Chitragupta Puja

Chitragupta Puja 2025 Date And Time: चित्रगुप्त पूजा 2025 में कब है? जानें शुभ मुहूर्त, महत्व और संपूर्ण पूजा विधि

Chitragupta Puja:हिंदू धर्म में, भगवान चित्रगुप्त (Bhagwan Chitragupta) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन्हें 33 कोटि देवी-देवताओं में से एक माना जाता है, जिन्हें ‘देवताओं का लेखपाल’ (Accountant of the Gods) भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान चित्रगुप्त का जन्म ब्रह्म जी के चित्त से हुआ था। इनका मुख्य कार्य मनुष्यों के कर्मों का हिसाब रखना है। Chitragupta Puja मृत्यु के बाद, ये उसी के अनुसार जीवों को दंडित या पुरस्कृत करते हैं। इन्हें मृत्यु के देवता यमराज का सहायक (Assistant of Yamraj) और आकाशीय अभिलेखों के रक्षक के रूप में भी जाना जाता है। चित्रगुप्त पूजा 2025 कब है? (Chitragupta Puja 2025 Date) चित्रगुप्त पूजा विशेष रूप से पंचदिवसीय दीपावली पर्व के आखिरी दिन, यानी भाई दूज (Bhai Dooj) के साथ की जाती है। इसे यम द्वितीया (Yama Dwitiya) के नाम से भी जाना जाता है। हर साल यह पूजा कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर की जाती है। साल 2025 में भगवान चित्रगुप्त की पूजा गुरुवार 23 अक्टूबर 2025 को की जाएगी। चित्रगुप्त पूजा 2025 शुभ मुहूर्त (Chitragupta Puja Shubh Muhurat) पूजा के लिए शुभ समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए। विवरण (Details) समय (Time) स्रोत (Source) कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि का आरंभ 22 अक्टूबर 2025 को रात 8 बजकर 16 मिनट पर कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि का समापन 23 अक्टूबर 2025 को रात 10 बजकर 46 मिनट पर चित्रगुप्त पूजा अपराह्न मुहूर्त (Shubh Muhurat) दोपहर 1 बजकर 13 मिनट से दोपहर 3 बजकर 28 मिनट तक पूजा की कुल अवधि 2 घंटे 15 मिनट चित्रगुप्त पूजा का महत्व (Significance of Chitragupta Puja) यह पर्व विशेष रूप से कायस्थ समुदाय (Kayastha community) के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो भगवान चित्रगुप्त की पूजा इष्ट और कुलदेवता के रूप में करते हैं। Chitragupta Puja इस पूजा को मस्याधार पूजा या दावत पूजन (Dawat Pujan) भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन कलम (Pen) और दवात (Inkpot) की पूजा की जाती है। भगवान चित्रगुप्त कलम और दवात की सहायता से ही समस्त जीवों के कर्मों का विवरण लिखते हैं। इस पूजा से मिलने वाले लाभ: 1. ज्ञान और बुद्धि: भगवान चित्रगुप्त की पूजा करने से ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि होती है। 2. सफलता: साधक को विद्या, बुद्धि, साहस और लेखन के क्षेत्र में सफलता मिलने की मान्यता है। 3. दरिद्रता का निवारण: माना जाता है कि इनकी पूजा से अशिक्षा और दरिद्रता दूर होती है। 4. कर्मों की समीक्षा: इस दिन लोग पूजा पाठ करने के साथ ही आत्मचिंतन और अपने कर्मों की समीक्षा करते हैं, और ईमानदारी की राह पर चलने का प्रण लेते हैं। 5. व्यापार में उन्नति: कारोबारियों के लिए इस दिन का विशेष महत्व होता है। नई पुस्तकों पर ‘श्री’ लिखकर काम की शुरुआत की जाती है और आय-व्यय का विवरण चित्रगुप्त जी के सामने रखा जाता है। भगवान चित्रगुप्त की पूजा विधि (Chitragupta Puja Vidhi) चित्रगुप्त पूजा Chitragupta Puja के दिन कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है: 1. तैयारी: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पूजाघर के पास अच्छी तरह से साफ-सफाई करें। 2. स्थापना: पूजा स्थल में वेदी पर भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। पूजा करते समय आपका मुख पूर्व दिशा (East) की ओर होना चाहिए। 3. अर्घ्य और दीपक: सबसे पहले मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएं। इसके बाद दही, दूध, घी, चीनी और शहद से पंचामृत बनाकर अर्पित करें। 4. सामग्री अर्पण: एक पानी से भरा कलश पास में रखें, जिसमें तुलसी के कुछ पत्ते डालें। भगवान को हल्दी, चंदन, फूल, फल, भोग और मिठाई आदि अर्पित करें। 5. लेखन सामग्री की पूजा: ध्यान रखें कि पूजा में कलम, एक डायरी या खाली कागज और दवात जरूर लेकर बैठें। 6. मंत्र लेखन: पूजा के दौरान, खाली पन्ने पर रोली और घी से स्वास्तिक (Swastik) बनाएं। इसके बाद, नए कलम से डायरी पर “श्री गणेशाय नमः” और “ॐ चित्रगुप्ताय नमः” लिखें। कुछ स्रोतों के अनुसार, आप देवी-देवताओं के नाम भी लिख सकते हैं। 7. प्रार्थना: अपने पिछले सभी कार्यों का विवरण चित्रगुप्त जी के सामने रखें। शिक्षा, बुद्धि और जीवन में उन्नति के लिए भगवान से प्रार्थना करें। 8. समापन: अंत में, चित्रगुप्त कथा का पाठ करें और फिर भगवान चित्रगुप्त की आरती करें। पूजा समाप्ति के बाद सभी लोगों में प्रसाद बांटें। नरक चतुर्दशी 2025: कब है छोटी दिवाली? जानें तारीख, महत्व, यम दीया जलाने के नियम और भूलकर भी न करने वाले 4 काम

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श्रीलक्ष्मीस्तुतिःShri Lakshmistutih

श्रीलक्ष्मीस्तुतिःShri Lakshmistutih जयन्ति जगतां मातुः स्तनकुङ्कुमबिन्दवः ।मुकुन्दाश्लेषसङ्क्रान्तकौस्तुभश्रीविडम्बनः ॥ १॥ पायात्पयोधिदुहितुः कपोलामलचन्द्रमाः ।यत्र सङ्क्रान्तबिम्बेन हरिणा हरिणायितम् ॥ २॥ देवेऽर्पितवरणस्रजि बहुमाये वहति कैटभीरूपम् ।जयति सुरासुरहसिता लज्जाजिह्मेक्षणा लक्ष्मीः ॥ ३॥ तल्पीकृताहिरगणितगरुडो हाराभिहतविधिर्जयति ।फणशतपीतश्वासो रागान्धायाः श्रियः केलिः ॥ ४॥ स्मेराननेन हरिणा सस्पृहमाकारवेदिनाऽऽकलितम् ।जयति पुरुषायितायाः कमलायाः कैटभीध्यानम् ॥ ५॥ कमलासनकमलेक्षणकमलारिकिरीटकमलभृद्वाहैः ।नुतपदकमला कमला करधृतकमला करोतु मे कमलम् ॥ ६॥ किञ्जल्कराजिरिव नीलसरोजलग्नालेखेव काञ्चनमयी निकषोपलस्था ।सौदामिनी जलदमण्डलगामिनीवपायादुरःस्थलगता कमला मुरारेः ॥ ७॥ दन्तैः कोरकिता स्मितैर्विकसिता भ्रूविभ्रमैः पत्रितादोर्भ्यां पल्लविता नखैः कुसुमिता लीलाभिरुद्वेलिता ।उत्तुङ्गस्तनमण्डलेन फलिता भक्ताभिलाषे हिताकाचित्कल्पलता सुरासुरनुता पायात्सुधाब्धेः सुता ॥ ८॥ उत्तुङ्गस्तनमण्डलोपरिलसत्प्रालम्बमुक्तामणेःअन्तर्बिम्बितमिन्द्रनीलनिकरच्छायानुकारिद्युति ।लज्जाव्याजमुपेत्य नम्रवदना स्पष्टं मुरारेर्वपुःपश्यन्ती मुदिता मुदेऽस्तु भवतां लक्ष्मीर्विवाहोत्सवे ॥ ९॥ आख्याते हसितं पितामह इति त्रस्तं कपालीति चव्यावृत्तं गुरुरित्ययं दहन इत्याविष्कृता भीरुता ।पौलोमीपतिरत्यसूयितमथ व्रीडाविनम्रश्रियापायाद्वः पुरुषोत्तमोऽयमिति यो न्यस्तः स पुष्पाञ्जलिः ॥ १०॥ क्रीडाभिन्नहिरण्यशुक्तिकुहरे रक्तात्मनावस्थितान्हारं हारमुदारकुङ्कुमरसानव्याजभव्यान्नखैः ।वीरश्रीकुचकुम्भसीम्नि लिखतो वीरस्य पत्रावलीःतत्कालोचित भावबन्धमधुरं मन्दस्मितं पातु वः ॥ ११॥ पद्मायाः स्तनहेमसद्मनि मणिश्रेणीसमाकर्षकेकिञ्चित्कञ्चुकसन्धिसन्निधिगते शौरेः करे तस्करे ।सद्यो जागृहि जागृहीति वलयध्वानैर्ध्रुवं गर्जताकामेन प्रतिबोधिताः प्रहरिका रोमाङ्कुराः पान्तु वः ॥ १२॥ यादृग्जानासि जाम्बूनदगिरिशिखरे कान्तिरिन्दोः कलानांइत्यौत्सुक्येन पत्यौ स्मितमधुरमुखाम्भोरुहं भाषमाणे ।लीलादोलायमानश्रुतिकमलमिलद्भृङ्गसङ्गीतसाक्षीपायादम्भोधिजायाः कुसुमशरकलानाट्यनान्दीनकारः ॥ १३॥ उत्तिष्ठन्त्या रतान्ते भरमुरगपतौ पाणिनैकेन कृत्वाधृत्वा चान्येन वासो विगलितकबरीभारमंसे वहन्त्याः ।भूयस्तत्कालकान्तद्विगुणितसुरतप्रीतिना शौरिणा वःशय्यामालिङ्ग्य नीतं वपुरलसलसद्बाहु लक्ष्म्याः पुनातु ॥ १४॥ इति श्रीलक्ष्मीस्तुतिः समाप्ता ।

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श्रीकनकधारास्तोत्रम्:Shri Kanakadhara Stotra

श्रीकनकधारास्तोत्रम्:Shri Kanakadhara Stotra वन्दे वन्दारुमन्दारमिन्दिरानन्दकन्दलम् ।अमन्दानन्दसन्दोहबन्धुरं सिन्धुराननम् ॥ अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्तीभृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीलामाङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥ १॥ मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेःप्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले यासा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥ २॥ विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षंआनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ३॥ आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दंआनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रंभूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥ ४॥ बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे याहारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमालाकल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ५॥ कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेःधाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिःभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥ ६॥ प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धंमन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ७॥ दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारांअस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरंनारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ८॥ इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टांपुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ९॥ गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति (गरुडध्वजभामिनीति)शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैतस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १०॥ श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यैरत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायैपुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११॥ नमोऽस्तु नालीकनिभाननायैनमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायैनमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२॥ सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानिसाम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि । (सरोरुहाणि)त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि (दुरितोत्तरणोद्यतानि, दुरितोद्धरणोद्यतानि)मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥ १३॥ यत्कटाक्षसमुपासनाविधिःसेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।सन्तनोति वचनाङ्गमानसैःत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १४॥ सरसिजनिलये सरोजहस्तेधवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेत्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १५॥ दिग् हस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १६॥ कमले कमलाक्षवल्लभे त्वंकरुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।अवलोकय मामकिञ्चनानांप्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ १७॥ स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहंत्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनोभवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ १८॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत श्री कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायैनमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै ।नमोऽस्तु देवादिदयापरायैनमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १९॥ नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायैनमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै ।नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायैनमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ २०॥ नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायैनमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायैनमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ २१॥ देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातःकल्याणगात्रि कमलेक्षणजीवनाथे ।दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं माम्आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः ॥ २२॥ अयं स्तवः स्वामिना शङ्करभगवत्पादेन ब्रह्मव्रतस्थेन कालटिनाम्निस्वग्राम एवाकिञ्चन्यपरिखिन्नाया द्विजगृहिण्या निर्धनत्वमार्जनायनिरमायि । तेन स्तवेन प्रीता लक्ष्मीर्विप्रं विपुलधनदानेनाप्रीणयदितिशङ्करविजयतः समाधिगम्यते, “स मुनिर्मुरजित्कुटुम्बिनींपदचित्रैर्नवनीत कोमलैः ंअधुरैरूपतस्थिवां- स्तवैः”इत्यादिना ॥ एते श्रीमन्मातुरभ्यर्थनया स्तवमेतमतनिषतेतिकालटिग्रामनिकटवर्तिनां विदुषां मतम् । तदारभ्य कर्णाकर्णिकयातथानुश्रुतम् ।

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Govardhan Puja

Govardhan Puja 2025 Date And Time: कब है गोवर्धन और अन्नकूट पूजा? जानिए शुभ मुहूर्त, विधि और पौराणिक कथा

Govardhan Puja 2025 Date And Time: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव का महत्व हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja 2025) का पर्व अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे अन्नकूट पूजा (Annakut Puja 2025) के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर मनाया जाता है। यह मुख्यतः दिवाली के अगले दिन पड़ता है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को घनघोर वर्षा से बचाने के लिए Govardhan Puja गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर धारण किया था। मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल और बरसाना जैसे स्थानों पर इस पर्व की भव्यता विशेष तौर पर देखने को मिलती है। गोवर्धन पूजा 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja Shubh Muhurat 2025) वर्ष 2025 में गोवर्धन पूजा की सही तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: 1. गोवर्धन पूजा की तिथि (Govardhan Puja Date 2025) पंचांग के अनुसार, गोवर्धन पूजा बुधवार, 22 अक्टूबर 2025 को की जाएगी। प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ: 21 अक्टूबर 2025 को शाम 05:54 बजे से। प्रतिपदा तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर 2025 को रात्रि 08:16 बजे समाप्त। नोट: उदयातिथि के अनुसार, गोवर्धन एवं अन्नकूट पूजा 22 अक्टूबर 2025 को होगी। 2. गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja Shubh Muhurat) गोवर्धन पूजा के लिए तीन प्रमुख शुभ मुहूर्त बताए गए हैं: 1. गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। 2. गोवर्धन पूजा सायाह्नकाल/संध्या काल मुहूर्त: दोपहर 3 बजकर 29 मिनट से शाम 5 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। 3. गोवर्धन पूजा गोधूली मुहूर्त: शाम को 05:44 से 06:10 के बीच रहेगा। क्यों कहा जाता है इसे अन्नकूट पूजा? (Why is it called Annakut Puja?) गोवर्धन पूजा के दिन को अन्नकूट पूजा (Annakut Puja) भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन भक्त तरह-तरह के भोजन तैयार करते हैं। अन्नकूट का अर्थ: अन्नकूट का अर्थ ‘अन्न का ढेर’ या ‘कई प्रकार के अन्न का मिश्रण’ होता है। सजावट: भक्त इन तैयार किए गए भोजनों को गोवर्धन पर्वत के आकार में सजाते हैं। भोग: इस अन्नकूट को भोग के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है और इसके बाद प्रसाद के रूप में अन्य लोगों को बांटा जाता है। प्रसाद: कई स्थानों पर इस दिन बाजरे की खिचड़ी या कड़ी बाजरे का भोग लगाकर लोगों में बांटा जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों में विशेष रूप से अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव की पौराणिक कथा (Govardhan Puja Katha) गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण और इंद्रदेव से जुड़ी हुई है: इंद्र का मान-मर्दन: द्वापर युग में, ब्रजवासी इंद्र की पूजा करके उन्हें छप्पन भोग अर्पित करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रथा को बंद करने और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए कहा, क्योंकि पर्वत, खेत और गाय ही उनका जीवन चला रहे थे। इंद्र का क्रोध: जब ब्रजवासियों ने इंद्र उत्सव मनाना छोड़ दिया, तो इंद्रदेव क्रोधित हो गए और ब्रजमंडल में मूसलधार वर्षा करने लगे। गिरिराज का रक्षण: ब्रजवासियों को इस वर्षा से बचाने के लिए, श्रीकृष्ण ने अपने वाम हस्त की कनिष्ठा (छोटी) अंगुली के नाखून पर गोवर्धन पर्वत को 7 दिन तक उठाकर इंद्र का मान-मर्दन किया था। सभी ग्रामीण, गोप और गोपिकाएं पर्वत की छाया में सुखपूर्वक रहे। इंद्र की क्षमा: सातवें दिन, ब्रह्माजी के कहने पर इंद्रदेव ने श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की। उत्सव की शुरुआत: भगवान श्रीकृष्ण ने 7वें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव ‘अन्नकूट’ के नाम से भी मनाया जाने लगा। बाद में, गोवर्धन के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग लगाने का प्रचलन हुआ। गोवर्धन पूजा की सरल विधि (Govardhan Puja Vidhi) गोवर्धन पूजा के दिन साधक को धन, संतान और गौ रस में वृद्धि प्राप्त होती है। पूजा विधि इस प्रकार है: 1. गिरिराज महाराज का निर्माण: सबसे पहले गोबर से गिरिराज महाराज (गोवर्धन पर्वत) की आकृति तैयार की जाती है। 2. पूजन सामग्री: इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल आदि चढ़ाए जाते हैं। 3. नाभि पूजा: गोवर्धन जी की नाभि के स्थान पर मिट्टी का दीपक या कोई अन्य पात्र रखा जाता है। इस पात्र में दूध, दही, गंगाजल, शहद और बताशे डाले जाते हैं। 4. पशुओं की पूजा: इस दिन कृषि के काम में आने वाले पशुओं जैसे गाय और बैल की पूजा का भी विधान है। 5. परिक्रमा और प्रसाद: पूजा समाप्त होने के बाद, गोवर्धन जी की सात बार परिक्रमा की जाती है। नाभि में रखे पात्र की सामग्री को पूजा के बाद प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है।

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Bhai Dooj 2025

Bhai Dooj 2025 Date And Time: किस दिशा में बिठाकर करें भाई का तिलक? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और नियम

भाई दूज का महत्व (Importance of Bhai Dooj) भाई दूज (Bhai Dooj 2025 Kab Hai?) का पर्व भाई-बहन के पवित्र प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है, जिसे यम द्वितीया या भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है। यह त्योहार दीपावली के दो दिन बाद, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। Bhai Dooj 2025 इस शुभ दिन पर, बहनें अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं। वहीं, भाई अपनी बहन की सदैव रक्षा करने का वचन देते हैं और उन्हें उपहार भेंट करते हैं। भाई दूज 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त (Bhai Dooj 2025 Exact Date and Shubh Muhurat) Bhai Dooj: भाई दूज 2025 की सही तारीख जानना हर भाई-बहन के लिए महत्वपूर्ण है। Bhai Dooj ज्योतिषीय दृष्टि से इस वर्ष कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि की शुरुआत 22 अक्टूबर 2025 की रात 08 बजकर 16 मिनट पर होगी। Bhai Dooj 2025 यह तिथि 23 अक्टूबर 2025 की रात 10 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगी। पंचांग और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, भाई दूज का पर्व 23 अक्टूबर 2025 (गुरुवार) को मनाया जाएगा। तिलक करने का शुभ समय (Tilak Shubh Muhurat) तिलक करने का शुभ मुहूर्त (Bhai Dooj 2025 Shubh Muhurat) दोपहर के समय रहेगा। Bhai Dooj 2025 इस समय किया गया तिलक अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। तिलक करने का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 13 मिनट से 03 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। तिलक के दौरान भाई-बहन के बैठने की सही दिशा और नियम (Bhai Dooj 2025 Disha And Niyam) तिलक समारोह के दौरान सही दिशा में बैठना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। भाई का मुख किस दिशा में हो? (Brother’s Direction) तिलक करते समय भाई का मुख उत्तर (North) या उत्तर-पश्चिम (North-West) दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा माना जाता है, जबकि उत्तर-पश्चिम दिशा वायु की दिशा है। इन दिशाओं की ओर मुख करने से भाई के जीवन में स्थिरता और उन्नति आती है। बहन का मुख किस दिशा में हो? (Sister’s Direction) बहन को अपने भाई का तिलक करते समय उत्तर-पूर्व (North-East) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। इस दिशा की ओर मुख करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भाई दूज Bhai Dooj पर तिलक करने के महत्वपूर्ण नियम (Bhai Dooj 2025 Rituals) भाई दूज के दिन तिलक करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:It is mandatory to follow some special rules while doing Tilak on the day of Bhai Dooj: 1. आसन का उपयोग: भाई को हमेशा किसी आसन पर बिठाकर ही तिलक करना चाहिए; उन्हें सीधे जमीन पर नहीं बिठाना चाहिए। 2. पूजा की थाली: पूजा की थाली में रोली या कुमकुम, अक्षत (चावल), मिठाई, सुपारी, सूखा नारियल (नारियल का गोला), और एक दीपक अवश्य रखें। 3. शुभ मुहूर्त का पालन: तिलक हमेशा शुभ मुहूर्त और भद्राकाल से बाहर के समय में ही करें, क्योंकि भद्राकाल में किए गए किसी भी शुभ काम का फल नहीं मिलता है। 4. सिर ढकना: तिलक करते समय बहनें अपना सिर चुनरी से और भाई अपना सिर रुमाल से ढककर रखें। Bhai Dooj बिना सिर ढके तिलक नहीं करना चाहिए। 5. सात्विक भोजन: इस दिन भाई और बहन दोनों को सात्विक भोजन ही करना चाहिए। 6. उपहार और भेंट: तिलक करने के बाद बहन भाई को नारियल का गोला या मिठाई अवश्य खिलाएं। Bhai Dooj इसके साथ ही, भाई अपनी बहन को वस्त्र, मिठाई, ड्राई फ्रूट्स, चॉकलेट या पर्सनलाइज्ड गिफ्ट उपहार के रूप में दें।

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Narak Chaturdashi

Narak Chaturdashi 2025 Date:नरक चतुर्दशी 2025: कब है छोटी दिवाली? जानें तारीख, महत्व, यम दीया जलाने के नियम और भूलकर भी न करने वाले 4 काम

हर साल कार्तिक मास में आने वाला दीपों का त्योहार दिवाली बहुत खास होता है। दिवाली से ठीक एक दिन पहले मनाया जाने वाला पर्व नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi) जिसे छोटी दिवाली (Chhoti Diwali) भी कहा जाता है, शास्त्रों में विशेष महत्व रखता है। Narak Chaturdashi इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा करने का विधान है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह त्योहार कब मनाया जाता है, इसका महत्व क्या है और Narak Chaturdashi इस दिन यमराज की नाराजगी से बचने के लिए कौन से काम नहीं करने चाहिए? आइए, उज्जैन के आचार्यों से प्राप्त जानकारी के आधार पर जानते हैं सबकुछ… 1. कब मनाई जाएगी नरक चतुर्दशी (Narak Chaturdashi 2025 Date) हिंदू धर्म में, नरक चतुर्दशी हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। तिथि और समय 2025: • चतुर्दशी तिथि की शुरुआत: 19 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 51 मिनट पर होगी। • चतुर्दशी तिथि का समापन: 20 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगा। • उत्सव की तारीख: इस साल 19 अक्टूबर को नरक चतुर्दशी या छोटी दिवाली मनाई जाएगी। 2. नरक चतुर्दशी का महत्व और पौराणिक कथा (Religious Significance) सनातन धर्म में इस त्योहार का खास महत्व है। नरक चतुर्दशी मनाए जाने के पीछे दो प्रमुख कारण और धार्मिक मान्यताएं हैं: भगवान कृष्ण ने किया था नरकासुर का संहार धार्मिक मान्यता के अनुसार, छोटी दिवाली के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का संहार किया था। चिरकाल में नरकासुर का आतंक बहुत बढ़ गया था और उसने बलपूर्वक सोलह हजार स्त्रियों को बंदी बना लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर से भीषण युद्ध किया था और कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि तक चले इस युद्ध में उन्हें विजयश्री मिली। उन्होंने नरकासुर का वध कर सोलह हजार स्त्रियों को मुक्त कराया था। इसलिए इस दिन लोग राक्षस पर भगवान कृष्ण की जीत का जश्न मनाते हैं, और इसी कारण इसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। यमराज की पूजा और मोक्ष की प्राप्ति इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विशेष विधान है। Narak Chaturdashi शास्त्र भी इस दिन यम दीप जलाने की आज्ञा देते हैं। यम दीया का महत्व: 1. अकाल मृत्यु का भय खत्म: मान्यता के अनुसार, नरक चतुर्दशी के दिन यम के नाम का दीपक जलाने से व्यक्ति का अकाल मृत्यु का भय खत्म होता है। 2. नरक द्वार बंद: दीपक जलाकर यमराज से यह प्रार्थना की जाती है कि वे नरक के द्वार सदा हमारे लिए बंद रखें, ताकि हमें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। 3. सकारात्मकता का स्वागत: इस दिन बुराई के अंधेरे को दूर करने और जीवन में सकारात्मकता का स्वागत करने के लिए भी दीपक जलाए जाते हैं। 3. नरक चतुर्दशी पर क्या करें और कैसे करें स्नान? यह पर्व भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई की जाती है और उन्हें फूलों या लाइटों से सजाया जाता है। स्नान और पूजा विधि: • साधक प्रातः काल में सूर्योदय से पहले उठकर घर की साफ-सफाई करते हैं। • नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद स्नान-ध्यान करते हैं। • इस दिन गंगाजल युक्त पानी से स्नान करना शुभ माना जाता है। • सुविधा होने पर अपामार्ग युक्त पानी से स्नान करने की सलाह दी जाती है। कहते हैं कि इससे व्यक्ति को जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। • इसके बाद भक्ति भाव से भगवान कृष्ण की पूजा करते हैं, जिससे हर मनोकामना पूरी होती है। 4. भूल से भी न करें ये 4 काम, यमराज होंगे नाराज! चूँकि इस दिन यमलोक के देवता यमराज की पूजा की जाती है, Narak Chaturdashi इसलिए कुछ कार्यों को वर्जित माना गया है। यमराज की नाराजगी से बचने के लिए, नरक चतुर्दशी के दिन भूल से भी ये काम न करें: 1. जीव हत्या: इस दिन किसी भी जीव की हत्या न करें। 2. दक्षिण दिशा की सफाई: यम की दिशा दक्षिण मानी गई है, इसलिए इस दिन घर की दक्षिण दिशा को भूल से भी गंदा न रखें। 3. तेल का दान: शास्त्रों में तेल का दान विशेष महत्व रखता है, लेकिन इस दिन तेल का दान नहीं करना चाहिए। Narak Chaturdashi मान्यता है कि ऐसा करने से देवी लक्ष्मी नाराज हो जाती हैं। 4. तामसिक भोजन: इस दिन तामसिक भोजन नहीं खाना चाहिए। Narak Chaturdashi नरक चतुर्दशी के दिन भगवान कृष्ण की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है और जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।

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Dhanteras 2025 mein Kya Khariden :धरतेरस के दिन नहीं खरीद सकते सोना या चांदी, तो इन 5 उपाय से भी होगा धन लाभ !

Dhanteras 2025 :हिंदू धर्म में धनतेरस के त्योहार को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन सोना या चांदी खरीदने की परंपरा है. मगर कोई यह नहीं खरीद सकता, तो उसकी जगह क्या खरीदना चाहिए, आइए जानते हैं. Dhanteras 2025:हिंदू धर्म में Dhanteras धनतेरस का त्योहार का विशेष महत्व है. यह पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है, जो इस बार 18 अक्टूबर 2025 को है. इस दिन विशेष रूप से सोना या चांदी खरीदने से घर-परिवार में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का आगमन होता है, मगर कोई व्यक्ति इस दिन सोना या चांदी नहीं खरीद पाता तो वे कई अन्य चीजें भी खरीद सकता है. जिसे शास्त्रों में शुभ माना गया है. Dhanteras 2025 mein Kya Khariden- धनतेरस Dhanteras पर पीतल के बर्तन खरीदने की परंपरा पुरानी है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पीतल को भगवान धन्वंतरि की धातु माना गया है. ऐसा करने से घर में स्वास्थ्य, सौभाग्य और धन में वृद्धि होती है. माना जाता है कि पीतल खरीदने से तेरह गुना लाभ प्राप्त होता है और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है. इस शुभ दिन पर नया झाड़ू लाना भी बेहद मंगलकारी माना जाता है. झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे खरीदने से घर की नकारात्मकता दूर होती है. धनतेरस पर लाए गए झाड़ू की पहले पूजा की जाती है और फिर इसका प्रयोग घर में किया जाता है, ताकि मां लक्ष्मी का स्थायी वास बना रहे. धनतेरस Dhanteras पर धनिया खरीदने की परंपरा भी खास महत्व रखती है. धनिया के बीज को मां लक्ष्मी को अर्पित करने के बाद तिजोरी या धन रखने की जगह पर रखा जाता है. ऐसा करने से घर में समृद्धि आती है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है. यह बीज केवल धन का प्रतीक ही नहीं, बल्कि शुभ ऊर्जा का वाहक भी माना जाता है. गोवत्स द्वादशी 2025 (बछ बारस): जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और व्रत के नियम गोमती चक्र को पवित्र और चमत्कारी वस्तु माना गया है. धनतेरस के दिन 11 गोमती चक्र खरीदकर उन्हें लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखना शुभ माना गया है. ऐसा करने से धन की कमी दूर होती है और घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी होती है. यह उपाय विशेष रूप से व्यापारियों के लिए लाभकारी माना गया है. पीली कौड़ी मां लक्ष्मी से जुड़ा माना जाता है. Dhanteras धनतेरस पर इसे हल्दी में रंग कर या पहले से रंगी हुई खरीदकर दीवाली की रात पूजा में शामिल किया जाता है. इसके बाद इसे तिजोरी में रखने से धन का प्रवाह बना रहता है. यह छोटा-सा उपाय परिवार में समृद्धि और खुशहाली लाने के लिए बेहद प्रभावी माना गया है.

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Dhanteras 2025 Date: धनतेरस पर भूलकर भी ना खरीदें ये चीजें, उड़ जाएगी घर की बरकत

Dhanteras 2025 Shopping: धनतेरस हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो दिवाली की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. यह दिन नई शुरुआत और समृद्धि का प्रतीक है. इस शुभ अवसर पर माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है, Dhanteras जिससे घर में धन-धान्य और सौभाग्य का वास बना रहे. मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि पर उनकी पूजा करने से व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है. Dhanteras 2025 Date ऐसे में आइए जानते हैं कि धनतेरस के दिन किन चीजों को नहीं खरदीना चाहिए.  Dhanteras 2025 Date:धनतेरस 2025 की तिथि और समय:Dhanteras 2025 Date:Date and time of Dhanteras 2025 Dhanteras 2025 Date: पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 18 अक्टूबर दोपहर 12 ब जकर 18 मिनट से आरंभ होकर 19 अक्टूबर दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक रहेगी. प्रदोष काल के आधार पर धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर 2025, शनिवार को मनाया जाएगा. पूजा और खरीदारी का शुभ मुहूर्त:Auspicious time for worship and shopping धनतेरस पूजा मुहूर्त- शाम 7:16 से रात 8:20 बजे तकब्रह्म मुहूर्त- सुबह 4:43 से 5:33 बजे तकअभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:43 से दोपहर 12:29 बजे तक नुकीली या धारदार वस्तुएं जैसे चाकू, कैंची और सुई न खरीदें। इनसे घर में कलह और नकारात्मकता बढ़ने की आशंका रहती है. चमड़े से बनी वस्तुएं या काले रंग के वाहन, कपड़े व अन्य वस्तुएं भी इस दिन नहीं खरीदनी चाहिए। Dhanteras ऐसा करने से दरिद्रता और दुर्भाग्य का प्रवेश माना जाता है.प्लास्टिक की वस्तुएं जैसे डिब्बे या सजावटी सामान भी घर में न लाएं। ऐसा करने से बरकत में कमी और धन-संचय में बाधा उत्पन्न हो सकती है. धनतेरस 2025 की तिथि और समय:Dhanteras 2025 date and time पंचांग के अनुसार, इस साल कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 18 अक्टूबर दोपहर 12 ब जकर 18 मिनट से आरंभ होकर 19 अक्टूबर दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक रहेगी. प्रदोष काल के आधार पर धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर 2025, शनिवार को मनाया जाएगा. Govatsa Dwadashi 2025 Date And Time: गोवत्स द्वादशी 2025 (बछ बारस): जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और व्रत के नियम धनतेरस पर क्या खरीदना होगा शुभ:What to buy on Dhanteras? Dhanteras:इस दिन झाड़ू खरीदना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक है. इसके अलावा, सोना-चांदी के आभूषण, चांदी के सिक्के, देवी-देवताओं की मूर्तियां, नए वाहन या गैजेट्स की खरीदारी भी मंगलकारी मानी जाती है. इन वस्तुओं को घर लाने से जीवन में समृद्धि, सौभाग्य और सकारात्मकता का संचार होता है. धनतेरस के दिन की पूजा विधि:Worship method on Dhanteras day Dhanteras 2025 Date:धनतेरस के दिन शाम के वक्त शुभ मुहूर्त में उत्तर की ओर कुबेर और धन्वंतरि की स्थापना करें।साथ ही मां लक्ष्मी, गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद दीप जलाकर पूजा करें।तिलक करने के बाद पुष्प, फल आदि का भोग लगाएं।कुबेर देवता को सफेद मिठाई और धन्वंतरि देव को पीली मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के दौरान ‘ऊँ ह्रीं कुबेराय नमः’ इस मंत्र का जाप करते रहें।भगवान धन्वंतरि को प्रसन्न करने के लिए इस दिन धन्वंतरि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।धनतेरस के दिन से दिवाली मनाई जाती है और देवी लक्ष्मी के स्वागत की तैयारी की जाती है। लक्ष्मी के चरणों की निशानी के रूप में रंगोली से लेकर घर के अंदर तक छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं। शाम को 13 दीये जलाकर लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी पूजा से समृद्धि, सुख और सफलता मिलती है। धनतेरस के दिन का महत्व:Importance of Dhanteras day Dhanteras:मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से घर में धन की कमी नहीं होती है। Dhanteras 2025 Date इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है। इसके ठीक दो दिन बाद दिवाली मनाई जाती है। ‘धन’ का अर्थ है समृद्धि और ‘तेरस’ का अर्थ है तेरहवां दिन।’ दक्षिण भारत में इस दिन गायों को सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। गायों को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। जो प्राणी कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात यमराज के नाम से पूजा करता है और दक्षिण दिशा में दीपमाला के दर्शन करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं होता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक रखते हैं।

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shrIlakShmIsahasranAmAvaliH:श्रीलक्ष्मीसहस्रनामावलिः

shrIlakShmIsahasranAmAvaliH:श्रीलक्ष्मीसहस्रनामावलिः shrIlakShmIsahasranAmAvaliH: ॐ श्रियै नमः । वासुदेवमहिष्यै । पुम्प्रधानेश्वरेश्वर्यै ।अचिन्त्यानन्तविभवायै । भावाभावविभाविन्य । अहम्भावात्मिकायै ।पद्मायै । शान्तानन्तचिदात्मिकायै । ब्रह्मभावं गतायै ।त्यक्तभेदायै । सर्वजगन्मय्यै । शान्तानन्तचिदात्मिकायै ।ब्रह्मभावं गतायै । त्यक्तभेदायै । सर्वजगन्मय्यै ।षाड्गुण्यपूर्णायै । त्रय्यन्तरूपायै । आत्मानपगामिन्यै । एकयोग्यायै ।अशून्यभावाकृत्यै । तेजःप्रभाविन्यै । भाव्यभावकभावायै ।आत्मभाव्यायै । कामदुहे नमः ॥ २० ॐ आत्मभुवे नमः । भावाभावमय्यै । दिव्यायै । भेद्यभेदकभावन्यै ।जगत्कुटुम्बिन्यै । अखिलाधारायै । कामविजृम्भिण्यै ।पञ्चकृत्यकर्यै । पञ्चशक्तिमय्यै । आत्मवल्लभायै ।भावाभावानुगायै । सर्वसम्मतायै । आत्मोपगूहिन्यै । अपृथक्चारिण्यै ।सौम्यायै । सौम्यरूपव्यवस्थितायै । आद्यन्तरहितायै । देव्यै ।भवभाव्यस्वरूपिण्यै । महाविभूत्यै नमः ॥ ४० ॐ समतां गतायै नमः । ज्योतिर्गणेश्वर्यै । सर्वकार्यकर्यै ।धर्मस्वभावात्मने । अग्रतः स्थितायै । आज्ञासमविभक्ताङ्ग्यै ।ज्ञानानन्दक्रियामय्यै । स्वातन्त्र्यरूपायै । देवोरःस्थितायै ।तद्धर्मधर्मिण्यै । सर्वभूतेश्वर्यै । सर्वभूतमात्रे ।आत्ममोहिन्यै । सर्वाङ्गसुन्दर्यै । सर्वव्यापिन्यै ।प्राप्तयोगिन्यै । विमुक्तिदायिन्य । भक्तिगम्यायै । संसारतारिण्यै ।धर्मार्थसाधिन्यै नमः ॥ ६० ॐ व्योमनिलयायै नमः । व्योमविग्रहायै । पञ्चव्योमपद्यै ।रक्षव्यावृत्यै । प्राप्यपूरिण्यै । आनन्दरूपायै । सर्वाप्तिशालिन्यै ।शक्तिनायिकायै । हिरण्यवर्णायै । हैरण्यप्राकारायै ।हैममालिन्यै । प्रत्नरत्नायै । भद्रपीठायै । वेशिन्यै ।रजतस्रजायै । स्वाज्ञाकार्यमरायै । नित्यायै । सुरभ्यै ।व्योमचारिण्यै । योगक्षेमवहायै नमः ॥ ८० ॐ सर्वसुलभायै नमः । इच्छाक्रियात्मिकायै । करुणाग्रानतमुख्यै ।कमलक्ष्यै । शशिप्रभायै । कल्याणदायिन्यै । कल्यायै ।कलिकल्मषनाशिन्यै । प्रज्ञापरिमितायै । आत्मानुरूपायै ।सत्योपयाचितायै । मनोज्ञेयायै । ज्ञानगम्यायै ।नित्यमुक्तात्मसेविन्यै । कर्तृशक्त्यै । सुगहनायै ।भोक्तृशक्त्यै । गुणप्रियायै । ज्ञानशक्त्यै ।अनौपम्यायै नमः ॥ १०० ॐ निर्विकल्पायै नमः । निरामयायै । अकलङ्कायै । अमृताधारायै ।महाशक्त्यै । विकासिन्यै । महामायायै । महानन्दायै । निःसङ्कल्पायै ।निरामयायै । एकस्वरूपायै । त्रिविधायै । सङ्ख्यातीतायै ।निरञ्जनायै । आत्मसत्तायै । नित्यशुचये । पराशक्त्यै ।सुखोचितायै । नित्यशान्तायै । निस्तरङ्गायै नमः ॥ १२० ॐ निर्भिन्नायै नमः । सर्वभेदिन्यै । असङ्कीर्णायै । अविथेयात्मने ।निषेव्यायै । सर्वपालिन्यै । निष्कामनायै । सर्वरसायै । अभेद्यायै ।सर्वार्थसाधिन्यै । अनिर्देश्यायै । अपरिमितायै । निर्विकारायै ।त्रिलक्षणायै । भयङ्कर्यै । सिद्धिरूपायै । अव्यक्तायै ।सदसदाकृत्यै । अप्रतर्क्यायै । अप्रतिहतायै नमः ॥ १४० ॐ नियन्त्र्यै नमः । यन्त्रवाहिन्यै । हार्दमूर्त्यै । महामूर्त्यै ।अव्यक्तायै । विश्वगोपिन्यै । वर्धमानायै । अनवद्याङ्ग्यै ।निरवद्यायै । त्रिवर्गदायै । अप्रमेयायै । अक्रियायै । सूक्ष्मायै ।परिनिर्वाणदायिन्यै । अविगीतायै । तन्त्रसिद्धायै । योगसिद्धायै ।अमरेश्वर्यै । विश्वसूत्यै । तर्पयन्त्यै नमः ॥ १६० ॐ नित्यतृप्तायै नमः । महौषध्यै । शब्दाह्वयायै । शब्दसहायै ।कृतज्ञायै । कृतलक्षणायै । त्रिवर्तिन्यै । त्रिलोकस्थायै ।भूर्भुवःस्वरयोनिजायै । अग्राह्यायै । अग्राहिकायै । अनन्ताह्वयायै ।सर्वातिशायिन्यै । व्योमपद्मायै । कृतधुरायै । पूर्णकामायै ।महेश्वर्यै । सुवाच्यायै । वाचिकायै । सत्यकथनायै नमः ॥ १८० ॐ सर्वपालिन्यै नमः । लक्ष्यमाणायै । लक्ष्यन्त्यै । जगज्ज्येष्ठायै ।शुभावहायै । जगत्प्रतिष्ठायै । भुवनभर्त्र्यै ।गूढप्रभावत्यै । क्रियायोगात्मिकायै । मूर्त्यै । हृदब्जस्थायै ।महाक्रमायै । परमदिवे । प्रथमजायै । परमाप्तायै । जगन्निधये ।आत्मानपायिन्यै । तुल्यस्वरूपायै । समलक्षणायै ।तुल्यवृत्तायै नमः ॥ २०० ॐ समवयसे नमः । मोदमानायै । खगध्वजायै । प्रियचेष्टायै ।तुल्यशीलायै । वरदायै । कामरूपिण्यै । समग्रलक्षणायै ।अनन्तायै । तुल्यभूर्त्यै । सनातन्यै । महर्द्ध्यै ।सत्यसङ्कल्पायै । बह्वृचायै । परमेश्वर्यै । जगन्मात्रे ।सूत्रवत्यै । भूतधात्र्यै । यशस्विन्यै । महाभिलाषायै नमः ॥ २२० ॐ सावित्र्यै नमः । प्रधानायै । सर्वभासिन्यै । नानावपुषे ।बहुभिदायै । सर्वज्ञायै । पुण्यकीर्तनायै । भूताश्रयायै ।हृषीकेश्वर्यै । अशोकायै । वाजिवाहिकायै । ब्रह्मात्मिकायै ।पुण्यजन्यै । सत्यकामायै । समाधिभुवे । हिरण्यगर्भायै । गम्भीरायै ।गोधूल्यै । कमलासनायै । जितक्रोधायै नमः ॥ २४० ॐ कुमुदिन्यै नमः । वैजयन्त्यै । मनोजवायै । धनलक्ष्म्यै ।स्वस्तिकर्यै । राज्यलक्ष्म्यै । महासत्यै । जयलक्ष्म्यै । महागोष्ठ्यै ।मघोन्यै । माधवप्रियायै । पद्मगर्भायै । वेदवत्यै । विविक्तायै ।परमेष्ठिन्यै । सुवर्णबिन्दवे । महत्यै । महायोगिप्रियायै ।अनघायै । पद्मेस्थितायै नमः ॥ २६० ॐ वेदमय्यै नमः । कुमुदायै । जयवाहिन्यै । संहत्यै । निर्मितायै ।ज्योतिषे । नियत्यै । विविधोत्सवायै । रुद्रवन्द्यायै । सिन्धुमत्यै ।वेदमात्रे । मधुव्रतायै । विश्वम्भरायै । हैमवत्यै । समुद्रायै ।इच्छाविहारिण्यै । अनुकूलायै । यज्ञवत्यै । शतकोट्यै ।सुपेशलायै नमः ॥ २८० ॐ धर्मोदयायै नमः । धर्मसेव्यायै । सुकुमार्यै । सभावत्यै ।भीमायै । ब्रह्मस्तुतायै । मध्यप्रभायै । देवर्षिवन्दितायै ।देवभोग्यायै । महाभागायै । प्रतिज्ञायै । पूर्णशेवध्यै ।सुवर्णरुचिरप्रख्यायै । भोगिन्यै । भोगदायिन्यै । वसुप्रदायै ।उत्तमवध्वे । गायत्र्यै । कमलोद्भवायै । विद्वत्प्रियायै नमः ॥ ३०० ॐ पद्मचिह्नायै नमः । वरिष्ठायै । कमलेक्षणायै । पद्मप्रियायै ।सुप्रसन्नायै । प्रमोदायै । प्रियपार्श्वगायै । विश्वभूषायै ।कान्तिमय्यै । कृष्णायै । वीणारवोत्सुकायै । रोचिष्कर्यै ।स्वप्रकाशायै । शोभमानविहङ्गमायै । देवाङ्कस्थायै । परिणत्यै ।कामवत्सायै । महामत्यै । इल्वलायै । उत्पलनाभायै नमः ॥ ३२० ॐ आधिशमन्यै नमः । वरवर्णिन्यै । स्वनिष्ठायै । पद्मनिलयायै ।सद्गत्यै । पद्मगन्धिन्यै । पद्मवर्णायै । कामयोन्यै । चण्डिकायै ।चारुकोपनायै । रतिस्नुषायै । पद्मधरायै । पूज्यायै ।त्रैलोक्यमोहिन्यै । नित्यकन्यायै । बिन्दुमालिन्यै । अक्षयायै ।सर्वमातृकायै । गन्धात्मिकायै । सुरसिकायै नमः ॥ ३४० ॐ दीप्तमूर्त्यै नमः । सुमध्यमायै । पृथुश्रोण्यै । सौम्यमुख्यै ।सुभगायै । विष्टरश्रुत्यै । स्मिताननायै । चारुदत्यै ।निम्ननाभ्यै । महास्तन्यै । स्निग्धवेण्यै । भगवत्यै । सुकान्तायै ।वामलोचनायै । पल्लवाङ्घ्र्यै । पद्ममनसे । पद्मबोधायै ।महाप्सरसे । विद्वत्प्रियायै । चारुहासायै नमः ॥ ३६० ॐ शुभदृष्ट्यै नमः । ककुद्मिन्यै । कम्बुग्रीवायै । सुजघनायै ।रक्तपाण्यै । मनोरमायै । पद्मिन्यै । मन्दगमनायै । चतुर्दंष्ट्रायै ।चतुर्भुजायै । शुभरेखायै । विलासभ्रुवे । शुकवाण्यै ।कलावत्यै । ऋजुनासायै । कलरवायै । वरारोहायै । तलोदर्यै ।सन्ध्यायै । बिम्बाधरायै नमः ॥ ३८० ॐ पुर्वभाषिण्यै नमः । स्त्रीसमाह्वयायै । इक्षुचापायै । सुमशरायै ।दिव्यभूषायै । मनोहरायै । वासव्यै । पण्डरच्छत्रायै ।करभोरवे । तिलोत्तमायै । सीमन्तिन्यै । प्राणशक्त्यै । विभीषिण्यै ।असुधारिण्यै । भद्रायै । जयावहायै । चन्द्रवदनायै । कुटिलालकायै ।चित्राम्बरायै । चित्रगन्धायै नमः ॥ ४०० ॐ रत्नमौलिसमुज्ज्वलायै नमः । दिव्यायुधायै । दिव्यमाल्यायै ।विशाखायै । चित्रवाहनायै । अम्बिकायै । सिन्धुतनयायै । सुश्रेण्यै ।सुमहासनायै । सामप्रियायै । नम्रिताङ्ग्यै । सर्वसेव्यायै ।वराङ्गनायै । गन्धद्वारायै । दुराधर्षायै । नित्यपुष्टायै ।करीषिण्यै । देवजुष्टायै । आदित्यवर्णायै ।दिव्यगन्धायै नमः ॥ ४२० ॐ सुहृत्तमायै । अनन्तरूपायै । अनन्तस्थायै ।सर्वदानन्तसङ्गमायै । यज्ञाशिन्यै । महावृष्ट्यै । सर्वपूज्यायै ।वषट्क्रियायै । योगप्रियायै । वियन्नाभ्यै । अनन्तश्रियै ।अतीन्द्रियायै । योगिसेव्यायै । सत्यरतायै । योगमायायै । पुरातन्यै ।सर्वेश्वर्यै । सुतरण्यै । शरण्यायै । धर्मदेवतायै नमः ॥ ४४० ॐ सुतरायै नमः । संवृतज्योतिषे । योगिन्यै । योगसिद्धिदायै ।सृष्टिशक्त्यै । द्योतमानायै । भूतायै । मङ्गलदेवतायै ।संहारशक्त्यै । प्रबलायै । निरुपाधये । परावरायै । उत्तारिण्यै ।तारयन्त्यै । शाश्वत्यै । समितिञ्जयायै । महाश्रियै । अजहत्कीर्त्यै ।योगश्रियै । सिद्धिसाधिन्यै नमः ॥ ४६० ॐ पुण्यश्रियै नमः । पुण्यनिलयायै । ब्रह्मश्रियै ।ब्राह्मणप्रियायै । राजश्रियै । राजकलितायै । फलश्रियै ।स्वर्गदायिन्यै । देवश्रियै । अद्भुतकथायै । वेदश्रियै ।श्रुतिमार्गिण्यै । तमोऽपहायै । अव्ययनिधये । लक्षणायै ।हृदयङ्गमायै । मृतसञ्जीविन्यै । शुभ्रायै । चन्द्रिकायै ।सर्वतोमुख्यै नमः ॥ ४८० ॐ सर्वोत्तमायै नमः । मित्रविन्दायै । मैथिल्यै । प्रियदर्शनायै ।सत्यभामायै । वेदवेद्यायै । सीतायै । प्रणतपोषिण्यै ।मूलप्रकृत्यै । ईशानायै । शिवदायै । दीप्रदीपिन्यै । अभिप्रियायै ।स्वैरवृत्त्यै । रुक्मिण्यै । सर्वसाक्षिण्यै । गान्धारिण्यै ।परगत्यै । तत्त्वगर्भाय । भवाभवायै नमः

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Govatsa Dwadashi

Govatsa Dwadashi 2025 Date And Time: गोवत्स द्वादशी 2025 (बछ बारस): जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और व्रत के नियम

Govatsa Dwadashi 2025 Mein Kab Hai: क्या आप जानते हैं कि भारतीय संस्कृति में गौमाता को सर्वोच्च तीर्थस्थान और देवताओं का निवास क्यों माना जाता है? गोवत्स द्वादशी एक ऐसा ही पावन पर्व है जो गाय और उनके बछड़ों के प्रति हमारी कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है, जिसे ‘नंदिनी व्रत’ या ‘बछ बारस’ के नाम से भी जाना जाता है गोवत्स द्वादशी और वसु बारस का अर्थ और महत्व:Meaning and significance of Govatsa Dwadashi and Vasu Baras Govatsa Dwadashi:गोवत्स द्वादशी हिंदू कैलेंडर के अनुसार अश्विन माह (अक्टूबर और नवंबर के बीच) के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि (12वें दिन) को मनाई जाती है। कई क्षेत्रों में, यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। नाम: इसे नंदिनी व्रत भी कहा जाता है। महाराष्ट्र में इसे ‘वसु बारस’ कहते हैं, जो दीवाली उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। ‘वसु’ का अर्थ गाय और ‘बारस’ का अर्थ बारहवाँ दिन होता है। Govatsa Dwadashi गुजरात में इसे ‘वाघ बारस’ के नाम से जाना जाता है। Govatsa Dwadashi उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में इसे ‘वाघ’ भी कहते हैं, जिसका अर्थ है वित्तीय ऋण चुकाना, इसलिए इस दिन व्यापारी अपने खाते की किताबें साफ करते हैं। महत्व: यह पर्व गौमाता को समर्पित है, जिन्हें हिंदू धर्म में पवित्र माता माना जाता है क्योंकि वे मानव जाति को पोषण प्रदान करती हैं।  संतान सुख: माताएँ इस दिन अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और कल्याण के लिए उपवास रखती हैं।   संतान प्राप्ति: यह माना जाता है कि यदि कोई निसंतान दंपत्ति श्रद्धापूर्वक गोवत्स द्वादशी का व्रत और पूजा करता है, तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।   पापों से मुक्ति: इस दिन गाय की सेवा और पूजा करने से व्यक्ति को जाने-अनजाने में हुए गौ-अनादर या पापों से मुक्ति मिलती है। गोवत्स द्वादशी 2025: शुभ तिथि और मुहूर्त:Govatsa Dwadashi 2025: Auspicious date and time गोवत्स द्वादशी का पर्व धनतेरस से ठीक एक दिन पहले आता है। विवरण तिथि और समय गोवत्स द्वादशी 2025 की तिथि 17 अक्टूबर 2025, शुक्रवार द्वादशी तिथि प्रारम्भ 17 अक्टूबर, 2025 को 11:12 ए एम बजे से द्वादशी तिथि समाप्त 18 अक्टूबर, 2025 को 12:18 पी एम बजे तक प्रदोषकाल गोवत्स द्वादशी मुहूर्त (श्री मंदिर) 05:29 पी एम से 07:59 पी एम तक (अवधि: 02 घण्टे 30 मिनट्स) प्रदोषकाल गोवत्स द्वादशी मुहूर्त (गणेशस्पीक्स) 06:05 PM to 08:30 PM (Duration: 02 Hours 25 Mins) गोवत्स द्वादशी पूजा विधि और व्रत के नियम:Govatsa Dwadashi puja method and fasting rules इस दिन गाय और बछड़े की पूजा के लिए शुद्धता और श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण है। पूजा की विधि (Puja Vidhi) 1. व्रत का संकल्प: व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र पहनें और संतान की दीर्घायु या अन्य मनोकामनाओं के लिए व्रत का संकल्प लें। 2. गौ-स्नान और सज्जा: गाय और बछड़े को साफ पानी से स्नान कराएं और उन्हें नए वस्त्र या कपड़े से सजाएं। 3. तिलक: उनके माथे पर कुमकुम, हल्दी, अक्षत (चावल) और बाजरे या मूंग से तिलक लगाएं। 4. भोग: उन्हें श्रद्धा से हरा चारा, अंकुरित मूंग-मौठ, भीगे चने, गुड़ और मीठी रोटी खिलाएं। (यह भोग नंदिनी की पृथ्वी पर उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है।) 5. आरती और प्रार्थना: दीपक जलाकर गाय की आरती उतारें। उनके चरण स्पर्श करें, सहलाएं और जाने-अनजाने में हुए पापों के लिए क्षमा याचना करते हुए परिक्रमा करें। 6. प्रतिकात्मक पूजा: यदि आपके पास गाय और बछड़े उपलब्ध न हों, तो शुद्ध गीली मिट्टी से उनकी प्रतीकात्मक प्रतिमा बनाकर भी पूजा की जा सकती है। 7. श्रीकृष्ण की पूजा: इस दिन भगवान श्रीकृष्ण (जिन्हें गायों के प्रति अपने गहरे प्रेम के लिए जाना जाता है) की भी पूजा की जाती है। गोवत्स द्वादशी व्रत के दौरान क्या न करें (वर्जित कार्य):What not to do during Govatsa Dwadashi fast (forbidden actions) गोवत्स द्वादशी Govatsa Dwadashi के दिन व्रत के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। वर्जित वस्तु/कार्य कारण और स्पष्टीकरण गाय के दूध से बने उत्पाद इस दिन गाय का दूध, दही, घी या पनीर जैसी वस्तुएं नहीं खानी चाहिए। चाकू से कटी वस्तुएँ व्रत रखने वाली महिलाएं चाकू से कटी हुई फल, कंद-मूल या सब्जियां नहीं खाती हैं। केवल बिना कटे फल और कंद-मूल का सेवन करें। गेहूं से बना भोजन इस दिन गेहूं से बने खाद्य पदार्थों को ग्रहण करना भी वर्जित माना जाता है। बाजरे से बना खाना ग्रहण किया जा सकता है. गौमाता को कष्ट किसी भी गाय या बछड़े को मारना, भगाना या कष्ट देना अत्यंत पाप माना गया है। शारीरिक श्रम व्रत करने वाले को अत्यधिक शारीरिक श्रम से बचना चाहिए और रात भर जागरूक रहना चाहिए। गोवत्स द्वादशी की पौराणिक कथा:Mythology of Govatsa Dwadashi गोवत्स द्वादशी के महत्व का उल्लेख ‘भविष्य पुराण’ में भी मिलता है, जिसमें दिव्य गाय नंदिनी और उनके बछड़ों की कहानी बताई गई है। एक समय सुवर्णपुरा नामक राज्य था, जिसके राजा देवदानी की दो रानियां (सीता और गीता) थीं। रानी सीता को भैंस प्रिय थी, जबकि रानी गीता गाय और उसके बछड़े को प्रेम करती थी। एक दिन ईर्ष्यावश भैंस के कहने पर रानी सीता ने क्रोध में आकर गाय के बछड़े को मार डाला और उसे गेहूं के ढेर में दबा दिया। जब राजा भोजन करने बैठे, तो उन्हें चारों ओर रक्त और मांस के टुकड़े दिखाई देने लगे; यहाँ तक कि उनके थाल का भोजन भी मलिन हो गया और पूरे राज्य में रक्त की वर्षा होने लगी। चिंतित राजा ने एक आकाशवाणी सुनी, जिसमें उन्हें रानी सीता के पाप के बारे में पता चला। आकाशवाणी ने राजा से कहा कि इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए, उन्हें अगले दिन गोवत्स द्वादशी का व्रत करना होगा। Govatsa Dwadashi आकाशवाणी ने यह भी बताया कि यदि राजा चाकू से कटे फल और दूध का सेवन नहीं करेंगे, तो उन्हें पापों से मुक्ति मिल जाएगी और बछड़ा जीवित हो जाएगा। राजा ने वैसा ही किया। परिणामस्वरूप, बछड़ा जीवित हो उठा। तब राजा ने तुरंत पूरे राज्य में गोवत्स द्वादशी का व्रत और पूजन करने का आदेश दिया, और तभी से यह परंपरा

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Sapne Mein Mobile Pani Me Girna:सपने में पानी में गिरता हुआ फोन देखना

Sapne Mein mobile Pani Me Girna: स्वप्न के अर्थ और व्याख्या के अनुसार, पानी में गिरते हुए फ़ोन का सपना देखना एक नकारात्मक संकेत है। इस सपने का अर्थ है कि आप ठीक से नहीं सोच रहे हैं और किसी ऐसी चीज़ के पीछे भागकर आर्थिक नुकसान पहुँचा रहे हैं जिसका कोई वास्तविक मूल्य नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि लापरवाही या दुर्घटना के कारण आपकी कोई मूल्यवान चीज़ क्षतिग्रस्त हो सकती है। पानी में गिरते हुए फ़ोन के सपने का अर्थ यह भी है कि किसी और की गतिविधि के कारण आपको अप्रत्याशित समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। सपने में फोन Mobile का पानी में गिरना और स्वयं का उस सपने में मौजूद होना जीवन में अचानक आने वाली समस्याओं का संकेत है, विशेष रूप से महत्वपूर्ण दस्तावेजों या इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के खो जाने के कारण। यदि आप सपने में देखते हैं कि आपका फ़ोन पानी में गिर गया है और आप उसे किसी अनजान जगह पर ढूँढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपको नई जगह पर परेशानी का सामना करना पड़ेगा। इसका यह भी मतलब है कि आपको किसी चीज़ के खो जाने का एहसास बहुत देर से होगा। Sapne Mein Mobile Pani Me Girna:सपने में पानी में गिरता हुआ फोन देखना सपने में फोन Mobile का पानी में गिरना और आप किसी पर आरोप लगा रहे हैं, इसका मतलब है पूर्वाग्रह या लोगों पर गलत आरोप लगाना। सपने में फ़ोन Mobile पानी में गिरता हुआ देखना और आप डरे हुए या रोते हुए देखना, इसका मतलब है कि आप वास्तविकता से वाकिफ़ नहीं हैं और आपकी हरकतें दिखावटी थीं। आपको निकट भविष्य में इस व्यवहार की कीमत चुकानी पड़ेगी। कृपया ध्यान दें कि आजकल फ़ोन पानी में गिरना एक आम सपना है और इसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं है क्योंकि यह डर और दिन के समय की गतिविधियों का परिणाम है। किसी सपने का अर्थ होने के लिए, उसे बिना किसी दिन के प्रभाव के स्वाभाविक रूप से घटित होना चाहिए। यहां पानी में फोन गिरने के सपने की कुछ और सामान्य व्याख्याएं दी गई हैं:Here are some of the more common interpretations of a dream about a phone falling into water: 1. संचार का नुकसान आधुनिक जीवन में फ़ोन संचार और संपर्क का प्रतीक हैं। सपने में फ़ोन पानी में गिरता हुआ देखना किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से संपर्क टूटने या संचार में रुकावट का संकेत हो सकता है। आप लोगों से कटा हुआ महसूस कर सकते हैं या अपनी बात कहने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। 2. भावनात्मक अतिभार सपनों में पानी अक्सर भावनाओं से जुड़ा होता है। अगर कोई फ़ोन, जो आपके संबंधों का प्रतीक है, पानी में गिर जाए, तो यह संकेत हो सकता है कि भावनाएँ (जैसे तनाव, चिंता या उदासी) आपकी स्पष्ट रूप से संवाद करने की क्षमता पर हावी हो रही हैं। यह ऐसी स्थिति का प्रतिनिधित्व कर सकता है जहाँ भावनाएँ आपकी तर्कसंगत सोच को “दबा” रही हैं। 3. नियंत्रण खोने का डर आपके हाथ से फ़ोन Mobile का पानी में गिरना, ख़ासकर आपके सामाजिक या निजी जीवन के पहलुओं पर नियंत्रण खोने के डर का संकेत हो सकता है। यह काम, रिश्तों, या किसी भी ऐसी स्थिति को लेकर चिंता से जुड़ा हो सकता है जहाँ आप खुद को शक्तिहीन महसूस करते हैं। 4. तकनीकी अधिभार या निर्भरता कुछ मामलों में, यह सपना तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता की चिंता को दर्शा सकता है। पानी में अपना Mobile फ़ोन खोना, इस सहारे को खोने की आपकी चिंता या डिजिटल दुनिया से लगातार जुड़े रहने की आपकी चिंता का प्रतीक हो सकता है। 5. अनसुलझे मुद्दे या पछतावा सपनों में पानी कभी-कभी अनसुलझे मुद्दों या भावनाओं का प्रतीक हो सकता है। पानी में गिरता फ़ोन इन मुद्दों से प्रभावी ढंग से निपटने के आपके संघर्ष या लंबे समय तक पछतावे के कारण अवसरों या रिश्तों को खोने के डर का प्रतीक हो सकता है। 6. परिवर्तन या पुनर्जन्म पानी शुद्धि और नवीनीकरण का भी प्रतीक है। फ़ोन Mobile का पानी में गिरना इस बात का संकेत हो सकता है कि आप एक परिवर्तनकारी दौर से गुज़र रहे हैं, जहाँ आप पुराने संचार पैटर्न या रिश्तों को छोड़कर नई प्रगति और भावनात्मक स्पष्टता की ओर बढ़ रहे हैं।

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Rama Ekadashi 2025

Rama Ekadashi 2025: बंद किस्मत के दरवाजे खोल देगा ये मंत्र, रमा एकादशी पर जरूर करें जाप

Rama Ekadashi 2025: हिंदू धर्म में एकादशी को बहुत शुभ और खास माना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से दरिद्रता और आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं।  Rama Ekadashi 2025: इस विशेष अवसर पर कुछ विशेष मंत्रों का जप करने से शुभ फल कई गुना बढ़ जाते हैं और Rama Ekadashi 2025 मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। Rama Ekadashi 2025 तो आइए जानते हैं कि रमा एकादशी के दिन कौन से मंत्रों का जाप करना चाहिए। Rama Ekadashi 2025:एकादशी मंत्र ऊँ श्री त्रिपुराय विद्महे तुलसी पत्राय धीमहि तन्नो: तुलसी प्रचोदयात।ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ।। तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी।धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया ।। लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्।तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया ।। वृंदा,वृन्दावनी,विश्वपुजिता,विश्वपावनी |पुष्पसारा,नंदिनी च तुलसी,कृष्णजीवनी || एत नाम अष्टकं चैव स्त्रोत्र नामार्थ संयुतम |य:पठेत तां सम्पूज्य सोभवमेघ फलं लभेत || महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी ।आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते । देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः !नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।। दन्ताभये चक्र दरो दधानं, कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।। शांताकारम भुजङ्गशयनम पद्मनाभं सुरेशम।विश्वाधारं गगनसद्र्श्यं मेघवर्णम शुभांगम। लक्ष्मी कान्तं कमल नयनम योगिभिर्ध्यान नग्म्य्म।वन्दे विष्णुम भवभयहरं सर्व लोकेकनाथम। ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि। मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुणध्वजः।मङ्गलम् पुण्डरी काक्षः, मङ्गलाय तनो हरिः॥ ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा ।बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात् ।करोमि यद्यत्सकलं परस्मै ।नारायणयेति समर्पयामि ॥ भगवान विष्ण के मंत्र अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव।अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।। कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् || ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् || श्री विष्णु स्तोत्र किं नु नाम सहस्त्राणि जपते च पुन: पुन: ।यानि नामानि दिव्यानि तानि चाचक्ष्व केशव: ।। मत्स्यं कूर्मं वराहं च वामनं च जनार्दनम् ।गोविन्दं पुण्डरीकाक्षं माधवं मधुसूदनम् ।। पदनाभं सहस्त्राक्षं वनमालिं हलायुधम् ।गोवर्धनं ऋषीकेशं वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम् ।। विश्वरूपं वासुदेवं रामं नारायणं हरिम् ।दामोदरं श्रीधरं च वेदांग गरुड़ध्वजम् ।। अनन्तं कृष्णगोपालं जपतो नास्ति पातकम् ।गवां कोटिप्रदानस्य अश्वमेधशतस्य च ।। कन्यादानसहस्त्राणां फलं प्राप्नोति मानव:अमायां वा पौर्णमास्यामेकाद्श्यां तथैव च ।। संध्याकाले स्मरेन्नित्यं प्रात:काले तथैव च ।मध्याहने च जपन्नित्यं सर्वपापै: प्रमुच्यते ।।

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