शिवलिंग क्या है ? जानिए शिव लिंग के बारे में 12 चीज़ें
शिवलिंग एक ऊर्जा का स्वरुप है जिसमें एक या एक से ज्यादा चक्र मौजूद होते हैं। ज़्यादातर ज्योतिर्लिंग में एक या दो चक्र प्रतिष्ठित हैं। ध्यानलिंग में सभी सातों चक्र परम तक प्रतिष्ठित हैं। शिवलिंग का मतलब लिंग शब्द का मतलब है “आकार”। हम इसे “आकार” इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जो अप्रकट है, वो जब खुद को प्रकट करने लगता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो जब सृष्टि की उत्पत्ति शुरु हुई तो जो सबसे पहला आकार इसने लिया था, वो एक दीर्घवृताकार था । एक पूर्ण दीर्घवृत्त या इल्लिप्स को हम एक लिंग कहते हैं। सृष्टी की शुरुआत हमेशा एक दीर्घवृत्त या एक लिंग के रूप में हुई और उसके बाद ये कई रूपों में प्रकट हुई। और हम अपने अनुभव से यह जानते हैं कि जब आप ध्यान की गहरी अवस्था में जाते हैं तो पूर्ण विलीन होने वाला बिंदु आने से पहले ऊर्जा एक बार फिर एक दीर्घवृत या एक लिंग का रूप ले लेती है। तो इस तरह से सबसे पहला आकार भी लिंग है और सबसे आखिरी आकार भी लिंग है। 1.एक लिंग में ईश्वरत्व को स्थापित करना ज़रूरी तकनीक से, एक साधारण जगह, यहां तक कि एक पत्थर के टुकड़े को एक दिव्य जीवंतता में तब्दील किया जा सकता है। यह ईश्वरत्व को स्थापित करने की प्रक्रिया है।” सद्गुरु अगर आप मुझे कोई चीज़, मान लीजिए कि एक कागज़ का टुकड़ा देते हैं तो मैं उसे अत्यधिक ऊर्जावान बनाकर आपको वापस दे सकता हूं। अगर आप मेरे छूने से पहले और छूने के बाद इसे पकड़ेंगे तो आप दोनों के बीच का अंतर महसूस कर पायेंगे। लेकिन एक कागज़ इस ऊर्जा को बनाए नहीं रख सकता है। लेकिन अगर आप एक सही लिंग आकार बनाते हैं तो ये ऊर्जा का एक असीमित भंडारगृह बन जाता है। एक बार आप इसे प्रतिष्ठित कर देते हैं, तो ये हमेशा वैसा ही रहेगा। 2.शिवलिंग का रहस्य क्या है? – प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ प्रतिष्ठा का अर्थ है, ईश्वरत्व को स्थापित करना। इस तरह की स्थापना का जो सबसे सामान्य तरीका है, वो है मंत्रों, अनुष्ठानों तथा अन्य प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करना अगर आप किसी आकार की स्थापना या प्रतिष्ठा मंत्रों के माध्यम से करें, तो आपको उस देवता को जीवंत बनाए रखने के लिए उसके निरंतर रख रखाव की ज़रूरत होती है।प्राण-प्रतिष्ठा ऐसी प्रक्रिया नहीं है। जब एक आकार की प्रतिष्ठा या स्थापना जीवन ऊर्जाओं के माध्यम से की जाती है, न कि मंत्रों या अनुष्ठानों से, तो जब यह एक बार स्थापित हो जाए, तो यह हमेशा के लिए रहता है। इसे किसी रख-रखाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। यही कारण है कि ध्यानलिंग में पूजा नहीं की जाती क्योंकि इसे ऐसे रख रखाव की ज़रूरत नहीं है। इसे प्राण-प्रतिष्ठा द्वारा स्थापित किया गया है और यह हमेशा ऐसा ही रहेगा। यहां तक कि अगर आप लिंग का पत्थर वाला हिस्सा हटा दें, यह फिर भी वैसा ही रहेगा। अगर पूरी दुनिया का अंत भी हो जाए, तब भी यह वैसा ही रहेगा। 3.लिंग की रचना – एक आत्मपरक सब्जेक्टिव या भीतरी विज्ञान लिंग को बनाने का विज्ञान एक अनुभव से जन्मा विज्ञान है, जो हजारों सालों से यहां मौजूद है। परंतु पिछले आठ सौ या नौ सौ सालों में, खासतौर पर जब भारत में भक्ति आंदोलन की लहर फैली, तो मंदिर निर्माण का विज्ञान खो गया। एक भक्त के लिए अपनी भावनाओं से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं होता। उसका रास्ता भावनाओं का है। यह उसकी भावनाओं की ही ताकत होती है, जिसके दम पर वह सबकुछ करता है। तो उन्होंने विज्ञान को किनारे रख दिया और मनचाहे तरीके से मंदिर बनाने लगे। आप जानते हैं, यह एक प्रेम संबंध होता है? एक भक्त जो चाहेकर सकता है। उसके लिए सब जायज है क्योंकि उसके पास एक ही चीज है और वह है अपनी भावनाओं की ताकत। इसी वजह से लिंग बनाने का विज्ञान खत्म होने लगा। वरना यह एक बहुत गहन विज्ञान था। यह एक आत्मपरक विज्ञान या सब्जेक्टिव साईंस है और इसे कभी लिखा नहीं गया। क्योंकि लिखने से इसके गलत समझे जाने की पूरी संभावना थी। इस तरह से, बिना किसी विज्ञान की जानकारी के, अनेक लिंगों की स्थापना की गई। 4.शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई ? – चक्रों को दर्शातें हैं लिंग चक्र, ऊर्जा तंत्र में वे स्थान होते हैं जहां प्राण की नाड़ियाँ मिलती हैं और ऊर्जा का एक भंवर बनता है। वैसे तो शरीर में 114 चक्र होते हैं लेकिन आम तौर पर जब हम चक्रों की बात करते हैं तो हम सात महत्वपूर्ण चक्रों की ही बात करते हैं, जो कि जीवन के सात आयामों को दर्शाते हैं। ये सात महत्वपूर्ण ट्रैफिक जंक्शन की तरह हैं। इस समय, भारत में अधिकतर लिंगों में केवल एक या दो चक्र ही स्थापित है। ईशा योग केंद्र में मौजूद ध्यानलिंग की खासियत ये है कि इसमें सातों चक्रों को अपने चरम तक ऊर्जावान बनाकर स्थापित किया गया है। यह ऊर्जा की सबसे उच्चतम संभव अभिव्यक्ति है । ये इस तरह से है कि अगर आप ऊर्जा को लेते हैं और उसे उसकी तीव्रता की चरम सीमा तक ले जाते हैं तो, केवल एक निश्चित सीमा तक ये एक आकार को धारण कर सकती है, उसके बाद ये आकार छोड़ देती है। जब ये अपना आकार छोड़ देती है तो लोग इसे अनुभव नहीं कर पाते। ऊर्जा को उस बिंदु तक धकेलना कि जिसके बाद वो आकार छोड़ दे, और ठीक तभी उसे एक निश्चित रूप दे देना- इस तरह से ध्यानलिंग की स्थापना/प्रतिष्ठा की गई है। 5.पंच भूतों की साधना योग की सबसे बुनियादी साधना है भूतशुद्धि। पंचभूत, प्रकृति के पांच तत्व हैं। अगर आप खुद को देखें तो आपका शरीर पांच तत्वों का बना हुआ है। ये हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश। ये आपस में एक खास तरीके से मिलकर भौतिक शरीर के रूप में प्रकट होते हैं। आध्यात्मिक प्रक्रिया, भौतिक प्रकृति और इन पंच तत्वों से परे जाने की प्रक्रिया है। इन तत्वों की उन सभी चीज़ों पर बहुत ही मज़बूत पकड़ है जिन्हें आप अनुभव करते हैं। इनसे परे जाने के लिए योग का एक बुनियादी अभ्यास है, जिसे भूत शुद्धि कहते हैं। हर एक
शिवलिंग क्या है ? जानिए शिव लिंग के बारे में 12 चीज़ें Read More »
KARMASU