जब सुदर्शन चक्र के भय से भागे दुर्वासा

अम्बरीष (Ambarish) बड़े धर्मात्मा राजा थे। उनके राज्य में बड़ी सुख शांति थी। धन, वैभव,राज्य, सुख, अधिकार, लोभ, लालच से दूर निश्चिन्त होकर वह अपना अधिकतर समय ईश्वर भक्ति में लगाते थे। अपनी सारी सम्पदा, राज्य आदि सब कुछ वे भगवान विष्णु की समझते थे। उन्हीं के नाम पर वह सबकी देखभाल करते और स्वयं भगवान के भक्त रूप में सरल जीवन बिताते। दान-पुण्य, परोपकार करते हुए उन्हें ऐसा लगता जैसे वह सब कार्य स्वयं भगवान उनके हाथों से सम्पन्न करा रहे है। उन्हें लगता था कि ये भौतिक सुख-साधना, सामग्री सब एक दिन नष्ट हो जाएगी, पर भगवान की भक्ति, उन पर विश्वास, उन्हें इस लोक, परलोक तथा सर्वत्र उनके साथ रहेगी। अम्बरीष (Ambarish) की ऐसी विरक्ति तथा भक्ति से प्रसन्न हो भगवान श्री कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र (Sudarshan Chakra) उनकी रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया था। एक बार की बात है कि अम्बरीष ने एक वर्ष तक द्वादशी प्रधान व्रत रखने का नियम बनाया। हर द्वादशी को व्रत करते। ब्राह्मणों को भोजन कराते तथा दान करते। उसके पश्चात अन्न, जल ग्रहण कर व्रत का पारण करते। एक बार उन्होंने वर्ष की अंतिम द्वादशी को व्रत की समाप्ति पर भगवान विष्णु की पूजा की। महाभिषेक की विधि से सब प्रकार की सामग्री तथा सम्पत्ति से भगवान का अभिषेक किया तथा ब्राह्मणों, पुरोहितों को भोजन कराया, खूब दान दिया। ब्राह्मण-देवों की आज्ञा से जब व्रत की समाप्ति पर पारण करने बैठे ही थे तो अचानक महर्षि दुर्वासा आ पधारे। अम्बरीष ने खड़े होकर आदर से उन्हें बैठाया और भोजन करने के लिए प्रार्थना करने लगे। दुर्वासा (Durvasa) ने कहा-“भूख तो बड़ी जोर की लगी है राजन ! पर थोड़ा रुको, मैं नदी में स्नान करके आ रहा हूँ, तब भोजन करूँगा।” ऐसा कहकर दुर्वासा वहा से चले गए। वहां स्नान-ध्यान में इतना डूबे कि उन्हें याद ही न रहा कि अम्बरीष बिना उनको भोजन कराएं अपना व्रत का पारण नहीं करेंगे। बहुत देर होने लगी। द्वादशी समाप्त होने जा रही थी। द्वादशी के रहते पारण न करने से व्रत खण्डित होता और उधर दुर्वासा को खिलाएं बिना पारण किया नहीं जा सकता था। बड़ी विकट स्थिति थी। अम्बरीष दोनों स्थितियों से परेशान थे। अंत में ब्राह्मणों ने परामर्श दिया कि द्वादशी समाप्त होने में थोड़ा ही समय शेष है। पारण द्वादशी तिथि के अंदर ही होना चाहिए। दुर्वासा अभी नहीं आए। इसीलिए राजन ! आप केवल जल पीकर पारण कर लीजिये। जल पीने से भोजन कर लेने का कोई दोष नहीं लगेगा और द्वादशी समाप्त न होने से व्रत खण्डित भी नहीं होगा। शास्त्रो के विधान के अनुसार ब्राह्मणों की आज्ञा से उन्होंने व्रत का पारण कर लिया। अभी वह जल पी ही रहे थे कि दुर्वासा आ पहुंचे। दुर्वासा ने देखा कि मुझ ब्राह्मण को भोजन कराएं बिना अम्बरीष ने जल पीकर व्रत का पारण कर लिया। बस फिर क्या था, क्रोध में भरकर शाप देने के लिए हाथ उठाया ही था कि अम्बरीष ने विनयपूर्वक कहा-“ऋषिवर ! द्वादशी समाप्त होने जा रही थी। आप तब तक आए नहीं। वर्ष भर का व्रत खण्डित न हो जाए, इसीलिए ब्राह्मणों ने केवल जल ग्रहण कर पारण की आज्ञा दी थी। जल के सिवा मैने कुछ भी ग्रहण नहीं किया है।” पर दुर्वासा क्रोधित हो जाने पर तो किसी की सुनते नहीं थे। अपनी जटा से एक बाल उखाड़कर जमीन पर पटक कर कहा-“लो, मुझे भोजन कराए बिना पारण कर लेने का फल भुगतो। इस बाल से पैदा होने वाली कृत्या ! अम्बरीष को खा जा।” बाल के जमीन पर पड़ते ही एक भयंकर आवाज के साथ कृत्या राक्षसी प्रकट होकर अम्बरीष को खाने के लिए दौड़ी। भक्त पर निरपराध कष्ट आया देख उनकी रक्षा के लिए नियुक्त सुदर्शन चक्र सक्रिय हो उठा। चमक कर चक्राकार घूमते हुए कृत्या राक्षसी को मारा, फिर दुर्वासा की ओर बढ़ा। भगवान के सुदर्शन चक्र को अपनी ओर आते देख दुर्वासा घबराकर भागे, पर चक्र उनके पीछे लग गया। कहां शाप देकर अम्बरीष को मारने चले थे, कहां उनकी अपनी जान पर आ पड़ी। चक्र से बचने के लिए वे भागने लगे। जहां कही भी छिपने का प्रयास करते, वहीं चक्र उनका पीछा करता। भागते-भागते ब्रह्मलोक में ब्रह्मा के पास पहुंचे और चक्र से रक्षा करने के लिए गुहार लगाई। ब्रह्मा बोले-“दुर्वासा ! मैं तो सृष्टि को बनाने वाला हूं। किसी की मृत्यु से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं। आप शिव के पास जाए, वे महाकाल है। वह शायद आपकी रक्षा करे।” दुर्वासा शिव के पास आए और अपनी विपदा सुनाई। दुर्वासा की दशा सुनकर शिव को हंसी आ गई। बोले-“दुर्वासा ! तुम सबको शाप ही देते फिरते हो। ऋषि होकर क्रोध करते हो। मैं इस चक्र से तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि यह विष्णु का चक्र है, इसलिए अच्छा हो कि तुम विष्णु के पास जाओ। वही चाहे तो अपने चक्र को वापस कर सकते है।” दुर्वासा की जान पर आ पड़ी थी। भागे-भागे भगवान विष्णु के पास पहुंचे। चक्र भी वहां चक्कर लगाता पहुंचा। दुर्वासा ने विष्णु से अपनी प्राण-रक्षा की प्रार्थना की। विष्णु बोले-“दुर्वासा ! तुमने तप से अब तक जितनी भी शक्ति प्राप्त की, वह सब क्रोध तथा शाप देने में नष्ट करते रहे। तनिक सी बात पर नाराज होकर झट से शाप दे देते हो। तुम तपस्वी हो। तपस्वी का गुण-धर्म क्षमा करना होता है। तुम्हीं विचार करो, अम्बरीष का क्या अपराध था ? मैं तो अपने भक्तो के ह्रदय में रहता हूं। अम्बरीष के प्राण पर संकट आया तो मेरे चक्र ने उनकी रक्षा की। अब यह चक्र तो मेरे हाथ से निकल चुका है इसलिए जिसकी रक्षा के लिए यह तुम्हारे पीछे घूम रहा है, अब उसी की शरण में जाओ। केवल अम्बरीष ही इसे रोक सकते है।” दुर्वासा भागते-भागते थक गए। भगवान विष्णु ने दुर्वासा को स्वयं नहीं बचाया, बल्कि उपाय बताया। दुर्वासा उल्टे पाँव फिर भागे और आए अम्बरीष के पास। अम्बरीष अभी भी बिना अन्न ग्रहण किए, उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। दुर्वासा को देखते ही उनको प्रणाम कर बोले-“मुनिदेव ! मैं तब से आपकी प्रतीक्षा में बिना अन्न ग्रहण किए केवल वही जल पिया है, आप कहां चले गए थे ? दुर्वासा ने चक्र की ओर इशारा करके कहा-“अम्बरीष ! पहले इससे

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रहस्यमई “चूडामणि” का अदभुत रहस्य “

आज हम अपने पाठकों को रामायण में वर्णित चूडामणि की कहानी (Story of Chudamani) बता रहे है। इस कहानी में आप जानेंगे की- १–कहाँ से आई चूडा मणि ? २–किसने दी सीता जी को चूडामणि ? ३–क्यों दिया लंका में हनुमानजी को सीता जी ने चूडामणि ? ४–कैसे हुआ वैष्णो माता का जन्म? चौ.-मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा चौ–चूडामनि उतारि तब दयऊ हरष समेत पवनसुत लयऊ चूडामणि कहाँ से आई सागर मंथन से चौदह रत्न निकले, उसी समय सागर से दो देवियों का जन्म हुआ – १– रत्नाकर नन्दिनी २– महालक्ष्मी रत्नाकर नन्दिनी ने अपना तन मन श्री हरि ( विष्णु जी ) को देखते ही समर्पित कर दिया ! जब उनसे मिलने के लिए आगे बढीं तो सागर ने अपनी पुत्री को विश्वकर्मा द्वारा निर्मित दिव्य रत्न जटित चूडा मणि प्रदान की ( जो सुर पूजित मणि से बनी) थी। इतने में महालक्षमी का प्रादुर्भाव हो गया और लक्षमी जी ने विष्णु जी को देखा और मनहीमन वरण कर लिया यह देखकर रत्नाकर नन्दिनी मन ही मन अकुलाकर रह गईं सब के मन की बात जानने वाले श्रीहरि रत्नाकर नन्दिनी के पास पहुँचे और धीरे से बोले ,मैं तुम्हारा भाव जानता हूँ, पृथ्वी को भार- निवृत करने के लिए जब – जब मैं अवतार ग्रहण करूँगा , तब-तब तुम मेरी संहारिणी शक्ति के रूपमे धरती पे अवतार लोगी , सम्पूर्ण रूप से तुम्हे कलियुग मे श्री कल्कि रूप में अंगीकार करूँगा अभी सतयुग है तुम त्रेता , द्वापर में, त्रिकूट शिखरपर, वैष्णवी नाम से अपने अर्चकों की मनोकामना की पूर्ति करती हुई तपस्या करो। तपस्या के लिए बिदा होते हुए रत्नाकर नन्दिनी ने अपने केश पास से चूडामणि निकाल कर निशानी के तौर पर श्री विष्णु जी को दे दिया वहीं पर साथ में इन्द्र देव खडे थे , इन्द्र चूडा मणि पाने के लिए लालायित हो गये, विष्णु जी ने वो चूडा मणि इन्द्र देव को दे दिया , इन्द्र देव ने उसे इन्द्राणी के जूडे में स्थापित कर दिया। शम्बरासुर नाम का एक असुर हुआ जिसने स्वर्ग पर चढाई कर दी इन्द्र और सारे देवता युद्ध में उससे हार के छुप गये कुछ दिन बाद इन्द्र देव अयोध्या राजा दशरथ के पास पहुँचे सहायता पाने के लिए इन्द्र की ओर से राजा दशरथ कैकेई के साथ शम्बरासुर से युद्ध करने के लिए स्वर्ग आये और युद्ध में शम्बरासुर दशरथ के हाथों मारा गया। युद्ध जीतने की खुशी में इन्द्र देव तथा इन्द्राणी ने दशरथ तथा कैकेई का भव्य स्वागत किया और उपहार भेंट किये। इन्द्र देव ने दशरथ जी को ” स्वर्ग गंगा मन्दाकिनी के दिव्य हंसों के चार पंख प्रदान किये। इन्द्राणी ने कैकेई को वही दिव्य चूडामणि भेंट की और वरदान दिया जिस नारी के केशपास में ये चूडामणि रहेगी उसका सौभाग्य अक्षत–अक्षय तथा अखन्ड रहेगा , और जिस राज्य में वो नारी रहे गी उस राज्य को कोई भी शत्रु पराजित नही कर पायेगा। उपहार प्राप्त कर राजा दशरथ और कैकेई अयोध्या वापस आ गये। रानी सुमित्रा के अदभुत प्रेम को देख कर कैकेई ने वह चूडामणि सुमित्रा को भेंट कर दिया। इस चूडामणि की समानता विश्वभर के किसी भी आभूषण से नही हो सकती। जब श्री राम जी का व्याह माता सीता के साथ सम्पन्न हुआ । सीता जी को व्याह कर श्री राम जी अयोध्या धाम आये सारे रीति- रिवाज सम्पन्न हुए। तीनों माताओं ने मुह दिखाई की प्रथा निभाई। सर्व प्रथम रानी सुमित्रा ने मुँहदिखाई में सीता जी को वही चूडामणि प्रदान कर दी। कैकेई ने सीता जी को मुँह दिखाई में कनक भवन प्रदान किया। अंत में कौशिल्या जी ने सीता जी को मुँह दिखाई में प्रभु श्री राम जी का हाथ सीता जी के हाथ में सौंप दिया। संसार में इससे बडी मुँह दिखाई और क्या होगी। जनक जीने सीता जी का हाथ राम को सौंपा और कौशिल्या जीने राम का हाथ सीता जी को सौंप दिया। राम की महिमा राम ही जाने हम जैसे तुक्ष दीन हीन अग्यानी व्यक्ति कौशिल्या की सीता राम के प्रति ममता का बखान नही कर सकते। सीताहरण के पश्चात माता का पता लगाने के लिए जब हनुमान जी लंका पहुँचते हैं हनुमान जी की भेंट अशोक वाटिका में सीता जी से होती है। हनुमान जी ने प्रभु की दी हुई मुद्रिका सीतामाता को देते हैं और कहते हैं – मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा चूडामणि उतारि तब दयऊ हरष समेत पवन सुत लयऊ सीता जी ने वही चूडा मणि उतार कर हनुमान जी को दे दिया , यह सोंच कर यदि मेरे साथ ये चूडामणि रहेगी तो रावण का बिनाश होना सम्भव नही है। हनुमान जी लंका से वापस आकर वो चूडामणि भगवान श्री राम को दे कर माताजी के वियोग का हाल बताया।

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तुलसी और विष्णु की कहानी

 सावर्णि मुनि की पुत्री तुलसी अपूर्व सुंदरी थी। उनकी इच्छा थी कि उनका विवाह भगवान नारायण के साथ हो। इसके लिए उन्होंने नारायण पर्वत की घाटी में स्थित बदरीवन में घोर तपस्या की। दीर्घ काल तक तपस्या के उपरांत ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और वर मांगने को कहा।तुलसी ने कहा- “सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव ! आप अन्तर्यामी है। सबके मन की बात जानते है, फिर भी मैं अपनी इच्छा बताती हूं। मैं चाहती हूं कि भगवान श्री नारायण मुझे पति रूप में मिले।”ब्रह्मा ने कहा-“तुम्हारा अभीष्ट तुम्हें अवश्य मिलेगा। अपने पूर्व जन्म में किसी अपराध के कारण तुम्हें शाप मिला है। इसी प्रकार भगवान श्री नारायण के एक पार्षद को भी दानव-कुल में जन्म लेने का शाप मिला है। दानव कुल में जन्म ने के बाद भी उसमे नारायण का अंश विद्यमान रहेगा। इसलिए इस जन्म में पूर्व जन्म के पाप के शमन के लिए सम्पूर्ण नारायण तो नहीं, नारायण के अंश से युक्त दानव-कुल जन्मे उस शापग्रस्त पार्षद से तुम्हारा विवाह होगा। शाप-मुक्त होने पर भगवान श्री नारायण सदा सर्वदा के लिए तुम्हारे पति हो जायेंगे।” तुलसी ने ब्रह्मा के इस वर को स्वीकार किया, क्योंकि मानव-कुल में जन्म के कारण उसे मायावी भोग तो भोगना ही था। तुलसी बदरीवन में ही रहने लगी। नारायण का वह पार्षद दानव कुल में शंखचूड़ के नाम से पैदा हुआ था। कुछ दिनों के बाद वह भ्रमण करता हुआ बदरीवन में आया। यहां तुलसी को देखते ही वह उस पर मुग्ध हो गया। तुलसी के सामने उसने अपने साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। इतने में ही वहां ब्रह्मा जी आ गए और तुलसी से कहा-“तुलसी ! शंखचूड़ को देखो, कैसा देवोपम इसका स्वरूप है। दानव कुल में जन्म लेने के बाद भी लगता है जैसे इसके शरीर में नारायण का वास हो। तुम प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लो।” तुलसी को भी लगा कि उसकी तपस्या पूर्ण हुई। उसे इच्छित फल मिला है। शंखचूड़ के साथ उसका गांधर्व-विवाह हो गया और वह शंखचूड़ के साथ उसके महल में पत्नी बनकर आ गई। शंखचूड़ ने अपनी परम सुंदरी सती साध्वी पत्नी तुलसी के साथ बहुत दिनों तक राज्य किया। उसने अपने राज्य का इतना विस्तार किया कि देवलोक तक उसके अधिकार में आ गया। स्वर्ग का सुख भोगने वाले देवताओं की दशा भिखारियों जैसे हो गई। शंखचूड़ किसी को कष्ट नहीं देता था, पर अधिकार और राज्य छिन जाने से सारे देवता मिलकर ब्रह्मा,विष्णु और शिव की सभा में गए तथा अपनी विपत्ति सुनाई। ब्रह्मा जी ने कहा-“तुलसी परम साध्वी है। उसका विवाह शंखचूड़ से मैंने ही कराया था। शंखचूड़ को तब तक नहीं हराया या मारा जा सकता है जब तक तुलसी को न छला जाए।” विष्णु ने कहा -“शंखचूड़ पूर्व जन्म में मेरा पार्षद था। शाप के कारण उसे दैत्यकुल में जन्म लेना पड़ा। इस जन्म में भी मेरा अंश उसमे व्याप्त है। साथ ही तुलसी के पतिव्रत-धर्म से वह अजेय है।” फिर देवताओं की सहमति से भगवान शिव ने शंखचूड़ के पास सन्देश भेजा कि या तो वह देवताओं का राज्य लौटा दे, या फिर उनसे युद्ध करे। शंखचूड़ शंकर के पास पहुंचा। उसने कहा-“देवाधिदेव ! आपके लिए देवताओं का पक्ष लेना उचित नहीं है। राज्य बढ़ाना हर राजा का कर्तव्य है। मैं किसी को दुखी नहीं कर रहा हूं। देवताओं से कहिए वे मेरी प्रजा होकर रहे। मैंने आपका भी कोई अपकार नहीं किया है। हमारा आपका युद्ध शोभा नहीं देता। अगर आप हार गए तो बड़ी लज्जा की बात होगी। मैं हार गया तो आपकी कीर्ति बहुत अधिक नहीं बढ़ेगी।” भगवान शंकर हंसे। वे तो सब रहस्य समझते थे। तुलसी और शंखचूड़ के पूर्व-जन्म के शाप की अवधि लगभग पूरी हो चुकी थी। बोले- “इसमें कीर्ति और लज्जा की बात नहीं। तुम देवों का राज्य लौटाकर उन्हें उनके पद पर प्रतिष्ठित होने दो। युद्ध से बचने का यही एक उपाय है। ” शंखचूड़ ने कहा-“मैंने युद्ध के बल से देवलोक जीता है। कोई उसे युद्ध के द्वारा ही वापस ले सकता है। यह मेरा अंतिम उत्तर है। मैं जा रहा हूं।” ऐसा कहकर शंखचूड़ चला गया। उसने अपनी पत्नी तुलसी को सारी बात बताई और कहा-“कर्म-भोग सब काल-सूत्र में बंधा है। जीवन में हर्ष, शोक, भय, सुख-दुःख, मंगल-अमंगल काल के अधीन है। हम तो केवल निमित्त है। सम्भव है, भगवान शिव देवों का पक्ष लेकर मुझसे युद्ध करे। तुम चिंता मत करना। तुम्हारा सती तेज मेरी रक्षा करेगा।” दूसरे दिन भगवान शंकर के नेतृत्व में देवताओं ने युद्ध छेड़ दिया। शंखचूड़ ने भीषण वाणों की वर्षा कर उनका वेग रोका। उसके प्रहार से देवता डगमगाने लगे। उसने दानवी शक्ति का प्रयोग कर मायावी युद्ध आरम्भ किया। युद्ध स्थल पर वह किसी को दिखाई नहीं देता था, पर उसके अस्त्र-शस्त्र प्रहार कर देवों को घायल कर रहे थे। देवगण अपने अस्त्र चलाएं तो किस पर चलाएं, क्योंकि कोई शत्रु सामने था ही नहीं। कई दिनों तक इस तरह भयंकर युद्ध चला। शंखचूड़ पराजित नहीं हुआ। तब शिव ने विष्णु से कहा-“विष्णु ! कुछ उपाय करो, अन्यथा मेरा तो सारा यश मिट्टी में मिल जाएगा। विष्णु ने सोचा-‘बल से तो शंखचूड़ को हराया नहीं जा सकता, इसलिए छल का सहारा लेना होगा। उन्होंने तुरन्त अपना स्वरूप शंखचूड़ जैसा बनाया और अस्त्र-शस्त्र से सज्जित हो तुलसी के पास आए, बोले-“प्रिये ! मैं युद्ध जीत गया। सारे देवता भगवान शंकर समेत हार गए। इस ख़ुशी में आओ मैं तुम्हे अंक से लगा लूं।” पति को प्रत्यक्ष खड़ा देख तथा विजय का समाचार सुन वह दौड़कर मायावी शंखचूड़ के गले से लिपट गई। इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ने आलिंगन हो खूब ख़ुशी मनाई। पर-पुरुष के साथ इस प्रकार के व्यवहार से उसका सती-तेज नष्ट हो गया। उसका सती-तेज जो शंखचूड़ की कवच के रूप में रक्षा कर रहा था, वह कवच नष्ट हो गया। शंखचूड़ शक्तिहीन हो गया, यह जानते ही भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से प्रहार किया। त्रिशूल के लगते ही शंखचूड़ जलकर भस्म हो गया। शंखचूड़ के मरने को जानकर विष्णु अपने असली स्वरूप में आ गए। सामने अपने पति शंखचूड़ के स्थान पर भगवान विष्णु को खड़ा देख तुलसी बहुत विस्मित हुई। उसको पता लग गया कि स्वयं नारायण ने उसके साथ छल किया है। क्रोध में

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गजेन्द्र मोक्ष की कहानी 

अति प्राचीन काल की बात है। द्रविड़ देश में एक पाण्ड्यवंशी राजा राज्य करते थे। उनका नाम था इंद्रद्युम्न। वे भगवान की आराधना में ही अपना अधिक समय व्यतीत करते थे। यद्यपि उनके राज्य में सर्वत्र सुख-शांति थी। प्रजा प्रत्येक रीति से संतुष्ट थी तथापि राजा इंद्रद्युम्न अपना समय राजकार्य में कम ही दे पाते थे। वे कहते थे कि भगवान विष्णु ही मेरे राज्य की व्यवस्था करते है। अतः वे अपने इष्ट परम प्रभु की उपासना में ही दत्तचित्त रहते थे। राजा इंद्रद्युम्न के मन में आराध्य-आराधना की लालसा उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई। इस कारण वे राज्य को त्याग कर मलय-पर्वत पर रहने लगे। उनका वेश तपस्वियों जैसा था। सिर के बाल बढ़कर जटा के रूप में हो गए थे। वे निरंतर परमब्रह्म परमात्मा की आराधना में तल्लीन रहते। उनके मन और प्राण भी श्री हरि के चरण-कमलों में मधुकर बने रहते। इसके अतिरिक्त उन्हें जगत की कोई वस्तु नहीं सुहाती। उन्हें राज्य, कोष, प्रजा तथा पत्नी आदि किसी प्राणी या पदार्थ की स्मृति ही नहीं होती थी। एक बार की बात है, राजा इन्द्रद्युम्न प्रतिदिन की भांति स्नानादि से निवृत होकर सर्वसमर्थ प्रभु की उपासना में तल्लीन थे। उन्हें बाह्य जगत का तनिक भी ध्यान नहीं था। संयोग वश उसी समय महर्षि अगस्त्य अपने समस्त शिष्यों के साथ वहां पहुँच गए। लेकिन न पाद्ध, न अघ्र्य और न स्वागत। मौनव्रती राजा इंद्रद्युम्न परम प्रभु के ध्यान में निमग्न थे। इससे महर्षि अगस्त्य कुपित हो गए। उन्होंने इंद्रद्युम्न को शाप दे दिया- “इस राजा ने गुरुजनो से शिक्षा नहीं ग्रहण की है और अभिमानवश परोपकार से निवृत होकर मनमानी कर रहा है। ब्राह्मणों का अपमान करने वाला यह राजा हाथी के समान जड़बुद्धि है इसलिए इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।” महर्षि अगत्स्य भगवदभक्त इंद्रद्युम्न को यह शाप देकर चले गए। राजा इन्द्रद्युम्न ने इसे श्री भगवान का मंगलमय विधान समझकर प्रभु के चरणों में सिर रख दिया। क्षीराब्धि में दस सहस्त्र योजन लम्बा, चौड़ा और ऊंचा त्रिकुट नामक पर्वत था। वह पर्वत अत्यंत सुन्दर एवं श्रेष्ठ था। उस पर्वतराज त्रिकुट की तराई में ऋतुमान नामक भगवान वरुण का क्रीड़ा-कानन था। उसके चारों ओर दिव्य वृक्ष सुशोभित थे। वे वृक्ष सदा पुष्पों और फूलों से लदे रहते थे। उसी क्रीड़ा-कानन ऋतुमान के समीप पर्वतश्रेष्ठ त्रिकुट के गहन वन में हथनियों के साथ अत्यंत शक्तिशाली और अमित पराक्रमी गजेन्द्र रहता था। एक बार की बात है। गजेन्द्र अपने साथियो सहित तृषाधिक्य (प्यास की तीव्रता) से व्याकुल हो गया। वह कमल की गंध से सुगंधित वायु को सूंघकर एक चित्ताकर्षक विशाल सरोवर के तट पर जा पहुंचा। गजेन्द्र ने उस सरोवर के निर्मल,शीतल और मीठे जल में प्रवेश किया। पहले तो उसने जल पीकर अपनी तृषा बुझाई, फिर जल में स्नान कर अपना श्रम दूर किया। तत्पश्चात उसने जलक्रीड़ा आरम्भ कर दी। वह अपनी सूंड में जल भरकर उसकी फुहारों से हथिनियों को स्नान कराने लगा। तभी अचानक गजेन्द्र ने सूंड उठाकर चीत्कार की। पता नहीं किधर से एक मगर ने आकर उसका पैर पकड़ लिया था। गजेन्द्र ने अपना पैर छुड़ाने के लिए पूरी शक्ति लगाई परन्तु उसका वश नहीं चला, पैर नहीं छूटा। अपने स्वामी गजेन्द्र को ग्राहग्रस्त देखकर हथिनियां, कलभ और अन्य गज अत्यंत व्याकुल हो गए। वे सूंड उठाकर चिंघाड़ने और गजेन्द्र को बचाने के लिए सरोवर के भीतर-बाहर दौड़ने लगे। उन्होंने पूरी चेष्टा की लेकिन सफल नहीं हुए। वस्तुतः महर्षि अगत्स्य के शाप से राजा इंद्रद्युम्न ही गजेन्द्र हो गए थे और गन्धर्वश्रेष्ठ हूहू महर्षि देवल के शाप से ग्राह हो गए थे। वे भी अत्यंत पराक्रमी थे। संघर्ष चलता रहा। गजेन्द्र स्वयं को बाहर खींचता और ग्राह गजेन्द्र को भीतर खींचता। सरोवर का निर्मल जल गंदला हो गया था। कमल-दल क्षत-विक्षत हो गए। जल-जंतु व्याकुल हो उठे। गजेन्द्र और ग्राह का संघर्ष एक सहस्त्र वर्ष तक चलता रहा। दोनों जीवित रहे। यह द्रश्य देखकर देवगण चकित हो गए। अंततः गजेन्द्र का शरीर शिथिल हो गया। उसके शरीर में शक्ति और मन में उत्साह नहीं रहा। परन्तु जलचर होने के कारण ग्राह की शक्ति में कोई कमी नहीं आई। उसकी शक्ति बढ़ गई। वह नवीन उत्साह से अधिक शक्ति लगाकर गजेन्द्र को खींचने लगा। असमर्थ गजेन्द्र के प्राण संकट में पड़ गए। उसकी शक्ति और पराक्रम का अहंकार चूर-चूर हो गया। वह पूर्णतया निराश हो गया। किन्तु पूर्व जन्म की निरंतर भगवद आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आई। उसने निश्चय किया कि मैं कराल काल के भय से चराचर प्राणियों के शरण्य सर्वसमर्थ प्रभु की शरण ग्रहण करता हूं। इस निश्चय के साथ गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्त्रोत द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा। गजेन्द्र की स्तुति सुनकर सर्वात्मा सर्वदेव रूप भगवान विष्णु प्रकट हो गए। गजेन्द्र को पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर अत्यंत शीघ्रता से उक्त सरोवर के तट पर पहुंचे। जब जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेन्द्र ने हाथ में चक्र लिए गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु को तीव्रता से अपनी ओर आते देखा तो उसने कमल का एक सुन्दर पुष्प अपनी सूंड में लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा- “नारायण ! जगद्गुरो ! भगवान ! आपको नमस्कार है।” गजेन्द्र को अत्यंत पीड़ित देखकर भगवान विष्णु गरुड़ की पीठ से कूद पड़े और गजेन्द्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर खींच लाए और तुरंत अपने तीक्ष्ण चक्र से ग्राह का मुंह फाड़कर गजेन्द्र को मुक्त कर दिया। ब्रह्मादि देवगण श्री हरि की प्रशंसा करते हुए उनके ऊपर स्वर्गिक सुमनों की वृष्टि करने लगे। सिद्ध और ऋषि-महर्षि परब्रह्म भगवान विष्णु का गुणगान करने लगे। ग्राह दिव्य शरीर-धारी हो गया। उसने विष्णु के चरणो में सिर रखकर प्रणाम किया और भगवान विष्णु के गुणों की प्रशंसा करने लगा। भगवान विष्णु के मंगलमय वरद हस्त के स्पर्श से पाप मुक्त होकर अभिशप्त हूहू गन्धर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके त्रेलोक्य वन्दित चरण-कमलों में प्रणाम कर अपने लोक चला गया। भगवान विष्णु ने गजेन्द्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गन्धर्व,सिद्ध और देवगण उनकी लीला का गान करने लगे। गजेन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने सबके समक्ष कहा- “प्यारे गजेन्द्र ! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन

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वराह अवतार कथा – जब हिरण्याक्ष का वध करने के लिए विष्णु बने वराह

एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनत-सनकादि भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ धाम पहुंचे। वैकुंठ में विष्णु धाम के द्वार पर भगवान के दो पार्षद जय-विजय द्वारपाल के रूप में बैठे थे। इन दिगम्बर साधुओं को देखकर पहले तो उन्हें हंसी आ गई, फिर पूछा- “आप लोग कौन है ? ऐसे नंग-धड़ंग यहां कहां चले आ रहे है ? उनकी बात का सनत ने बुरा नहीं माना, क्योंकि ये द्वारपाल थे और बिना पूरी जांच-पड़ताल के कैसे अंदर जाने देते। अपनी वेश-भूषा पर उनके हंसने का भी बुरा नहीं माना, क्योंकि वैकुंठ जैसे वैभवशाली परिवेश में ऐसे साधुओं का क्या काम। उनके प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा-“हम सनत कुमार भगवान विष्णु के दर्शन करना चाहते है। हम सदा इसी रूप में रहते है, इसलिए हमे अंदर जाने दो। ” मगर जय-विजय नामक द्वारपालों ने सनत-सनकादि को अंदर नहीं जाने दिया। इससे ऋषियों को क्रोध आ गया कि इन द्वारपालों को इतनी भी समझ नहीं की ऋषियों साधुओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। क्रोध में उन्होंने शाप देते हुए कहा-“तुम दोनों ने देवों के साथ रहकर भी दैत्यों जैसा व्यवहार किया है, इसलिए अगले जन्म में तुम दोनों दैत्य कुल में जन्म लोगे।” द्वार पर इस विवाद को सुनकर भगवान विष्णु स्वयं बाहर आ गए और सनत-सनकादि को आदर से अंदर जाने को कहा। उधर जय-विजय को दुखी देख भगवान विष्णु ने कारण पूछा तो उन्होंने अपने शाप की बात बताई। भगवान विष्णु ने कहा-“उद्दंडता का फल तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा। असुर कुल में तुम्हारा अगला जन्म अवश्य होगा। इतनी चिंता मत करो। तुम मेरे पार्षद हो, इसलिए इसका पुण्य भी मिलेगा। मेरे द्वारा ही तुम्हें दैत्य-योनि से मुक्ति मिलेगी।” सनत-सनकादि भगवान के दर्शन कर चले गए। जय-विजय की मृत्यु होने पर उनका जन्म कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के गर्भ से हुआ। दिति दैत्य कुलों की माता थी, अतः उसके गर्भ से जन्म लेने वाले जय-विजय का नाम इस जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुआ। उन दोनों में प्रबल आसुरी शक्ति थी। उन्होंने अपने उत्पात द्वारा आसुरी शक्ति के बल पर आसुरी राज्य स्थापित किया। उन्होंने देवलोक पर भी आक्रमण कर देवताओं को भी त्रस्त कर रखा था। उन्होंने घोषणा की कि अब से उनके राज्य के सारे यज्ञ उनके ही नाम पर होंगे। देवों को कोई यज्ञ भाग नहीं मिलेगा। किसी भी देवी-देवता या ईश्वर की पूजा आराधना के बजाय उनकी ही पूजा होगी। देवगण कभी यहां पहुंच ही न सके, इसलिए मैं पृथ्वी को ही पाताल में पहुंचा देता हूं।” यह निश्चय कर हिरण्याक्ष आसुरी शक्ति के बल पर पृथ्वी को रसातल में ले गया। इससे सारे ब्रह्मांड में उथल-पुथल मच गई। सृष्टि का नियम भंग होने लगा। चतुर्दिक हा-हा-कार मच गया। ऋषियों-मुनियों तथा देवताओं ने मिलकर विष्णु से प्रार्थना की- “भगवान ! देखिए इन दो महापराक्रमी असुरो ने क्या किया ? देवताओं का यज्ञ भाग छीना, पूजा-पाठ, धार्मिक कर्मकांड समाप्त किए और अब तो समस्त भूमण्डल को ही रसातल में ले गए। उठिए, कुछ करिए। ब्रह्मा की सृष्टि में बड़ा व्यवधान उपस्थित हो गया है। आप ऋषियों-मुनियों तथा मानवों के रहने का स्थान बनाएं। पृथ्वी जल में डुब रही है, उसके उद्धार के लिए वैकुण्ठ का वास छोड़कर कोई अवतार लीजिए। ” भगवान विष्णु ने देवताओं तथा ऋषियों को आश्वासन दिया- “जब पृथ्वी पर पाप का भार ज्यादा हो जाता है तो उसके उद्धार के लिए मुझे अवतार लेना ही पड़ता है। आप लोग निश्चिन्त होकर जाइये। मैं कुछ करता हूं।” देवताओं के चले जाने पर भगवान विष्णु ने नीचे देखा। पृथ्वी का कही पता नहीं, सर्वत्र जल-ही-जल दिख रहा था। फिर तो भगवान वाराह के रूप में प्रकट हुए और समुद्र में कूद पड़े, भयंकर गर्जना के साथ अपनी विशाल दाढ़ पर पृथ्वी को रखकर वे अथाह जल राशि को चीरते हुए ऊपर आ गए। पृथ्वी को समुद्र से ऊपर आते देख तथा वाराह का भयंकर शब्द सुनकर हिरण्याक्ष बौखला गया कि किसने उसकी शक्ति को चुनौती दी है। वाराह को देखते ही वह उसे मारने दौड़ा। उसका हर अस्त्र-शस्त्र वराह के शरीर से टकराकर चूर-चूर हो जाता था। भगवान कुछ देर उसके प्रहार झेलते रहे और उसके क्रोध को भड़काते रहे। रूप भले ही वाराह का था, पर थे तो वे परब्रह्म अनन्त शक्ति भगवान विष्णु। उन्होंने एक झटके से हिरण्याक्ष को अपनी दाढ़ पर उठा लिया और घुमाकर आकाश में दूर फेंक दिया। आकाश में चक्कर काटकर वह धड़ाम से पृथ्वी पर वाराह के पास ही गिर पड़ा। मरणासन्न हिरण्याक्ष ने देखा कि वह वाराह अब वाराह न होकर भगवान विष्णु है। उसे अपना पूर्व जन्म याद हो आया। उसने भगवान के चरण पकड़ लिए और कहा- “भगवान ! पाप के शाप का आपने अंत कर दिया और अपने ही हाथों इस जन्म से मुक्ति दिलाई। मुझे तो मुक्ति मिली, पर मेरे भाई हिरण्यकशिपु का क्या होगा ? उसे भी तो मुक्ति दीजिये।भगवान विष्णु हंसकर बोले- “समय से पूर्व किसी के पाप का अंत नहीं होता। तुम्हारे भाई हिरण्यकशिपु के पाप का अभी अंत नहीं है। तुम्हारे अंत के लिए पृथ्वी कारण बनी। उसके अंत के लिए मुझे एक और अवतार लेना पड़ेगा। तुम्हारे लिए वाराह बनना पड़ा। उसके लिए नृसिंह रूप में अवतार लेकर उसका उद्धार करना पड़ेगा।”

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कोकिलावन – यहाँ कोयल दर्शन दिए थे, श्री कृष्ण ने शनिदेव को

 दिल्ली से 128 किमी की दूरी पर तथा मथुरा से 60 किमी की दूरी पर स्थित कोसी कला स्थान पर सूर्यपुत्र भगवान शनिदेव जी का एक अति प्राचीन मंदिर स्थापित है। इसके आसपास ही नंदगांव, बरसाना एवं श्री बांके बिहारी मंदिर स्थित है। कोकिलावन धाम का यह सुन्दर परिसर लगभग 20 एकड में फैला है। इसमें श्री शनि देव मंदिर, श्री देव बिहारी मंदिर, श्री गोकुलेश्वर महादेव मंदिर , श्री गिरिराज मंदिर, श्री बाबा बनखंडी मंदिर प्रमुख हैं। यहां दो प्राचीन सरोवर और गोऊ शाला भी हैं। कहते हैं जो यहां आकर शनि महाराज के दर्शन करते हैं उन्हें शनि की दशा, साढ़ेसाती और ढैय्या में शनि नहीं सताते। प्रत्येक शनिवार को यहां पर आने वाले श्रद्धालु शनि भगवान की 3 किमी की परिक्रमा करते हैं। शनिश्चरी अमावस्‍या को यहां पर विशाल मेले का आयोजन होता है। शनि महाराज भगवान श्री कृष्ण के भक्त माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि कृष्ण के दर्शनों के लिए शनि महाराज ने कठोर तपस्या की। शनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने इसी वन में कोयल के रुप में शनि महाराज को दर्शन दिया। इसलिए यह स्थान आज कोकिला वन के नाम से जाना जाता है। आइए श्री कृष्ण और शनिदेव के प्रसंग को विस्तार से जानते है। कोकिलावन में स्तिथ शनि मंदिर में विराजित शनि देव माता यशोदा ने नहीं करने दिया शनि को कृष्ण दर्शन:जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने नंदगांव पधारे। कृष्णभक्त शनिदेव भी देवताओं संग श्रीकृष्ण के दर्शन करने नंदगांव पहुंचे। परंतु मां यशोदा ने उन्हें नंदलाल के दर्शन करने से मना कर दिया क्योंकि मां यशोदा को डर था कि शनि देव कि वक्र दृष्टि कहीं कान्हा पर न पड़ जाए। परंतु शनिदेव को यह अच्छा नहीं लगा और वो निराश होकर नंदगांव के पास जंगल में आकर तपस्या करने लगे। शनिदेव का मानना था कि पूर्णपरमेश्वर श्रीकृष्ण ने ही तो उन्हें न्यायाधीश बनाकर पापियों को दण्डित करने का कार्य सोंपा है। तथा सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का शनिदेव सदैव कल्याण करते है। श्री कृष्ण ने कोयल बन दिए शनिदेव को दर्शन भगवान् श्री कृष्ण शनि देव कि तपस्या से द्रवित हो गए और शनि देव के सामने कोयल के रूप में प्रकट हो कर कहा – हे शनि देव आप निःसंदेह अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो और आप के ही कारण पापियों – अत्याचारियों – कुकर्मिओं का दमन होता है और परोक्ष रूप से कर्म-परायण, सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का कल्याण होता है, आप धर्मं -परायण प्राणियों के लिए ही तो कुकर्मिओं का दमन करके उन्हें भी कर्तव्य परायण बनाते हो, आप का ह्रदय तो पिता कि तरह सभी कर्तव्यनिष्ठ प्राणियो के लिए द्रवित रहता है और उन्ही की रक्षा के लिए आप एक सजग और बलवान पिता कि तरह सदैव उनके अनिष्ट स्वरूप दुष्टों को दंड देते रहते हो। हे शनि देव ! कोकिलावन में स्तिथ कुंड में स्नान करते भक्त मैं आप से एक भेद खोलना चाहता हूँ ; कि यह बृज-क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और मैं इस पवित्र भूमि को सदैव आप जैसे सशक्त-रक्षक और पापिओं को दंड देने में सक्षम कर्तव्य-परायण शनि देव कि क्षत्र-छाया में रखना चाहता हूँ ; इसलिए हे शनि देव – आप मेरी इस इच्छा को सम्मान देते हुए इसी स्थान पर सदैव निवास करो, क्योंकि मैं यहाँ कोयल के रूप में आप से मिला हूँ इसी लिए आज से यह पवित्र स्थान “कोकिलावन” के नाम से विख्यात होगा। यहाँ कोयल के मधुर स्वर सदैव गूंजते रहेंगे, आप मेरे इस बृज प्रदेश में आने वाले हर प्राणी पर नम्र रहें साथ ही कोकिलावन-धाम में आने वाला आप के साथ – साथ मेरी भी कृपा का पात्र होगा। मंदिर का इतिहास : गरूड़ पुराण में व नारद पुराण में कोकिला बिहारी जी का उल्लेख आता है । तो शनिमहाराज का भी कोकिलावन में विराजना भगवान कृष्ण के समय से ही माना जाता है । बीच में कुछ समय के लिए मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गया था करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व में राजस्थान में भरतपुर महाराज हुए थे उन्होंने भगवान की प्रेरणा से इस कोकिलावन में जीर्ण-शीर्ण हुए मंदिर का अपने राजकोष से जीर्णोधार कराया । तब से लेकर आज तक दिन पर दिन मंदिर का विकास होता चला आ रहा है ।

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असावरी देवी – यह है भगवान शिव कि बहन, जानिए कैसे और क्यों हुई उत्पन्न?

पौराणिक कथा के अनुसार जब देवी पार्वती ने भगवान शिव से विवाह किया तो वह खुद को घर में अकेली महसूस करती थीं। उनकी इच्छा थी कि काश उनकी भी एक ननद होती जिससे उनका मन लगा रहता। लेकिन भगवान शिव तो अजन्मे थे, उनकी कोई बहन नहीं थी इसलिए पार्वती मन की बात मन में रख कर बैठ गईं। भगवान शिव तो अन्तर्यामी हैं उन्होंने देवी पार्वती के मन की बात जान ली। उन्होंने पार्वती से पूछा कोई समस्या है देवी? तब पार्वती ने कहा कि काश उनकी भी कोई ननद होती। भगवान शिव ने कहा मैं तुम्हें ननद तो लाकर दे दूं। लेकिन क्या ननद के साथ आपकी बनेगी. पार्वती जी ने कहा कि भला ननद से मेरी क्यों न बनेगी। भगवान शिव ने कहा ठीक है देवी, मैं तुम्हें एक ननद लाकर दे देता हूं।भगवान शिव ने अपनी माया से एक देवी को उत्पन्न कर दिया। यह देवी बहुत ही मोटी थी, इनके पैरों में दरारें पड़ी हुई थीं। भगवान शिव ने कहा कि यह लो तुम्हारी ननद आ गयी। इनका नाम असावरी देवी है। देवी पार्वती अपनी ननद को देखकर बड़ी खुश हुईं। झटपट असावरी देवी – यह है भगवान् शिव कि बहन, जानिए कैसे और क्यों हुई उत्पन्न के लिए भोजन बनाने लगीं। असावरी देवी स्नान करके आईं और भोजन मांगने लगीं। देवी पार्वती ने भोजन परोस दिया। जब असावरी देवी ने खाना शुरू किया, तो पार्वती के भंडार में जो कुछ भी था सब खा गईं और महादेव के लिए कुछ भी नहीं बचा। इससे पार्वती दुःखी हो गईं। इसके बाद जब देवी पार्वती ने ननद को पहनने के लिए नए वस्त्र दिए, तो मोटी असावरी देवी के लिए वह वस्त्र छोटे पड़ गए। पार्वती उनके लिए दूसरे वस्त्र का इंतजाम करने लगीं। इस बीच ननद रानी को अचानक मजाक सूझा और उन्होंने अपने पैरों की दरारों में पार्वती जी को छुपा लिया।पार्वती जी का दम घुटने लगा। महादेव ने जब असावरी देवी से पार्वती के बारे में पूछा तो असावरी देवी ने झूठ बोला। जब शिव जी ने कहा कि कहीं ये तुम्हारी बदमाशी तो नहीं, असावरी देवी हंसने लगीं और जमीन पर पांव पटक दिया। इससे पैर की दरारों में दबी देवी पार्वती बाहर आ गिरीं। उधर ननद के व्यवहार से देवी पार्वती का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। देवी पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि कृपया ननद को जल्दी से ससुराल भेजने की कृपा करें। मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने ननद की चाह की।भगवान शिव ने असावरी देवी को कैलाश से विदा कर दिया।

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क्यों होता है 12 साल में एक बार कुंभ मेले का आयोजन?

कुम्भ मेले का आयोजन चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन में होता है।  हर जगह कुम्भ मेले का आयोजन  12 साल में एक बार होता है। आइए जानते है क्या है इसका कारण-कुम्भ मेले के 12 वर्ष में एक बार आयोजित होने के पीछे दो मान्यताएं है। पहली ज्योतिष, दूसरी पौराणिक।ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार भचक्र में स्थित 360 अंश को 12 भागों में बांटकर 12 राशियों की कल्पना की गई है। भचक्र से तात्पर्य आकाश मंडल से है। हर कुंभ के निर्धारित मुहूर्त में गुरु और सूर्य विशेष महत्वपूर्ण होते हैं। गुरु एक राशि पर लगभग 13 महीने तक रहता है और फिर उसी राशि पर आने में 12 वर्ष का समय लगता है। यही कारण है कि कुंभ पर्व 12 वर्ष में एक बार होता है। हरिद्वार, प्रयाग व नासिक में हर 12 वें साल में कुंभ की परंपरा है। उज्जैन में कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है क्योंकि इस समय गुरु सिंह राशि में होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार इन्द्र देवता ने महर्षि दुर्वासा को रास्ते में मिलने पर जब प्रणाम किया तो दुर्वासाजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी माला दी, लेकिन इन्द्र ने उस माला का आदर न कर अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर डाल दिया। जिसने माला को सूंड से घसीटकर पैरों से कुचल डाला। इस पर दुर्वासाजी ने क्रोधित होकर इन्द्र को श्रीविहीन होने का शाप दिया। इस घटना के बाद इन्द्र घबराए हुए ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी ने इन्द्र को लेकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे इन्द्र की रक्षा करने की प्रार्थना की। भगवान ने कहा कि इस समय असुरों का आतंक है। इसलिए तुम उनसे संधि कर लो और देवता और असुर दोनों मिलकर समुद्र मंथन कर अमृत निकालों। जब अमृत निकलेगा तो हम तुम लोगों को अमृत बांट देंगे और असुरों को केवल श्रम ही हाथ मिलेगा। पृथ्वी के उत्तर भाग मे हिमालय के समीप देवता और दानवों ने समुद्र का मन्थन किया। इसके लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया। जिसके फलस्वरूप क्षीरसागर से पारिजात, ऐरावत हाथी, उश्चैश्रवा घोड़ा रम्भा कल्पबृक्ष शंख, गदा धनुष कौस्तुभमणि, चन्द्र मद कामधेनु और अमृत कलश लिए धन्वन्तरि निकलें। इस कलश के लिए असुरों और दैत्यों में संघर्ष शुरू हो गया। अमृत कलश को दैत्यों से बचाने के लिए देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत बृहस्पति, चन्द्रमा, सूर्य और शनि की सहायता से उसे लेकर भागे। यह देखकर दैत्यों ने उनका पीछा किया। यह पीछा बारह दिनों तक होता रहा। देवता उस कलश को छिपाने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान को भागते रहे और असुर उनका पीछा करते रहे।इस भागदौड़ में देवताओं को पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करनी पड़ी। इन बारह दिनों की भागदौड़ में देवताओं ने अमृत कलश को हरिद्वार, प्रयाग, नासिक तथा उज्जैन नामक स्थानों पर रखा। इन चारों स्थानों में रखे गए कलश से अमृत की कुछ बूंदे छलक पड़ी। अंत में कलह को शांत करने के लिए समझौता हुआ। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर दैत्यों को भरमाए रखा और अमृत को इस प्रकार बांटा कि दैत्यों की बारी आने तक कलश रिक्त हो गया। देवताओं का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के बराबर माना गया है। इसलिए हर 12 वें वर्ष कुंभ की परंपरा है।

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महाभारत युद्ध में पांण्डवों को जिताने के लिए श्री कृष्ण ने किये ये छल

महाभारत में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को बहुत ही चतुर और सभी कलाओं का जानकार बताया गया है। श्रीकृष्ण ने कई बार चतुराई का उपयोग करते हुए ऐसे काम किए, जिन्हें छल माना जाता है। यहां जानिए 5 ऐसे प्रसंग जब श्रीकृष्ण ने अपनी इस चतुराई का प्रयोग महाभारत युद्ध में पांडवों को जिताने में किया- 1. अर्जुन को ऐसे बचाया कर्ण के दिव्यास्त्र से महाभारत युद्ध से पहले देवराज इंद्र को यह डर था कि उनका पुत्र अर्जुन कर्ण से जीत नहीं पाएगा, जब तक कि कर्ण के पास कुंडल और कवच हैं। इसीलिए इंद्र ने ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण से उसके कुंडल और कवच दान में मांग लिए। कर्ण के इस दानी स्वभाव से इंद्र प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे एक दिव्यास्त्र दिया था। इंद्र ने कर्ण से कहा था कि ये दिव्यास्त्र सिर्फ एक बार चल सकता है और जिस पर भी इसका उपयोग किया जाएगा, वह इंसान हो या देवता बच नहीं सकेगा। कर्ण ने ये दिव्यास्त्र अर्जुन के लिए संभाल कर रख लिया था। कर्ण चाहता था कि इस दिव्यास्त्र से ही अर्जुन को युद्ध में पराजित करेगा। श्रीकृष्ण ये बात जानते थे कि कर्ण के पास जब तक ये दिव्यास्त्र है पांडव कौरवों को हरा नहीं सकते हैं और इस दिव्यास्त्र के रहते अर्जुन भी कर्ण का सामना नहीं कर पाएगा। इसीलिए श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में भीम के विशालकाय पुत्र घटोत्कच को ले आए। घटोत्कच के युद्ध में आते ही कौरव सेना में हाहाकार मच गया। कोई भी यौद्धा घटोत्कच का सामना नहीं कर पा रहा था। तब दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने इंद्र के दिव्यास्त्र का उपयोग किया और घटोत्कच को मार दिया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कर्ण के दिव्यास्त्र का उपयोग करवा दिया और अर्जुन को बचा लिया। 2. श्रीकृष्ण की चतुराई से दुर्योधन की जांघ नहीं बन पाई लोहे की महाभारत युद्ध के समय गांधारी ने अपने पुत्र दुर्योधन को पूरी तरह नग्न अवस्था में बुलवाया था। माता की आज्ञा का पालन करने के लिए दुर्योधन भी नग्न अवस्था में ही जा रहा था, तब श्रीकृष्ण दुर्योधन को नग्न देखकर हंसने लगे। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से कहा कि इस अवस्था में माता के सामने जाओगे तो तुम्हें शर्म नहीं आएगी। ये बात सुनकर दुर्योधन ने अपने पेट के नीचे जांघ वाले हिस्से पर केले का पत्ता लपेट लिया और इसी अवस्था में गांधारी के सामने पहुंच गया। गांधारी ने अपनी आंखों पर बंधी पट्टी खोलकर दुर्योधन के शरीर पर दिव्य दृष्टि डाली। इस दिव्य दृष्टि के प्रभाव से दुर्योधन की जांघ के अलावा पूरा शरीर लोहे के समान हो गया। जांघ लोहे की तरह इसलिए नहीं हुई, क्योंकि दुर्योधन ने जांघ पर केले का पत्ता लपेट लिया था। श्रीकृष्ण जानते थे कि यदि गांधारी ने नग्न दुर्योधन पर दिव्य दृष्टि डाल दी तो उसका पूरा शरीर लोहे के समान हो जाएगा। इसके बाद कोई भी दुर्योधन को पराजित नहीं कर पाएगा। श्रीकृष्ण ने चतुराई से दुर्योधन की जांघ को केले के पत्ते से ढकवा दिया था। इसी कारण दुर्योधन की जांघ लोहे के समान नहीं हो पाई और शेष पूरा शरीर लोहे का हो गया था। 3. दुर्योधन की जांघ पर प्रहार करने के लिए श्रीकृष्ण ने उकसाया भीम को युद्ध में भीम और दुर्योधन का आमना-सामना हुआ। तब भीम दुर्योधन को किसी भी प्रकार पराजित नहीं कर पा रहा था, क्योंकि दुर्योधन का शरीर लोहे की तरह बन चुका था और भीम की गदा के प्रहारों का कोई असर उस पर नहीं हो रहा था। यह देखकर श्रीकृष्ण ने दुर्योधन की जांघ पर प्रहार करने के लिए भीम को इशारों में उकसाया। इसके बाद भीम ने दुर्योधन की जांघ पर प्रहार किया, जिससे दुर्योधन घायल हो गया। सिर्फ दुर्योधन की जांघ ही लोहे की तरह नहीं बन पाई थी। गदा युद्ध का एक नियम यह भी था कि योद्धा एक-दूसरे पर सिर्फ कमर के ऊपर ही प्रहार कर सकते थे, लेकिन श्रीकृष्ण के उकसाने पर भीम ने दुर्योधन की कमर के नीचे जांघ पर गदा से प्रहार किया था। जिससे बलराम श्रीकृष्ण पर क्रोधित भी हुए थे। 4. जयद्रथ को इस चतुराई से लेकर आए अर्जुन के सामने महाभारत युद्ध में जयद्रथ के कारण अकेला अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया था और दुर्योधन आदि योद्धाओं ने एक साथ मिलकर उसे मार दिया था। जब ये बात अर्जुन को पता चली तो उसने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध कर दूंगा, यदि ऐसा नहीं हुआ तो स्वयं अग्नि समाधि ले लूंगा। इस प्रतिज्ञा के बाद अगले दिन पूरी कौरव सेना जयद्रथ की रक्षा के लिए तैनात कर दी गई। सभी जानते थे कि किसी भी प्रकार जयद्रथ को सूर्यास्त तक बचा लिया तो अर्जुन खुद ही अपने प्राणों का अंत कर लेगा। अर्जुन के बिना कौरव आसानी से पांडवों को हरा सकते थे। जब काफी समय तक अर्जुन जयद्रथ तक नहीं पहुंच पाया तो श्रीकृष्ण ने अपनी माया से सूर्य को कुछ देर के लिए छिपा लिया, जिससे ऐसा लगने लगा कि सूर्यास्त हो गया। सूर्यास्त समझकर जयद्रथ खुद ही अर्जुन के सामने आ गया और हंसने लगा। ठीक उसी समय सूर्य पुन: निकल आया और अर्जुन ने जयद्रथ का वध कर दिया। 5. श्रीकृष्ण की चतुराई से अर्जुन ने ऐसे हराया भीष्म को महाभारत युद्ध की शुरुआत में ही कौरव सेना के सेनापति पितामह भीष्म ने पांडवों की सेना में तबाही मचा दी थी। उस समय पांडवों के लिए ये जरूरी हो गया कि किसी भी तरह पितामह भीष्म को पराजित किया जाए। भीष्म को पराजित करना बहुत मुश्किल था, इसीलिए श्रीकृष्ण युद्ध में शिखण्डी को लेकर आए। शिखण्डी पूर्व जन्म में अंबा थी जो भीष्म से बदला लेना चाहती थी। भीष्म ये बात जानते थे कि शिखण्डी स्त्री से पुरुष बना है, इसीलिए भीष्म उसे स्त्री ही मानते थे। युद्ध में श्रीकृष्ण ने शिखण्डी को अर्जुन की ढाल बनाया। शिखण्डी को सामने देखकर भीष्म ने शस्त्र रख दिए, क्योंकि वे किसी भी स्त्री के सामने शस्त्र नहीं उठा सकते थे। इसका फायदा उठाकर अर्जुन ने शिखण्डी के पीछे से भीष्म पर बाणों की बारिश कर दी और भीष्म बाणों की शय्या पर पहुंच गए।

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श्री राम और कंबंध राक्षस का प्रसंग

यह तब की बात है जब सीताजी को रावण, श्रीराम तथा लक्ष्मण की अनुपस्थिति मंं हरण कर ले गया था। जब तक दोनों वापस लौटे सीताजी कुटिया में नहीं थीं, यह देख श्रीराम व्याकुल हो उठे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार सीता कहां गईं, और उनकी खोज में दोनों जंगल की ओर निकल गए। कुछ दूर जाने पर उन्होंने एक गिद्ध को ज़ख्मी हालत में देखा, वह अपने आखिरी श्वास ले रहा था। वह था जटायू, उसने बताया कि उसने श्रीराम की पत्नी सीता को देखा है, लंका का दुष्ट राजा रावण उसे अपने साथ ले गया। वह सीताजी को रावण से छुड़ाने का प्रयास ही कर रहा था, जिस दौरान रावण ने उस पर तीखा प्रहार किया। यह बताते हुए जटायु ने अपनी आखिरी सांसें लीं, जिसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण ने जटायु का अंतिम संस्कार किया। अब वे यह तो जान गए थे कि सीताजी को रावण ले गया, लेकिन उन तक कैसे पहुंचा जाए यह नहीं जानते थे। लेकिन मन तो परेशान था, इसलिए पांव ना रुके और दोनों घने जंगल में सीताजी की तलाश में आगे बढ़ते चले गए। कुछ दूर जाने पर अचानक उन्होंने एक अजीब से प्राणी को देखा, वह एक राक्षस था जिसका नाम था ‘कबंध’। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण के अनुसार यह राक्षस उस काल के सबसे अजीबोगरीब राक्षसों में से एक था। इस राक्षस का सिर, घड़, मुख, कोई भी अंग सही स्थान पर नहीं था। कहते हैं कि इसका मुंह इसके पेट के स्थान पर था। और इसका दिमाग इसके सीने पर था तथा दोनों के बीचो-बीच थी इसकी आंख, लेकिन एक ही आंख। कहते हैं कि जब श्रीराम और लक्ष्मण ने उस राक्षस को देखा तो वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था। उसके दोनों हाथों में जंगली जीव थे जिन्हें वह इधर-उधर पटक रहा था, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र श्रीराम और लक्ष्मण पर पड़ी तो वह उनकी ओर दौड़ा चला आया। अपने विशाल शरीर का फायदा उठाते हुए उसने दोनों को अपने हाथों में पकड़ लिया और तेज़ी से मसलने की कोशिश करने लगा। लेकिन तभी बेहद कुशलता से श्रीराम और लक्ष्मण ने कबंध के दोनों हाथ काट दिए। हाथ कटकर धरती पर गिरे और दोनों राक्षस की कैद से छूट गए। दूसरी ओर कबंध स्वयं भी दर्द से कराहता हुआ ज़मीन पर आ गिरा। अपने सामने श्रीराम को देख वह समझ गया कि वे कौन हैं। वह विनम्रतापूर्वक श्रीराम की ओर बढ़ा और बोला, ‘हे देव! मैं तो आप ही का इंतज़ार कर रहा था। मैं जानता था कि मुझ पापी को इस दण्ड से मुक्ति देने के लिए आप ज़रूर आएंगे’। कबंध ने बताया कि वह पिछले जन्म में एक ऋषि पुत्र था लेकिन वह कुछ दुष्ट मिज़ाज़ का था। वह तपस्या में लीन अन्य ऋषियों को तंग करता और राक्षसों जैसे वेश बनाकर उनकी साधना भंग करने पहुंच जाता। उसकी इन्हीं हरकतों से तंग आकर एक ऋषि ने उसे हमेशा के लिए राक्षस बनने का श्राप दे दिया, जिस कारणवश वह इस अजीबोगरीब कबंध राक्षस के वेश में जंगल में भटक रहा था। लेकिन आज वह श्रीराम द्वारा मुक्त हुआ है, अपनी मुक्ति से प्रसन्न होकर उसने श्रीराम से वहां आने का कारण पूछा। तब मालूम हुआ कि वे दोनों उस घने जंगल में माता सीता की खोज में आए हैं जिसे दैत्य रावण अपने साथ ले गया है। वजह जानने पर कबंध हैरान हो गया और श्रीराम को सचेत करने लगा कि रावण बेहद अहंकारी दैत्य है। वह काफी बलशाली है, ना केवल अन्य दैत्य बल्कि स्वयं देवता भी उससे भय खाते हैं। उसने सभी देवताओं को भी परेशान किया हुआ है। उसने कहा कि वह जानता है कि श्रीराम अपनी पत्नी को रावण की कैद से छुड़ाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। लेकिन फिर भी वह एक ऐसा सुझाव देना चाहता है जिससे उनके बंद हुए मार्ग खुलते जाएंगे और अंत में वे अपनी अर्धांगिनी को लेकर ही आएंगे। रामायण ग्रंथ में कबंध तथा श्रीराम की इस वार्तालाप के ऊपर एक श्लोक मौजूद है – “गच्छ शीघ्रमितो वीर सुग्रीवं तं महाबलम्। वयस्यं तं कुरु क्षिप्रमितो गत्वाद्य राघव।।“ अर्थात् सुग्रीव ही वह शख़्स है जो उन्हें सीताजी तक पहुंचने में मदद कर सकता है। उन्हें उसकी सहायता जरूर लेनी चाहिए। कंबध ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि श्रीराम अकेले अपनी पत्नी तक पहुंचने तथा दैत्य रावण के साथ संघर्ष करने के लिए सक्षम नहीं हैं, वरन् उसके इस सुझाव के पीछे एक खास कारण छिपा है। इसमें कोई शक नहीं कि एक इंसान अपनी समझदारी का उपयोग करके एक बलवान को परास्त नहीं कर सकता, लेकिन उसकी समझदारी इसमें ही है कि वह उस बलवान को हराने के लिए सही विकल्पों का प्रयोग करे। अत: कबंध के अनुसार श्रीराम के लिए सुग्रीव एकमात्र ऐसा विकल्प था जो कठिनाई के इस मार्ग में उनके लिए सहायक सिद्ध होने वाला था। लेकिन रामायण ग्रंथ का यह श्लोक हमें किसी को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना नहीं सिखाता। अपितु जब तक आप स्वयं किसी को पसंद नहीं करते, उसका साथ नहीं चाहते तब तक अपने स्वार्थ के लिए उसका उपयोग कतई ना करें। लेकिन यदि आप स्वयं दिल से उस इंसान की सहायता लेने के लिए तैयार हैं, तो उसकी सहायता लेना कभी भी गलत नहीं होगा। श्रीराम ने भी कुछ ऐसा ही किया, उन्होंने तो सुग्रीव से मदद लेने से पहले स्वयं उसको अपना राज्य वापस पाने में मदद की। इसके बाद ही उन्होंने अपने मिलने का कारण बताया..

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आरंग- यहाँ कृष्ण ने ली थी राज मोरध्वज की परीक्षा, मांगा था उसके बेटे का मांस

छत्तीसगढ़ की राजधानी से करीब 30 किलोमीटर दूर रायपुर-कोलकाता हाईवे पर एक कस्बा है- आरंग। कहा जाता है कि यह कभी राजा मोरध्वज की राजधानी थी और इसकी पहचान एक समृद्ध नगर के रूप में थी। मोरध्वज की कहानी पुराणों में मिलती है जिसे कृष्ण ने आदेश दिया था कि वह अपने बेटे ताम्रध्वज को आरी से चीरकर उसका मांस शेर के सामने पेश करे। आरे से चीरने की कहानी के कारण ही इस नगर का नाम ‘आरंग’ पड़ा। आरंग का प्रसिद्ध भांड देवल मंदिर, जिसे 11वीं-12वीं सदी का बताया जाता है। (फोटो: साभार ललित शर्मा) आरंग में में मौजूद आर्कियोलोजिकल एविडेंस इस बात की गवाही देते हैं कि यह कभी व्यवस्थित नगर रहा होगा। हालांकि, महाभारत काल (कृष्ण काल) का कोई सबूत नहीं मिलता। शायद इसलिए कि अब तक उसके पांच हजार साल से ज्यादा बीत चुके हैं। जैन मंदिर में इरॉटिक मूर्तियां भांड देवल मंदिर के बाहर बनी मूर्तियां, जिनमें कुछ खजुराहो की तर्ज पर इरॉटिक हैं।आरंग मंदिरों की नगरी है। इनमें 11वीं-12वीं सदी में बना भांडदेवल मंदिर प्रमुख है। यह एक जैन मंदिर है जिसके बाहरी हिस्सों में बनी इरॉटिक मूर्तियां खजुराहो की याद दिलाती हैं। इसके गर्भगृह में काले ग्रेनाइट से बनी जैन तीर्थंकरों की तीन मूर्तियां हैं। महामाया मंदिर में 24 तीर्थकरों की मूर्तियां देखने लायक हैं। यहां के बाग देवल, पंचमुखी हनुमान तथा दंतेश्वरी मंदिर भी प्रसिद्ध हैं। महानदी के किनारे स्थित इस ऐतिहासिक शहर में जल के कटाव से आर्कियोलोजिकल मटेरियल मिलते रहते हैं।बाग देवल मंदिर को अब बागेश्वर नाथ मंदिर कहा जाने लगा है।सुवर्ण नदी से मिले ताम्रपत्र से पता चलता है कि छठी-सातवीं सदी में यहां राजर्षि तुल्यकुल वंश का शासन था। वंश के अंतिम शासन भीमसेन ने यह ताम्रपत्र जारी किया था। इतिहासकारों का मत है कि इस वंश के राजा गुप्त ताम्रपत्र में गुप्त सम्राट के अधीन रहे होंगे।भांड देवल मंदिर में स्थापित जैन मूर्तियां राजा मोरध्वज की एेतिहासिक नगरी आरंग में स्थित स्वायंभू पंचमुखी महादेव, मान्यता है की पीपल वृक्ष को चीर कर प्रकट हुए हैं स्वायंभू पंचमुखी महादेव. कृष्ण ने ली थी परीक्षा पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद कृष्ण अपने भक्त मोरध्वज की परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने अर्जुन से शर्त लगाई थी कि उनका उससे भी बड़ा कोई भक्त है। कृष्ण ऋषि का वेश बना अर्जुन को साथ लेकर मोरध्वज के पास पहुंचे और कहा, ‘मेरा शेर भूखा है और वह मनुष्य का ही मांस खाता है।’ राजा अपना मांस देने को तैयार हो गए तो कृष्ण ने दूसरी शर्त रखी कि किसी बच्चे का मांस चाहिए। राजा ने तुरंत अपने बेटे का मांस देने की पेशकश की। कृष्ण ने कहा, ‘आप दोनों पति-पत्नी अपने पुत्र का सिर काटकर मांस खिलाओ, मगर इस बीच आपकी आंखों में आंसू नहीं दिखना चाहिए।’ राजा और रानी ने अपने बेटे का सिर काटकर शेर के आगे डाल दिया। तब कृष्ण ने राजा मोरध्वज को आशीर्वाद दिया जिससे उसका बेटा फिर से जिंदा हो गया।

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क्यों गया में हर व्यक्ति चाहता है पिंडदान?

बिहार की राजधानी पटना से करीब 104 किलोमीटर की दूरी पर बसा है गया जिला। धार्मिक दृष्टि से गया न सिर्फ हिन्दूओं के लिए बल्कि बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए भी आदरणीय है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे महात्मा बुद्ध का ज्ञान क्षेत्र मानते हैं जबकि हिन्दू गया को मुक्तिक्षेत्र और मोक्ष प्राप्ति का स्थान मानते हैं। इसलिए हर दिन देश के अलग-अलग भागों से नहीं बल्कि विदेशों में भी बसने वाले हिन्दू आकर गया में आकर अपने परिवार के मृत व्यकित की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान करते दिख जाते हैं। गया के प्रति लोगों के मन जो आस्था मौजूद है वह यूं ही नहीं है। गया के बारे में आप भी अगर गहराई से जानेंगे और इसके अतीत में जाएंगे तो आपके सामने गया के कई ऐसे राज खुलेंगे जो आपको हैरत में डाल देंगे और आप लोक परलोक के ऐसे सवालों में उलझ जाएंगे जिसका जवाब सिर्फ और सिर्फ गया में ही मिल सकता है। क्यों गया में हर व्यक्ति चाहता है पिंडदान? गया तीर्थ के बारे में गरूड़ पुराण में कहा गया है ‘गयाश्राद्धात् प्रमुच्यन्त पितरो भवसागरात्। गदाधरानुग्रहेण ते यान्ति परामां गतिम्।। यानी गया श्राद्ध करने मात्र से पितर यानी परिवार में जिनकी मृत्यु हो चुकी है वह संसार सागर से मुक्त होकर गदाधर यानी भगवान विष्णु की कृपा से उत्तम लोक में जाते हैं। वायु पुराण में बताया गया है कि मीन, मेष, कन्या एवं कुंभ राशि में जब सूर्य होता है उस समय गया में पिण्ड दान करना बहुत ही उत्तम फलदायी होता है। इसी तरह मकर संक्रांति और ग्रहण के समय जो श्राद्ध और पिण्डदान किया जाता है वह श्राद्ध करने वाले और मृत व्यक्ति दोनों के लिए ही कल्याणी और उत्तम लोकों में स्थान दिलाने वाला होता है। गया तीर्थ के बारे में गरूड़ पुराण यह भी कहता है कि यहां पिण्डदान करने मात्र से व्यक्ति की सात पीढ़ी और एक सौ कुल का उद्धार हो जाता है। गया तीर्थ के महत्व को भगवान राम ने भी स्वीकार किया है। गया में है देवी सीता का शाप (जब सीता ने किया पिण्डदान) वाल्मिकी रामायण में सीता द्वारा पिंडदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान राम लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए। उधर दोपहर हो गई थी। पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढती जा रही थी। अपराहन में तभी दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की मांग कर दी। गया जी के आगे फल्गू नदी पर अकेली सीता जी असमंजस में पड गई। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया।थोडी देर में भगवान राम और लक्ष्मण लौटे तो उन्होंने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया। बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है, इसके लिए राम ने सीता से प्रमाण मांगा। तब सीता जी ने कहा कि यह फल्गू नदी की रेत केतकी के फूल, गाय और वटवृक्ष मेरे द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं। इतने में फल्गू नदी, गाय और केतकी के फूल तीनों इस बात से मुकर गए। सिर्फ वटवृक्ष ने सही बात कही। तब सीता जी ने दशरथ का ध्यान करके उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की।दशरथ जी ने सीता जी की प्रार्थना स्वीकार कर घोषणा की कि ऐन वक्त पर सीता ने ही मुझे पिंडदान दिया। इस पर राम आश्वस्त हुए लेकिन तीनों गवाहों द्वारा झूठ बोलने पर सीता जी ने उनको क्रोधित होकर श्राप दिया कि फल्गू नदी- जा तू सिर्फ नाम की नदी रहेगी, तुझमें पानी नहीं रहेगा। इस कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी रहती है। गाय को श्राप दिया कि तू पूज्य होकर भी लोगों का जूठा खाएगी। और केतकी के फूल को श्राप दिया कि तुझे पूजा में कभी नहीं चढाया जाएगा। वटवृक्ष को सीता जी का आर्शीवाद मिला कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री तेरा स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेगी। यही कारण है कि गाय को आज भी जूठा खाना पडता है, केतकी के फूल को पूजा पाठ में वर्जित रखा गया है और फल्गू नदी के तट पर सीताकुंड में पानी के अभाव में आज भी सिर्फ बालू या रेत से पिंडदान दिया जाता है।

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