साल 2023 में मासिक शिवरात्रि कब-कब है? यहां देखे पूरे साल की संपूर्ण लिस्ट

हिंदू धर्म में मासिक शिवरात्रि भगवान शंकर और पार्वती के मिलन का दिन माना गया है. जानते हैं साल 2023 में कब-कब है मासिक शिवरात्रि मासिक शिवरात्रि का शिवभक्तों का इंतजार रहता है. साल 2023 में शिवरात्रि कब-कब पड़ रही हैं? पूरे साल की मासिक शिवरात्रि की पूरी लिस्ट, यहां देखें. हिंदू धर्म में शिवरात्रि का बहुत महत्व बताया गया है. हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। शिवरात्रि भगवान भोले नाथ को समर्पित है. एक साल में 12 मास होते है और 12 मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है. मासिक शिवरात्रि भोलेनाथ और माता पार्वती को समर्पित है, शिवरात्रि पर भोलेनाथ की आराधना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है. साथ ही मन चाहे फल की प्राप्ति होती है. मासिक शिवरात्रि पर रात्रि में पूजा करने का विशेष महत्व होता है। इस साल की पहली मासिकत्रि 20 जनवरी 2023 शुक्रवार को पड़ रही है. मासिक शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त 20 जनवरी को रात 11.53 बजे शुरू हो कर 21 जनवरी को 12.47 तक रहेगा . माना जाता है की इस दिन पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखने वालों को भोले नाथ अनंत फल देते है. तो आप भी पूरे श्रद्धा भाव के साथ इस व्रत का पालन करें. मासिक शिवरात्रि का महत्व मान्यताओं के अनुसार और पौराणिक कथाओं के मुताबिक चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। सबसे पहले भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने उनकी पूजा की थी। तभी से इस दिन को भगवान शिव के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। कई पुराणों में भी इस व्रत का जिक्र किया गया है। जिसमें बताया गया है कि इस व्रत को माता लक्ष्मी, माता सरस्वती, गायत्री और सीता माता और पार्वती माता सहित कई देवियों से रखा है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को रखने से व्यक्ति के जीवन में सुख शांति मिलती है। साथ ही रोगों से मुक्ति भी मिलती है। मासिक शिवरात्रि पूजा विधि मासिक शिवरात्रि के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लें। इसके बाद भगवान शिव के मंदिर या फिर घर के ही मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करें। याद रखें की सबसे पहले शिवलिंग का अभिषेक करें। इसके लिए जल, शुद्ध घी, दूध, शक्कर, दही आदि से अभिषेक करें। कहा जाता है कि रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न होते हैं। साथ ही इस दिन बेलपत्र, धतूरा, श्रीफल चढ़ाएं। इस बात का ख्याल रखें की आप बेल पत्र को अच्छे से साफ कर लें। शिव पूजा करते समय शिव पुराण, शिव स्तुति, शिव अष्टक, शिव चालीसा और शिव श्लोक का पाठ करें। संध्या के समय आप फलहार कर सकते हैं। ख्याल रखें की शिवरात्रि के व्रत में अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।आपको बता दें कि शिवरात्रि के पूजन का उत्तम समय मध्य रात्रि का समय होता है। भगवान शिव की पूजा रात 12 बजे के बाद करना उत्तम फलदायी रहता है। साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ भी करें ऐसा करने से आपकी आर्थिक परेशानियां दूर होंगी। मासिक शिवरात्रि की लिस्ट 20 जनवरी 2023, शुक्रवार – माघ मासिक शिवरात्रि 18 फरवरी 2023, शनिवार – महाशिवरात्रि, फाल्गुन शिवरात्रि 20 मार्च 2023, सोमवार – चैत्र मासिक शिवरात्रि 18 अप्रैल 2023, मंगलवार – वैशाख मासिक शिवरात्रि 17 मई 2023, बुधवार – ज्येष्ठ मासिक शिवरात्रि 16 जून 2023, शुक्रवार – आषाढ़ मासिक शिवरात्रि 15 जुलाई 2023, शनिवार – सावन मासिक शिवरात्रि 14 अगस्त 2023, सोमवार – अधिक माह, मासिक शिवरात्र 13 सितंबर 2023, बुधवार – भाद्रपद मासिक शिवरात्रि 12 अक्टूबर 2023, गुरुवार – अश्विन मासिक शिवरात्रि 11 नवंबर 2023, शनिवार – कार्तिक मासिक शिवरात्रि 11 दिसंबर 2023, सोमवार – मार्गशीर्ष मासिक शिवरात्रि  मासिक शिवरात्रि पर इन चमत्कारी मंत्रों का करें जाप  ॐ शिवाय नम: ॐ सर्वात्मने नम: ॐत्रिनेत्राय नम: ॐ हराय नम: मासिक शिवरात्रि बोले नाथ और माता पार्वती के मिलन का दिन है, इस दिन  भोलेनाथ और माता पार्वती का विवाह हुआ था, तो आप भी इस शिवरात्रि करें शिव पार्वती की आराधना जिससे पूरी होगी आपकी हर मनोकामना. Disclaimer : यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि karmasu.in किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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जब प्रभु राम ने तोड़ा पवनपुत्र हनुमान का घमंड, पढ़ें यह रोचक कथा

मंगलवार का दिन पवनपुत्र हनुमान जी की आराधना के लिए समर्पित है. कई बार हनुमान जी ने अपने प्रभु राम की मदद के लिए असंभव को भी संभव कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने ने राम नाम के महत्व के लिए प्रभु राम के क्रोध का सामना भी किया. हनुमान जी के आराध्य प्रभु राम हैं और राम जी को हनुमान जी सभी भक्तों में सबसे अधिक प्रिय हैं. हनुमान जी और प्रभु राम से जुड़ी कई कहानियां हैं. आज हम आपको एक ऐसी कथा के बारे में बता रहे हैं, जिसमें प्रभु राम ने हनुमान जी के घमंड को तोड़ा था. लंका युद्ध के पहले की बात है. समुद्र को पारकर लंका जाने के लिए सेतु बनाया जाना था. उससे पूर्व प्रभु राम चाहते थे कि सेतु पर एक शिवलिंग की स्थापना की जाए. प्रभु राम ने हनुमान जी से अपने मन की बात बताई और कहा कि काशी जाकर शिवलिंग लाएं और मुहूर्त से पूर्व आ जाएं. पवनपुत्र के लिए काशी जाना कोई बड़ी बात नहीं थी. वे तो अतुलित बलशाली और वेगवान थे. वे पलभर में ही काशी पहुंच गए. अपने वेग पर उनको थोड़ा सा अभिमान हो गया. प्रभु राम तो अंतर्यामी हैं. उन्हें यह बात पता चल गई. उन्होंने सुग्रीव से कहा कि मुहूर्त बीत जाएगी, ऐसे में वे रेत की ही शिवलिंग सेतु पर स्थापित कर देते हैं. प्रभु राम ने वहां पर रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया. इसी बीच हनुमान जी काशी से शिवलिंग लेकर प्रभु राम के पास पहुंच गए. उन्होंने देखा कि प्रभु राम ने तो रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया है. हनुमान जी ने प्रभु राम से कहा कि आपने मुझे काशी भेजकर यह शिवलिंग लाने को कहा था. यह लेकर आ गया, लेकिन आपने रेत का शिवलिंगस्थापित कर दिया. तब प्रभु राम ने कहा कि उनसे भूल हो गई है. ऐसा करो कि इस रेत वाले शिवलिंग को यहां से हटा दो. फिर वे काशी से लाए शिवलिंग को यहां स्थापित कर देंगे. हनुमान जी ने प्रभु आज्ञा पाकर अपनी पूंछ से रेत के शिवलिंग को पकड़ लिया और उसे उखाड़ने की कोशिश करने लगे. लेकिन वह शिवलिंग वहां से एक इंच भी नहीं हिला. हनुमान जी को पहले आश्चर्य हुआ, लेकिन थोड़े ही देर में उनको अपनी गलती का एहसास हो गया. उनका घमंड टूट गया. फिर उन्होंने अपने प्रभु श्री राम से क्षमा मांगी.

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जानिए वरुथिनी एकादशी पर्व का महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक कथा

भगवान विष्णु इस सृष्टि के पालनकर्ता हैं। शास्त्रों और पुराणों में एकादशी का बहुत महत्व बताया गया है। सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी को इसी वजह से हरि वासर और हरि का दिन भी कहा जाता है। हिन्दू कैलेंडर के हर महीने में दो एकादशी पड़ती है। हर एकादशी का अपना महत्व है और इसी क्रम में वरुथिनी एकादशी भी आता है। इस दिन भगवान मधुसूदन की पूजा की जाती है। वरुथिनी एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से जातकों के सारे दुख दूर होते हैं और उन्हें करोड़ों साल तक ध्यान करने जितना फल प्राप्त होता है। यूं तो हर एकादशी में दान का विशेष महत्व है लेकिन मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी में दान करने से सूर्य ग्रहण के दौरान स्वर्ण दान जितना फल प्राप्त होता है। वरुथिनी एकादशी के व्रत से कन्यादान के कर्म से भी ज्यादा फल प्राप्त होता है। यही वजह है कि वरुथिनी एकादशी का सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। आज हम आपको इस लेख में वरुथिनी एकादशी के व्रत से जुड़ी एक पौराणिक कथा बताएंगे जोकि स्वयं भगवान विष्णु से जुड़ी है लेकिन उससे पहले आपको वरुथिनी व्रत से जुड़ी कुछ खास जानकारी दे देते हैं। वरुथिनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा मान्यता है कि एक बार पांडु पुत्र अर्जुन के आग्रह पर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें वरुथिनी एकादशी व्रत का महत्व और उससे जुड़ी एक कथा बताई। इस कथा के अनुसार बहुत पहले नर्मदा तट के किनारे एक राज्य हुआ करता था जिस पर मान्धाता नामक राजा का राज हुआ करता था। राजा मान्धाता एक बेहद ही नेक दिल, दानी और तपस्वी राजा था। एक बार राजा मान्धाता किसी जंगल में तपस्या में लीन थे। तभी कहीं से वहां पर एक जंगली भालू आ धमकता है और उनके पैरों को चबाने लगता है। राजा मान्धाता इस कृत्य से घबराते नहीं हैं लेकिन जब भालू उन्हें खींच कर ले जाने लगता है तब वे भगवान श्री हरि विष्णु को याद करते हैं। भक्त की पुकार सुनकर श्री हरि वहाँ प्रकट हो जाते हैं और जंगली भालू का गला अपने सुदर्शन चक्र से काट डालते हैं। लेकिन जब तक ऐसा कुछ होता तब तक वह भालू राजा मान्धाता का एक पैर चबा चुका था। यह देख कर राजा बहुत दुखी होते हैं। तब राजा के दुख को देखते हुए भगवान विष्णु को उन पर दया आ जाती है। ऐसे में भगवान विष्णु राजा मान्धाता को बताते हैं कि उनके पैर की यह हालत उनके पूर्व जन्म में किए गए पापों का फल है। श्री हरि विष्णु राजा मान्धाता से आगे कहते हैं कि राजा मथुरा जाएँ और वहाँ भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा के साथ-साथ वरुथिनी एकादशी का व्रत भी रखें। इससे उनके खराब अंग पुनः ठीक हो जाएंगे।  राजा मान्धाता भगवान श्री हरि विष्णु के आदेशों का पालन करते हुए मथुरा जाते हैं और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखते हुए भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा करते हैं जिसके फलस्वरूप उनका खराब पाँव वापस से ठीक हो जाता है।

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कब है वरूथिनी एकादशी? जान लें विष्णु पूजा का शुभ मुहूर्त और पारण समय, व्रत से होंगे 4 लाभ

वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वरूथिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है. एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से वैशाख कृष्ण एकादशी की महिमा और पूजा विधि के बारे में जानना चाहा. तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वैशाख कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है. वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पाप मिटते हैं, भय दूर होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और सौभाग्य मिलता है.  हिंदू धर्म के व्रत त्‍योहारों में एकादशी का सबसे प्रमुख स्‍थान है। प्रत्‍येक मास में दो एकादशी होती है और सभी का कुछ खास महत्‍व होता है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत के बारे में शास्‍त्रों में बताया जाता है कि संपूर्ण व‍िधि-विधान से यह व्रत करने और पूजा करने से उपासक को बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है और सभी पापों का नाश होता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस व्रत के महत्‍व, परंपरा और शुभ मुहूर्त के बारे मे वरूथिनी एकादशी तिथि 2023 हिंदू कैलेंडर के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 15 अप्रैल दिन शनिवार को रात 08 बजकर 45 मिनट पर प्रारंभ हो रही है और इस तिथि का समापन अगले दिन 16 अप्रैल दिन रविवार को शाम 06 बजकर 14 मिनट तक है. उदयातिथि के आधार पर वरूथिनी एकादशी का व्रत 16 अप्रैल रविवार को रखा जाएगा. 3 शुभ योगों में है वरूथिनी एकादशी 16 अप्रैल को वरूथिनी एकादशी वाले दिन प्रात:काल से शुक्ल योग है, जो देर रात 12:13 बजे तक है. उसके बाद से ब्रह्म योग है. यह पारण के दिन हैं. इन दो शुभ योगों के अलावा त्रिपुष्कर योग पारण वाले दिन 17 अप्रैल को प्रात: 04 बजकर 07 मिनट से सुबह 05 बजकर 54 मिनट तक है. व्रत के दिन शतभिषा नक्षत्र है. व्रत के दिन का अभिजित मुहूर्त सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक है. वरूथिनी एकादशी पूजा मुहूर्त 2023 वरूथिनी एकादशी वाले दिन सुबह 07:32 बजे से लेकर दोपहर 12:21 बजे तक शुभ समय है. इसमें सुबह 09:08 बजे से सुबह 10:45 बजे तक लाभ-उन्नति मुहूर्त और सुबह 10:45 बजे से दोपहर 12:21 बजे तक अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त है. इन मुहूर्त में आप एकादशी व्रत की पूजा कर सकते हैं. दोपहर में शुभ-उत्तम मुहूर्त 01:58 बजे से 03:34 बजे तक है.

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हनुमान जन्‍मोत्‍सव कब है, जानें मुहूर्त, पूजाविधि और महत्‍व

हनुमान जयंती 6 अप्रैल 2203 को मनाई जाएगी. हनुमान भक्ति करने वालों पर कभी विपदा नहीं आती.. जानते हैं हनुमान जयंती पर बजरंगबली की पूजा की सामग्री और मुहूर्त.हनुमान जयंती यानी कि बजरंग बली का जन्‍मोत्‍सव चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस बार हनुमान जयंती 6 अप्रैल को मनाई जाएगी। पौराणिक मान्‍यताओं के हनुमानजी को रुद्रावतार यानी कि भगवान शिव का अवतार माना जाता है और उनका जन्‍म चैत्र मास की पूर्णिमा को मंगलवार के दिन हुआ था। इसलिए मंगलवार का दिन बजरंगबली को समर्पित माना जाता है और इस दिन व्रत करने और उनकी पूजा करने से उनकी कृपा प्राप्‍त होती है। हनुमान जयंती के अवसर पर भी भक्‍त व्रत करते हैं और विधि विधान से उनकी पूजा करके व्रत को पूर्ण करते हैं। इस दिन देश भर के मंदिरों में जगह-जगह भंडारे आयोजित होते हैं और कई तरह के उपाय और अनुष्‍ठान करवाए जाते हैं।  धार्मिक मान्यता है कि हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर अगर विधि विधान से मारुति नंदन की पूजा की जाए तो स्वंय हनुमान साधक की हर संकट में रक्षा करते हैं. हनुमान जी पूजा घर पर करने से बहुत फायदे होते है लेकिन हनुमान मंदिर में जाकर पूजा करें तो अत्यंत लाभकारी होता है. हनुमान जन्मोत्सव 2023 मुहूर्त (Hanuman Jayanti 2023 Muhurat) चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि 05 अप्रैल 2023 बुधवार को प्रातः 09:19 बजे से शुरू होगी. पूर्णिमा तिथि का समापन 06 अप्रैल 2023 गुरुवार, प्रातः 10:04 बजे होगा. उदयातिथि के अनुसार हनुमान जयंती  6 अप्रैल 2023 को है. इस दिन कई लोग हनुमान जी के निमित्त व्रत भी रखते हैं हनुमान जयंती का महत्‍व (Hanuman Jayanti Importance) हनुमान जयंती की पूजा का विशेष महत्‍व माना जाता है। मान्‍यता है कि इस दिन पूजा अर्चना करने वाले को बजरंग बली हर रोग और दोष से दूर रखते हैं और हर प्रकार के संकट से रक्षा करते हैं। जीवन में कष्‍ट दूर होते है और सुख शांति की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जिन लोगों पर शनि की अशुभ दशा चल रही है वे यदि हनुमान जयंती पर व्रत रखें तो उनके शनि के दोष दूर होते हैं और कष्‍टों से मुक्ति मिलती है। हनुमान जयंती पूजा सामग्री (Hanuman Jayanti Samagri) हनुमान जंयती पूजा विधि (Hanuman Jayanti Puja vidhi) हनुमान जी हर बुरी शक्त‍ि का नाश कर हर काम में आगे बढ़ने में मदद करने वाले हैं. ऐसे में हनुमान जयंती पर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें. लाल वस्त्र पहनें और फिर बजरंगबली को सिंदूर का चोला चढ़ाएं. सरसों के तेल का दीपक लगाकर ॐ मारुतात्मजाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें. बजरंगबली को गुड़-चने का भोग लगाएं और फिर घर या मंदिर में 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करें.  कहते हैं इस दिन घर में सुंदरकांड करना चाहिए. इससे हनुमान जी का घर में वास होता है. जीवन की हर समस्याओं से मुक्ति मिलती है.

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जानिए शिवपुराण के अनुसार भगवन शिव को कौनसी चीज़ चढाने से मिलता है क्या फल

किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें अर्पित की जाती है। प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन मिलता है की भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग चीज़ों का क्या फल होता है। शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को चढ़ाने से क्या फल मिलता है भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है। तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है। जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है। गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है। यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है। नपुंसक व्यक्ति अगर घी से भगवान शिव का अभिषेक करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान संभव है। तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को चढ़ाएं। सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है। शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है। शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा (टीबी) रोग में आराम मिलता है। शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है। चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है। अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है। शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है। बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है। जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं। हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है। लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि | महत्व | भगवान कार्तिकेय का जन्म कथा

स्कंद षष्ठी 2023 का महत्वसंतान प्राप्ति के लिए भी षष्ठी तिथि को महत्वपूर्ण माना गया है. पौराणिक कथा में सुनने को मिलता है कि, इस व्रत के प्रभाव से ही च्यवन ऋषि को आंखों की ज्योति प्राप्त हुई थी. वहीं स्कंद षष्ठी व्रत के प्रभाव और भगवान स्कंद की कृपा से ही प्रियव्रत का मृत शिशु फिर से जीवित हो गया था स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। इनकी पूजा से जीवन में हर तरह की कठिनाइंया दूर होती हैं और व्रत रखने वालों को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान के कष्टों को कम करने और उसके सुख की कामना से ये व्रत किया जाता है। हालांकि यह त्योहार दक्षिण भारत में प्रमुख रूप से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है। उनका प्रिय पुष्प चंपा है। इसलिए इस व्रत को चंपा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद षष्ठी का महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान कार्तिकेय षष्ठी तिथि और मंगल ग्रह के स्वामी हैं तथा दक्षिण दिशा में उनका निवास स्थान है। इसीलिए जिन जातकों की कुंडली में कर्क राशि अर्थात् नीच का मंगल होता है, उन्हें मंगल को मजबूत करने तथा मंगल के शुभ फल पाने के लिए इस दिन भगवान कार्तिकेय का व्रत करना चाहिए। क्योंकि स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को प्रिय होने से इस दिन (Skanda Shashti Vrat) व्रत अवश्य करना चाहिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिकेय अपने माता-पिता और छोटे भाई श्रीगणेश से नाराज होकर कैलाश पर्वत छोड़कर मल्लिकार्जुन (शिव जी के ज्योतिर्लिंग) आ गए थे और कार्तिकेय ने स्कन्द षष्ठी को ही दैत्य तारकासुर का वध किया था तथा इसी तिथि को कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने थे। भारत में स्कन्द षष्ठी भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर है। ज्ञात हो कि स्कन्द पुराण कार्तिकेय को ही समर्पित है। स्कन्द पुराण में ऋषि विश्वामित्र द्वारा रचित कार्तिकेय 108 नामों का भी उल्लेख हैं। इस दिन निम्न मंत्र से कार्तिकेय का पूजन करने का विधान है। खासकर दक्षिण भारत में इस दिन भगवान कार्तिकेय के मंदिर के दर्शन करना बहुत शुभ माना गया है। चम्पा षष्ठी या स्कन्द षष्ठी का त्योहार दक्षिण भारत, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि में प्रमुखता से मनाया जाता है। बैंगन छठ  स्कंद षष्ठी का दिन भगवान शिव के अवतार जिसे खंडोबा के नाम से जाना जाता है, उन्हें भी समर्पित है। खंडोबा को ही मल्हारी मार्तण्ड भी कहा गया। होलकर राजवंश के कुल देवता मल्हारी मार्तण्ड की चम्पा षष्ठी की रात्रि बैंगन छठ का आयोजन होता है। चौंसठ भैरवों में मार्तण्ड भैरव भी एक हैं। वैसे सूर्य को भी मार्तण्ड कहा गया है। जैसे बिहार में छठ पूजा, सूर्य पूजा का महत्व है, उसी तरह महाराष्ट्र में बैंगन छठ का महत्व है। महाराष्ट्र में जैजूरी खंडोबा का मुख्य स्थान है, जो होळ गांव के पास है। इंदौर के शासक इसी होळ गांव के होने से होलकर कहलाए और खंडोबा उनके कुल देवता है। कहा जाता है कि इस दिन तेल का सेवन नहीं करना चाहिए तथा बाजरे की रोटी एवं बैंगन के भुर्ते को प्रसाद वितरित करने का प्रचलन है। महाराष्ट्र और सुदूर मालवा में बसे मराठी भाषियों में मल्हारी मार्तण्ड की नवरात्रि का आयोजन मार्गशीर्ष प्रतिपदा से मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी तक 5 दिन के उपवास के उपरांत मल्हारी मार्तण्ड की ‘षडरात्रि’ ‘बोल सदानंदाचा येळकोट येळकोट’ के साथ संपन्न होती है। इसीलिए इस दिन भगवान कार्तिकेय और खंडोबा का पूजन विशेष रूप से करना चाहिए। स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि स्कन्द षष्ठी के दिन सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें।  इसके बाद स्नान-ध्यान कर सर्वप्रथम व्रत का संकल्प लें।  पूजा घर में मां गौरी और शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित करें।  स्कन्द षष्ठी के दिन व्रतधारी व्यक्तियों को दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके भगवान कार्तिकेय का पूजन करना चाहिए। पूजन में जल, मौसमी फल, फूल, मेवा, दही, कलावा, दीपक, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूध, गाय का घी, इत्र आदि से करें।  अंत में आरती करें।  वहीं शाम को कीर्तन-भजन पूजा के बाद आरती करें।  इसके पश्चात फलाहार करें। रात्रि में भूमि पर शयन करना चाहिए। भगवान कार्तिकेय की पूजा का मंत्र देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव। कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥’ इसके अलावा स्कन्द षष्ठी एवं चम्पा षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय के इन मंत्रों का जाप भी किया जाना चाहिए। कार्तिकेय गायत्री मंत्र ‘ॐ तत्पुरुषाय विद्महे: महा सैन्या धीमहि तन्नो स्कन्दा प्रचोदयात’। यह मंत्र हर प्रकार के दुख एवं कष्टों का नाश करने के लिए प्रभावशाली है। शत्रु नाश के लिए पढ़ें ये मंत्र- ॐ शारवाना-भावाया नम:ज्ञानशक्तिधरा स्कन्दा वल्लीईकल्याणा सुंदरादेवसेना मन: कांता कार्तिकेया नामोस्तुते। इस तरह से भगवान कार्तिकेय का पूजन-अर्चन करने से जीवन के सभी कष्‍टों से मुक्ति मिलती है। भगवान कार्तिकेय की जन्म कथा कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे।  इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे।  उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।

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भारत के प्रमुख धार्मिक स्थल और इनकी यात्रा

भारत देश में धर्म, कर्म और क्षमा को प्राथमिकता दी जाती हैं। भारत एक ऐसा देश हैं जहां कई जाति और धर्म को मानने वाले लोग बहुत ही प्रेम से रहते हैं और भाईचारे का परिचय देते हैं। भारत को “विश्वास की भूमि” भी कहा जा सकता है। भारत के धार्मिक स्थलों में कई मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा के अलावा भी तीर्थ स्थल हैं। भारत के निवासी अपने-अपने धर्म के अनुसार इन पवित्र स्थानों पर जाते हैं और अपने ईस्ट देव, अल्लाह और गॉड से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। आज हम आपको अपने आर्टिकल के माध्यम से भारत के खास तीर्थ स्थलों और मंदिरों के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं। यदि आप इण्डिया के इन पवित्र स्थलों के बारे में जानना चाहते है तो इस लेख को पूरा जरूर पढ़े। 1. भारत का धार्मिक स्थल वैष्णो देवी माता मंदिर भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल माता वैष्णो देवी का मंदिर हिन्दू धर्म का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। जम्मू कश्मीर की आकर्षित त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है यह पवित्र स्थान 9 देवियों में से एक माता वैष्णो रानी का परम धाम हैं। देवी के दर्शन के लिए आने वाले भक्तो की भीड़ नवरात्री के अवसर पर देखने लायक होती है। श्रद्धालुगण सीढ़ियों पर चलते हुए लम्बा सफर तय करते हैं और माता रानी का जयकारा लगाते है। वैष्णो देवी धाम में कई पावन स्थान हैं। 2. भारत का धार्मिक मंदिर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर / स्वर्ण मंदिर / हरमंदिर साहिब  भारत के धार्मिक तीर्थ स्थलों में अमृतसर का स्वर्ण मंदिर / हरमंदिर साहिब सिखों के चौथे गुरु श्री रामदास साहिब जी द्वारा निर्मित किया गया था। भारत में धार्मिक स्थलों की यात्रा करने के लिए गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब भारत में सिख तीर्थ स्थल में सबसे ख़ास माना जाता है। स्वर्ण जडित यह पवित्र पर्यटन स्थल अपने में कई ऐतिहासिक घटनाओ को समेटे हुए हैं। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। अमृत कलश (झील) और तीर्थ परिसर कि यात्रा टूरिस्टों को बहुत लुभाती हैं। 3. भारत का ऐतिहासिक धार्मिक स्थल कोणार्क सूर्य मंदिर (सन टेम्पल) कोणार्क सूर्य मंदिर भारत में ओडिशा के तट पर पुरी से लगभग 35 किलोमीटर कि दूरी पर उत्तर-पूर्व कोणार्क में स्थित है। हिंदू देवता सूर्य को समर्पित यह एक विशाल मंदिर है और भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हैं। कोणार्क दो शब्दों कोण (कोना) और अर्क (अर्का) से मिलकर बना है। जहां कोण का अर्थ कोना (कॉर्नर) और अर्क का अर्थ सूर्य (सूर्य) है। दोनों को संयुक्त रूप से मिलाने पर यह सूर्य का कोना यानि कोणार्क कहा जाता है। कोणार्क के सन मंदिर को काले पैगोडा के नाम से भी जाना जाता है। 4. हिंदुस्तान के धार्मिक स्थल जगन्नाथ मंदिर पूरी भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में जगन्नाथ मंदिर ओडिशा में सबसे अच्छा धार्मिक स्थल माना जाता हैं। इस मंदिर के प्रमुख देवता भगवान जगन्नाथ, बलभद्रऔर देवी सुभद्रा हैं। जगन्नाथ रथ यात्रा बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं, जिसमे मंदिर के तीनो मुख्य देवताओं को एक रथ में बिठाया जाता हैं। इस पवित्र मंदिर को भारतीय संस्कृति का प्रामाणिक प्रतिबिंब माना जाता है। 5. भारत का दर्शनीय स्थल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग (प्रकाश का स्तंभ) हैं। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य में स्थित हिन्दू धर्म का एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। हिन्दू धर्म से सम्बंधित यह पवित्र स्थान पर्यटकों को अपने दरबार में आमंत्रित करता हैं। 6. भारत का प्रसिद्ध तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर  भारत के प्रसिद्ध स्थानों में शामिल तिरुपति का वेंकटेश्वर मंदिर यहाँ का एक प्रमुख दर्शनीय स्थान हैं, जोकि भगवान विष्णु का अवतार हैं। भगवान विष्णु का तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर आंध्र प्रदेश राज्य के तिरुपति में शेषचलम श्रेणी की अंतिम पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर भारत में सबसे अधिक देखे जाने वाले हिंदू मंदिरों में से एक हैं। 7. भारत में देखने लायक जगह हेमकुंड साहिब भारत में देखने वाली जगहों में शामिल हेमकुंड साहिब भारत का प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। हेमकुंड साहिब की संरचना पंचकोणीय है। बर्फ से ढंकी हुई ऊँची पहाड़ियों पर स्थित इस स्थान सुन्दरता देखने लायक होती हैं। पर्यटक हेमकुंड का दौरा करना बहुत अधिक पसंद करते हैं। 8. भारत के पवित्र तीर्थ स्थल अमरनाथ गुफा भारत में देखने वाली पवित्र जगहों में अमरनाथ गुफा भारत के सबसे खूबसूरत राज्य जम्मू और कश्मीर में स्थित है। अमरनाथ गुफा भारत के प्राचीन तीर्थ स्थलों में शुमार हैं। माना जाता है कि भगवान भोले नाथ ने अपनी पत्नी देवी पार्वती की अमरता का रहस्य इसी स्थान पर उजागर किया था। यह स्थान अमरनाथ लिंग के लिए प्रसिद्ध हैं और हिन्दू धर्म का एक परम पूजनीय स्थान हैं। 9. इंडिया के फेमस धार्मिक स्थल वाराणसी भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित वाराणसी भारत में एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है, जोकि हिन्दू धर्म की आस्था से सम्बंधित हैं। वाराणसी की सुन्दरता और अखंडता को देखने के लिए देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की लम्बी कतार लगी रहती है। शहर के मध्य से प्रवाहित होने वाली पवित्र गंगा नदी निस्संदेह वाराणसी शहर की सुन्दरता और पवित्रता को बढ़ा देती है। सुबह शाम होने वाली गंगा नदी की आरती से वाराणसी शहर में भक्ति लहर दौड जाती है। 10. इंडिया टूरिज्म में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल द्वारका नगरी भारत के धार्मिक स्थलों में शामिल द्वारिका नगरी एक प्रमुख तीर्थ स्थल हैं जिसका निर्माण महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण ने करबाया था। जब श्री कृष्ण और बलराम ने अपनी राजधानी मथुरा से द्वारिका में स्थानांतरित की थी। द्वारिका गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित है। हिन्दू धर्म से सम्बंधित द्वारिका चार धामों में से एक हैं। 11. भारत में फेमस ऋषिकेश शहर की धार्मिक यात्रा ऋषिकेश भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों की यात्राओं में शामिल है। यहां स्थित असंख्य हिंदू मंदिरों और योग केंद्रों की भारी व्यवस्था की गई हैं। ऋषिकेश धाम भारत में यात्रा करने के लिए एक प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। 12. भारत में घूमने वाली जगह मथुरा भारत के दर्शनीय स्थलों में मथुरा एक ऐसी जगह है जोकि भारत की सबसे पवित्र भूमि मानी जाती हैं। दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पवित्र स्थान भगवान श्री कृष्ण

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जानिए, क्यों मनाते हैं बैसाखी और क्या है महत्व

)बैसाखी का त्योहार 14 अप्रैल 2023 को मनाया जाएगा. पंजाब के लोगों, विशेषकर सिखों के लिये, वैसाखी एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है. वैसाखी को हिन्दु सौर कैलेंडर पर आधारित, सिख नव वर्ष के रूप में भी मनाया जाता है भारत त्योहारों का देश माना जाता है। अलग-अलग धर्मों का पालन करने वाले लोग यहां रहते हैं। हर धर्म के अपने-अपने कुछ खास त्योहार हैं। पूरे साल भर इसी तरह त्योहारों का उत्सव चलता रहता है। हिंदू धर्म में होली, दीपोत्सव और रक्षाबंधन जैसे त्योहार मनाते हैं। उसी तरह सिख लोगों के लिए चैत्र माह में पड़ने वाला बैसाखी का त्योहार खास होता है। यह समय ही कुछ विशेष होता है, खेतों मे रबी की फसल पक कर लहलहाती है। किसान अपनी मेहनत से आई फसलों को देखकर खुश होते हैं। मान्यता है कि इस खुशी का इजहार बैसाखी त्योहार को मनाकर करते हैं। वैसे इस त्योहार के मनाए जाने को लेकर कई मान्यताएं है। हम आपको इसके महत्व और मनाए जाने के पीछे के कारणों के बारे में बताएंगे। बैसाखी के पर्व की शुरुआत भारत के पंजाब प्रांत से हुई है और इसे रबी की फसल की कटाई शुरू होने की सफलता के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा के अलावा उत्तर भारत में भी बैसाखी के पर्व का बहुत महत्व है। इस दिन गेहूं, तिलहन, गन्ने आदि की फसल की कटाई शुरू होती है। क्यों मनाते हैं बैसाखीदरअसल बैसाखी को मनाए जाने का एक कारण यह भी है कि इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है। बैसाखी का पर्व किसानों का खास त्योहार होता है। किसान भाई इसी दिन अपनी अच्छी फसल के लिए भगवान का शुक्रिया करते हैं। इतिहास पर गौर फरमाएं तो सन् 1699 मे इसी दिन सिक्खों के अंतिम गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सिक्खों को खालसा के रूप मे संगठित किया था, यह भी इस दिन को खास बनाने का एक कारण है। कैसे मनाते हैं बैसाखीइस त्योहार की तैयारी भी सबसे बड़े त्योहार दीपावली की ही तरह कई दिनों पहले से शुरू हो जाती है। लोग घरों की सफाई करते है, आंगन में अल्पना और रंगोली बनाई जाती है। शाम को लाइटिंग से घर सजाते हैं, कई तरह के पकवान बनाते हैं। सुबह स्नान आदि के बाद सिक्ख लोग गुरुद्वारे जाते हैं। गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ होता है, कीर्तन आदि करवाए जाते हैं। नदी के किनारे मेले लगाए जाते हैं जिसमें भारी संख्या में लोग आते हैं। पंजाबी लोग इस दिन विशेष नृत्य भांगड़ा करते हुए खुशी मनाते हैं। बच्चे,बूढ़े और महिलाएं सभी ढोल की आवाज में मदमस्त हो जाते हैं और हर्षोल्लास से नाचते गाते हैं। वैसे तो यह त्योहार पूरे भारत वर्ष मे मनाया जाता है, परंतु पंजाब और हरियाणा राज्यों मे इस त्योहार की चहक अलग ही होती है। यह है महत्वहिंदू धर्म के लोग बैसाखी को नववर्ष के रुप में भी मनाते हैं इस दिन स्नान, भोग आदि लगाकर पूजा की जाती है। हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मान्यता यह भी है कि हजारों साल पहले मुनि भागीरथ कठोर तपस्या के बाद देवी गंगा को धरती पर उतारने में इसी दिन कामयाब हुए थे। इसलिये इस दिन हिंदू संप्रदाय के लोग पारंपरिक रूप से गंगा स्नान करने को भी पवित्र मानते हैं व देवी गंगा की स्तुति करते हैं। इस दिन पवित्र नदियोंं में स्नान का अपना अलग महत्व है। ज्योतिषीय दृष्टि से भी बैसाखी का बहुत ही शुभ व मंगलकारी महत्व है क्योंकि इस दिन आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। वहीं सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने से इसे मेष सक्रांति भी कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि लोगों के राशिफल पर बैसाखी का सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसे सौर नववर्ष भी कहा जाता है। मेष संक्राति के दौरान पर्वतीय इलाकों में भी मेलों का आयोजन होता है व देवी पूजा करने का रिवाज है। लोग इस दिन अपने घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

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श्राद्ध या पितृपक्ष में कौवों को भोजन क्यों कराते है ?

श्राद्ध के समय लोग अपने पूर्वजों को याद करके यज्ञ करते हैं और कौए को अन्न जल अर्पित करते हैं। दरअसल, कौए को यम का प्रतीक माना जाता है। गरुण पुराण के अनुसार, अगर कौआ श्राद्ध को भोजन ग्रहण कर लें तो पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। साथ ही ऐसा होने से यम भी खुश होते हैं और उनका संदेश उनके पितरों तक पहुंचाते है। पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष में कौवों को पितरों का प्रतिक मानकर भोजन कराया जाता है। लेकिन भोजन कौए को ही क्यों दिया जाता है, इसका वर्णन हमे हमारे पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। हमारे धर्म ग्रंथों में इससे सम्बंधित 2 प्रसंगों का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है। पहले प्रसंग के अनुसार मरूता नाम के राजा एक बार यज्ञ कर रहे थे। इसमें इंद्र सहित सभी देवता शामिल हुए। इसमें देवताओं का दुश्मन रवाना (कौए की तरह दिखने वाला एक पक्षी) भी यहां आ गया। फिर इंद्र ने मोर, कुबेर ने गिरगिट, वरुण ने श्वान और यम ने कौए का रूप धारण कर कर उसे भगाया और फिर मूल रूप में वापस लौट आए। उन्होंने अपनी जान की रक्षा करने के लिए कौए, गिरगिट और श्वान को वरदान भी दिया। यम ने कौए को वरदान दिया कि तुम्हें दिया भोजन पूर्वजों की आत्मा को भी शांत करेगा। दूसरे प्रसंग के अनुसार इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। त्रेता युग की घटना कुछ इस प्रकार हैं – जयंत ने कौऐ का रूप धर कर माता सीता को घायल कर दिया था। तब भगवान श्रीराम ने तिनके से ब्रह्मास्त्र चलाकर जयंत की आंख को क्षतिग्रस्त कर दिया था। जयंत ने अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी, तब राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा। इसके अलावा गरुण पुराण में भी कौओं का जिक्र आया है। गरुड़ पुराण में बताया है कि कौएं यमराज के संदेश वाहक होते हैं। श्राद्ध पक्ष में कौएं घर-घर जाकर खाना ग्रहण करते हैं, इससे यमलोक में स्थित पितर देवताओं को तृप्ति मिलती है। कौओं के संबंध में एक रोचक बात यह है की कौएं KHA की आवाज निकालते है। मूल रूप से KHA एक संस्कृत शब्द हैं। इसके कई अर्थ है – सूर्य, वायु, स्वर्ग, आसमान, पृथ्वी, ख़ुशी, ब्रह्म आदि। विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी कौओं का वर्णन मिलता है। ग्रीक माइथोलॉजी में रैवन (एक प्रकार का कौवा) को गुड लक का सिम्बल माना गया है। इसे गॉड का मैसेंजर कहा गया है। इसे दुनिया का निर्माण करने वालों में से एक बताया गया है। नोर्स माइथोलॉजी में दो रैवन (एक प्रकार का कौवा) हगिन और मुनिन का जिक्र मिलता है। इन्हें ईश्वर के प्रति उत्साह का प्रतीक बताया गया है। इजिप्शियन माइथोलॉजी में आत्मा के तीन रूप माने गए हैं। ये ‘का’, ‘बा’ और ‘अख’ होते हैं। इनमें ‘का’ को प्राणशक्ति बताया गया है। ‘का’ के निकलते ही व्यक्ति प्राणहीन हो जाता है।

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कालाष्टमी व्रत कल, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी मनाई जाती है। जानिए कालाष्टमी व्रत की पूजा- विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व के बारे में। हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी मनायी जाती है। इस बार कालाष्टमी का व्रत 13 फरवरी को रखा जाएगा।  कालाष्टमी के दिन भगवान शंकर के भैरव स्वरूप की उपासना की जाती है। दरअसल,  भैरव के तीन रूप हैं- काल भैरव, बटुक भैरव और रूरू भैरव। आज के दिन इनमें से काल भैरव की उपासना की जाती है। कहते हैं आज के दिन भगवान शंकर के काल भैरव स्वरूप की उपासना करने से जीवन की सारी परेशानियां दूर होंगी और आपकी मनचाही मुरादें पूरी होंगी। इसके साथ ही आज के दिन अष्टमी तिथि वालों का श्राद्ध है। इस उन लोगों का श्राद्ध किया जायेगा, जिनका स्वर्गवास किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ हो। इस दिन श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को विशेष फल के रूप में कई तरह की समृद्धियां प्राप्त होती हैं।  चैत्र कालाष्टमी 2023 शुभ मुहूर्तहिंदू पंचांग के अनुसार इस बार चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 14 मार्च 2023 को रात 08 बजकर 22 मिनट पर शुरू हो जाएगी. जिसका समापन अगले दिन यानी 15 मार्च 2023 को शाम 06 बजकर 45 मिनट पर होगा पूजा- विधि कालाष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें। उसके बाद भगवान भैरव की पूजा- अर्चना करें।  इस दिन भगवान भोलेनाथ के साथ माता पार्वती औरभगवान गणेश की भी विधि- विधान से पूजा- अर्चना करनी चाहिए।  फिर घर के मंदिर में दीपक जलाएं आरती करें और भगवान को भोग भी लगाएं।  इस बात का ध्यान रखें भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का ही भोग लगाया जाता है। कालाष्टमी व्रत का महत्व  मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की पूजा करने से सभी तरह के भय से मुक्ति मिल जाती है। इस दिन व्रत करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है साथ ही भैरव भगवान की कृपा से शत्रुओं से छुटकारा मिल जाता है। कालाष्टमी व्रत मंत्र शिवपुराण में कालभैरव की पूजा के दौरान इन मंत्रों का जप करना बेहद फलदायी माना गया है।  अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्,भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!! अन्य मंत्र:ओम भयहरणं च भैरव:।ओम कालभैरवाय नम:।ओम ह्रीं बं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।ओम भ्रं कालभैरवाय फट्।

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कन्याकुमारी – धार्मिक स्थल

कन्याकुमारी धार्मिक स्थल, Kanyakumari Religious Places in hindi, हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरते हैं। भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षो से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्च है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र बीच पर फैले रंग बिरंगी रेत इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है। कन्याकुमारी दक्षिण भारत के महान शासकों चोल, चेर, पांड्य के अधीन रहा है। यहां के स्मारकों पर इन शासकों की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस जगह का नाम कन्याकुमारी पड़ने के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने असुर बानासुरन को वरदान दिया था कि कुंवारी कन्या के अलावा किसी के हाथों उसका वध नहीं होगा। प्राचीन काल में भारत पर शासन करने वाले राजा भरत को आठ पुत्री और एक पुत्र था। भरत ने अपना साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में बांटकर अपनी संतानों को दे दिया। दक्षिण का हिस्सा उसकी पुत्री कुमारी को मिला। कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाता था। कुमारी ने दक्षिण भारत के इस हिस्से पर कुशलतापूर्वक शासन किया। उसकी ईच्छा थी कि वह शिव से विवाह करें। इसके लिए वह उनकी पूजा करती थी। शिव विवाह के लिए राजी भी हो गए थे और विवाह की तैयारियां होने लगीं थी। लेकिन नारद मुनि चाहते थे कि बानासुरन का कुमारी के हाथों वध हो जाए। इस कारण शिव और देवी कुमारी का विवाह नहीं हो पाया। इस बीच बानासुरन को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा। कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी। दोनों के बीच युद्ध हुआ और बानासुरन को मृत्यु की प्राप्ति हुई। कुमारी की याद में ही दक्षिण भारत के इस स्थान को कन्याकुमारी कहा जाता है। माना जाता है कि शिव और कुमारी के विवाह की तैयारी का सामान आगे चलकर रंग बिरंगी रेत में परिवर्तित हो गया। सागर के मुहाने के दाई और स्थित यह एक छोटा सा मंदिर है जो पार्वती को समर्पित है। मंदिर तीनों समुद्रों के संगम स्थल पर बना हुआ है। यहां सागर की लहरों की आवाज स्वर्ग के संगीत की भांति सुनाई देती है। भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाते हैं जो मंदिर के बाई ओर 500 मीटर की दूरी पर है। मंदिर का पूर्वी प्रवेश द्वार को हमेशा बंद करके रखा जाता है क्योंकि मंदिर में स्थापित देवी के आभूषण की रोशनी से समुद्री जहाज इसे लाइटहाउस समझने की भूल कर बैठते है और जहाज को किनारे करने के चक्कर में दुर्घटनाग्रस्त हो जाते है। यह स्मारक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को समर्पित है। यही पर महात्मा गांधी की चिता की राख रखी हुई है। इस स्मारक की स्थापना 1956 में हुई थी। महात्मा गांधी 1937 में यहां आए थे। उनकी मृत्यु के बाद 1948 में कन्याकुमारी में ही उनकी अस्थियां विसर्जित की गई थी। स्मारक को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर सूर्य की प्रथम किरणें उस स्थान पर पड़ती हैं जहां महात्मा की राख रखी हुई है। कन्याकुमारी तिरूचेन्दूर 85 किमी दूर स्थित तिरूचेन्दूर के खूबसूरत मंदिर भगवान सुब्रमण्यम को समर्पित हैं। बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित इस मंदिर को भगवान सुब्रमण्यम के 6 निवासों में से एक माना जाता है। कन्याकुमारी नागराज मंदिर कन्याकुमारी से 20 किमी दूर नगरकोल का नागराज मंदिर नाग देव को समर्पित है। यहां भगवान विष्णु और शिव के दो अन्य मंदिर भी हैं। मंदिर का मुख्य द्वार चीन की बुद्ध विहार की कारीगरी की याद दिलाता है। कन्याकुमारी पदमानभापुरम महल पदमानभापुरम महल की विशाल हवेलियां त्रावनकोर के राजा द्वारा बनवाया हैं। ये हवेलियां अपनी सुंदरता और भव्यता के लिए जानी जाती हैं। कन्याकुमारी से इनकी दूरी 45 किमी है। यह महल केरल सरकार के पुरातत्व विभाग के अधीन हैं। कन्याकुमारी कोरटालम झरना यह झरना 167 मीटर ऊंची है। इस झरने के जल को औषधीय गुणों से युक्त माना जाता है। यह कन्याकुमारी से 137 किमी दूरी पर स्थित है। कन्याकुमारी विवेकानंद रॉक मेमोरियल समुद्र में बने इस स्थान पर बड़ी संख्या में पर्यटक आते है। इस पवित्र स्थान को विवेकानंद रॉक मेमोरियल कमेटी ने 1970 में स्वामी विवेकानंद के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए बनवाया था। इसी स्थान पर स्वामी विवेकानंद गहन ध्यान लगाया था। इस स्थान को श्रीपद पराई के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी। कहा जाता है कि यहां कुमारी देवी के पैरों के निशान मुद्रित हैं। इस स्मारक के विवेकानंद मंडपम और श्रीपद मंडपम नामक दो प्रमुख हिस्से हैं।

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