हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं

हिन्दू धर्म या कहें कि भारतीय संस्कृति में प्रचलित और ग्रंथों में उल्लेखित भारत के 29 ऐसे रहस्य हैं, जो अभी तक अनसुलझे हुए हैं और संभवत: उनमें से कुछ का रहस्य मानव कभी नहीं जान पाएगा। प्राचीन सभ्यताओं, धर्म, समाज और संस्कृतियों का महान देश भारत वैसे भी रहस्य और रोमांच के लिए जाना जाता है। एक ओर जहां भारत में दुनिया की प्रथम भाषा संस्कृत का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद लिखा गया। एक और जहां दुनिया की प्रथम लिपि ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया के प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला की स्थापना हुई। प्राचीन भारत में एक ओर जहां अगस्त्य मुनि ने बिजली का आविष्कार किया था तो हजारों वर्ष पूर्व ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र लिखकर यह बताया था कि किस तरह विमान बनाए जा सकते हैं। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत जहां भास्कराचार्य ने ईजाद किया था तो वहीं कणाद ऋषि को परमाणु सिद्धांत का जनक माना गया है। एक ओर जहां सांप-सीढ़ी का खेल भारत में जन्मा दो दूसरी ओर शतरंज का आविष्कार भी भारत में ही हुआ। आचार्य चरक और सुश्रुत को श्रेय जाता है प्लास्टिक सर्जरी चिकित्सा की खोज का। पाणिणी ने दुनिया का पहला व्याकरण लिखा था। ज्यामिति, पाई का मान, रिलेटिविटी का सिद्धांत जैसे कई सिद्धांत और आविष्कार हैं, जो भारत ने गढ़े हैं। लेकिन हम उक्त सबसे हटकर कुछ ऐसे 29 रहस्य बताने वाले हैं, जो अब तक अनसुलझे हैं। ऋषि कश्यप और उनकी पत्नियों के पुत्रों का रहस्य कहते हैं कि धरती के प्रारंभिक काल में धरती एक द्वीप वाली थी, फिर वह दो द्वीप वाली बनी और अंत में सात द्वीपों वाली बन गई। कहते हैं कि प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने समुद्र में और धरती पर तरह-तरह के जीवों की उत्पत्ति की। उत्पत्ति के इस काल में उन्होंने अपने कई मानस पुत्रों को भी जन्म दिया। उन्हीं में से एक थे मरीची। ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे।  मान्यता के अनुसार इन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता ‘कला’ कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। यहां रहस्य वाली बात यह कि क्या कोई इंसान सर्प, पक्षी, पशु आदि तरह की जातियों को जन्म दे सकता है? हालांकि जीव विकासवादियों को इस पर शोध करना चाहिए। क्या मनुष्य और पशुओं के संयोग से कोई एक नई प्रजाति को जन्म देना संभव है। भगवान विष्णु सदा एक गरूड़ पर सवार रहते थे। ये गरूड़जी कश्यप की पत्नी विनीता से जन्मे थे। यूं तो कश्यप ऋषि की कई पत्नियां थीं लेकिन प्रमुख रूप से 17 का हम उल्लेख करना चाहेंगे- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. काष्ठा, 5. अरिष्टा, 6. सुरसा, 7. इला, 8. मुनि, 9. क्रोधवशा, 10. ताम्रा, 11. सुरभि, 12. सुरसा, 13. तिमि, 14. विनीता, 15. कद्रू, 16. पतांगी और 17. यामिनी आदि पत्नियां बनीं। 1. अदिति से 12 आदित्यों का जन्म हुआ- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। ये सभी देवता कहलाए और इनका स्थान हिमालय के उत्तर में था। 2. दिति से कई पुत्रों का जन्म हुआ- कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक 2 पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। ये दैत्य कहलाए और इनका स्थान हिमालय के ‍दक्षिण में था। श्रीमद्भागवत के अनुसार इन 3 संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र नि:संतान रहे जबकि हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। 3. दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरुपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। ये सभी दानव कहलाए। 4. अन्य पत्नियां : रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की। रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जंतुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया। रानी विनीता के गर्भ से गरूड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए। कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।  रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की 2 पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के 60 हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ, जो कि कालांतर में निवात कवच के नाम से विख्यात हुए। 10 फन, उड़ने वाले, मणिधर और इच्छाधारी सांप होते हैं? सभी जीव-जंतुओं में गाय के बाद सांप ही एक ऐसा जीव है जिसका हिन्दू धर्म में ऊंचा स्थान है। सांप एक रहस्यमय प्राणी है। देशभर के गांवों में आज भी लोगों के शरीर में नाग देवता की सवारी आती है। शिव के प्रमुख गणों में सांप भी है। भारत में नाग जातियों का लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं कि कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला- उक्त 5 नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। ये सभी कश्यप वंशी थे, लेकिन इन्हीं से नागवंश चला। शेषनाग को 10 फन वाला माना गया है। भगवान विष्णु उन पर ही लेटे हुए दर्शाए गए हैं। उड़ने वाला और इच्छाधारी नाग : माना जाता है कि 100 वर्ष से ज्यादा उम्र होने के बाद सर्प में उड़ने की शक्ति आ जाती है। सर्प कई प्रकार के

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डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध

बहुत पुरानी बात है मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था।इसका कारण डाकू अंगुलीमाल था। डाकू अंगुलीमाल मगध के जंगलों की गुफा में रहता था। वह लोगों को लूटता था और जान से भी मार देता था। लोगों को डराने के लिए वह जिसे भी मारता उसकी एक ऊँगली काट लेता और उन उँगलियों की माला बनाकर पहनता। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा। गाँव के सभी लोग परेशान थे कैसे इस डाकू के आतंक से छुटकारा मिल एक दिन गौतम बुद्ध उस गाँव में आये। गाँव के लोग उनकी आवभगत करने लगे। गौतम बुद्ध ने देखा कि गाँव के लोगों में किसी बात को लेकर देहशत फैली है! तब गौतम बुद्ध ने गाँव वालों से इसका कारण पूछा- ये सुनते ही गाँव वालों ने अंगुलिमाल के आतंक का पूरा किस्सा उन्हें सुनाया। अगले ही दिन गौतम बुद्ध जंगल की तरफ निकल गये, गाँव वालों ने उन्हें बहुत रोका पर वो नहीं माने। बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसकी गुफा के सामने से निकल गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा। अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को  पकड़ नहीं पा रहा था। थक हार कर उसने कहा- “रुको” बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले- मैं तो कबका रुक गया पर तुम कब ये हिंसा रोकोगे। अंगुलिमाल ने कहा- सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। सारा मगध मुझसे डरता है। तुम्हारे पास जो भी माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ। बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले- मैं ये कैसे मान लूँ कि तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली इन्सान हो। तुम्हे ये साबित करके दिखाना होगा। अंगुलिमाल बोला बताओ- “कैसे साबित करना होगा?”। बुद्ध ने कहा- “तुम उस पेड़ से दस पत्तियां तोड़ कर लाओ”। अंगुलिमाल ने कहा- बस इतनी सी बात, “मैं तो पूरा पेड़ उखाड़ सकता हूँ”। अंगुलिमाल ने दस पत्तियां तोड़कर ला दीं। बुद्ध ने कहा- अब  इन पत्तियों को वापस पेड़ पर जाकर लगा दो। अंगुलिमाल ने हैरान होकर कहा- टूटे हुए पत्ते कहीं वापस लगते हैं क्या ? तो बुद्ध बोले – जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे शक्तिशाली कैसे हुए ? यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसे तोड़ो मत, यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे म्रत्यु देने का भी तुम्हे कोई अधिकार नहीं है। ये सुनकर अंगुलीमाल को अपनी गलती का एहसास हो गया। और वह बुद्ध का शिष्य बन गया। और उसी गाँव में रहकर लोगों की सेवा करने लगा। आगे चलकर यही अंगुलिमाल बहुत बड़ा सन्यासी बना और अहिंसका के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी इन्सान कितना ही बुरा क्यों न हो, वह बदल सकता है। दोस्तों, अंगुलिमाल बुराई का एक प्रतीक है, और हम सबमें छोटे-बड़े रूप में कोई न कोई बुराई है। ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने अन्दर की बुराइयों को पहचाने और उन्हें ख़त्म करें।

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कृष्ण, बलराम और राक्षस

महाभारत काल की बात है। एक बार कृष्ण और बलराम किसी जंगल से गुजर रहे थे। चलते-चलते काफी समय बीत गया और अब सूरज भी लगभग डूबने वाला था। अँधेरे में आगे बढना संभव नहीं था, इसलिए कृष्ण बोले, “ बलराम, हम ऐसा करते हैं कि अब सुबह होने तक यहीं ठहर जाते हैं, भोर होते ही हम अपने गंतव्य की और बढ़ चलेंगे।” लराम बोले, “ पर इस घने जंगल में हमें खतरा हो सकता है, यहाँ सोना उचित नहीं होगा, हमें जाग कर ही रात बितानी होगी।” “अच्छा, हम ऐसा करते हैं कि पहले मैं सोता हूँ और तब तक तुम पहरा देते रहो, और फिर जैसे ही तुम्हे नींद आये तुम मुझे जगा देना; तब मैं पहरा दूंगा और तुम सो जाना।”, कृष्ण ने सुझाव दिया। बलराम तैयार हो गए। कुछ ही पलों में कृष्ण गहरी नींद में चले गए और तभी बलराम को एक भयानक आकृति उनकी ओर आती दिखी, वो कोई राक्षस था। राक्षस उन्हें देखते ही जोर से चीखा और बलराम बुरी तरह डर गए। इस घटना का एक विचित्र असर हुआ- भय के कारण बलराम का आकार कुछ छोटा हो गया और राक्षस और विशाल हो गया। उसके बाद राक्षस एक बार और चीखा और पुन: बलराम डर कर काँप उठे, अब बलराम और भी सिकुड़ गए और राक्षस पहले से भी बड़ा हो गया। राक्षस धीरे-धीरे बलराम की और बढ़ने लगा, बलराम पहले से ही भयभीत थे, और उस विशालकाय राक्षस को अपनी और आता देख जोर से चीख पड़े –“कृष्णा…” ,और चीखते ही वहीँ मूर्छित हो कर गिर पड़े। बलराम की आवाज़ सुन कर कृष्ण उठे, बलराम को वहां देख उन्होंने सोचा कि बलराम पहरा देते-दते थक गए और सोने से पहले उन्हें आवाज़ दे दी। अब कृष्ण पहरा देने लगे। कुछ देर बाद वही राक्षस उनके सामने आया और जोर से चीखा। कृष्ण जरा भी घबराए नही और बोले, “बताओ तुम इस तरह चीख क्यों रहे हो, क्या चाहिए तुम्हे?” इस बार भी कुछ विच्त्र घटा- कृष्ण के साहस के कारण उनका आकार कुछ बढ़ गया और राक्षस का आकर कुछ घट गया। राक्षस को पहली बार कोई ऐसा मिला था जो उससे डर नहीं रहा था। घबराहट में वह पुन: कृष्ण पर जोर से चीखा इस बार भी कृष्ण नहीं डरे और उनका आकर और भी बड़ा हो गया जबकि राक्षस पहले से भी छोटा हो गया। एक आखिरी प्रयास में राक्षस पूरी ताकत से चीखा पर कृष्ण मुस्कुरा उठे और फिर से बोले, “ बताओ तो क्या चाहिए तुम्हे?” फिर क्या था राक्षस सिकुड़ कर बिलकुल छोटा हो गया और कृष्ण ने उसे हथेली में लेकर अपनी धोती में बाँध लिया और फिर  कमर में खोंस कर रख लिया कुछ ही देर में सुबह हो गयी, कृष्ण ने बलराम को उठाया और आगे बढ़ने के लिए कहा! वे धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे तभी बलराम उत्तेजित होते हुए बोले, “पता है कल रात में क्या हुआ था, एक भयानक राक्षस हमे मारने आया था!” “रुको-रुको”, बलराम को बीच में ही टोकते हुए कृष्ण ने अपनी धोती में बंधा राक्षस निकाला  और बलराम को दिखाते हुए बोले, “कहीं तुम इसकी बात तो नहीं कर रहे हो “हाँ, ये वही है। पर कल जब मैंने इसे देखा था तो ये बहुत बड़ा था, ये इतना छोटा कैसे हो गया?”, बलराम आश्चर्यचकित होते हुए बोले। कृष्ण बोले, “ जब जीवन में तुम किसी ऐसी चीज से बचने की कोशिश करते हो जिसका तुम्हे सामना करना चाहिए तो वो तुमसे बड़ी हो जाती है और तुम पर नियंत्रण करने लगती है लेकिन जब तुम उस चीज का सामना करते हो जिसका सामना तुम्हे करना चाहिए तो तुम उससे बड़े हो जाते हो और उसे नियंत्रित करने लगते हो!  दोस्तों, ये राक्षस दरअसल, हमारी life में आने वाले challenges हैं, विपरीत स्थितियां हैं, life problems हैं! अगर हम इन situations को avoid करते रहते हैं तो ये समस्याएं और भी बड़ी होती चली जाती हैं और ultimately हमें control करने लगती हैं लेकिन अगर हम इनका सामना करते हैं, courage के साथ इन्हें face करते हैं तो यही समस्याएं धीरे-धीरे छोटी होती चली जाती हैं और अंततः हम उनपर काबू पा लेते हैं। इसलिए जब कभी भी life में ऐसी problems आएं जिनका सामना आपको करना ही चाहिए तो उसे अवॉयड मत करिए…जिसे फेस करना है उसे फेस करिए, उससे बचने की कोशिश मत करिए, जब आप ऐसा करेंगे तो देखते-देखते ही वे समस्याएं इतनी छोटी हो जायेंगी कि आप आराम से उनपर नियंत्रण कर सकेंगे और उन्हें हेमशा-हमेशा के लिए ख़त्म कर सकेंगे

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मत्स्य अवतार की कथा पढ़ें

मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जंतु एकत्रित करने के लिए कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुन: जीवन का निर्माण किया। एक दूसरी मान्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुराकर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुन: स्थापित किया। एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था। सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं, अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। दूसरे दिन मछली सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढिए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया। यहां भी मछली का शरीर रातभर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने के लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुन: सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है। तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया। आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अत: मछली पुन: सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मयभरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? मत्स्यरूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से 7वें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में फिर जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा। भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुंचेगी। आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइएगा। मैं उसी समय आपको पुन: दिखाई पडूंगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूंगा। सत्यव्रत उसी दिन से श्रीहरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। 7वें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। तभी उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए। नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्यरूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े। सत्यव्रत और सप्त ऋषिगण मत्स्यरूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे। भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते-जी ही जीवनमुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्यरूपी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए। भगवान ने ब्रह्माजी को पुन: वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमिट कल्याण किया।

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हनुमानजी की जन्म कथा

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार साल में दो तिथियों पर हनुमानजी जन्म दिवस मनाए जाने की परंपरा है। चैत्र महीने की पूर्णिमा और कार्तिक माह की चतुर्दशी तिथि पर हनुमान जयंती मनाई जाती है। इसमें से एक तिथि पर भगवान हनुमान का जन्मदिवस के रूप में और दूसरी तिथि विजय दिवस के तौर पर मनाई जाती। हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर यहां पढ़ें रामभक्त हनुमानजी के जन्म की कहानी नुमान जन्म कथा हमें पुराणों में भिन्न-भिन्न रूप में मिलती है। उनकी माता का नाम अंजनी और पिता का नाम केसरी था। कथा के अनुसार सूर्य के वर से सुवर्ण के बने हुए सुमेरु में केसरी का राज्य था। उसकी अति सुंदरी अंजना नामक स्त्री थी। एक बार अंजना ने शुचिस्नान करके सुंदर वस्त्राभूषण धारण किए। उस समय पवन देव ने उसके कर्णरन्ध्र में प्रवेश कर आते समय आश्वासन दिया कि तेरे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा और ऐसा ही हुआ भी। अंजना के उदर से हनुमानजी उत्पन्न हए। दो प्रहर बाद सूर्योदय होते ही उन्हें भूख लगी। माता फल लाने गई। इधर लाल वर्ण के सूर्य को फल मान कर हनुमान जी उसको लेने के लिए आकाश में उछल गए। उस दिन अमावस्या होने से सूर्य को ग्रसने के लिए राहु आया था, किंतु हनुमानजी को दूसरा राहु मान कर वह भाग गया। तब इंद्र ने हनुमानजी पर वज्र-प्रहार किया। उससे इनकी ठोड़ी टेढ़ी हो गई, जिससे ये हनुमान कहलाए।  इंद्र की इस दृष्टता का दंड देने के लिए पवन देव ने प्राणि मात्र का वायु संचार रोक दिया। तब ब्रह्मादि सभी देवों ने हनुमान को वर दिए। ब्रह्माजी ने अमितायु का, इंद्र ने वज्र से हत न होने का, सूर्य ने अपने शतांश तेज से युक्त और संपूर्ण शास्त्रों के विशेषज्ञ होने का, वरुण ने पाश और जल से अभय रहने का, यम ने यमदंड से अवध्य और पाश से नाश न होने का, कुबेर ने शत्रुमर्दिनी गदा से निःशंख रहने का, शंकर ने प्रमत्त और अजेय योद्धाओं से जय प्राप्त करने का और विश्वकर्मा ने मय के बनाए हुए सभी प्रकार के दुर्बोध्य और असह्य, अस्त्र, शस्त्र तथा यंत्रादि से कुछ भी क्षति न होने का वर दिया। इस प्रकार के वरों के प्रभाव से आगे जाकर हनुमानजी ने अमित पराक्रम के जो काम किए, वे सब हनुमानजी के भक्तों में प्रसिद्ध हैं और जो अश्रुत या अज्ञात हैं, वे अनेक प्रकार की रामायणों, पद्म, स्कन्द और वायु आदि पुराणों एवं उपासना-विषय के अगणित ग्रंथों से ज्ञात हो सकते हैं।

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गंगा जन्म की कथा 

ऋषि विश्वामित्र ने इस प्रकार कथा सुनाना आरम्भ किया, “पर्वतराज हिमालय की अत्यंत रूपवती, लावण्यमयी एवं सर्वगुण सम्पन्न दो कन्याएँ थीं। सुमेरु पर्वत की पुत्री मैना इन कन्याओं की माता थीं। हिमालय की बड़ी पुत्री का नाम गंगा तथा छोटी पुत्री का नाम उमा था। गंगा अत्यन्त प्रभावशाली और असाधारण दैवी गुणों से सम्पन्न थी। वामन पुराण के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन रूप में अपना एक पैर आकाश की ओर उठाया तो तब ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु के चरण धोकर जल को अपने कमंडल में भर लिया। इस जल के तेज से ब्रह्मा जी के कमंडल में गंगा का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने गंगा हिमालय को सौंप दिया इस तरह देवी पार्वती और गंगा दोनों बहन हुई। वह किसी बन्धन को स्वीकार न कर मनमाने मार्गों का अनुसरण करती थी। उसकी इस असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर देवता लोग विश्व के क्याण की दृष्टि से उसे हिमालय से माँग कर ले गये। पर्वतराज की दूसरी कन्या उमा बड़ी तपस्विनी थी। उसने कठोर एवं असाधारण तपस्या करके महादेव जी को वर के रूप में प्राप्त किया।” वत्स राम! तुम्हारी ही अयोध्यापुरी में सगर नाम के एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। सगर की पटरानी केशिनी विदर्भ प्रान्त के राजा की पुत्री थी। केशिनी सुन्दर, धर्मात्मा और सत्यपरायण थी। सगर की दूसरी रानी का नाम सुमति थी जो राजा अरिष्टनेमि की कन्या थी। दोनों रानियों को लेकर महाराज सगर हिमालय के भृगुप्रस्रवण नामक प्रान्त में जाकर पुत्र प्राप्ति के लिये तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उन्हें वर दिया कि तुम्हें बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी। दोनों रानियों में से एक का केवल एक ही पुत्र होगा जो कि वंश को बढ़ायेगा और दूसरी के साठ हजार पुत्र होंगे। कौन सी रानी कितने पुत्र चाहती है इसका निर्णय वे स्वयं आपस में मिलकर कर लें। केशिनी ने वंश को बढ़ाने वाले एक पुत्र की कामना की और गरुड़ की बहन सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों की।विश्वामित्र के इतना कहने पर राम ने कहा, “गे भगवन्! जब गंगा को देवता लोग सुरलोक ले गये तो वह पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुई और गंगा को त्रिपथगा क्यों कहते हैं?” इस पर ऋषि विश्वामित्र ने बताया, “महादेव जी का विवाह तो उमा के साथ हो गया था किन्तु सौ वर्ष तक भी उनके किसी सन्तान की उत्पत्ति नहीं हुई। एक बार महादेव जी के मन में सन्तान उत्पन्न करने का विचार आया। जब उनके इस विचार की सूचना ब्रह्मा जी सहित देवताओं को मिली तो वे विचार करने लगे कि शिव जी के सन्तान के तेज को कौन सम्भाल सकेगा? उन्होंने अपनी इस शंका को शिव जी के सम्मुख प्रस्तुत किया। उनके कहने पर अग्नि ने यह भार ग्रहण किया और परिणामस्वरूप अग्नि के समान महान तेजस्वी स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ। देवताओं के इस षड़यंत्र से उमा के सन्तान होने में बाधा पड़ी तो उन्होंने क्रुद्ध होकर देवताओं को शाप दे दिया कि भविष्य में वे कभी पिता नहीं बन सकेंगे। इस बीच सुरलोक में विचरण करती हुई गंगा से उमा की भेंट हुई। गंगा ने उमा से कहा कि मुझे सुरलोक में विचरण करत हुये बहुत दिन हो गये हैं। मेरी इच्छा है कि मैं अपनी मातृभूमि पृथ्वी पर विचरण करूँ। उमा ने गंगा आश्वासन दिया कि वे इसके लिये कोई प्रबन्ध करने का प्रयत्न करेंगी। उचित समय पर रानी केशिनी ने असमंजस नामक पुत्र को जन्म दिया। रानी सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकल जिसे फोड़ने पर छोटे छोटे साठ हजार पुत्र निकले। उन सबका पालन पोषण घी के घड़ों में रखकर किया गया। कालचक्र बीतता गया और सभी राजकुमार युवा हो गये। सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमंजस बड़ा दुराचारी था और उसे नगर के बालकों को सरयू नदी में फेंक कर उन्हें डूबते हुये देखने में बड़ा आनन्द आता था। इस दुराचारी पुत्र से दुःखी होकर सगर ने उसे अपने राज्य से निर्वासित कर दिया। असमंजस के अंशुमान नाम का एक पुत्र था। अंशुमान अत्यंत सदाचारी और पराक्रमी था। एक दिन राजा सगर के मन में अश्वमेघ यज्ञ करवाने का विचार आया। शीघ्र ही उन्होंने अपने इस विचार को कार्यरूप में परिणित कर दिया। राम ने ऋषि विश्वामित्र से कहा, “गुरुदेव! मेरी रुचि अपने पूर्वज सगर की यज्ञ गाथा को विस्तारपूर्वक सुनने में है। अतः कृपा करके इस वृतान्त को पूरा पूरा सुनाइये।” राम के इस तरह कहने पर ऋषि विश्वामित्र प्रसन्न होकर कहने लगे, ” राजा सगर ने हिमालय एवं विन्ध्याचल के बीच की हरी भरी भूमि पर एक विशाल यज्ञ मण्डप का निर्माण करवाया। फिर अश्वमेघ यज्ञ के लिये श्यामकर्ण घोड़ा छोड़कर उसकी रक्षा के लिये पराक्रमी अंशुमान को सेना के साथ उसके पीछे पीछे भेज दिया। यज्ञ की सम्भावित सफलता के परिणाम की आशंका से भयभीत होकर इन्द्र ने एक राक्षस का रूप धारण करके उस घोड़े को चुरा लिया। घोड़े की चोरी की सूचना पाकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया कि घोड़ा चुराने वाले को पकड़कर या मारकर घोड़ा वापस लाओ। पूरी पृथ्वी में खोजने पर भी जब घोड़ा नहीं मिला तो, इस आशंका से कि किसीने घोड़े को तहखाने में न छुपा रखा हो, सगर के पुत्रों ने सम्पूर्ण पृथ्वी को खोदना आरम्भ कर दिया। उनके इस कार्य से असंख्य भूमितल निवासी प्राणी मारे गये। खोदते खोदते वे पाताल तक जा पहुँचे। उनके इस नृशंस कृत्य की देवताओं ने ब्रह्मा जी से शिकायत की तो ब्रह्मा जी ने कहा कि ये राजकुमार क्रोध एवं मद में अन्धे होकर ऐसा कर रहे हैं। पृथ्वी की रक्षा कर दायित्व कपिल पर है इसलिये वे इस विषय में कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। पूरी पृथ्वी को खोदने के बाद भी जब घोड़ा और उसको चुराने वाला चोर नहीं मिला तो निराश होकर राजकुमारों ने इसकी सूचना अपने पिता को दी। रुष्ट होकर सगर ने आदेश दिया कि घोड़े को पाताल में जाकर ढूंढो। पाताल में घोड़े को खोजते खोजते वे सनातन वसुदेव कपिल के आश्रम में पहुँच गये। उन्होंने देखा कपिलदेव आँखें बन्द किये बैठे हैं और उन्हीं के पास यज्ञ का वह घोड़ा बँधा हुआ है। उन्होंने कपिल मुनि को घोड़े का चोर समझकर उनके लिये अनेक दुर्वचन कहे और उन्हें

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विष्णु जी की ये पौराणिक कथा, जानकर चकित रह जाएंगे आप

आपने भगवान विष्णु के दशावतार की कथा तो पढ़ी या सुनी होगी। लेकिन हम इससे अलग हटक आपको ऐसी पौराणिक कथा बताने वाले हैं जिससे आपके शायद की पढ़ा या सुना होगा। आओ आज हम बताते हैं भगवान विष्णु और गरुड़ की पौराणिक कथा। आओ आज हम बताते हैं भगवान विष्णु और गरुड़ की पौराणिक कथा। गरुड़ और विष्णु की पौराणिक कथा ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थीं जिनमें से दो वनिता और कद्रू थी।ये दोनों ही बहनें थी, जो एक दूसरे से ईर्ष्या रखती थी।दोनों के पुत्र नहीं थे तो पति कश्यप ने दोनों को पुत्र के लिए एक वरदान दे दिया। गरुड़ और विष्णु की पौराणिक कथा ऋषि कश्यप की कई पत्नियां थीं जिनमें से दो वनिता और कद्रू थी। ये दोनों ही बहनें थी, जो एक दूसरे से ईर्ष्या रखती थी। दोनों के पुत्र नहीं थे तो पति कश्यप ने दोनों को पुत्र के लिए एक वरदान दे दिया। वनिता ने दो बलशाली पुत्र मांगे जबकि कद्रू ने हजार सर्प पुत्र रूप में मांगे जो कि अंडे के रूप में जन्म लेने वाले थे। सर्प होने के कारण कद्रू के हजार बेटे अंडे से उत्पन्न हुए और अपनी मां के कहे अनुसार काम करने लगे। दोनों बहनों में शर्त लग गई थी कि जिसके पुत्र बलशाली होंगे हारने वाले को उसकी दासता स्वीकार करनी होगी। इधर सर्प ने जो जन्म ले लिया था लेकिन वनिता के अंडों से अभी कोई पुत्र नहीं निकला था। इसी जल्दबाजी में वनिता ने एक अंडे को पकने से पहले ही फोड़ दिया। अंडे से अर्धविकसित बच्चा निकला जिसका ऊपर का शरीर तो इंसानों जैसा था लेकिन नीचे का शरीर अर्धपक्व था। इसका नाम अरुण था। अरुण ने अपनी मां से कहा कि ‘पिता के कहने के बाद भी आपने धैर्य खो दिया और मेरे शरीर का विस्तार नहीं होने दिया। इसलिए मैं आपको श्राप देता हूं कि आपको अपना जीवन एक सेवक के तौर पर बिताना होगा। अगर दूसरे अंडे में से निकला उनका पुत्र उन्हें इस श्राप से मुक्त ना करवा सका तो वह आजीवन दासी बनकर रहेंगी।’ भय से विनता ने दूसरा अंडा नहीं फोड़ा और पुत्र के शाप देने के कारण शर्त हार गई और अपनी छोटी बहन की दासी बनकर रहने लगी। बहुत लंबे काल के बाद दूसरा अंडा फूटा और उसमें से विशालकाय गरुड़ निकला जिसका मुख पक्षी की तरह और बाकी शरीर इंसानों की तरह था। हालांकि उनकी पसलियों से जुड़े उनके विशालकाय पंक्ष भी थे। जब गरुड़ को यह पता चला कि उनकी माता तो उनकी ही बहन की दासी है और क्यों है यह भी पता चला, तो उन्होंने अपनी मौसी और सर्पों से इस दासत्व से मुक्ति के लिए उन्होंने शर्त पूछी। सर्पो ने विनता की दासता की मुक्ति के लिए अमृत मंथन ने निकला अमृत मांग। अमृत लेने के लिए गरुड़ स्वर्ग लोक की तरफ तुरंत निकल पड़े। देवताओं ने अमृत की सुरक्षा के लिए तीन चरणों की सुरक्षा कर रखी थी, पहले चरण में आग की बड़े परदे बिछा ररखे थे। दूसरे में घातक हथियारों की आपस में घर्षण करती दीवार थी और अंत में दो विषैले सर्पो का पहरा। वहां तक भी पहुंचाने से पहले देवताओं से मुकाबला करना था। गरुड़ सब से भीड़ गए और देवताओं को बिखेर दिया। तब गरुड़ ने कई नदियों का जल मुख में ले पहले चरण की आग को बुझा दिया, अगले पथ में गरुड़ ने अपना रूप इतना छोटा कर लिया के कोई भी हथियार उनका कुछ न बिगाड़ सका और सांपों को अपने दोनों पंजो में पकड़कर उन्होंने अपने मुंह से अमृत कलश उठा लिया और धरती की ओर चल पड़े।  लेकिन तभी रास्ते में भगवान विष्णु प्रकट हुए और गरुड़ के मुंह में अमृत कलश होने के बाद भी उसके प्रति मन में लालच न होने से खुश होकर गरुड़ को वरदान दिया की वो आजीवन अमर हो जाएंगे। तब गरुड़ ने भी भगवान को एक वरदान मांगने के लिए बोला तो भगवान ने उन्हें अपनी सवारी बनने का वरदान मांगा। इंद्र ने भी गरुड़ को वरदान दिया की वो सांपों को भोजन रूप में खा सकेगा इस पर गरुड़ ने भी अमृत सकुशल वापसी का वादा किया।  अंत में गरुड़ ने सर्पों को अमृत सौंप दिया और भूमि पर रख कर कहा कि यह रहा अमृत कलश। मैंने यहां इसे लाने का अपना वादा पूरा किया और अब यह आपके सुपूर्द हुआ, लेकिन इसे पीने के आप सभी स्नान करें तो अच्छा होगा। जब वे सभी सर्प स्नान करने गए तभी वहां अचानक से भगवान इंद्र पहुंचे और अमृत कलश को वापस ले गए। लेकिन कुछ बूंदे भूमि पर गिर गई जो घांस पर ठहर गई थी। सर्प उन बूंदों पर झपट पड़े, लेकिन उनके हाथ कुछ न लगा। इस तरह गरुड़ की शर्त भी पूरी हो गई और सर्पों को अमृत भी नहीं मिला।

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कृष्ण के बालपन की 16 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

1. कंस को भविष्यवाणी कंस मथुरा नामक राज्य का राजा था। और वह बहुत लालची और क्रूर भी था। वह अत्याचारी भी था, इसलिए मथुरा की प्रजा उससे डरी रहती थी। कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्यार करता था। जब देवकी का विवाह हुआ, तो कंस ने अपने बहन और उसके पति वासुदेव के रथ का सारथी बनने का निर्णय किया। जब वह रथ हांक रहा था, तभी उसे आकाशवाणी सुनाई दी, “अरे मूर्ख, तेरी मौत के दिन पास आ रहे हैं!” कंस यह सब सुनकर भौचक्का रह गया। आकाशवाणी दुबारा सुनाई दी, “देवकी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा।” कंस यह सुनते ही अपनी बहन को मारने के लिए उठा, लेकिन वासुदेव ने उसे रोका और वचन दिया कि वे अपनी सारी संतान पैदा होते ही उसे दे दीया करेगा। कंस मान गया लेकिन उसने दोनों को कारागार में डाल दिया। वासुदेव और देवकी की छह संतान को उसने पैदा होते ही मार डाला, लेकिन कृष्ण और बलराम को वासुदेव ने अपनी चतुराई से बचा लिया। कई सालों बाद भविष्यवाणी सच साबित हुई और कृष्ण जोकि देवकी का आठवां संतान था उसने कंस का वध कर दिया और मथुरा को कंस की गुलामी से आजाद कर दिया। 2. कृष्ण के जन्म की कहानी कृष्ण की कहानियां कंस ने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया था। देवकी ने विष्णु की आराधना की, तो विष्णु ने उसे वचन दिया कि वह स्वयं उसके आठवें पुत्र के रूप में जन्म लेगा। इसके बाद श्रावण महा में तूफानी रात में विष्णु ने देवकी के पेट से जन्म लिया। उस समय आश्चर्यजनक रूप से वासुदेव की हथकड़ियां और बेड़िया खुल गई। सैनिकों को नींद आ गई। तभी आकाशवाणी हुई, “अपने बच्चे को गोकुल में नंद के पास छोड़ आओ।”वासुदेव ने एक टोकरी में नवजात बच्चे को रखा और कारागार से निकल गया। रास्ते में भारी बारिश के बीच उन्होंने यमुना नदी पार की। वह अपने बच्चे को सुरक्षित यशोदा के पास छोड़ आए। आकाशवाणी सच निकली बड़े होकर देवकी की आठवीं संतान कृष्ण ही कंस के काल बने और सभी लोगों को उनके आतंक से मुक्त किया। 3. बलराम के जन्म की कहानी कंस ने अपनी बहन देवकी और बहनोई वासुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके होने वाली हर संतान को दुष्ट कंस मार देता था। क्योंकि आकाशवाणी के अनुसार देवकी की आठवीं संतान कंस का काल बनेगा परंतु दुष्ट कंस ने हर संतान को मारने लगा। जब देवकी और वासुदेव के छठे पुत्र को दुष्ट कंस ने मार डाला, तो देवकी बहुत दुखी हुई। उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की।एक रात भगवान विष्णु उसके सपने में आए और बोले कि नागराज शेषनाग उनके सातवे पुत्र के रूप मैं पैदा होंगे। विष्णु ने यह भी कहा कि कंस उस बच्चे को मार नहीं पाएगा। जब देवकी गर्भवती हुई तो आश्चर्यजनक रूप से उसके पेट से भ्रूण रोहिणी के गर्भ मैं चला गया। रोहिणी वासुदेव की दूसरी पत्नी थी। यह बच्चा बलराम के रूप में पैदा हुआ, जो कृष्ण का बड़ा भाई था। 4. कंस और पूतना की कहानी बच्चों के लिए कृष्ण के बालपन की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ कंस जानता था कि आकाशवाणी के अनुसार देवकी का आठवां पुत्र उसे मार डालेगा। जब देवकी की आठवीं संतान ने जन्म लिया, तो कंस को पता चला कि वह आठवीं संतान एक लड़की है तो वह तुरंत देवकी के पास कारागार जा पहुंचा। कंस ने देवकी की गोद से संतान को छीन लिया। वह दरअसल देवी योगमाया थी। योगमाया कंस की मूर्खता पर हंसने लगी और बोली की उसको मारने वाला तो जन्म ले चुका है। और गोकुल में रह रहा है। कंस बहुत क्रोधित हुआ। उसने उस दिन जन्में सभी बच्चों को मार डालने का आदेश दिया। उसके सिपाहियों ने बहुत प्रयास किया लेकिन कृष्ण को वह नहीं मार पाए। कंस ने जब राक्षसी पूतना को कृष्ण को मारने के लिए भेजा। उसने अपना विशाला दूध पिलाकर कृष्ण को मारने की योजना बनाई लेकिन बालक कृष्ण ने उस राक्षसी पूतना को ही मार दिया। 5.  कृष्ण का मक्खन प्रेम कृष्ण जैसे जैसे बड़े होते गए, वैसे वैसे उनकी शैतानियां भी बढ़ती गई। दूध और मक्खन के उनके शोक की कहानियां घर-घर में फैल चुकी थी। जब ग्वालिने दूध की मटकिया लेकर निकलती तो कृष्ण और उनके साथी पत्थर मारकर मटकिया फोड़ देते थे। कृष्ण का दूध मक्खन का लालच देखकर मक्खन को मटकी में अच्छी तरह से बंद कर ऊपर छींके पर लटका देती थी, ताकि कृष्ण के हाथ पुस्तक ना पहुंच पाए। एक दिन कृष्ण को सोता जानकर यशोदा पास के कुवे से पानी भरने चल दी। उनके जाते ही कृष्ण उठ बैठे और सिटी बजाकर उन्होंने अपने सारे साथियों को बुला लिया। सारे साथी एक के ऊपर एक खड़े होते गए और सबसे ऊपर चढ़कर किसने मटकी उतार ली। सारे साथी मिलकर मक्खन खाने लगे तभी, यशोदा वहां आ गई। क्रोध में आकर उन्होंने छड़ी उठाई और उसके पीछे दौड़ी। सारे बालक भाग निकले, लेकिन कृष्ण पकड़े गए और उनकी अच्छी पिटाई हुई। आज भी हम कृष्ण के इस दही माखन के प्रेम के लिए कृष्ण जयंती पर बालक एक के ऊपर एक चढ़कर भाई या माखन की मटकी फोड़ते हैं और उन्हें याद करते हैं। 6. तृणावर्त और कृष्णा की कहानी श्री कृष्ण की बचपन की कहानी एक दिन यशोदा अपने घर के कामकाज में व्यस्त थी, बालकृष्ण को उन्होंने आंगन में छोड़ दिया। तभी, कंस का सेवक असुर तृणावर्त तेज हवा के बवंडर के रूप में वहां प्रकट हुआ और कृष्ण को उड़ा ले गया।  पूरे गोकुल नगर में धूल छा गई और तृणावर्त  आकाश में लगातार ऊंचाई पर बढ़ता गया। पूरे नगर में धूल का घना बादल छा गया। किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।  यशोदा को चिंता हुई। उन्होंने कृष्ण को ढूंढने की कोशिश की। जब कृष्ण ही नहीं मिला तो वह जोर जोर से रोने लगी। तृणावर्त ने नन्हे बालक को अपने कंधों पर उठाने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण ने अपने आप को  इतना भारी कर लिया कि वह विवश होकर नीचे जमीन की ओर आने लगा। कृष्ण ने अपना आकार किसी पहाड़ की तरह बड़ा कर डाला और तृणावर्त  की गर्दन दबा ली। असुर कृष्ण की पकड़ से छूटने

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परशुराम जी को मिला था चिरंजीवी रहने का वरदान, जानें उनकी जन्म कथा

महत्वपूर्ण जानकारी परशुराम जयंती 2023 शनिवार, 22 अप्रैल 2023 तृतीया तिथि प्रारंभ: 22 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 07:49 बजे तृतीया तिथि समाप्त: 23 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 07:47 बजे क्या आप जानते हैं: कल्कि पुराण के अनुसार, परशुराम, कल्कि के दसवें अवतार विष्णु के गुरु होंगे और उन्हें मार्शल आर्ट सिखाएंगे।  इस दिन को बेहद शुभ माना जाता है. अक्षय तृतीया पर शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं. इसी शुभ दिन पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था. इसलिए, अक्षय तृतीया को परशुराम  जयंती के रूप में मनाया जाता है. परशुराम भगवान विष्णु के अवतार थे. उन्हें विष्णु का उग्र अवतार माना जाता था. उन्होंने श्रीराम से पहले धरती पर अवतार लिया था. कहा जाता है कि उन्हें चिरंजीवी रहने का वरदान मिला था. परशुराम आज भी मौजूद हैं. तो, चलिए उनकी जन्म कथा पढ़ लें.  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार परशुराम को विष्णु के दशावतारों में से छठा अवतार माना जाता है. उनके पिता का नाम ऋषि जमदग्नि था. जमदग्नि ने चंद्रवंशी राजा की पुत्री रेणुका से विवाह किया था. उन्होंने पुत्र के लिए एक महान यज्ञ किया था. इस यज्ञ से प्रसन्न होकर इंद्रदेव ने उन्हें तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया और फिर अक्षय तृतीया को परशुराम ने जन्म लिया.  ऋषि जमदग्नि और रेणुका ने अपने पुत्र का नाम राम रखा था. राम ने शस्त्र का ज्ञान भगवान शिव से प्राप्त किया था. शिवजी ने उन्हें प्रसन्न होकर अपना फरसा यानी परशु दिया था. इसके बाद वे परशुराम कहलाएं. परशुराम को चिरंजीवी माना जाता है यानी कि वे आज भी जीवित हैं. उनका जिक्र रामायण और महाभारत दोनों काल में किया गया है. कहा जाता है कि कलयुग के अंत में जब विष्णु के कल्कि अवतार जन्म लेंगे, तब भी परशुराम आएंगे.    कहा जाता है कि उन्होंने क्षत्रिय कुल के हैहय वंश का 21 बार नाश किया था. महाभारत काल में उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया था. श्रीकृष्ण को उन्होंने सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था. सतयुग के दौरान भी उनकी एक कथा प्रचलित है. जिसके मुताबिक वे एक बार भगवान शिव के दर्शन के लिए गए तो गणेश जी ने उन्हें रोक लिया. इससे गुस्सा होकर परशुराम ने गणपति का एक दांत तोड़ दिया. वहीं रामायण काल में भी उन्होंने राजा जनक, राजा दशरथ परशुराम का सम्मान किया. परशुराम जंयती हिन्दू धर्म के भगवान विष्णु के छठे अवतार की जयंती के रूप में मनाया जाता है। परशुराम जी की जयंती हर वर्ष वैशाख के महीने में शुक्ल पक्ष तृतीय के दौरान आता है। भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया और देवराज इन्द्र को प्रसन्न कर पुत्र प्राप्ति का वरदान पाया। महर्षि की पत्नी रेणुका ने वैशाख शुक्ल तृतीय पक्ष में परशुराम को जन्म दिया था। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप अवतार तब लिया था। जब पृथ्वी पर बुराई हर तरफ फैली हुई थी। योद्धा वर्ग, हथियारों और शक्तियों के साथ, अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। भगवान परशुराम ने इन दुष्ट योद्धाओं को नष्ट करके ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाये रखा था। हिंदू ग्रंथों में भगवान परशुराम को राम जामदग्नाय, राम भार्गव और वीरराम भी कहा जाता है। परशुराम की पूजा निओगी भूमिधिकारी ब्राह्मण, चितल्पन, दैवदन्या, मोहाल, त्यागी, अनावील और नंबुदीरी ब्राह्मण समुदायों के मूल पुरुष या संस्थापक के रूप में की जाती है।अन्य सभी अवतारों के विपरीत हिंदू आस्था के अनुसार परशुराम अभी भी पृथ्वी पर रहते है। इसलिए, राम और कृष्ण के विपरीत परशुराम की पूजा नहीं की जाती है। दक्षिण भारत में, उडुपी के पास पजका के पवित्र स्थान पर, एक बड़ा मंदिर मौजूद है जो परशुराम का स्मरण करता है। भारत के पश्चिमी तट पर कई मंदिर हैं जो भगवान परशुराम को समर्पित हैं। कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। परशुराम विष्णु अवतार कल्कि को भगवान शिव की तपस्या और दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहेंगे। यह पहली बार नहीं है कि भगवान विष्णु के 6 अवतार एक और अवतार से मिलेंगे। रामायण के अनुसार, परशुराम सीता और भगवान राम के विवाह समारोह में आए और भगवान विष्णु के 7 वें अवतार से मिले। अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: ।इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥ अर्थ: चार वेदन्यताता अर्थात् पूर्ण ज्ञान है और पीठपर धनुष्य-बाण अर्थात् शौर्य है।यहाँ ब्राह्मतेज और क्षात्रेज, उच्चासन विधायक हैं। जो सत्य का विरोध करेगा, उसे ज्ञान से या बाण से परशुराम परजित करेंगे।

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चंद्र दर्शन 2023 : जानिए तिथि, अनुष्ठान और महत्व

भारत में 21 फरवरी 2023 मंगलवार को चंद्र दर्शन अनुष्ठान किए जा सकते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, चंद्र दर्शन का समय 21 फरवरी, 2023 को शाम 06:15 बजे से शाम 07:28 बजे के बीच है। चंद्र दर्शन एक हिंदू अनुष्ठान है जो चंद्रमा को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए किया जाता है, जिसे चंद्र के नाम से भी जाना जाता है। यह आमतौर पर हर महीने की अमावस्या (अमावस्या) के दिन मनाया जाता है, जब चंद्रमा आकाश में दिखाई नहीं देता है। चंद्र दर्शन क्या है? चंद्र दर्शन को हिंदू धर्म में एक भाग्यशाली घटना के रूप में माना जाता है जो हिंदू कैलेंडर के हर महीने में एक बार होती है| चन्द्र दर्शन तब किया जाता है जब अमावस्या के बाद पहली बार चंद्रमा दिखाई देता है। यह भारत के लगभग हर हिस्से में बहुत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू मान्यताओं में, यह दिन धार्मिक महत्व रखता है। भक्त इस दिन भगवान चंद्र की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं और चंद्र देवता की विशेष पूजा करते हैं। इस विशेष दिन पर चंद्रमा को देखने के लिए इसे बहुत भाग्यशाली और समृद्ध माना जाता है। चंद्र देव के सम्मान में, चंद्र दर्शन मनाया जाता है। सूर्यास्त के ठीक बाद के समय को चन्द्रमा को देखने के लिए या चंद्र दर्शन के लिए सबसे अनुकूल समय माना जाता है। चौघड़िया की जाँच करें चन्द्र दर्शन के लिए सबसे अच्छा और सबसे शुभ समय की भविष्यवाणी करने के लिए। ऐसा कहा जाता है कि सभी अनुष्ठान समृद्धि और खुशी लाते हैं क्योंकि यह माना जाता है कि जब देवता प्रसन्न होते हैं तो भक्त को सफलता और सौभाग्य प्राप्त होता है। तारीक और मुहूर्त चंद्र दर्शन तिथि: मंगलवार, फरवरी 21, 2023 चंद्र दर्शन समय: शाम 06:15 बजे से शाम 07:28 बजे तक चंद्र दर्शन के अनुष्ठान क्या हैं चन्द्र दर्शन के दिन विभिन्न अनुष्ठान किए जाते हैं: इस विशेष दिन पर,हिंदू लोग चंद्रमा भगवान की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद मांगते हैं। एक व्रत भी है जो भक्तों द्वारा इस विशेष दिन पर चन्द्र देव को प्रसन्न करने के लिए रखा जाता है। श्रद्धालु दिनभर भोजन करने से परहेज करते हैं। व्रत का समापन चन्द्रमा दिखने के बाद किया जाता है और भक्त अपनी प्रार्थना करते हैं। यह एक धारणा है कि जो व्यक्ति प्रत्येक और हर अनुष्ठान का श्रद्धा और धार्मिक रूप से पालन करते हैं, और वे चंद्र दर्शन की पूर्व संध्या पर चंद्रमा भगवान की पूजा करते हैं, उन्हें भारी समृद्धि के साथ-साथ अनंत सौभाग्य भी प्राप्त होता है। दान देना एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान और चंद्र दर्शन महोत्सव का एक अभिन्न पहलू है। लोग आमतौर पर इस दिन ब्राह्मणों को चीनी, चावल और कपड़े दान करते हैं। इस दिन कई अनुष्ठान किए जाते हैं जैसे कि महिलाएं अपने पति के लंबे जीवन के लिए और साथ ही विवाहित जीवन से विभिन्न बाधाओं के उन्मूलन के लिए उपवास रखती हैं। चंद्र दर्शन का महत्व हिंदू धर्म में चंद्र दर्शन का महत्व प्राचीन पौराणिक कथाओं में निहित है। चंद्र, चंद्रमा देवता हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक माना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्र ऋषि अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया के पुत्र हैं। उन्हें मानव जीवन को प्रभावित करने वाले नौ खगोलीय पिंडों (नवग्रहों) में से एक माना जाता है। चंद्र सौंदर्य, शांति और शांति से जुड़ा है। उन्हें उर्वरता का स्वामी भी माना जाता है और उन जोड़ों द्वारा पूजा की जाती है जो एक बच्चे को गर्भ धारण करने की कोशिश कर रहे हैं। चंद्र मन और भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है और माना जाता है कि इसमें मानव मनोदशा को प्रभावित करने की शक्ति है।

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हिन्दू पौराणिक कथाओं के 5 बड़े खलनायक, जिनके कारण बदल गया इतिहास

हिन्दू धर्म में यूं तो कई ऐसा खलनायक हुए हैं जिनके कारण धरती त्रस्त रही है लेकिन हमने इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ाव के कुछ ऐसे खलनायक चुने हैं जिनकी चर्चा आज भी होती है। आओ जानते हैं ऐसे ही 5 खलनायकों के बारे में संक्षिप्त जानकारी। 1.हिरण्याक्ष : हिरण्याक्ष भयंकर दैत्य था। वह तीनों लोकों पर अपना अधिकार चाहता था। हिरण्याक्ष का दक्षिण भारत पर राज था। ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान वराहरूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया। आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। उन्होंने अपनी सेना को लेकर हिरण्याक्ष के क्षे‍त्र पर चढ़ाई कर दी और विंध्यगिरि के पाद प्रसूत जल समुद्र को पार कर उन्होंने हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। संगमनेर में महासंग्राम हुआ और अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी तथा हिरण्याक्षगण हैंगड़े नामों से कई स्थान हैं। उल्लेखनीय है कि सबसे पहले भगवान विष्णु ने नील वराह का अवतार लिया फिर आदि वराह बनकर हिरण्याक्ष का वध किया इसके बाद श्‍वेत वराह का अवतार नृसिंह अवतार के बाद लिया था। हिरण्याक्ष को मारने के बाद ही स्वायंभूव मनु को धरती का साम्राज्य मिला था। 2.महाबली : महाबली बाली अजर-अमर है। कहते हैं कि वो आज भी धरती पर रहकर देवताओं के विरुद्ध कार्य में लिप्त है। पहले उसका स्थान दक्षिण भारत के महाबलीपुरम में था लेकिन मान्यता अनुसार अब मरुभूमि अरब में है जिसे प्राचीनकाल में पाताल लोक कहा जाता था। अहिरावण भी वहीं रहता था। समुद्र मंथन में उसे घोड़ा प्राप्त हुआ था जबकि इंद्र को हाथी। उल्लेखनीय है कि अरब में घोड़ों की तादाद ज्यादा थी और भारत में हाथियों की।शिवभक्त असुरों के राजा बाली की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। वह मानता था कि देवताओं और विष्णु ने उसके साथ छल किया। हालांकि बाली विष्णु का भी भक्त था। भगवान विष्णु ने उसे अजर-अमर होने का वरदान दिया था। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बाली का जन्म हुआ। बाली जानता था कि मेरे पूर्वज विष्णु भक्त थे, लेकिन वह यह भी जानता था कि मेरे पूर्वजों को विष्णु ने ही मारा था इसलिए बाली के मन में देवताओं के प्रति द्वेष था। उसने शुक्राचार्य के सान्निध्य में रहकर स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को खदेड़ दिया था। वह ‍तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा था। बाली से भारत के एक नए इतिहास की शुरुआत होती है। 3.वृत्रासुर – यह सतयुग की बात है जब कालकेय नाम के एक राक्षस का संपूर्ण धरती पर आतंक था। वह वत्रासुर के अधीन रहता था। दोनों से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने मिलकर सोचा वृत्रासुर का वध करना अब जरूरी हो गया। इस वृत्तासुर के वध के लिए ही दधीचि ऋषि की हड्डियों से एक हथियार बनाया जिसका नाम वज्र था। वृत्रासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने आर्यों के नगरों पर कई बार आक्रमण करके उनकी नाक में दम कर रखा था। अंत में इन्द्र ने मोर्चा संभाला और उससे उनका घोर युद्ध हुआ जिसमें वृत्रासुर का वध हुआ। इन्द्र के इस वीरतापूर्ण कार्य के कारण चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी थी। शोधकर्ता मानते हैं कि वृत्रासुर का मूल नाम वृत्र ही था, जो संभवतः असीरिया का अधिपति था। पारसियों की अवेस्ता में भी उसका उल्लेख मिलता है। वृत्र ने आर्यों पर आक्रमण किया था तथा उन्हें पराजित करने के लिए उसने अद्विशूर नामक देवी की उपासना की थी। इन्द्र और वृत्रासुर के इस युद्ध का सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर गहरा असर पड़ा था। तभी तो होमर के इलियड के ट्राय-युद्ध और यूनान के जियॅस और अपोलो नामक देवताओं की कथाएं इससे मिलती-जुलती हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन विश्व पर इन्द्र-वृत्र युद्ध का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था। 4.रावण : रावण एक कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ ब्रह्म ज्ञानी तथा बहु-विद्याओं का जानकार था। उसे मायावी इसलिए कहा जाता था कि वह इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास एक ऐसा विमान था, जो अन्य किसी के पास नहीं था। इस सभी के कारण सभी उससे भयभीत रहते थे। एक मान्यता अनुसार असुरराज विष्णु के पार्षद जय और विजय ने ही रावण और कुंभकर्ण के रूप में फिर से जन्म लेकर धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। रावण ने रक्ष संस्कृति की नींव रखी थी। रावण ने कुबेर से लंका और उनका विमान छीना। रावण ने राम की सीता का हरण किया और अभिमानी रावण ने शिव का अपमान किया था। विद्वान होने के बावजूद रावण क्रूर, अभिमानी, दंभी और अत्याचारी था। हालांकि राम या रावण के काल में और भी बहुत सारे खलनायक थे लेकिन रावण उन सभी में अग्र था। 5. जरासंध : भगवान कृष्ण के मामा थे कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राज पद से हटाकर स्वयं राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। उसमें असुरों, दानवों और राक्षसों जैसी प्रवृत्ति थी। कंस अपने पूर्वजन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कंस का श्वसुर मगथ का सम्राट जरासंध था। महाभारत काल के सबसे बड़े खलनायक में से किसी एक को  तय करना मुश्किल है। कंस से बड़ा खलनायक जरासंध था। कंस तो भगवान श्रीकृष्ण को मारने के चक्कर में ही मारा गया। भगवान श्रीकृष्ण को सबसे ज्यादा यदि किसी ने परेशान किया तो वह था जरासंध। वह बृहद्रथ नाम के राजा का पुत्र था और जन्म के समय दो टुकड़ों में विभक्त था। जरा नाम की राक्षसी ने उसे जोड़ा था तभी उसका नाम जरासंध पड़ा। महाभारत युद्ध में जरासंध कौरवों के साथ था। जरासंध अत्यन्त क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त

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कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा

कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्तिमार्कंडेय पुराण के अनुसार पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गए। आज सूयर्देव का दिन है। इस दिन लोग सूर्य देव की उपासना करते हैं। सूर्य ही हैं जिनसे पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य को पूजने का यह प्रचलन आज से नहीं बल्कि वैदिक काल से चला आ रहा है। वेदों में भी सूर्य देव की आराधना की गई है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है। वैदिक काल ही क्यों आजकल भी कई लोग सूर्य को अर्ध्य देना नहीं भूलते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सूर्य देव की उत्पत्ति कैसे हुई थी, अगर नहीं, तो हम आपको इसका जवाब अपने आर्टिकल में दे रहे हैं। हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर हिंदू धर्म में सूर्य को देवता माना गया हैं और इनकी पूजा अर्चना भी की जाती हैं। पृथ्वी के दो साक्षात देवता हैं सूर्य और चंद्रमा। ये दोनों देव ही प्रत्यक्ष हैं और उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं वेदों के मुताबिक सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया हैं इस पृथ्वी पर जीवन सूर्य से ही हैं हिंदू धर्म में सूर्य को जल का अर्घ्य दिया जाता हैं। हिंदू धर्म पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति, प्रभाव, स्तुति, मंत्र आदि के बारे में बताया गया हैं नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद मिलता हैं तो आज हम आपको अपने इस लेख में सूर्य देव की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक कथा बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं। हिंदू धर्म के मार्कंडेय पुराण के मुताबिक सारा जगत पहले प्रकाश रहित था। उस वक्त कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के मुंह से सबसे पहला शब्द जो निकला वो था ॐ, यह सूर्य का तेज रूप सूक्ष्म रूप था। इसके बाद ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए। यह चारों ॐ के तेज में एकाकार हो गए। यह विश्व का अविनाशी कारण हैं सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार का कारण हैं ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की जिससे सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को धारण किया। वही सृष्टि की रचना की गई तब ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र ​ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। सूर्य को प्रसन्न करने के लिए अदिति ने घोर तप किया। फिर सुषुम्ना नाम की किरण ने अदिति के गर्भ में प्रवेश किया। इस अवस्था में भी अदिति ने चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन किया। इस ऋषि राज कश्यप क्रोधित हो गए। उन्होंने अदिति से कहा कि तुम इस तरह व्रत रख कर गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा रही हो। इस तरह तुम शिशु को क्यों करना चा​हती हो। वही जब देवी अदिति ने यह सुना तो अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। फिर सूर्य देव शिशु रूप में अदिति के गर्भ में प्रगट हुए। अदिति को मारिचम अन्डम कहा जाता था। इसके चलते ही इस बालक का नाम मार्तंड पड़ा। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया हैं।

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