महामाया परमेश्वरी के सोलह श्रंगारों का धरती पे अवतरण तथा मिथ्यादेवी का कलियुग में शासन

श्रृष्टि के प्रथम कल्प में एकबार मिथ्या देवी अपने पती अधर्म और भाई कपट के साथ मिलकर भूलोक में घर-घर अत्याचार फैला दिया। लोभ ने अपनी दोनों पत्नियों क्षुधा और पिपाशा के साथ मनुष्यों का जीना मुश्किल कर दिया। लोग एक दूसरे का धन, भूमि , पुत्री तथा पत्नियों का हरण करने लगे चारों ओर व्यभिचार फैल गया। अधर्म और मिथ्यादेवी का शासन हो गया। प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। तब सप्त रिषियों ने महामाया परमेश्वरी की उपासना व घोर तप किया।आदिशक्ति माता- रिषियों को उनकी तपस्या का फल प्रदान करने के लिए प्रगट हुईं। भूतल पे धर्म को स्थापित करने के लिए तथा अधर्म का नाश करने के लिए माँ ने अंश रूप में अपने शरीर से अग्नि देव तथा उनकी पत्नी स्वाहा देवी को, यग्यदेव तथा उनकी पत्नी दीक्षा देवी और दक्षिणा देवी को, पितृदेव तथा उनकी पत्नी स्वधा देवी को, पुण्यदेव तथा उनकी पत्नी प्रतिष्ठा देवी को, शुशील देव तथा उनकी पत्नी शान्ति देवी और लज्जा देवी को, ग्यान देव तथा उनकी पत्नी बुद्धि देवी, मेधादेवी, धृतिदेवी को अपने शरीर से उत्पन्न किया और अधर्म तथा मिथ्यादेवी की सत्ता को समाप्त करने के लिए आदेश दिया। हजारों वर्षों तक युद्ध चला लेकिन मिथ्यादेवी को कोई परास्त नही कर पाया। यह देखकर माता परमेश्वरी ने अपने शरीर से पुन: बैराग्यदेव तथा उनकी पत्नी श्रद्धादेवी और भक्ति देवी को, वायुदेव और उनकी पत्नी स्वस्तिदेवी को, मोहदेव तथा उनकी पत्नी दयादेवी को, सुखदेव तथा उनकी पत्नी तन्द्रादेवी और प्रीतिदेवी को तथा रूद्रदेव और उनकी पत्नी कालाग्निदेवी को अपने शरीर से उत्पन्न किया। फिर पुन: युद्ध होने लगा। एक पल में रूद्रदेव और उनकी पत्नी कालाग्निदेवी ने मिथ्यादेवी तथा अधर्म और कपट को तथा उनके साथियों को बंदी बना लिया। एक हजार वर्षों तक बंदीगृह में मिथ्यादेवी पडी रहीं और उसी कारागार में रूद्रदेव और उनकी पत्नी कालाग्निदेवी की तपस्या करती रहीं । मिथ्यादेवी की तपस्या से प्रसन्न होकर रूद्रदेव और माता कालाग्निदेवी प्रगट हुईं और मिथ्यादेवी को बरदान दिया । रूद्रदेव ने मिथ्यादेवी से कहा- सतयुग में तुम अदृश्य रहोगी त्रेतायुग में तुम सूक्ष्म रूप से रहोगी द्वापरयुग में तुम आधे शरीर से रहोगी कलियुग में तुम सम्पूर्ण शरीर से रहोगी कलियुग में सर्वत्र तुम्हारा शासन होगा माता कालाग्निदेवी ने मिथ्यादेवी से कहा- हमारे शरीर के सोलह श्रंगारों का अंश रूप से धरती पर अवतरण हुआ है। उनके पास कभी न जाना अन्यथा वहीं पर भस्म हो जाओगी । मिथ्यादेवी ने हाथ जोडकर पूँछा, माते आपके सोलह श्रंगार अंश रूप से कहाँ कहाँ हैं। माता ने कहा- हमारी आँख का काजल क्षीर सागर के रूप में है। हमारी माँग का सिंदूर शेषनाग का रूप धारण करके विष्णु की शेषसैया बनकर क्षीर सागर में है। हमारे पाँव का महावर बृक्ष रूप में कौशल देश में है। जब विष्णु का राम रूप में अवतार होगा तब मेरे भक्त कच्छप का केवट रूप में जन्म होगा केवट इस बृक्ष को काटकर नाव बनायेगा और उसी नाव से केवट विष्णु रूपी राम को गंगा के पार उतारेगा । हमारे भाल की बिंदी गोकुल में गौ रूप धारण करके(लाखों की संख्या में) कष्णावतार में कृष्ण के साथ रहकर उनकी लीलाओं का रस-पान करेंगी। हमारी चूडीयाँ नदी का रूप धारण करके सरयू नाम से जानी जायेगी जो राम की लीलाओं का रसास्वादन करेगी । हमारी पायल पीताम्बर का रूप धारण करके हमेशा कृष्ण के शरीर पर विद्यमान रहेगी । हमारे पाँव की बिछिया मंद्राचल पर्वत के नाम से जानी जायेगी। अगले कल्प में सागर मंथन की लीला होगी, जिसमें मंद्राचल पर्वत मथानी बनेगा। हमारी नासिका की नथुनी ब्रह्मा का कमन्डल है । हमारे कान के कर्णफूल कुन्डल का रूप धारण करके रूद्रदेव के कर्ण में बिराजमान हैं। और हमारे कमर की करधन बलराम के हल का फल बनके असुरों का बिनाश करेगी । इसलिए तुम इनके पास न जाना अन्यथा वहीं तुम जलकर भस्म हो जाओगी। कलियुग में जो भक्त हमें सोलह श्रंगार अर्पण कर हमारी उपासना करें उनके पास कभी न जाना। कलियुग में तुम्हारा सर्वत्र शासन होगा। ||ऊँऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै नम: ||

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कैसे हुई क्षीर सरोवर की उत्पत्ति

एक समय की बात है। गोपांगनाओं से घिरे भगवान श्री कृष्ण पुष्प वृन्दावन में विहार कर रहे थे। सहसा प्रभु के मन में दूध पीने की इच्छा जाग उठी। तब भगवान ने अपने वामपार्श्व से लीलापूर्वक सुरभी गौ को प्रकट किया।बछड़े सहित वह गौ दुग्धवती थी।सुदामा ने एक रत्नमय पात्र में उसका दूध दुहा। स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने उस स्वादिष्ट दूध को पिया। फिर हाथ से छूट कर वह पात्र धरती पर गिर पड़ा और दूध धरती पर फैल गया। उस दूध से वहाँ एक सरोवर बन गया, गोलोक में वह क्षीरसरोवर नाम से विख्यात हुआ। भगवान की इच्छा से उसमें रत्नमय घाट बन गये। उसी समय सहसा असंख्य कामधेनु प्रकट हो गयीं। जितनी वे गौयें थीं, उतने ही बछड़े उस सुरभी के रोम कूप से निकल आये। फिर उन गौओं के बहुत से पुत्र व पौत्र भी हुए। यों उस सुरभी से गौओं की सृष्टि कही गयी। पूर्व काल में श्री कृष्ण ने देवी सुरभी की पूजा की थी। तत्पश्चात् त्रिलोकी में उस देवी की पूजा का प्रचार हो गया।दीपावली के दूसरे दिन भगवान श्री कृष्ण की आज्ञा से सुरभी की पूजा सम्पन्न हुयी थी। एक बार वाराह कल्प में देवी सुरभी ने दूध देना बंद कर दिया। तब त्रिलोकी में दूध का अभाव हो गया। ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर इन्द्र ने देवी सुरभी की स्तुति आरम्भ की। स्तुति सुनते ही सुरभी संतुष्ट और प्रसन्न होकर ब्रह्मलोक में प्रकट हो गयीं। देवराज इन्द्र को मनोवांछित वर देकर वे पुनः गोलोक चलीं गयीं। फिर सारा विश्व दूध से परिपूर्ण हो गया। दूध से घृत बना और घृत से यज्ञ सम्पन्न होने लगे तथा उनसे देवता संतुष्ट हुए।

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लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा का परस्पर श्राप देना

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु की तीन पत्नियाँ- लक्ष्मी, गंगा और सरस्वती थीं। एक बार विष्णुजी ने गंगा के प्रति विशेष अनुराग और लगाव दिखाया जिसके फलस्वरूप सरस्वती के मन में ईर्ष्या भाव उत्पन्न हो गया। सरस्वती, तीनों पत्नियों के प्रति समान अनुरक्ति रखने के आर्योचित सिद्धांत की उपेक्षा करके गंगा के प्रति आसक्ति दिखाने के लिए अपने पति विष्णुजी को खरी-खोटी बातें सुनाने लगीं। सरस्वती ने गंगा को भी आड़े हाथों लेकर दुर्वचन कहे।विष्णुजी पत्नियों के इस कलह को देखकर प्रासाद से बाहर चले गए। बिना कुछ कहे इस तरह पति के बाहर चले जाने से तो सरस्वती का क्रोध और भी भड़क उठा। उन्होंने गंगा के केश पकड़े और मारने को लपकीं। लक्ष्मी ने बीच में आकर दोनों को शांत करने का प्रयास किया। इस पर सरस्वती ने लक्ष्मी को भी गंगा की सहायिका मानते हुए उनका अपमान किया और उन्हें बीच में आने के कारण वृक्ष हो जाने का शाप दे दिया। इधर गंगा अपने कारण निरपराध लक्ष्मी को दंडित होते देखकर अत्यधिक क्षुब्ध हो उठीं और उन्होंने सरस्वती को भूतल पर नदी हो जाने का शाप दिया। सरस्वती भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने भी गंगा को मृतक की अस्थियाँ ढोने वाली नदी बनकर पृथ्वी तल पर बहने का शाप दे दिया। जब विष्णुजी अपने पार्षदों सहित लौटे तो उन्हें अपनी पत्नियों के परस्पर कलह और शाप आदि का पूरा पता लगा। विष्णुजी ने लक्ष्मी की शांत वृत्ति, सहनशीलता और उदारता को देखकर केवल उसे ही पत्नी रूप में अपने पास रखना उचित समझा। विष्णुजी ने गंगा और सरस्वती को त्याग देने का निश्चय कर लिया। वियोग की अवश्यंभावी स्थिति से व्यथित होकर दोनों ही कातर स्वरों में शापों से शीघ्र निपटने का उपाय पूछने लगीं। विष्णु ने उन्हें बताया कि गंगा तो नदी रूप में स्वर्ग, भूलोक और पाताल लोक में त्रिपथगा होकर बहेंगी। उनका स्थान शिव जटाओं में भी होगा। अंश रूप में ही वे स्वर्ग में मेरे सानिध्य में रहेंगी। सरस्वती प्रधान रूप से पृथ्वी तल पर रहेंगी और अंश रूप में मेरे पास। लक्ष्मी ‘तुलसी’ वृक्ष बनकर मेरे शालिग्राम स्वरूप से विवाह करके समग्र और स्थायी रूप से मेरा पत्नीत्व ग्रहण करेंगी। दोनों देवियाँ शापानुसार नदी रूप में पृथ्वी पर आईं। पृथ्वी पर स्रोतों में जो सर (जल) दिखाई देता है, उस सर का स्वामी सरस्वान कहलाता है और सरस्वान की पत्नी होने से सरस्वती सरस्वती कहलाईं। सरस्वती नदी तीर्थरूपा हैं। वे पापनाश के लिए जलती अग्नि के समान हैं। यही गंगा और सरस्वती शाप के कारण भूलोक में नदी बनकर बहती हैं। राधा-कृष्ण के शरीरों से उत्पन्न उनके स्वरूपों का दर्शन कराने वाली गंगा अत्यंत पवित्र, सर्व सिद्धिदात्री तथा तीर्थरूपा नदी हैं। भविष्य पुराणों में कहा गया है कि सरस्वती के शाप से भारतवर्ष में आईं गंगा शाप की अवधि पूरी हो जाने पर यानी कलियुग की समाप्ति पर पुन: भगवान श्रीहरि की आज्ञा से बैकुण्ठ चली जाएँगी।

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कहानी राजा पृथु की -अपने पिता वेन की दाहिनी भुजा के मंथन से पैदा हुए थे पृथु

ध्रुव के वनगमन के पश्चात उनके पुत्र उत्कल को राजसिंहासन पर बैठाया गया, लेकिन वे ज्ञानी एवम विरक्त पुरुष थे, अतः प्रजा ने उन्हें मूढ़ एवं पागल समझकर राजगद्दी से हटा दिया और उनके छोटे भाई भ्रमिपुत्र वत्सर को राजगद्दी पर बैठाया। उन्होंने तथा उनके पुत्रों ने लम्बी अवधि तक शासन किया। उनके ही वंश में एक राजा हुए अंग। उनके यहां वेन नाम का पुत्र हुआ। वेन की निर्दयता से दुखी होकर राजा अंग वन को चले गए। वेन ने राजगद्दी सम्भाल ली। अत्यंत दुष्ट प्रकृति का होने के कारण अंत में ऋषियों ने उसे शाप देकर मार डाला। वेन के कोई सन्तान नहीं थी, अतः उसकी दाहिनी भुजा का मंथन किया गया। तब राजा पृथु का जन्म हुआ।ध्रुव के वंश में वेन जैसा क्रूर जीव क्यों पैदा हुआ ? इसके पीछे क्या रहस्य है ? यह जानने की इच्छा बड़ी स्वभाविक है। अंग राजा ने अपनी प्रजा को सुखी रखा था। एक बार उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ किया था। उस समय देवताओं ने अपना भाग ग्रहण नहीं किया, क्योंकि अंग राजा के कोई सन्तान नहीं थी। मुनियों की कथानुसार-अंग राजा ने उस यज्ञ को अधूरा छोड़कर पुत्र प्राप्ति के लिए दूसरा यज्ञ किया। आहुति देते समय यज्ञ में से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। उसने राजा को खीर से भरा एक पात्र दिया। राजा ने खीर का पात्र लेकर सुंघा, फिर अपनी पत्नी को दे दिया। पत्नी ने उस खीर को ग्रहण किया। समय आने पर उसके गर्भ से एक पुत्र हुआ, किन्तु माता अधर्मी वंश की पुत्री थी, इसी कारण वह सन्तान अधर्मी हुई। इसी अंग राजा का पुत्र वेन था। वेन के वंश से राजा पृथु की हस्तरेखाओं तथा पांव में कमल चिन्ह था। हाथ में चक्र का चिन्ह था। वे भगवान विष्णु के ही अंश थे। ब्राह्मणों ने राजा पृथु का राज्याभिषेक करके सम्राट बना दिया। उस समय पृथ्वी अन्नहीन थी। प्रजा भूखी मर रही। प्रजा का करुण क्रंदन सुनकर राजा पृथु अति दुखी हुए। जब उन्हें मालूम हुआ कि पृथ्वी माता ने अन्न, औषधि आदि को अपने उदर में छिपा लिया है तो वे धनुष-बाण लेकर पृथ्वी को मारने दौड़ पड़े। पृथ्वी ने जब देखा कि अब उसकी रक्षा कोई नहीं कर सकता तो वह राजा पृथु की शरण में आई। जीवनदान की याचना करती हुई वह बोली-“मुझे मारकर अपनी प्रजा को सिर्फ जल पर ही कैसे जीवित रख पाओगे ?” पृथु ने कहा-“स्त्री पर हाथ उठाना अवश्य ही अनुचित है, लेकिन जो पालनकर्ता अन्य प्राणियों के साथ निर्दयता का व्यवहार करता है उसे दंड अवश्य ही देना चाहिए।” पृथ्वी ने राजा को नमस्कार करके कहा-“मेरा दोहन करके आप सब कुछ प्राप्त करे। आपको मेरे योग्य बछड़ा और दोहन-पात्र का प्रबन्ध करना पड़ेगा। मेरी सम्पूर्ण सम्पदा को दुराचारी चोर लूट रहे थे, अतः मैने वह सामग्री अपने गर्भ में सुरक्षित रखी है। मुझे आप समतल बना दीजिये।” राजा पृथु सन्तुष्ट हुए। उन्होंने मनु को बछड़ा बनाया एवं स्वयं अपने हाथो से पृथ्वी का दोहन करके अपार धन-धान्य प्राप्त किया। फिर देवताओं तथा महर्षियों को भी पृथ्वी के योग्य बछड़ा बनाकर विभिन्न वनस्पति, अमृत, सुवर्ण आदि इच्छित वस्तुएं प्राप्त की। उन्होंने पृथ्वी को अपनी कन्या के रूप में स्वीकार किया। पृथ्वी को समतल बनाकर पृथु ने स्वयं पिता की भांति प्रजाजनों के कल्याण एवं पालन-पोषण का कर्तव्य पूरा किया। राजा पृथु ने सौ अश्वमेघ यज्ञ किए। स्वयं भगवान विष्णु उन यज्ञों में आए, साथ ही सब देवता भी आए। पृथु के इस उत्कर्ष को देखकर इंद्र को ईर्ष्या हुई। उनको सन्देह हुआ कि कही राजा पृथु इंद्रपुरी न प्राप्त कर ले। उन्होंने सौवे यज्ञ का घोडा चुरा लिया। जब इंद्र घोडा लेकर आकाश मार्ग से भाग रहे थे तो अत्रि ऋषि ने उन्हें देख लिया। उन्होंने राजा को बताया और इंद्र को पकड़ने के लिए कहा। राजा ने अपने पुत्र को आदेश दिया। पृथु कुमार ने भागते हुए इंद्र का पीछा किया। इंद्र ने वेश बदल रखा था। पृथु के पुत्र ने जब देखा कि भागने वाला जटाजूट एवं भस्म लगाए हुए है तो उसे धार्मिक व्यक्ति समझकर बाण चलाना उपयुक्त न समझा। वह लौट आया, तब अत्रि मुनि ने उसे पुनः पकड़ने के लिए भेजा। फिर से पीछा करते पृथु कुमार को देखकर इंद्र घोड़े को वही छोड़कर अंतर्धान हो गए। पृथु कुमार अश्व को लेकर यज्ञशाला में आए। सभी ने उनके पराक्रम की स्तुति की। अश्व को पशुशाला में बांध दिया गया। इंद्र ने छिपकर पुनः अश्व को चुरा लिया। अत्रि ऋषि ने यह देखा तो पृथु कुमार को बताया। पृथु कुमार ने इंद्र को बाण का लक्ष्य बनाया तो इंद्र ने अश्व को छोड़ दिया और भाग गए। इंद्र के इस षड्यन्त्र का पता पृथु को चला तो उन्हें बहुत क्रोध आया। ऋषियों ने राजा को शांत किया और कहा-“आप व्रती है, यज्ञपशु के अतिरिक्त आप किसी का भी वध नहीं कर सकते। लेकिन हम मन्त्र द्वारा इंद्र को ही हवनकुंड में भस्म किए देते है।” यह कहकर ऋत्विजों ने मन्त्र से इंद्र का आह्वान किया। वे आहुति डालना ही चाहते थे कि वहां ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने सबको रोक दिया। उन्होंने पृथु से कहा-“तुम और इंद्र दोनों ही परमात्मा के अंश हो। तुम तो मोक्ष के अभिलाषी हो। इन यज्ञों की क्या आवश्यकता है ? तुम्हारा यह सौवा यज्ञ सम्पूर्ण नहीं हुआ है, चिंता मत करो। यज्ञ को रोक दो। इंद्र के पाखण्ड से जो अधर्म उत्पन्न हो रहा है, उसका नाश करो।” भगवान विष्णु स्वयं इंद्र को साथ लेकर पृथु की यज्ञशाला में प्रकट हुए। उन्होंने पृथु से कहा-“मैं तुम पर प्रसन्न हूं। यज्ञ में विघ्न डालने वाले इंद्र को तुम क्षमा कर दो। राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना है। तुम तत्वज्ञानी हो। भगवत प्रेमी शत्रु को भी समभाव से देखते हो। तुम मेरे परमभक्त हो। तुम्हारी जो इच्छा हो, वह मांग लो।” राजा पृथु भगवान विष्णु के वचनों से प्रसन्न थे। इंद्र लज्जित होकर राजा पृथु के चरणों में गिर पड़े। पृथु ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया। राजा पृथु ने भगवान विष्णु से कहा-“भगवन ! सांसारिक भोगो का वरदान मुझे नहीं चाहिए। यदि आप देना ही चाहते है तो मुझे सहस्त्र कान दीजिये, जिससे आपका कीर्तन, कथा एवं गुणगान हजारों कानों से श्रवण करता रहूं।

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कहानी महर्षि दधीचि की- देवताओं की प्राण रक्षा के लिए किया था अपनी अस्थियों का दान

एक बार देवराज इंद्र के मन में अभिमान पैदा हो गया जिसके फलस्वरूप उसने देवगुरु बृहस्पति का अपमान कर दिया। उसके आचरण से क्षुब्ध होकर देवगुरु इंद्रपुरी छोड़कर अपने आश्रम में चले गए। बाद में जब इंद्र को अपनी भूल का आभास हुआ तो वह बहुत पछताया, क्योंकि अकेले देवगुरु बृहस्पति ही ऐसे व्यक्ति थे, जिनके कारण देवता, दैत्यों के कोप से बचे रहते थे। पश्चाताप करता इंद्र देवगुरु को मनाने के लिए उनके आश्रम में पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर देवगुरु को प्रणाम किया और कहा, “आचार्य। मुझसे बहुत बड़ा अपराध हो गया था। उस समय क्रोध में भरकर मैंने आपके लिए जो अनुचित शब्द कह दिए थे, मैं उनके लिए आपसे क्षमा मांगता हूं। आप देवों के कल्याण के लिए पुनः इंद्रपुरी लौट चलिए। हम सारे देव मिलकर आपकी भली-भांति सेवा…।” इंद्र का शेष वाक्य अधूरा ही रह गया क्योंकि देवगुरु अपने तपोबल से अदृश्य हो चुके थे। इंद्र ने उनकी बहुत खोज की किन्तु जब देवगुरु का कुछ पता न चला तो वह थक-हार कर इंद्रपुरी लौट गया। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने जब यह समाचार सुना तो उन्होंने दैत्यों से कहा, “दैत्यों ! यही अवसर है जब तुम देवलोक पर अधिकार कर सकते हो। आचार्य बृहस्पति के चले जाने के बाद देवों की शक्ति आधी रह गई है। तुम लोग चाहो तो अब आसानी से देवलोक पर अधिकार कर सकते हो।” उचित अवसर देखकर दैत्यों ने अमरावती को चारों ओर से घेर लिया और चारों और मार-काट मचा दी। इंद्र किसी तरह जान बचाकर वहां से भाग निकला और पितामह ब्रह्मा की शरण में पहुंच गया। वह करबद्ध होकर ब्रह्माजी से बोला, “पितामह, देवों की रक्षा कीजिए। दैत्यों ने अचानक हमला करके अमरावती में मार-काट मचा दी है। वे चुन-चुनकर देव योद्धाओं का वध कर रहे है। मैं किसी तरह जान बचाकर यहां तक पहुंचा हूं।” पितामह ब्रह्मा आचार्य बृहस्पति के देवलोक छोड़ जाने की बात सुन चुके थे। बोले, “यह सब तुम्हारे अहंकार के कारण हुआ है, देवराज। अब भी यदि तुम आचार्य बृहस्पति की मना सको और उन्हें देवलोक में ले आओ तो वे दैत्यों पर विजय प्राप्त करने का कोई उपाय तुम्हे बता देंगे। “मैं अपनी भूल पर बहुत पश्चाताप करता उन्हें खोजने के लिए गया था, पितामह। किन्तु मेरे देखते ही देखते वे अपने तपोबल से अदृश्य हो गए।” इंद्र ने कहा। “आचार्य तुमसे कुपित है, इंद्र।” ब्रह्माजी ने कहा, “अब जब तक तुम उनकी आराधना करके उन्हें स्वयं सम्मानपूर्वक देवलोक नहीं ले जाओगे, वे अमरावती नहीं आएंगे।” “फिर क्या किया जाए, पितामह ? आचार्य का कुछ पता-ठिकाना भी तो हमारे पास नहीं है। उन्हें खोजने में समय लगेगा। तब तक तो दैत्य सम्पूर्ण अमरावती को जलाकर राख कर देंगे।” इंद्र की बात सुनकर ब्रह्माजी ने अपने नेत्र बन्द कर लिए। वे चिंतन में डूब गए। कुछ देर बाद उन्होंने अपने नेत्र खोले और इंद्र से कहा, “इंद्र ! इस समय भूमण्डल में सिर्फ एक ही व्यक्ति है जो तुम्हे इस आपदा से मुक्ति दिला सकता है और वह है महर्षि त्वष्टा का महाज्ञानी पुत्र विश्वरूप। अगर तुम उसे अपना पुरोहित नियुक्त कर लो तो वह तुम्हें इस संकट से मुक्त करा देगा।” ब्रह्मा जी ने उपाय बताया। पितामह का परामर्श मानकर देवराज इंद्र महर्षि विश्वरूपं के पास पहुंचे। विश्वरूप के तीन मुख थे। पहले मुख से वे सोमवल्ली लता का रस निकालकर यज्ञ करते समय पीते थे। दूसरे मुख से मदिरा पान करते तथा तीसरे मुख से अन्न आदि भोजन का आहार करते थे। इंद्र ने उन्हें प्रणाम किया तो महर्षि ने पूछा, “आज यहां कैसे आगमन हुआ, देवराज ? आप किसी विपत्ति में तो नही फंस गए ?” “आपने ठीक अनुमान लगाया है मुनिश्रेष्ठ।” इंद्र ने कहा, “देवो पर इस समय बहुत बड़ी विपत्ति आई हुई है, दैत्यों ने अमरावती को घेर रखा है। चारो ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है।” विश्वरूप मुस्कुराए। बोले, ” तो देवो और दैत्यों का पुराना झगड़ा है, देवराज। दोनों हो महर्षि कश्यप की सन्ताने है। इसलिए कोई एक-दूसरे से छोटा नहीं बनना चाहता। तुम्हारे इस झगड़े में मैं क्या कर सकता हूं ?” “देवो को इस समय आपकी सहायता की आवश्यकता है मुनिश्रेष्ठ। सिर्फ आप ही उनका भय दूर कर सकते है।” इस प्रकार इंद्र ने जब विश्वरूप की बहुत अनुनय-विनय की तो विश्वरूप पिघल गए। उन्होंने देवो के यज्ञ का होता (पुरोहित) बनना स्वीकार कर लिया। वे बोले, “देवो की दुर्दशा देखकर ही मैने आपके यज्ञ का होता बनना स्वीकार किया है, देवराज।” ततपश्चात उन्होंने देवराज को नारायण कवच प्रदान करते हुए कहा, “यह कवच ले जाओ देवराज। दैत्यों से युद्ध करते समय यह न सिर्फ तुम्हारी रक्षा करेगा बल्कि तुम्हे विजयश्री भी प्रदान करेगा।” विश्वरूप से नारायण कवच प्राप्त करके देवराज पुनः अमरावती पहुंचे। उनके वहां पहुचने से देवो में नए उत्साह का संचरण हो गया और वे पूरी शक्ति के साथ दैत्यों पर टूट पड़े। भयंकर युद्ध छिड़ गया। इस बार इंद्र के पास नारायण कवच होने के कारण दैत्य मैदान में नहीं ठहर सके। वे पराजित होकर भाग खड़े हुए। विजयश्री देवताओं के हाथ लगी। युद्ध समाप्त होने पर देवराज विश्वरूप का आभार व्यक्त करने के लिए उनके पास पहुंचे। बोले, “आपकी कृपा से हमने दैत्यों पर विजय प्राप्त कर ली है, मुनिवर। अब हम एक इस यज्ञ करना चाहते है जिसके फलस्वरूप देवलोक हमेशा के लिए दैत्यों के भय से मुक्त रह सके। और आप हमे वचन दे ही चुके है कि उस यज्ञ के होता होंगे, तो कृपा करके अब आप हमारे साथ चलिए।” देवराज के अनुरोध पर विश्वरूप अमरावती पहुंचे। उन्होंने यज्ञ में आहुतियां डालनी आरम्भ कर दी। उसी समय एक दैत्य ब्राह्मण का वेश धारण कर महर्षि विश्वरूप के पास आ बैठा। उसने धीरे से महर्षि विश्वरूप से कहा, “महर्षि ! देवताओं का पक्ष लेकर आप जो यह यज्ञ दैत्यों के विनाश के लिए कर रहे है, यह उचित नहीं है।” “क्यों उचित नहीं है ?” विश्वरूप ने पूछा। “इसलिए उचित नहीं है कि देव और दैत्य एक ही पिता की सन्ताने है। आप भूल रहे है कि स्वयं आपकी माताजी दैत्य परिवार से है। क्या आप चाहेंगे कि आपका मातृकुल हमेशा के लिए नष्ट हो जाए ?” बात विश्वरूप की समझ में आ गई। उन्होंने आहुतियां देते

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केवल लक्ष्मण ही कर सकते थे मेघनाद(इंद्रजीत) का वध, पर क्यों? जानिए रामायण का एक अनजान सत्य

हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसार में भर में गाई जाती है। लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी। लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा॥ अगस्त्य मुनि बोले- श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥ उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था॥ ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥ लक्ष्मण ने उसका वध किया इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥ श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥ फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥ अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो चौदह वर्षों तक न सोया हो, जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो और चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥ श्रीराम बोले- परंतु मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा॥ मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥ अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥ प्रभु से कुछ छुपा है भला! दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥ अगस्त्य मुनि ने कहा – क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥ लक्ष्मणजी आए प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा॥ प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?, फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ?, और 14 साल तक सोए नहीं ? यह कैसे हुआ ? लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥ आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं. चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए – आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे. मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था. निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था॥ निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥ आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था। अब मैं 14 साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे. एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥ आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे? मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥ सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥ प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों की गिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥ प्रभु ने कहा- इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था? लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे॥ जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता॥ जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे, जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे, जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक मेंरहे, जिस दिन रावण ने मुझे शक्ति मारी, और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥ इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी॥ विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया ॥ भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया । || ऊँ लं लक्ष्मण देवताभ्यो: नम: ||

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जनक पैदा हुए थे अपने पिता निमि के शरीर मंथन से, यह है धर्म ग्रंथो में वर्णित श्रृष्टि के तीन अदभुत मंथन

आप में अधिकतर पाठक देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के बारे में जानते है। लेकिन हमारे धर्म ग्रंथो में इसके अलावा भी अन्य मंथन का वर्णन है। आज हम आपको तीन ऐसे ही मंथन की कहानियां बता रहे है। ये तीन मंथन इस प्रकार है –1. सागर मंथन2. राजा निमि के शरीर का मंथन3. क्षीर सरोवर का मंथन सागर मंथन (Sagar Manthan)- जैसा की हम सभी जानते है कि देवों और असुरों के बीच सागर मंथन हुआ। मंद्राचल गिरि मथानी बना तथा वासुकि नाग रस्सी बना। मंथन से चौदह रत्नो की प्राप्ति हुई। पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकलने वाली वस्तुओं को रत्न कहा गया है तथा वे चौदह रत्न थे। हलाहल (विष),कामधेनु,उच्चैःश्रवा घोड़ा,ऐरावत हाथी,कौस्तुभ मणि,कल्पद्रुम,रम्भा,लक्ष्मी,वारुणी (मदिरा),चन्द्रमा,पारिजात वृक्ष,पंच जन्य शंख,धन्वन्तरि वैद्य औरअमृत। राजा निमि के शरीर का रिषियों ने मंथन किया । जिसमे सोने की मथानी और रेशम की रस्सी का प्रयोग किया गया । तन का मंथन हुआ।मंथन से चौदह पुत्रों को प्राप्त किया। बारह पुत्रों ने सन्यास ग्रहण किया। तेरहवें पुत्र जनक(शीरध्वज ) को राजा बनाया गया। पुत्रों के नाम-१-जनक(शीरध्वज)२-जीव३-गव,(कुशध्वज)४- सुमंत५-सार६अतिसार७-अमृत८-अभय९-अंशुमान१०- अमन११- आदि१२- अमित१३-अगाध१४-अनन्त क्षीर सरोवर का मंथन (Ksheer Sarovar Manthan)- राजकुमारी वृजेश्वरी का विवाह नही होगा, ऐसी भविष्यवाणी राज ज्योतिष्यों ने की, राजकुमारी ने ये बात नारद मुनि को बताई। नारद ने उसे श्री कृष्ण का तप करने के लिए कहा।राजकुमारी ने घोर तपस्या की भगवान श्री कृष्ण प्रकट हुए,। भगवान श्री कृष्ण ने वृजेश्वरी के साथ मिलकर क्षीर सरोवर का मंथन किया। जिसमे काठ की मथानी और सन की रस्सी का प्रयोग किया । मंथन से चौदह पुरूषों की उत्पत्ति हुई, जिसके साथ वृजेश्वरी का विवाह हुआ । चौदह पुरूषों के नाम—कृष्णेश्वर,पिंगल,कनक,पार्थ,उदधि,बिन्दु,अचल,शूलपाणि, सूरसेन,संदल,सौरभ,सारंग,साज,गोविंद ।। विवाह होने के बाद बृजेश्वरी ने श्री कृष्ण से विनती की और कहा हे प्रभु आप की कृपा से मुझे चौदह पती तो प्राप्त हो गये लेकिन समाज क्या सोचेगा संसार की नजर मुझपे होगी लोग मुझे ताना मारेंगें इस संसार में मै कैसे जियूँगी । श्री कृष्ण ने बृजेश्वरी पर कृपा की चौदहों पुरुषों को एक शरीर में समाहित कर दिया जो ” कृष्णेश्वर” के नाम से जाना गया। एक शरीर में चौदह आत्माओं ने वास किया ( शरीर एक आत्मायें चौदह ) । ||ऊँश्री कृष्णाय गोविन्दाय बलभद्राय वासुदेवाय पर काया प्रवेशाय नमो नम: ऊँ ||डा. अजय दीक्षित जी द्वारा लिखे सभी लेख आप नीचे TAG में Dr. Ajay Dixit पर क्लिक करके पढ़ सकते है।

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मोहिनी और विष्णु भक्त रुक्मांगद की कहानी

 प्राचीन काल में रुक्मांगद नामक एक प्रसिद्ध सार्वभौम नरेश थे। भगवान की आराधना ही उनका जीवन था। वे चराचार जगत में अपने आराध्य भगवान हषीकेश के दर्शन करते तथा भगवान विष्णु की सेवा की भावना से ही अपने राज्य का संचालन करते थे। वे सभी प्राणियों पर क्षमा भाव रखते थे।राजा रुक्मांगद ने अपने जीवन में अपनी समस्त प्रजा एवं परिवार सहित एकादशी-व्रत के अनुष्ठान का नियम धारण कर रखा था। एकादशी के दिन राज्य की ओर से घोषणा होती थी कि आज एकादशी के दिन आठ वर्ष से अधिक और पचासी वर्ष से कम आयुवाला जो भी मनुष्य अन्न खायेगा, वह राजा की ओर से दंडनीय होगा। एकादशी के दिन सभी लोग गंगास्नान एवं दान-पूण्य करते थे। राजा के धर्म की ध्वजा सर्वत्र फहराने लगी। धर्म के प्रभाव से प्रजा सर्वथा सुखी एवं समृद्ध थी। राजा रुक्मांगद का गृहस्थ-जीवन पूर्णरूप से सुखमय था। वे पीताम्बरी भगवान विष्णु की आराधना करते हुए मनुष्य लोक के उत्तम भोग भोग रहे थे। उनकी पतिव्रता पत्नी संध्यावली साक्षात् भगवती लक्ष्मी का दूसरा रूप थी। वह सभी दृष्टि से पति का सुख-सम्पादन करने में अदितीय थी। पति का सुख ही रानी संध्यावली का जीवन था। पति की सेवा वह अपने हाथों से करती थी। उनका पुत्र धर्मांगद गुणों में अपने पिता के अनुरूप ही था। उसकी भी बुद्धि भगवान विष्णु के चरणों में लग गयी थी। वह अपने माता-पिता का आज्ञाकारी था। उसमे संचालन की पूर्ण योग्यता थी वह भी प्रजा पालक एवं प्रजा की रक्षा में सदा तत्पर रहता था। राजा रुक्मांगद ने अपने पुत्र धर्मांगद के गुणों से प्रसन्न होकर राज्य-संचालन का भार उसके कंधो पर देना आरम्भ कर दिया। भगवान श्री हरी की आराधना एवं एकादशी-व्रत के प्रभाव से राज्य में समस्त प्रजा सुखी थी। मृत्यु के पश्चात सभी वैकुण्ठधाम में जाने लगे। नरक के द्वार तक कोई जाता ही नहीं था। सम्पूर्ण नरक सुना हो गया। सूर्यपुत्र यमराज एवं चित्रगुप्त – दोनों के लिए कोई कार्य रहा ही नहीं। जब सभी प्रजानन वैकुंठ जाने लगे, तब यमराज किन्हें दण्ड दे और चित्रगुप्त किनके कर्मो का हिसाब रखे। अंत में वे ब्रह्मा जी की सभा में पहुंचे। उन्होंने ब्रह्मा जी से रुक्मांगद के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा-“पितामह ! भगवान विष्णु की आराधना एवं एकादशी व्रत के प्रभाव से समस्त प्राणी वैकुंठ धाम को प्राप्त हो रहे है। नरक में कोई प्राणी नहीं आ रहा है। लम्बे समय से हम लोग व्यर्थ बैठे है।” यह सुनकर ब्रह्मा जी को अत्यंत प्रसन्नता हुई। वे मन ही मन भक्तराज रुक्मांगद को नमन करने लगे। ब्रह्मा जी रुक्मांगद की ऐसी अदभुद महिमा को और बढ़ाना चाहते थे। उन्होंने अपने मन में संकल्प से एक अत्यंत सुंदर एवं लावण्यवती नारी को प्रकट किया। उस नारी का नाम मोहिनी था। वह संसार की समस्त सुंदरियों में श्रेष्ठ एवं रूप के वैभव से सम्पन्न थी। एक दिन राजा रुक्मांगद वन-भ्रमण के लिए निकले। उसी वन में वह मोहिनी अत्यंत मधुर वीणा बजा रही थी। उस रूपराशि को देखकर राजा रुक्मांगद उस पर मोहित हो गए। राजा ने मोहिनी से विवाह की याचना की। मोहिनी मुस्कुराते हुए एक शर्त रखकर बोली-“महाराज ! समय पर मैं जो कहूं आपको उसका पालन करना पड़ेगा।” राजा ने मोह के वशीभूत होकर वह शर्त स्वीकार कर ली और वे मोहिनी के साथ अपनी राजधानी लौट आए। वहां वे मोहिनी के साथ सुख से समय व्यतीत करने लगे। युवराज धर्मांगद ने शासन की पूर्ण योग्यता प्राप्त कर ली थी। उसने भूमण्डल के सभी मण्डलों को जीतकर उन पर अपना शासन जमा लिया तथा अनेक बहुमूल्य रत्न-मणियां लाकर अपने पिता को अर्पित किये। धर्मांगद के सुराज्य से प्रसन्न होकर रुक्मांगद ने अपनी सम्पूर्ण शासन-व्यवस्था उसे सौंप दी और एक योग्य कन्या से धर्मांगद का विधिपूर्वक विवाह कर दिया। ब्रह्मा जी ने मोहिनी को राजा रुक्मांगद की परीक्षा के लिए ही भेजा था। सुखपूर्वक बहुत समय व्यतीत होने पर एक दिन वह अवसर आया जब रुक्मांगद का एकादशी-व्रत निर्विघ्न चल रहा था। वे एकादशी के दिन कभी अन्न ग्रहण नहीं करते थे। सदैव की भांति वे घोषणा करा देते-मनुष्यों ! तुम सब अपने वैभव के अनुसार एकादशी के दिन चक्र-सुदर्शनधारी भगवान विष्णु की पूजा करो। जो भगवान विष्णु का लोक प्रदान करने वाले मेरे इस धर्मसम्मत वचन का पालन नहीं करेगा, निश्चय ही उसे कठोर दंड दिया जायगा। एक दिन मोहिनी अपने पति रुक्मांगद से एकादशी के दिन अन्न खाने के लिए आग्रह करने लगी। उसने हठपूर्वक कहा कि गृहस्थ राजा को जो सदैव परिश्रम करता है, कभी भी अन्न नहीं छोड़ना चाहिए। राजा ने मोहिनी को बहुत समझाया। उन्होंने शास्त्रो का प्रमाण देकर बताया कि एकादशी के दिन जो अन्न खाता है, वह पाप का भागी और नरकगामी होता है, किन्तु मोहिनी अपने हठ पर अटल रही। मोहिनी ने राजा को विवाह के समय दी हुई अपनी शर्त की स्मृति कराई कि जो मैं कहूंगी उनका आपको पालन करना होगा अन्यथा असत्यवादी हो जाएंगे एवं सत्य का त्याग करने से आपको पाप का भागी होना पड़ेगा। मोहिनी ने अंत में यह भी घोषणा की कि आप एकादशी के दिन अन्न ग्रहण नहीं करेंगे तो मैं आपको त्यागकर चली जाऊंगी। राजा रुक्मांगद ने उसे बहुत समझाया परन्तु मोहिनी अपने निश्चय पर अटल रही। वह अपने पति को असत्यवादी घोषित करती हुई उन्हें छोड़कर जाने को तत्पर थी। इधर राजा रुक्मांगद मोहिनी पर आसक्त होते हुए भी एकादशी के दिन अन्न ग्रहण न करने के निश्चय पर दृढ़ थे। पितृभक्त धर्मांगद एवं पतिव्रता रानी संध्यावली ने मोहिनी को राजा को छोड़कर न जाने के लिए बहुत समझाया। रानी संध्यावली ने अत्यंत मधुर वाणी में मोहिनी से कहा-“जो नारी सदा अपने पति की आज्ञा का पालन करती है, उसे सावित्री के समान अक्षय तथा निर्मल लोक प्राप्त होते है। देवि ! तुम अपना यह आग्रह छोड़ दो। महाराज ने कभी बचपन में भी एकादशी के दिन अन्न ग्रहण नहीं किया है। अतः तुम इसके लिए उन्हें बाध्य मत करो। तुम उनसे कोई अन्य वर मांग लो।” रानी संध्यावली की बात सुनकर दुष्ट ह्रदया मोहिनी ने अपनी एक नई शर्त रखी-“राजा रुक्मांगद अपने हाथों से अपने पुत्र धर्मांगद का सर काटकर भेट करे अथवा एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करे तभी सत्य की रक्षा हो सकती

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राधा जन्म की कहानी – ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार मां के गर्भ से नहीं जन्मी थी राधा 

 धर्म ग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन व्रज में श्रीकृष्ण के प्रेयसी राधा का जन्म हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा भी श्रीकृष्ण की तरह ही अनादि और अजन्मी हैं, उनका जन्म माता के गर्भ से नहीं हुआ। इस पुराण में देवी राधा जन्म से जुड़ी एक अद्भुत कथा का उल्लेख मिलता है।इस पुरण में बताया गया है कि देवी राधा भगवान श्री कृष्ण के साथ गोलोक में निवास करती थी । एक बार देवी राधा गोलोक में नहीं थीं तब श्री कृष्ण अपनी एक अन्य पत्नी विराजा के साथ विहार कर रहे थे। राधा को इस की जैसे की सूचना मिली वह गोलोक लौट आई इन्होंने विरजा को श्री कृष्ण के संग विहार करते हुए देखा तो कृष्ण को भला बुरा कहने लगी। राधा को क्रोधित देखकर विरजा नदी बनकर वहां से चली गई। कृष्ण को बुरा कहने पर श्री कृष्ण के सेवक और मित्र श्रीदामा को क्रोध आ गया और उन्होंने देवी राधा का अपमान कर दिया। इससे देवी राधा और क्रोधित हो गई इन्होंने श्रीदामा को राक्षस कुल में जन्म लेने का शाप दे दिया। श्रीदाम ने भी आवेश में आकर देवी राधा को पृथ्वी पर मनुष्य रुप में जन्म लेने का शाप दे दिया। इस शाप के कारण श्रीदामा शंखचूड़ नामक असुर बना। देवी राधा को कीर्ति और वृषभानु जी की पुत्री के रुप में जन्म लेना पड़ा। लेकिन इनका जन्म देवी कीर्ति के गर्भ से नहीं हुआ था। ऐसे हुआ राधा का जन्म (Radha Birth Story) ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि श्रीदामा और देवी राधा ने जब एक दूसरे को शाप दे दिया तब भगवान श्री कृष्ण ने आकर देवी राधा से कहा कि पृथ्वी पर तुम्हें गोकुल में देवी कीर्ति और वृषभानु की पुत्री के रुप में जन्म लेना होगा। वहां तुम्हारा विवाह रायाण नामक एक वैश्य से होगा और सांसारिक तौर पर तुम रायाण की पत्नी कहलाओगी। रायाण मेरा ही अंश होगा। राधा रुप में तुम मेरी प्रिया बनकर रहोगी और कुछ समय तक आपका मेरा विछोह रहेगा। इस बाद भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि अब आप वृषभानु के घर में जन्म लेने की तैयारी करें। संसार की दृष्टि में राधा की माता कीर्ति गर्भवती हुई लेकिन उनके गर्भ में राधा ने प्रवेश नहीं किया। कीर्ति ने अपने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था और योगमाया के सहयोग से कीर्ति ने वायु को जन्म दिया लेकिन वायु के जन्म के साथ ही वहां राधा कन्या रुप में प्रकट हो गई। इसलिए यह माना जाता है कि देवी राधा अयोनिजा थी।12 वर्ष बीतने पर माता-पिता ने राधा का विवाह रायाण नामक वैश्य के साथ कर दिया। उस समय राधा घर में अपनी छाया को स्थापित करके स्वयं अंतर्धान हो गई। उस छाया के साथ ही रायाण का विवाह हुआ। कुछ समय तक श्रीकृष्ण वृंदावन में श्रीराधा के साथ आमोद-प्रमोद करते रहे। इसके बाद श्रीदामा के श्राप के कारण उनका वियोग हो गया। इस बीच में श्रीकृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारा। सौ वर्ष पूर्ण हो जाने पर तीर्थयात्रा के प्रसंग से श्रीराधा ने श्रीकृष्ण का दर्शन प्राप्त किया। इसके बाद श्रीकृष्ण राधा के साथ गोलोकधाम पधारे।

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उच्ची पिल्लयार मंदिर- मान्यता है की यहां विभीषण ने किया था श्रीगणेश पर वार, जानिए क्यों 

भगवान गणेश के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है उच्ची पिल्लयार मंदिर (Ucchi Pillayar Temple) जो की तमिलनाडू के तिरुचिरापल्ली (त्रिचि) नामक स्थान पर रॉक फोर्ट पहाड़ी की चोटी पर बसा बसा हुआ है। यह मंदिर लगभग 273 फुट की ऊंचाई पर है और मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 400 सिढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है। पहाड़ों पर होने की वजह से यहां का नजारा बहुत ही सुंदर और देखने योग्य होता है। सुंदरता के साथ-साथ यहां की एक और खासियत इस मंदिर से जुड़ी कहानी भी है। मान्यता है इस मंदिर की कहानी रावण के भाई विभीषण से जुड़ी है। मंदिर से जुड़ा इतिहास (History of Ucchi Pillayar Temple) कहा जाता है कि रावण का वध करने के बाद भगवान राम ने अपने भक्त और रावण के भाई विभीषण को भगवान विष्णु के ही एक रूप रंगनाथ की मूर्ति प्रदान की थी। विभीषण वह मूर्ति लेकर लंका जाने वाला था। वह राक्षस कुल का था, इसलिए सभी देवता नहीं चाहते थे कि मूर्ति विभीषण के साथ लंका जाए। सभी देवताओं ने भगवान गणेश से सहायता करने की प्रार्थना की।उस मूर्ति को लेकर यह मान्यता थी कि उन्हें जिस जगह पर रख दिया जाएगा, वह हमेशा के लिए उसी जगह पर स्थापित हो जाएगी। चलते-चलते जब विभीषण त्रिचि पहुंच गया तो वहां पर कावेरी नदी को देखकर उसमें स्नान करने का विचार उसके मन में आया। वह मूर्ति संभालने के लिए किसी को खोजने लगा। तभी उस जगह पर भगवान गणेश एक बालक के रूप में आए। विभीषण ने बालक को भगवान रंगनाथ की मूर्ति पकड़ा दी और उसे जमीन पर न रखने की प्रार्थना की।विभीषण के जाने पर गणेश ने उस मूर्ति को जमीन पर रख दिया। जब विभीषण वापस आया तो उसने मूर्ति जमीन पर रखी पाई। उसने मूर्ति को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन उठा न पाया। ऐसा होने पर उसे बहुत क्रोध आया और उस बालक की खोज करने लगा। भगवान गणेश भागते हुए पर्वत के शिखर पर पहुंच गए, आगे रास्ता न होने पर भगवान गणेश उसी स्थान पर बैठ गए। जब विभीषण वे उस बालक को देखा तो क्रोध में उसके सिर पर वार कर दिया। ऐसा होने पर भगवान गणेश ने उसे अपने असली रूप के दर्शन दिए। भगवान गणेश के वास्तविक रूप को देखकर विभीषण ने उनसे क्षमा मांगी और वहां से चले गए। तब से भगवान गणेश उसी पर्वत की चोटी परऊंची पिल्लयार के रूप में स्थित है। आज भी भगवान गणेश के सिर पर चोट का निशान कहा जाता है कि विभीषण ने भगवान गणेश के सिर पर जो वार किया था, उस चोट का निशान आज भी इस मंदिर में मौजूद भगवान गणेश की प्रतिमा के सिर पर देखा जा सकता है। तिरुचिरापल्ली का प्राचीन नाम था थिरिसिरपुरम मान्यताओं के अनुसार, तिरुचिरापल्ली पहले थिरिसिरपुरम के नाम से जाना जाता था। थिरिसिरन नाम के राक्षस ने इस जगह पर भगवान शिव की तपस्या की थी, इसी वजह से इसका नाम थिरिसिरपुरम रखा गया था। साथ ही यह भी माना जाता है कि इस पर्वत की तीन चोटियों पर तीन देवों पहले भगवान शिव, दूसरी माता पार्वती और तीसरे गणेश (ऊंची पिल्लयार ) स्थित है, जिसकी वजह से इसे थिरि-सिकरपुरम कहा जाता है। बाद में थिरि-सिकरपुरम को बदल कर थिरिसिरपुरम कर दिया गया। मंदिर में मनाएं जाने वाले उत्सव ऊंची पिल्लयार मंदिर (Ucchi Pillayar Temple) में भगवान गणेश की प्रतिदिन छः आरतियां की जाती है। यहां पर आदि पूरम और पंगुनी त्योहार भी बड़ी धूम-धाम से मनाएं जाते हैं। कैसे पहुंचें हवाई मार्ग- तिरुचिरापल्ली जिसे त्रिचि के नाम से भी जाना जाता है, तमिलनाडू के बड़े शहरों में से एक है। मंदिर से लगभग 7 कि.मी. की दूरी पर त्रिचि का एयरपोर्ट है। रेलमार्ग-देश के लगभग सभी बड़े शहरों से त्रिचि के लिए रेल गाड़िया भी चलती हैं।सड़क मार्ग-त्रिची से चेन्नई की दूरी लगभग 320 कि.मी., मदुरै की दूरी लगभग 124 कि.मी. है और नियमित बस सेवा द्वारा दक्षिण भारत में सभी प्रमुख शहरों से त्रिचि पहुंचा जा सकता है।

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जानिए कैसे हुआ भागीरथी गंगा से पहले,”पंच गंगाओं “का धरती पर अवतरण

हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार इस धरती पर भागीरथी गंगा के आने से पहले ही पंच गंगाओं का धरती पर अवतरण हो चूका था। इन पंच गंगाओं का जहाँ अवतरण हुआ था वो जगह “पंचनद तीर्थ” कहलाती है। आइए जानते है कैसे हुआ पंच गंगाओं का धरती पे आगमन ? रिषी शालंकायन के पुत्र शिलाद मुनि बाल ब्रम्हचारी थे। वंश बेल को आगे बढाने के लिए उन्होंने शिवजी की तपस्या की शिव जी ने स्वयं अयोनिज पुत्र बनकर शिलाद मुनि के यहाँ जन्म लेने का शिलादमुनि को वरदान दिया। कुछ समय पश्चात शिलादमुनि यज्ञ करने के लिए यज्ञ क्षेत्र को जोत रहे थे, तभी हल का फल भूमि में फँस गया। उसी समय उन शिव की आग्या से उनका पुत्र रूप होकर प्रलयाग्नि के समान देदीप्यमान रूप में प्रकट हुआ। शिलादमुनि उस बालक को अपनी पर्णकुटी मे ले गये, उस बालक से मुनि को महा आनन्द प्राप्त हुआ इस लिए उसका नाम मुनि ने नन्दी रखा। पाँच वर्ष की अवस्था में मुनि ने नन्दी जी को सांगोपांग वेदों का और शास्त्रों का अध्ययन कराया। सात वर्ष की अवस्था में नन्दी जी ने शिवजी की घोर तपस्या प्रारम्भ कर दी। तपस्या से खुश होकर शिव जी पार्वती सहित प्रकट हुए, और नन्दी जी को अजर अमर अविऩाशी रहने का वरदान दिया। शिवजी ने अपने गले से कमलों की माला उतार कर नन्दीजी के गले में डाल दी। गले में माला पडते ही नन्दीजी के तीन नेत्र तथा दस भुजायें हो गईं। भगवान वृषभध्वज ने अपनी जटाओं से हार के समान निर्मल जल ग्रहण कर ” नदी हो ” ऐसा कहकर जल को नन्दी जी पर छिडक दिया। उसी जल से पाँच शुभ गंगाओं का धरती पर अवतरण हो गया।१— जटोदका गंगा२— त्रिस्रोता गंगा३— वृषध्वनि गंगा४— स्वर्णोदिका गंगा५— जम्बू नदी गंगा यही पाँचो नदियाँ ” पंचनद ” नामक. परम पवित्र तीर्थ के नाम से जानी जाती हैं। जो शिव का पृष्ठदेश कहलाता है , जो जपेश्वर के समीप आज भी वर्तमान है। पार्वती जी ने नन्दी को शिवजी के गणों का अधिपति बना दिया। कुछ समय के बाद ब्रम्हाजी ने मरूत् की कन्या सुयशा के साथ नन्दीजी का व्याह करा दिया। व्याह सम्पन्न हो जाने के बाद शिव जी ने नन्दी जी को अदभुत वरदान दिये। शिवजी ने कहा :—– हे ! नन्दी तुम हमेशा हमारे प्रिय रहोगे तुम अजेय महाबली होकर पूजनीय होगे और ” जहाँ मैं रहूँगा वहीं तुम रहोगे “, ” जहाँ तुम रहोगे वहीं मै रहूँगा”। इसी वरदान के कारण जहाँ भी शिव प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित किया जाता है वहाँ नन्दी जी को जरूर स्थापित किया जाता है।धन्य हैं भोलेनाथ धन्य है उनकी माया |शिवजीकी माया में सारा ब्रम्हांड समाया ||“अजय” चरण में पडा तुम्हारे ये भोले वरदानी |अपनी भक्ती दे दो मुझको आके भवं भवानी ।।

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महाभारत प्रसंग- जब एक स्त्री के देखने मात्र से काले हो गए थे युधिष्ठिर के पैरों के नाखून

शास्त्रों में महाभारत को पांचवां वेद कहा गया है। महाभारत की कथा जितनी बड़ी है, उतनी ही रोचक भी है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। इस ग्रंथ में कुल एक लाख श्लोक हैं, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहते हैं।हम अब तक आपको महाभारत में वर्णित अनेकों कथाएं व प्रसंग बता चुके है। आज हम आपको महाभारत से जुड़ा एक और प्रंसग बता रहे है जब एक स्त्री के देखने मात्र से युधिष्ठर के पैरों के नाख़ून काले हो गए थे। आइए जानते है क्यों हुआ ऐसा।महाभारत के अनुसार, युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव धृतराष्ट्र व गांधारी से मिलने गए। उस समय गांधारी भी अन्यायपूर्वक किए गए दुर्योधन के वध से क्रोधित थी। पांडव डरते-डरते गांधारी के पास पहुंचे। दुर्योधन के वध की बात करने पर भीम ने गांधारी से कहा कि यदि मैं अधर्मपूर्वक दुर्योधन को नहीं मारता तो वह मेरा वध कर देता। धर्मयुद्ध में दुर्योधन से कोई नहीं जीत सकता था। तब गांधारी ने कहा कि तुमने युद्धभूमि में दु:शासन का खून पिया, क्या वह उचित था? तब भीम ने कहा कि दु:शासन का खून मेरे दांतों से आगे नहीं गया। जिस समय दु:शासन ने द्रौपदी के बाल पकड़ थे, उसी समय मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की थी। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता तो क्षत्रिय धर्म का पालन नहीं कर पाता। भीम के बाद युधिष्ठिर गांधारी से बात करने के लिए आगे आए। माता गांधारी बहुत ज्यादा क्रोध में थी जैसे ही गांधारी की दृष्टि पट्टी से होकर युधिष्ठिर के पैरों के नाखूनों पर पड़ी, वह काले हो गए। यह देख अर्जुन श्रीकृष्ण के पीछे छिप गए और नकुल, सहदेव भी इधर-उधर हो गए। थोड़ी देर बाद जब गांधारी का क्रोध शांत हो गया, तब पांडवों ने उनसे आशीर्वाद लिया।

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