सतयुग में पृथ्वी पर श्री हनुमान जन्म का अदभुत रहस्य

श्री व्यास जी ने राजा परीक्षित से कहा:–परीक्षित होनी तो होके रहती है, इसे कोई बदल नही सकता। आज मैं तुम्हे उस रहस्य को बताता हूँ, जो दुर्लभ है। एक समय सृष्टि से जल तत्व अदृश्य हो गया ।सृष्टि में त्राहि-त्राहि मच गयीऔर जीवन का अंत होने लगा तब व्रम्हा जी विष्णु जी ऋषि गण तथा देवता मिलकर श्री शिव जी के शरण में गए और शिव जी से प्रार्थना की और बोले नाथों के नाथ आदिनाथ अब इस समस्या से आप ही निपटें । श्रृष्टि में पुन: जल तत्व कैसे आयेगा । देवों की विनती सुन कर भोलेनाथ ने ग्यारहों रुद्रों को बुलाकर पूछा आप में से कोई ऐसा है जो सृष्टि को पुनः जल तत्व प्रदान कर सके । दस रूदों ने इनकार कर दिया । ग्यारहवाँ रुद्र जिसका नाम हर था उसने कहा मेरे करतल में जल तत्व का पूर्ण निवास है । मैं श्रृष्टि को पुन: जल तत्व प्रदान करूँगा लेकिन इसके लिए मूझे अपना शरीर गलाना पडेगा और शरीर गलने के बाद इस श्रृष्टि से मेरा नामो निशान मिट जायेगा । तब भगवान शिव ने हर रूपी रूद्र को वरदान दिया और कहा:–इस रूद्र रूपी शरीर के गलने के बाद तुम्हे नया शरीर और नया नाम प्राप्त होगा और मैं सम्पूर्ण रूप से तुम्हारे उस नये तन में निवास करूंगा जो श्रृष्टि के कल्याण हेतू होगा। हर नामक रूद्र ने अपने शरीर को गलाकर श्रृष्टि को जल तत्व प्रदान किया ।और उसी जल से एक महाबली वानर की उत्पत्ति हुई। जिसे हम हनुमान जी के नाम से जानते हैं । यह घटना सतयुग के चौथे चरण में घटी । शिवजी ने हनुमान जी को राम नाम का रसायन प्रदान किया।हनुमान जी ने राम नाम का जप प्रारम्भ किया । त्रेतायुग में अन्जना और केशरी के यहाँ पुत्र रूप में अवतरित हुए । इस लिए बाबा तुलसी दास जी ने हनुमान चालीसा में कहा है:— शंकर स्वयं केशरी नन्दनतेज प्रताप महा जग बन्दन *****दोहा— तीन लोक चौदह भुवन कर धारे बलवान ।राम काज हित प्रगट भे बीर बली हनुमान। चौपाई:– अजय शरण तुम्हरे हनुमंता ।नहि देखा तुम सम कोउ संता ।।कृपा करहु मो पर बलधारी ।भवं भवानी हर तिरपुरारी ।। दोहा—राम नाम की है सपथ ये श्रृष्टी के नाथ ।परम् ज्ञान मोहि दीजिए साक्षी श्री रघुनाथजय सियारामजय हनुमान

सतयुग में पृथ्वी पर श्री हनुमान जन्म का अदभुत रहस्य Read More »

वसुदेव, देवकी और रोहिणी के पूर्वजन्म की कथा

कश्यप मुनि और उनकी दो पत्नियों (अदिति और दिति) ने ही जल-जन्तुओं के स्वामी वरूणदेव के शापवश पृथ्वी पर वसुदेव, देवकी और रोहिणी के रूप में अवतार ग्रहण किया था।एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्य के लिए वरुणदेव की गौ ले आये। यज्ञ-कार्य की समाप्ति के बाद वरुणदेव के बहुत याचना करने पर भी उन्होंने वह गौ वापिस नहीं दी। तब उदास मन से वरुणदेव ब्रह्माजी के पास गये और उनको अपना दु:ख सुनाते हुए कहा–हे महाभाग ! वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है। अत: मैंने उसे शाप दे दिया कि मनुष्य जन्म लेकर तुम गोपालक हो जाओ और तुम्हारी दोनों पत्नियां भी मानव योनि में उत्पन्न होकर अत्यधिक दु:खी रहें। मेरी गाय के बछड़े माता से अलग होकर बहुत दु:खी हैं और रो रहे हैं, अतएव पृथ्वीलोक में जन्म लेने पर यह अदिति भी मृतवत्सा (जन्म लेते ही बच्चों का मृत्यु को प्राप्त हो जाना) होगी। इसे कारागार में रहना पड़ेगा और उसे बहुत कष्ट भोगना होगा। वरुणदेव की बात सुनकर प्रजापति ब्रह्मा ने कश्यप मुनि को बुलाया और पूछा–’आपने लोकपाल वरुण की गाय का हरण क्यों किया; और फिर आपने गाय को लौटाया भी नहीं। आप ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं? न्याय को जानते हुए भी आपने दूसरे के धन का हरण किया है।’ लोभ की ऐसी महिमा है कि वह महान-से-महान लोगों को भी नहीं छोड़ता है। संसार में लोभ से बढ़कर अपवित्र अन्य कोई चीज नहीं है; यह सबसे बलवान शत्रु है। महर्षि कश्यप भी इस नीच लोभवश दुराचार में लिप्त हो गये। अत: मर्यादा की रक्षा के लिए ब्रह्माजी ने अपने प्रिय पौत्र कश्यप मुनि को शाप दे दिया कि तुम अपने अंश से पृथ्वी पर यदुवंश में जन्म लेकर वहां अपनी दोनों पत्नियों के साथ गोपालन का कार्य करोगे। इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वी का बोझ उतारने के लिए वरुणदेव तथा ब्रह्माजी ने कश्यप मुनि को शाप दे दिया था। कश्यप मुनि ने अगले जन्म में वसुदेवजी और उनकी दोनों पत्नियों ने देवकी और रोहिणी के रूप में जन्म लिया।

वसुदेव, देवकी और रोहिणी के पूर्वजन्म की कथा Read More »

भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के घर क्यों लिया कृष्णावतार?

स्वायम्भुवमन्वन्तर में जब माता देवकी का पहला जन्म हुआ था, उस समय उनका नाम ‘पृश्नि’ तथा वसुदेव ‘सुतपा’ नामक प्रजापति थे। दोनों ने संतान प्राप्ति की अभिलाषा से सूखे पत्ते खाकर और कभी हवा पीकर देवताओं का बारह हजार वर्षों तक तप किया।इन्द्रियों का दमन करके दोनों ने वर्षा, वायु, धूप, शीत आदि काल के विभिन्न गुणों को सहन किया और प्राणायाम के द्वारा अपने मन के मल धो डाले। उनकी परम तपस्या, श्रद्धा और प्रेममयी भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीविष्णु उनकी अभिलाषा पूर्ण करने के लिए उनके सामने प्रकट हुए और उन दोनों से कहा:——-** कि ‘तुम्हारी जो इच्छा हो माँग लो।’ तब उन दोनों ने भगवान श्रीहरि जैसा पुत्र माँगा। भगवान विष्णु उन्हें तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गये। वर देने के बाद भगवान ने शील, स्वभाव, उदारता आदि गुणों में अपने जैसा अन्य किसी को नहीं देखा। ऐसी स्थिति में भगवान ने विचार किया कि मैंने उनको वर तो दे दिया कि मेरे-सदृश्य पुत्र होगा, परन्तु इसको मैं पूरा नहीं कर सकता; क्योंकि संसार में वैसा अन्य कोई है ही नहीं। किसी को कोई वस्तु देने की प्रतिज्ञा करके पूरी ना कर सके तो उसके समान तिगुनी वस्तु देनी चाहिए। ऐसा विचारकर भगवान ने स्वयं उन दोनों के पुत्र के रूप में तीन बार अवतार लेने का निर्णय किया। इसलिए भगवान जब प्रथम बार उन दोनों के पुत्र हुए, उस समय वे ‘पृश्निगर्भ’ के नाम से जाने गये। दूसरे जन्म में माता पृश्नि ‘अदिति’ हुईं और सुतपा ‘कश्यप’ हुए। उस समय भगवान ‘वामन’ के रूप में उनके पुत्र हुए।फिर द्वापर में उन दोनों का तीसरा जन्म हुआ। इस जन्म में वही अदिति ‘देवकी’ हुईं और कश्यप ‘वसुदेवजी’ हुए और अपने वचन को सच करने के लिए भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में श्रीकृष्णावतार लिया।

भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के घर क्यों लिया कृष्णावतार? Read More »

पुराणों में वर्णित शनि देव से जुड़े अदभुत रहस्य

काशी-विश्वनाथ की स्थापना करी थी शनि देव ने :-स्कन्द पुराण में काशी खण्ड में वृतांत आता है, कि छाया सुत श्री शनिदेव ने अपने पिता भगवान सूर्य देव से प्रश्न किया कि हे पिता! मै ऐसा पद प्राप्त करना चाहता हूँ, जिसे आज तक किसी ने प्राप्त नही किया, हे पिता ! आपके मंडल से मेरा मंडल सात गुना बडा हो, मुझे आपसे अधिक सात गुना शक्ति प्राप्त हो, मेरे वेग का कोई सामना नही कर पाये, चाहे वह देव, असुर, दानव, या सिद्ध साधक ही क्यों न हो। आपके लोक से मेरा लोक सात गुना ऊंचा रहे। दूसरा वरदान मैं यह प्राप्त करना चाहता हूँ, कि मुझे मेरे आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन हों, तथा मै भक्ति ज्ञान और विज्ञान से पूर्ण हो सकुँ शनिदेव की यह बात सुन कर भगवान सूर्य प्रसन्न तथा गदगद हुए, और कह, बेटा ! मै भी यही चाहता हूँ, के तू मेरे से सात गुना अधिक शक्ति वाला हो। मै भी तेरे प्रभाव को सहन नही कर सकूं, इसके लिये तुझे तप करना होगा, तप करने के लिये तू काशी चला जा, वहां जाकर भगवान शंकर का घनघोर तप कर, और शिवलिंग की स्थापना कर, तथा भगवान शंकर से मनवांछित फ़लों की प्राप्ति कर ले। शनि देव ने पिता की आज्ञानुसार वैसा ही किया, और तप करने के बाद भगवान शंकर के वर्तमान में भी स्थित शिवलिंग की स्थापना की, जो आज भी काशी-विश्वनाथ के नाम से जाना जाता है, और कर्म के कारक शनि ने अपने मनोवांछित फ़लों की प्राप्ति भगवान शंकर से की, और ग्रहों में सर्वोपरि पद प्राप्त किया। मोक्ष देने वाला एक मात्र गृह है शनिशनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैं। शनि को सूर्य पुत्र माना जाता है। लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी। शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं। लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है, जितना उसे माना जाता है। इसलिये वह शत्रु नही मित्र है। मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है। सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है, और हर प्राणी के साथ न्याय करता है। जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं, शनि केवल उन्ही को प्रताडित करता है। वैदूर्य कांति रमल:, प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत:।अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद:॥ भावार्थ:-शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब प्रकाशित होता है, तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता है, तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है, ऐसा ऋषि महात्मा कहते हैं। इस कारण शनि है पितृ शत्रुधर्मग्रंथो के अनुसार सूर्य की द्वितीय पत्नी के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवन शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी की उसने अपने खाने पिने तक सुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया ! शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया की शनि मेरा पुत्र नहीं हैं ! तभी से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखता हैं ! शनि देव ने अपनी साधना तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न कर अपने पिता सूर्य की भाँति शक्ति प्राप्त की और शिवजी ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब शनि देव ने प्रार्थना की कि युगों युगों में मेरी माता छाया की पराजय होती रही हैं, मेरे पिता पिता सूर्य द्वारा अनेक बार अपमानित व् प्रताड़ित किया गया हैं ! अतः माता की इक्छा हैं कि मेरा पुत्र अपने पिता से मेरे अपमान का बदला ले और उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली बने ! तब भगवान शंकर ने वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ स्थान होगा ! मानव तो क्या देवता भी तुम्हरे नाम से भयभीत रहेंगे ! शनि के सम्बन्ध मे हमे पुराणों में अनेक आख्यान मिलते हैं। माता के छल के कारण पिता ने उसे शाप दिया। पिता अर्थात सूर्य ने कहा,”आप क्रूरतापूर्ण द्रिष्टि देखने वाले मंदगामी ग्रह हो जाये”. यह भी आख्यान मिलता है कि शनि के प्रकोप से ही अपने राज्य को घोर दुर्भिक्ष से बचाने के लिये राजा दशरथ उनसे मुकाबला करने पहुंचे तो उनका पुरुषार्थ देख कर शनि ने उनसे वरदान मांगने के लिये कहा.राजा दशरथ ने विधिवतस्तुति कर उसे प्रसन्न किया। पद्म पुराण में इस प्रसंग का सविस्तार वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि ने जगत जननी पार्वती को बताया है कि मैं सौ जन्मो तक जातक की करनी का फ़ल भुगतान करता हूँ। एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनि से पूंछा कि तुम क्यों जातकों को धन हानि करते हो, क्यों सभी तुम्हारे प्रभाव से प्रताडित रहते हैं, तो शनि महाराज ने उत्तर दिया,”मातेश्वरी, उसमे मेरा कोई दोष नही है, परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है, इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है, उसे दंड देना मेरा काम है”. एक आख्यान और मिलता है, कि किस प्रकार से ऋषि अगस्त ने जब शनि देव से प्रार्थना की थी, तो उन्होने राक्षसों से उनको मुक्ति दिलवाई थी। जिस किसी ने भी अन्याय किया, उनको ही उन्होने दंड दिया, चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती रही हों, जिन्होने सीता का रूप रखने के बाद बाबा भोले नाथ से झूठ बोलकर अपनी सफ़ाई दी और परिणाम में उनको अपने ही पिता की यज्ञ में हवन कुंड मे जल कर मरने के लिये शनि देव ने विवश कर दिया, अथवा राजा हरिश्चन्द्र रहे हों, जिनके दान देने के अभिमान के कारण सप्तनीक बाजार मे बिकना पडा और,शमशान की रखवाली तक करनी पडी, या राजा नल और दमयन्ती को ही ले लीजिये, जिनके तुच्छ पापों की सजा के लिये उन्हे दर दर का होकर भटकना पडा, और भूनी हुई मछलियां तक पानी मै तैर कर भाग गईं, फ़िर साधारण मनुष्य के द्वारा जो भी मनसा, वाचा, कर्मणा, पाप कर दिया जाता है वह चाहे जाने मे किया जाय या अन्जाने

पुराणों में वर्णित शनि देव से जुड़े अदभुत रहस्य Read More »

उर्वशी अप्सरा के पूर्व जन्म की कहानी

प्राचीन काल में कश्मीर देश में देवव्रत नामक एक द्विज थे। उनके सुन्दर रूप वाली एक कन्या थी। जो मालिनी के नाम से प्रसिद्ध थी। द्विज ने उस कन्या का विवाह सत्यशील नामक सुन्दर बुद्धि मान द्विज के साथ कर दिया।मालिनी कुमार्ग पर चलने वाली पुंश्चली होकर स्वच्छन्दतापूर्वक इधर-उधर रहने लगी। उसके घर में काम- काज के बहाने “उपपति ” रहा करता था । सभी जाति के मनुष्य जार के रूप में उसके यहाँ ठहरते थे । वह कभी पति की आज्ञा नही मानती थी। सदा पर पुरूष के साथ रंगरलियाँ मनाती थी । इसी दोष के कारण उसके सब अंगों में कीडे पड गये थे। उन कीडों से उसकी नाक, जिह्वा और कानों का उच्छेद हो गया,स्तन तथा अंगुलियाँ गल गयीं। उसमें पंगुता आ गयी । इन सब क्लेशों के कारण उसकी मृत्यु हो गयी । तत्पश्चात् सौवीर देश में पद्मबन्धु नामक द्विज के घर में अनेक दुखों से घिरी हुई कुतिया हुई। उस समय भी उसके सिर में कीडे पड गये,और योनि में भी कीडे भरे रहते थे। इस तरह तीस वर्ष बीत गये। एक दिन पद्मबन्धु का पुत्र गंगा में स्नान करके पवित्र हो भीगे वस्त्र से घर आया। उसने तुलसी की वेदी के पास जाकर अपने पैर धोये। दैव योग से वह कुतिया वेदी के नीचे सोई हुई थी। सूर्योदय से पहले का समय था,ब्राह्मणकुमार के चरणोदक से वह नहा गयी और तत्काल उसके सारे पाप नष्ट हो गये । कुतिया को अपने पूर्व जन्म के दुराचरण पूर्ण वृतान्त याद आ गये। और वह वृतान्त कुतिया ने ब्राह्मण कुमार को सुनाये। तब ब्राह्मण कुमार बोले- पति का अपराध करने वाली स्त्री सैकडों बार तिर्यग्योनि में और अरबों बार कीडे की योनि में जन्म लेती है। यह सुनकर कुतिया बोली- दीनवत्सल! मैं आप के दरवाजे पर रहने वाली कुतिया हूँ । मुझ दीना के प्रति दया कीजिये। द्विजेन्द्र मैं आप को नमस्कार करती हूँ । कुतिया की विनती सुनकर ब्राह्मण कुमार के पिता पद्मबन्धु ने संकल्प किया- कुतिया ! ले, मैने द्वादशी का पुण्य तुझे दे दिया। ब्राह्मण के इतना कहते ही कुतिया ने सहसा अपने प्राचीन शरीर का त्यागा कर दिया और दिव्य देह धारण कर दशों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई ब्राह्मण की आग्या से स्वर्गलोक चली गई । वहाँ महान सुखों का उपभोग करके इस पृथ्वी पर भगवान् नर-नारायण के अंश से वही कुतिया “उर्वशी” नाम से प्रकट हुई। धन्य हैं श्री हरि धन्य हैं उनकी माया ।मायापति की माया में “अजय” ब्रहमांड समाया ।।आप की माया का कोई भेद न पाया ।नैनों मे है छबी आप की दिव्य करो मम काया ।। ||हरि हर शरणं गच्छामि ||

उर्वशी अप्सरा के पूर्व जन्म की कहानी Read More »

दीपावली की प्रतिपदा को करें:–पाँचवे वेद ” महाभारत की पूजा, फिर करें गोवर्धन पूजा

व्यास जी ने अर्जुन से कहा :—– पूर्वकाल की बात है,तीन वलवान् असुरों ने आकाश में अपने नगर बना रक्खे थे । वे नगर विमान के रूप में आकाश में विचरा करते थे । उन तीन नगरों में एक लोहे का, दूसरा चाँदी का और तीसरा सोने का बना था । जो सोने का बना था , उसका स्वामी था कमलाक्ष । चाँदी के बने हुए पुर में तारकाक्ष रहता था । तथा लोहे के नगर में विद्युन्माली रहता था । इन्द्र ने उन पुरों का भेदन करने के लिए अपने सभी अस्त्रों का प्रयोग किया पर वे सफल नही हुए ।तब सभी देवता भगवान शंकर की शरण में गये । वहाँ पहुँच कर उन्होंने कहा:——– भगवन ! इन त्रिपुर निवासी दैत्यों को ब्रह्मा जी ने वरदान दे रक्खा है, उसके घमन्ड में फूलकर ये भयंकर दैत्य तीनों लोकों को कष्ट पहुँचा रहे हैं। महादेव! आप के शिवा दूसरा कोई इनका ऩाश करने में समर्थ नही है ,आप ही इन देवद्रोहियों का वध कीजिए । देवताओं के ऐसा कहने पर भगवान शंकर ने उनका हित साधन के लिए तथास्तु कहा और :——— एक दिव्य रथ तथा अस्त्रों का निर्माण किया :—– दिव्य रथ का निर्माण :—-१- रथ की धवाजा बने:–गन्धमादन तथा विन्ध्याचल पर्वत ।२- ऱथ बनी :-समुद्र और वनों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी ।३- नागराज शेष रथ की धुरी के स्थान पर रक्खा गया ।४- पहिया बने :- चन्द्रमा और सूर्य ।५- एलपत्र के पुत्र को और पुष्पदन्त को जुए की कीलें बनाया ।६- मलयाचल को जुआ बनाया ।७- तक्षकनाग को बनाया जुआ बाँधने की रस्सी ।८- घोडे की बागडोर बने सम्पूर्ण प्राणी ।९- चारों वेद बने :- रथ के चार घोडे ।१०- लगाम बने :– उपवेद ।११- गायत्री और सावित्री बनीं :– पगहा१२:- ॐकार को बनाया :– चाबुक ।१३- ब्रह्मा जी बनें :- सारिथ१४- गाण्डीव धनुष बना :- मन्दराचल ।१५- प्रत्यन्चा बने :- वासुकिनाग ।१६- बाण बने ‘- भगवान विष्णु ।१७- बाण का फल बने :- अग्नि देव१८- बाण की पाँख बने :- वायुदेव ।१९:- बाण की पूँछ बने :- वैवस्वत यम ।२०- बाण के फल की धार बनी :– बिजली२१- मेरू को प्रधान ध्वजा बनाया । इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार कर भगवान शंकर उसपे आरूढ हुए । भगवन शंकर उस रथ में एक हजार वर्ष तक रहे । जब तीनों पुर आकाश में एकत्रित हुए तब शिवजी ने तीन गाँठ और तीन फल वाले बाण से उन तीनों पुरों को भेद डाला । -हे ! अर्जुन यह घटना कार्तिक,शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को घटी थी। इस दिन भगवान शंकर की आराधना करने से मानव विश्वविजयी हो जाता है। तथा शिवजी हर तरह के सुख- साधन प्रदान करते हैं। इस लिए -हे ! अर्जुन तुम शिवजी की आराधना करो तुम्हारा कल्याण हो। भगवान शंकर ही रूद्र,शिव,अग्नि,सर्वज्ञ , इन्द्र,वायु और अश्वनीकुमार हैं। वे ही बिजली और मेघ है। सूर्य, चंद्रमा,वरूण,काल,,,मृत्यु, यम, रात, दिवस, मास, पक्ष, ॠतु, संवत्सर, सन्ध्या, धाता, विधाता, विश्वात्मा और विश्वकर्मा भी वे ही हैं। वे निराकार होकर भी सम्पूर्ण देवताओं के आकार धारण करते हैं। वे एक, अनेक, सौ, हजार और लाख हैं। -हे ! अर्जुन शिवजी की महिमा मैं एक हजार वर्ष तक कहता रहूँ, तो भी उनके गुणों का पार नही पा सकता । कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को जो भी प्राणी महाभारत की पूजा भगवान शिव की आराधना करके करता है वह समस्त सुखों का अधिकारी हो जाता है । शिव जी ने व्यास जी को वरदान दिया था। आप के लिखे इस ग्रंथ में मेरा विजयेश्वर नाम से निवास होगा। जो भी महाभारत ग्रन्थ का रसास्वादन करेगा,करायेगा उसकी मनोकामना पूरी होगी ।

दीपावली की प्रतिपदा को करें:–पाँचवे वेद ” महाभारत की पूजा, फिर करें गोवर्धन पूजा Read More »

||अदभुत रहस्य:- जब मृत्यु की भी हुई मृत्यु ||

गोदावरी के पावन तट पे “श्वेत” नामक एक ब्राह्मण रहते थे । जो शिव जी के अनन्य भक्त थे,सदा शिव भक्ती में लीन रहते थे। उनकी आयु पूरी हो चुकी थी । यमदूत उन्हें समय से लेने आये , लेकिन यमदूत श्वेत के घर में प्रवेश नही कर पाये। तब स्वयं ” मृत्यु देव”आये और श्वेत के घर में प्रवेश कर गये। श्वेत की रक्षा भैरव बाबा कर रहे थे। भैरव बाबा ने मृत्यु देव से वापस जाने के लिए कहा लेकिन मृत्यु देव ने भैरव बाबा की बात नही मानी और श्वेत पर फंदा डाल दिया। भक्त पर मृत्यु देव का यह आक्रमण देखकर भैरव बाबा को सहन न हुआ । भैरव बाबा ने मृत्यु पर डंडे से प्रहार कर दिया । मृत्यु देव वहीं ठंडे हो गये  मर गये । मृत्यु की मृत्यु सुनकर यमराज आ गये उन्होंने श्वेत पर यमदंड से प्रहार कर किया। वहाँ पर कार्तिकेय जी पहले से ही मौजूद थे, जो श्वेत की ऱक्षा कर रहे थे। उन्होंने यमराज को मार गिराया और साथ में यम दूतों का संघार कर दिया । मृत्यु की सजा देने वाले यमराज की भी मृत्यु हो गयी।यह देखकर सूर्य देव विचिलित हो गये क्यों की यमदेव सूर्य देव के पुत्र हैं। पुत्र को मरा हुआ देखकर  सूर्य देव ने भगवान शिव की आराधना की। भोलेनाथ प्रगट हुए, शिव जी ने नंदी के द्वारा गौतमी गंगा (गोदावरी) का जल मँगवाया और मरे हुए लोगों पे छिडकवाया तत्क्षण सबके सब स्वस्थ होकर उठ खडे हुए(जीवित हो गये) । इसी लिए शिव जी को विश्वनाथ कहा जाता है।

||अदभुत रहस्य:- जब मृत्यु की भी हुई मृत्यु || Read More »

कर्ण में सूर्य देव के साथ दम्बोद्भव असुर का भी था अंश, जानिए एक अदभुत पौराणिक रहस्य

त्रेता युग में दो कहानियों के तार कर्ण से आ कर जुड़ते हैं । एक असुर था – दम्बोद्भव (Dambodhav) । उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की । सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने “अमरत्व” का वरदान माँगा । सूर्यदेव ने कहा यह संभव नहीं है। तब उसने माँगा कि उसे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो और जैसे ही कोई एक भी कवच को तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो । सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा । इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था । दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की सहक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा । वह “सहस्र कवच” नाम से जाना जाने लगा । उधर सती जी के पिता “दक्ष प्रजापति” ने अपनी पुत्री “मूर्ति” का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र “धर्म” से किया । मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना हुआ था – और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि इसे ख़त्म करने के लिए वे आयें । विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे । समयक्रम में मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम हुए नर और नारायण । दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे – दो शरीरों में एक आत्मा । विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था । दोनों भाई बड़े हुए। एक बार दम्बोध्भव इस वन पर चढ़ आया । तब उसने एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया । उस व्यक्ति ने कहा कि मैं “नर” हूँ , और तुमसे युद्ध करने आया हूँ । भय होते भी दम्बोद्भव ने हंस कर कहा – तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ? मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो । नर ने हँस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं – वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ । युद्ध शुरू हुआ , और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी । जैसे ही हज़ार वर्ष का समय पूर्ण हुआ, नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया । लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर वहीँ गिर पड़े । सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर ही गया । तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है – और वह चकित हो गया । अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा आ रहा है ??? लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे – जो दम्बोद्भव की और नहीं, बल्कि अपने भाई नर की और दौड़ रहे थे । दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था – इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए ।नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए । उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे । तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि हुई है – जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं । अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा ।इस तरह ९९९ बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता । जब 999 कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी । तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ । नर और नारायण उसका पीछा करते वहां आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा । किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए। तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए । इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ हुआ । समय बाद कुंती जी ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ । लेकिन यह आम तौर पर ज्ञात नहीं है, कि , कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों हैं । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है – सूर्य और सहस्रकवच । दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये । कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश है,वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है । जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है, और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है । यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो जाती ।इसिलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे।

कर्ण में सूर्य देव के साथ दम्बोद्भव असुर का भी था अंश, जानिए एक अदभुत पौराणिक रहस्य Read More »

ब्रह्मा जी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने लिखी रामायण, जानिए महर्षि वाल्मीकि से जुडी कुछ रोचक बातें

वाल्मीकि को प्राचीन वैदिक काल के महान ऋषियों कि श्रेणी में प्रमुख स्थान प्राप्त है। पुराणों के अनुसार, इन्होंने कठोर तपस्या कर महर्षि का पद प्राप्त किया था। परमपिता ब्रह्मा के कहने पर इन्होंने भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित रामायण नामक महाकाव्य लिखा। ग्रंथों में इन्हें आदिकवि कहा गया है। इनके द्वारा रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण संसार का सर्वप्रथम काव्य माना गया है। आइए जानते है महर्षि वाल्मीकि के जीवन से जुडी कुछ रोचक बातें इस प्रकार लिखी महर्षि वाल्मीकि ने रामायणरामायण के अनुसार, एक बार महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर गए। वहां उन्होंने प्रेम करते क्रौंच (सारस) पक्षी के जोड़े को देखा। वे दोनों पक्षी मधुर बोली बोलते थे। तभी उन्होंने देखा कि एक निषाद (शिकारी) ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया और मादा पक्षी विलाप करने लगी। उसके इस विलाप को सुन कर महर्षि की करुणा जाग उठी और अनायास ही उनके मुख से ये शब्द निकले मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:।यत् क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्॥ अर्थात- निषाद। तुझे कभी भी शांति न मिले, क्योंकि तूने इस क्रौंच के जोड़े में से एक की, जो काम से मोहित हो रहा था, बिना किसी अपराध के ही हत्या कर डाली। तब महर्षि वाल्मीकि ने सोचा कि अचानक ही उनके मुख से श्लोक की रचना हो गई। जब महर्षि वाल्मीकि अपने आश्रम पहुंचे तब भी उनका ध्यान उस श्लोक की ओर ही था। तभी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में भगवान ब्रह्मा आए और उनसे कहा कि- आपके मुख से निकला यह छंदोबद्ध वाक्य (गाया जाने वाला) श्लोक रूप ही होगा। मेरी प्रेरणा से ही आपके मुख से ऐसी वाणी निकली है। अत: आप श्लोक रूप में ही श्रीराम के संपूर्ण चरित्र का वर्णन करें। इस प्रकार ब्रह्माजी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की। रत्नाकर से बने महर्षि वाल्मीकिधर्म ग्रंथों के अनुसार, महर्षि वाल्मीकि का पूर्व नाम रत्नाकर था। ये अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए लूट-पाट करते थे। एक बार उन्हें निर्जन वन में नारद मुनि मिले। जब रत्नाकर ने उन्हें लूटना चाहा, तो उन्होंने रत्नाकर से पूछा कि- यह काम तुम किसलिए करते हो? तब रत्नाकर ने जवाब दिया कि- अपने परिवारके भरण-पोषण के लिए। नारद ने प्रश्न किया कि- इस काम के फलस्वरूप जो पाप तुम्हें होगा, क्या उसका दंड भुगतने में तुम्हारे परिवार वाले तुम्हारा साथ देंगे? नारद मुनि के प्रश्न का जवाब जानने के लिए रत्नाकर अपने घर गए। परिवार वालों से पूछा कि- मेरे द्वारा किए गए काम के फलस्वरूप मिलने वाले पाप के दंड में क्या तुम मेरा साथ दोगे? रत्नाकर की बात सुनकर सभी ने मना कर दिया। रत्नाकर ने वापस आकर यह बात नारद मुनि को बताई। तब नारद मुनि ने कहा कि- जिन लोगों के लिए तुम बुरे काम करते हो यदि वे ही तुम्हारे पाप में भागीदार नहीं बनना चाहते तो फिर क्यों तुम यह पापकर्म करते हो? नारद मुनि की बात सुनकर इनके मन में वैराग्य का भाव आ गया। अपने उद्धार के उपाय पूछने पर नारद मुनि ने इन्हें राम नाम का जाप करने के लिए कहा। रत्नाकर वन में एकांत स्थान पर बैठकर राम-राम जपने लगे। लेकिन अज्ञानतावश राम-राम की जगह मरा-मरा जपने लगे। कई वर्षों तक कठोर तप के बाद उनके पूरे शरीर पर चींटियों ने बाँबी बना ली जिस कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। कालांतर में महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की। प्रचेता के पुत्र थे महर्षि वाल्मीकिमहर्षि वाल्मीकि को कुछ लोग निम्न वर्ग का मानते हैं, जबकि वाल्मीकि रामायण में स्वयं वाल्मीकि ने श्लोक संख्या 7/93/17, 7/93/19 और आध्यात्म रामायण 7/7/31 में इन्होंने स्वयं को प्रचेता का पुत्र कहा है।प्रचेतसोअहं दशम: पुत्रो राघवनन्दन मनुस्मृति 1/35 में प्रचेता को वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य, कवि आदि का भाई बताया गया है। स्कंदपुराण के वैशाख माहात्म्य में इन्हें जन्मांतर (पूर्व जन्म) का व्याध (शिकारी) बतलाया है। व्याध जन्म के पहले ये स्तंभ नाम के श्रीवस्तगोत्रीय ब्राह्मण थे। व्याध जन्म में शंख ऋषि के सत्संग से, राम नाम के जाप से ये दूसरे जन्म में अग्निशर्मा (मतांतर से रत्नाकर) हुए। वहां भी व्याधों के संग के कुछ दिन संस्कारवश व्याध कर्म करने लगे। फिर सप्तर्षियों के सत्संग से मरा-मरा जपकर बांबी पड़ने से वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुए और वाल्मीकि रामायण की रचना की। कुछ अन्य फैक्ट्स  महर्षि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य में अनेक स्थानों पर सूर्य, चंद्र, व अन्य नक्षत्रों की स्थितियों का वर्णन किया है। साथ ही उन्होंने रावण की मृत्यु के पूर्व राक्षसी त्रिजटा के स्वप्न, श्रीराम के यात्राकालिक मुहूर्त विचार, विभीषण द्वारा लंका के अपशकुनों आदि के बारे में विस्तार पूर्वक बताया है। इससे पता चलता होता है कि महर्षि वाल्मीकि ज्योतिष विद्या एवं खगोल विद्या के भी प्रकांड पंडित थे। अपने वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम लक्ष्मण व सीता सहित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम गए थे। श्रीरामचरितमानस के अनुसार-देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीक आश्रम प्रभु आए॥तथा जब श्रीराम ने सीता का परित्याग कर दिया, तब महर्षि वाल्मीकि ने ही सीता को आश्रय दिया था। इससे सिद्ध होता है कि महर्षि वाल्मीकि श्रीराम के समकालीन थे तथा उनके जीवन में घटित प्रत्येक घटनाओं की जानकारी महर्षि वाल्मीकि को थी।

ब्रह्मा जी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने लिखी रामायण, जानिए महर्षि वाल्मीकि से जुडी कुछ रोचक बातें Read More »

श्रीगणेश गीता जब श्रीगणेश ने दिया राजा वरेण्य को गीता का ज्ञान

भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता उपदेश दिया था, यह बात तो सब जानते हैं लेकिन विघ्न विनाशक गणपति ने भी गीता का उपदेश दिया था, ये कम लोगों को पता है। श्रीकृष्ण गीता और गणेश गीता में लगभग सारे विषय समान हैं। बस दोनों में उपदेश देने की मन: स्थिति में अंतर है। भगवत गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र के मैदान में, मोह और अपना कर्तव्य भूल चुके अर्जुन को दिया गया था। लेकिन गणेश गीता में विघ्नविनाशक गणपति, यह उपदेश युद्ध के बाद , राजा वरेण्य को देते हैं। दोनों ही गीता में गीता सुनने वाले श्रोताओं अर्जुन और राजा वरेण्य की स्थिति और परिस्थिति में अंतर है।भगवत गीता के पहले अध्याय अर्जुन विषाद योग से यह बात स्पष्ट होती है कि अर्जुन मोह के कारण मूढ़ावस्था में चले गये थे। लेकिन राजा वरेण्य मुमुक्षु स्थिति में थे। वह अपने धर्म और कर्तव्य को जानते थे। श्रीगणेश गीता की पृष्ठ भूमि:—देवराज इंद्र समेत सारे देवी देवता, सिंदूरा दैत्य के अत्याचार से परेशान थे। जब ब्रह्मा जी से सिंदूरा से मुक्ति का उपाय पूछा गया तो उन्होने गणपति के पास जाने को कहा। सभी देवताओं ने गणपति से प्रार्थना की कि वह दैत्य सिंदूरा के अत्याचार से मुक्ति दिलायें। देवताओं और ऋषियों की आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने मां जगदंबा के घर गजानन रुप में अवतार लिया। इधर राजा वरेण्य की पत्नी पुष्पिका के घर भी एक बालक ने जन्म लिया। लेकिन प्रसव की पीड़ा से रानी मूर्छित हो गईं और उनके पुत्र को राक्षसी उठा ले गई। ठीक इसी समय भगवान शिव के गणों ने गजानन को रानी पुष्पिका के पास पहुंचा दिया। क्योंकि गणपति भगवान ने कभी राजा वरेण्य की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि वह उनके यहां पुत्र रूप में जन्म लेंगे। लेकिन जब रानी पुष्पिका की मूर्छा टूटी तो वो चतुर्भुज गजमुख गणपति के इस रूप को देखकर डर गईं। राजा वरेण्य के पास यह सूचना पहुंचाई गई कि ऐसा बालक पैदा होना राज्य के लिये अशुभ होगा। बस राजा वरेण्य ने उस बालक यानि गणपति को जंगल में छोड़ दिया। जंगल में इस शिशु के शरीर पर मिले शुभ लक्षणों को देखकर महर्षि पराशर उस बालक को आश्रम लाये। यहीं पर पत्नी वत्सला और पराशर ऋषि ने गणपति का पालन पोषण किया। बाद में राजा वरेण्य को यह पता चला कि जिस बालक को उन्होने जंगल में छोड़ा था, वह कोई और नहीं बल्कि गणपति हैं। अपनी इसी गलती से हुए पश्चाताप के कारण वह भगवान गणपति से प्रार्थना करते हैं कि मैं अज्ञान के कारण आपके स्वरूप को पहचान नहीं सका इसलिये मुझे क्षमा करें। करुणामूर्ति गजानन पिता वरेण्य की प्रार्थना सुनकर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होंने राजा को कृपापूर्वक अपने पूर्वजन्म के वरदान का स्मरण कराया| भगवान् गजानन पिता वरेण्य से अपने स्वधाम-यात्रा की आज्ञा माँगी| स्वधाम-गमन की बात सुनकर राजा वरेण्य व्याकुल हो उठे अश्रुपूर्ण नेत्र और अत्यंत दीनता से प्रार्थना करते हुए बोले- ‘कृपामय! मेरा अज्ञान दूरकर मुझे मुक्ति का मार्ग प्रदान करे|’ राजा वरेण्य की दीनता से प्रसन्न होकर भगवान् गजानन ने उन्हें ज्ञानोपदेश प्रदान किया| यही अमृतोपदेश गणेश-गीता के नाम से विख्यात है| गणेश गीता की मुख्य बातें:——– श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों में 700 श्लोक हैं, जबकि ‘गणेशगीता’ के 11 अध्यायों में 414 श्लोक हैं। ‘सांख्यसारार्थ’ नामक प्रथम अध्याय में गणपति ने योग का उपदेश दिया और राजा वरेण्य को शांति का मार्ग बतलाया। ‘कर्मयोग’ नामक दूसरे अध्याय में गणेशजी ने राजा को कर्म के मर्म का उपदेश दिया। ‘विज्ञानयोग’ नामक तीसरे अध्याय में भगवान गणेश ने वरेण्य को अपने अवतार-धारण करने का रहस्य बताया। गणेशगीता के ‘वैधसंन्यासयोग’ नाम वाले चौथे अध्याय में योगाभ्यास तथा प्राणायाम से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण बातें बतलाई गई हैं। ‘योगवृत्तिप्रशंसनयोग’ नामक पांचवें अध्याय में योगाभ्यास के अनुकूल-प्रतिकूल देश-काल-पात्र की चर्चा की गई है। बुद्धियोग’ नाम के छठे अध्याय में श्रीगजानन कहते हैं, ‘अपने किसी सत्कर्म के प्रभाव से ही मनुष्य में मुझे (ईश्वर को) जानने की इच्छा उत्पन्न होती है। जिसका जैसा भाव होता है, उसके अनुरूप ही मैं उसकी इच्छा पूर्ण करता हूं। अंतकाल में मेरी (भगवान को पाने की) इच्छा करने वाला मुझमें ही लीन हो जाता है। मेरे तत्व को समझने वाले भक्तों का योग-क्षेम मैं स्वयं वहन करता हूं।’ ‘उपासनायोग’ नामक सातवें अध्याय में भक्तियोग का वर्णन है। ‘विश्वरूपदर्शनयोग’ नाम के आठवें अध्याय में भगवान गणेश ने राजा वरेण्य को अपने विराट रूप का दर्शन कराया। नौवें अध्याय में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान तथा सत्व, रज, तम-तीनों गुणों का परिचय दिया गया है। ‘उपदेशयोग’ नामक दसवें अध्याय में दैवी, आसुरी और राक्षसी-तीनों प्रकार की प्रकृतियों के लक्षण बतलाए गए हैं। इस अध्याय में गजानन कहते हैं-‘काम, क्रोध, लोभ और दंभ- ये चार नरकों के महाद्वार हैं, अत: इन्हें त्याग देना चाहिए तथा दैवी प्रकृति को अपनाकर मोक्ष पाने का यत्न करना चाहिए। ‘त्रिविधवस्तुविवेक-निरूपणयोग’ नामक अंतिम ग्यारहवें अध्याय में कायिक, वाचिक तथा मानसिक भेद से तप के तीन प्रकार बताए गए हैं। श्रीमद्भगवत गीता और गणेश गीता श्रीमद्भगवद्गीता और गणेशगीता का आरंभ भिन्न-भिन्न स्थितियों में हुआ था, उसी तरह इन दोनों गीताओं को सुनने के परिणाम भी अलग-अलग हुए। अर्जुन अपने क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने के लिए तैयार हो गया, जबकि राजा वरेण्य राजगद्दी त्यागकर वन में चले गए। वहां उन्होंने गणेशगीता में कथित योग का आश्रय लेकर मोक्ष पा लिया।गणेशगीता में लिखा है, ‘जिस प्रकार जल जल में मिलने पर जल ही हो जाता है, उसी तरह श्रीगणेश का चिंतन करते हुए राजा वरेण्य भी ब्रह्मालीन हो गए।’ गणेशगीता आध्यात्मिक जगत् का दुर्लभ रत्न है

श्रीगणेश गीता जब श्रीगणेश ने दिया राजा वरेण्य को गीता का ज्ञान Read More »

गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर

चौपाई : * पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥।नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥1॥ भावार्थ:-पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखान कर कहिए॥1॥ * प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥2॥ भावार्थ:-हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥2॥ * संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥3॥ भावार्थ:-संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान्‌ पुण्य कौन सा है और सबसे महान्‌ भयंकर पाप कौन है॥3॥ * मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥4॥ भावार्थ:-फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है। (काकभुशुण्डिजी ने कहा-) हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥4॥ *नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥5॥ भावार्थ:-मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥5॥ * सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥6॥ भावार्थ:-ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥6॥ * नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥7॥ भावार्थ:-जगत्‌ में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत्‌ में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥7॥ * संत सहहिं दुख पर हित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी॥भूर्ज तरू सम संत कृपाला। पर हित निति सह बिपति बिसाला॥8॥ भावार्थ:-संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)॥8॥ * सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाई बिपति सहि मरई॥खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥9॥ भावार्थ:-किंतु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और (उन्हें बाँधने के लिए) अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं॥9॥ * पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥10॥ भावार्थ:-वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दुःख के लिए ही होता है॥10॥ * संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥11॥ भावार्थ:-और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चंद्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥11॥ * हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई॥द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥12॥ भावार्थ:-शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥12॥  सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥13॥ भावार्थ:-जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥13॥ * सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥14॥ भावार्थ:-जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥14॥ * मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥15॥ भावार्थ:-सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥15॥ * प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥16॥ भावार्थ:-यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्‌ वे अपार हैं)॥16॥ चौपाई : * ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥17॥ भावार्थ:-ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता

गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर Read More »

कैसे हुआ बालि और सुग्रीव का जन्म तथा कैसे पड़ा ऋष्यमूक पर्वत का नाम

आज इस लेख में हम आपको दो पौराणिक घटनाओं के बारे में बताएंगे- बालि और सुग्रीव का जन्म कैसे हुआ? ऋष्यमूक पर्वत का नाम कैसे पड़ा? 1. ऋष्यमूक पर्वत का नाम कैसे पड़ा?- ऋष्यमूक पर्वत श्रेणियों के अन्तर्गत एक पर्वत पर एक विशाल बानर रहता था, जिसका नाम ऋक्षराज था ।किसी ने उससे पूछा कि इस पर्वत का नाम ऋष्यमूक क्यों पड़ा? तो उसने कहा कि रावण के द्वारा सताए हुए कई ऋषि एक साथ एक जगह मूक (मौन) होकर रावण का विरोध कर रहे थे। रावण जब विश्व विजय के लिए वहाँ से निकला, तो उसने एक साथ लाखों ऋषियों को एक जगह एकत्र देख कर पूछा कि इतने सारे महात्मा लोग यहाँ क्या कर रहे हैं? तो राक्षसों ने जबाव दिया — महाराज ! यह आपके द्वारा सताए हुए ऋषि मूक होकर आपके विरोध स्वरूप यहाँ इकठ्ठे होकर आंदोलन कर रहे हैं । रावण ने कहा कि इनकी इतनी हिम्मत? मार डालो इन सभी को। रावण की आज्ञा से राक्षसों ने उन सभी ऋषियों को मार डाला ।उन्हीं के अस्थि अवशेषों से यह पहाड़ बन गया, जिससे इसका नाम ऋष्यमूक पर्वत पड़ गया । 2. बालि और सुग्रीव का जन्म कैसे हुआ?वह ऋक्षराज नाम का बानर बड़ा ही शक्तिशाली था। अपने बल के घमंड में इधर उधर विचरण करता रहता था ।उस पर्वत के पास में एक बड़ा ही सुंदर तालाब था, लेकिन उस तालाब की यह विशेषता थी कि जो उसमें स्नान करता, वह एक अत्यंत सुंदर स्त्री बन जाता। ऋक्षराज को यह बात मालूम नहीं थी। मस्ती में एक दिन वह उस तालाब में कूद पड़ा और जैसे ही बाहर आया तो उसने देखा कि वह एक बहुत ही सुंदर षोडशी स्त्री के रूप में परिणित हो चुका है। यह देख कर उसे बहुत शर्म महसूस हुई, परंतु वह क्या कर सकता था? इतने में देवराज इन्द्र की दृष्टि उस स्त्री पर पड़ी। देखते ही उनका तेज स्खलित हो गया। वह तेज उस स्त्री के बालों पर गिरा। उसी से बालि की उत्पत्ति हुई । थोड़ी देर बाद सूर्योदय होने पर सूर्य की दृष्टि भी उस सुन्दरी पर पड़ी, तो सूर्यदेव भी उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गये। उनका तेज भी स्खलित हो गया, जो उस स्त्री की ग्रीवा पर पड़ा।उससे जिस पुत्र का जन्म हुआ उसका नाम सुग्रीव पड़ा। क्योंकि ग्रीवा पर तेज गिरा था, इसीलिए वे सुग्रीव कहलाए। दोनों ही सगे भाई थे। बड़ा भाई बालि इन्द्र का पुत्र और छोटा भाई सूर्य का पुत्र सुग्रीव था। बालों पर तेज गिरने से बालि और ग्रीवा पर तेज गिरने से सुग्रीव नाम पड़ा। दोनों का पालन पोषण उसी ऋक्षराज बानर से बनी हुई स्त्री ने किया और उसी ऋष्यमूक पर्वत को अपना निवास बनाया।

कैसे हुआ बालि और सुग्रीव का जन्म तथा कैसे पड़ा ऋष्यमूक पर्वत का नाम Read More »