भगवान शिव ने पार्वती जी की मगरमच्छ बनकर क्यों ली परीक्षा, पढ़ें ये पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में सोमवार के दिन का बेहद महत्व माना जाता है. सोमवार का दिन भगवान भोलेनाथ (Lord Shiva) को समर्पित होता है. जो भी व्यक्ति सोमवार के दिन विधि-विधान से शिवजी का पूजन और आराधना करता है. उसके जीवन के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं. इसके साथ ही जीवन में सुख एवं समृद्धि का वास हो जाता है. भगवान भोलेनाथ को बेहद जल्दी प्रसन्न होने वाला देवता भी माना जाता है. भोलेनाथ का विवाह पार्वती जी के साथ हुआ था. इसके लिए पार्वती जी ने सैंकड़ों वर्षों तक कठिन तप किया था. तप के बाद एक वक्त ऐसा भी आया था जब पार्वती जी को भगवान शिव की परीक्षा का सामना करना पड़ा था. आइए जानते हैं ये पौराणिक कथा.. शिव जी ने ली इस तरह परीक्षा पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए सैकड़ों वर्षों तक कठोर तप किया था. उनकी तपस्या को देखकर देवताओं ने शिवजी से देवी पार्वती की मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना की थी. इसके बाद भोलेनाथ ने सप्तर्षियों को पार्वती जी की परीक्षा लेने के लिए भेजा. इस परीक्षा के दौरान सप्तर्षियों ने शिवजी के ढेरों अवगुणों को बताते हुए माता पार्वती से शिव जी से विवाह न करने का कहा लेकिन पार्वती जी अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुईं.इस पर खुद भोलेनाथ ने माता पार्वती की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. माता पार्वती के तप से प्रसन्न होकर शंकर जी उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. कुछ क्षणों बाद ही एक मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया और लड़का मदद के लिए पुकारने लगा. बच्चे की आवाज सुनकर पार्वती जी नदी किनारे पहुंची और उनका मन द्रवित हो गया. इस बीच लड़के ने माता पार्वती को देखकर कहा कि मेरी न मां है न बाप, न कोई मित्र ही है..माता आप ही मेरी रक्षा करें. इस पर पार्वती जी ने मगरमच्छ से कहा कि ग्राह इस लड़के को छोड़ दें. इस पर मगरमच्छ ने कहा कि दिन के छठे पहर जो मुझे मिलता है उसे आहार बनाना मेरा नियम है. पार्वती जी के विनती करने पर मगरमच्छ ने लड़के को छोड़ने के बदले में पार्वती जी के तप से प्राप्त वरदान का पुण्य फल मांग लिया. इस पर पार्वती जी तैयार हो गईं. मगरमच्छ ने बालक को छोड़ दिया और तेजस्वी बन गया. अपने तप का फल दान करने के बाद पार्वती जी ने बालक को बचा लिया और एक बार फिर भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तप करने बैठ गईं. इस पर भोलेनाथ दोबारा प्रकट हुए और पूछा कि तुम अब क्यों तप कर रही हो, मैंने तम्हें पहले ही मनमांगा दान दे दिया है. इस पर पार्वती जी ने अपने तप का फल दान करने की बात कही. इस पर शिवजी प्रसन्न होकर बोले मगरमच्छ और लड़के दोनों के स्वरूप में मैं ही था. मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था कि तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख दुख का अनुभव करता है या नहीं. तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही मैंने ये लीला रचाई थी. अनेको रूप में दिखने वाला मैं ही एक सत्य हूं. अनेक शरीरों में नजर आने वाला मैं निर्विकार हूं. इस तरह पार्वती जी शिव जी की परीक्षा में उत्तीर्ण हुई और उनकी अर्धांगिनी बनी पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! तप तो मैं पुन: कर सकती हूं, किंतु यदि तुम इस लड़के को निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल जाता ? देखते ही देखते वह लड़का अदृश्य हो गया। मगरमच्छ लुप्त हो गया। पार्वती जी ने विचार किया- मैंने तप तो दान कर दिया है। अब पुन: तप आरंभ करती हूं। पार्वती ने फिर से तप करने का संकल्प लिया। भगवान सदाशिव फिर से प्रकट होकर बोले- पार्वती, भला अब क्यों तप कर रही हो? पार्वती जी ने कहा- प्रभु ! मैंने अपने तप का फल दान कर दिया है। आपको पतिरूप में पाने के संकल्प के लिए मैं फिर से वैसा ही घोर तप कर आपको प्रसन्न करुंगी। महादेव बोले- मगरमच्छ और लड़के दोनों रूपों में मैं ही था। तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख-दुख का अनुभव करता है या नहीं, इसकी परीक्षा लेने को मैंने यह लीला रची। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही एक हूं। मैं अनेक शरीरों में, शरीरों से अलग निर्विकार हूं। तुमने अपना तप मुझे ही दिया है इसलिए अब और तप करने की जरूरत नहीं…. देवी ने महादेव को प्रणाम कर प्रसन्न मन से विदा किया।

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भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को क्यों दिया था श्राप पढ़ें यह पौराणिक कथा

लक्ष्मी माता का दिन माता लक्ष्मी  की पूजा के लिए समर्पित है. आज लोग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के उपाय करते हैं. जिन पर माता लक्ष्मी की कृपा हो जाती है, वह धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है. हर कोई उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेना चाहता है. कोई नहीं चाहता कि माता लक्ष्मी उससे नाराज हो जाएं. हालांकि एक बार भगवान विष्णु  माता लक्ष्मी से नाराज हो गए थे और उनको श्राप दे दिया था. आखिर ऐसा क्यों हुआ? पढ़ें यह पौराणिक कथा. पौराणिक कथाओं में जिक्र मिलता है कि एक बार श्री हर‍ि धरती पर भ्रमण के लिए जा रहे थे। तभी देवी लक्ष्‍मी ने उनके साथ चलने की अनुमति मांगी। कई बार कहने पर भगवान विष्‍णु ने कहा कि वह साथ चल सकती हैं लेकिन उन्‍हें एक शर्त माननी होगी। उन्‍होंने कहा कि धरती पर कैसी भी स्थिति आए लेकिन उन्‍हें उत्‍तर द‍िशा की ओर नहीं देखना है। देवी लक्ष्‍मी भी भगवान की शर्त मान लेती हैं और साथ चल देती हैं। इस तरह खुद को रोक न सके भगवान और रो पड़े कथा मिलती है कि जब श्री विष्‍णु और माता लक्ष्‍मी पर भ्रमण कर रहे थे। तभी देवी की नजर उत्‍तर द‍िशा की ओर पड़ी। उस ओर इतनी हरियाली थी कि वह खुद को रोक न सकीं और सामने द‍िख रहे बगीचे में चली गईं। इसके बाद उन्‍होंने उस बाग से एक पुष्‍प तोड़ लिया और भगवान विष्‍णु के पास वापस आईं। उन्‍हें देखते ही श्री हरि रो पड़े। तभी माता लक्ष्‍मी को उनकी शर्त याद आई। तब भगवान विष्‍णु ने कहा कि बिना किसी से पूछे उसकी किसी भी वस्‍तु को छूना अपराध है। जब माता लक्ष्मी को मिला श्राप एक समय की बात है माता लक्ष्मी एक सुंदर अश्व को देखने में इतनी ध्यानमग्न थीं, कि उन्होंने भगवान विष्णु की बातों पर ध्यान नहीं दिया. इससे क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने उनको पृथ्वी लोक पर अश्वी बनने का श्राप दे दिया. इससे माता लक्ष्मी दुखी हो गईं, तो भगवान विष्णु ने कहा कि आपको कुछ समय के लिए अश्व की योनी में रहना होगा. फिर आपको एक पुत्र होगा. उसके बाद ही उस योनी से मुक्ति मिलेगी जब समय आया तो माता लक्ष्मी पृथ्वी पर अश्व की योनी में जीवन व्यतीत करने लगीं. उन्होंने काफी समय तक भगवान शिव की आराधना की. अपने तप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न किया. भगवान शिव ने कहा कि आपके पति भगवान विष्णु इस पूरे संसार के पालनहार हैं. एक स्त्री का पति ही उसका भगवान होता है. आपको केवल भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए. इस पर माता लक्ष्मी ने कहा कि आप में और श्रीहरि में कोई भेद नहीं हैं. बस दोनों का स्वरूप अलग अलग है. आप यह दुख दूर कीजिए ताकि वह अश्व की योनी से मुक्त हों. इस पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको आशीष दिया और भगवान विष्णु को पृथ्वी लोक पर जाने के बारे में अवगत कराने का वचन दिया. कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अश्व रुप में अवतार लिया और माता लक्ष्मी के साथ अश्व योनी में समय व्यतीत किया. माता लक्ष्मी ने कुछ समय बाद एकवीर नामक पुत्र को जन्म दिया. उसके फलस्वरूप माता लक्ष्मी श्राप से मुक्त होकर वैकुंठ धाम चली गईं. एकवीर से हैहय वंश की उत्पत्ति हुई

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दीपावली पर प्रचलित है लक्ष्मी जी की यह पौराणिक कथा

हमारी लोक संस्कृति में दीपावली त्योहार और माता लक्ष्मी की बड़ी सौंधी सी कथा प्रचलित है। एक बार कार्तिक मास की अमावस को लक्ष्मीजी भ्रमण पर निकलीं। चारों ओर अंधकार व्याप्त था। वे रास्ता भूल गईं। उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि वे मृत्युलोक में गुजार लेंगी और सूर्योदय के पश्चात बैकुंठधाम लौट जाएंगी, किंतु उन्होंने पाया कि सभी लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद कर सो रहे हैं।  तभी अंधकार के उस साम्राज्य में उन्हें एक द्वार खुला दिखा जिसमें एक दीपक की लौ टिमटिमा रही थी। वे उस प्रकाश की ओर चल दीं। वहां उन्होंने एक वृद्ध महिला को चरखा चलाते देखा। रात्रि विश्राम की अनुमति मांग कर वे उस बुढ़िया की कुटिया में रुकीं।  वृ्द्ध महिला लक्ष्मीदेवी को बिस्तर प्रदान कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गई। चरखा चलाते-चलाते वृ्‍द्धा की आंख लग गई। दूसरे दिन उठने पर उसने पाया कि अतिथि महिला जा चुकी है किंतु कुटिया के स्थान पर महल खड़ा था। चारों ओर धन-धान्य, रत्न-जेवरात बिखरे हुए थे। कथा की फलश्रुति यह है कि मां लक्ष्मीदेवी जैसी उस वृद्धा पर प्रसन्न हुईं वैसी सब पर हों। और तभी से कार्तिक अमावस की रात को दीप जलाने की प्रथा चल पड़ी। लोग द्वार खोलकर लक्ष्मीदेवी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। किंतु मानव समाज यह तथ्य नहीं समझ सका कि मात्र दीप जलाने और द्वार खोलने से महालक्ष्मी घर में प्रवेश नहीं करेंगी। बल्कि सारी रात परिश्रम करने वाली वृद्धा की तरह कर्म करने पर और अंधेरी राहों पर भटक जाने वाले पथिकों के लिए दीपकों का प्रकाश फैलाने पर घरों में लक्ष्मी विश्राम करेंगी। ध्यान दिया जाए कि वे विश्राम करेंगी, निवास नहीं। क्योंकि लक्ष्मी का दूसरा नाम ही चंचला है। अर्थात् अस्थिर रहना उनकी प्रकृति है। इस दीपोत्सव पर कामना करें कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे। हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है।  ।। न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामति: भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्।। अर्थात् लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती। वे सत्कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं।

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भगवान श्रीहरि विष्णु के दशावतार की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथाएं

भगवान श्रीहरि विष्‍णु ने धर्म की रक्षा हेतु हर काल में अवतार लिया। वैसे तो भगवान विष्णु के अनेक अवतार हुए हैं लेकिन उनमें 10 अवतार ऐसे हैं, जो प्रमुख रूप से स्थान पाते हैं। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं भगवान श्रीहरि विष्णु के 10 अवतार यानी दशावतार की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथाएं मत्स्य अवतार पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई।  राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा। उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है। कूर्म अवतार धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इन्द्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इन्द्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इन्द्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए। समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया। किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ। 3. वराह अवतार धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी कथा इस प्रकार है- पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। 4. भगवान नृसिंह भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। 5. वामन अवतार सत्ययुग में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था तब भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया। लेकिन

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सीताजी के जन्म से जुड़ी रोचक पौराणिक कथा जाने

वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम वल्लभा देवी सीता का प्राकट्य पर्व मनाया जाता है। इसलिए इस तिथि को जानकी नवमी और सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम वल्लभा देवी सीता का प्राकट्य पर्व मनाया जाता है। इसलिए इस तिथि को जानकी नवमी और सीता नवमी के नाम से जाना जाता है। मां लक्ष्मी का अवतार माता सीता भूमि रूप हैं,भूमि से उत्पन्न होने के कारण उन्हें भूमात्मजा और राजा जनक की पुत्री होने से उन्हें जानकी भी कहा जाता है। श्री रामजी की प्राणप्रिया सीताजी के जन्म के बारे में रामायण और अन्य पौराणिक ग्रंथों दो कथाएं सर्वाधिक प्रचलित हैं। राजा जनक की पुत्री सीता मान्यता है कि एक बार मिथिला में भयंकर अकाल पड़ा उस समय मिथिला के राजा जनक थे। वह बहुत ही ज्ञानी एवं पुण्यात्मा थे। प्रजा के हित में धर्म कर्म के कार्यों में बढ़ चढ़कर रूचि लेते। एक बार मिथिला में भयंकर अकाल पड़ा। ऋषि-मुनियों ने सुझाव दिया कि यदि राजा जनक स्वयं हल चलाकर भूमि जोते तो देवराज इंद्र की कृपा से यह अकाल दूर हो सकता है। प्रजा के हित में राजा ने खुद हल चलाने का निर्णंय लिया। हल चलाते-चलाते एक जगह आकर हल अटक गया,राजा ने देखा कि एक सुंदर स्वर्ण कलश है जिसमें हल की नोक अटकी हुई है। कलश को बाहर निकाला तो उसमें एक अति सुन्दर दिव्य ज्योति लिए नवजात कन्या है। धरती मां के आशीर्वाद स्वरूप राजा जनक ने इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। चूंकि हल की नोक को सीत कहा जाता है इसलिए राजा जनक ने इस कन्या का नाम सीता रखा। जहां पर उन्होंने हल चलाया वह स्थान वर्तमान में बिहार के सीतामढी के पुनौरा राम गांव को बताया जाता है। रावण और मंदोदरी की पुत्री सीता अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि ‘रावण कहता है कि जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूं तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने।’ अद्भुत रामायण की कथा के अनुसार गृत्स्मद नामक ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था। एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया था तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहां मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया। यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया। रावण ने कहा कि यह अति तीक्ष्ण विष हैं इसे संभालकर रख दो। मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी और मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया। इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी। जबकि उस वक्त रावण विहार करने सह्याद्रि पर्वत पर गया था। ऐसे में मंदोदरी ने सोचा कि जब मेरे पति मेरे पास नहीं है। ऐसे में जब उन्हें इस बात का पता चलेगा। तो वह क्या सोचेंगे। यही सब सोचते हुए मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र चली ग ई। कहा जाता है कि वहीं पर उसने गर्भ को निकालकर एक घड़े में रखकर भूमि में दफन कर दिया और सरस्वती नदी में स्नान कर वह वापस लंका लौट गई। मान्यता है कि वही घड़ा हल चलाते वक्त मिथिला के राजा जनक को मिला था,जिसमें से सीताजी प्रकट हुईं थी।

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महाकालेश्वर की ये अद्भुत पौराणिक कथाएं, आज भी है लोगों से अनजान

उज्जैनी में चंद्रसेन  नाम का राजा राज किया करता था।वह भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। शिवगणों में मणिभद्र नामक गण उसका मित्र था। एक बार मणिभद्र ने राजा चंद्रसेन को बहुत ही अद्भुत चिंतामणि प्रदान की। चंद्रसेन ने उसे अपने गले में पहन लिया  पहनने के बाद प्रभामंडल तो जगमगा  उठा साथ ही दूर देशों में उसकी यश कीर्ति बढ़ने लगी। उस मनी को प्राप्त करने की आशा दूसरे देशों के राजा भी रखते थे। इसलिए उस मनी को प्राप्त करने के लिए इन राजाओं ने प्रयास करना शुरू कर दिया।कुछ राजाओं ने उस मणि को प्राप्त करने की मांग करी  तो कुछ ने विनती की।लेकिन वो राजा की अत्यंत प्रिय वस्तु थी, इसलिए राजा ने वह मनी किसी को भी देना जरूरी नहीं समझा। अंत में उन पर मणि आकांक्षी राजा ने आक्रमण कर दिया। इसी कारण से चंद्रसेन भगवान महाकाल के चरणों में जाकर ध्यान मग्न हो गए। जब चंद्रसेन ध्यान मग्न था उस समय एक गोपी अपने छोटे बालक के साथ दर्शन हेतु मंदिर में आई। बालक की उम्र मात्र 5 वर्ष थी और  गोपी विधवा थी। जब बालक ने चंद्रसेन को ध्यान मंत्र करते देखा तो वह भी पूजा हेतु प्रेरित हुआ। वह बालक भी अपने घर में एक छोटे से स्थान में जाकर बैठ गया और भक्ति भाव से शिवलिंग की पूजा करने लगा। थोड़ी समय पूर्व उसकी माता ने उसे भोजन के लिए बुलाया, लेकिन बालक वहां नहीं गया। फिर उसकी माता ने उसे बुलाया, लेकिन वह फिर से नहीं गया। जब माता स्वयं चलकर आई तो उसने देखा कि बालक ध्यान मग्न होकर भगवान शिव की पूजा कर रहा है। से कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा। तब क्रोध में आकर माता ने अपने पुत्र को पीटना शुरू कर दिया और पूजा की सारी सामग्री उठा कर फेंक दी।ध्यान से मुक्त होकर जब बालक चेतना में आया तो उसने देखा कि उसकी पूजा  की सारी सामग्री नष्ट हो चुकी है। फिर अचानक से उसकी व्यथा में चमत्कार हुआ। भगवान शिव की दया दृष्टि से वहां पर एक सुंदर सा मंदिर निर्मित हो गया था। मंदिर के बीचो बीच एक दिव्य शिवलिंग विराजमान था एवं बालक द्वारा सज्जित पूजा सामग्री भी थी। यह सब दृष्टि देखते ही उसकी माता भी आश्चर्यचकित हो उठी। राजा चंद्रसेन को जब इस घटना की जानकारी मिली तो वह भी इस शिवभक्त बालक से मिलने की इच्छा जागृत करने लगे। अन्य राजा जो इस मणि के लिए युद्ध पर उतारू थे, वह भी उस बालक को देखने पहुंचे। सभी राजाओं ने मिलकर चंद्रसेन राजा से क्ष मा मांगी और सब मिलकर महाकाल की पूजा अर्चना करने लगे। तभी वहँ पर राम भक्त श्री हनुमान जी अवतरित हुए और उन्होंने बालक को गोद में उठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जनसमुदाय  को संबोधित करना शुरू किया। ऋते शिवं नान्यतमा गतिरस्ति शरीरिणाम्॥एवं गोप सुतो दिष्टया शिवपूजां विलोक्य च॥ अमन्त्रेणापि सम्पूज्य शिवं शिवम् वाप्तवान्।एष भक्तवरः शम्भोर्गोपानां कीर्तिवर्द्धनः इह भुक्तवा खिलान् भोगानन्ते मोक्षमवाप्स्यति॥अस्य वंशेऽष्टमभावी नंदो नाम महायशाः।प्राप्स्यते तस्यस पुत्रत्वं कृष्णो नारायणः स्वयम्॥ अर्थात भगवान शिव के अतिरिक्त प्राणियों की कोई गति नहीं होती । इस बालक ने बिना किसी मंत्र  अथवा विधि- विधान के शिव पूजा करी और मंगल को प्राप्त किया है।यह शिव का परम भक्त समस्त समाज की कृति बढ़ाने वाला है। इस लोक में यह अत्यंत सुख को प्राप्त करने वाला होगा। इसी के वंश का आठवां पुरुष महायशस्वी ‘नंद’ होगा जिसके पुत्र के रूप में स्वयं नारायण ‘कृष्ण’ नाम से प्रतिष्ठित होंगे। लोग कहते हैं कि भगवान शिव तभी से उज्जयिनी में स्वयं विराजमान है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में महाकाल यानी शिव भगवान जी की असीम महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है।

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भगवान ब्रह्मा द्वारा बनाई गई इस सृष्टि की अद्भुत पौराणिक कथा

हिंदू धर्म के कुछ संप्रदाय पूरी सृष्टि और उसकी ब्रह्मांडीय गतिविधि को तीन देवताओं के प्रतीक के रूप में देखते हैं, जो हिंदू त्रिमूर्ति का गठन करते हैं: ब्रह्मा – निर्माता, विष्णु – पालनकर्ता, और शिव– संहारक पौराणिक कथाओं के अनुसार संपूर्ण विश्व के निर्माण से पूर्व, दूध का केवल एक सफेद समुद्र मौजूद था, जिसे क्षीरसागर कहा जाता है। क्षीरसागर पर तैरता एक कमल का फूल था, जिसकी फीकी गुलाबी पंखुड़ियों के भीतर सो रहे थे विश्व के निर्माता, भगवान ब्रह्मा। जब भगवान ब्रह्मा सो रहे थे, तब कुछ भी नहीं था। न पृथ्वी और न आकाश, न प्रकाश या अंधकार, न अच्छा या बुरा, न मनुष्य या पशु। ब्रह्मांड बिल्कुल मौजूद नहीं था। शांत, खामोश, क्षीरसागर के अलावा कुछ भी नहीं था। इस ब्रह्मांड में जीवन तभी शुरू हुआ जब भगवान ब्रह्मा जाग गए।दस हजार साल बीत गए, एक अनंत काल बीत गया, लेकिन जब अचानक क्षीरसागर की शांत सतह कांपने लगी, तब भगवान ब्रह्मा ने अपनी आँखें खोली थीं। जब उन्होंने अपने चारों ओर देखा और कुछ नहीं पाया, उन्हें काफी खाली और अकेलापन महसूस हुआ। उनकी आँखों में बड़े-बड़े आँसू छलक पड़े। जब वे आँसू क्षीरसागर में गिरे तो उन्होंने पृथ्वी का रूप लिया और जिन आंसुओं को ब्रह्मा जी ने पौंछ दिया, वे वायु और आकाश बन गए। फिर वे खड़े हुए और स्वयं को तब तक खिंचा जब तक उनका शरीर ब्रह्मांड नहीं बन गया। वह बाईं ओर फैले और आकाश में सूर्य, चंद्रमा और सभी सितारों का निर्माण किया। उन्होंने इधर और उधर स्वयं को फैलाया और शुष्क मौसम और तूफानी मौसम, आग, हवा और बारिश का निर्माण किया। और फिर उन्होंने देवताओं को बनाया। सबसे पहले उन्होंने प्रकाश के देवता की रचना की। वे सुंदरता और अच्छाई से सुसज्जित थे, और उनके दोस्त देवदूत, संत, परी और अप्सरा थे।फिर उन्होंने असुरों, अंधकार के देवता, की रचना की। उनके दोस्त भूत, दानव और नाग थे। और इसलिए उन्होंने मित्र और शत्रु दोनों बनाए, क्योंकि देवता और असुर शत्रु होने के लिए बनाए गए थे। साथ ही उन्होंने बताया कि क्षीरसागर में अमृत नाम का एक चमत्कारी पदार्थ मौजूद है, जो भी उसे ग्रहण करता है, वह हमेशा के लिए अमर हो जाएगा। देव और असुर दोनों अमृत चाहते थे, लेकिन वे इसे समुद्र मंथन करके और मक्खन में बदलकर ही प्राप्त कर सकते थे। लेकिन उन्हें ऐसा मंथन कहां मिलेगा जो कार्य के लिए पर्याप्त शक्तिशाली हो? तभी असुर और देव मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने के लिए मंथन और शक्तिशाली रस्सी की खोज करने लगे। देवों ने एक दिशा में खोज की और मंदरा नामक पर्वत को पाया, जो समुद्र से बाहर निकल रहा था। उन्होंने पर्वत को मंथन के लिए उपयोग करने का विचार किया और असुरों को सहायता करने के लिए बुलाया। हालांकि पर्वत इतना विशाल था कि कई देव और असुर थक गए और कई की जान भी चली गई। इस दृश्य को देख विष्णु भगवान ने सहायता करने का विचार किया। और क्षीरसागर के बीच पर्वत को रखा। वहीं मंथन की रस्सी के रूप में उन्होंने वासुकी (सबसे विशाल नाग) का उपयोग किया। असुरों ने सर्प का सिर, देवों ने पुंछ को पकड़ा और मंथन करना आरंभ किया। कई वर्षों के बाद मंथन से सबसे पहले एक भयंकर विष निकला, इस विष में संपूर्ण विश्व को समाप्त करने की शक्ति मौजूद थी। इसलिए भगवान शिव द्वारा उस विष का सेवन कर लिया गया और देवी पार्वती ने उस विष को भगवान शिव के कंठ में रोक दिया। इसके बाद अन्य कई वर्षों की कठोर मंथन के बाद क्षीरसागर से कई अद्भुत चीजें निकली, जिन्हें देवों और असुरों ने समान रूप से बिना लड़े बाँट दिया। लेकिन जैसे ही अमृत निकला, दोनों पक्षों में तीखी नोकझोंक होने लगी। तभी एक राक्षस ने देवदूत से प्याला छीन लिया, तुरंत अमृत की कुछ बूंदों को अपने मुंह में डाल दिया। हालांकि ब्रह्मा असुरों को अमर होने नहीं देना चाहते थे, तो इसलिए भगवान विष्णु ने तुरंत ही उनका गला काट दिया। वह राक्षस राहू था, और तब राहू की गर्दन से ऊपर का भाग चंद्रमा और सूर्य के चारों ओर पीछा करता रहता है, और कभी-कभी वह एक को निगल जाता था और पृथ्वी को अंधेरे में डुबो देता था। राहू का केवल गर्दन से ऊपर का हिस्सा अमर हो पाया था। और इसलिए दुनिया बनाई गई; अच्छाई और बुराई, प्रकाश और अंधकार, देवों और असुरों के बीच युद्ध शुरू हो गया था। इसलिए यह तब तक चलता रहेगा जब तक कि भगवान ब्रह्मा थक नहीं जाएंगे और एक बार फिर अपनी आँखें बंद नहीं कर लेते हैं। तब ब्रह्मांड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, सिवाय क्षीरसागर, एक कमल के फूल, और गहरी नींद में सृष्टि के भगवान के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

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बाल ब्रह्मचारी होने के बाद भी हनुमान जी को क्यों करने पड़े 3 विवाह पढ़ें पूरी कथा

ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी का विवाह नहीं हुआ था और वे बाल ब्रह्मचारी थे लेकिन ऐसा नहीं है. कुछ शास्त्रों में हनुमान जी के विवाहित होने की बात कही गई है. श्रीराम भक्त हनुमान जी के देश और दुनिया में करोड़ों भक्त हैं. लोगों की बजरंगबली में बड़ी श्रद्धा है. कहते हैं हनुमान जी का नाम लेने भर से मन का ख़ौफ़ ख़त्म हो जाता है. आपने पहलवानों को भी बजरंगबली की पूजा करते देखा होगा. ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी जीवन भर ब्रह्म्चर्य का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम की सेवा करते रहे. हिन्दू धर्मशास्त्रों में पवनसुत हनुमान को राम भक्त के रूप में जाना और पूजा जाता है. ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी जीवन भर ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम की सेवा करते रहे. लेकिन वहीं कुछ पौराणिक शास्त्रों में हनुमान जी के विवाहित होने की बात कही गई है. यहां तक की आंध्रप्रदेश में हनुमान जी का एक ऐसा मंदिर है जहां पर हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी की भी मूर्ति स्थापित की गई है. आंध्रप्रदेश का यह मंदिर हनुमान जी के विवाह के गवाह का एकमात्र मंदिर माना जाता है. आइए जानते हैं हनुमान जी के तीन विवाह के बारे में  सूर्य की पुत्री सुवर्चला के साथ विवाह  सूर्य की पुत्री सुवर्चला और हनुमान जी के विवाह का उल्लेख पराशर संहिता में मिलता है. पराशर संहिता में उल्लेख किया गया है कि हनुमान जी सूर्य देवता के शिष्य थे. सूर्य देवता हनुमान जी को नौ विद्याओं का ज्ञान देना चाहते थे. इन  नौ विद्याओं में से पांच विद्याएं तो हनुमान जी ने सीख लीं लेकिन बाकी विद्याओं को सीखने के लिए विवाहित होना अनिवार्य था. इसी अनिवार्यता की वजह से सूर्य देवता ने अपनी पुत्री का विवाह हनुमान जी के साथ कर दिया. हनुमान जी से विवाह होने के बाद सुवर्चला सदा के लिए तपस्या में लीन हो गईं. रावण की दुहिता अनंगकुसुमा के साथ विवाह हनुमान जी के दूसरे विवाह का उल्लेख पउम चरित से प्राप्त होता है. पउम चरित के अनुसार रावण और वरुण देव के बीच हुए युद्ध में हनुमान जी वरुण देव की तरफ से रावण से युद्ध किया था जिसके परिणामस्वरूप इस युद्ध में रावण की हार हुई थी. युद्ध में हारने के बाद रावण ने अपनी दुहिता अनंगकुसुमा का विवाह हनुमान जी से कर दिया था.  वरुणदेवकीपुत्रीसत्यवतीसेविवाह  जब वरुण देव और रावण के बीच युद्ध हो रहा था तब हनुमान जी वरुण देव की तरफ से लड़ते हुए वरुण देव को विजय दिलाई थी. वरुण देव ने इस विजय से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह हनुमान जी से कर दिया था. विवाह के बाद भी आजीवन ब्रह्मचारी रहे हनुमान जी: हनुमान जी ने भले ही विशेष परिस्थितियों के तहत ये तीनों विवाह किए थे लेकिन उन्होंनें कभी भी अपनी पत्नियों के साथ वैवाहिक जीवन व्यतीत नहीं किया और वे आजीवन ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते रहे. ये सब बातें विभिन्न शास्त्रों के अनुसार बताई गई हैं हालांकि ये बात जगजाहिर है कि परमभक्त हनुमान ने वैवाहिक जीवन व्यतीत नहीं किया और वे आजीवन बह्मचारी रहे.

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पवनपुत्र हनुमान बचपन में बेहद नटखट थे जानें उनसे जुड़ी रोचक बातें

हनुमान बाल्यकाल से ही बहुत चंचल स्वभाव के थे जनता से रिश्ता वेबडेस्क।त्रेता युग में जब श्रीराम ने अयोध्या में अवतार लिया तो उनकी सेवा करने के लिए भगवान शंकर ने भी अपने अंश से वायु के द्वारा कपिराज केसरी की पत्नी अंजना माता के यहां वानर रूप में अवतार लिया. यह छोटा सा बालक बाल्यकाल से ही बहुत चंचल स्वभाव का था. इसके चलते उन्‍हें ऋषियों ने श्राप तक दे दिया था. ऋषियों ने दिया था हनुमान जी को श्राप ऋषियों के आश्रम में लगे बड़े-बड़े पेड़ों को हनुमान जी अक्‍सर अपनी सशक्त भुजाओं से चपलता में तोड़ देते थे, तो कभी आश्रम के सामान को अस्त व्यस्त कर देते थे. जिसके कारण ऋषियों को हवन पूजन और अध्ययन अध्यापन में व्यवधान होता था. इससे ऋषियों ने नाराज होकर उन्हें श्राप दिया कि आज से तुम अपना बल भूले रहोगे और जब कोई तुम्हें स्मरण कराएगा तभी तुम्हें अपने बल का भान होगा. बस इस घटना के बाद से वे सामान्य वानरों की भांति रहने लगे. इंद्र के प्रहार से टेढ़ी हो गई थी ठोड़ी केसरी नंदन के हनुमान नाम पड़ने की कथा भी एक घटना से जुड़ी है. जन्म के कुछ समय बाद ही उन्‍होंने सूर्य को लाल फल समझा और उसे पाने के लिए वे आकाश की ओर दौड़ पड़े. संयोग से उस दिन सूर्य ग्रहण था और राहु ने उन्हें देखा तो समझा कि सूर्य को कोई और पकड़ने आ रहा है तो राहु खुद ही उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ा. किंतु जैसे ही वायुपुत्र केसरी नंदन उसकी ओर पूरे वेग से बढ़े तो भयभीत हो कर राहु भाग गया और सीधे इन्द्रदेव से गुहार लगाई. इंद्रदेव का ऐरावत निगलने वाले थे हनुमान जब इन्द्रदेव सफेद ऐरावत पर सवार होकर देखने निकले कि मामला क्या है. तब अंजनी पुत्र ने ऐरावत हाथी को बड़ा सा सफेद फल समझा और सूर्य को छोड़कर उसे ही खाने की लिए लपक पड़े. इन्द्र ने घबराकर अपने वज्र से प्रहार किया जो पवन पुत्र की ठोड़ी (हनु) पर लगा. इससे पवनपुत्र की ठोड़ी टेढ़ी हो गई. वे बज्र के प्रहार से मूर्छित हो कर गिर पड़े, पुत्र को मूर्छित देख वायुदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी गति ही बंद कर ली. श्वास रुकने से सभी जीव जंतु और देवता भी व्याकुल हो गए. अंत में सभी देवताओं ने उस बालक को अग्नि जल व वायु आदि से अभय होकर अमर होने का वरदान दिया. इसके बाद ही वायुदेव प्रसन्न हुए और अपनी गति शुरू की. इस घटना के बाद से ही उस बालक का नाम हनुमान पड़ गया. माता के आदेश पर सूर्य से प्राप्त किया ज्ञान हनुमान जी ने मां के आदेश पर भगवान सूर्यनारायण के पास जाकर वेद वेदांग आदि सभी शास्त्रों और कलाओं का अध्ययन किया. सभी प्रकार के ज्ञान और कलाओं में निपुण होने के बाद वे किष्किंधा पर्वत पर सुग्रीव के साथ रहने लगे. सुग्रीव ने इनकी योग्यता और कुशलता को परख कर अपना सचिव बना लिया. वे सुग्रीव के सबसे प्रिय हो गए. जब बालि ने अपने ही छोटे भाई सुग्रीव को मार कर घर से निकाल दिया तब भी हनुमान जी ने सुग्रीव का साथ दिया और उनके साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगे.

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जानकी या सीता नवमी

महत्वपूर्ण जानकारी जानकी या सीता नवमी 2023 शनिवार, 29 अप्रैल 2023 नवमी तिथि शुरू – 28 अप्रैल 2023 अपराह्न 04:01 बजे नवमी तिथि समाप्त – 29 अप्रैल 2023 को शाम 06:22 बज सीता नवमी हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन को देवी सीता की जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं सीता नवमी के दिन व्रत रखती हैं और अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। सीता नवमी को सीता जयंती और जानकी नवमी भी कहा जाता है। सीता जयंती वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि मंगलवार के दिन पुष्य नक्षत्र में माता सीता का जन्म हुआ था। देवी सीता का विवाह भगवान राम से हुआ था। भगवान राम का जन्म भी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के दौरान नवमी तिथि को हुआ था। हिंदू कैलेंडर में सीता जन्मदिवस रामनवमी के एक महीने के बाद आती है। देवी सीता, मिथिला के राजा जनक की दत्तक पुत्री थीं। इसलिए इस दिन को जानकी नवमी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा जनक यज्ञ करने के लिए भूमि की जुताई कर रहे थे, तो उन्हें सोने के ताबूत में एक बच्ची मिली। एक जुताई वाली भूमि को ‘सीता’ कहा जाता था इसलिए राजा जनक ने बच्ची का नाम सीता रखा। सीता नवमी के दिन पूरे देश में भगवान राम और जानकी मंदिरों में विशेष पूजा व अनुष्ठान किया जाता है। मंदिरों को फूलों व लाइटों से सजाया जाता है। रामायण के पाठ बाद भजन कार्यक्रम भी विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जाते हैं। कुछ मंदिर द्वारा राम रथ यात्रा निकालते हैं और ’जय सिया राम’ का जाप करते हैं और पूरे रास्ते भक्ति गीत गाते हैं। सीता नवमी पूजा सीता नवमी के दिन देवी सीता की पूजा कि जाती है। इस वैवाहित महिलायें इस दिन व्रत करती है और अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है। ऐसा माना जाता है कि सीता नवमी व्रत करने से व्यक्ति में शील, मातृत्व, त्याग और समर्पण जैसे गुण आते हैं। सीता और भगवान राम की एक साथ पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। सीता नवमी पूजा विधि माता सीता को श्रृंगार करके सुहाग का सामान अर्पित करें। इसके बाद रोली, माला, फूल, चावल, धूप, दीप, फल व मिष्ठान अर्पित करें। तिल के तेल या गाय के घी से दीपक जलाएं और फिर माता की आरती उतारें। इसके बाद 108 बार माता सीता के मंत्रों का जप करें और सीता चालीसा का पाठ करें

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सीता नवमी से जुडी पौराणिक कथा

पौराणिक कथा कथा यह है कि मां लक्ष्मी जी का अवतार सीता माता अपने पिछले जन्म में मुनि कुषध्वजा की बहुत ही सुंदर पुत्री वेदावती थी। वे भगवान विष्णु की भक्त थी वे हर समय केवल उनकी पूजा में ही लीन रहती थी, उनका प्रण था कि वे भगवान विष्णु के अतिरिक्त किसी और से विवाह नही करेंगी। उनके पिता एक ऋषि थे, वे अपनी बेटी के इस प्रण को अच्छी तरह से जानते थे, उन्होनें कभी अपनी पुत्री को अपना मन बदलने के लिए विवष नही किया। पुत्री की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होनें पुत्री के लिए आए अनेकों षक्तिषाली राजाओं और देवताओं के रिष्तों को मना कर दिया। मना किए गए रिष्तों में से एक रिष्ता दैत्यों के षक्तिषाली राजा षंभु का भी था। रिष्ते के लिए न मिलने पर दानव षंभु ने इसे अपना अपमान समझा और अपने अपमान का बदला लेने के उद्देष्य से मौका देखकर वेदावती के माता पिता का वध कर दिया। अपने माता पिता की मृत्यु के बाद वेदावती संसार में बिलकुल अकेली और अनाथ हो गई वे अपने पिता के आश्रम में ही रहने लगी और सारा समय भगवान विष्णु का ध्यान करने लगी। वेदावती बहुत ही खुबसूरत थी और उनकी तपस्या ने उन्हें पहले से भी अधिक सुंदर बना दिया था। एक बार लंका के राजा रावण ने उसे जंगल में भगवान विष्णु के लिए तपस्या करते हुए देखा वो वेदावती की सुंदरता पर मोहित हो गया उसने वेदावती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा परन्तु उसे भी न में ही जवाब मिला। न में जवाब मिलने पर रावण ने वेदावती की तपस्या भंग कर दी और उनके बालों को पकड़़कर उन्हें घसीटने लगा। ंरावण के इस कुकृत्य से क्रोधित वेदावती ने अपने बाल काट दिए और कहा कि वो वहीं उसकी आखों के सामने ही अग्नि में कूदकर अपने प्राणों का त्याग करेगीं। अग्नि में प्रवेष करते समय वेदावती ने कहा कि रावण ने इस जंगल में उन्हें अपमानित किया है वो दोबारा से जन्म लेकर उसके विनाष का कारण बनेगीं। वो वेदावती ही थीं जो सीता के रुप में जन्मीं और राम जी के माध्यम से रावण के विनाष का कारण बनी। जब वेदावती का जन्म सीता जी के रुप में हुआ तो वे मिथिला नरेष राजा जनक को उनकें खेतों में जुताई करते समय भूमि पर लेटी हुई मिली। उनकी दैविक सुंदरता से प्रभावित होकर राजा जनक ने उन्हें अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। देवी सीता को जानकी, वैदही, मैथली तथा और अन्य नामों से भी जाना जाता है। वे राजा जनक को भूमि पर पड़ी हुई मिली थी इसलिए उन्हें भूदेवी की संतान भी माना जाता है। राजा जनक की पुत्री सीता  माना जाता है कि एक बार मिथिला में भयंकर अकाल पड़ा. उस समय मिथिला के राजा जनक थे. वे बहुत ही ज्ञानी एवं पुण्यात्मा थे. वे प्रजा के हित में धर्म कर्म के कार्यों में बढ़ चढ़कर रूचि लेते थे. ऋषि-मुनियों ने उन्हें सुझाव दिया कि यदि राजा जनक स्वयं हल चलाकर भूमि जोते तो देवराज इंद्र की कृपा से ये अकाल दूर हो सकता है. प्रजा के हित में राजा ने खुद हल चलाने का निर्णंय लिया. हल चलाते-चलाते एक जगह आकर हल अटक गया. राजा ने देखा कि एक सुंदर स्वर्ण कलश है जिसमें हल की नोक अटकी हुई है. कलश को बाहर निकाला तो उसमें एक अति सुन्दर दिव्य ज्योति लिए नवजात कन्या है. धरती मां के आशीर्वाद स्वरूप राजा जनक ने इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया. क्योंकि, हल की नोक को सीत कहा जाता है इसलिए राजा जनक ने इस कन्या का नाम सीता रखा गया. जहां पर उन्होंने हल चलाया वे स्थान वर्तमान में बिहार के सीतामढ़ी के पुनौरा राम गांव को बताया जाता है. रावण और मंदोदरी की पुत्री सीता रामायण में इस बात का उल्लेख किया गया है कि ‘रावण कहता है कि जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूं तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने.’ रामायण की कथा के अनुसार गृत्स्मद नाम का ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था. एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया तब रावण इनकी कुटिया में आया और उस जगह पर मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया. यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया. रावण ने कहा कि ये अति तीक्ष्ण विष हैं. इसे संभालकर रख दो. मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुखी थी और मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया. इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गई. ऐसे में मंदोदरी ने सोचा कि जब मेरे पति मेरे पास नहीं है. उन्हें इस बात का पता चलेगा. तो वे क्या सोचेंगे. यही सब सोचते हुए मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र चली गई. कहा जाता है कि वहीं पर उसने गर्भ को निकालकर एक घड़े में रखकर भूमि में दफन कर दिया और सरस्वती नदी में स्नान करके वे वापस लंका लौट गई. माना जाता है कि वही घड़ा हल चलाते वक्त मिथिला के राजा जनक को मिला था, जिसमें से सीताजी प्रकट हुईं थी.  

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हिन्दू धर्म के 29 ऐसे रहस्य, जो अनसुलझे हैं

हिन्दू धर्म या कहें कि भारतीय संस्कृति में प्रचलित और ग्रंथों में उल्लेखित भारत के 29 ऐसे रहस्य हैं, जो अभी तक अनसुलझे हुए हैं और संभवत: उनमें से कुछ का रहस्य मानव कभी नहीं जान पाएगा। प्राचीन सभ्यताओं, धर्म, समाज और संस्कृतियों का महान देश भारत वैसे भी रहस्य और रोमांच के लिए जाना जाता है। एक ओर जहां भारत में दुनिया की प्रथम भाषा संस्कृत का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया का प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद लिखा गया। एक और जहां दुनिया की प्रथम लिपि ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ तो दूसरी ओर दुनिया के प्रथम विश्वविद्यालय नालंदा और तक्षशिला की स्थापना हुई। प्राचीन भारत में एक ओर जहां अगस्त्य मुनि ने बिजली का आविष्कार किया था तो हजारों वर्ष पूर्व ऋषि भारद्वाज ने विमानशास्त्र लिखकर यह बताया था कि किस तरह विमान बनाए जा सकते हैं। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत जहां भास्कराचार्य ने ईजाद किया था तो वहीं कणाद ऋषि को परमाणु सिद्धांत का जनक माना गया है। एक ओर जहां सांप-सीढ़ी का खेल भारत में जन्मा दो दूसरी ओर शतरंज का आविष्कार भी भारत में ही हुआ। आचार्य चरक और सुश्रुत को श्रेय जाता है प्लास्टिक सर्जरी चिकित्सा की खोज का। पाणिणी ने दुनिया का पहला व्याकरण लिखा था। ज्यामिति, पाई का मान, रिलेटिविटी का सिद्धांत जैसे कई सिद्धांत और आविष्कार हैं, जो भारत ने गढ़े हैं। लेकिन हम उक्त सबसे हटकर कुछ ऐसे 29 रहस्य बताने वाले हैं, जो अब तक अनसुलझे हैं। ऋषि कश्यप और उनकी पत्नियों के पुत्रों का रहस्य कहते हैं कि धरती के प्रारंभिक काल में धरती एक द्वीप वाली थी, फिर वह दो द्वीप वाली बनी और अंत में सात द्वीपों वाली बन गई। कहते हैं कि प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने समुद्र में और धरती पर तरह-तरह के जीवों की उत्पत्ति की। उत्पत्ति के इस काल में उन्होंने अपने कई मानस पुत्रों को भी जन्म दिया। उन्हीं में से एक थे मरीची। ऋषि कश्यप ब्रह्माजी के मानस पुत्र मरीची के विद्वान पुत्र थे।  मान्यता के अनुसार इन्हें अनिष्टनेमी के नाम से भी जाना जाता है। इनकी माता ‘कला’ कर्दम ऋषि की पुत्री और कपिल देव की बहन थी। यहां रहस्य वाली बात यह कि क्या कोई इंसान सर्प, पक्षी, पशु आदि तरह की जातियों को जन्म दे सकता है? हालांकि जीव विकासवादियों को इस पर शोध करना चाहिए। क्या मनुष्य और पशुओं के संयोग से कोई एक नई प्रजाति को जन्म देना संभव है। भगवान विष्णु सदा एक गरूड़ पर सवार रहते थे। ये गरूड़जी कश्यप की पत्नी विनीता से जन्मे थे। यूं तो कश्यप ऋषि की कई पत्नियां थीं लेकिन प्रमुख रूप से 17 का हम उल्लेख करना चाहेंगे- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. काष्ठा, 5. अरिष्टा, 6. सुरसा, 7. इला, 8. मुनि, 9. क्रोधवशा, 10. ताम्रा, 11. सुरभि, 12. सुरसा, 13. तिमि, 14. विनीता, 15. कद्रू, 16. पतांगी और 17. यामिनी आदि पत्नियां बनीं। 1. अदिति से 12 आदित्यों का जन्म हुआ- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। ये सभी देवता कहलाए और इनका स्थान हिमालय के उत्तर में था। 2. दिति से कई पुत्रों का जन्म हुआ- कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक 2 पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री को जन्म दिया। ये दैत्य कहलाए और इनका स्थान हिमालय के ‍दक्षिण में था। श्रीमद्भागवत के अनुसार इन 3 संतानों के अलावा दिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जो कि मरुन्दण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र नि:संतान रहे जबकि हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। 3. दनु : ऋषि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरुण, अनुतापन, धूम्रकेश, विरुपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोम और विप्रचिति आदि 61 महान पुत्रों की प्राप्ति हुई। ये सभी दानव कहलाए। 4. अन्य पत्नियां : रानी काष्ठा से घोड़े आदि एक खुर वाले पशु उत्पन्न हुए। पत्नी अरिष्टा से गंधर्व पैदा हुए। सुरसा नामक रानी से यातुधान (राक्षस) उत्पन्न हुए। इला से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। मुनि के गर्भ से अप्सराएं जन्मीं। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया। सुरभि ने भैंस, गाय तथा दो खुर वाले पशुओं की उत्पत्ति की। रानी सरसा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। तिमि ने जलचर जंतुओं को अपनी संतान के रूप में उत्पन्न किया। रानी विनीता के गर्भ से गरूड़ (विष्णु का वाहन) और वरुण (सूर्य का सारथि) पैदा हुए। कद्रू की कोख से बहुत से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक।  रानी पतंगी से पक्षियों का जन्म हुआ। यामिनी के गर्भ से शलभों (पतंगों) का जन्म हुआ। ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की 2 पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के 60 हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ, जो कि कालांतर में निवात कवच के नाम से विख्यात हुए। 10 फन, उड़ने वाले, मणिधर और इच्छाधारी सांप होते हैं? सभी जीव-जंतुओं में गाय के बाद सांप ही एक ऐसा जीव है जिसका हिन्दू धर्म में ऊंचा स्थान है। सांप एक रहस्यमय प्राणी है। देशभर के गांवों में आज भी लोगों के शरीर में नाग देवता की सवारी आती है। शिव के प्रमुख गणों में सांप भी है। भारत में नाग जातियों का लंबा इतिहास रहा है। कहते हैं कि कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप, बिच्छू आदि विषैले जंतु पैदा किए। अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पिंगला- उक्त 5 नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। ये सभी कश्यप वंशी थे, लेकिन इन्हीं से नागवंश चला। शेषनाग को 10 फन वाला माना गया है। भगवान विष्णु उन पर ही लेटे हुए दर्शाए गए हैं। उड़ने वाला और इच्छाधारी नाग : माना जाता है कि 100 वर्ष से ज्यादा उम्र होने के बाद सर्प में उड़ने की शक्ति आ जाती है। सर्प कई प्रकार के

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