क्यों मनाया जाता है नाग पंचमी का त्योहार? जानिए पौराणिक कथा

नाग पंचमी पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार जनमेजय अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित के पुत्र थे। जब जनमेजय ने पिता की मृत्यु का कारण सर्पदंश जाना तो उसने बदला लेने के लिए सर्पसत्र नामक यज्ञ का आयोजन किया। नागों की रक्षा के लिए यज्ञ को ऋषि आस्तिक मुनि ने श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन रोक दिया और नागों की रक्षा की। इस कारण तक्षक नाग के बचने से नागों का वंश बच गया। आग के ताप से नाग को बचाने के लिए ऋषि ने उनपर कच्चा दूध डाल दिया था। तभी से नागपंचमी मनाई जाने लगी। वहीं नाग देवता को दूध चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। नाग पंचमी के दिन इन देवों का करें स्मरण नाग पंचमी के दिन जिन नाग देवों का स्मरण कर पूजा की जाती है। उन नामों में अनंत, वासुकी, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट, शंख, कालिया और पिंगल प्रमुख हैं। इस दिन घर के दरवाजे पर सांप की 8 आकृतियां बनाने की परंपरा है। हल्दी, रोली, अक्षत और पुष्प चढ़ाकर सर्प देवता की पूजा करें। कच्छे दूध में घी और शक्कर मिलाकर नाग देव का स्मरण कर उन्हें अर्पित करें।

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God story in hindi-भगवान विष्णु की पत्नियां

विष्णु भगवान की तीन पत्नियां थीं। लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा। तीनों बड़ी गुणवती और सौम्य हृदयया थीं, पर तीनों की अलग-अलग प्रकृति थी। तीनों भगवान विष्णु के प्रति मन में अनन्य प्रेम रखती थीं। स्वयं विष्णु भगवान भी तीनों को अनन्य प्रेम करते थे।  भगवान विष्णु ने अपनी तीनों पत्नियों को समान अधिकार प्रदान कर रखा था। तीनों बड़ी स्वतंत्रता के साथ अपने-अपने अधिकारों का उपभोग कर रही थीं। पर प्रकृति की भिन्नता के कारण सरस्वती के मन में संदेह पैदा हो उठा कि विष्णु मेरी अपेक्षा गंगा को अधिक प्रेम करते हैं। जब संदेह उत्पन्न हो गया तो ईर्ष्या भी पैदा हो उठी। सरस्वती गंगा से जलने लगीं। बात-बात में उन्हें खरी-खोटी सुनाने लगीं। गंगा कुछ बोलती नहीं थीं वे चुपचाप सुन लिया करती थीं।  लक्ष्मी को सरस्वती का व्यवहार अच्छा नहीं लगा। उन्होंने अवसर पाकर सरस्वती से कहा-“बहन सरस्वती ! तुम जब देखो गंगा को खरी-खोटी सुनाती रहती हो। तुम यह अच्छा नहीं कर रहीं। मेरी बात मानो, गंगा को जली-कटी सुनानी बंद कर दो।”  पर लक्ष्मी की नेक सलाह सरस्वती को अच्छी नहीं लगी। उनके हृदय में तो ईर्ष्या की आग जल रही थी। उन्होंने सोचा कि लक्ष्मी गंगा का पक्ष ले रही हैं। अतः उनके हृदय की आग और भी अधिक भड़क उठी। वे क्रोध भरे स्वरों में बोलीं-“लक्ष्मी! तुम गंगा का पक्ष लेकर मेरा अपमान कर रही हो। मैं इसे सहन नहीं कर सकती। मैं तुम्हें शाप देती हूं, तुम नदी बनकर धरती पर प्रवाहित होओ।” लक्ष्मी बड़ी शांत प्रकृति की थीं। वे सरस्वती के शाप को सुनकर भी शीतल बनी रहीं। उन्होंने न तो शाप का प्रतिवाद किया और न उनके प्रति मुख से कठोर शब्द ही निकाले। ऐसा लगा, जैसे उनके लिए कुछ हुआ ही न हो। पर गंगा को सरस्वती का शाप अच्छा नहीं लगा। वे सरस्वती के शाप को सुनकर उत्तेजित हो उठीं और क्रोध भरे स्वर में बोलीं- ‘सरस्वती ! तुमने लक्ष्मी को शाप देकर बड़ा अनुचित कार्य किया है। वे तो तुम्हारे शाप को सुनकर चुप रहीं। पर मैं चुप नहीं रह सकती। मैं तुम्हें भी शाप देती हूं, तुम भी नदी बन जाओ और धरती पर जाकर प्रवाहित होओ।”  यह सुनकर सरस्वती के मन की आग और भी अधिक भड़क उठी। वे क्रोध भरे स्वर में बोलीं- “मैं तो नदी बन जाऊंगी, पर तुम भी बैकुंठ में नहीं रह सकतीं। मैं भी तुम्हें शाप दे रही हूं, तुम भी नदी बन जाओ और धरती पर जाकर प्रवाहित होओ।”  इस प्रकार भगवान विष्णु की तीनों पत्नियां कलह और ईर्ष्या के कारण एक-दूसरे को शाप देकर दुख का शिकार बन गईं। यह सुनकर भगवान विष्णु को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने अपनी पत्नियों से कहा- “तुम तीनों ने ईर्ष्या के कारण एक दूसरे को शाप देकर अच्छा नहीं किया। तुम तीनों ने स्वयं अपने लिए दुख को निमंत्रित किया है, अपने ही हाथों से अपने घर को जलाया  विष्णु की भर्त्सना से तीनों पत्नियां बड़ी दुखी हुईं। वे दुख प्रकट करती हुई, विष्णु से क्षमा याचना करने लगीं। विष्णु ने कहा- “तुम तीनों ने एक दूसरे को शाप दिया है। शाप के अनुसार तुम तीनों को नदी बनना ही पड़ेगा, नदी बनकर धरती पर जाना ही पड़ेगा।”  यह सुनकर लक्ष्मी का मन दुख से भर गया। उन्हें विष्णु का वियोग एक क्षण को भी सह्य नहीं था। वे अपने प्राणों को आंसुओं के रूप में बहाती हुई बोलीं-“प्रभो! मुझ पर दया कीजिए। मैं एक क्षण भी आपके बिना नहीं रह सकती। कोई ऐसा उपाय बताइए, जिससे मुझे आपसे विलग न होना पड़े, धरती पर न जाना पड़े।” विष्णु ने कहा-“लक्ष्मी ! तुम्हें धरती पर जाना ही पड़ेगा, किंतु तुम्हारे हृदय में कपट और ईर्ष्या का भाव नहीं है। अतः तुम मुझे बहुत प्रिय हो। तुम्हें मुझसे विलग नहीं होना पड़ेगा। तुम अर्द्धशक्ति से मेरे पास रहो और अर्द्धशक्ति के रूप में पद्मावती नदी के रूप में धरती पर जाकर बहो। धरती पर शंखचूड़ नामक एक राक्षस उत्पन्न होगा। वह मेरा ही अंश होगा। तुम तुलसी के रूप में उसकी पत्नी बनोगी। तुम तुलसी के रूप में सदा विष्णुप्रिया बनी रहोगी और जन-जन से आदर पाओगी।”  गंगा को भी भगवान विष्णु से विलग होने का बड़ा दुख था। अतः उन्होंने भी साश्रु नयन निवेदन किया-“प्रभो! ऐसा कोई उपाय बताइए, जिससे मैं आपसे विलग न होऊं।”  भगवान विष्णु ने कहा- “गंगे! शापवश तुम्हें भी धरती पर जाना ही पड़ेगा। राजा भगीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए तप कर रहे हैं। तुम्हें धरती पर गंगा के रूप में प्रवाहित होना पड़ेगा और भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार करना होगा। तुम भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार करके समुद्र में मिल जाओ। समुद्र मेरा ही रूप है। अत: तुम सदा मुझमें ही रहोगी। तुम स्वर्ग से उतरने पर शिव की जटाओं में रहोगी। शिव और मुझमें कोई अंतर नहीं है। इस रूप में भी तुम सदा मुझमें ही रहोगी।”  सरस्वती चुपचाप विष्णु की बातों को सुन रही थीं। अंत में भगवान विष्णु ने सरस्वती की ओर देखा और कहा-“सरस्वती ! तुम अपने अर्द्धगुणों से नदी बनकर बहोगी और अर्द्धगुणों से ब्रह्मा की पत्नी बनोगी। शाप का फल तुम्हें भी भोगना ही पड़ेगा।”  सरस्वती बोलीं-“भगवन! आप तो भेद-विभेद रहित हैं, फिर आप लक्ष्मी और मुझमें भेद क्यों कर रहे हैं? आपने लक्ष्मी को तो अपने पास ही रहने की अनुमति प्रदान की, पर मुझे आप सदा के लिए विलग कर रहे हैं।”  विष्णु बोले-“सरस्वती! किसी को भी न तो मैं विलग करता हूं और न अपने पास रखता हूं। मेरी किसी में न तो आसक्ति है और न किसी से भी विरक्ति है। सबको अपने-अपने गुणों और कर्मों के अनुसार ही मेरा साहचर्य प्राप्त होता है। लक्ष्मी निष्कपट हृदय की हैं। वे न तो किसी से ईर्ष्या करती हैं, न किसी से बैर रखती हैं। वे सबसे प्रेम करती हैं। यही कारण है, वे सदा मेरे साथ रहती हैं। पर तुम ईर्ष्या और क्रोध के वशीभूत रहती हो। यही कारण है, तुम्हें मुझसे विलग होना पड़ा है।”  विष्णु के कथन को सुनकर सरस्वती मौन हो गईं। उन्हें ऐसा लगा, जैसे विष्णु के कथन का प्रत्येक अक्षर उनके सामने मूर्तिमान बनकर खड़ा हो गया हो। सरस्वती का हृदय पश्चाताप की वेदना से जलने लगा, पर अब क्या हो

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प्राचीन कथा-युधिष्ठिर और यक्ष की कथा

प्रसंग द्वैत वन का है। चित्रसेन गंधर्व के बन्धन से राजा दुर्योधन को छुडाकर युधिष्ठिर पुनः द्वैत वन लौट गए। वहां एक ब्राह्मण घबराया हुआ पहुंचा और युधिष्ठिर से बोला, “राजन! मेरा तो बुरा हाल हुआ, अरणियां-सहित मैंने अपना बर्तन एक पेड़ पर टांग रखा था। एक हिरण आया और उसे लेकर भाग गया। हाय! अब मैं अग्नि कैसे जलाऊंगा? तुम और तुम्हारे चारों भाई जाकर उसे खोजो और मेरा अरणियों का बर्तन मुझे ला दो। ब्राह्मण के आग्रह पर पाण्डव उस हिरण को ढूंढ़ने निकल पड़े। पर उसका कहीं भी पता न चला। थके हुए खिन्न पांडव एक वट वृक्ष की ठंडी छाया में जा बैठे। युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाई नकुल से कहा, “देखो, पास में कहीं पानी हो, तो  तुर्णो में भरकर प्यास बुझाने के लिए यहां लाओ।”  समीप ही एक कुण्ड था। नकुल वहां पहुंचा। ज्यों ही उसने वहां का पानी पीना चाहा, समीप के एक वृक्ष से कोई बोला, “खबरदार! ऐसा दुस्साहस न करना। इस कुण्ड पर पहले से ही मेरा अधिकार है। माद्री-पुत्र! पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, तभी इसका पानी पी सकोगे।”  वह यक्ष था। उसकी इस बात पर नकुल ने ध्यान नहीं दिया।  वह प्यास के मारे व्याकुल था। जैसे ही उसने सरोवर का जल पिया, वह गिर पड़ा और उसके प्राण छूट गए। इसी प्रकार सहदेव, अर्जुन और भीम एक-एक करके सभी का यही हाल हुआ।  यधिष्ठिर ने भाइयों को मृत देखकर बहुत विलाप किया। उन्होंने भी ज्यों ही वहां का पानी पीना चाहा, वही आवाज सुनाई दी, “युधिष्ठिर! मेरे प्रश्नों का देकर ही तुम इस पानी को हाथ लगा सकते हो।”  “पूछो, यथामति मैं तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर दूंगा।” युधिष्ठिर ने कहा यक्ष-“धर्म का एकमात्र साधन क्या है? किस एक ही उपाय से यश प्राप्त होता है? स्वर्ग-प्राप्ति का एकमात्र साधन क्या है? कौन-सा ऐसा एक ही उपाय है, जिससे सुख लाभ हो सकता है,  युधिष्ठिर –“दक्षता धर्म का एकमात्र साधन है। यश-लाभ का एकमात्र उपाय दान है। स्वर्ग केवल सत्य से ही प्राप्त होता है। एक शील ही सुख का मूल है।” यक्ष-“मनुष्य की आत्मा कौन है? कौन उसका भाग्य द्वारा प्राप्त मित्र है?” युधिष्ठिर -“मनुष्य की आत्मा उसका पुत्र है। मित्र उसकी भार्या है, जो भाग्य से ही मिलती है।” यक्ष-“सर्वोत्तम लाभ क्या है? सर्वोत्तम सुख क्या है?” युधिष्ठिर-“आरोग्य सर्वोत्तम लाभ है। सन्तोष ही सबसे ऊंचा सुख है।” यक्ष-‘संसार में धर्म से बढ़कर और क्या है ? वह कौन-सा धर्म है, जो सदा फल देता है ? वह क्या है, जिसका नियंत्रण करके शोक नहीं होता? वे कौन हैं, जिनके साथ की गई मित्रता कभी जीर्ण नहीं होती?” युधिष्ठिर-“उदारता धर्म से भी बढ़कर है। सदा फल देने वाला वैदिक धर्म है। वह मन है, जिसका नियंत्रण करके शोक नहीं होता। सज्जनों की मित्रता कभी जीर्ण नहीं होती।” यक्ष-“किसे त्यागकर मनुष्य प्रिय हो जाता है? किस वस्तु के त्याग से उसे शोक नहीं होता?  वह क्या है, जिसे त्यागकर मनुष्य सम्पत्तिशाली हो जाता है? किसे त्यागने से वह सुखी हो सकता है?”  युधिष्ठिर -“अहंकार का त्याग करने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है। क्रोध के त्याग से उसे शोक नहीं होता। काम का त्याग करके वह सम्पत्तिशाली बनता है।  और लोभ के त्याग से वह सुखी होता है।” यक्ष-“तप का क्या लक्षण है? दम किसे कहते हैं? सबसे बड़ी क्षमा क्या है?  और लज्जा की भावना क्या है?” युधिष्ठिर -“स्वधर्म का परिपालन ही धर्म है।  दम, मन का दमन, अर्थात निग्रह ही है। (शीत, उष्ण, सुख-दुख आदि) द्वन्द्वों का सहना ही सबसे बडी क्षमा के न करने योग्य कर्म से मुंह मोड़ लेना ही लज्जा की भावना है।” यक्ष-“सबसे बड़ी दया क्या है?  और आर्जव अर्थात सरलता किसे कहते हैं?” युधिष्ठिर– “सबके सुख की इच्छा ही सबसे बड़ी दया है। समचित्तता को ही आर्जव कहते हैं।” यक्ष-“मनुष्यों का दुर्जय शत्रु कौन-सा है? ऐसी कौन-सी व्याधि है, जिसका अन्त ही नहीं? साधु किसे कहा जाए?  और असाधु किसे कहते हैं?” युधिष्ठिर –“मनुष्यों का दुर्जय शत्रु क्रोध है। लोभ ऐसी व्याधि है, जिसका कोई अन्त नहीं। साधु वह है, जो सब प्राणियों का भला चाहता है।  और निर्दयी ही असाधु है।” यक्ष-“सबसे बड़ा स्नान क्या है?  और सबसे बड़ा दान किसे कहा जाए?” युधिष्ठिर -“मनोविकारों का त्याग ही सबसे बड़ा स्नान है। प्राणियों की रक्षा ही महान दान है।”  यक्ष-“मेरा अन्तिम प्रश्न यह है, जिसका उत्तर पाने से तुम्हारे भाई जीवित हो जाएंगे।  इस जगत में आश्चर्य क्या है?”  उत्तर-“दिन-प्रतिदिन प्राणी यमलोक को जा रहे हैं । यह देखते हुए भी शेष प्राणी चाहते हैं कि वे अनन्तकाल तक जीवित रहें ! इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?”  यक्ष को युधिष्ठिर के इन उत्तरों से पूरा सन्तोष हो गया और उसने चारों पांडवों को जीवित कर दिया। 

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शिक्षाप्रद धार्मिक कहानी-राजा आदित्य सेन की कथा

प्राचीन समय में उज्जयिनी नगरी में राजा आदित्य सेन राज करते थे। वह बडे ही शूरवीर तथा प्रजा-वत्सल थे। एक दिन अपने कुछ सैनिकों, मंत्रियों तथा रानी के साथ वे शिकार करने को निकले।  घने जंगल में जाकर एक हिरन के पीछे उन्होंने अपना घोड़ा दौड़ाया। भागते हिरन का पीछा करते हुए घोड़ा राजा समेत सबकी आंखों से ओझल हो गया। हिरन छलांगें लगाता हुआ न जाने किस झाड़ी में छिप गया। राजा का घोड़ा एक ऐसे निर्जन स्थान पर जा खड़ा हुआ, जहां पता ही नहीं चलता था कि वे कहां आ गए हैं और अब किधर जाना है?  उधर, राजा के मंत्रियों तथा सैनिकों को बड़ी चिंता हुई कि महाराज कहां भटक गए? बहुत खोज-खबर की, मगर न तो महाराज का पता चला, न ही घोड़ा कहीं दिखा। अब तो सब परेशान ! क्या किया जाए?  महारानी की सलाह से तय किया गया कि अब राजधानी उज्जयिनी लौट चलते हैं। महाराज जहां कहीं भी होंगे, बाद में स्वयं पहुंच जाएंगे। हमारे वीर महाराज को किसी हिंस्र जानवर से कोई भय नहीं हो सकता।  उधर, महाराजा आदित्य सेन का बुरा हाल था। भयानक जंगल में वह घोड़े को लेकर किधर जाएं, पता ही नहीं चल रहा था। भूख-प्यास से बेहाल थे। इतनी चिंता तो शत्रुओं से युद्ध करने पर भी कभी नहीं हुई थी। यहां इस जंगल में कितना असहाय हो गया हूं। उधर मेरी रानी, मंत्री तथा सैनिकों का न जाने क्या हाल होगा? इसी सोच में पड़े वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गए।  बहुत देर तक सोच-विचार करने के बाद भी उन्हें कोई रास्ता न सूझा। सूरज के डूबने से अंधेरा घिरने लगा, तो उन्होंने घोड़े के आगे हाथ जोड़कर कहा-‘हे मेरे अश्व! तुम और तुम्हारी जाति बहुत स्वामिभक्त होती है। तुमने मुझे इस निर्जन तथा बियाबान जगह में लाकर खड़ा तो कर दिया है, अब तुम ही मुझे इस संकट से उबारोगे। यहां तुम्हारे सिवा मेरा कोई सहायक नहीं है।’  यह कहकर राजा घोड़े पर सवार हो गए। घोड़ा किधर जाएगा और वह कहां पहुचेंगे, इसका उन्हें कुछ पता नहीं था।  अब तक अंधेरा काफी घिर आया था। राजा के भाग्य और घोड़े की सूझ बझ से घोड़ा घने जंगल से बाहर आ गया। अब राजा को भी लगा कि संकट पार हो जाएगा। फिर उन्हें दूर, बहुत दूर रोशनी की एक झलक दिखी। घोड़ा स्वयं उस ओर बढ गया। खुली जगह एक घर और कुछ आदमियों को देखकर, राजा की जान में जान आई। राजा घोड़े से उतरे। उस आश्रम जैसे घर के द्वार पर खड़े होकर उन्होंने आवाज लगाई-“अरे कोई है? मैं एक भटका हआ यात्री हं। मझे रात में अपने यहां शरण दीजिए।”  दरवाजा खुला और एक आदमी बाहर आया। जब तक वह आगंतुक से कुछ पूछे, पांच-छह आदमी और भी बाहर आ गए। हाथ में लाठियां थीं। सबने एक स्वर में पूछा-“गुरुजी? कौन है यह? इतनी रात गए तो कोई चोर-डाकू ही यहां आ सकता है।”  गुरु जी ने उन लोगों को शांत कर कहा-“ठहरो! मैं देखता-पूछता हूं कि कौन है?”  यह कहकर उन्होंने दीपक की रोशनी आदित्य सेन पर डाली। भूख, प्यास, थकान से आदित्य सेन का बुरा हाल था। जंगल में झाड़ियों में उलझकर वस्त्र भी कई जगह से फट गए थे। चेहरे का सारा राजसी तेज समाप्त हो चुका था।  गुरुजी उनसे कुछ पूछते कि इससे पहले ही उन्होंने कहना शुरू किया-“हे पूज्यवर ! मैं विपत्ति का मारा एक शिकारी हूं। एक हिरन के पीछे मेरा घोड़ा दौड़ा, हिरन तो न जाने कहां ओझल हो गया पर मैं भटक गया। सारा दिन भूख-प्यास और बेहाली में बीता। अंत में अपने को भगवान के भरोसे छोड़ दिया। अब मैं आपके द्वार पर खड़ा हूं।”  गुरुजी का नाम चक्रधर था। जब उन्होंने यह सब सुना, तो लगा कि निश्चय ही यह आदमी मुसीबत का मारा है। इसे शरण अवश्य देनी चाहिए। उन्होंने कहा-“अतिथि तो हमारे लिए भगवान जैसा होता है। आप घोड़े को बाहर बांधकर अंदर आ जाएं।”  इतना सुनते ही उनके साथियों ने कहा- “गुरु जी! यह आप क्या कर रहे हैं। यह आदमी डाकू भी हो सकता है। झूठ-मूठ अपनी बुरी दशा बताकर अंदर आ जाएगा और रात में हमें लूटकर चला जाएगा।”  गुरु जी बोले-“ऐसा मत सोचो। अगर यह डाकू भी हो, तो डरने की कोई बात नहीं, यह अकेला है और हम सब इतने हैं। तुम सब निश्चिंत होकर सोओ। मैं जागकर पहरा देता रहूंगा। इतनी रात गए इस हालत में एक आदमी को शरण देना, उसके प्राणों की रक्षा करना हमारा धर्म है। हमें इस धर्म को निभाना चाहिए।”  यह कहते हुए उन्होंने आदित्य सेन को अन्दर बुलाया। उन्हें खाना दिया।  घोड़े के लिए चारा-पानी देना भी न भूले। जब आदित्य सेन थोड़ा आश्वस्त हा तो गुरु जी ने कहा-“अब आप निश्चिंत होकर सोइए। मेरे रहते आपको कोई कष्ट नहीं होगा। सवेरे आपको जहां जाना होगा, चले जाइएगा।”  आदित्य सेन लेटे-लेटे सोचने लगे कि समय बड़ा बलवान होता है। वह कब किसको किस दशा में डाल दे, इसका कुछ पता नहीं होता। मैं प्रजा पालक राजा, जो चोर-डाकुओं और शत्रुओं का नाश करने वाला हूं, आज किसी की कृपा से अपनी भूख मिटा पाया हूं। कहीं मैं चोर-डाकू तो नहीं, इस भय से गुरु जी रात भर जागकर अपने अनुयाइयों की रक्षा कर रहे हैं। सोचते-सोचते थके-मांदे आदित्य सेन जाने कब सो गए।  प्रात:काल जब वे उठे, तो थकान उड़ चुकी थी। गुरु जी से कहा-“आपने रात में शरण देकर मुझ पर जो उपकार किया है, मैं जीवन भर इसे न भूलूंगा। आज्ञा दीजिए, अब चलूं। मेरे घर-परिवार के लोग बहुत चिंतित होंगे।”  गुरु जी ने कहा-“मैंने कोई उपकार नहीं किया। एक मनुष्य होने के नाते एक दुखी आदमी के साथ अपना मानवीय कर्तव्य निभाया है। आप शीघ्र अपने घर पहुंचकर अपने परिवार की चिंता दूर करें।”  दूसरे दिन महाराज के उज्जयिनी पहुंचते ही सारे दरबार में खुशी छा गई। राजा ने रात के प्रसंग की किसी से चर्चा नहीं की।  चक्रधर का यह आश्रम उज्जयिनी राज्य में ही था। आदित्य सेन ने एक दिन अपने एक सामंत से कहा कि अमुक वन में चक्रधर नाम के एक ऋषि का आश्रम है, जहां वह अपने कुछ शिष्यों के साथ रहते हैं। वहां जाकर उन्हें

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पौराणिक शिक्षाप्रद कहानियां-नीलमाधव की कथा

पूर्वकाल में उत्कल (उड़ीसा) प्रदेश के शबरपल्ली नगर में विश्ववसु नामक एक व्यक्ति रहता था। वह विष्णु का भक्त था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान नीलमाधव साकार रूप में उसके हाथ से नैवेद्य ग्रहण करते थे। नीलमाधव की मूर्ति एक ऐसी गुफा में थी जिसका पता विश्ववसु के सिवा किसी को न था।  उत्कल के राजा इन्द्रद्युम्न भी विष्णु के भक्त थे। भगवान उन्हें दर्शन दें, इसके लिए वह हमेशा विष्णु की पूजा में लगे रहते, पर उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो रही थी। एक दिन उनकी सभा में कुछ संन्यासी आए। उन्होंने नीलमाधव की प्रकट लीला की चर्चा की। यह भी कहा कि वह प्रकट होकर स्वयं नैवेद्य ग्रहण करते हैं, पर वह मूर्ति कहां है, इसका पता उन्हें भी नहीं था।  राजा इन्द्रद्युम्न ने नीलमाधव की मूर्ति का पता लगाने के लिए चारों ओर पुरोहितों को भेजा। उन्हीं खोजियों में राज-पुरोहित विद्यापति भी थे। घूमते-घूमते वह शबरपल्ली नगर में पहुंचे और विश्ववसु के यहां ही ठहरे।  विश्ववसु की पुत्री ललिता विद्यापति पर मोहित हो गई। विद्यापति भी ललिता की तरफ आकर्षित हो गए।  विश्ववसु नित्य प्रात: घर से निकल जाते और रात देर से घर लौटते। लौटने पर विश्ववसु के शरीर से चन्दन की अद्भुत सुगन्ध निकलती थी। विद्यापति को इससे बड़ा आश्चर्य होता था। एक दिन उसने ललिता से पूछा कि तुम्हारे पिता नित्य प्रात: कहां जाते हैं ?  ललिता ने बताया कि बाबा नित्य भगवान नीलमाधव की पूजा के लिए जाते हैं। विद्यापति ने विश्ववसु से श्रीमूर्ति के दर्शन कराने का बड़ा आग्रह किया, परन्तु विश्ववसु राजी न हुए। आखिरकार विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह अपने पिता को राजी करे कि उसे श्रीमूर्ति के दर्शन एक बार अवश्य करा दें।  एक दिन ललिता ने अपने पिता से विशेष रूप से आग्रह किया कि वह विद्यापति को श्रीमूर्ति के दर्शन करा दें।  बेटी के आग्रह के आगे विश्ववसु को झुकना पड़ा। आखिर एक शर्त पर वह राजी हुए कि विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर उसे श्रीमूर्ति तक ले जाएंगे। फिर पट्टी बांधकर वापस लाएंगे।  विद्यापति विश्ववसु की शर्त पर राजी हो गए। गुफा तक पहुंचने के मार्ग का पता चल जाए, इसके लिए विद्यापति ने एक चालाकी की। वह अपने साथ सरसों के दाने छिपाकर ले गए और चुपके-चुपके रास्ते में बिखेरते गए, ताकि बाद में उन  दानों के उग जाने पर उस मार्ग का पता चल जाए। ।  गुफा के अन्दर श्रीमूर्ति के पास पहुंचते ही विश्ववसु ने विद्यापति की आंखों की पट्टी खोल दी।  नीलमाधव की दिव्य मूर्ति देखकर विद्यापति चकित हो गए। वह सन्तुष्ट भी थे कि गुफा का पता चल गया है।  विद्यापति राजा इन्द्रद्युम्न के पास पहुंचे। उन्हें भगवान नीलमाधव की श्रीमूर्ति का पता लगाने के बारे में बताया। राजा अपने मन्त्री तथा सभासदों को लेकर विद्यापति के साथ नीलमाधव के दर्शन के लिए चल पड़े।  गुफा में पहुंचने पर राजा ने देखा, मूर्ति तो वहां है ही नहीं। राजा बड़े दुखी हुए। उन्हें क्रोध भी आया। सोचा-मूर्ति को छिपा देने में विश्ववसु का हाथ है। विश्ववसु नहीं चाहते कि पूजा-अर्चना का उसका एकाधिकार समाप्त हो जाए। बस, राजा ने विश्ववसु को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन मूर्ति का फिर भी पता न चला।  भगवान नीलमाधव के दर्शन न कर पाने से राजा इतने दुखी हुए कि उन्हें जीवन बेकार लगने लगा। इसी सोच में डूबे थे कि उन्हें एक आवाज सुनाई दी  “श्रीमूर्ति का दर्शन न कर पाने की तुम्हारी दशा को मैं समझता हूं, पर इसमें विश्ववसु का कोई दोष नहीं है। उसे मुक्त कर दो। मैं स्वयं लुप्त हो गया हूं, जाओ, अपनी राजधानी ‘पुरी’ में नीलगिरि पर मन्दिर का निर्माण करो। उसमें मेरी दारु वृक्ष की लकड़ी की मूर्ति की प्रतिष्ठा करो। तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी।”  देव-वाणी सुनकर राजा को बड़ा सन्तोष हुआ। वह राजधानी लौट आए। विश्ववसु को मुक्त कर दिया। पुरी में नीलगिरि पहाड़ी पर मन्दिर का निर्माण कराने लगे, पर दारुवृक्ष की लकड़ी की मूर्ति की प्रतिष्ठा कैसे होगी?—इसकी चिन्ता उन्हें सता रही थी। मन्दिर लगभग बन गया, तो एक रात को स्वप्न आया कि समुद्र में तैरता हुआ एक दारु किनारे आ लगा है। इस दारु से श्रीमूर्ति का निर्माण कराओ। राजा अपने मन्त्रियों के साथ समुद्र के किनारे उस स्थान पर गए, जहां स्वप्न में उन्हें दारु दिखाई दिया था। देखा तो सचमुच ही एक विशाल दारु वृक्ष समुद्र तट पर विद्यमान था। उस विशाल दारु पर शंख, चक्र, गदा तथा पद्म के चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।  दारु को रस्से से बांधा गया। हाथियों से खिंचवाकर बाहर लाने का प्रयत्न होने लगा, पर आश्चर्य, दारु एक इंच भी न हिला। राजा चिन्तित हो फिर भगवान विष्णु का स्मरण करने लगे, तो सुनाई पड़ा-“मेरे भक्त विश्ववस को बुलाओ। उसकी तथा विद्यापति की मदद से इस दारु को स्वर्ण-रथ पर चढाकर मन्दिर की वेदी तक ले जाओ।”  ऐसा ही किया गया। फिर उस दारु को श्रीमूर्ति के रूप में तराशने के लिए कुशल शिल्पियों को बुलवाया गया। जो भी शिल्पी उस दारु पर चोट करता, औजार टूट जाता। अनेक प्रयासों के बावजूद उस दारु का एक कोना भी न छीला जा सका।  राजा को बड़ी चिन्ता हुई। इस चिन्ता में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए उन्हें नींद आ गई।  दूसरे दिन अचानक एक वृद्ध बढ़ई आया। राजा से बोला-“महाराज, मैं इक्कीस दिन में उस दारु से श्रीमूर्ति का निर्माण कर दूंगा। एक ही शर्त है कि इन इक्कीस दिनों तक मन्दिर का मुख्य द्वार बन्द रहेगा। अन्दर मैं अकेला मूर्ति का निर्माण करूंगा।”  राजा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने काम वृद्ध को सौंप दिया। मन्दिर का मुख्य द्वार बाहर से बन्द कर दिया। ठक-ठक का स्वर बाहर सुनाई देने लगा। दो हफ्ते बाद अचानक आवाज बन्द हो जाने के कारण राजा को चिन्ता हुई। उन्होंने सोचा कहीं ऐसा तो नहीं, अन्दर वृद्ध शिल्पी का देहान्त हो गया हो। उन्होंने इक्कीस दिन के पूर्व ही द्वार खोलकर देखना चाहा कि अन्दर क्या स्थिति है? द्वार खोलकर ज्यों ही वह भीतर गए, देखा कि वृद्ध शिल्पी का कहीं पता नहीं और उस दारु से तीन  मूर्तियों का अधूरा निर्माण हुआ पड़ा है। मूर्तियों में हाथ की उंगलियां तथा पैर भी प्रकट नहीं हुए थे।  राजा को लगा, उनकी सारी साधना व्यर्थ गई। दुख

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पौराणिक कथा-ब्राह्मण नरोत्तम की अहंकार कथा 

बहुत पहले की बात है, नरोत्तम नाम का एक ब्राह्मण था। उसके घर में मां बाप थे तथापि वह उनकी परिचर्या न कर तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़ा। उसने अनेक तीर्थों में पर्यटन तथा अवगाहन किया, जिसके प्रताप से उसके गीले वस्त्र निरालम्ब आकाश में उड़ने लगे और सूखने लगे। जब उसने यों ही स्वच्छन्द गति से अपने वस्त्रों को आकाश में उड़ते देखा, तब उसे अपनी तीर्थचर्या का महान अहंकार हो गया। वह समझने लगा कि मेरे समान पुण्यकर्मा यशस्वी इस संसार में दूसरा कोई भी नहीं है। एक बार उसने ऐसा ही कहीं कह भी दिया। तब तक उसके सिर पर एक बगुले ने बीट कर दी। क्रुद्ध होकर नरोत्तम ने बगुले को शाप दे दिया, जिससे वह बगुला वहीं जलकर भस्म हो गया। पर आश्चर्य! तब उसके कपडे का आकाश में उड़ना और सूखना बन्द हो गया। अब नरोत्तम बड़ा उदास हो गया। तब आकाशवाणी हुई-“ब्राह्मण! तुम परम धार्मिक मूक चाण्डाल के पास जाओ, वहीं धर्म क्या है इसका तुम्हें पता चल जाएगा तथा तम्हारा कल्याण भी होगा।”  नरोत्तम को इससे बड़ा कुतूहल हुआ। वह तुरन्त पता लगाता हुआ मूक चाण्डाल के घर पहुंचा। वहां मूक बड़ी श्रद्धा से अपने माता-पिता की सेवा-शुश्रूषा में लगा था। उसके विलक्षण पुण्य-प्रताप से भगवान विष्णु निरालम्ब उसके घर अन्तरिक्ष में वर्तमान थे। वहां पहुंचते ही नरोत्तम ने मूक को आवाज दी और कहा-“अरे! मैं यहां आया हूं, तुम मुझे यहां आकर शाश्वत हितकारी धर्मतत्त्व का स्वरूपतः वर्णन सुनाओ।” मूक बोला- “मैं अपने माता-पिता की सेवा में लगा हूं। इनकी विधिपूर्वक परिचर्या करके तुम्हारा कार्य करूंगा। तब तक चुपचाप दरवाजे पर बैठे रहो। मैं तुम्हारा आतिथ्य करना चाहता हूं।” अब तो नरोत्तम की त्योरी चढ़ गई। वह बड़े जोरों से बिगड़कर बोला “अरे! मुझ ब्राह्मण की सेवा से बढ़कर तुम्हारा क्या काम आ गया है ? तुमने मुझे हंसी-खेल समझ रखा है क्या?” मूक ने कहा- “ब्राह्मण देवता! मैं बगुला नहीं हूं। तुम्हारा क्रोध केवल बगुले पर ही चरितार्थ हो सकता है, अन्यत्र कहीं नहीं। यदि तुम्हें मुझसे कुछ पूछना है तो तुम्हें यहां ठहरकर प्रतीक्षा करनी ही पडेगी। यदि तुम्हारा यहां ठहरना कठिन ही हो तो तुम पतिव्रता के यहां जाओ। उसके दर्शन से . तुम्हारे अभीष्ट की सिद्धि हो सकेगी।”  तब तक द्विजरूपधारी विष्णु, चाण्डाल के घर से बाहर निकल पड़े और नरोत्तम से बोले-“चलो, मैं तुम्हें पतिव्रता का घर दिखला दूं।”  अब नरोत्तम उनके साथ हो लिया।  उसने उनसे पूछा-“भगवन! तुम इस चाण्डाल के घर स्त्रियों में आवृत होकर क्यों रहते हो?”  भगवान बोले-“इसका रहस्य तुम पतिव्रता आदि का दर्शन करने पर स्वयं समझ जाओगे।”  नरोत्तम ने पूछा-“महाराज! यह पतिव्रता कौन-सी बला है ? पतिव्रता का लक्षण तथा महत्त्व क्या है ? क्या आप इस सम्बन्ध में कुछ जानते हैं?” भगवान ने कहा-‘पतिव्रता स्त्री अपने दोनों कुलों के सभी पुरुषों का उद्धार कर देती है। प्रलयपर्यन्त वह स्वर्ग-भोग करती है। कालान्तर में जब वह जन्म लेती है, तब उसका पति सार्वभौम राजा होता है। सैकड़ों जन्मों तक यह क्रम चलकर अन्त में उन दोनों पति-पत्नी का मोक्ष होता है। जो स्त्री प्रेम में अपने पुत्र से सौगुना तथा भय में राजा से सौगुना पति प्रेम तथा भय करती है, उसे पतिव्रता कहते हैं। जो काम करने में दासी के समान, भोजन कराने में माता के समान, विहार में वेश्या के समान, विपत्तियों में मन्त्री के समान हो, उसे पतिव्रता कहते हैं। वैसी ही यहां एक शुभा नाम की पतिव्रता स्त्री है। तुम उससे जाकर धर्म के रहस्यों को समझो।”  नरोत्तम ने पतिव्रता के दरवाजे पर पहुंचकर आवाज लगाई। पतिव्रता आवाज सुनकर बाहर आ गई। नरोत्तम बोला- “मुझे धर्म का रहस्य समझाओ।” पतिव्रता बोली-“ब्राह्मण देवता! मैं स्वतन्त्र नहीं हूं। इस समय मुझे पति की परिचर्या करनी है। अभी तो आप अतिथि के रूप में मेरे यहां विराजें। पति सेवा से निवृत्त होकर मैं आपका कार्य करूंगी।”  नरोत्तम बोला, ‘कल्याणी ! मुझे आतिथ्य की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम मुझे साधारण ब्राह्मण न समझो।”  पतिव्रता ने कहा- ‘मैं बगुला नहीं हूं। यदि तुम्हें ऐसी ही जल्दी है तो तुम तुलाधार वैश्य के पास चले जाओ। वह तुम्हारा कार्य कर सकेगा।”  नरोत्तम उस वैश्य के घर पहुंचा। वहां पहुंचकर उसने उस ब्राह्मण को देखा, जिसे चाण्डाल के घर में देखा था। तुलाधार व्यापार के कार्य में बेतरह फंसा था।  उसने कहा- “ब्राह्मण देवता! एक प्रहर रात तक मुझे अवकाश नहीं। आप कृपया अद्रोहक के पास पधारें, वह आपके द्वारा बगुले की मृत्यु, वस्त्रों का उड़ना और फिर न उड़ने के रहस्यों को यथाविधि बतला सकेगा।”  वह ब्राह्मण फिर नरोत्तम के साथ हो गया। नरोत्तम ने उससे पूछा- “ब्राह्मण ! आश्चर्य है, यह तुलाधार स्नान, संध्या, ऋषि व पितृ-तर्पण आदि से सर्वथा रहित है। इसका शरीर मल का भण्डार हो रहा है। इसके सारे वस्त्र भी बेढंगे हो रहे हैं, तथापि यह मेरी सारी बातों को, जो इसके परोक्ष में घटी हैं, कैसे जान गया?”  ब्राह्मण-रूपधारी भगवान बोले- “इसने सत्य और समता से तीनों लोकों को जीत लिया है। यह मुनिगणों के साथ देवता और पितरों को भी तृप्त कर चुका और इसी के प्रभाव से भूत, भविष्य और वर्तमान की परोक्ष घटनाओं को भी जान सकता है। सत्य से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं, झूठ से बड़ा कोई दूसरा पातक नहीं। इसी प्रकार समता की भी महत्ता है। शत्रु, मित्र, मध्यस्थ-इन तीनों में जिसका समान भाव उत्पन्न हो गया है, समझो उसके सारे पाप क्षीण हो गए और वह विष्णु सायुज्य को प्राप्त कर लेता है।”  “जिस व्यक्ति में सत्य, शम, दम, धैर्य, स्थैर्य, अनालस्य, अनाश्चर्य, निर्लोभिता और समता जैसे गुण हैं, उसमें सारा विश्व ही प्रतिष्ठित है। ऐसा पुरुष करोड़ों कुलों का उद्धार कर लेता है। उसके शरीरों में साक्षात् भगवान विराजमान हैं। वह देवलोक-नरलोक के सभी वृत्तान्तों को जान सकता है।”  नरोत्तम ने कहा-“अस्तु! तुलाधार की सर्वज्ञता का कारण मुझे ज्ञात हो गया। पर अद्रोहक कौन तथा किस प्रभाव वाला है, क्या यह आप जानते हैं?”  विप्ररूपी भगवान बोले- “कुछ समय पूर्व की बात है। एक राजकुमार की स्त्री बडी सुन्दरी तथा युवती थी। एक दिन उस राजकुमार को अपने पिता की आज्ञा से कहीं बाहर जाने की आवश्यकता हुई। अब वह स्त्री के सम्बन्ध में सोचने लगा कि उसे कहां रखा जाए? जहां उसकी पूरी सुरक्षा हो सके। अन्त में वह

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धार्मिक लघु कथाएं-कलियुग में धर्म लाभ कथा 

एक बार मुनियों में परस्पर इस विषय पर बड़ा विवाद हुआ कि किस समय का किया गया थोड़ा-सा भी पुण्य अत्यधिक फलदायक होता है तथा कौन उसका सुविधापूर्वक अनुष्ठान कर सकता है?’ अन्त में वे इस सन्देह के निवारण के लिए महामुनि व्यासजी के पास गए।  उस समय दैववशात् वे गंगाजी में स्नान कर रहे थे। ज्यों ही ऋषिगण वहां पहुंचे, व्यासजी डुबकी लगाते हुए ऋषियों को सुनाकर जोर से बोले-“कलियुग ही श्रेष्ठ है, कलियुग ही श्रेष्ठ है।” यह कहकर वे पुनः जलमग्न हो गए।  थोड़ी देर बाद जब वे जल से पुन: बाहर निकले, तब ‘शूद्र ही धन्य है, शूद्र ही धन्य है।’ यों कहकर फिर डुबकी लगा ली। इस बार जब वे जल से बाहर आए, तब-‘स्त्रियां ही धन्य हैं, स्त्रियां ही साधु हैं, उनसे अधिक धन्य कौन है?’ यह वाक्य बोले।  तदनन्तर जब वे ध्यानादि से निवृत्त हुए, तब वे मुनिजन उनके पास आए। वहां उन्होंने अभिवादनादि के बाद शान्त होकर शुभागमन का कारण पूछा।  ऋषियों ने कहा- “हमें आप पहले यह बताइए कि आपने जो कलियुग ही श्रेष्ठ है, शूद्र ही धन्य हैं, स्त्रियां ही धन्य हैं ‘ यह कहा-इसका आशय क्या है ? यदि कोई आपत्ति न हो तो पहले यही बतलाने का कष्ट करें। तदनन्तर हम लोग अपने आने का कारण कहेंगे।” व्यासजी बोले-“ऋषियो! जो फल सतयुग में दस वर्ष तप, ब्रह्मचर्य और धर्माचरण करने से प्राप्त होता है, वही त्रेता में एक वर्ष, द्वापर में एक मास तथा कलियुग में केवल एक दिन में प्राप्त होता है। इसी कारण मैंने कलियुग को श्रेष्ठ कहा है। जो फल सतयुग में योग, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में पूजा करने से प्राप्त होता है, वही फल कलियुग में केशव का नाम-कीर्तन करने मात्र से मिल जाता है। ऋषियो! कलियुग में अत्यल्प, श्रम, अत्यल्प काल में अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति हो जाती है इसलिए मैंने कलियुग को श्रेष्ठ कहा है। इसी प्रकार द्विजातियों को उपनयनपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पडता है। तत्तद्धर्मों के अनुष्ठान में बड़ा श्रम और शक्ति का व्यय होता है। इस प्रकार बड़े क्लेश से उन्हें पुण्यों की प्राप्ति होती है, पर शूद्र तो केवल द्विजों को सेवा से ही प्रसन्न कर अनायास पुण्य प्राप्त कर लेता है और स्त्रियों को भी ये पुण्य केवल मन, वचन, कर्म से, अपने पति की सेवा करने से ही उपलब्ध हो जाते हैं, इसीलिए मैंने ‘शुद्र ही धन्य हैं, स्त्रियां ही साधु हैं, इनसे धन्य और कौन है!’ ये शब्द कहे थे। अस्तु, अब कृपया आप लोग यह बतलाएं कि आपके आने का कौन-सा शुभ कारण है?”  ऋषियों ने कहा-“महामुने! हम लोग जिस प्रयोजन से आए थे, वह कार्य हो गया। हम लोगों में यही विवाद छिड़ गया था कि अल्पकाल में कब अधिक पुण्य अर्जित किया जा सकता है तथा उसे कौन सम्पादित कर सकता है। वह  आपके इस स्पष्टीकरण से समाप्त तथा निर्णीत हो चुका।”  व्यासदेव ने कहा- “ऋषियो! मैंने ध्यान से आपके आने की बात जान ली थी तथा आपके हृदयगत भावों को भी जान गया था। अतएव मैंने उपर्युक्त बातें कहीं और आप लोगों को भी साधु-साधु कहा था। वास्तव में जिन पुरुषों ने गुण रूपी जल से अपने सारे दोष धो डाले हैं, उनके थोड़े से ही प्रयत्न से कलियुग में धर्म सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार शूद्रों को द्विज सेवा तथा स्त्रियों को पति सेवा से अनायास ही महान धर्म की सिद्धि, विशाल पुण्य राशि की प्राप्ति हो जाती है। इस प्रकार आप लोगों की अभीष्ट वस्तु मैंने बिना पूछे ही बतला दी थी।”  तदनन्तर उन्होंने व्यासजी का पूजन करके उनकी बार-बार प्रशंसा की और वे जैसे आए थे, वैसे ही अपने-अपने स्थान को लौट गए। 

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Dharmik katha-महर्षि लोमश की कथा 

प्राचीन काल में एक राजा थे, जिनका नाम था इन्द्रद्युम्न । वे बड़े दानी, धर्मज्ञ और सामर्थ्यशाली थे। धनार्थियों को वे सहस्र स्वर्ण मुद्राओं से कम दान नहीं देते थे। उनके राज्य में सभी एकादशी व्रत रखते थे। गगन की बालूका, वर्षा की धारा और आकाश के तारे कदाचित् गिने जा सकते हैं, पर इन्द्रद्युम्न के पुण्यों की गणना नहीं हो सकती। इन पुण्यों के प्रताप से वे सशरीर ब्रह्मलोक चले गए।  सौ कल्प बीत जाने पर ब्रह्माजी ने उनसे कहा-“राजन! स्वर्ग साधन में केवल पुण्य ही कारण नहीं है, अपितु त्रैलोक्यविस्तृत निष्कलंक यश भी अपेक्षित होता है। इधर चिरकाल से तुम्हारा यश क्षीण हो रहा है, उसे उज्ज्वल करने के लिए तुम वसुधातल पर जाओ।”  ब्रह्माजी के ये शब्द समाप्त भी न हो पाए थे कि राजा इन्द्रद्युम्न ने अपने को पृथ्वी पर पाया। वे अपने निवास स्थल काम्पिल्य नगर में गए और वहां के निवासियों से अपने सम्बन्ध में पूछताछ करने लगे। उन्होंने कहा-“हम लोग तो उनके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते, आप किसी वृद्ध चिरायु से पूछ सकते हैं। सुनते हैं नैमिषारण्य में सप्तकल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनि रहते हैं, कृपया आप उन्हीं से इस प्राचीन बात का पता लगाइए।”  जब राजा ने मार्कण्डेयजी से प्रणाम करके पूछा कि, “मुने! क्या आप इन्द्रद्युम्न राजा को जानते हैं?”  तब उन्होंने कहा, “नहीं, मैं तो नहीं जानता, पर मेरा मित्र नाड़ीजंघवक शायद इसे जानता हो, इसलिए चलो, उससे पूछा जाए।”  नाडीजंघवक ने अपनी बड़ी विस्तृत कथा सुनाई और साथ ही अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए अपने से भी अति दीर्घायु प्राकार कर्म उलूक के पास चलने की सम्मति दी। पर इसी प्रकार सभी ने अपने को असमर्थ बतलाते हुए चिरायु गध्रराज और मानसरोवर में रहने वाले कच्छप मन्थर के पास पहुंचे। मन्थर ने इन्द्रद्युम्न को देखते ही पहचान लिया और कहा कि “आप लोगों में जो यह पांचवां राजा इन्द्रद्यम्न है, इसे देखकर मुझे बड़ा भय लगता है, क्योंकि इसी के यज्ञ में मेरी पीठ पृथ्वी की उष्णता से जल गई थी।”  अब राजा की कीर्ति तो प्रतिष्ठित हो गई, पर उसने क्षयिष्णु स्वर्ग में जाना ठीक न समझा और मोक्ष साधन की जिज्ञासा की। एतदर्थ मन्थर ने लोमशजी के पास चलना श्रेयस्कर बतलाया।  लोमशजी के पास पहुंचकर यथाविधि प्रणामादि करने के पश्चात मन्थर ने निवेदन किया कि इन्द्रद्युम्न कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।  महर्षि लोमश की आज्ञा लेने के पश्चात इन्द्रद्युम्न ने कहा-“महाराज ! मेरा प्रथम प्रश्न तो यह है कि आप कभी कुटिया न बनाकर शीत, आतप तथा वृष्टि से बचने के लिए केवल एक मुट्ठी तृण ही क्यों लिए रहते हैं?”  मुनि ने कहा, “राजन! एक दिन मरना अवश्य है, फिर शरीर का निश्चित नाश जानते हुए भी हम घर किसके लिए बनाएं? यौवन, धन तथा जीवन-ये सभी चले जाने वाले हैं। ऐसी दशा में ‘दान’ ही सर्वोत्तम भवन है।”  इन्द्रद्युम्न ने पूछा, “मुने! यह आयु आपको दान के परिणाम में मिली है अथवा तपस्या के प्रभाव से, मैं यह जानना चाहता हूं।”  लोशमजी ने कहा, “राजन! मैं पूर्वकाल में एक दरिद्र शूद्र था। एक दिन दोपहर के समय जल के भीतर मैंने एक बहुत बड़ा शिवलिंग देखा। भूख से प्राण सूखे जा रहे थे। उस जलाशय में स्नान करके मैंने कमल के सुन्दर फूलों से उस शिवलिंग का पूजन किया और पुन: मैं आगे चल दिया। क्षुधातुर होने के कारण मार्ग में ही मेरी मृत्यु हो गई। दूसरे जन्म में मैं ब्राह्मण के घर में उत्पन्न हुआ। शिव पूजा के फलस्वरूप मुझे पूर्व जन्म की बातों का स्मरण रहने लगा। मैंने जान बूझकर मूकता धारण कर ली। पिताजी की मृत्यु हो जाने पर सम्बन्धियों ने मुझे निरा गूंगा जानकर सर्वथा त्याग दिया। अब मैं रात-दिन भगवान शंकर की आराधना करने लगा। इस प्रकार सौ वर्ष बीत गए। प्रभु चन्द्रशेखर ने मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और मुझे इतनी दीर्घ आयु दी।”  यह जानकर इन्द्रद्युम्न, बक, कच्छप, गीध और उलूक ने भी लोमशजी से शिव दीक्षा ली और तप करके मोक्ष प्राप्त किया। 

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शिक्षाप्रद पौराणिक कथाएँ-भीलकुमार कण्णप्प की कथा 

वन में श्री शंकरजी का एक मन्दिर था। भीलकुमार कण्णप्प आखेट करने निकला और घूमता-घामता उस मन्दिर तक पहुंच गया। मन्दिर में भगवान शिव की प्रतिमा थी। उस भावुक सरल हृदय भीलकुमार के मन में यह भाव आया ‘भगवान इन हिंसक पशुओं से भरे वन में अकेले हैं। कहीं कोई पशु रात्रि में आकर इन्हें कष्ट न दे।’ उस समय संध्या हो रही थी। भीलकुमार ने धनुष पर बाण चढ़ाया और मन्दिर के द्वार पर पहरा देने बैठ गया। वह पूरी रात वहीं बैठा रहा। सवेरा हुआ। कण्णप्प के मन में अब भगवान की पूजा करने का विचार हुआ, किन्तु वह क्या जाने पूजा करना। वह वन में गया, पशु मारे और अग्नि में उनका मांस भून लिया। शहद की मक्खियों का छत्ता तोड़कर उसने शहद निकाला। एक दोने में शहद और मांस उसने लिया, वन की लताओं से कुछ पुष्प तोड़े और अपने बालों में उलझा लिए। नदी का जल मुख में भर लिया और मन्दिर पहुंचा। मूर्ति पर कुछ फूल पत्ते पड़े थे। उन्हें कण्णप्प ने पैर से हटा दिया, क्योंकि उसके एक हाथ में धनुष था और दूसरे में मांस का दोना। मुख से ही मूर्ति पर उसने जल गिराया। अब धनुष एक ओर रखकर बालों में लगाए फूल निकालकर उसने मूर्ति पर चढ़ाए और मांस को नैवेद्य रूप में मूर्ति के सामने रख दिया। उसके बाद फिर से धनुष पर बाण चढ़ाकर चौकीदारी करने के लिए मन्दिर के द्वार के बाहर बैठ गया।  कण्णप्प भूल गया घर, भूल गया परिवार, यहां तक कि भोजन तथा निद्रा की सुधि भी भूल गई। वह अपने भगवान की पूजा और उनकी रखवाली में जैसे संसार और शरीर सब भूल गया।  उस मन्दिर में प्रात:काल एक ब्राह्मण दूर के गांव से प्रतिदिन आते थे और पजा करके चले जाते थे। उनके आने का समय वही था जब कण्णप्प वन में आखेट करने जाता था। मन्दिर में मांस के टुकड़े पड़े देखकर ब्राह्मण को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने नदी से जल लाकर पूरा मन्दिर धोया। स्वयं फिर से स्नान किया और तब पूजा की। लेकिन यह कोई एक दिन की बात तो थी नहीं। प्रतिदिन जब यही दशा मन्दिर की मिलने लगी, तब एक दिन ब्राह्मण ने निश्चय किया, ‘आज छिपकर देखूगा कि कौन प्रतिदिन मन्दिर को भ्रष्ट कर जाता है।’  ब्राह्मण छिपकर देखता रहा, किन्तु जब उसने धनुष लिए भयंकर भील को देखा, तब कुछ बोलने का साहस उसे नहीं हुआ। इधर कण्णप्प ने मन्दिर में प्रवेश करते ही देखा कि भगवान की मूर्ति के एक नेत्र से रक्त बह रहा है। उसने हाथ का दोना नीचे रख दिया और दुख से रो उठा-‘हाय! किस दुष्ट ने मेरे भगवान के नेत्र में चोट पहुंचाई।  पहले तो कण्णप्प धनुष पर बाण चढ़ाकर मन्दिर से बाहर दौड़ गया। वह मूर्ति को चोट पहुंचाने वाले को मार देना चाहता था, किन्तु बहत शीघ्र धनुष फेंककर उसने घास-पत्ते एकत्र करने प्रारम्भ कर दिए। एक पूरा गट्ठर लिए वह मन्दिर लौटा और एक-एक पत्ते एवं जड़ को मसल-मसलकर मूर्ति के नेत्र में लगाने लगा। कण्णप्प का उद्योग सफल नहीं हुआ। मूर्ति के नेत्रों से रक्त जाना किसी प्रकार भी रुकता नहीं था। इससे वह भीलकुमार अत्यन्त व्याकुल हो गया। दसी समय उसे स्मरण आया कि उससे कभी किसी भील ने कहा था-‘शरीर के घाव पर यदि दूसरे शरीर के उसी अंश का मांस लगा दिया जाकण्णप्प प्रसन्न हो गया। उसने अपने तरकस से एक बाण निकाला और उसकी नोक अपने नेत्र में घुसेड़ ली। अपने हाथों से अपना नेत्र निकालकर उसने मूर्ति के नेत्र पर रखकर दबाया। स्वयं उसके नेत्र के गड्ढे से रक्त की धार बह रही थी, किन्तु उसे पीड़ा का पता नहीं था। वह प्रसन्न हो रहा था कि मूर्ति के नेत्र से रक्त निकलना बन्द हो गया है।  इसी समय मूर्ति के दूसरे नेत्र से रक्त निकलने लगा। कण्णप्प को तो अब औषधि मिल गई थी। उसने मूर्ति के उस नेत्र पर पैर का अंगूठा रखा, जिससे दूसरा नेत्र निकाल लेने पर जब वह अंधा हो जाए तो इस मूर्ति के नेत्र को ढूंढना न पड़े। बाण की नोक उसने अपने दूसरे नेत्र में चुभाई। सहसा मन्दिर दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हो उठा। उसी मूर्ति से भगवान शंकर प्रकट हो गए। उन्होंने कण्णप्प को हृदय से लगा लिया।  “ब्राह्मण! मुझे पूजा-पद्धति प्रसन्न नहीं करती। मुझे तो सरल श्रद्धापूर्ण भाव ही प्रिय है।” भगवान शिव ने छिपे हुए ब्राह्मण को सम्बोधित किया। कण्णप्प के नेत्र स्वस्थ हो चुके थे। वह तो आशुतोष का पार्षद बन गया था और उनके साथ ही उनके दिव्य धाम में चला गया। ब्राह्मण को भी उस भीलकुमार के संसर्ग से भगवान का दर्शन प्राप्त हुआ। 

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पौराणिक कहानियां-गुप्त एवं रहस्यमय विद्या

महर्षि दध्यड आथर्वण जिन्हें पुराणों में दधीचि महर्षि कहा गया। तपोवन में आश्रम बनाकर रहते थे। वे सदा अपनी तपस्या में लीन रहते तथा सुयोग्य छात्रों को विद्या दान किया करते थे। उन्हें मधु विद्या नाम की एक गुप्त एवं रहस्यमय विद्या का ज्ञान था। जिसे वे बहुत देख-भाल कर ही किसी को देते थे। क्योंकि उन्हें यह ज्ञात था कि यदि किसी अनाधिकारी को उस विद्या को दे दिया तो यह व्यर्थ तो जाएगी ही, साथ ही उन्हें भी इसके दोष का भागी होना पड़ेगा।  एक बार देवराज इन्द्र उनके तपोवन में अतिथि बन कर पहुँचे और महर्षि से बोले- “मैं आपके यहाँ अतिथि बन कर आया हूँ आप मेरी इच्छा को पूरी कीजिए।” महर्षि ने पूछा- “आप कौन हैं?” इन्द्र ने कहा- “पहले आप यह वचन दीजिए कि आप अपने अतिथि की इच्छा पूरी करेंगे।”  उस समय के रिवाज के अनुसार अतिथि की इच्छा को पूर्ण करना प्रत्येक गृहस्थ का धर्म था। अतः महर्षि ने वादा किया- “अतिथि  जैसा चाहेगा वैसा ही होगा।” तब इन्द्र ने कहा- “ऋषिवर! मैं इन्द्र हूँ तथा आपसे मधु विद्या सीखने का इच्छुक हूँ।”  यह सुनकर महर्षि बहुत पछताए। क्योंकि वे इन्द्र को उस विद्या के योग्य नहीं समझते थे। इन्द्र तो स्वर्ग के भोगों के राजा थे। वहाँ तो भोगों की इन्तहां थी। राजा इन्द्र हर समय या तो अप्सराओं के नाच- गाने में व्यस्त थे या फिर इस चिन्ता में लगे रहते थे कि कोई तपस्वी इतनी अधिक तपस्या न कर ले कि उनका सिंहासन ही छीन ले। वे अप्सराओं को भेजकर उनकी तपस्या भंग करवा देते थे। जैसाकि उन्होंने मेनका नाम की अप्सरा को भेजकर विश्वामित्र की तपस्या भंग करवा दी थी| यह साधु पुरुषों के काम नहीं हैं। वे युद्ध प्रिय भी थे। वे अपने बज्र का प्रयोग शत्रुओं के खिलाफ करते रहते थे, लेकिन अब क्या हो सकता था, उन्होंने अपने वचन को रखने के लिए इन्द्र को मधु विद्या सिखा दी, लेकिन उनके छलपूर्वक वायदा करा लेने से क्षुब्ध होकर क्रोध में यह भी कह डाला कि जिनके हृदय में भिन्न-भिन्न प्रकार की इच्छाएं भरी पड़ी हैं, जिनका मन स्वादिष्ट भोजन, सुन्दर वस्त्र तथा मनोरंजन के साधनों को पाने की लालसा में खोया हुआ है वह श्रेष्ठतम विद्या को पाने के पश्चात् भी कुछ नहीं कर सकता। ऐसा व्यक्ति चाहे स्वर्ग का  राजा देवराज इन्द्र हो या संसार का एक निकृष्ट कुत्ता दोनों में कोई अंतर नहीं है। इसलिए भोगों के रास्तों को छोड़कर कल्याण के रास्ते को अपनाइए। सन्मार्ग पर चलिए, अच्छे गुणों को अपनाइए, दूसरों के हित में अपने जीवन को लगा दीजिए। देवराज को यह सुनकर कि महर्षि ने उनकी तुलना एक कुत्ते से की है, बड़ा क्रोध आया, लेकिन यह सोचकर कि उन्होंने उन्हें मधु विद्या भी सिखाई है तथा इस अर्थ में वे उनके गरु हैं. अपने क्रोध को पी गए और बोले- “अब यदि आपने इस विद्या को किसी और को सिखाया तो आपका सिर धड़ से अलग हो जाएगा।” महर्षि ने चुपचाप इस शाप को सुन लिया और इंद्र के जाने के पश्चात् अपनी नियमित जीवन प्रणाली में लग गए। उनके मन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उनका मन स्थिर व शांत रहा।  कुछ दिनों बाद वैदिक काल के प्रसिद्ध वैद्य अश्विनी कुमार, जो दो जुड़वा भाई थे, उनके पास आए और बोले- “ऋषिवर! हमारा सारा जीवन परोपकार के लिए है, हमने न जाने कितने पीड़ित व्यक्तियों के कष्टों को दूर किया है, हमारे इलाज से पंगु व्यक्ति चलने लगे हैं, अंधों को दिखाई देने लगा है तथा हमने अनेक दुर्बल तथा रोगी व्यक्तियों को सबल तथा निरोगी किया है। दूसरों के कष्टों को दूर करने के सिवाय हमारी और कोई इच्छा नहीं है। हम किसी को भी कष्ट में नहीं देख सकते, उसे सताने की तो बात ही दूर है। इसलिए हम ज्ञान प्राप्त करने के सच्चे अधिकारी हैं, सुपात्र हैं, कृपा करके हमें मधु विद्या का रहस्य समझाइए, हम आपके सदा ऋणी रहेंगे।”  अश्विनी कुमारों की बात सुनकर महर्षि के मन में फिर उलझन पैदा हो गई। उन्होंने सोचा कि यदि वे अधिकारी व्यक्ति को ज्ञान प्रदान नहीं करते तो यह नैतिक अपराध होगा और यदि उपदेश देते हैं तो उनका सिर धड़ से अलग हो जाएगा। क्या करें और क्या न करें। आखिर परिणाम की चिंता किए बिना उन्होंने ज्ञान देने का ही निश्चय किया। हाँ, उन्होंने अपनी समस्या अश्विनी कुमारों के सामने रखी।  महर्षि की समस्या जान कर अश्विनी कुमार बोले- “भगवन्, इसका हल हमारे पास है, हम संजीवनी विद्या जानते हैं जिससे मरे हुए व्यक्ति को भी जीवित कर सकते हैं। हम आपका सिर अलग करके सुरक्षित रख देंगे तथा एक घोड़े का सिर आपको लगा देंगे। आप उस घोड़े के सिर से हमें मधु विद्या का उपदेश दीजिए। जब आपका घोड़े का सिर देवराज इंद्र के अभिशाप से अलग हो जाएगा तब हम आपके असली सिर को आपके धड़ के साथ जोड़ देंगे और आपको मरने नहीं देंगे।” यही हुआ, महर्षि दध्यड आथर्वण ने मधु विद्या का उपदेश अश्विनी कुमारों को दिया और उसके देते ही उनका घोड़े का सिर अलग हो गया। तब अश्विनी कुमारों ने पुनः असली सिर को उनके धड़ से जोड़ दिया और वे जीवित हो उठे। इसी बीच देवराज इंद्र को भी अपनी भूल का अहसास हो गया। वे बहुत पछताए कि जिस महान् व्यक्ति ने मुझे ऐसा ऊंचा ज्ञान दिया उसी को मैंने शाप दे दिया। उन्होंने कोई गलत बात नहीं कही थी, वास्तव में मेरा हृदय उन सभी दुर्गुणों से भरा हुआ है, जो उन्होंने बताए थे। वे शीघ्र महर्षि के पास उपस्थित हुए और अपने अपराध की क्षमा मांगने लगे।  महर्षि बोले- “देवेन्द्र! मेरे हृदय में आपके प्रति कोई क्रोध नहीं है। मैंने तो आपके आग्रह तथा वचन के अनुसार आपको मधु विद्या सिखाई थी। आपने जो कुछ भी कहा अथवा किया, उसे मैं भूल चुका हूँ। आपके हृदय में अभिमान है, इसलिए आप ज्ञान प्राप्त करके भी उससे लाभ नहीं उठा सकते। ज्ञानवान व्यक्ति के लिए  विनम्र होना आवश्यक है। मैंने आपकी परीक्षा लेने के लिए ही कड़वी बातें कही थी और आप उसमें असफल रहे। अब आपने भूल का पश्चात्ताप कर लिया है, इसलिए आप अपराधी नहीं हैं। मेरे घोड़े का सिर एक जलाशय में

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प्राचीन कथा-राजा हरिश्चंद्र की कथा

सर्यवंश में त्रिशंक नाम के एक प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट थे, जिन्हें भगवान विश्वामित्र ने अपने योगबल से सशरीर स्वर्ग भेजने का प्रयत्न किया था। महाराज हरिश्चन्द्र उन्हीं त्रिशंकु के पुत्र थे। ये बड़े ही धर्मात्मा, सत्यपरायण तथा प्रसिद्ध दानी थे। इनके राज्य में प्रजा बड़ी सुखी थी और दुर्भिक्ष, महामारी आदि उपद्रव कभी नहीं होते थे। महाराज हरिश्चन्द्र का यश तीनों लोकों में फैला हुआ था। भगवान नारद के मुख से इनकी प्रशंसा सुनकर देवराज इन्द्र ईर्ष्या से जल उठे और उनकी परीक्षा के लिए महर्षि विश्वामित्र से प्रार्थना की। इन्द्र की प्रार्थना पर प्रसन्न होकर महर्षि परीक्षा लेने को तैयार हो गए। विश्वामित्र अयोध्या पहुंचे। राजा हरिश्चन्द्र से बातों-ही-बातों में उन्होंने समस्त राज्य दान रूप में ले लिया। महाराज हरिश्चन्द्र ही भूमण्डल के एकछत्र राजा थे। दान दिए हुए राज्य (भूमण्डल) का उपभोग करना उन जैसे सत्यवादी के लिए उचित न था। अब समस्या उत्पन्न हुई कि वे कहां रहें?  उन दिनों काशी ही एक ऐसा स्थान था जिस पर किसी मनुष्य का अधिकार नहीं समझा जाता था। वे रानी शैव्या और पुत्र रोहिताश्व के साथ काशी की तरफ चल पड़े। जाते समय मुनि ने राजा से कहा कि बिना दक्षिणा के यज्ञ, दान और जप-तप आदि सब निष्फल होते हैं अत: आप इस बड़े भारी दान को सफल बनाने के लिए मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्राएं दक्षिणास्वरूप दीजिए।  मगर महाराज के पास अब रह ही क्या गया था? उन्होंने इसके लिए एक मास की अवधि मांगी। विश्वामित्र ने प्रसन्नतापूर्वक एक मास का समय दे दिया।  महाराज हरिश्चन्द्र काशी पहुंचे और शैव्या तथा रोहिताश्व को एक ब्राह्मण के हाथ बेचकर स्वयं एक चाण्डाल के यहां बिक गए। क्योंकि इसके सिवा अन्य कोई उपाय भी न था। इस प्रकार मुनि के ऋण से मुक्त होकर राजा हरिश्चन्द्र अपने स्वामी के यहां रहकर काम करने लगे।  उनका स्वामी श्मशान का मालिक था। उसने इन्हें श्मशान में रहकर मर्दो के कफन लेने का काम सौंपा। इस प्रकार राजा बड़ी सावधानी से स्वामी का काम करते हुए श्मशान में ही रहने लगे।  इधर रानी शैव्या ब्राह्मण के घर रहकर उसके बर्तन साफ करती, घर में झाड़ू -बहारू देती और कुमार पुष्प-वाटिका से ब्राह्मण के देवपूजन के लिए पुष्प लाता। राजसुख भोगे हुए और कभी कठिन काम करने का अभ्यास न होने के कारण रानी शैव्या और कुमार रोहिताश्व का शरीर अत्यन्त परिश्रम के कारण इतना सुख गया कि उन्हें पहचानना कठिन हो गया। इसी बीच, एक दिन जबकि कुमार पुष्पचयन चयन कर रहा था, एक पुष्पलता के भीतर से एक काले विषधर ने उसे डस लिया। कुमार का मृत शरीर जमीन पर गिर पड़ा। जब शैव्या को यह खबर मिली को वह अपने स्वामी के कार्य से निपटकर विलाप करती हुई पुत्र के शव के पास गई और उसे लेकर दाह के लिए श्मशान पहुंची। महारानी पुत्र के शव को जलाना ही चाहती थी कि हरिश्चन्द्र ने आकर उससे कफन मांगा। पहले तो दम्पति ने एक दुसरे को पहचाना ही नहीं, परन्तु दुख के कारण शैव्या के रोने-चीखने से राजा ने रानी और पुत्र को पहचान लिया। यहां पर हरिश्चन्द्र की तीसरी बार कठिन परीक्षा हुई। शैव्या के पास रोहिताश्व के कफन के लिए कोई कपड़ा नहीं था। परन्तु राजा ने रानी के गिड़गिडाने की कोई परवाह नहीं की। वे पिता के भाव से पुत्रशोक से कितने ही दुखी क्यों न हों, पर यहां तो वे पिता नहीं थे। वे तो श्मशान के स्वामी कनाकर थे और उनकी आज्ञा बिना किसी भी शव को कफन लिए बिना जलाने देना पाप था। राजा अपने धर्म से जरा भी विचलित नहीं हुए। जब राना ने को किसी तरह मानते नहीं देखा तो वह अपनी साड़ी के दो टुकरे करके कफन के रूप में देने को तैयार हो गई। रानी ज्यों ही साड़ी के दो टुकरे करके तैयार हई कि वहां भगवान नारायण एवं महर्षि विश्वामित्र सहित ब्रह्मादि देवगणआ उपस्थित हए और कहने लगे कि हम तुम्हारी धर्मपालन की दृढ़ता से अत्यन प्रसन्न हैं, तम तीनों सदेह स्वर्ग में जाकर अनन्त काल तक स्वर्ग के  दिव्य भोगो को भोगो|  इधर, इन्द्र ने रोहिताश्व के मृत शरीर पर अमृत की वर्षा करके उसे जीवित कर दिया। कुमार सोकर उठे हुए की भांति उठ खड़े हुए। हरिश्चन्द्र ने समस्त देवगणों से कहा कि जब तक मैं अपने स्वामी से आज्ञा न ले लूं तब तक यहां से कैसे हट सकता हूं।  इस पर धर्मराज ने कहा- “राजन! तुम्हारी परीक्षा के लिए मैंने ही चाण्डाल रूप धारण किया था। तुम अपनी परीक्षा में पूर्णत: उत्तीर्ण हो गए। अब तुम सहर्ष स्वर्ग जा सकते हो।”  महाराज हरिश्चन्द्र ने कहा-“महाराज ! मेरे विरह में मेरी प्रजा अयोध्या में व्याकुल हो रही होगी। उनको छोड़कर मैं अकेला कैसे स्वर्ग जा सकता हूं? यदि आप मेरी प्रजा को भी मेरे साथ स्वर्ग भेजने को तैयार हों तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, अन्यथा उनके बिना मैं स्वर्ग में रहने का कतई इच्छुक नहीं हूं।”  इन्द्र बोले-“महराज ! उन सबके कर्म तो अलग-अलग हैं, वे सब एक साथ कैसे स्वर्ग जा सकते हैं?”  यह सुनकर हरिश्चन्द्र ने कहा-“मुझे आप मेरे जिन कर्मों के कारण अनन्त काल के लिए स्वर्ग भेजना चाहते हैं उन कर्मों का फल आप सबको समान रूप से बांट दें, फिर उनके साथ स्वर्ग का क्षणिक सुख भी मेरे लिए सुखकर होगा। किन्तु उनके बिना मैं अनन्त काल के लिए भी स्वर्ग में रहना नहीं चाहता।” उनके विचार जानकर देवराज प्रसन्न हो गए और उन्होंने ‘तथास्तु’ कह दिया। सब देवगण महाराज हरिश्चन्द्र एवं शैव्या तथा रोहिताश्व को आशीर्वाद एवं नाना प्रकार के वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। भगवान नारायण देव ने भी उन्हें अपनी अचल भक्ति देकर कृतार्थ कर दिया।  राजा हरिश्चन्द्र का वरदान मिलने के कारण सभी अयोध्यावासी अपने स्त्री पुत्र एवं भृत्यों सहित सदेह स्वर्ग चले गए। पीछे से विश्वामित्र ने अयोध्या नगरी को फिर से बसाया और कुमार रोहित को अयोध्या के राजसिंहासन पर बिठाकर उसे समस्त भूमण्डल का एकछत्र अधिपति बना दिया। 

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पौराणिक कथाएं-गयासुर की कथा 

वैदिक काल में ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे तो असुर कुल में ‘गय’ का जन्म हुआ, पर उसमें आसुरी वृत्ति नहीं थी। वह परम वैष्णव तथा दैवज्ञ था। वेद संहिताओं में जिन असुरों का नाम आया है, उसमें गय प्रमुख है।  एक बार उसकी इच्छा हुई कि वह अच्छे कार्य कर इतना पुण्यात्मा हो जाए कि लोग उसके दर्शन करके ही सब पापों से मुक्त हो जाएं तथा मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्ग में स्थान मिले। ऐसा विचार कर उसने कोलाहल पर्वत पर समाधि लगाकर भगवान विष्णु की तपस्या करनी प्रारंभ की। वर्ष पर वर्ष बीतते गए, उसकी तपस्या चलती रही।  उसके कठोर तप से प्रभावित होकर भगवान विष्णु प्रगट हुए और गय की समाधि भंग करते हुए कहा-“महात्मन गय, उठो! तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। किस उद्देश्य के लिए इतना कठोर तप किया? अपना इच्छित वर मांगो।” गय ने आंखें खोली तो देखा, सामने चतुर्भुज भगवान विष्णु खड़े हैं। गय ने चरणों में दण्डवत प्रणाम कर कहा-“भगवन! आपके चतुर्भुज रूप का दर्शन कर मेरे सब पाप दूर हो गए। मुझे ऐसा लगता है कि आप इसी रूप में मेरे अन्दर समा गए हैं। अब तो यही इच्छा है, आप इसी रूप में मेरे शरीर में वास करें तथा जो मुझे देखे, उसे मेरे बहाने आपके दर्शन का पुण्य मिले तथा उसके सभी पाप नष्ट हो जाएं और वह इतना पुण्यात्मा हो जाए कि मृत्यु के बाद उस जीव को स्वर्ग में स्थान मिले। मेरे इस तप का फल उन सबको प्राप्त हो जो मेरे माध्यम से आपके अप्रत्यक्ष दर्शन करें।” गय की इस सार्वजनिक कल्याण-भावना से भगवान विष्णु बहुत प्रभावित हुए और हाथ उठाकर बोले-‘तथास्तु!” ऐसा कहते ही भगवान अन्तर्धान हो गए।  अब गय एक स्थान पर न बैठकर सर्वत्र घूम-घूम कर लोगों से मिलता। फलस्वरूप जो भी उसे देखता, उसके पापों का क्षय हो जाता और वह मरणोपरान्त स्वर्ग का अधिकारी हो जाता।  इससे यमराज की व्यवस्था में व्यवधान आ गया। अब किसी के कर्मफल का लेखा-जोखा वे क्या रखें, जब गय के दर्शन होते ही उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वह स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है तो फिर नरक दूतों का क्या कार्य रहा।  उन्होंने ब्रह्मा जी के सामने यह समस्या रखी। ब्रह्मा जी ने कहा-“ठीक है, इसका कुछ उपाय करते हैं। कर्मफल का विधान बना रहना चाहिए। हम इसके शरीर पर एक यज्ञ का आयोजन करते हैं तथा मैं और अन्य सारे देवता इसकी पीठ पर पत्थर रखकर, उस पर बैठकर उसे अचल कर देंगे। फिर यह कहीं आ-जा न सकेगा।” गय की पीठ पर यज्ञ हो, यह तो और पुण्य का काम है, गय ने ब्रह्मा के इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। ब्रह्मा जी यमराज सहित सारे देवताओं को लेकर, पत्थर से दबाकर उस पर बैठ गए। अपने ऊपर इतना भार होने पर भी गय अचल नहीं हुआ। देवगणों को चिन्ता हुई तो ब्रह्मा ने कहा-‘इसे भगवान विष्णु ने वरदान दिया है, इसलिए हम विष्णु जी की शक्ति का आह्वान करें तथा उन्हें भी इस शिला पर अपने साथ बैठाएं, तब यह अचल होगा।”  ब्रह्मा समेत सब देवों ने विष्णु का आह्वान किया तथा अपनी और यमराज की समस्या बताई। विष्णु इस पर विचार कर जब सबके साथ उस पर बैठे तब कहीं जाकर वह अचल हुआ।  विष्णु को अपने ऊपर आकर बैठे देखकर उसने देवताओं से कहा-“आप सब तथा भगवान विष्णु की मर्यादा के लिए मैं अब अचल होता हूं तथा घूमकर लोगों को दर्शन देकर जो उनका पाप क्षय करता था, उस कार्य को समाप्त करता है। पर आप सबके इस प्रयास से भी भगवान विष्णु का यह वरदान व्यर्थ सही जाएगा। भगवन, अब आप मुझे पत्थर-शिला के रूप में परिवर्तित कर यहीं अचल रूप से स्थापित कर दें।”  गय का यह मर्यादित त्याग देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हो उठे और बोले-गय! तुम्हारा यह त्याग व्यर्थ नहीं जाएगा। इस अवस्था में भी तुम्हारी कोई इच्छा हो तो वह कहो, मैं उसे पूर्ण करूंगा।”  गय ने कहा-“नारायण ! मेरी इच्छा है कि आप इन सभी देवताओं के साथ अपरोक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मरणोपरान्त धार्मिक कृत्य के लिए तीर्थस्थल बन जाए। जो व्यक्ति यहां अपने पितरों का श्राद्ध करें, तर्पण-पिण्ड दान आदि करें, उन मृतात्माओं को नरक की पीड़ा से मुक्ति मिले। यह सारा क्षेत्र ऐसी ही पुण्य-भूमि बन जाए।”  विष्णु ने कहा-“गय! तुम धन्य हो! तुमने अपने जीवन में भी जन कल्याण के लिए ऐसा ही वर मांगा और अब मरण-अवस्था में मृत आत्माओं की मुक्ति के लिए भी ऐसा ही वर मांग रहे हो। तुम्हारी इस जन-कल्याण भावना से हम सब बंध गए। ऐसा ही होगा। इस क्षेत्र का नाम तुम्हारे नाम गयासुर के अर्धभाग ‘गया’ से विख्यात होगा। इस क्षेत्र में आने वाले तथा इस शिला के दर्शन कर यहां श्राद्ध तर्पण-पिण्ड दान करने वालों के पूर्वजों को जीवन में जाने-अनजाने किए गए पाप कर्मों से मुक्ति मिलेगी। यहां स्थित पर्वत ‘गयशिर’ कहलाएगा। गयशिर पर्वत की परिक्रमा, फल्गू नदी में स्नान तथा इस शिला का दर्शन करने पर पितरों का तो कल्याण होगा ही, जो यहां इस उद्देश्य से आएगा, उसके पुण्य में भी श्रीवृद्धि होगी।” भगवान विष्णु से ऐसा वर पाकर गय संतुष्ट होकर शान्त हो गया। बिहार प्रदेश में स्थित ‘गया’ पितरों के श्राद्ध पिण्ड-दान का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। यहां स्थित विष्णु मंदिर के पृष्ठ भाग में पत्थर की एक अचल शिला आज भी स्थित है।  जो जन-कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनका यश ऐसे ही चिरकाल तक स्थायी तथा स्थिर होता है। जो केवल अपने लिए न जीकर समष्टि के लिए जीते हैं, उनका जन्म-मरण दोनों सार्थक होता है। 

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