पौराणिक कथाएं-गयासुर की कथा 

वैदिक काल में ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे तो असुर कुल में ‘गय’ का जन्म हुआ, पर उसमें आसुरी वृत्ति नहीं थी। वह परम वैष्णव तथा दैवज्ञ था। वेद संहिताओं में जिन असुरों का नाम आया है, उसमें गय प्रमुख है।  एक बार उसकी इच्छा हुई कि वह अच्छे कार्य कर इतना पुण्यात्मा हो जाए कि लोग उसके दर्शन करके ही सब पापों से मुक्त हो जाएं तथा मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्ग में स्थान मिले। ऐसा विचार कर उसने कोलाहल पर्वत पर समाधि लगाकर भगवान विष्णु की तपस्या करनी प्रारंभ की। वर्ष पर वर्ष बीतते गए, उसकी तपस्या चलती रही।  उसके कठोर तप से प्रभावित होकर भगवान विष्णु प्रगट हुए और गय की समाधि भंग करते हुए कहा-“महात्मन गय, उठो! तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। किस उद्देश्य के लिए इतना कठोर तप किया? अपना इच्छित वर मांगो।” गय ने आंखें खोली तो देखा, सामने चतुर्भुज भगवान विष्णु खड़े हैं। गय ने चरणों में दण्डवत प्रणाम कर कहा-“भगवन! आपके चतुर्भुज रूप का दर्शन कर मेरे सब पाप दूर हो गए। मुझे ऐसा लगता है कि आप इसी रूप में मेरे अन्दर समा गए हैं। अब तो यही इच्छा है, आप इसी रूप में मेरे शरीर में वास करें तथा जो मुझे देखे, उसे मेरे बहाने आपके दर्शन का पुण्य मिले तथा उसके सभी पाप नष्ट हो जाएं और वह इतना पुण्यात्मा हो जाए कि मृत्यु के बाद उस जीव को स्वर्ग में स्थान मिले। मेरे इस तप का फल उन सबको प्राप्त हो जो मेरे माध्यम से आपके अप्रत्यक्ष दर्शन करें।” गय की इस सार्वजनिक कल्याण-भावना से भगवान विष्णु बहुत प्रभावित हुए और हाथ उठाकर बोले-‘तथास्तु!” ऐसा कहते ही भगवान अन्तर्धान हो गए।  अब गय एक स्थान पर न बैठकर सर्वत्र घूम-घूम कर लोगों से मिलता। फलस्वरूप जो भी उसे देखता, उसके पापों का क्षय हो जाता और वह मरणोपरान्त स्वर्ग का अधिकारी हो जाता।  इससे यमराज की व्यवस्था में व्यवधान आ गया। अब किसी के कर्मफल का लेखा-जोखा वे क्या रखें, जब गय के दर्शन होते ही उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वह स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है तो फिर नरक दूतों का क्या कार्य रहा।  उन्होंने ब्रह्मा जी के सामने यह समस्या रखी। ब्रह्मा जी ने कहा-“ठीक है, इसका कुछ उपाय करते हैं। कर्मफल का विधान बना रहना चाहिए। हम इसके शरीर पर एक यज्ञ का आयोजन करते हैं तथा मैं और अन्य सारे देवता इसकी पीठ पर पत्थर रखकर, उस पर बैठकर उसे अचल कर देंगे। फिर यह कहीं आ-जा न सकेगा।” गय की पीठ पर यज्ञ हो, यह तो और पुण्य का काम है, गय ने ब्रह्मा के इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। ब्रह्मा जी यमराज सहित सारे देवताओं को लेकर, पत्थर से दबाकर उस पर बैठ गए। अपने ऊपर इतना भार होने पर भी गय अचल नहीं हुआ। देवगणों को चिन्ता हुई तो ब्रह्मा ने कहा-‘इसे भगवान विष्णु ने वरदान दिया है, इसलिए हम विष्णु जी की शक्ति का आह्वान करें तथा उन्हें भी इस शिला पर अपने साथ बैठाएं, तब यह अचल होगा।”  ब्रह्मा समेत सब देवों ने विष्णु का आह्वान किया तथा अपनी और यमराज की समस्या बताई। विष्णु इस पर विचार कर जब सबके साथ उस पर बैठे तब कहीं जाकर वह अचल हुआ।  विष्णु को अपने ऊपर आकर बैठे देखकर उसने देवताओं से कहा-“आप सब तथा भगवान विष्णु की मर्यादा के लिए मैं अब अचल होता हूं तथा घूमकर लोगों को दर्शन देकर जो उनका पाप क्षय करता था, उस कार्य को समाप्त करता है। पर आप सबके इस प्रयास से भी भगवान विष्णु का यह वरदान व्यर्थ सही जाएगा। भगवन, अब आप मुझे पत्थर-शिला के रूप में परिवर्तित कर यहीं अचल रूप से स्थापित कर दें।”  गय का यह मर्यादित त्याग देखकर भगवान विष्णु प्रसन्न हो उठे और बोले-गय! तुम्हारा यह त्याग व्यर्थ नहीं जाएगा। इस अवस्था में भी तुम्हारी कोई इच्छा हो तो वह कहो, मैं उसे पूर्ण करूंगा।”  गय ने कहा-“नारायण ! मेरी इच्छा है कि आप इन सभी देवताओं के साथ अपरोक्ष रूप से इसी शिला पर विराजमान रहें और यह स्थान मरणोपरान्त धार्मिक कृत्य के लिए तीर्थस्थल बन जाए। जो व्यक्ति यहां अपने पितरों का श्राद्ध करें, तर्पण-पिण्ड दान आदि करें, उन मृतात्माओं को नरक की पीड़ा से मुक्ति मिले। यह सारा क्षेत्र ऐसी ही पुण्य-भूमि बन जाए।”  विष्णु ने कहा-“गय! तुम धन्य हो! तुमने अपने जीवन में भी जन कल्याण के लिए ऐसा ही वर मांगा और अब मरण-अवस्था में मृत आत्माओं की मुक्ति के लिए भी ऐसा ही वर मांग रहे हो। तुम्हारी इस जन-कल्याण भावना से हम सब बंध गए। ऐसा ही होगा। इस क्षेत्र का नाम तुम्हारे नाम गयासुर के अर्धभाग ‘गया’ से विख्यात होगा। इस क्षेत्र में आने वाले तथा इस शिला के दर्शन कर यहां श्राद्ध तर्पण-पिण्ड दान करने वालों के पूर्वजों को जीवन में जाने-अनजाने किए गए पाप कर्मों से मुक्ति मिलेगी। यहां स्थित पर्वत ‘गयशिर’ कहलाएगा। गयशिर पर्वत की परिक्रमा, फल्गू नदी में स्नान तथा इस शिला का दर्शन करने पर पितरों का तो कल्याण होगा ही, जो यहां इस उद्देश्य से आएगा, उसके पुण्य में भी श्रीवृद्धि होगी।” भगवान विष्णु से ऐसा वर पाकर गय संतुष्ट होकर शान्त हो गया। बिहार प्रदेश में स्थित ‘गया’ पितरों के श्राद्ध पिण्ड-दान का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। यहां स्थित विष्णु मंदिर के पृष्ठ भाग में पत्थर की एक अचल शिला आज भी स्थित है।  जो जन-कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं, उनका यश ऐसे ही चिरकाल तक स्थायी तथा स्थिर होता है। जो केवल अपने लिए न जीकर समष्टि के लिए जीते हैं, उनका जन्म-मरण दोनों सार्थक होता है। 

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भारत के विभिन्न राज्यों में दशहरा और विजयादशमी कैसे मनाया जाता है

भारत के विभिन्न राज्यों में दशहरा और विजयादशम कैसे मनाया जाता है विजयादशमी का पर्व हमारे लिए ढेर सारी खुशियां लेकर आता है। इसका धार्मिक महत्त्व तो है ही, साथ ही इस दिन हमारा मनोरंजन भी खूब होता है। मेला देखने का आनंद मिलता है। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। रावण तेज आवाज के साथ धूं-धूं कर जलता है, जैसे वह अट्टहास कर रहा हो। यह भी कहा जाता है कि रावण जलने के साथ ही असत्य पर सत्य की विजय होती है। दस पाप यानी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी की प्रवत्ति का नाश हो जाता है।  विजयादशमी को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाता है। कहीं इसे दशहरा कहते हैं तो कहीं विजयादशमी। इसी पर्व को बिजोया, आयुध पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। कहा जाता है कि भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसे बहुत खुशी होती है। इस खुशी में वह जश्न मनाता है।  धार्मिक मान्यता  यह भी कहा जाता है कि इस पर्व को भगवती के विजया नाम पर भी विजयादशमी कहते हैं। इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुंचे थे, इसलिए भी इस पर्व को विजयादशमी कहा जाता है। अयोध्या में इसका विशेष उत्सव होता है। वहां दुर्गापूजा के बजाय रामलीला का विशेष आयोजन होता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।  ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। महाभारत में दुर्योधन ने पांडवों को जुएं में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुन: बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहां नौकरी कर ली थी।  जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।  विभिन्न प्रांतों में दशहरे का जश्न  दशहरा पर्व पूरे देश में मनाया जाता है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि मनाने का तरीका सब जगह अलग है। हर इलाके के लोग अपनी संस्कृति एवं परंपरा के अनुरूप इस पर्व को मनाते हैं। लेकिन इस पर्व के केंद्र में खुशहाली ही होती है।  हिमाचल का दशहरा  हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा प्रसिद्ध है। यहां दस दिन अथवा एक सप्ताह पूर्व इस पर्व की तैयारी आरंभ हो जाती है। महिला व पुरुष तुरही, बिगुल, ढोल, नगाड़े, बांसुरी आदि लेकर बाहर निकलते हैं। पहाड़ी इलाके के लोग अपने ग्रामीण देवता का धूमधाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक नटी नृत्य करते हैं। इस प्रकार जुलूस बनाकर नगर के मुख्य भागों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा निराली होती है।  पंजाब का दशहरा  पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं। इस दौरान यहां आगंतुकों का स्वागत पारंपरिक मिठाई और उपहारों से किया जाता है। यहां भी रावण-दहन के आयोजन होते हैं व मैदानों में मेले लगते हैं।  उत्तर प्रदेश का दशहरा  उत्तर प्रदेश में दशहरा बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। अयोध्या में पूरे माहभर का विशेष उत्सव होता है। इसी तरह बनारस के पास स्थित रामनगर में रामलीला होती है। यहां की रामलीला देश ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है। यही वजह है कि बनारस पूरे नौ दिन तक विदेशी पर्यटकों से भरा रहता है। उत्तर प्रदेश के हर गली एवं गांव में नवरात्र के पहले दिन घट स्थापना की जाती है। मंदिरों के साथ ही कुछ लोग अपने घरों में भी आकर्षक पंडाल बनाते हैं, जिसमें दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय की मूर्ति स्थापित की जाती है। नौ दिन तक पूजा अर्चना के बाद मूर्ति को नदियों में विसर्जित किया जाता है। दसवें दिन दशहरा मेला लगता है। इस दिन रावण का पुतला दहन किया जाता है।  यही वजह है कि बनारस पूरे नौ दिन तक विदेशी पर्यटकों से भरा रहता है। उत्तर प्रदेश के हर गली एवं गांव में नवरात्र के पहले दिन घट स्थापना की जाती है। मंदिरों के साथ ही कुछ लोग अपने घरों में भी आकर्षक पंडाल बनाते हैं, जिसमें दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय की मूर्ति स्थापित की जाती है। नौ दिन तक पूजा अर्चना के बाद मूर्ति को नदियों में विसर्जित किया जाता है। दसवें दिन दशहरा मेला लगता है। इस दिन रावण का पुतला दहन किया जाता है।  बिहार एवं झारखंड का दशहरा  बिहार एवं झारखंड में भी उत्तर प्रदेश की तरह ही दशहरा मनाया जाता है। यहां भी नौ दिन तक देवी उपासना होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां रावण के पुतला दहन का चलन कम है।  छत्तीसगढ़ का दशहरा  छत्तीसगढ़ में दशहरा धूमधाम से मनाया जाता है। राज्य के हर गांव में दशहरा को लेकर नवरात्र के पहले दिन से ही तैयारी शुरू हो जाती है, लेकिन बस्तर का दशहरा प्रसिद्ध है। यहां दशहरे को राम की रावण पर विजय पाने के रूप में नहीं मनाया जाता है। बल्कि यहां के लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित

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पौराणिक कहानियां-अर्जुन और उर्वशी कथा

पाण्डव वनवास का जीवन व्यतीत कर रहे थे। भगवान व्यास की प्रेरणा से अर्जुन अपने भाइयों की आज्ञा लेकर तपस्या करने गए। तप करके उन्होंने भगवान शंकर को प्रसन्न किया, आशुतोष ने उन्हें अपना पाशुपतास्त्र प्रदान किया। इसके अनन्तर देवराज इन्द्र अपने रथ में बैठाकर अर्जुन को स्वर्गलोक ले गए। इन्द्र ने तथा अन्य लोकपालों ने भी अपने दिव्यास्त्र अर्जुन को दिए।  उन दिव्यास्त्रों को लेकर अर्जुन ने देवताओं के शत्रु निवातकवच नामक असुरगणों पर आक्रमण कर दिया। देवता भी उन असुरों पर विजय पाने में असमर्थ रहे थे, उन असुरों के बार-बार आक्रमण से देवता संत्रस्त हो रहे थे। अर्जुन ने युद्ध में असुरों को पराजित कर दिया। उनके गाण्डीव (धनुष) से छूटे बाणों की मार से व्याकुल होकर असुर भाग खड़े हुए और पाताल लोक चले गए।  असुर-विजयी अर्जुन जब अमरावती लौटे, तब देवताओं ने बड़े उल्लास से उनका स्वागत किया। देवसभा सजाई गई। देवराज इन्द्र अर्जुन को साथ लेकर अपने सिंहासन पर बैठे। गन्धर्वगण वीणा बजाने लगे। स्वर्ग की श्रेष्ठतम अप्सराएं एक-एक करके नृत्य करने लगीं। देवराज किसी भी प्रकार अर्जुन को सन्तुष्ट करना चाहते थे। वह ध्यान से अर्जुन की ओर देख रहे थे कि उनकी अरुचि और आकर्षण का पता लगा सकें।  अप्सराएं अपनी समस्त कला प्रकट करके देवताओं तथा देवराज के परमप्रिय अतिथि को रिझा लेना चाहती थीं।  देवप्रतिहारी एक नृत्य समाप्त होने पर दूसरी अप्सरा का नाम लेकर परिचय देती और देवसभा एक नवीन झंकृति से झूम उठती। परन्तु जिस अर्जुन के स्वागत में यह सब हो रहा था, वे मस्तक झुकाए, नेत्र नीचे किए शान्त बैठे थे। स्वर्ग के इस वैभव में उन्हें अपने वल्कल पहने, फूल-मूल खाकर भूमि शयन करने वाले वनवासी भाई स्मरण आ रहे थे। उन्हें तनिक भी आकर्षण नहीं जान पडता था अमरावती में।  सहसा देवप्रतिहारी ने उर्वशी का नाम लिया। अर्जुन का सिर ऊपर उठा। देवसभा में उपस्थित होकर नृत्य करती उर्वशी को उन्होंने कई बार देखा। सहस्र लोचन इन्द्र ने यह बात लक्षित कर ली। महोत्सव समाप्त होने पर देवराज ने गन्धर्वराज चित्रसेन को अपने पास बुलाकर कहा-“उर्वशी के पास जाकर मेरी यह आज्ञा सूचित कर दो कि आज रात्रि में वे अर्जुन की सेवा में पधारें। अर्जन हम सबके परम प्रिय हैं। उन्हें आज वे अवश्य प्रसन्न करें।”  उर्वशी स्वयं अर्जुन पर अनुरक्त हो चुकी थी। चित्रसेन के द्वारा जब उसे देवराज का आदेश मिला, तो उसने उसे बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार किया। उस दिन उसने अपने को इतना सजाया जितना वह अधिक-से-अधिक सजा सकती थी। रात्रि में भरपूर शृंगार करके वह अर्जुन के निवास स्थान पर पहुंची।  अर्जुन उर्वशी को देखते ही शय्या से उठकर खड़े हो गए। दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और बोले-“माता! आप इस समय कैसे पधारी? मैं आपकी क्या सेवा करूं?”  उर्वशी तो अर्जुन के सम्बोधन से ही भौचक्की रह गई। उसने स्पष्ट बतलाया कि वह स्वयं उन पर आसक्त है और देवराज का भी उसे आदेश मिला है। उसने प्रार्थना की कि अर्जुन उसे स्वीकार करें। लेकिन अर्जुन ने स्थिर भाव से कहा “आप मुझसे ऐसी अनुचित बात फिर न कहें। आप ही कुरुकुल की जननी हैं, यह बात मैंने ऋषियों से सुन रखी थी। आज देवसभा में जब प्रतिहारी ने आपका नाम लिया, तब मुझे आपका दर्शन करने की इच्छा हुई। मैंने अपने कुल की माता समझकर अनेक बार आपके सुन्दर चरणों के दर्शन किए। लगता है कि इसी से देवराज को मेरे सम्बन्ध में कुछ भ्रम हो गया।”  उर्वशी ने समझाया-“पार्थ! यह धरा नहीं है, स्वर्ग है। हम अप्सराएं न किसी की माता हैं, न बहन, न पत्नी ही। स्वर्ग में आया हुआ प्रत्येक प्राणी अपने पुण्य के अनुसार हमारा उपभोग कर सकता है। तुम मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लो।”  रात्रि का एकान्त समय था और पर्याप्त श्रृंगार किए स्वर्ग की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी प्रार्थना कर रही थी, किन्तु धर्मज्ञ अर्जुन के चित्त को कामदेव स्पर्श भी नहीं कर सका। उन्होंने उसी प्रकार हाथ जोड़कर प्रार्थना की-“जिस प्रकार कुन्ती मेरी माता हैं, जिस प्रकार माद्री मेरी माता हैं, जिस प्रकार इन्द्राणी शचीदेवी मेरी माता हैं, उसी प्रकार आपको भी मैं अपनी माता समझता हूं। आप मुझे अपना पुत्र मानकर मुझ पर अनुग्रह करें।”  उर्वशी की ऐसी उपेक्षा तो कभी किसी ऋषि ने भी नहीं की थी। उसे इसमें अपने सौन्दर्य का अपमान प्रतीत हुआ। उस कामातुर ने क्रोध में आकर शाप दिया-“तुमने नपुंसक के समान मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, इसलिए हिजड़े बनकर स्त्रियों के बीच नाचते-गाते हुए तुम्हें एक वर्ष रहना पड़ेगा।”  शाप देकर उर्वशी चली गई। अर्जुन भी उसे शाप देने में समर्थ थे और उन्हें अन्यायपूर्वक शाप दिया गया था, किन्तु उन्होंने उर्वशी को जाते समय भी मस्तक झुकाकर प्रणाम ही किया।  प्रात:काल देवराज को सब बातें ज्ञात हुईं। अर्जुन के संयम पर प्रसन्न होकर वे बोले-“धनंजय! धर्म का पालन करने वाले पर कभी विपत्ति नहीं आती। यदि कोई विपत्ति आती भी है तो वह उसका मंगल ही करती है। उर्वशी का शाप तुम्हारे लिए एक मानव वर्ष तक ही रहेगा और शाप के कारण वनवास के अन्तिम अज्ञातवास वाले एक वर्ष के समय में तुम्हें कोई पहचान नहीं सकेगा। तुम्हारे लिए यह शाप उस समय वरदान ही सिद्ध होगा।” 

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पौराणिक कथाएं-च्यवन ऋषि और सुकन्या कथा

प्राचीन काल में भृगु नाम के एक महान ऋषि हुए हैं। उनकी पत्नी का नाम था-पुलोमा ! एक बार जब ऋषि पत्नी पुलोमा गर्भवती थीं, तभी प्रमोला नाम का एक राक्षस शूकर (सूअर) का रूप धारण कर उन्हें जबरन उनके आश्रम से उठा ले गया। पुलोमा ने छूटने का प्रयास किया। अथक प्रयास के बाद वे उस राक्षस की पकड़ से छूट गई और बचने के लिए इधर-उधर दौड़ने लगीं। इसी प्रयास में उनका गर्भ च्यवित हो गया। तब उस च्यवित गर्भ से एक तेजस्वी बालक पैदा हुआ। उस बालक में इतना तेज था कि उसे देखकर राक्षस भस्म हो गया। आश्रम में लौटकर माता-पिता ने उस बालक का नाम रखा–च्यवन! आगे चलकर वे ही महर्षि च्यवन के नाम से प्रसिद्ध हुए।  भृगु के पुत्र च्यवन बड़े ही तपस्वी, तेजस्वी और ब्रह्मतेज सम्पन्न हुए। वे सदा तपस्या में ही लगे रहते थे। तपस्या करते-करते उनके शरीर के ऊपर दीमक लग गई थी और दीमक के एक टीले के नीचे वे दब गए थे, केवल उनकी दो आंखें दिखाई देती थीं। एक दिन महाराज शर्याति अपनी सेना सहित वहां पहुंचे। सैनिकों ने जंगल में डेरे डाल लिए, हाथी-घोड़े यथास्थान बांधे गए और सैनिक इधर-उधर घूमने-फिरने लगे। महाराज शर्याति की पुत्री सुकन्या अपनी सखियों सहित जंगल में घूमने लगी। घूमते-घूमते उसने एक टीला देखा। तभी टीले में से दो चमकती हुई आंखें दिखाई दीं। उत्सुकतावश वह अपनी सखियों के साथ टीले के पास आ गई और बाल्यकाल की चंचलता के कारण उसने उन दोनों आंखों में कांटा चुभो दिया। उनमें से रक्त की धारा बह निकली। सुकन्या डर गई और भागकर अपने डेरे में आ गई, उसने यह बात किसी से भी नहीं कही।  इधर, राजा की सेना में एक अपूर्व ही दृश्य दिखाई देने लगा, राजा की समस्त सेना का मल-मूत्र बन्द हो गया। राजा, मन्त्री, सेवक, सैनिक, घोड़े, हाथी, रानी, राजपुत्री सभी दुखी हो गए। राजा को बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने सबसे पूछा “यहां पर भगवान भार्गव-मुनि च्यवन का आश्रम है, तुम लोगों ने उनका कोई अनिष्ट तो नहीं किया है, किसी ने उनके आश्रम पर जाकर अपवित्रता या अशिष्टता तो नहीं की है?”  सभी ने कहा-“महाराज! हम तो उधर गए भी नहीं।”  तब डरते-डरते सुकन्या ने कहा-“पिताश्री! अज्ञानवश एक अपराध मुझसे गया है-दीमक के ढेर में दो जुगनू-से चमक रहे थे, मैंने उनमें कांटा चभो दिया था जिससे उनमें से रक्त की धारा बह निकली।”  महाराज सब समझ गए, वे पुरोहित और मन्त्री के साथ बड़ी दीनता से महर्षि च्यवन के आश्रम पर पहुंचे। उनकी विधिवत पूजा की और अज्ञान में अपनी कन्या के किए हुए अपराध की क्षमा मांगी। महाराज शर्याति ने हाथ जोड़कर कहा  “भगवन ! मेरी यह कन्या सरल है, सीधी है। इससे अनजाने में यह अपराध हो गया, अब मेरे लिए जो भी आज्ञा हो, कहें, मैं उसका सहर्ष पालन करूंगा।”  च्यवन मुनि बोले-“राजन ! यह अपराध अज्ञान में ही हुआ सही, किन्तु मै वृद्ध हूं, आंखें भी मेरी फूट गईं अत: तुम इस कन्या को ही मेरी सेवा करने के लिए छोड़ जाओ।”  महाराज ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। सुकन्या ने भी बड़ी इसे स्वीकार किया। सुकन्या का विवाह विधिवत च्यवन मुनि के साथ गया और राजा उसे समझाकर अपनी राजधानी को चले गए।  च्यवन मुनि का स्वभाव कुछ कड़ा था, किन्तु साध्वी सुकन्या दिन-रात सेवा करके उन्हें सदा सन्तुष्ट रखती थी।  एक बार देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार च्यवन मुनि के आश्रम पर च्यवन मुनि ने उनका विधिवत सत्कार किया। ऋषि के आतिथ्य को स्वीकार कर अश्विनीकुमारों ने कहा- “ब्रह्मन! हम आपका क्या उपकार करें?”  च्यवन मुनि ने कहा-“देवताओ! तुम सब कुछ कर सकते हो। तुम मेरी इस वृद्धावस्था को समाप्त कर मुझे युवावस्था प्रदान कर दो, इसके बदले मैं तम्हें यज्ञ में भाग दिलाऊंगा। अभी तक तुम्हें यज्ञों में भाग नहीं मिलता है।”  अश्विनीकुमारों ने ऋषि की आज्ञा मानकर एक सरोवर का निर्माण किया और बोले-“आप इसमें स्नान कीजिए।” ऋषि च्यवन ने वैसा ही किया। कुछ देर बाद सुकन्या ने तीन एक जैसे पुरुषों को तालाब से निकलते देखा। दरअसल पतिव्रता सुकन्या की परीक्षा लेने के लिए दोनों अश्वनीकुमारों ने भी अपने रूप वैसे ही बना लिए थे। तब सुकन्या ने अश्विनीकुमारों की बहुत प्रार्थना की कि मेरे पति को अलग कर दीजिए। सुकन्या की स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनीकुमार अंतर्धान हो गए और सुकन्या अपने परम सुन्दर रूपवान पति के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।  च्यवन ऋषि की वृद्धावस्था जाती रही, उन्हें आंखें फिर से प्राप्त हो गईं, उनका तपस्या से क्षीण जर्जर शरीर एकदम बदल गया। वे परम सुन्दर रूपवान युवा बन गए। एक दिन राजा अपनी कन्या को देखने आए। पहले तो वे ऋषि को न पहचानकर कन्या पर क्रुद्ध हुए। किन्तु जब उन्होंने सब वृत्तान्त सुना तो कन्या पर बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने ऋषि की चरणवन्दना की कि आपके तप के प्रभाव से हमारा वंश पावन हुआ। उन च्यवन ऋषि के पुत्र प्रमति हुए और प्रमति के रुरु ।  रुरु के शौनक हुए। ये सब भृगु वंश में उत्पन्न होने से भार्गव कहलाए।

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पौराणिक कहानियां-महर्षि दधीचि की कथा

एक बार की बात है, देवराज इन्द्र अपनी सभा में बैठे थे। उन्हें अभिमान आया कि हम तीनों लोकों के स्वामी हैं। ब्राह्मण हमें यज्ञ में आहति देते है हमारी उपासना करते हैं। फिर हम सामान्यं ब्राह्मण बृहस्पति जी से इतना क्यों डरले ह? उनके आने पर खडे क्यों हो जाते हैं, वे तो हमारी जीविका से पलते है सोचकर वे सिंहासन पर डटकर बैठ गए। भगवान बृहस्पति के आने पर न तो वे  स्वय उठे, न सभासदों को उठने दिया। देवगुरु बृहस्पति जी इन्द्र की यह देखकर लौट गए।  थोड़ी देर के बाद देवराज का मद उतर गया, उन्हें अपनी गलती मालुम हई। वे अपने कृत्य पर बड़ा पश्चाताप करने लगे, दौड़े-दौड़े गुरु के यहां आए कित गुरुजी नहीं मिले। वे तो कहीं अज्ञातवास में चले गए थे। निराश होकर इन्द्र लौर आए। गुरु के बिना यज्ञ कौन करावे, यज्ञ के बिना देवता शक्तिहीन होने लगे।  असुरों को यह बात मालूम हो गई, उन्होंने अपने गुरु शुक्राचार्य की सम्मति से देवताओं पर चढ़ाई कर दी।   इन्द्र को स्वर्ग छोड़कर भागना पड़ा, स्वर्ग पर असुरों का अधिकार हो गया। पराजित देवताओं को लेकर इन्द्र भगवान ब्रह्मा जी के पास गए, अपना सब हाल सुनाया। ब्रह्मा जी ने कहा-“त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को अपना पुरोहित बनाकर काम चलाओ।”  देवताओं ने ऐसा ही किया। विश्वरूप बड़े विद्वान, वेदज्ञ और सदाचारी थे किन्तु उनकी माता असुर कुल की थीं, इसीलिए ये देवताओं से छिपाकर कभी कभी असुरों को भी कुछ भाग दे देते थे। इससे असुरों के बल में भी वृद्धि होने लगी।  इन्द्र को जब इस बात का पता चला तो वह बहत क्रोधित हआ। एक दिन विश्वरूप एकांत में बैठे वेदाध्ययन कर रहे थे कि इन्द्र ने पीछे से जाकर उनका सिर काट लिया। इस पर उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लग गया। बहुत मान-मनोव्वल के बाद अन्ततः किसी प्रकार गुरु बृहस्पति जी प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञ आदि कराकर इन्द्र के सिर लगी ब्रह्महत्या को पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों में बांट दिया। इन्द्र का फिर से स्वर्ग पर अधिकार हो गया।  इधर, त्वष्टा ऋषि ने जब सुना कि इन्द्र ने मेरे पुत्र को मार दिया है, तो उन्हें बडा दुख हआ। अपने तप के प्रभाव से उन्होंने उसी समय इन्द्र को मारने की इच्छा से एक बड़े भारी बलवान वृत्रासुर को उत्पन्न किया। वृत्रासुर के पराक्रम से सम्पूर्ण अलोक्य भयभीत हो गया। उसके ऐसे पराक्रम को देखकर देवराज भी डर गए, वे दौडे-दौड़े ब्रह्माजी के पास गए। सब हाल सुनाकर उन्होंने ब्रह्माजी से वृत्रासुर के कोप से बचने का कोई उपाय पूछा।  ब्रह्माजी ने कहा-“देवराज ! तुम किसी प्रकार वृत्रासुर से बच नहीं सकते। वह बडा बली, तपस्वी और ईश्वर-भक्त है। उसे मारने का एक ही उपाय है कि नैमिषारण्य में एक महर्षि दधीचि तपस्या कर रहे हैं। उग्र तप के प्रभाव से उनकी हड़ियां वज्र से भी अधिक मजबूत हो गई हैं। यदि परोपकार की इच्छा से वह अपनी हड्डियां तुम्हें दे दें और उनसे तुम अपना वज्र बनाओ, उस वज्र से जब तुम वृत्रासुर पर प्रहार करोगे तो उसकी मृत्यु हो जाएगी।”  बह्माजी के सुझाव पर देवराज समस्त देवताओं के साथ नैमिषारण्य पहुंचे। उग्र तपस्या में लगे महर्षि दधीचि की उन्होंने भांति-भांति से स्तुति की| ऋषि ने उनसे वरदान मांगने के लिए कहा। इन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा की मंगलाकामना के निमित्त आप अपनी रीढ़ की हड्डी हमें दे दीजिए।”  महर्षि दधीचि ने कहा-“देवराज! समस्त देहधारियों को अपना पर प्यारा होता है, स्वेच्छा से इस शरीर को जीवित अवस्था में छोड़ना बडा कठिन होता है, किन्तु त्रैलोक्य की मंगलकामना के निमित्त मैं इस काम को भी करूंगा। मेरी इच्छा तीर्थ करने की थी।”  इन्द्र ने कहा-“ब्रह्मन ! समस्त तीर्थों को मैं यहीं बुलाए देता हूं।” यह कहकर देवराज ने समस्त तीर्थों को नैमिषारण्य में बुलाया। सभी ने ऋषि की स्तुति की। ऋषि ने सबमें, स्नान, आचमन आदि किया और वे समाधि में बैठ गए। तत्पश्चात एक जंगली गौ ने उनके शरीर को अपनी कांटेदार जीभ से चाटना आरम्भ किया। चाटते-चाटते चमड़ी उधड़ गई। तब इन्द्र ने उनकी तप से अभिमंत्रित रीढ़ की हड्डी निकाल ली, उससे एक महान शक्तिशाली तेजोमय दिव्य वज्र बनाया गया और उसी वज्र की सहायता से देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर को मारकर तीनों लोकों के संकट को दूर किया।  इस प्रकार एक महान परोपकारी ऋषि के अद्वितीय त्याग के कारण देवराज इन्द्र का कष्ट दूर हो गया और तीनों लोक सुखी हुए।  संसार के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत थोड़े मिलेंगे, जिनमें स्वेच्छा से केवल परोपकार के ही निमित्त किसी ने अपने शरीर को हंसते-हंसते एक याचक को सौंप दिया गया हो। इसलिए महर्षि दधीचि का यह त्याग परोपकारी संतों के लिए एक परम आदर्श है।  ऋषि दधीचि की महानता ही थी कि उन्होंने उस इन्द्र की रक्षार्थ अपनी अस्थि दान की, जिसने उनके साथ घोर अन्याय किया था। एक बार अश्विनीकुमारों को ब्रह्मविद्या का उपदेश देने के कारण इन्द्र ने इनका मस्तक उतार लिया था। फिर अश्विनीकुमारों ने इनके धड़ पर घोड़े का सिर चढ़ा दिया और इससे इनका नाम अश्वशिरा विख्यात हुआ था। जिस इन्द्र ने इनके साथ इतना दुष्ट बर्ताव किया था. उसी इन्द्र की महर्षि ने अपनी हड्डी देकर सहायता की। संतों की उदारता ऐसी ही होती है। वज्र बनने के बाद जो हड्डियां बची थीं, उन्हीं से शिवजी का पिनाक धनुष बना था। दधीचि ब्रह्मा जी के पुत्र अथर्वा ऋषि के पुत्र थे। चन्द्रभागा नदी तट पर इनका आश्रम था।

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पौराणिक कथा-शबरी की कथा 

प्राचीन समय की बात है। पांचाल देश का राजकुमार सिंहकेतु एक दिन अपने सेवकों को साथ लेकर वन में शिकार खेलने गया। उसके सेवको में से शबर नामक एक सेवक को शिकार की खोज में इधर-उधर घूमते हुए एक टूटा-फूटा शिवालय दिखाई पडा। उसके चबूतरे पर एक शिवलिङ्ग पड़ा था, जो टूटकर जलहरी से सर्वथा अलग हो गया था। शबर ने उसे मूर्तिमान सौभाग्य की तरह उठा लिया। वह राजकुमार के पास पहुंचा और उसे शिवलिङ्ग दिखलाकर विनयपूर्वक बोला-‘प्रभो ! देखिए, यह कैसा सुन्दर शिवलिङ्ग है। आप यदि कृपा पूर्वक मुझे पूजा की विधि बता दें तो मैं नित्य इसकी पूजा किया करूं।”  निषाद के इस प्रकार पूछने पर राजकुमार ने प्रेम-पूर्वक पूजा की विधि बतला दी। षोडशोपचार पूजन के अतिरिक्त उसने चिता भस्म चढ़ाने की बात भी बतलाई। अब शबर प्रतिदिन स्नान करके चन्दन, अक्षत, वन के नए-नए पत्र, पुष्प, फल, धूप, दीप, नृत्य, गीत, वाद्य के द्वारा भगवान महेश्वर का पूजन करने लगा। वह प्रतिदिन चिताभस्म भी अवश्य भेंट करता। तत्पश्चात वह स्वयं प्रसाद ग्रहण करता। इस प्रकार श्रद्धालु शबर पत्नी के साथ भक्तिपूर्वक भगवान शंकर की आराधना में तल्लीन हो गया।  एक दिन जब शबर पूजा के लिए बैठा तो देखा कि पात्र मे चिताभस्म तनिक भी शेष नहीं है। उसने बड़े प्रयत्न से इधर-उधर ढूढा, पर उसे कहीं भी चिताभस्म नहीं मिली। तब उसने अपनी पत्नी से चिताभस्म के बारे में पूछा। साथ ही उसने यह भी कहा कि ‘यदि चिताभस्म नहीं मिली तो पजा के बिना में अब क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता।’  उसकी पत्नी ने उसे चिन्तित देखकर कहा-“नाथ! घबराइए मत। एक उपाय है। यह घर तो पूराना हो ही गया है। मैं इसमें आग लगाकर उसी में प्रवेश कर जाती हूं। इससे आपकी पूजा के निमित्त पर्याप्त चिताभस्म तैयार हो जाएगी।” बहुत वाद-विवाद के बाद शबर भी उसके प्रस्ताव से सहमत हो गया। शबरी ने स्वामी की आज्ञा पाकर स्नान किया और उस घर में आग लगाकर अग्नि की तीन बार पारिक्रमा की, पति को नमस्कार किया और सदाशिव भगवान का हृदय में ध्यान करती हुई अग्नि में घुस गई। वह क्षण भर में जलकर भस्म हो गई। फिर शबर ने उस भस्म से भगवान भूतनाथ की पूजा की।  शबर को कोई विषाद तो था नहीं। स्वभाववशात पूजा के बाद वह प्रसाद देने के लिए अपनी स्त्री को पुकारने लगा। स्मरण करते ही वह स्त्री तुरंत आकर खड़ी हो गई। अब शबर को उसके जलने की बात याद आई। आश्चर्यचकित होकर उसने पूछा, “तुम और यह मकान तो सब जल गए थे, फिर यह सब कैसे हुआ?”  शबरी ने कहा-“आग में मैं घुसी तो मुझे लगा कि जैसे मैं जल में घुसी हूं। आधे क्षण तक तो मुझे प्रगाढ़ निद्रा-सी विदित हुई और अब जागी हूं। जगने पर देखती हूं तो यह घर भी पूर्ववत खड़ा है। अब प्रसाद के लिए यहां आई हूं।”  निषाद-दम्पति इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि उनके सामने एक दिव्य विमान आ गया। उस पर भगवान के चार गुण थे। उन्होंने ज्यों ही उन्हें स्पर्श किया और विमान पर बैठाया, उनके शरीर दिव्य हो गए। वास्तव में श्रद्धायुक्त भगवान की आराधना का ऐसा ही माहात्म्य है। 

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पौराणिक कथाएं-अश्वपति की कथा

राजर्षि अश्वपति कैकय देश के अधिपति थे। वे बड़े ज्ञानी और वैश्य विद्या के उपासक थे। उनके राज्य में बड़ी शान्ति थी। प्रजा अपने सम्राट का सम्मान करती थी।  उन्हीं दिनों पांच विद्वान ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे। प्राचीनशाल,सत्ययज, इन्द्रद्युम्न, जन और बुडिल नाम के उन पांच गृहस्थ वेदों ने यह कि किया कि आरुणि उद्दालक के पास चलें और उनसे वैश्वानर-विद्या सीखें।  वे उद्दालक के पास पहुंचे, किन्तु उद्दालक स्वयं भी ब्रह्म विद्या नहीं जानते  थे।  तब उन्होंने सोचा कि मैं इस विद्या का पूर्णत: ज्ञान नहीं रखता और न कर ही सकता है, इसलिए इस विद्या में प्रवीण विद्वान अश्वपति के पास चलना चाहिए।  अत: आरुणि आदि सब मिलकर अश्वपति के पास गए। राजा ने पृथक पृथक सबकी पूजा की और बड़ी श्रद्धा-भक्ति से उनका स्वागत-सत्कार किया। वे लोग बड़े आनन्द से वहां ठहर गए। दूसरे दिन प्रात:काल आकर अश्वपति ने उन ऋषियों से प्रार्थना की कि मैं एक यज्ञ करना चाहता हूं, आप लोग मेरे ऋत्विक बनकर यहां रहें और उतनी ही दक्षिणा आप लोग पृथक-पृथक होकर ग्रहण करें।  वे लोग यज्ञ कराने या दक्षिणा लेने के लिए नहीं आए थे। उनके आने का उद्देश्य तो वैश्वानरोपासना का ज्ञान प्राप्त करना था। यदि वे इस पौरोहित्य और दक्षिणा के प्रलोभन में पड़कर अपना उद्देश्य भूल जाते तो उन्हें वास्तविक ज्ञान की उपलब्धि कैसे होती? उन्होंने इस बात को विघ्न समझकर अस्वीकार कर दिया।  अश्वपति ने सोचा कि राजा का स्थान बड़ा ही विषम है, सम्भव है, मेरे राज्य में बड़े बड़े पाप होते हों। प्रजा के पापों का भागी राजा ही तो होता है-ऐसा सोचकर ही इन लोगों ने मेरे यज्ञ में दक्षिणा ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया है। अत: उनके मन से यह शंका दूर कर देने के लिए उन्होंने अपनी सफाई पेश की। वे बोले  “मेरे राज्य में न चोर है, न लोभी है, न शराबी है, न यशहीन है, न मूर्ख है और न व्यभिचारी या व्यभिचारिणी ही है। इसलिए आप लोग यजमान बनना स्वीकार करें।”  उन लोगों ने कहा-“राजन ! मनुष्य जिन उद्देश्यों को लेकर कहीं जाता है उन्हीं की पूर्णता चाहता है। हम लोग इस समय धन या सम्मान के लिए नहीं आए हैं. हम तो वैश्वानर उपासना ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। इसलिए आप कृपा करके उसी का वर्णन करें।”  यह सुनकर राजा ने कहा-“कल प्रात:काल मैं इस विद्या का वर्णन करूंगा।” दूसरे दिन प्रातःकाल ही वे सब हाथ में समिधा (हवन सामग्री) लेकर बड़ी नम्रता के साथ राजा के पास उपस्थित हुए और राजा ने एक-एक करके सबकी उपासना पूछो। सबने अपनी-अपनी की हुई उपासना का वर्णन किया। सबकी एकाकी उपासना सुनकर अश्वपति ने बतलाया कि ‘ब्रह्म विद्या के एक-एक अंग की उपासना करने के कारण ही आप लोग प्रजा, पशु, धन आदि सांसारिक सम्पत्तियों से युक्त हैं। परन्तु इस अधूरी उपासना के कारण आप लोगों का बड़ा अनिष्ट हो सकता था। बड़ा अच्छा हुआ, आप लोग मेरे पास आ गए।’ आप लोगों को वैश्वानर-आत्मा की पृथक-पृथक उपासना नहीं करनी चाहिए, वह तो सारे लोकों में, सारे प्राणियों में और सारी आत्माओं में भोक्ता के रूप में विद्यमान है। वही सब कुछ है। उसके अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है। इसके पश्चात राजा ने नित्य अग्निहोत्र अथवा प्रतिदिन की वैश्वानर-पूजा पद्धति उन्हें बतलाई।  उन्होंने कहा-“वैश्वानर आत्मा को जानने वाला जो पुरुष प्रतिदिन भोजन के समय जो अन्न प्राप्त हो उसके पांच ग्रास लेकर ‘ॐ प्राणाय स्वाहा’, ‘ॐ व्यानाय स्वाहा’, ‘ॐ अपानाय स्वाहा’, ‘ॐ समानाय स्वाहा’, ‘ॐ उदानाय स्वाहा’, इन मन्त्रों से पांच आहुतियां देकर अपने उदरस्थ वैश्वानर का अग्निहोत्र करता है, वह सारे लोकों, सम्पूर्ण प्राणियों और समस्त आत्माओं को तृप्त करता है। जैसे मूंज की रुई आग लगते ही भस्म हो जाती है, वैसे ही इस उपासना को करने वालों के समस्त पाप जल जाते हैं। जैसे भूखे बच्चे अपनी माता की प्रतीक्षा किया करते हैं, वैसे ही संसार के समस्त प्राणी इस नित्य अग्निहोत्र की प्रतीक्षा किया करते हैं और इन आहुतियों को पाकर सन्तुष्ट होते हैं।”  इस प्रकार अश्वपति से ज्ञानदक्षिणा प्राप्त करके वे लोग लौट गए और महाराज अश्वपति पूर्ववत ज्ञान में स्थित होकर प्रजापालन करने लगे। 

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पौराणिक प्रेम कथा-शकुंतला और दुष्यंत की प्रेम कथा

शकुंतला और दुष्यंत की प्रेम कथा -महाराज दुष्यंत एक दिन आखेट करने के लिए वन में गए। वहां एक मृग का पीछा करते हुए महर्षि कण्व के आश्रम के निकट जा पहुंचे। दुष्यंत थके हुए थे। उन्हें प्यास भी लगी हुई थी, अतः उन्होंने अपने घोड़े को आश्रम की ओर मोड़ दिया।  आश्रम में पहुंचे तो महर्षि के शिष्यों ने उनका भावभीना स्वागत किया। उन्हें सम्मानपूर्वक बैठाया, तभी दुष्यंत की निगाह वल्कल पहने सखियों के साथ लताओं को सींचती हुई शकुंतला पर पड़ी। उसका अपूर्व सौंदर्य देखकर दुष्यंत मुग्ध हो उठे।  अतिथि को आश्रम में आया देखकर शकुंतला ने पौधों को सींचना बंद कर दिया। वह एक पात्र में जल भरकर लाई और राजा के समीप आकर विनयपूर्वक बोली-‘यह पाद-प्रक्षालन के लिए जल और ये कुछ कंद और फल हैं। कृपया आचमन करके इन्हें स्वीकार करें। मेरे पिता महर्षि कण्व तो इस समय आश्रम में नहीं हैं। किसी ग्रहशांति के लिए वे सोमतीर्थ गए हैं।’ राजा दुष्यंत ने आतिथ्य ग्रहण किया, तदुपरांत उन्होंने कहा-‘देवी! वैसे पुरुवंशियों का चित्त अधर्म की ओर कभी प्रवृत्त नहीं होता, पर न जाने क्यों तुम्हें देखकर मेरा मन विचलित हो रहा है। तुम-मुनि कन्या तो नहीं जान पड़तीं, फिर तुम कौन हो? कृपया अपना परिचय दो?’  आपने ठीक समझा है, राजन!’ शकुंतला बोली-‘मैं महर्षि विश्वामित्र की पुत्री हं। मेरी माता मेनका ने उत्पन्न होते ही मेरा त्याग कर दिया था। नदी किनारे शकत पक्षी मेरे ऊपर छाया करके मुझे घेरे हुए थे। संयोगवश उसी समय महर्षि कण्व उधर से गुजरे। उन्होंने मुझे देखा तो दया करके उठा लाए। उन पक्षियों के कारण ही मेरा नाम शकुंतला रखा गया। महर्षि ने बड़े स्नेह से मेरा लालन-पालन किया। अब मैं उन्हीं को अपना पिता मानती हूं।’ शकुंतला ने अपना परिचय दिया। सनकर महाराज दुष्यंत आश्चर्य से उसका चेहरा देखने लगे। शकुंतला ने आगे कहा-‘आप हमारे अतिथि हैं। बताइए, मैं आपकी क्या सेवा करूं?’  ‘शकंतला, तुम राजर्षि के कुल में उत्पन्न हुई हो।’ महाराज दुष्यंत बोले-‘मेरा मन तुम्हें देखकर तुम्हारी ओर आकर्षित हो गया है। मुझे स्वीकार करो और मेरे विशाल साम्राज्य की महारानी बनो।’ दुष्यंत ने मधुर स्वर में अनुनय की।   ‘महाराज! मैं स्वाधीन नहीं हूं। मेरे पिता को आने दीजिए। आप उनसे ही यह प्रार्थना कीजिए।’ शकुंतला ने लजाते हुए कहा।  ‘राजकन्याएं स्वयं ही अपने पति का चयन किया करती हैं। महर्षि कण्व मेरे इस विचार से असंतुष्ट नहीं होंगे।’ दुष्यंत प्रतीक्षा करने को तैयार न थे। शकुंतला का हृदय भी दुष्यंत की ओर आकर्षित हो चुका था और जिसे हृदय दिया जा चुका हो, वह तो उसका हो ही गया, उसकी हर आज्ञा का पालन करना चाहिए। ऐसा सोचकर शकुंतला ने राजा का अनुरोध स्वीकार कर लिया। राजा ने उसी समय शकुंतला से गंधर्व-रीति से विवाह कर लिया। फिर कुछ दिन आश्रम में रहकर और शकुंतला को अपनी मुद्रिका देकर तथा शीघ्र ही उससे विधिवत विवाह करके राजमहल में बुलाने का वचन देकर वह अपने नगर को चले गए।  एक दिन शकुंतला अपने पति के ध्यान में निमग्न बैठी हुई थी, तभी महर्षि दुर्वासा वहां पहुंच गए। शकुंतला को उनके आगमन का पता ही नहीं चला। शकुंतला के ऐसे व्यवहार पर मुनि को क्रोध आ गया। उन्होंने उसे शाप दे दिया कि जिसके ध्यान में तू मेरे स्वागत-सत्कार को भी नहीं उठी, वह तुझे भूल जाएगा। सखियों ने शाप सुना। उन्होंने ऋषि से मनुहार की, उनका उचित स्वागत-सत्कार किया, तो किसी प्रकार से दुर्वासा मान गए। उन्होंने शाप का परिहार किया कि किसी चिह्न के दिखलाने पर महाराज को शकुंतला का स्मरण हो जाएगा। शकुंतला इस घटना से अनभिज्ञ ही रही। कुछ दिन के बाद महर्षि कण्व अपने आश्रम में लौटे। उन्हें शकुंतला की सखियों से शकुंतला और राजा दुष्यंत के विषय में सब कुछ ज्ञात हुआ। इससे उन्हें प्रसन्नता हुई। उन्होंने विवाहिता कन्या को अपने आश्रम में रखना उचित नहीं समझा। उनका अनुमान था कि महाराज अपनी राजकीय व्यवस्थाओं में फंसकर शकुंतला के विषय में भूल गए हैं, तब उन्होंने अपने दो शिष्यों के साथ शकुंतला को राजा के पास भेजा। दोनों शिष्य शकुंतला को लेकर राजधानी में पहुंचे। राजदरबार में उन्होंने महाराज दुष्यंत से साक्षात्कार किया और राजा को आशीर्वाद देकर अपने आने का उद्देश्य बताया।  महर्षि कण्व के शिष्यों ने कहा-‘राजन! महर्षि कण्व ने आपकी मंगल कामना की है। उन्होंने कहा है कि मेरी पुत्री शकुंतला, जिसके साथ आपने आश्रम में गंधर्व-विधि के साथ विवाह किया था, मैं उसे आपके पास भेज रहा हूं। ऋषि ने यह भी कहा है कि राजकार्यों की व्यस्तता के कारण आपका उसे भूल जाना अस्वाभाविक नहीं।  अब आप अपनी धर्मपत्नी को स्वीकार करें और हमें आश्रम लौटने की आज्ञा दें।’  मुझे तो कुछ भी स्मरण नहीं है कि मैंने कभी किसी आश्रम की कन्या के साथ विवाह किया था।’ शिष्यों की बात सुनकर राजा दुष्यंत आश्चर्य से बोले-‘आप लोग क्या कह रहे हैं, मेरी समझ में कुछ नहीं आता।’ दुर्वासा के शाप के कारण राजा दुष्यंत सब कुछ भूल गए थे।  ‘राजन! तब क्या आपने मुझे भ्रष्ट करने के लिए ही वे मुधर बातें की थीं? एक नरेश होकर भी एक कन्या का सतीत्व भंग कर उसके साथ गंधर्व-विधि से विवाह करके आप अपने वचन से मुकर रहे हैं। ऐसा कहते हुए आपको लज्जा भी नहीं आई। और पुत्र अपने पिता, पितामह को नरक से मुक्त करता है और मैं आपके द्वारा ही गर्भ से हूं। आप अब इस प्रकार के निष्ठुर वचन क्यों बोल रहे हैं?’ शकुंतला पर महाराज के वचनों से जैसे वज्रपात हुआ था। किसी प्रकार धैर्य धारण करके उसने रोते हुए कहा।  तुम व्यर्थ ही मुझे कलंकित कर रही हो। मुझे स्मरण तक नहीं कि मैंने तुम्हें पहले कभी देखा भी है। महारानी बनने के लोभ में यदि तुम ऐसा कर रही हो, तो यह सब व्यर्थ है। पुरुवंशी पराई स्त्री की तरफ कभी भूलकर भी नहीं देखते।’ महाराज ने कठोरतापूर्वक उत्तर दिया।  आपने अपने प्रेम के चिह्न स्वरूप मुझे यह मुद्रिका दी थी। कहते हुए शकुंतला ने अपनी उंगली से मुद्रिका उतारनी चाही, लेकिन यह जानकर वह सन्न रह गई कि उसकी उंगली में राजा की दी हुई अंगूठी नहीं थी। मार्ग में गंगा में आचमन करते समय वह न जाने किस तरह उसकी उंगली से निकल गई थी।  ‘चुप क्यों हो गईं,

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यमराज-नचिकेता संवाद (Yamraj-Nachiketa Samwad)

 हमारे धर्म ग्रंथो में मृत्यु के देव यमराज से जुड़े दो ऐसे प्रसंग आते है जब यमराज को इंसान के हठ के आगे मजबूर होना पड़ा था। पहला प्रसंग सावित्री से सम्बंधित है, जहाँ यमराज को सावित्री के हठ पर मजबूर होकर उसके पति सत्यवान को पुनः जीवित करना पड़ा। जबकि दूसरा प्रसंग एक बालक नचिकेता से सम्बंधित है, जहाँ यमराज को एक बालक की जिद के आगे मजबूर होकर उसे मृत्यु से जुड़े गूढ़ रहस्य बताने पढ़े। हम आपको यमराज और सावित्री के प्रसंग के बारे में पहले बता चुके है। आज हम जानेंगे यमराज और नचिकेता से जुड़े प्रसंग को और उनके बीच हुए संवाद को। यमराज-नचिकेता प्रसंग | Yamraj Nachiketa Prasang इस प्रसंग का वर्णन हिन्दू धर्मग्रन्थ कठोपनिषद में मिलता है। इसके अनुसार नचिकेता वाजश्रवस (उद्दालक) ऋषि के पुत्र थे। एक बार उन्होंने विश्वजीत नामक ऐसा यज्ञ किया, जिसमें सब कुछ दान कर दिया जाता है। दान के वक्त नचिकेता यह देखकर बेचैन हुआ कि उनके पिता स्वस्थ गायों के बजाए कमजोर, बीमार गाएं दान कर रहें हैं। नचिकेता धार्मिक प्रवृत्ति का और बुद्धिमान था, वह तुरंत समझ गया कि मोह के कारण ही पिता ऐसा कर रहे हैं। पिता के मोह को दूर करने के लिए नचिकेता ने पिता से सवाल किया कि वे अपने पुत्र को किसे दान देंगे। उद्दालक ऋषि ने इस सवाल को टाला, लेकिन नचिकेता ने फिर यही प्रश्न पूछा। बार-बार यही पूछने पर ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने कह दिया कि तुझे मृत्यु (यमराज) को दान करुंगा। पिता के वाक्य से नचिकेता को दु:ख हुआ, लेकिन सत्य की रक्षा के लिए नचिकेता ने मृत्यु को दान करने का संकल्प भी पिता से पूरा करवा लिया। तब नचिकेता यमराज को खोजते हुए यमलोक पहुंच गया। यम के दरवाजे पर पहुंचने पर नचिकेता को पता चला कि यमराज वहां नहीं है, फिर भी उसने हार नहीं मानी और तीन दिन तक वहीं पर बिना खाए-पिए बैठा रहा। यम ने लौटने पर द्वारपाल से नचिकेता के बारे में जाना तो बालक की पितृभक्ति और कठोर संकल्प से वे बहुत खुश हुए। यमराज ने नचिकेता की पिता की आज्ञा के पालन और तीन दिन तक कठोर प्रण करने के लिए तीन वर मांगने के लिए कहा। तब नचिकेता ने पहला वर पिता का स्नेह मांगा। दूसरा अग्नि विद्या जानने के बारे में था। तीसरा वर मृत्यु रहस्य और आत्मज्ञान को लेकर था। यम ने आखिरी वर को टालने की भरपूर कोशिश की और नचिकेता को आत्मज्ञान के बदले कई सांसारिक सुख-सुविधाओं को देने का लालच दिया, लेकिन नचिकेता को मृत्यु का रहस्य जानना था। अत: नचिकेता ने सभी सुख-सुविधाओं को नाशवान जानते हुए नकार दिया। अंत में विवश होकर यमराज ने जन्म-मृत्यु से जुड़े रहस्य बताए। आइए अब हम जानते है की नचिकेता ने यमराज से क्या सवाल किये और यमराज ने उनका क्या उत्तर दिया। किस तरह शरीर से होता है ब्रह्म का ज्ञान व दर्शन? मनुष्य शरीर दो आंखं, दो कान, दो नाक के छिद्र, एक मुंह, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न के रूप में 11 दरवाजों वाले नगर की तरह है, जो ब्रह्म की नगरी ही है। वे मनुष्य के हृदय में रहते हैं। इस रहस्य को समझकर जो मनुष्य ध्यान और चिंतन करता है, उसे किसी प्रकार का दुख नहीं होता है। ऐसा ध्यान और चिंतन करने वाले लोग मृत्यु के बाद जन्म-मृत्यु के बंधन से भी मुक्त हो जाता है। क्या आत्मा मरती या मारती है?  जो लोग आत्मा को मारने वाला या मरने वाला मानते हैं, वे असल में आत्मा को नहीं जानते और भटके हुए हैं। उनकी बातों को नजरअंदाज करना चाहिए, क्योंकि आत्मा न मरती है, न किसी को मार सकती है। कैसे हृदय में माना जाता है परमात्मा का वास? मनुष्य का हृदय ब्रह्म को पाने का स्थान माना जाता है। यमदेव ने बताया मनुष्य ही परमात्मा को पाने का अधिकारी माना गया है। उसका हृदय अंगूठे की माप का होता है। इसलिए इसके अनुसार ही ब्रह्म को अंगूठे के आकार का पुकारा गया है और अपने हृदय में भगवान का वास मानने वाला व्यक्ति यह मानता है कि दूसरों के हृदय में भी ब्रह्म इसी तरह विराजमान है। इसलिए दूसरों की बुराई या घृणा से दूर रहना चाहिए। क्या है आत्मा का स्वरूप? यमदेव के अनुसार शरीर के नाश होने के साथ जीवात्मा का नाश नहीं होता। आत्मा का भोग-विलास, नाशवान, अनित्य और जड़ शरीर से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह अनन्त, अनादि और दोष रहित है। इसका कोई कारण है, न कोई कार्य यानी इसका न जन्म होता है, न मरती है। यदि कोई व्यक्ति आत्मा-परमात्मा के ज्ञान को नहीं जानता है तो उसे कैसे फल भोगना पड़ते हैं? जिस तरह बारिश का पानी एक ही होता है, लेकिन ऊंचे पहाड़ों पर बरसने से वह एक जगह नहीं रुकता और नीचे की ओर बहता है, कई प्रकार के रंग-रूप और गंध में बदलता है। उसी प्रकार एक ही परमात्मा से जन्म लेने वाले देव, असुर और मनुष्य भी भगवान को अलग-अलग मानते हैं और अलग मानकर ही पूजा करते हैं। बारिश के जल की तरह ही सुर-असुर कई योनियों में भटकते रहते हैं। कैसा है ब्रह्म का स्वरूप और वे कहां और कैसे प्रकट होते हैं? ब्रह्म प्राकृतिक गुणों से एकदम अलग हैं, वे स्वयं प्रकट होने वाले देवता हैं। इनका नाम वसु है। वे ही मेहमान बनकर हमारे घरों में आते हैं। यज्ञ में पवित्र अग्रि और उसमें आहुति देने वाले भी वसु देवता ही होते हैं। इसी तरह सभी मनुष्यों, श्रेष्ठ देवताओं, पितरों, आकाश और सत्य में स्थित होते हैं। जल में मछली हो या शंख, पृथ्वी पर पेड़-पौधे, अंकुर, अनाज, औषधि हो या पर्वतों में नदी, झरने और यज्ञ फल के तौर पर भी ब्रह्म ही प्रकट होते हैं। इस प्रकार ब्रह्म प्रत्यक्ष देव हैं। आत्मा निकलने के बाद शरीर में क्या रह जाता है? जब आत्मा शरीर से निकल जाती है तो उसके साथ प्राण और इन्द्रिय ज्ञान भी निकल जाता है। मृत शरीर में क्या बाकी रहता है, यह नजर तो कुछ नहीं आता, लेकिन वह परब्रह्म उस शरीर में रह जाता है, जो हर चेतन और जड़ प्राणी में विद्यमान हैं। मृत्यु के बाद आत्मा को क्यों और कौन सी योनियां मिलती हैं? यमदेव

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जब हनुमान जी के कोप से बचने के लिए शनि देव को बनना पड़ा स्त्री

गुजरात में भावनगर के सारंगपुर में हनुमान जी का एक अति प्राचीन मंदिर स्तिथ है जो की कष्टभंजन हनुमानजी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है की इस मंदिर में हनुमान जी के पैरों में स्त्री रूप में शनि देव बैठे है।सभी जानते हैं कि हनुमानजी स्त्रियों के प्रति विशेष आदर और सम्मान का भाव रखते हैं। ऐसे में उनके चरणों में किसी स्त्री का होना आश्यर्च की बात है। लेकिन इसका सम्बन्ध एक पौराणिक कथा से है जिसमें बताया गया है की आखिर क्यों शनिदेव को स्त्री का रूप धारण कर हनुमान जी के चरणों में आना पड़ा। आइए पहले पढ़ते है यह कथा फिर जानेंगे कष्टभंजन हनुमान मंदिर के बारे में। हमारे शास्त्रों में हनुमान जी और शनि देव से जुड़े अनेकों प्रसंग है जो बताते है की कैसे समय-समय पर हनुमान जी ने शनिदेव को ठीक किया। इनमे से ही एक प्रसंग यह है – प्राचीन मान्यताओं के अनुसार एक समय शनिदेव का प्रकोप काफी बढ़ गया था। शनि के कोप से आम जनता भयंकर कष्टों का सामना कर रही थी। ऐसे में लोगों ने हनुमानजी से प्रार्थना की कि वे शनिदेव के कोप को शांत करें। बजरंग बली अपने भक्तों के कष्टों को दूर करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और उस समय श्रद्धालुओं की प्रार्थना सुनकर वे शनि पर क्रोधित हो गए। जब शनिदेव को यह बात मालूम हुई कि हनुमानजी उन पर क्रोधित हैं और युद्ध करने के लिए उनकी ओर ही आ रहे हैं तो वे बहुत भयभीत हो गए। भयभीत शनिदेव ने हनुमानजी से बचने के लिए स्त्री रूप धारण कर लिया। शनिदेव जानते थे कि हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी हैं और वे स्त्रियों पर हाथ नहीं उठाते हैं। हनुमानजी शनिदेव के सामने पहुंच गए, शनि स्त्री रूप में थे। तब शनि ने हनुमानजी के चरणों में गिरकर क्षमा याचना की और भक्तों पर से शनि का प्रकोप हटा लिया। तभी से हनुमानजी के भक्तों पर शनिदेव की तिरछी नजर का प्रकोप नहीं होता है। शनि दोषों से मुक्ति हेतु कष्टभंजन हनुमानजी के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं।सारंगपुर में कष्टभंजन हनुमानजी के मंदिर का भवन काफी विशाल है। यह किसी किले के समान दिखाई देता है। मंदिर की सुंदरता और भव्यता देखते ही बनती है। कष्टभंजन हनुमानजी सोने के सिंहासन पर विराजमान हैं और उन्हें महाराजाधिराज के नाम से भी जाना जाता है। हनुमानजी की प्रतिमा के आसपास वानर सेना दिखाई देती है। यह मंदिर बहुत चमत्कारी है और यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। यदि कुंडली में शनि दोष हो तो वह भी कष्टभंजन के दर्शन से दूर हो जाता है। इस मंदिर में हनुमानजी की प्रतिमा बहुत ही आकर्षक है। मंदिर की स्वयं की वेबसाइट पर हनुमान जी के हर दिन के लाइव दर्शन की सुविधा उपलब्ध है।

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कब, क्यों और कैसे डूबी द्वारका?

श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है।  समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है।  एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण पुत्र सांब को दिया गया श्राप।  आइए इस घटना पर विस्तार से जानते है। गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप – महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप – महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा? ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी। ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप – महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा? ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी। इसके बाद द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे। प्रतिदिन आंधी चलने लगी। चूहे इतने बढ़ गए कि मार्गों पर मनुष्यों से ज्यादा दिखाई देने लगे। वे रात में सोए हुए मनुष्यों के बाल और नाखून कुतरकर खा जाया करते थे। सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की आवाज निकालने लगे। गायों के पेट से गधे, कुत्तियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी। अंधकवंशियों के हाथों मारे गए थे प्रद्युम्न – जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे। उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे। प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया। सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए। यदुवंशियों के नाश के बाद अर्जुन को बुलवाया था श्रीकृष्ण ने – अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)। उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मरने लगे। श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृत्यु हो गई। फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे। श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए। बलरामजी के स्वधाम गमन के बाद ये किया श्रीकृष्ण ने – द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं।

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Brahma Temple Story : क्यों है ब्रह्मा जी का पुरे भारत में एक मंदिर ?

हिन्दुओं में तीन प्रधान देव माने जाते है- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्मा इस संसार के रचनाकार है, विष्णु पालनहार है और महेश संहारक है। लेकिन हमारे देश में जहाँ विष्णु और महेश के अनगिनत मंदिर है वही खुद की पत्नी सावित्री के श्राप के चलते ब्रह्मा जी का पुरे भारत में एक मात्र मंदिर है जो की राजस्थान के प्रशिद्ध तीर्थ पुष्कर में स्तिथ है। आखिर क्यों दिया सावित्री ने अपने पति ब्रह्मा को ऐसा श्राप इसका वर्णन पद्म पुराण में मिलता है। पौराणिक कथा – पत्नी सावित्री ने ब्रह्मा जी को क्यों दिया था श्राप हिन्दू धर्मग्रन्थ पद्म पुराण के मुताबिक एक समयधरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसके बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर ब्रह्मा जी ने उसका वध किया। लेकिन वध करते वक़्त उनके हाथों से तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा, इन तीनों जगहों पर तीन झीलें बनी। इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा। इस घटना के बाद ब्रह्मा ने संसार की भलाई के लिए यहाँ एक यज्ञ करने का फैसला किया। ब्रह्मा जी यज्ञ करने हेतु पुष्कर पहुँच गए लेकिन किसी कारणवश सावित्री जी समय पर नहीं पहुँच सकी। यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनके साथ उनकी पत्नी का होना जरूरी था, लेकिन सावित्री जी के नहीं पहुँचने की वजह से उन्होंने गुर्जर समुदाय की एक कन्या ‘गायत्री’ से विवाह कर इस यज्ञ शुरू किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं।उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता लोग डर गए। उन्होंने उनसे विनती की कि अपना शाप वापस ले लीजिए। लेकिन उन्होंने नहीं लिया। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। कोई भी दूसरा आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा। भगवान विष्णु ने भी इस काम में ब्रह्मा जी की मदद की थी। इसलिए देवी सरस्वती ने विष्णु जी को भी श्राप दिया था कि उन्हें पत्नी से विरह का कष्ट सहन करना पड़ेगा। इसी कारण राम (भगवान विष्णु का मानव अवतार) को जन्म लेना पड़ा और 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी से अलग रहना पड़ा था। नहीं पता किसने बनवाया था ब्रह्मा जी के मंदिर का निर्माण कब हुआ व किसने किया इसका कोई उल्लेख नहीं है।  लेकिन ऐसा कहते है की आज से तकरीबन एक हजार दो सौ साल पहले अरण्व वंश के एक शासक को एक स्वप्न आया था कि इस जगह पर एक मंदिर है जिसके सही रख रखाव की जरूरत है। तब राजा ने इस मंदिर के पुराने ढांचे को दोबारा जीवित किया। सावित्री का भी है मंदिर पुष्कर में सावित्री का भी मंदिर है लेकिन वो ब्रह्मा जीके पास न होकर ब्रह्मा जी के मंदिर के पीछे एक पहाड़ी पर स्तिथ है जहाँ तक पहुंचने के लिए सैकड़ों सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। कार्तिक पूर्णिमा पर लगाता है पुष्कर मेला पुष्कर मेलाभगवान ब्रह्मा ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन यज्ञ किया था। यही कारण है कि हर साल अक्टूबर-नवंबर के बीच पड़ने वाले कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर मेला लगता है। मेला के दौरान ब्रह्मा जी के मंदिर में हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। इन दिनों में भगवान ब्रह्मा की पूजा करने से विशेष लाभ मिलता है।

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