरउपाख्यानस्य व्याख्याने हयशिरोरत्नभूषणे तद्विवरणदीधितौ चपरिशीलितानां श्रुतीनामर्थस्य सङ्ग्राहकश्रीलक्ष्मीहयवदनरत्नमालास्तोत्रम् । वागीशाख्या श्रुतिस्मृत्युदितशुभतनोवसुदेवस्य मूर्तिःज्ञाता यद्वागुपज्ञं भुवि मनुजवेरैर्वाजिवक्त्रप्रसादात् ।प्रख्याताश्चर्यशक्तिः कविकथकहरिः सर्वतन्त्रस्वतन्त्रःत्रय्यन्ताचार्यनामा मम हृदि सततं देशिकेन्द्रः स इन्धाम् ॥ १॥ सत्वस्थं नाभिपद्मे विधिमथ दितिजं राजसं तामसं चा-ब्बिन्द्वोरुत्पाद्य ताभ्यामपहृतमखिलं वेदमादाय धात्रे ।दत्त्वा द्राक्तौ च हत्वा वरगणमदिशद्वेधसे सत्र आदौतन्त्रं चोपादिशद्यस्स मम हयशिरा मानसे सन्निधत्ताम् ॥ २॥ अध्यास्तेऽङ्कं परावाग् वरहयशिरसो भर्तुराचार्यके यावाञ्छावानैतरेयोपनिषदि चरमात्प्राक्तने खण्ड आदौ ।यस्या वीणां च दैवीं मनसि विनिदधत्ख्यातिमेत्यन्त्यमन्त्रेसेशाना सर्ववाचो मम हृदयगता चारु मां वादयेद्वाक् ॥ ३॥ कृष्णं विप्रा यमेकं विदुरपि बहुधा वेदयो (रैतरेये) रादिमान्तेस्रष्टा विस्रंसमानस्स्वमथ समदधाच्छन्दसां येन दानात् ।कृष्ण विष्णुं च जिष्णुं कलयितुरपि यत्संहितामायुरुक्तंवाक्श्लिष्टं प्राणमेनं हयमुखमनुसन्दध्महे किं वृथाऽन्यैः ॥ ४॥ प्रख्याता याऽऽश्वलायन्यधिकफलदशश्लोक्यभिख्या तदन्तःश्रुत्युक्ता वाक् सरस्वत्यपि हयमुख ते शक्तिरन्या न युक्ता ।पूर्णा त्वच्छक्तिरर्धं भवति विधिवधूर्या नदी सा कलास्याइत्युक्ते ब्रह्मवैवर्त इह समुदिता स्यात्परा निम्नगाऽन्या ॥ ५॥ श्रीहर्षों विष्णुपत्नीं वदति कविरिमा नैषधे मल्लिनाथःख्यातामेतां पुराणे हयमुख भुवि च स्थापितां विष्णुपार्श्वे ।धीवाग्मित्वार्थजप्यं दिनमुखसमये शौनकस्सूक्तमत्याःश्रीयुक्तं बह्वृचस्स स्मृतिकृदपि तदा चिन्तनीयं तथैनाम् ॥ ६॥ वागाम्भृण्यादिसूक्ते निरवधिमहिमा या श्रुता वाक् च देवीपूर्वे सूक्तेऽपि हंसस्त्वमधिकमहिमा विश्रुतो बह्वृचैर्यः ।युक्तावारण्यके तौ कथितबहुगुणौ सामनी संहितेत्य-प्याराध्यो व्यूहरूपी हयमुखविदितो ज्ञानिनां कर्मभिस्त्वम् ॥ ७॥ इन्द्रो वृत्रं हनिष्यन् सखिवर वितरं विक्रमस्वेति विष्णुंसम्प्रार्थ्यातो हतारिस्तत उपजनितब्रह्महत्त्यापनुत्त्यै ।सूक्ताभ्यामाहुतिं यं प्रति परमजुहोन्मूर्ध्नि गन्धर्व एकोदेवानां नामधारी स मम दृढमतावद्य वाचस्पतिस्तात् ॥ ८॥ वेदे चाथर्वणाख्ये प्रथमत उदितं यत्त्रिषप्तीयसूक्तंतन्मेधाजन्मकर्माङ्गमिति निगदितं कौशिकेन स्वसूत्रे ।मेधाकामः पुमान् यस्तुरगमुख ततस्सर्वलोकाधिनाथंध्यायेद्वाचस्पतिं त्वां प्रभवति सकलस्तच्छृतार्थोऽप्रकम्प्यः ॥ ९॥ नासन्नो सत्तदानीमपि तु कमलयाऽवातमेकं तदानीत्तस्माद्धान्यत्परं किञ्चिदपि न तमसा गूढमग्रे प्रकेतम् ।अद्धा को वेद हेतुं द्विविधमविगुणं वासुदेवाभिधानंव्यूहं त्वां प्रातरर्च्यं हयमुख भगमाहुः क्रमात्तैत्तिरीयाः ॥ १०॥ प्रातःपूज्यं भगाख्यं प्रथममकथयन् बह्वृचाः पञ्चमेऽथोनासत्सूक्तेऽष्टमे प्राग्वदपि समवदन् तैतिरीयक्रमात्त्वाम् ।पाराशर्योऽवतीर्णं वदति हयमुखाथर्वणः कौशिकस्त्वाम्मेधार्थं प्रातरर्च्यं भगमनुमनुते संहिताऽप्याह साधु ॥ ११॥ प्रद्युम्नान्तं त्रिपाद्भास्वरवपुरमृतं वासुदेवादिवृन्देपादस्तत्रानिरुद्धो भुवि तत उदभूदात्मभूऋग्विधिज्ञाः ।हुत्वा त्वां यज्ञरूपं हयवदन जितन्ते स्तुतिं तन्वतेऽतःनिर्णीतं सर्ववेदेष्वनुपममिति तत्पौरुष सूक्तमाप्तैः ॥ १२॥ सर्वे वेदाः प्रजाश्च प्रचुरबहुभिदाः संश्रयन्ते यमेकम् ।शास्ता योऽन्तःप्रविष्टस्स्वयमपि दशधात्माचरत्यर्णवे यम् ।ब्रह्मा चैकोन्वविन्दद्धरिमिह दशहोतारमन्तश्च चन्द्रेदेवास्सन्तं सहैनं न हि विदुरवतात्सोऽद्य वाचस्पतिर्माम् ॥ १३॥ यस्माद्ब्रह्मा च रुद्रस्सकलजगदिदं जायतेऽन्तर्बहिर्यत्व्याप्त्या सत्तां च यस्मिन् लयमपि लभते यश्चतुर्वेदमूर्तिः ।विष्णुर्नारायणोऽष्टाक्षरपदविदितो देवकीपुत्र एकोयोथार्वाङ्गे मधोः सूदन उपनिषदि ज्ञायते मे स इन्धाम् ॥ १४॥ शक्तिः स्वाभाविकी सात्र च विविधपरा श्रूयते ज्ञानमेवंत्रेधा तत्र क्रियेत्थं बलमपि तदसौ वासुदेवः स हंसः ।यो ब्रह्माणं विधाय प्रथममथ परान् प्राहिणोत्सर्ववेदान्तस्मै देवं प्रपद्ये शरणमहमिमं चामृतस्यैष सेतुः ॥ १५॥ वम्र्यो विष्णोर्धनुर्ज्यां हयवदन वरान्नेच्छया चिच्छिदुस्तत् ।कोट्या च्छिन्नं च विष्णोः शिर इति गदितं यत्प्रवर्ग्यार्थवादे ।तच्छीर्षं याजमानं श्रुतिमुखत इदं स्थापित युक्तितोऽपिप्रादुर्भावः स गौणो बहुमुखहरिवंशादिनिर्धारितो वा ॥ १६॥ शुक्लं वेदं विवस्वानुपदिशसि परं याज्ञवल्क्याय वाजीवेदैकार्थैर्वचोभिर्मितमिदमखिलाम्नायधीकारिणीं याम् ।वाग्देवीं मोक्षधर्मे कथयति मुनिराट् तत्कृपालब्धभूमात्वच्छक्तिस्सेत्यकम्प्यं हयमुख गदितं ब्रह्मवैवर्तवाग्भिः ॥ १७॥ तस्माद्वेदेऽपि तत्रोपनिषदि बृहदारण्यके काण्ड आत्मात्वं वाग्देव्या सहादौ जनयसि मिथुनीभूय सर्वांश्च वेदान् ।धातारं तस्य पत्नीं तदनु तदुभयद्वारिकां व्यष्टिसृष्टिंतद्यज्ञाराधितोऽस्मै हयवदन वरान्यच्छसीति प्रतीमः ॥ १८॥ तुर्येऽध्याये द्वितीयं तुरगमुख शिशुब्राह्मण व्यूहरूपम्प्राण स्थूणां शिशुं त्वां चमसमपि शिरोऽर्वाग्बिलं चोर्ध्वबुध्नम् ।सप्तानां देवतानामधिकरणममित्रेन्द्रियाणां जयार्थंवाचाष्टम्या युतं त्वां परिकलयति तद्ब्रह्म भक्तार्तिहारि ॥ १९॥ दध्यङ्ङाथर्वणोश्वित्रिदशकृतशिरोधारणादश्वमूर्ध्नाताभ्यां प्रावर्ग्यतत्त्वं हयमुख समुपादिक्षदेतद्यथार्थम् ।एतावत्येव तत्त्वे कलिबलवशतस्तामसाश्शक्त्यधीनंभावत्कं शीर्षमाहुर्भुवि जनिसमये त्वत्कटाक्षातिदूराः ॥ २०॥दध्यङ्ङाथर्वणो यो हयमुख बृहदारण्यके काण्ड आदौआह प्रावर्ग्यतत्त्वं यदपि शतपथे दीक्षणीयार्थवादे ।विष्ण्वाख्यं तत्त्वमुक्तं पुनरुपनिषदि ब्रह्म वागीशरूपंयच्च प्रोक्तं तृतीये तदपि च स मधुब्राह्मणे वक्ति तुर्ये ॥ २१॥ वाचा देव्यानिरुद्धेन च सृजति जगत्सर्वमित्यग्र उक्तोवाहास्यो वासुदेवः स पर इति मधुब्राह्मणं स्थापयित्वा ।दध्यङ्ङाथर्वणोश्वित्रिदशहितमधुत्वाष्ट्रकक्ष्योपदेष्टातत्त्वं जानाति चेत्यप्यखिलशुभतनुं वक्ति वागीश्वरं त्वाम् ॥ २२॥ दध्यङ्ङाथर्वणोऽसावुपदिशति मधुब्राह्मणं त्वाष्ट्रकक्ष्यंयत्तन्नारायणाख्यं कवचमिति समाधुष्यते सात्विकाग्र्यैः ।वृत्रस्येदं वधायालमिति हयमुख ब्रह्मविद्येति तत्त्वंवागीशैते न जानन्त्यनघ तव कृपाबाह्यतां ये प्रयाताः ॥ २३॥ तत्त्वं नारायणाख्योपनिषदि कथितं पञ्चरात्रोक्तरीत्यातन्नामाख्यान आहाश्वमुख विशदमाद्यं च धर्मं मुनीन्द्रः ।गीतायां सङ्गृहीतं विशदयितुमनाः कृष्ण वाहाननैक्यंब्रूते वेदोदितत्वं स्थिरयति च तदत्रोक्त एकान्तिधर्मे ॥ २४॥ आदौ नारायणं तं वदति मधुजितं देवकीपुत्रमन्तेवेदान्तो मोक्षधर्मे वरहयशिरसं प्राह कृष्णस्स्वमेव ।इत्यालोच्यैव योगी कलिजिदभिजगौ तत्क्रमात् स्तौति मध्येवाहास्य त्वां शठारिर्मुनिरपि मनुतेऽश्वं पुरः कृष्णमन्ते ॥ २५॥ जन्मादीनां निदानं कतिचिदकथयन् देवमेकं तथाऽन्येदेवीमेकां विदुस्तन्मिथुनमविकलं ब्रह्म वेदान्तवेद्यम् ।इत्येवं स्थापयित्वा चिदचिदवियुतं श्रीमदेकं तदित्य-प्याचख्यौ मोक्षधर्मे हयमुखजनिवृत्तापदेशान्मुनीन्द्रः ॥ २६॥ श्रावण्यां तेऽवतारे हयमुख निगमोद्धारणार्थत्वबुद्धेःऋग्वेदोपक्रमस्तच्छ्रवणभ इति निश्चिन्वते बह्वृचाग्र्याः ।प्रारम्भो पौर्णमास्यां यजुष इति परे याजुषाः सङ्गिरन्तेतद्वेदोपक्रमान्ते भुवि विधिवशगास्त्वां समाराधयन्ति ॥ २७॥ विष्णोः पत्नी परा वागिति बहुमनुते भारती यां यदींशःपत्युः प्राक्पञ्चरात्रं श्रुतिमपि समुपादिक्षदित्यादरेण ।तद्वागाश्लिष्टमूर्तिं हयशिरस उपाराधयन्ती निशम्यश्रीभाष्यं लक्ष्मणाय स्वपतिविदित यत्याकृतिं बिभ्रतेऽदात् ॥ २८॥ वागीशानस्य मन्त्रं श्रुतिशिखरगुरुस्तार्क्ष्यलक्षं जपित्वाप्राप्तं तत्काललालामृतमपिबदहीन्द्राख्यपुर्यां यतीन्दोः ।मातुर्भ्रातुस्तनूजोत्तमगुणकुरुकाधीशवंश्यार्चितां त-न्मूर्ति सम्प्राप्य काञ्चयां स्वयमपि चिरमाराधयद्भक्तिभूम्ना ॥ २९॥ काले वेदान्तसूरिस्स्वपदमुपगतं ब्रह्मतन्त्रस्वतन्त्रंशिष्याग्र्यं मूर्तिमेनां समनयदथ तच्छात्रपारम्परीतः ।सेयं वागीशमूर्तिर्गुरुवरपरकालादिभिः सेव्यमानारम्यास्थान्यां त्रिकालं विलसति विहितार्चाद्य कर्णाटदेशे ॥ ३०॥ धर्मं पूर्वाश्रमोक्तं सुकरमपि न कृत्वाऽन्तिमोक्तस्य तस्या-नुष्ठानेऽशक्तिभीतं यमुखकृपणं लम्भयित्वाऽऽश्रमं तम् ।शोभोद्रेकादिनाऽर्चाविशय उपगते लक्ष(कोटि)पूजां तुलस्यास्वोपाख्या व्याकृतिं चाकलयसि कियती मय्यनर्घा दया ते ॥ ३१॥ इत्थं वागीशपादूयुगलसततसंसेवनार्चादिदीक्षःतत्रैतां नव्यरङ्गेश्वरयतिरनघामार्पयद्रत्नमालाम् ।एनां नित्यं पठन्तो भुवि मनुजवरा भक्तिभूनेप्सितार्थान्सर्वान् विन्दन्ति वाहाननवरकरुणापाङ्गधाराभिषेकात् ॥ ३२॥ इति श्रीलक्ष्मीहयग्रीवदिव्यपादुकासेवक-श्रीमदभिनवरङ्गनाथब्रह्मतन्त्रपरकालमहादेशिककृतिषुश्रीलक्ष्मीहयवदनरत्नमालास्तोत्रं समाप्तम् ।

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Diwali 2025

Diwali 2025 Subh Muhurat: भूलकर भी घर न लाएं ये 5 ‘अशुभ’ चीजें, वरना पूरे साल रहेगी पैसों की तंगी और मां लक्ष्मी होंगी नाराज !

दिवाली का महत्व और मां लक्ष्मी का आगमन:Importance of Diwali and arrival of Goddess Lakshmi Diwali 2025 Subh Muhurat: हिंदू धर्म में दिवाली (Deepawali) का पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है, जिसे ‘दीपों की रोशनी’ का त्यौहार भी कहा जाता है। पंचांग के अनुसार, यह हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस पवित्र दिन पर माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश और कुबेर देव की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि Diwali 2025 दिवाली के दिन माता लक्ष्मी पृथ्वीलोक पर भ्रमण करने के लिए आती हैं और अपने भक्तों से प्रसन्न होकर उन पर अपनी असीम कृपा बरसाती हैं। शास्त्रों के अनुसार, मां लक्ष्मी वहीं वास करती हैं, जहां साफ-सफाई होती है। Diwali 2025 Subh Muhurat इसलिए दिवाली से पहले बहुत से लोग घर में नई वस्तु लाते हैं। लेकिन, उज्जैन के पंडित आनंद भारद्वाज और अन्य आचार्यों ने कुछ ऐसी चीजों के बारे में सावधान किया है, जिन्हें दिवाली के दौरान या उससे पहले घर में लाने से मां लक्ष्मी रुष्ट (नाराज) हो सकती हैं। Diwali 2025 Subh Muhurat इन वस्तुओं को लाने से पैसों से जुड़ी दिक्कतें और साल भर पैसों की तंगी झेलनी पड़ सकती है। Diwali 2025 Subh Muhurat: भूलकर भी घर न लाएं ये 5 ‘अशुभ’ चीजें…… आइए जानते हैं वे कौन सी वस्तुएं हैं, जिनसे आपको भूलकर भी बचना चाहिए: 1. धारदार और नुकीली चीजें (Sharp and Pointed Objects) दिवाली से पहले या दिवाली के दिन धारदार और नुकीली चीजें लाने की भूल बिल्कुल भी न करें। क्यों हैं ये अशुभ? • धारदार चीजें, जैसे- कैंची, चाकू, लोहा आदि, घर में नकारात्मकता बढ़ाती हैं। • कहा जाता है कि इन्हें घर लाने से घर में अशांति रहने लगती है। • इसका सीधा असर आपके घर की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। 2. टूटी हुई या पुरानी चीजें (Broken and Damaged Items) दिवाली की साफ-सफाई के दौरान आपको टूटी-फूटी चीजों से विशेष दूरी बनाकर रखनी चाहिए। क्या न लाएं और क्या हटा दें:What not to bring and what to remove? • टूटी हुई चीजें, जैसे बर्तन, फर्नीचर या सजावटी सामान, घर में नकारात्मक ऊर्जा का कारण बनता है। • पंडित आनंद भारद्वाज के अनुसार, इन्हें बेकार में घर में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इससे मां लक्ष्मी नाराज होती हैं। • पुराने जूते-चप्पल अगर घर में संभालकर रखे हुए हैं, तो उन्हें तुरंत निकाल कर फेंक देना चाहिए। 3. नकारात्मकता दर्शाने वाली तस्वीरें (Negative Pictures) Diwali 2025:दिवाली का पर्व सकारात्मकता और प्रकाश का पर्व है। Diwali 2025 Subh Muhurat इसलिए घर में कभी भी नकारात्मकता को दर्शाने वाली तस्वीरों को नहीं लगाना चाहिए। क्या करें? • युद्ध, संघर्ष या उदासी की तस्वीरें तुरंत हटा दें। • इन्हें हटाकर घर में सकारात्मक और प्रेरणादायक चित्रों को लगाना चाहिए, जिससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहे। 4. काले रंग की वस्तुएं (Black Coloured Items) दिवाली के त्यौहार को हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया गया है। काले रंग को नकारात्मका का प्रतीक माना जाता है। क्या परहेज करें? • दिवाली के दिन काले रंग के परदे या झालर (सजावटी लाइट) लगाने से बचें। • काले रंग की कोई भी वस्तु अपने घर पर न लाएं। • काले रंग के कपड़े की खरीददारी करने से भी इस दौरान बचना चाहिए। 5. खट्टा सामान (Sour Items) कुछ मान्यताओं के अनुसार, Diwali 2025 दिवाली से पहले खट्टा सामान की खरीददारी करने से बचना चाहिए। कौन से खाद्य पदार्थ न खरीदें? • इस समय में नींबू, आचार आदि जैसी खट्टी चीजों की खरीदारी नहीं करनी चाहिए। • माना जाता है कि इन्हें घर लाने से व्यक्ति को पैसों से जुड़ी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। निष्कर्ष: यदि आप चाहते हैं कि आपके घर पर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहे, तो दिवाली से पहले इन अशुभ चीजों को अपने घर पर भूलकर भी न लाएं।

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Lakshmi Ganesh

Spne mein Maa Lakshmi Ganesh ko Dekhna: सपने में मां लक्ष्मी और गणेश जी का दीदार: जानिए ये 7 शुभ संकेत जो बदल सकते हैं आपकी किस्मत

Spne mein Maa Lakshmi Ganesh ko Dekhna:हर इंसान आमतौर पर सपने देखता है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में शुभ या अशुभ संकेत देते हैं। ये हमारे अचेतन मन (subconscious mind) की एक झलक होते हैं। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि अगर आपने कोई सपना शुभ देखा हो, तो उसका असल जिंदगी में भी फल शुभ ही हो। Lakshmi Ganesh लेकिन कुछ दिव्य आकृतियों का सपना देखना विशेष महत्व रखता है और आपकी किस्मत चमकने का संकेत देता है। Spne mein Maa Lakshmi Ganesh ko Dekhna: सपने में मां लक्ष्मी और गणेश जी का दीदार…. आइए जानते हैं कि यदि आपको सपने में धन की देवी मां लक्ष्मी और विघ्नहर्ता भगवान गणेश Lakshmi Ganesh जी दिखाई दें तो इसका क्या मतलब होता है। 1. सपने में केवल मां लक्ष्मी को देखना:Seeing only Goddess Lakshmi in dreams स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में केवल मां लक्ष्मी को देखना अत्यंत शुभ (बहुत शुभ) माना गया है। मां लक्ष्मी समृद्धि और धन की देवी हैं। इस सपने के मुख्य संकेत: • आकस्मिक धन लाभ: यह संकेत है कि आपको कहीं से आकस्मिक धन की प्राप्ति हो सकती है। यह सपना यह भी दर्शाता है कि आपकी आर्थिक परेशानियों से निजात मिल सकती है। • समृद्धि और कृपा: इसका मतलब है कि आप पर मां लक्ष्मी की कृपा होने वाली है। यह संकेत हो सकता है Lakshmi Ganesh कि आपके प्रयास सफल होंगे, विशेषकर यदि आप व्यवसाय या किसी अन्य क्षेत्र में मेहनत कर रहे हैं। 2. उल्लू पर बैठकर दर्शन दें मां लक्ष्मी:Give darshan of Goddess Lakshmi sitting on an owl मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। यदि आप सपने में Lakshmi Ganesh मां लक्ष्मी को उनके वाहन उल्लू पर बैठे देखते हैं, तो यह बहुत ही शुभ संकेत माना जाता है। इस शुभ संकेत का अर्थ: • करियर और व्यापार में लाभ: इसका मतलब है कि आपको व्यापार (बिजनेस) और करियर में फायदा हो सकता है। • धन आगमन का सूचक: उल्लू पर बैठी माता को देखना धन आगमन का सूचक माना जाता है। • समस्याओं से छुटकारा: मां लक्ष्मी के साथ उल्लू देखना यह भी दर्शाता है कि आपको अपनी मौजूदा समस्याओं से छुटकारा मिलेगा। Lakshmi Ganesh आपको खुद पर विश्वास करके काम शुरू करना चाहिए, जिसमें आपको निश्चित रूप से लाभ मिलेगा। 3. माता लक्ष्मी को विष्णु भगवान के साथ देखना:Seeing Goddess Lakshmi with Lord Vishnu Lakshmi Ganesh स्वप्न शास्त्र के मुताबिक, सपने में माता लक्ष्मी को विष्णु भगवान के साथ देखना भी बहुत शुभ माना जाता है। यह क्या दर्शाता है? • शुभ समाचार: इसका मतलब है कि आपको कोई शुभ सूचना मिलने वाली है। • विवाह का संकेत: यदि आप अविवाहित हैं, तो आपको विवाह से संबंधित शुभ सूचना मिल सकती है। • उधार धन वापसी: यह संकेत देता है कि उधार दिया हुआ धन आपको वापस मिल सकता है। 4. सपने में भगवान गणेश जी को देखना:Seeing Lord Ganesha in dreams भगवान गणेश विघ्नहर्ता और सफलता के प्रतीक हैं। जब आप सपने में भगवान गणेश को देखते हैं, तो यह कई सकारात्मक बदलावों की ओर इशारा करता है: • विघ्नों का निवारण: यह संकेत हो सकता है कि आपके जीवन में आने वाली बाधाएं (बाधाएँ) दूर होने वाली हैं। यह सपना आपको आश्वासन देता है कि आपके सभी कार्य सफल होंगे। • नई शुरुआत: भगवान गणेश का सपना नई शुरुआत और नए अवसरों का प्रतीक होता है। Lakshmi Ganesh यह संकेत हो सकता है कि आप किसी नए प्रोजेक्ट, व्यवसाय या व्यक्तिगत जीवन में नई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। • बुद्धि और विवेक: गणेश जी का दीदार यह भी दर्शाता है Lakshmi Ganesh कि आपको अपने निर्णयों में विवेक और बुद्धि का उपयोग करने की आवश्यकता है। यह आपको समस्याओं का समाधान सोच-समझकर करने के लिए प्रेरित करता है। 5. माता लक्ष्मी और गणेश जी का एक साथ दिखाई देना:Appearance of Goddess Lakshmi and Ganesh ji together स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश जी की मूर्ति एक साथ दिखाई दे, तो इसका मतलब भी बहुत शुभ है। एक साथ दर्शन के लाभ: • कष्टों से मुक्ति: इसका मतलब है कि आपको कष्टों और परेशानियों से मुक्ति मिलने वाली है। • भाग्य का साथ: आपको भाग्य का भी साथ मिलना शुरू होगा। सपने में सकारात्मक परिवर्तन के अन्य संकेत स्वप्न शास्त्र में कुछ अन्य दृश्य भी हैं जो सकारात्मकता और नई शुरुआत का संकेत देते हैं, खासकर जब आप इन देवी-देवताओं को देखते हैं: 6. प्राकृतिक दृश्य: यदि आप सपने में हरे-भरे पेड़, फूलों या पहाड़ों को देखते हैं, तो यह सकारात्मकता और नई शुरुआत का संकेत हो सकता है। ये सपने आपकी भावनात्मक और मानसिक स्थिति में सुधार का संकेत देते हैं। 7. उत्सव या समारोह: सपने में किसी उत्सव या समारोह में भाग लेना यह दर्शाता है कि आपके जीवन में खुशियाँ आने वाली हैं। यह आपके रिश्तों में सुधार और नए अवसरों की ओर इशारा कर सकता है। सपने के बाद क्या करें? (आगे की दिशा) यदि आपको ये शुभ सपने दिखाई दिए हैं, तो स्वप्न शास्त्र कुछ विशेष क्रियाएं करने की सलाह देता है ताकि आप इन सकारात्मक संकेतों का अधिकतम लाभ उठा सकें: • पूजा और ध्यान: मां लक्ष्मी की पूजा करें और उनके प्रति श्रद्धा रखें। भगवान गणेश की पूजा करें और उनसे अपने कार्यों में सफलता की प्रार्थना करें। उनका आशीर्वाद आपके जीवन में सकारात्मकता लाएगा। • सकारात्मक सोच: अपने विचारों को सकारात्मक बनाए रखें। यह न केवल आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि आपके सपनों को साकार करने में भी मदद करेगा। • दान और सेवा: जरूरतमंदों की मदद करें। दान करने से आप अपने जीवन में मां लक्ष्मी का आशीर्वाद आकर्षित कर सकते हैं। • साधना: ध्यान और साधना में समय बिताएं। इससे आप मानसिक रूप से मजबूत बनेंगे और अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक सजग रहेंगे। कुबेर के ये 3 मंत्र होते हैं बहुत प्रभावशाली, दरिद्रता दूर कर बना सकते हैं बेशुमार धन….

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Kuber Mantra

Kuber Mantra:कुबेर के ये 3 मंत्र होते हैं बहुत प्रभावशाली, दरिद्रता दूर कर बना सकते हैं बेशुमार धन….

Kuber Mantra Upay 2025:हिंदू धर्म ग्रन्थों में जिस प्रकार से मां लक्ष्मी को धन की देवी कहा गया उसी प्रकार कुबेर देव का उल्लेख धन के राजा के रूप में हुआ है. मान्यता है कि कुबेर देव की सच्चे मन और श्रद्धा भाव से नियमित रूप से विधि पूर्वक उपासना-वंदना की जाये तो भक्तों पर उनकी अति कृपा होती है. जिस व्यक्ति पर भगवान कुबेर की कृपा होती है उसे कभी धन संबंधी समस्या नहीं आती है. उसे आर्थिक समस्या का सामना नहीं करना पड़ता है. कुबेर देव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए ये तीन प्रभावशाली मन्त्र है. Kuber Mantra इनके नियमित जाप से व्यक्ति की दरिद्रता दूर होती है और वह बहुत जल्द ही बेशुमार धन का मालिक बन जाता है. Kuber Mantra:कुबेर के ये 3 मंत्र होते हैं बहुत प्रभावशाली, दरिद्रता दूर कर बना सकते हैं बेशुमार धन…. भगवान कुबेर का अमोघ मंत्र माना जाता है कि ये मन्त्र Kuber Mantra कुबेर देवा का सबसे प्रिय मन्त्र है. Kuber Mantra इस 35 अक्षरों वाले मंत्र का नियमित रूप से 3 माह तक जाप करने से मनुष्य को किसी भी तरह के धन-धान्य की कमी नहीं होती. मन्त्र का जाप करते समय मुंह दक्षिण दिशा की और करें.   पहला मंत्र : ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये, धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥ अष्ट लक्ष्मी कुबेर मंत्र यह मंत्र मां लक्ष्मी और कुबेर देवता का माना जाता है. कहते हैं जिस व्यक्ति को जीवन में कहा जाता है कि इस मन्त्र के जाप से व्यक्ति के जीवन में ऐश्वर्य, पद, प्रतिष्ठा, सौभाग्य की प्राप्ति होती है. इस मंत्र का जाप सच्चे श्रद्धा भाव के साथ नियमित रूप से शुक्रवार की रात में करनी चाहिए. दूसरा मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट–लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः॥ धन प्राप्ति के लिए कुबेर मंत्र इस मंत्र से व्यक्ति को हर तरह के भौतिक सुख प्राप्त होते हैं. इस मंत्र के नियमित जाप से कभी भी आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ता. तीसरा मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः॥

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Diwali Puja Vidhi

Diwali Puja Vidhi : Laxmi Ganesh Kuber Puja Vidhi and Mantra: दिवाली की संपूर्ण पूजा विधि मंत्र सहित, ऐसे करें दिवाली पर लक्ष्मी पूजन

Diwali Laxmi Diwali Puja Vidhi Mantra 2025:दिवाली पूजा विधि मंत्र विस्तार से जानिए, दिवाली पर लक्ष्मी गणेश और भगवान कुबेर की पूजा कैसे करें जिससे आपको स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति हो जानिए दिवाली पूजन की संपूर्ण विधि और मंत्र। Diwali Puja Vidhi: कार्तिक कृष्ण अमावस्या के शुभ अवसर पर माता लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहे इसके लिए आज शाम शास्त्रों में लक्ष्मी माता के साथ गणेश और कुबेर की पूजा का विधान बताया गया है। शास्त्रों में कहा गया है Diwali Puja Vidhi कि कार्तिक कृष्ण अमावस्या तिथि को प्रदोष काल में स्थिर लग्न में दिवाली पूजन करने से अन्न-धन की प्राप्ति होती है। Diwali Puja Vidhi जो लोग तंत्र विद्या से देवी की पूजा करते हैं उन्हें आधी रात के समय निशीथ काल में पूजा करनी चाहिए। वैसे आज रात दिवाली पर निशीश काथ में सूर्य ग्रहण का सूतक लग जाएगा। ऐसे में गृहस्थों के लिए दीपावली पूजा की विधि जानें। Diwali Puja Vidhi : Laxmi Ganesh Kuber Puja Vidhi and Mantra: दिवाली की संपूर्ण पूजा विधि मंत्र सहित Diwali Puja Vidhi: दिवाली पूजन के लिए जरूरी सामग्री कलावा, रोली, सिंदूर, एक नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, पांच सुपारी, लौंग, पान के पत्ते, घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी, अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, रूई, आरती की थाली। कुशा, रक्त चंदनद, श्रीखंड चंदन। दिवाली पूजा की इस तरह करें तैयारी Diwali Puja Vidhi:पूजन शुरू करने से पहले गणेश लक्ष्मी के विराजने के स्थान पर रंगोली बनाएं। जिस चौकी पर पूजन कर रहे हैं उसके चारों कोने पर एक-एक दीपक जलाएं। इसके बाद प्रतिमा स्थापित करने वाले स्थान पर कच्चे चावल रखें फिर गणेश और लक्ष्मी की प्रतिमा को विराजमान करें। इस दिन लक्ष्मी, गणेश के साथ कुबेर, सरस्वती एवं काली माता की पूजा का भी विधान है Diwali Puja Vidhi अगर इनकी मूर्ति हो तो उन्हें भी पूजन स्थल पर विराजमान करें। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु की पूजा के बिना देवी लक्ष्मी की पूजा अधूरी रहती है। इसलिए भगवान विष्ण के बायीं ओर रखकर देवी लक्ष्मी की पूजा करें। दीवाली पूजन विधि और मंत्र: दिवाली पूजन आरंभ करें पवित्री मंत्र सेः “ऊं अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥” इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन और पूजन सामग्री पर 3-3 बार कुशा या पुष्पादि से छींटें लगाएं। आचमन करें – ऊं केशवाय नम: ऊं माधवाय नम:, ऊं नारायणाय नम:, फिर हाथ धोएं। Diwali Puja Vidhi: इस मंत्र से आसन शुद्ध करें- ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ अब चंदन लगाएं। अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए मंत्र बोलें चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठ सर्वदा। दीपावली पूजन के लिए संकल्प मंत्रः बिना संकल्प के पूजन पूर्ण नहीं होता इसलिए संकल्प करें- पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी का सिक्का, नारियल (पानी वाला), मिठाई, मेवा, आदि सभी सामग्री थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर संकल्प मंत्र बोलें- ऊं विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2071 तमेऽब्दे कालयुक्त नाम संवत्सरे दक्षिणायने हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ शुक्रवासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योगे नाग करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये। कलश की पूजा करेंः कलश पर मौली बांधकर ऊपर आम का पल्लव रखें। कलश में सुपारी, दूर्वा, अक्षत, सिक्का रखें। नारियल पर वस्त्र लपेटकर कलश पर रखें। हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देवता का कलश में आह्वान करें। ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांग सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥) दीपावली गणेश पूजा मंत्र विधिः. नियमानुसार सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें। हाथ में फूल लेकर गणेश जी का ध्यान करें। मंत्र बोलें- गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्। Diwali Puja Vidhi आवाहन मंत्र- हाथ में अक्षत लेकर बोलें -ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। अक्षत पात्र में अक्षत छोड़ें। पद्य, आर्घ्य, स्नान, आचमन मंत्र – एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:। इस मंत्र से चंदन लगाएं: इदम् रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:, इसके बाद- इदम् श्रीखंड चंदनम् बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। अब सिन्दूर लगाएं “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाएं। गणेश जी को लाल वस्त्र पहनाएं। इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि। गणेश जी को प्रसाद चढ़ाएं: इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिठाई अर्पित करने के लिए मंत्र: – इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब आचमन कराएं। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी दें: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:। कलश पूजन के बाद कुबेर और इंद्र सहित सभी देवी देवताओं की पूजा गणेश पूजन की तरह करें। Diwali Puja Vidhi बस गणेश जी के स्थान पर संबंधित देवी-देवताओं के नाम लें। Diwali Puja Vidhi:दीपावली लक्ष्मी पूजन विधि मंत्र सबसे पहले माता लक्ष्मी का ध्यान करेंः – ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी। गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।। लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। ज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः। नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।। अब हाथ में अक्षत लेकर बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।” प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं: ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि कहकर लाल वस्त्र पहनाएं। देवी लक्ष्मी की अंग पूजा मंत्र एवं विधि बाएं हाथ में अक्षत लेकर दाएं

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Hanuman Puja:साल 2025 में कब है हनुमान पूजा? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, नियम, अनुष्ठान और हनुमान जी का आशीर्वाद पाने के खास उपाय

Hanuman Puja:संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा भक्तों, मान्यता है कि पूर्ण भक्तिभाव के साथ नियमपूर्वक हनुमान जी की पूजा करने से वे बहुत जल्द ही जातक के सभी संकट दूर करते हैं, और प्रसन्न होकर सभी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। दिवाली पूजा से एक दिन पहले, भारत के कुछ हिस्सों में विशेष रूप से गुजरात में हनुमान जी की पूजा की जाती है। साल 2025 में हनुमान पूजा कब की जाएगी:When will Hanuman Puja be performed in the year 2025? दिवाली हनुमान पूजा 19 अक्टूबर 2025, रविवार को की जाएगी। दिवाली हनुमान पूजा मूहूर्त – 19 अक्टूबर की रात 11:18 पी एम से 12:08 ए एम, (20 अक्टूबर) तक रहेगा। पूजा मूहूर्त की कुल अवधि – 00 घण्टे 50 मिनट्स काली चौदस – 19 अक्टूबर 2025, रविवार को है। चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 19, 2025 को 01:51 पी एम बजे चतुर्दशी तिथि समाप्त – अक्टूबर 20, 2025 को 03:44 पी एम बजे इस दिन के अन्य शुभ मुहूर्त:Other auspicious times of this day मुहूर्त समय ब्रह्म मुहूर्त 04:18 ए एम से 05:08 ए एम प्रातः सन्ध्या 04:43 ए एम से 05:58 ए एम अभिजित मुहूर्त 11:20 ए एम से 12:06 पी एम विजय मुहूर्त 01:37 पी एम से 02:23 पी एम गोधूलि मुहूर्त 05:27 पी एम से 05:52 पी एम सायाह्न सन्ध्या 05:27 पी एम से 06:42 पी एम अमृत काल 09:59 ए एम से 11:44 ए एम निशिता मुहूर्त 11:18 पी एम से 12:08 ए एम, अक्टूबर 20 क्या है हनुमान पूजा:What is Hanuman Puja? Hanuman Puja: हनुमान पूजा एक धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें भक्त भगवान हनुमान की आराधना करते हैं। इसे विशेष रूप से बुराई, नकारात्मक ऊर्जाओं और संकटों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है। हनुमान जी को शक्ति, साहस, बुद्धि और संकटों पर विजय पाने वाला देवता माना जाता है। हनुमान पूजा आमतौर पर काली चौदस के दिन की जाती है, जो दिवाली से एक दिन पहले पड़ती है। इस दिन विशेष रूप से हनुमान जी की आराधना करने से घर, जीवन और मन पर नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा मिलती है। क्यों करते हैं हनुमान पूजा:Why do we worship Hanuman संकट निवारण के लिए हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है। Hanuman Puja उनकी पूजा करने से जीवन के संकट, भय और परेशानियों से मुक्ति मिलती है। नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा काली चौदस की रात को नकारात्मक ऊर्जाएं सबसे शक्तिशाली मानी जाती हैं। इस दिन Hanuman Puja हनुमान जी की पूजा करने से बुरी आत्माओं और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा होती है। भक्ति और शक्ति के लिए हनुमान जी की भक्ति से मन में साहस, शक्ति और आत्मविश्वास का संचार होता है। श्रीराम भक्त के रूप में आशीर्वाद हनुमान जी प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। उनकी पूजा करने से भक्त को श्रीराम की कृपा भी प्राप्त होती है। दिवाली उत्सव में महत्वपूर्ण स्थान हनुमान पूजा का समय दिवाली से एक दिन पहले रखा जाता है ताकि घर, परिवार और व्यापारिक कार्यों में सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे हनुमान पूजा का महत्व क्या है:What is the importance of Hanuman puja हनुमान पूजा Hanuman Puja और काली चौदस की पूजा एक ही दिन की जाती है। ऐसा माना जाता है कि काली चौदस अर्थात दिवाली से एक दिन पहले नरक चतुर्दशी की रात में नकारात्मक शक्तियां सबसे शक्तिशाली होती हैं। इन नकारात्मक ऊर्जाओं से लड़ने की शक्ति देने वाले भगवान हनुमान जी की पूजा शक्ति, सिद्धि और सभी प्रकार की बुरी आत्माओं से सुरक्षा पाने के लिए की जाती है। एक अन्य किवदंती के अनुसार, रावण के अत्याचारों से सबको मुक्त करवाने और भाई लक्ष्मण और देवी सीता सहित अपने चौदह वर्ष के वनवास को पूरा करने के बाद भगवान राम की अयोध्या वापसी के उत्सव के रूप में दिवाली मनाई जाती है। Hanuman Puja हनुमान जी प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। उनके जैसा कोई भक्त संसार में कोई दूजा नहीं हुआ। Hanuman Puja हनुमान जी की अद्वितीय भक्ति और समर्पण से प्रभु श्रीराम बहुत अभिभूत हुए और उन्होंने प्रसन्न होकर हनुमान जी को उनके पहले पूजे जाने का आशीर्वाद दिया। यही कारण है लोग दिवाली के उत्सव से एक दिन पहले भगवान हनुमान की पूजा करके उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। हनुमान पूजा के अनुष्ठान क्या हैं:What are the rituals of Hanuman puja हनुमान जी की साधना करते समय ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करें। जातक स्वयं की व पूजा स्थल की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। इस दिन भगवान हनुमान को सिंदूर और चमेली का तेल विशेष रूप से अर्पित करें। तो भक्तों, ये थी जानकारी दिवाली पर की जाने वाली Hanuman Puja हनुमान पूजा के बारे में। आशा है कि आपकी उपासना से बजरंगबली प्रसन्न होंगे और आपकी तथा आपके परिवार की सभी बुरी बलाओं से रक्षा करेंगे। हनुमान पूजा की विधि और अनुष्ठान:Method and rituals of Hanuman puja 1. पूजा की तैयारी 2. ब्रह्मचर्य और शुद्धता का पालन 3. हनुमान जी को अर्पण 4. हनुमान चालीसा का पाठ 5. हनुमान नाम का जाप 6. विशेष उपाय 7. हनुमान मंत्र पूजा के दौरान निम्न मंत्रों का उच्चारण करें:Chant the following mantras during the puja: ॐ हनुमते नमः ॐ श्रीरामदूताय नमः ॐ श्रीरामचरणस्मरणाय नमः इन मंत्रों का जाप करने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और बुरी शक्तियों से सुरक्षा मिलती है। हनुमान पूजा के नियम:Rules of hanuman puja स्नान और शुद्ध वस्त्र ब्रह्मचर्य का पालन समान का महत्व भक्ति और मानसिक शुद्धता हनुमान पूजा पद्धति:Hanuman worship method प्रतिमा या चित्र की स्थापना पूजा सामग्री आराधना विधि निम्न मंत्रों का उच्चारण करें भजन और पाठ ध्वजा और प्रतीक चिह्न इन उपायों से मिलेगा हनुमान जी का आशीर्वाद:With these measures you will get the blessings of Hanuman ji हर मंगलवार और शनिवार को Hanuman Puja हनुमान चालीसा का पाठ करने से शक्ति और साहस बढ़ता है। संकट और बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए हनुमान मंत्र का जाप नियमित करें। हनुमान जी की मूर्ति के सामने प्रतिदिन सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें। किसी जरूरतमंद को भोजन, वस्त्र या दान देने से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। नकारात्मक ऊर्जाओं और बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए हनुमान जी की आरती और स्तुति नियमित

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Diwali 2025: दिवाली से पहले इन 7 शुभ सपनों का दिखना है माता लक्ष्मी की कृपा का संकेत !

Diwali 2025: सपने हमें हमारे अचेतन मन में दिखाई देते हैं, और स्वप्नशास्त्र (Swapna Shastra) मानता है कि हम जो सपने देखते हैं, वे हमें आने वाले समय के बारे में संकेत देते हैं। कुछ सपने शुभ माने जाते हैं, जबकि कुछ अशुभ संकेत देते हैं। Diwali हिन्दू धर्म में दिवाली को धन की देवी लक्ष्मी से जोड़कर देखा जाता है। स्वप्नशास्त्र के अनुसार, यदि माता लक्ष्मी आपसे प्रसन्न हैं, तो वह दिवाली से पहले कुछ विशेष सपनों के जरिए संकेत देती हैं कि आपकी किस्मत चमकने वाली है और आप पर पैसों की बारिश होने वाली है। आइए विस्तार से जानते हैं 7 ऐसे अत्यंत शुभ सपनों के बारे में जो Diwali दीपावली से पहले दिखना सौभाग्य लाता है: 1. स्‍वास्तिक चिह्न का दिखना हिन्दू धर्म में स्‍वास्तिक चिह्न को अत्यंत शुभ माना गया है। Diwali दिवाली के दिन घर के मुख्य द्वार पर स्‍वास्तिक चिह्न लगाना शुभ होता है, जिससे माना जाता है कि देवी लक्ष्मी घर में वास करती हैं। स्वप्नशास्त्र कहता है कि अगर Diwali दिवाली से पहले सपने में स्‍वास्तिक चिह्न दिखाई दे, तो यह शुभ संकेत होता है। यह सपना परिवार में सुख और समृद्धि लेकर आता है, साथ ही परिवार के लोगों के बीच रिश्ते भी मजबूत होते हैं। 2. मंदिर का दिखना या खुद को पूजा करते देखना स्वप्नशास्त्र के अनुसार, Diwali दिवाली से पहले सपने में मंदिर के दर्शन होना एक बहुत शुभ संकेत है। यदि आप सपने में मंदिर देखते हैं, या खुद को पूजा करते हुए देखते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप जिस काम में बहुत दिनों से लगे हुए हैं, उसमें शीघ्र ही सफलता मिलने वाली है। यह सपना यह भी संकेत देता है कि माता लक्ष्मी आपसे प्रसन्न हैं। स्वप्नशास्त्र में मंदिर दर्शन को देवताओं के दर्शन के समान बताया गया है। यह सपना आपकी आध्यात्मिक उन्नति को भी दर्शाता है और यह बताता है कि आपके पारिवारिक जीवन में खुशियां आएंगी और देवी लक्ष्मी की कृपा से धन भी आएगा। 3. गाय से दूध निकालते दिखना या गाय का दिखना वैसे तो सपने में गौ माता का दिखना ही शुभ माना जाता है। लेकिन यदि Diwali दिवाली से पहले आप सपने में गाय से खुद को दूध निकालते हुए देखते हैं, तो यह अत्यंत ही शुभ होता है। इस सपने का अर्थ है कि माता लक्ष्मी आपसे प्रसन्न हैं और आप पर पैसों की बारिश करने वाली हैं। सामान्य तौर पर, सपने में गाय का दिखना जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में लाभ पाने और धन से जुड़े मामलों में सफलता अर्जित करने का संकेत देता है। 4. अखंड ज्योति या दीपक जलते हुए देखना दिवाली (Diwali) से पहले यदि कोई सपने में अखंड ज्योति (लगातार जलने वाला दीपक) जलते हुए देखता है, तो यह शुभ माना जाता है। इस सपने का अर्थ यह है कि माता लक्ष्मी की कृपा से आप दीर्घायु होने वाले हैं। साथ ही, आपके सुख और समृद्धि में भी वृद्धि होने वाली है। यदि आप सेहत को लेकर परेशान हैं, तो आप जल्द ही इस परेशानी से मुक्त हो सकते हैं। दीपावली से पहले दीपक का सपने में दिखना भी एक बेहद शुभ संकेत है। 5. अपने कुलदेव या कुलदेवी को देखना दिवाली Diwali से पहले अगर आपको सपने में अपने कुलदेवता या कुलदेवी दिखाई देते हैं, तो यह समझ लीजिए कि आपकी मनोकामना जल्‍द ही पूरी होने वाली है। यदि आप नौकरी तलाश रहे हैं, तो जल्द ही आपको अच्छी नौकरी मिलने वाली है। जो लोग अविवाहित हैं, उन्हें जल्द ही जीवनसाथी मिलने वाली है। 6. कमल का फूल, धन, और सोना देखना दीपावली Diwali से पहले अगर आपको सपने में कमल का फूल दिखाई देता है, तो इसे बहुत शुभ संकेत माना जाता है। ऐसा सपना आने के बाद आपके जीवन और आपके पारिवारिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इसी तरह, यदि आप सपने में धन या सोना देखते हैं, तो इसे भी बेहद शुभ संकेत माना जाता है। ऐसा सपना आने के बाद आपकी झोली खुशियों से भर सकती है, और आपको धन-धान्य की प्राप्ति होती है। 7. स्वच्छ जल या पवित्र नदी देखना अगर आप दीपावली Diwali से पहले सपने में गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदी देखें या कोई स्वच्छ तालाब देखें, तो इसे भी बेहद शुभ संकेत माना जाता है। इस सपने का अर्थ होता है कि माता लक्ष्मी आपके कर्मों से प्रसन्न हैं। ऐसा सपना आने के बाद आपको उनका आशीर्वाद प्राप्त हो सकता है और यह सपना आर्थिक रूप से आपको मजबूती दिलाने वाला माना जाता है। चित्रगुप्त पूजा 2025 में कब है? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और संपूर्ण पूजा विधि

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ShrI siddhi vinAyaka nAmAvali: श्रीसिद्धिविनायकनामावली

ShrI siddhi vinAyaka nAmAvali: श्रीसिद्धिविनायकनामावली अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरैरपि । सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ गणानामधिपश्चण्डो गजवक्त्रस्तिलोचनः । प्रीतो भवतु मे नित्यं वरदाता विनायकः ॥ गजाननं गणपतिं गुणानामालयं परम् । तं देवं गिरिजासूनुं वन्देऽहम् अमरार्चितम् ॥ गजवदनम् अचिन्त्यं तीक्ष्णदन्तं त्रिनेत्रम् बृहदुदरम् अशेषं पूतरूपं पुराणम् ।अमरवरसुपूज्यं रक्तवर्णं सुरेशम् पशुपतिसुतम् ईशं विघ्नराजं नमामि ॥ हरिहरविरिञ्चिवासवाद्यैः अपि कृतपूजमुपक्रमे क्रियायाःसकलदुरितहरम् अम्बिकायायाः प्रथमसुतं प्रणमामि विघ्नराजम् ॥ ध्यायेन्नित्यं गणेशं परमगुणयुतं ध्यानसंस्थं त्रिनेत्रम् एकं देवं त्वनेकं परमसुखयुतं देवदेवं प्रसन्नम् ।शुण्डादण्डाढ्यगण्डोद्गलितमदजलोल्लोलमत्तालिमालं श्रीमन्तं विघ्नराजं सकलसुखकरं श्रीगणेशं नमामि ॥ बीजापूरगदेक्षुकार्मुकरुजाचक्राब्जपाशोत्पल- व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशप्रोद्यत्कराम्भोरुहः ।ध्येयो वल्लभया सपद्मकरया श्लिष्टोज्वलद्भूषया विश्वोत्पत्तिविपत्तिसंस्थितिकरो विघ्नो विशिष्टार्त्थदः ॥ ॐ विनायकाय नमः ।ॐ विघ्नराजाय नमः ।ॐ गौरीपुत्राय नमः ।ॐ गणेश्वराय नमः ।ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः ।ॐ अव्ययाय नमः ।ॐ पूताय नमः ।ॐ दक्षाध्यक्ष्याय नमः ।ॐ द्विजप्रियाय नमः ।ॐ अग्निगर्भच्छिदे नमः । १०ॐ इन्द्रश्रीप्रदाय नमः ।ॐ वाणीबलप्रदाय नमः ।ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः ।ॐ शर्वतनयाय नमः ।ॐ गौरीतनूजाय नमः ।ॐ शर्वरीप्रियाय नमः ।ॐ सर्वात्मकाय नमः ।ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः ।ॐ देवोऽनेकार्चिताय नमः ।ॐ शिवाय नमः । २०ॐ शुद्धाय नमः ।ॐ बुद्धिप्रियाय नमः ।ॐ शान्ताय नमः ।ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।ॐ गजाननाय नमः ।ॐ द्वैमातुराय नमः ।ॐ मुनिस्तुत्याय नमः ।ॐ भक्त विघ्न विनाशनाय नमः ।ॐ एकदन्ताय नमः ।ॐ चतुर्बाहवे नमः । ३०ॐ शक्तिसंयुताय नमः ।ॐ चतुराय नमः ।ॐ लम्बोदराय नमः ।ॐ शूर्पकर्णाय नमः ।ॐ हेरम्बाय नमः ।ॐ ब्रह्मवित्तमाय नमः ।ॐ कालाय नमः ।ॐ ग्रहपतये नमः ।ॐ कामिने नमः ।ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः । ४०ॐ पाशाङ्कुशधराय नमः ।ॐ छन्दाय नमः ।ॐ गुणातीताय नमः ।ॐ निरञ्जनाय नमः ।ॐ अकल्मषाय नमः ।ॐ स्वयंसिद्धार्चितपदाय नमः ।ॐ बीजापूरकराय नमः ।ॐ अव्यक्ताय नमः ।ॐ गदिने नमः ।ॐ वरदाय नमः । ५०ॐ शाश्वताय नमः ।ॐ कृतिने नमः ।ॐ विद्वत्प्रियाय नमः ।ॐ वीतभयाय नमः ।ॐ चक्रिणे नमः ।ॐ इक्षुचापधृते नमः ।ॐ अब्जोत्पलकराय नमः ।ॐ श्रीधाय नमः ।ॐ श्रीहेतवे नमः ।ॐ स्तुतिहर्षताय नमः । ६०ॐ कलाद्भृते नमः ।ॐ जटिने नमः ।ॐ चन्द्रचूडाय नमः ।ॐ अमरेश्वराय नमः ।ॐ नागयज्ञोपवीतिने नमः ।ॐ श्रीकान्ताय नमः ।ॐ रामार्चितपदाय नमः ।ॐ वृतिने नमः ।ॐ स्थूलकान्ताय नमः ।ॐ त्रयीकर्त्रे नमः । ७०ॐ सङ्घोषप्रियाय नमः ।ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।ॐ स्थूलतुण्डाय नमः ।ॐ अग्रजन्याय नमः ।ॐ ग्रामण्ये नमः ।ॐ गणपाय नमः ।ॐ स्थिराय नमः ।ॐ वृद्धिदाय नमः ।ॐ सुभगाय नमः ।ॐ शूराय नमः । ८०ॐ वागीशाय नमः ।ॐ सिद्धिदाय नमः ।ॐ दूर्वाबिल्वप्रियाय नमः ।ॐ कान्ताय नमः ।ॐ पापहारिणे नमः ।ॐ कृतागमाय नमः ।ॐ समाहिताय नमः ।ॐ वक्रतुण्डाय नमः ।ॐ श्रीप्रदाय नमः ।ॐ सौम्याय नमः । ९०ॐ भक्ताकाङ्क्षितदाय नमः ।ॐ अच्युताय नमः ।ॐ केवलाय नमः ।ॐ सिद्धाय नमः ।ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः ।ॐ ज्ञानिने नमः ।ॐ मायायुक्ताय नमः ।ॐ दन्ताय नमः ।ॐ ब्रह्मिष्ठाय नमः ।ॐ भयावर्चिताय नमः । १००ॐ प्रमत्तदैत्यभयदाय नमः ।ॐ व्यक्तमूर्तये नमः ।ॐ अमूर्तये नमः ।ॐ पार्वतीशङ्करोत्सङ्गखेलनोत्सवलालनाय नमः ।ॐ समस्तजगदाधाराय नमः ।ॐ वरमूषकवाहनाय नमः ।ॐ हृष्टस्तुताय नमः ।ॐ प्रसन्नात्मने नमः ।ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः । १०८ (१०९) ॥ इति श्रीसिद्धिविनायकाष्टोत्तरशतनामावलिः ॥

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ShrI SiddhivinAyaka stotram:श्रीसिद्धिविनायकस्तोत्रम्

shrI siddhivinAyaka stotram:श्रीसिद्धिविनायकस्तोत्रम् जयोऽस्तु ते गणपते देहि मे विपुलां मतिम् ।स्तवनम् ते सदा कर्तुं स्फूर्ति यच्छममानिशम् ॥ १॥ प्रभुं मंगलमूर्तिं त्वां चन्द्रेन्द्रावपि ध्यायतः ।यजतस्त्वां विष्णुशिवौ ध्यायतश्चाव्ययं सदा ॥ २॥ विनायकं च प्राहुस्त्वां गजास्यं शुभदायकम् ।त्वन्नाम्ना विलयं यान्ति दोषाः कलिमलान्तक ॥ ३॥ त्वत्पदाब्जाङ्कितश्चाहं नमामि चरणौ तव ।देवेशस्त्वं चैकदन्तो मद्विज्ञप्तिं श‍ृणु प्रभो ॥ ४॥ कुरु त्वं मयि वात्सल्यं रक्ष मां सकलानिव ।विघ्नेभ्यो रक्ष मां नित्यं कुरु मे चाखिलाः क्रियाः ॥ ५॥ गौरिसुतस्त्वं गणेशः शॄणु विज्ञापनं मम ।त्वत्पादयोरनन्यार्थी याचे सर्वार्थ रक्षणम् ॥ ६॥ त्वमेव माता च पिता देवस्त्वं च ममाव्ययः ।अनाथनाथस्त्वं देहि विभो मे वांछितं फलम् ॥ ७॥ लम्बोदरस्वम् गजास्यो विभुः सिद्धिविनायकः ।हेरम्बः शिवपुत्रस्त्वं विघ्नेशोऽनाथबांधवः ॥ ८॥ नागाननो भक्तपालो वरदस्त्वं दयां कुरु ।सिन्दूरवर्णः परशुहस्तस्त्वं विघ्ननाशकः ॥ ९॥ विश्वास्यं मङ्गलाधीशं विघ्नेशं परशूधरम् ।दुरितारिं दीनबन्धूं सर्वेशं त्वां जना जगुः ॥ १०॥ नमामि विघ्नहर्तारं वन्दे श्रीप्रमथाधिपम् ।नमामि एकदन्तं च दीनबन्धू नमाम्यहम् ॥ ११॥ नमनं शम्भुतनयं नमनं करुणालयम् ।नमस्तेऽस्तु गणेशाय स्वामिने च नमोऽस्तु ते ॥ १२॥ नमोऽस्तु देवराजाय वन्दे गौरीसुतं पुनः ।नमामि चरणौ भक्त्या भालचन्द्रगणेशयोः ॥ १३॥ नैवास्त्याशा च मच्चित्ते त्वद्भक्तेस्तवनस्यच ।भवेत्येव तु मच्चित्ते ह्याशा च तव दर्शने ॥ १४॥ अज्ञानश्चैव मूढोऽहं ध्यायामि चरणौ तव ।दर्शनं देहि मे शीघ्रं जगदीश कृपां कुरु ॥ १५॥ बालकश्चाहमल्पज्ञः सर्वेषामसि चेश्वरः ।पालकः सर्वभक्तानां भवसि त्वं गजानन ॥ १६॥ दरिद्रोऽहं भाग्यहीनः मच्चित्तं तेऽस्तु पादयोः ।शरण्यं मामनन्यं ते कृपालो देहि दर्शनम् ॥ १७॥ इदं गणपतेस्तोत्रं यः पठेत्सुसमाहितः ।गणेशकृपया ज्ञानसिध्धिं स लभते धनम् ॥ १८॥ पठेद्यः सिद्धिदं स्तोत्रं देवं सम्पूज्य भक्तिमान् ।कदापि बाध्यते भूतप्रेतादीनां न पीडया ॥ १९॥ पठित्वा स्तौति यः स्तोत्रमिदं सिद्धिविनायकम् ।षण्मासैः सिद्धिमाप्नोति न भवेदनृतं वचःगणेशचरणौ नत्वा ब्रूते भक्तो दिवाकरः ॥ २०॥ इति श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् ।

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