विक्रम बेताल की कहानी: ज्यादा पापी कौन – बेताल पच्चीसी

बेताल के उड़ने के बाद दोबारा विक्रमादित्य शिंशपा वृक्ष की ओर दौड़े और पेड़ पर उल्टे लटके बेताल को कंधे पर लादकर चल पड़े। इसी बीच एक बार फिर बेताल ने राजा को एक नई कहानी सुनाते हुए कहा – बहुत समय पहले एक भोगवती नाम की नगरी हुआ करती थी। उस नगरी में राज रूपसेन का राज हुआ करता था। राजा को शादी करने का बड़ा मन था। एक दिन राजा ने अपने चिन्तामणि नाम के तोते से पूछा, “बताओ मेरी शादी किसके साथ होगी।” तोते ने कहा, “मगध की राजकुमारी चन्द्रवाती से।” राजा ने तोते की बात सुनने के बाद एक ज्योतिषी को बुलाकर यही सवाल पूछा। ज्योतिषी ने भी राजा को वही उत्तर दिया, जो तोते ने दिया था। मगध की राजकुमारी को भी अपने होने वाले वर के बारे में जानने का बड़ा मन था। राजकुमारी ने अपनी मैना मन्जरी से पूछा, “अरे! यह बताओ मेरा विवाह किसके साथ होगा।” मैना ने भी राजकुमारी को राजा रूपसेन से शादी होने की बात बताई। इतना सुनने के बाद दोनों नगर की तरफ से शादी का न्योता एक दूसरे को भेजा गया, जो स्वीकार हो गया। इस तरह राजा रूपसेन और राजकुमारी की शादी हो गई। शादी होने के बाद रानी अपने साथ मैना को भी लेकर आई। राजा ने अपने तोते से मन्जरी मैना की शादी करवा दी और दोनों को एक ही पिंजरे में रख दिया। एक दिन किसी बात को लेकर मैना और तोते के बीच में बहुत बहस होने लगी। मैना गुस्से में कहने लगी, “पुरुष पापी, धोखेबाज और अधर्मी होते हैं।” फिर गुस्साएं तोते ने कहा, “स्त्री लालची, झूठी और हत्यारी होती हैं।” दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ गया कि यह बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने दोनों से पूछा, “क्या हुआ, तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो।” मैना ने झट से कह दिया कि महाराज, आदमी बहुत बुरे होते हैं और फिर सीधे कहानी सुनाने लग गई। सालों पहले इलाहापुर नगरी में महाधन नाम का सेठ रहता था। उस सेठ के घर शादी के कई सालों बाद एक लड़का पैदा हुआ। महाधन सेठ ने उसका बड़े ही अच्छे से पालन-पोषण किया। अच्छे संस्कार मिलने के बाद भी सेठ का बेटा बड़ा होकर जुआ खेलने लगा। जुए की लत में वो सारा पैसा जुआ खेलते हुए हार गया। इसी बीच सेठ की मौत हो गई। जुए की लत की वजह से न तो लड़के के पास पैसे बचे और न पैसा कमाने वाला बाप, तो लड़का अपना नगर छोड़कर चन्द्रपुरी नगर पहुंच गया। नए नगर पहुंचकर लड़के की मुलाकात कर्ज देने वाले साहूकार हेमगुप्त से हुई। लड़के ने अपने पिता के बारे में साहूकार को बताया और एक झूठी कहानी उसको सुनाने लगा। उसने कहा कि वो जहाज लेकर बहुत बड़ा सौदा करके लौट रहा था। उसी समय समुद्र में इतना तेज तूफान आया कि उसका जहाज वहीं डूब गया और वो बच-बचाकर यहां पहुंचा है। इतना सुनते ही साहूकार ने उसे अपने घर में रहने की इजाजत दे दी। इसी बीच हेमगुप्त साहूकार को ख्याल आया कि सेठ का यह लड़का मेरी बेटी के लिए अच्छा वर साबित हो सकता है। तुरंत साहूकार ने अपनी बेटी की शादी सेठ के बेटे से करवा दी। शादी के कुछ दिन तक अपने दामाद का काफी सत्कार करने के बाद साहूकार ने अपनी बेटी को खूब सारा धन देकर विदा कर दिया। दोनों के साथ साहूकार ने एक दासी को भी भेजा। रास्ते में सेठ के बेटे ने अपनी पत्नी से कहा, “सारे गहने मुझे दे दो। यहां कई लुटेरे हैं।” उसकी पत्नी ने ऐसा ही किया। जेवर मिलते ही उसने दासी को मारकर कुएं में फेंक दिया और अपनी पत्नी को भी कुएं में धक्का दे दिया। लड़की जोर-जोर से रोने लगी। उसकी रोने की आवाज सुनकर एक राहगीर ने महिला को कुएं से निकाला। कुएं से निकलते ही वो अपने पिता के पास चली गई। उसने अपने साहूकार पिता को सच्चाई नहीं बताई, उसने कहा, “कुछ लुटेरे ने उन्हें लूट लिया और दासी को मार दिया।” साहूकार ने अपनी बेटी को दिलासा देते हुए कहा, “चिंता मत करो तुम्हारा पति जिंदा होगा और वो कभी-न-कभी जरूर लौटकर आ जाएगा।” उधर लड़का अपने नगर पहुंचकर दोबारा सारे पैसे और जेवरात जुए में हार जाता है। पैसे खत्म होने के बाद उसकी हालत बहुत बुरी हो गई। इससे परेशान लड़का दोबारा साहूकार के पास जाता है। वहां पहुंचते ही उसकी मुलाकात पत्नी से होती है। वो उसे देखकर बहुत खुश होती है और बताती है कि उस दिन जो कुछ भी हुआ उसने अपने पिता को नहीं बताया है। वो उस झूठी कहानी के बारे में अपने पति को बताती है। जैसे ही साहूकार अपने दामाद को घर में देखा तो उसने उसका स्वागत किया। कुछ दिन साहूकार के घर में रहने के बाद एक रात को मौका देखकर सेठ का बेटा अपनी पत्नी को मारकर उसके सारे जेवरात लेकर फरार हो जाता है। यह कहानी बताने के बाद मैना कहती है, “महाराज ये सब होते हुए मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है। यही वजह है मैं आदमियों को पापी कहती हूं।” मैना की कहानी सुनने के बाद राजा तोते से कहता है, “अब तुम बताओं स्त्रियों को बुरा क्यों कह रहे थे।” यह सुनते ही तोता भी कहानी सुनाने लग जाता है। वो बताता है कि एक समय वो कंचनपुर में सागरदत्त नाम सेठ के यहां रहता था। उसके बेटे का नाम श्रीदत्त था, जिसकी शादी पास के ही नगर श्रीविजयपुर के सेठ सोमदत्त की बेटी से हुई थी। शादी के बाद व्यापार करने के लिए लड़का परदेस चला गया। उसकी पत्नी जयश्री उसका इंतजार बेताबी से करती थी, लेकिन 12 साल गुजर गए, लेकिन वो परदेस से लौटकर नहीं आया। अपने पति का इंतजार करते हुए एक दिन महिला अपनी छत से एक पुरुष को आते हुए देखती है। वो उसे बेहद पसंद आता है। वो उसे अपनी सहेली के घर बुलाती है। वो उससे बात करती है और उससे रोज अपनी सहेली के घर मिलने को कहती है। अब श्रीदत्त की पत्नी जयश्री उस युवक से रोज मिलने लगी। ऐसा होते-होते कुछ महीने बीत गए। इसी बीच

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विक्रम बेताल की कहानी: बड़ा बलिदान किसका – बेताल पच्चीसी

हर बार की तरह राजा विक्रम फिर बेताल को पेड़ से नीचे उतारता है और पीठ पर लादकर उसे योगी के पास ले जाने के लिए चल देता है। ऐसे में एक बार फिर बेताल राजा विक्रम को बोलने पर विवश करने के लिए एक नई कहानी कहना शुरू करता है। कहानी है, राजा रूपसेन और अंगरक्षक वीरवर की। वर्धमान राज्य में रूपसेन नाम का एक राजा राज किया करता था। राजा बहुत ही साहसी, दयालु और न्यायप्रिय था। यही वजह थी कि केवल वर्धमान में ही नहीं बल्कि उसके राज्य से सटे सभी राज्यों में भी राजा रूपसेन के व्यक्तित्व की मिसाल दी जाती थी। एक दिन रूपसेन के दरबार में वीरवर नाम का एक व्यक्ति आया। जब राजा ने उसके आने की वजह पूछी तो वीरवर बोला, “मुझे नौकरी चाहिए और मैं अंगरक्षक के तौर पर आपकी सेवा करना चाहता हूं।” वीरवर की यह बात सुनकर राजा ने कहा, “ मैं तुम्हे अपना अंगरक्षक बना सकता हूं, लेकिन उसके लिए तुम्हें अपनी कार्यकुशलता सिद्ध करनी होगी। ताकि मैं यह तय कर सकूं कि तुम मेरे अंगरक्षक बनने के लायक हो भी या नहीं।” राजा की यह बात सुन वीरवर फौरन तैयार हो गया। उसने अपने बाहुबल के साथ अपना शस्त्र कौशल भी दिखाया। वीरवर की सभी विशेषताओं को देखकर राजा रूपसेन बहुत प्रभावित हुआ। राजा ने पूछा, “वीरवर बताओ अगर मैं तुम्हें अपना अंगरक्षक बनाता हूं, तो तुम्हें प्रतिदिन खर्च के लिए क्या चाहिए?” राजा के इस सवाल पर वीरवर बोला, “महाराज आप मुझे हजार तोले सोना दे देना।” वीरवर का इतना कहना था कि दरबार में मौजूद सभी लोग हैरान होकर वीरवर की ओर देखने लगे। राजा रूपसेन भी वीरवर की मांग पर आश्चर्य में पड़ गया। हो भी क्यों न, वेतन के रूप में वीरवर ने इतनी बड़ी रकम जो मांग ली थी। राजा ने गंभीर होकर वीरवर से पूछा, “तुम्हारे परिवार में कितने लोग हैं?” वीरवर ने उत्तर दिया, “कुल चार महाराज, मैं, मेरी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी।” वीरवर का जवाब सुन राजा ने मन ही मन सोचा कि आखिर चार लोगों के भरण-पोषण के लिए इसे इतने धन की क्या आवश्यकता। फिर कुछ सोचकर उसने वीरवर को हजार तोला सोना प्रतिदिन बतौर खर्च देने की बात मान ली। काम सिर्फ इतना था कि उसे हर रात राजा की सुरक्षा के लिए राजा के कक्ष के बाहर पहरा देना था। राजा यह जानना चाहता था कि वीरवर इतने धन का क्या करेगा। उसने वीरवर को हजार तोला सोना देकर रात में नौकरी पर आने को कहा और गुप्त रूप से कुछ सैनिकों को उसके पीछे लगा दिया। वीरवर नौकरी और मनचाहा वेतन पाकर बहुत खुश हुआ। वीरवर सोना लेकर खुशी-खुशी घर गया और आधा सोना ब्राह्मणों में बांट दिया। बाकी जो आधा बचा उसके दो हिस्से किए। एक हिस्सा वैरागियों, संन्यासियों और मेहमानों को दिया। फिर बचे हुए सोने से अनाज मंगाया और बढ़िया पकवान बनवाए। तैयार पकवान को पहले गरीबों को खिलाया और फिर उसके बाद जो बचा उसे अपने परिवार के साथ मिल बांट कर खाया। वीरवर की निगरानी कर रहे सैनिकों ने यह सारा नजारा देख जाकर राजा को बताया। राजा को यह जान संतोष हुआ कि उसके द्वारा दिए धन को वीरवर अच्छे काम में लगा रहा है। अब राजा को यह देखना था कि वीरवर अपने काम में कितना खरा उतरता है। वीरवर जब महल पहुंच राजा के कक्ष के बाहर पहरा देने लगा, तो राजा सोया नहीं। राजा पूरी रात चुपके से जांच करता रहा कि वीरवर अपना काम कितनी ईमानदारी से करता है। राजा ने पाया कि वीरवर बिना पलक झपकाए पूरी मुस्तैदी से कक्ष के बाहर पहरा दे रहा था। वीरवर की ऐसी कर्तव्यनिष्ठता देख राजा बहुत ही खुश हुआ। वीरवर प्रतिदिन इसी तरह सूरज ढलते ही महल पहुंच जाता और राजा की सुरक्षा में तैनात रहता। जब भी राजा को किसी भी चीज की जरूरत होती, वीरवर हमेशा हाजिर रहता। ऐसे ही देखते-देखते कई माह गुजर गए। एक रात कुछ अजीब घटना घटी। राजा ने आधी रात किसी स्त्री की रोने-बिलखने की आवाज सुनी। स्त्री की आवाज सुन राजा बहुत हैरान हुआ। राजा ने वीरवर को बुलाया और कहा, “जाओ और पता लगाकर आओ कि इतनी रात को कौन रो रहा है। साथ ही उसके रोने की वजह भी मालूम करना।” राजा का आदेश मिलते ही वीरवर वहां से फौरन उस स्त्री के रोने का कारण जानने के लिए निकल पड़ता है। थोड़ी दूर जाने के बाद वीरवर को एक स्त्री दिखाई दी। वह स्त्री सिर से पांव तक गहनों से लदी हुई थी। वह कभी नाचती, कभी कूदती और कभी सिर पीट-पीट कर रोती। यह सब देख वीरवर उस स्त्री के पास गया। उसने स्त्री के ऐसा करने के पीछे का कारण पूछा। वीरवर के पूछने पर स्त्री बोली, “मै राजलक्ष्मी हूं। रोती इसलिए हूं कि राजा रूपसेन की जल्द ही मौत होने वाली है। उनकी कुंडली में अकाल मृत्यु लिखी है। अब उनके जैसा न्याय प्रिय और कुशल राजा चला जाएगा, तो मुझे किसी और के अधिकार में रहना पड़ेगा। इसी बात का मुझे बहुत दुख है।” राजा की मौत की बात सुनकर वीरवर ने राजलक्ष्मी से पूछा, “क्या इस मुसीबत को टालने का कोई उपाय नहीं है?” इस पर राजलक्ष्मी बोली, “उपाय तो है, लेकिन क्या तू कर पाएगा।” वीरवर बोला, “आप मुझे उपाय बताएं, मुझसे जो भी बन पड़ेगा मैं अवश्य करूंगा।” वीरवर के हामी भरते ही राजलक्ष्मी बोली, “पूर्व की दिशा में यहां से कुछ दूर एक देवी का मंदिर है। अगर उस मंदिर में तू देवी के चरणों में अपने बेटे की बलि दे देता है, तो राजा पर आने वाला संकट टल जाएगा। उसके बाद राजा 100 साल तक बिना किसी तकलीफ के जीवित रहेगा और राज कर पाएगा।” राजलक्ष्मी की यह बात सुन वीरवर घर की ओर चल देता है और घर पहुंच कर सब हाल अपनी पत्नी को बताता है। इतने में उसका बेटा और बेटी भी जग जाते हैं। जब वीरवर के बेटे को इस बारे में पता चलता है, तो वह भी खुशी-खुशी देवी के चरणों में बलि चढ़ने के लिए राजी हो जाता है। वीरवर का बेटा कहता है, “सबसे पहले

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विक्रम बेताल की कहानी: पति कौन है?

सालों पहले यमुना किनारे धर्मस्थल नाम का एक नगर हुआ करता था। वहां एक ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम गणपति था। उसकी एक सुंदर और गुणवान बेटी थी। जैसे ही उसकी शादी की उम्र हुई, तो वो और उसका पूरा परिवार उसके लिए योग्य वर ढूंढने में लग गया। एक दिन ब्राह्मण किसी के घर पूजा करने के लिए गया और उसका बेटा भी पढ़ाई के लिए घर से बाहर चला गया। उस समय घर में ब्राह्मण की बेटी और उसकी पत्नी ही थी। उसी वक्त एक ब्राह्मण लड़का उनके घर आता है। ब्राह्मण की पत्नी उस लड़के का अच्छे से सत्कार करती है और खाना खिलाती है। लड़के का स्वभाव ब्राह्मण की पत्नी को पसंद आता है और वो उससे अपनी बेटी की शादी का वादा कर देती है। उधर, ब्राह्मण गणपति जिनके घर पूजा करने गया था, वहां भी वो एक ब्राह्मण लड़के से मिलता है और उससे अपनी बेटी की शादी करवाने का वचन दे देता है। ब्राह्मण का बेटा जहां पढ़ने गया था, वो भी वहां एक लड़के से यही वादा कर देता है। कुछ देर बाद गणपति और उसका बेटा दोनों खुद से चुने हुए लड़के को लेकर घर पहुंचते हैं। दोनों घर में एक और ब्राह्मण लड़के को देखकर चौंक जाते हैं। अब सभी इस दुविधा में पड़ जाते हैं कि लड़की एक है और शादी का वादा तीनों ने अलग-अलग लड़कों से कर दिया है, अब क्या होगा? लड़की का विवाह किससे करवाएंगे? इसी दुविधा के बीच पड़ोसी उनके घर खबर लेकर आता है कि उनकी बेटी को मोहल्ले में ही सांप न काट लिया है। भागा-भागा पूरा परिवार और तीनों ब्राह्मण लड़के लड़की के पास पहुंचते हैं, लेकिन तब तक लड़की की मौत हो जाती है। यह देखकर तीनों लड़के दुखी हो जाते हैं। कुछ देर बाद लड़की का परिवार और तीनों ब्राह्मण मिलकर उसका अंतिम संस्कार करते हैं। लड़की के क्रिया-कर्म के बाद एक ब्राह्मण लड़का उसकी हड्डियां अपने साथ लेकर जंगल चला जाता है। दूसरा उसकी राख को इकट्ठा करके पोटली में बांधकर उसी श्मशान घाट में झोपड़ी बनाकर रहने लगता है। तीसरा श्मशान घाट से निकल कर लड़की के गम में देश-देश योगी बनकर घूमने लगता है। ऐसा होते-होते कई साल गुजर गए। एक दिन अचानक योगी बनकर घूम रहा ब्राह्मण किसी तांत्रिक के घर पहुंच गया। ब्राह्मण को घर में देखकर तांत्रिक खुश हुआ और उसका सत्कार किया। तांत्रिक ने योगी से कुछ दिन अपने घर में ही रहने के लिए कहा। तांत्रिक की जिद देखकर योगी उनके घर में ही रुक गया। एक दिन तांत्रिक अपनी विद्या में बहुत लीन था और उसकी पत्नी सबके लिए खाना बना रही थी। उसी वक्त उनका बेटा रोने लगा और अपनी मां को परेशान करने लगा। तांत्रिक की पत्नी से उसे बहुत संभालने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं माना। आखिर में तांत्रिक की पत्नी को इतना गुस्सा आया कि उसने अपने बच्चे की पिटाई कर दी। उसके बाद भी जब बच्चा चुप नहीं हुआ, तो उसने उसे चूल्हे में डालकर जला दिया। यह सब देखकर योगी ब्राह्मण बहुत नाराज हुआ और बिना कुछ खाए ही अपनी पोटली लेकर उनके घर से जाने लगा। इतने में तांत्रिक आया और योगी से कहा, “महाराज खाना तैयार है, आप इस तरह गुस्से में बिना खाए यहां से न जाएं।” गुस्से में योगी ने कहा, “मैं इस घर में एक मिनट भी नहीं रुक सकता, जहां ऐसी राक्षसी रहती हो, वहां मैं कैसे कुछ खा सकता हूंं।” इतना सुनते ही तांत्रिक झट से चूल्हे के पास जाता है और एक किताब से एक मंत्र पढ़कर अपने बेटे को जिंदा कर देता है। यह सब देखकर योगी हैरान रह जाता है। उसने सोचा कि अगर यह किताब मेरे हाथ लग जाए, तो मैं अपनी पत्नी को भी जीवित कर सकता हूं। योगी यह सोच ही रहा होता है कि उधर तांत्रिक बेटे को जीवित करने के बाद फिर से योगी से खाना खाने का आग्रह करता है। योगी खाना खाता है और वहीं रुक जाता है। अब योगी के दिमाग में बस यही चल रहा था कि बस वो किसी तरह से उस किताब को हासिल कर ले। सोचते-सोचते रात हो जाती है। सब खाना खाकर सो जाते हैं। आधी रात को योगी उस मंत्र वाली किताब को लेकर तांत्रिक के घर से सीधे उस श्मशान घाट पहुंचता है, जहां ब्राह्मण की लड़की का अंतिम संस्कार किया गया था। वो सबसे पहले झोपड़ी बनाकर उसी जगह रह रहे ब्राह्मण को बुलाता है और उसे सारी कहानी सुनाता है। इसके बाद दोनों मिलकर फकीर बने ब्राह्मण को ढूंढते हैं। फकीर ब्राह्मण के मिलते ही योगी ब्राह्मण दोनों से कहता है कि लड़की की हड्डी और राख लेकर आओ, मैं उसे जिंदा करूंगा। दोनों ऐसा ही करते हैं। राख और हड्डी इकट्ठा करने के बाद लड़की को जलाई हुई जगह में योगी ब्राह्मण मंत्र पढ़ता और लड़की जिंदा हो जाती है। यह देख तीनों ब्राह्मण खुश हो जाते हैं। इतनी कहानी सुनाकर बेताल चुप हो जाता है। कुछ देर बाद वह राजा विक्रम से पूछता है, “बताओ वह लड़की किसकी पत्नी हुई?” विक्रमादित्य, बेताल के दोबारा उड़ने के डर से जवाब नहीं देते। गुस्से में बेताल कहता है, “देखो अगर तुम जवाब पता होते हुए भी नहीं दोगे, तो मैं तुम्हारी गर्दन में काट दूंगा, जल्दी से जवाब दो।” इतना सुनते ही राजा बोलते हैं, “जो ब्राह्मण श्मशान में कुटिया बनाकर रह रहा था, वो उसकी पत्नी हुई।” बेताल पूछता है, “कैसे?” तब विक्रमादित्य जवाब देते हैं, “जो हड्डी चुनकर फकीर बन गया, वो उसका बेटा हुआ। जिसने तांत्रिक विद्या से उसे जीवित किया, वो उसके पिता समान हुआ और जो उसकी राख के साथ जीवन जी रहा था, वो ही उसका पति हुआ।” जवाब सुनते ही बेताल ने कहा, “राजन तुमने बिलकुल सही उत्तर दिया है, लेकिन शर्त के मुताबिक तुम्हें मुंह नहीं खोलना था। इसलिए, मैं दोबारा उड़ रहा हूं।” इतना कहकर बेताल दोबारा घने जंगल के किसी पेड़ में जाकर लटक जाता है और राजा विक्रम उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे भागने लगते हैं। कहानी से सीख चतुराई और बुद्धि से बड़ी से बड़ी समस्या को हल किया जा सकता है।

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विक्रम बेताल की कहानी: पापी कौन है – बेताल पच्चीसी पहली कहानी

कड़ी मेहनत के बाद राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बेताल को पकड़ लिया। वह उसे अपने कंधे पर लादकर श्मशान की ओर ले चले। रास्ते में बेताल ने राजा को एक नई कहानी शुरू की और बेताल बोला… एक बार की बात है काशी में एक राजा था, जिसका नाम प्रताप मुकुट था। उसकी एक संतान थी, जिसका नाम वज्रमुकुट थी। एक दिन वज्रमुकुट दीवान के बेटे के साथ शिकार करने जंगल गया। काफी घूमने के बाद उन दोनों को एक तालाब दिखा, जिसमें कमल खिले थे और हंस उड़ रहे थे। दोनों दोस्तों ने वहां रुककर तालाब के पानी से हाथ-मुंह धोया और पास ही बने महादेव के मंदिर में दर्शन करने चले गए। दोनों ने अपने घोड़े मंदिर के बाहर ही बांध दिए। फिर जब दोनों दोस्त दर्शन करके मंदिर से बाहर निकले, तो उन्होंने देख कि तालाब में एक राजकुमारी अपनी सहेलियों के साथ स्नान करने आई है।राकुमारी को देखकर राजकुमार काफी खुश हुआ। राजकुमार और राजकुमारी दोनों एक-दूसरे को देखकर मोहित हो गए, जबकि दीवान का बेटा वहीं एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा। राजकुमार को देखते ही राजकुमारी ने बालों में से एक कमल का फूल निकाला, कान से लगाया, दांतों से कुतरा, पैरों के नीचे दबाया और फिर अपने छाती से लगाकर अपनी सहेलियों के साथ चली गई। उसके जाने के बाद राजकुमार काफी दुखी हुआ और अपने मित्र के पास लौटकर सारी बात बताई। राजकुमार बोला, “मैं राजकुमारी के बिना नहीं रह सकता हूं, लेकिन मुझे इस राजकुमारी के बारे में कुछ भी नहीं पता है। वह कहां रहती, उसका नाम क्या है?” दीवान के बेटे ने सारी बातें सुनी और राजकुमार को दिलासा देते हुए बोला, “राजकुमार, आप घबराइए मत। राजकुमारी ने सबकुछ बताया है। आश्चर्यचकित होते हुए राजकुमार ने पूछा, “वो कैसे?”दीवान के बेटे ने राजकुमार को बताना शुरू किया कि राजकुमारी ने कमल के फूल को बालों से निकालकर कानों से लगाया यानी राजकुमारी का कहना है कि वह कर्नाटक से है। दांत से फूल को कुतरा, मतलब उनके पिता का नाम दंतावट है। फूल को पांव से दबाने का मतलब था कि राजकुमारी का नाम पद्मावती है और फूल को सीने से लगाने का मतलब था कि अब आप उनके हृदय में बस चुके हैं। यह सब सुनते ही राजकुमार बहुत ज्यादा खुश हो गया। खुश होते हुए राजकुमार ने दीवान के बेटे से कहा कि मुझे कर्नाटक जाना है मुझे वहां ले चलो। दोनों दोस्त कई दिनों तक घूमते-फिरते कर्नाटक पहुंचे। जब वो दोनों राजमहल के निकट पहुंचे, तो उन्हें एक चरखा चलाती बुजुर्ग महिला दिखी।महिला को देखते ही दोनों घोड़े से उतरे और उसके पास जाकर कहा, “माई, हम दोनों व्यापारी हैं, हम बहुत दूर से आए हैं। हमारा सामान अभी तक आया नहीं है, कुछ दिनों में हमारा सामान भी पहुंच जाएगा। हम दोनों को बस रहने के लिए थोड़ी-सी जगह चाहिए।” उनकी बातें सुनकर बुजुर्ग महिला की ममता जाग उठी, उसने कहा, “बेटा इसे अपना ही घर समझो। जब तक मन करे यहां रह सकते हो।” इसके बाद दोनों उसके घर में रहने लगे। इसी बीच दीवान के बेटे ने उस महिला से पूछा, “आप क्या काम करती हैं माई? आपके यहां कौन-कौन रहता है? आप कैसे अपना गुजर-बसर करती हैं?”इन सारे सवालों का जवाब धीरे-धीरे उस महिला ने देना शुरू किया। उसने कहा, “मेरा एक पुत्र है, जो राजा के यहां नौकरी करता है। मैं राजा की पुत्री पद्मावती की दासी थी। बूढ़ी हो गई हूं, इसलिए घर में ही रहती हूं। महाराज खाने को दे देते हैं और पूरे दिन में एक बार राजकुमारी से मिलने चली जाती हूं।इतना सुनते ही राजकुमार ने बूढ़ी औरत को कुछ धन दिए और राजकुमारी तक संदेशा पहुंचाने को कहा। राजकुमार ने उस बूढ़ी महिला को कहा, “माई, कल तुम जब राजकुमारी के पास जाओ, तो उनसे कहना कि जेठ सुदी पंचमी को तुम्हें नदी के पास जो राजकुमार मिला था, वो तुम्हारे राज्य में आ गया है।” अगले दिन वो बूढ़ी औरत राजकुमार का संदेश लेकर राजकुमारी के पास गई। उस महिला की बात सुनते ही राजकुमारी गुस्सा हो गई। उन्होंने हाथों में चंदन लगाकर उस महिला के गाल पर तमाचा मारते हुए कहा, मेरे घर से निकल जाओ।बूढ़ी औरत ने घर लौटकर राजकुमार को सारी बातें बताई। महिला की बातें सुनकर राजकुमार चौंक गया। फिर राजकुमार के मित्र ने राजकुमार को धैर्य बंधाते हुए कहा, “राजकुमार आप चिंतित न हों। राजकुमारी की बातों को समझने की कोशिश करें। ध्यान दें कि राजकुमारी ने उंगलियों को सफेद चंदन में डुबोकर गाल पर मारा है। इसका मतलब अभी कुछ दिन चांदनी के हैं। उनके खत्म होने के बाद अंधेरी रात में मिलूंगी।”कुछ दिनों बाद बूढ़ी महिला फिर राजकुमारी के पास संदेशा लेकर पहुंची। इस बार राजकुमारी ने केसरी रंग में तीन उंगलियां डुबोकर बूढ़ी महिला के मुंह पर मारते हुए कहा, “भागो यहां से।” फिर उस महिला ने आकर राजकुमार को सारी बातें बताई। राजकुमार यह सुनकर बहुत दुखी हुआ। इस पर दीवान के बेटे ने राजकुमार से कहा, “इसमें दुखी होने की कोई बात नहीं है राजकुमार। राजकुमारी ने कहा है कि अभी उसकी तबीयत ठीक नहीं है, तो इसलिए तीन दिन और रुक जाओ।”तीन दिन बाद वो बूढ़ी महिला फिर राजकुमारी के पास जा पहुंची। इस बार फिर से राजकुमारी ने उस महिला को फटकारा और पश्चिम की खिड़की से बाहर जाने के लिए कहा। वो महिला फिर से राजकुमार के पास गई और सारी कहानी सुनाई। तब दीवान के बेटे ने राजकुमार को समझाते हुए कहा कि मित्र राजकुमारी ने आपको उस खिड़की की तरफ बुलाया है।राजकुमार यह सुनते ही खुशी से उछल पड़ा। उसने बूढ़ी महिला के कपड़े पहनकर नारी का भेष धारण किया, इत्र लगाया और हथियार बांधकर राजकुमारी से मिलने चल पड़ा। राजकुमार महल पहुंचा और खिड़की के रास्ते राजकुमारी के कमरे में पहुंच गया। राजकुमारी वहां पर तैयार थी और राजकुमार का इंतजार कर रही थी। राजकुमार जैसे ही कमरे में गया, उसकी आंखें खुली की खुली रह गईं। राजकुमारी के कमरे में कई महंगी चीजें रखी थीं। रातभर राजकुमार और राजकुमारी साथ ही रहे। फिर जैसे ही दिन निकलने को आया राजकुमारी ने उस राजकुमार को

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विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी

विक्रम बेताल की प्रारंभिक कहानी कुछ इस प्रकार है। बहुत समय पहले की बात है। उज्जयनी नाम के राज्य में राजा विक्रामादित्य राज किया करते थे। राजा विक्रामादित्य की न्यायप्रियता, कर्तव्यनिष्ठता और दानशीलता के चर्चे पूरे देश में मशहूर थे। यही कारण था कि दूर-दूर से लोग उनके दरबार में न्याय मांगने आया करते थे। राजा हर दिन अपने दरबार में लोगों की तकलीफों को सुनते और उनका निवारण किया करते थे। एक दिन की बात है। राजदरबार लगा हुआ था। तभी एक भिक्षु विक्रमादित्य के दरबार में आता है और एक फल राजा को देकर चला जाता है। राजा उस फल को कोषाध्यक्ष को दे देता है। उस दिन के बाद से हर रोज वह भिक्षु राजा के दरबार में आने लगा। उसका रोज का काम यही था कि वह राजा को फल देता और चुपचाप चला जाता। राजा भी प्रत्येक दिन भिक्षु द्वारा दिया गया फल कोषाध्यक्ष को थमा देता। ऐसे करते-करते करीब 10 साल बीत गए। एक दिन जब भिक्षु फिर राजा के दरबार में आकर फल देता है, तो इस बार राजा फल कोषाध्यक्ष को न देकर वहां मौजूद एक पालतू बंदर के बच्चे को दे देते हैं। यह बंदर किसी सुरक्षाकर्मी का था, जो छूट कर अचानक राजा के पास आ जाता है। बंदर जब उस फल को खाने के लिए तोड़ता है, तो उस फल के बीच से एक बहुमूल्य रत्न निकलता है। उस रत्न की चमक को देख राज दरबार में मौजूद सभी लोग हैरत में पड़ जाते हैं। राजा भी यह नजारा देख आश्चर्य में पड़ जाता है। राजा कोषाध्यक्ष को इससे पूर्व भिक्षु द्वारा दिए गए सभी फलों के बारे में पूछता है। राजा के पूछने पर कोषाध्यक्ष बताता है कि महाराज मैंने उन सभी फलों को राज कोष में सुरक्षित रखवा दिया है। मैं उन सभी फलों को अभी लेकर आता हूं। कुछ देर बाद कोषाध्यक्ष राजा को आकर बताता है कि सभी फल सड़-गल गए हैं। उनके स्थान पर बहुमूल्य रत्न बचे हुए हैं। यह सुनकर राजा बहुत खुश होता है और कोषाध्यक्ष को सारे रत्न सौंप देता है। अगली बार जब भिक्षु फल लेकर दोबारा विक्रमादित्य के दरबार पहुंचता है, तो राजा कहते हैं, “भिक्षु मैं आपका फल तब तक ग्रहण नहीं करूंगा, जब तक आप यह नहीं बताते कि हर दिन आप इतनी बहुमूल्य भेंट मुझे क्यों अर्पित करते हैं? राजा की यह बात सुन भिक्षु उन्हें एकांत स्थान पर चलने को कहता है। एकांत में ले जाकर भिक्षु राजा को बताता है कि मुझे मंत्र साधना करनी हैं और उस साधना के लिए मुझे एक वीर पुरुष की जरूरत है। चूंकि, मुझे तुमसे वीर दूसरा कोई नहीं मिल सकता, इसलिए यह बहुमूल्य उपहार तुम्हें दे जाता हूं। भिक्षु की बात सुन राजा विक्रमादित्य उसकी सहायता करने का वचन देते हैं। तब भिक्षु राजा को बताता है कि अगली अमावस्या की रात को उसे पास के श्मशान आना होगा, जहां वह मंत्र साधना की तैयारी करेगा। इतना कहकर भिक्षु वहां से चला जाता है। अमावस्या का दिन आते ही राजा को भिक्षु की बात याद आती है और वह वचन के अनुसार श्मशान पहुंच जाते हैं। राजा को देख भिक्षु बहुत प्रसन्न होता है। भिक्षु कहता है, “हे राजन, तुम यहां आए मैं बहुत खुश हुआ कि तुम्हें तुम्हारा वचन याद रहा। अब यहां से पूर्व की दिशा में जाओ। वहां एक महाश्मशान मिलेगा। उस महाश्मशान में एक शीशम का एक विशाल वृक्ष है। उस वृक्ष पर एक मुर्दा लटका हुआ है। उस मुर्दे को तुम्हें मेरे पास लेकर आना है। भिक्षु की बात सुनकर राजा सीधे उस मुर्दे को लाने चल देता है। महाश्मशान में पहुंचने के बाद राजा को एक विशाल शीशम के पेड़ पर एक मुर्दा लटका हुआ दिखाई देता है। राजा अपनी तलवार खींचता है और पेड़ से बंधी डोर को काट देता है। डोर कटते ही मुर्दा जमीन पर आ गिरता है और जोर से चीखने की आवाज आती है। दर्दभरी चीख सुन राजा को लगता है कि शायद यह मुर्दा नहीं, बल्कि कोई जिंदा इंसान है। थोड़ी देर बाद जब मुर्दा तेजी से हंसने लगता है और फिर पेड़ पर जाकर लटक जाता है, तो विक्रम समझ जाता है कि इस मुर्दे पर बेताल चढ़ा है। काफी कोशिश के बाद विक्रम बेताल को पेड़ से उतार अपने कंधे पर टांग लेते हैं। इस पर बेताल विक्रम से कहता है, “विक्रम मैं तेरे साहस को मान गया। तू बड़ा ही पराक्रमी है। मैं तेरे साथ चलता हूं, लेकिन मेरी एक शर्त है कि पूरे रास्ते में तू कुछ भी नहीं बोलेगा।” विक्रम सिर हिलाकर हां में बेताल की बात मान लेता है। इसके बाद बेताल विक्रम से कहता है कि रास्ता लंबा है, इसलिए इस रास्ते को रोमांचक बनाने के लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं। तो यह थी विस्तार से राजा विक्रम, योगी और बेताल की आरंभिक कहानी। यही से शुरू होता है बेताल पच्चीसी की 25 कहानियों का सफर, जो बेताल एक-एक करके विक्रम को सुनाता है। कहानियों के विक्रम-बेताल के इस भाग में आपको बेताल पच्चीसी की सभी कहानियां एक साथ पढ़ने को मिलेंगी। कहानी से सीख : एक राजा को हमेशा विक्रमादित्य की तरह सहासी और पराक्रमी होना चाहिए। तभी वह अपनी प्रजा की रक्षा कर सकता है।

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भीमसेन का अभिमान

पांडु पुत्र भीम को अपनें बलशाली होने पर अत्यंत गर्व हो जाता है। वनवास काल के दौरान एक दिन वह वन की ओर विचरते हुए दूर निकल जाते हैं। रास्ते में उन्हे एक वृद्ध वानर मिलता है। वानर की पूँछ भीमसेन के रास्ते में बिछी होती है। तभी भीम उसे अपनी पूँछ दूर हटा लेने को कहते हैं। परंतु वृद्ध वानर कहता है, “अब इस आयु में मुझसे बार-बार हिला-डुला नहीं जाता तुम तो काफी हट्टे-कट्टे हो, एक काम करो तुम ही मेरी पूँछ को हटा कर आगे बढ़ जाओ।” भीम उस वृद्ध वानर की पूँछ उठा कर हटाने के लिए भरसक प्रयास करते हैं, परंतु वह पूँछ को एक इंच भी हिला नहीं पाते हैं। अंत में भीमसेन उन्हे हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हैं और उन्हे अपना परिचय देने का विनम्र आग्रह करते हैं। फिर वृद्ध वानर के रूप धरे हुए पवन पुत्र हनुमान अपनें असली स्वरूप में आ जाते हैं, और भीम को अपना अहंकार छोड़ने की सीख देते हैं। सार: बल, बुद्धि और कौशल पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए।

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शिव के गण नंदी की कहानी

पौराणिक दंत कथा अनुसार, एक बार शिवजी के निवास स्थान पर कुछ दुष्ट व्यक्ति प्रवेश कर जाते हैं। इस बात का बोध होते ही शिवजी नंदी को कुछ निर्देश देना के लिए बुलाते हैं लेकिन अतिउत्साही नंदी शिवजी को अनसुना कर के उन दुष्टों के पीछे भाग पड़ता है। नंदी के इस अबोध आचरण से क्रोधित हो कर भगवान शिव नंदी को आज्ञा देते हैं- आज से तुम्हारा स्थान मेरे निवास स्थान के बाहर ही रहेगा। इसी कारण आज के समय में भी भगवान शिव के प्रिय नंदी का स्थान मंदिर के बाहर ही स्थापित किया जाता है। सार / Moral of the story- बिन सोचे समझे किसी कार्य में अमल करने पर अपार विपदा आ सकती है। जब कोई ज्ञानी व्यक्ति कुछ बोल रहा हो तब उनकी बात काटनी नहीं चाहिए और उन्हे अनसुना नहीं करना चाहिए।

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कर्ण की निष्ठा

एक राज पुत्र होते हुए भी कर्ण सूत पुत्र कहा गया। कर्ण एक महान दानवीर था। अपनें प्रण और वचन के लिए कर्ण अपनें प्राणों की भी बलि दे सकता था। पांडवों की शिक्षा खतम होने के बाद आयोजित रंग-भूमि में आकर कर्ण अर्जुन को ललकारता है  कि अगर वह संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुरधर है तो उससे मुक़ाबला कर के सिद्ध करे। कर्ण एक सूत के घर पला-बढ़ा होता है, इसलिए उसे सूत पुत्र समझ कर अर्जुन से मुक़ाबला नहीं करने दिया जाता है। पांडवों के प्रखर विरोधी दुर्योधन को यहाँ एक अवसर दिखता है, और वह फौरन कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर देता है। और कर्ण को अपना मित्र बना लेता है। दुर्योधन के इस कृत्य से कर्ण के दुखते घावों पर मरहम लग जाता है। लेकिन समय सीमा खत्म होने के कारण रंगभूमि में कर्ण-अर्जुन का मुक़ाबला टल जाता है। पांडवो और कौरवों के अंतिम निर्णायक युद्ध के पहले भगवान कृष्ण कर्ण को यह भेद बताते हैं कि तुम एक पांडव हो और कुंती के ज्येष्ठ पुत्र हो। इस रहस्य को जान कर भी कर्ण अपनें मित्र दुर्योधन से घात कर के अपनें भाइयों की ओर नहीं जाता है। दिव्य कवच-कुंडल के साथ कर्ण अजेय था और महाभारत के युद्ध में पांडव कभी उसे परास्त नहीं कर पाते। अतः इन्द्रदेव उससे सुबह स्नान के समय ब्राह्मण स्वरूप में आ कर दान में कवच-कुंडल मांगते हैं। पिता सूर्य देव द्वारा दिखाए गए स्वप्न से कर्ण को यह बात पहले ही ज्ञात हो जाती है कि इंद्र देव उससे रूप बदल कर कवच-कुंडल मांगने आयेंगे। पर फिर भी दानवीर कर्ण ब्राह्मण रुपी इंद्र देव को खाली हाथ नहीं लौटता और उनकी मांग पूरी करता है। इंद्र देव कवच-कुंडल के बदले में कर्ण को एक शक्ति अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका इस्तेमाल सिर्फ एक बार किया जा सकता था और उसका कोई काट नहीं था। युद्ध के दौरान भीम का पुत्र घटोत्कच कौरव सेना को तिनकों की तरह उड़ाए जा रहा था। उसने दुर्योधन को भी लहूलहान कर दिया। तब दुर्योधन सहायता मांगने कर्ण के पास आया। कर्ण शक्ति अस्त्र सिर्फ अर्जुन पर इस्त्माल करना चाहता था, पर मित्रता से विवश हो कर उसने वह अस्त्र भीम पुत्र घटोत्कच कर चला दिया। और उसका अंत कर दिया। और इस तरह अर्जुन सुरक्षित हो गया। अपनें साथ दो-दो शापों का बोझ ले कर चल रहे कर्ण को यह बात पता थी की जहां धर्म है वहीं कृष्ण होते हैं और जहां कृष्ण है वहीं विजय भी होती है। फिर भी उसने न दुर्योधन के एहसान भूल कर उससे घात किया, और ना ही अपनी दानवीरता से कभी पीछे हटा। सार- हो सके तो किसी के ऋणी मत बनो, और एक बार अगर किसी के ऋणी बन ही जाओ तो ऋण चुकाने में आनाकानी मत करो। अगर कोई कुछ मांगने आए तो उसे निराश नहीं करना चाहिए, जितना संभवतः हो उसकी मदद करनी चाहिए।

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भस्मासुर को शिव का वरदान

पूर्व काल में भस्मासुर नाम का एक राक्षस हुआ करता था। उसको समस्त विश्व पर राज करना था। अपने इसी प्रयोजन को सिद्ध करने हेतु वह शिव की कठोर तपस्या करता है। अंत में भोलेनाथ उसकी बरसों की गहन तपस्या से प्रसन्न हो कर उस के सामने प्रकट होते हैं। शिव उसे वरदान मांगने के लिए कहते हैं। तब भस्मासुर अमरत्व का वरदान मांगता है। अमर होने का वरदान सृष्टि विरुद्ध विधान होने के कारण शंकर भगवान उसकी यह मांग नकार देते हैं। तब भस्मासुर अपनी मांग बदल कर यह वरदान मांगता है की वह जिसके भी सिर पर हाथ रखे वह भस्म हो जाए। शिवजी उसे यह वरदान दे देते हैं। तब भस्मासुर शिवजी को ही भस्म करने उसके पीछे दौड़ पड़ता है। जैसे तैसे अपनी जान बचा कर शंकर भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं और उन्हे पूरी बात बताते हैं। भगवान विष्णु फिर भस्मासुर का अंत करने के लिए मोहिनी रूप रचते हैं। भस्मासुर जब भटक भटक कर शिवजी को भस्म करने के लिए ढूंढ रहा होता है तब मोहीनी उसके समीप प्रकट हो आती है। उसकी सुंदरता से मुग्ध हो कर भस्मासुर वहीं रुक जाता है। और मोहिनी से विवाह का प्रस्ताव रख देता है। मोहिनी जवाब में कहती है कि-वह सिर्फ उसी युवक से विवाह करेगी जो उसकी तरह नृत्य में प्रवीण हो। अब भस्मासुर को नृत्य आता नहीं था तो उसने इस कार्य में मोहिनी से मदद मांगी। मोहिनी तुरंत तैयार हो गयी। नृत्य सिखाते-सिखाते मोहिनी ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा और उसकी देखा-देखी भस्मासुर भी शिव का वरदान भूल कर अपना ही हाथ अपने सिर पर रख बैठा और खुद ही भस्म हो गया। इस तरह विष्णु भगवान की सहायता से भोलेनाथ की विकट समस्या का हल हो जाता है। सार- ज्ञान और दान सुपात्र को ही देना चाहिए।

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लक्ष्मण को मिला ज्ञान

श्री राम और रावण के बीच हुए अंतिम युद्ध के बाद रावण जब युद्ध भूमि पर, मरणशैया पर पड़ा होता है तब भगवान राम लक्ष्मण को समस्त वेदो के ज्ञाता, महापंडित रावण से राजनीति और शक्ति का ज्ञान प्राप्त करने को कहते हैं। और तब रावण लक्ष्मण को ज्ञान देते है कि- अच्छे कार्य में कभी विलंब नहीं करना चाहिए। और अशुभ कार्य को मोह वश करना ही पड़े तो उसे जितना हो सके उतना टालने का प्रयास करनी चाहिए। शक्ति और पराक्रम के मद में इतना अँधा नहीं हो जाना चाहिए की हर शत्रु तुच्छ और निम्न लगने लगे। मुझे ब्रह्मा जी से वर मिला था की वानर और मानव के अलावा कोई मुझे मार नहीं सकता। फिर भी मै उन्हे तुच्छ और निम्न समझ कर अहम में लिप्त रहा। जिस कारण मेरा समूल विनाश हुआ। तीसरी और अंतिम बात रावण नें यह कही कि, अपनें जीवन के गूढ रहस्य स्वजन को भी नहीं बताने चाहिए। चूँकि रिश्ते और नाते बदलते रहते हैं। जैसे की विभीषण जब लंका में था तब मेरा हितेच्छु था। पर श्री राम की शरण में आने के बाद मेरे विनाश का माध्यम बना। सार- अपनें गूढ़ रहस्य अपनें तक रखना, शुभ कर्म में देरी ना करना, गलत काम से परहेज़ करना, और किसी भी शत्रु को कमज़ोर ना समझना , यह अमूल्य पाठ हर एक इंसान को अपनें जीवन में उतारना चाहिए।

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धृतराष्ट्र का पुत्र मोह

हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र जन्म से अंध थे। इस कारण वह ज्येष्ठ पुत्र होते हुए भी राजा बनने योग्य नहीं थे। परंतु राजा पांडु एक गंभीर बीमारी का शिकार हो जाने की वजह से वन प्रस्थान कर गए थे और एक राज्य का सिंहासन रिक्त नहीं रखा जा सकता था, इसलिए धृतराष्ट्र को पांडु का प्रतिनिधि राजा बनाया गया था। एक बार राजसुख का स्वाद चख लेने वाले धृतराष्ट्र चाहते थे की उनके बाद हस्तिनापुर का राजा उनका पुत्र दुर्योधन बनें। इसी लालसा में उन्होने न्याय और अन्याया में तर्क करना छोड़ दिया, और अपने पुत्र की हर एक ज़्यादती को वह अनदेखा कर के पांडु पुत्रों से पग-पग पर अन्याय करते गए। दुर्योधन ने भी पांडवों के लिए अपनें ह्रदय मे घृणा ही पाल रखी थी। भीम को ज़हर दे कर नदी में डुबोना, लाक्षाग्रह में आग लगा कर पांडु पुत्रों और कुंती को ज़िंदा जला देने का षड्यंत्र, द्रौपदी चीर हरण, द्यूत क्रीडा में कपट कर के पांडवों को वनवास भेजना और ना जाने ऐसे कई षड्यंत्र से उसने पांडवों का अनिष्ट करने की चेष्टा की थी। अंत में जब उन के पाप का घड़ा भर गया, तब धर्म युद्ध हुआ। और उस महायुद्ध में लालची धृतराष्ट्र के 100 पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए। अपनी लालसा की वेदी पर अपने समस्त पुत्रों की बलि चढ़ा देने वाले धृतराष्ट्र नें युद्ध समाप्ती के बाद भी भीमसेन को अपनी भूजाओं में जकड़ कर मार डालने का प्रयास किया था। लेकिन अंत में शर्मिंदा हो और हार स्वीकार कर धृतराष्ट्र पत्नी सहित वन चले जाते हैं। सार- लालच बुरी बला है। इसे करने वाले का अंत भी धृतराष्ट्र जैसा ही होता है “परास्त” और “अपमानित”

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जनमेजय का “सर्प मेघ यज्ञ”

एक बार राजा परीक्षित किसी तपस्वी ऋषि का अपमान कर देते हैं। ऋषिवर क्रोधित हो उन्हें सर्प दंश से मृत्यु का श्राप दे देते हैं। सावधानियां रखने के बावजूद ऋषि वाणी अनुसार एक दिन फूलों की टोकरी में कीड़े के रूप में छुपे तक्षक नाग के काटने से परीक्षित की मृत्यु हो जाती है। जब राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय (पांडव वंश के आखिरी राजा) को पता चलता है की साँपों के राजा, तक्षक नाग के काटने से उनके पिता की मृत्यु हुई है तो वे प्रतिशोध लेने का निश्चय करते हैं। जनमेजय सर्प मेघ यज्ञ का आहवाहन करते हैं, जिससे समस्त पृथ्वी के साँप एक के बाद एक हवन कुंड में आ कर गिरने लगते हैं। सर्प जाति का अस्तित्व खतरे में पड़ता देख तक्षक नाग सूर्य देव के रथ में जा लिपटता है। अब अगर तक्षक नाग हवन कुंड में जाता तो उसके साथ सूर्य देव को भी हवन कुंड में जाना पड़ता। और इस दुर्घटना से सृष्टि की गति थम जाति। पिता की मृत्यु का बदला लेने की चाह में जनमेजय समस्त सर्प जाति का विनाश करने पर तुला था इसलिए देवगण उन्हे यज्ञ रोकने की सलाह देते हैं पर वह नहीं मानते। अंत में अस्तिका मुनि के हस्तक्षेप से जनमेजय अपना महा विनाशक यज्ञ रोक देते हैं। सार- बुरे कर्म का बुरा फल मिलना अटल है। नियति को कोई टाल नहीं सकता।

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