महाकाली की कहानी

महाकाली विनाश और प्रलय की पूजनीय देवी हैं। महाकाली सार्वभौमिक शक्ति, समय, जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म और मुक्ति की देवी हैं। वह काल (समय) का भक्षण करती है और फिर अपनी काली निराकारता को फिर से शुरू कर देती है। वह महाकाल की पत्नी भी हैं, महाकाली भगवान शिव का ही एक रूप है। संस्कृत में महाकाली महाकाल का नारीकृत रूप है, पार्वती और उनके सभी रूप महाकाली के विभिन्न रूप हैं। महाकाली कौन है? माँ काली शक्ति का एक भयानक रूप है। एक दुष्ट राक्षश के विनाश के लिए उनका अवतरण हुवा था। उनकी त्वचा काली है, उनकी आभूषण खोपड़ी का एक लंबा हार और उनके कई हाथ है। उनकी जीभ तरस्ती गर्म खून के लिए बाहर लटकी हुई है। महाकाली की उत्पत्ति कैसे हुई? रक्तबीज नाम का एक राक्षश था ,उसे ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था, के उसे स्त्री के आलावा और कोई मार नहीं सकता था। उसे यह भी वरदान था के उसके खून की एक बूँद ज़मीं पर गिरे तो एक और रक्तबीज राक्षश पैदा हो जाये। उसने देवताओ और ब्राह्मणो पर अत्याचार करके तीनो लोको में कोहराम मचा रखा था। देवता इस वरदान के कारण रक्तबीज को मारने में असमर्थ थे। युद्ध के मैदान में, जब देवता उसे मारते हैं, तो उसके खून की हर बूंद जो जमीन को छूती है, खुद को एक नए और अधिक शक्तिशाली रक्त बीज में बदल देती है, और पूरे युद्ध के मैदान को लाखों रक्त बीज के साथ से युद्ध करना पड़ता। निराशा में देवताओं ने मदद के लिए भगवान शिव का रुख किया। लेकिन जैसे ही भगवान शिव उस समय गहरे ध्यान में थे, देवताओं ने मदद के लिए उनकी पत्नी पारवती की ओर रुख किया। देवी ने तुरंत काली के रूप में इस खूंखार दानव से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। महाकाली ने रक्तबीज को कैसे मारा? माता युद्ध करते समय जैसे ही उसे मारती तो रक्तबीज के शरीर की बूंद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न होने लगा।  तब माता ने अपनी जीभा का आकर बड़ा कर लिया और फिर रक्तबीज का जैसे ही रक्त गिरता, तो वह माता के जीभा में गिरता, ऐसे करते-करते रक्त बीज कमज़ोर होने लगा, फिर माता ने उसका वध कर दिया। मां काली ने शिव जी के ऊपर पैर क्यों रखा ? रक्तबीज का वध करने के बाद महाकाली माता का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनका अति विक्राल स्वरुप के सामने आने से सब लोग डरने लगे,और उनके सामने जो भी आता उनका विनाश कर देती,उनको स्वयं ही नहीं पता था के वह क्या कर रही है। देवताओ की चिंता बढ़ गई के महाकाली माँ का गुस्सा कैसे शांत करे। तब देवता महादेव के पास गए और उनको विनंती की के माता को शांत करने का कोई मार्ग बताये। तब स्वयं भगवन शिव ने अनेक उपायों किये पर माता शांत न हो पाई। आखिर शिव जी ने खुद को माता के पैरो के बिच गिरा दिया और जैसे ही माता को शिवजी का स्पर्श हुवा। माता शांत हो गई, और महाकाली से पारवती बन गई। फिर सारे देवतागण जयजयकार करने लगे।

महाकाली की कहानी Read More »

दुर्गा कथा : मां पार्वती की पवित्र पौराणिक गाथा

‘या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।’  कैलाश पर्वत के निवासी भगवान शिव की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि, लेकिन सबमें सुंदर नाम तो ‘मां’ ही है। मंगलनाथ में भात पूजा माता की पवित्र कथा आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री पार्वती माता को शक्ति कहा जाता है। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वह पर्वतराज अर्थात् पर्वतों के राजा की पुत्र थी। राजकुमारी थी। लेकिन वह भस्म रमाने वाले योगी शिव के प्रेम में पड़ गई। शिव के कारण ही उनका नाम शक्ति हो गया। पिता की अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया। एक यज्ञ में जब दक्ष ने पार्वती (शक्ति) और शिव को न्यौता नहीं दिया, फिर भी पार्वती शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। पार्वती को यह सब सहन नहीं हुआ और वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। यह खबर सुनते ही शिव ने अपने सेनापति वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने कंधों पर धारण कर शिव ‍क्रोधित हो धरती पर घूमते रहे। इस दौरान जहां-जहां सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे वहां बाद में शक्तिपीठ निर्मित हो गए। जहां पर जो अंग या आभूषण गिरा उस शक्तिपीठ का नाम वह हो गया।  माता का रूप मां के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है। रक्तांबर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्धचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं। शेर हमेशा माता के साथ रहता है। माता की प्रार्थना जो दिल से पुकार निकले वही प्रार्थना। न मंत्र, न तंत्र और न ही पूजा-पाठ। प्रार्थना ही सत्य है। मां की प्रार्थना या स्तुति के पुराणों में कई श्लोक दिए गए है।

दुर्गा कथा : मां पार्वती की पवित्र पौराणिक गाथा Read More »

मंगलनाथ में भात पूजा- ONLINE PUJA

जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं। मांगलिक कुंडली वालों को विवाह के पूर्व मंगलनाथ में भात पूजा करने की सलाह दी जाती है। भात पूजा : भात अर्थात चावल। चावल से शिवलिंगरूपी मंगलदेव की पूजा की जाती है। जो मांगलिक हैं उन्हें विवाह पूर्व भात पूजा अवश्य करना चाहिए।  मंगलदेव की उत्पत्ति धरती माता से हुई थी। मंगलदेव का जन्म मध्यप्रदेश के अवंतिका अर्थात उज्जैन में हुआ था। जहां उनका जन्म हुआ था उसे मंगलनाथ स्थान कहते हैं। इस स्थान पर विश्व का एकमात्र मंगल ग्रह का मंदिर है। कहते हैं कि इस स्थान नर ही मंगल ग्रह की सीधी किरने धरती पर आती है। आप हमारे उच्च कोटि के विद्वान् ब्राम्हणो के द्वारा पूजा का आयोजन ऑनलाइन व् ऑफलाइन के माध्यम से करवा सकते हैं मंगल भात पूजा किसके द्वारा करवाई जानी चाहिए ?मंगल भात पूजा पूरी तरह से आपके जीवन से जुडी हुयी है इसलिए इस पूजा को विशिस्ट, सात्विक और विद्वान ब्राह्मण द्वारा गंभीरता पूर्वक करवानी चाहिए, पंडित श्री रमाकांत चौबे जी को इस पूजा का महत्त्व और विधि भली भांति से ज्ञात है और अभी तक इनके द्वारा की गयी पूजा गयी पूजा भगवान शिव की कृपा से सदैव सफल हुयी है। मंगल भात पूजा क्यों करवानी चाहिएकुछ व्यक्ति ऐसे होते है जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है उसी को ज्योतिष की भाषा में मंगल दोष कहते है, मंगल दोष कुंडली के किसी भी घर में स्थित अशुभ मंगल के द्वारा बनाए जाने वाले दोष को कहते हैं, जो कुंडली में अपनी स्थिति और बल के चलते जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, तो वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंगलनाथ मंदिर में पूजा-पाठ अवश्य करवाए, जैसा की उज्जैन को पुराणों में मंगल की जननी कहा जाता है इस लिए मंगल दोष को निवारण के लिए मंगल भात पूजा को उज्जैन में ही करवाने से अभीस्ट पुण्य एवं फल प्राप्त होता है. मंगल भात पूजा किसको करवानी चाहिए ?वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है अथवा इसी को मंगल दोष भी कहते है. यह स्थिति विवाह के लिए अत्यंत अशुभ मानी जाती है, ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दूसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए. अर्थात यदि वर और वधु दोनों ही मांगलिक होते है तो दोनों के मंगल दोष एक दूसरे से के योग से समाप्त हो जाते है. किन्तु अगर ऐसा किसी कारण से ज्ञात नहीं हो पाता है, और किसी एक की कुंडली में मंगल दोष हो तो मंगल भात पूजा अवस्य करवा लेनी चाहिए. मंगल दोष एक ऐसी विचित्र स्थिति है, जो जिस किसी भी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है जैसे संबंधो में तनाव व बिखराव, घर में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बेवजह बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है. मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रह योग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, आपको वैदिक पूजा-प्रक्रिया के द्वारा इसकी भीषणता को नियंत्रित करने के लिए उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर में यह पूजा करवानी चाहिए। क्या मिलते हैं लाभ : 1. मंगलदोष निवारण के लिए विवाह पूर्व भात पूजा के अलावा पीपल विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह आदि के उपाय भी बताए जाते हैं। इन उपायों से वैधव्य योग समाप्त हो जाता है।  2. मंगल यंत्र पूजन का भी एक उपाय है परंतु यह विशेष परिस्थिति में किया जाता है। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि के समय ही मंगल यंत्र पूजन का विधान है। भात पूजा के समय भी यह कार्य किया जा सकता है। इससे दाम्पत्य जीवन में सुख की प्राप्ति होती है और संतान सुख मिलता है। 3. गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हो तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है। भात पूजा करने से सभी का दोष निवारण हो जाता है। GET IN TOUCH 9129388891

मंगलनाथ में भात पूजा- ONLINE PUJA Read More »

कालसर्प दोष निवारण पूजा

कालसर्प दोष निवारण पूजा – ONLINE KARMASU

व्यक्ति के कर्म या उसके द्वारा किए गए कुछ पिछले कर्मों के परिणामस्वरूप कालसर्प योग दोष कुंडली में होना माना जाता है। इसके अलावा, यदि व्यक्ति ने अपने वर्तमान या पिछले जीवन में सांप को नुकसान पहुंचाया हो तो भी काल सर्प योग दोष की निर्मिति होती है। हमारे मृत पूर्वजों की आत्माए नाराज होने से भी यह दोष कुंडली में पाया जाता है। संस्कृत में काल सर्प दोष द्वारा कई सारे निहितार्थ सुझाए गए है। यह अक्सर कहा जाता है कि अगर काल सर्प दोष निवारण पूजा नहीं की गयी तो, संबंधित व्यक्ति के कार्य को प्रभावित करेगा और सबसे कठिन बना देगा। शिप्रा किनारे नृसिंह घाट पर बना विश्व का एकमात्र पारदेश्वर मंदिर अपने आपमें अनूठा है। महाकाल और हरसिद्धि मंदिर के समीप बने इस मंदिर में ढाई टन वजनी पारद शिवलिंग स्थापित है, जिसके दर्शन मात्र से ही समस्त पाप नष्ट होते हैं यहाँ आप हमारे विद्वान पंडितों के द्वारा घर बैठे अपने नाम गोत्र के साथ या आप यहाँ स्वयं जाकर हमारे माध्यम से कालसर्प दोष निवारण पूजा करवा सकते हैं कालसर्प दोष कुंडली में होने के लक्षण: यदि किसी व्यक्ति को पता नहीं की वे यह दोष से पीड़ित है या नहीं, या वो अनिश्चित है, तो निचे दिए गए कई लक्षण से कुंडली में स्थित काल सर्प योग के बारे में पता चल सकता है: यह भी कहा जाता है कि, कुछ लोगों को एयरोफोबिया ( अँधेरे से डर) भी होता है। किसी की भी कुंडली में इस प्रकार के योग को ठीक करने के लिए, विशेषज्ञ या पंडितजी से काल सर्प योग शांति पूजा करना आवश्यक है। GET IN TOUCH 9129388891

कालसर्प दोष निवारण पूजा – ONLINE KARMASU Read More »

कौन थे सीता माता के दो भाई जिनका रामायण में नहीं मिलता जिक्र

हम सभी ने पढ़ा, सुना और देखा है कि माता सीता की तीन बहनें थीं लेकिन आज हम आपको माता सीता के उन भाइयों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका जिक्र रामयण में नहीं मिलता है।   रामायण में राजा जनक की चार पुत्रियों का वर्णन मिलता है जो कुछ इस प्रकार है- माता सीता, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति। इस तथ्य से यह पता चलता है कि माता सीता की मात्र तीन बहनें ही थीं लेकिन कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि माता सीता के दो भाई भी थे। हालांकि माता सीता के इन भाइयों के बार में रामयण में कोई भी बात वर्णित नहीं है। हमें बताया कि रामायण में भले ही माता सीता के भाइयों का उल्लेख नहीं मिलता है लेकिन अन्य ग्रंथों में माता सीता के भाइयों के नाम और उनके बारे में जानकारी दी गई हैं। तो चलिए जानते हैं कौन थे माता सीता के भाई। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सीता और श्री राम का विवाह तय हुआ था तब विवाह के समय ब्रह्महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र उपस्थित थे। यहां तक कि श्री राम  और मात सीता का विवाह देखने स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र ब्राह्मणों के वेश में आए थे। दूसरी ओर सभी देवी और देवता भी विभिन्न वेश में विवाह के दौरान उपस्थित थे। विवाह का मंत्रोच्चार चल रहा था और उसी बीच कन्या के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म की बारी आई। इस रस्म में कन्या का भाई कन्या के आगे-आगे चलते हुए लावे का छिड़काव करता है। विवाह करवाने वाले पुरोहित ने जब इस प्रथा के लिए कन्या के भाई को बुलाने के लिए कहा तो वहां समस्या खड़ी हो गई, क्योंकि उस समय तक जनक का कोई पुत्र नहीं था।   ऐसे में सभी एक दूसरे से विचार करने लगे। इसके चलते विवाह में विलंब होने लगा। अपनी पुत्री के विवाह में इस प्रकार विलम्ब होता देखकर पृथ्वी माता भी दुखी हो गयी। तभी विवाह के समारोह के बीच एक रक्तवर्ण का युवक उठा और इस रस्म को पूरा करने के लिए आकर खड़ा हो गया। उस युवक ने राजा जनक से माता सीता के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म निभाने का आग्रह किया।  असल में वह और कोई नहीं बल्कि स्वयं मंगलदेव थे जो वेश बदलकर नवग्रहों सहित श्रीरामचन्द्र और सीता का विवाह देखने हेतु वहां उपस्थित हुए थे। चूंकि माता सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ और मंगल भी पृथ्वी के पुत्र थे। इसी सम्बन्ध से मंगलदेव माता सीता के भाई भी लगते थे। इसी कारण पृथ्वी माता के संकेत से वे इस विधि को पूर्ण करने के लिए आगे आए। वहीं, अन्य पौराणिक कथा के अनुसार राजा जनक के छोटे भाई के पुत्र थे लक्ष्मीनिधि जो रिश्ते में मात सीता के भाई लगते थे। तो इस प्रकार माता सीता के दो भाई थे एक मंगल और दूसरे लक्ष्मी निधि। हालांकि मंगल ग्रह के माता सीता के भाई होने पर सनातनियों द्वारा पुष्टि की गई है लेकिन लक्ष्मीनिधि नामक भाई के बारे में कोई खास प्रमाण नहीं मिलता है।  तो ये थे माता सीता के वो दो भाई जिनका जिक्र रामायण में साक्षात रूप से नहीं मिलता है। अगर हमारी स्टोरीज से जुड़े आपके कुछ सवाल हैं, तो वो आप हमें आर्टिकल के नीचे दिए कमेंट बॉक्स में बताएं। हम आप तक सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

कौन थे सीता माता के दो भाई जिनका रामायण में नहीं मिलता जिक्र Read More »

कब है सीता नवमी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

माता सीता के जन्मोत्सव को हर साल सीता नवमी के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में आइये जानते हैं सीता नवमी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व के बारे में।      हिन्दू धर्म में माता सीता को पतित-पावना और पतिव्रता स्त्री का सर्वोच्च उदाहरण माना गया है। वहीं, इसके अलावा माता सीता मां लक्ष्मी का भी अवतार मानी जाती हैं। माता सीता के जन्मोत्सव को हर साल सीता नवमी के रूप में मनाया जाता है। कि सीता नवमी इस बार कब पड़ रही है और साथ ही जानेंगे शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व के बारे में।  भगवान शिव ने किया था विष्णु जी के पुत्रों का वध, जानें पौराणिक कथा सीता नवमी 2023 कब है वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का शुभारंभ 28 अप्रैल, दिन शुक्रवार को शाम 4 बजकर 1 मिनट से हो रहा है। वहीं, इसका समापन 29 अप्रैल, दिन शनिवार को शाम 6 बजकर 22 मिनट से हो रहा है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, इस साल सीता नवमी 29 अप्रैल को मनाई जाएगी।  सीता नवमी 2023 पूजा विधि (Sita Navami 2023 Puja Vidhi) सीता नवमी की पूजा अष्टमी से शुरू हो जाती है।  अष्टमी के दिन सुबह उठकर गंगाजल से भूमि पर छिड़काव किया जाता है।  फिर एक मंडप लगाया जाता है। मंडप को पूर्ण रूप से सजाया जाता सीता नवमीसीता नवमीहै।  मंडप के पीच में एक चौकी पर लाल कपड़ा रख दिया जाता है।  नवमी की पूजा तक मंडप वाली जगह पर बिना शुद्धि के जाना मना होता है। सीता नवमी के दिन प्रातः उठकर स्नान किया जाता है।  फिर स्वच्छ वस्त्र धारण कर माता सीता की प्रतिमा को मंडप में लाया जाता है।  मूर्ति के स्थान पर आप तस्वीर भी मंडप में ला सकते हैं।  मात सीता को मंडप के बीचों बीच चौकी पर स्थापित किया जाता है।  फिर मां का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है।  मां सीता का अभिषेक कर उनका श्रृंगार किया जाता है।  माता सीता को पुष्प, फल, फूल, अक्षत और सुहाग का सामान अर्पित करते हैं।  फिर मां सीता को भोग लगाया जाता है और माता सीता के मंत्रों का जाप किया जाता है।  अंत में आरती करने के बाद माता सीता का प्रसाद परिवार में बांटा जाता है। व्रत पूरा होने के बाद दशमी के दिन मंडप को पवित्र नदी में विसर्जित किया जाता है। सीता नवमी का महत्व सीता नवमी का व्रत सुहागिनों और अविवाहिताओं दोनों के द्वारा रखा जाता है। मान्यता है कि सीता नवमी का व्रत रखने से शादीशुदा महिलाओं का वैवाहिक जीवन मधुर हो जाता है और उनके वैवाहिक जीवन के कष्ट भी दूर होते हैं। साथ ही, कुंवारी कन्याओं द्वारा व्रत रखने और माता सीता की पूजा करने से मनवांछित वर की प्राप्ति होती है और जीवन सुख-समृद्धिमय बीतता है।  तो ये थी सीता नवमी से जुड़ी समस्त जानकारी। अगर हमारी स्टोरीज से जुड़े आपके कुछ सवाल हैं, तो वो आप हमें आर्टिकल के नीचे दिए कमेंट बॉक्स में बताएं। हम आप तक सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

कब है सीता नवमी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व Read More »

चातुर्मास कथा:-भगवान विष्णु आखिर चार महीने योग निंद्रा में क्यों जाते हैं

चातुर्मास से जुड़ी एक कथाभगवान विष्णु ने देवमाता अदिति और कश्यप ऋषि के घर एक ब्राह्मण बालक के रूप में जन्म लिया था. यह भगवान विष्णु का वामन अवतार था. य​​ह घटना उस समय की है, जब असुरों के राजा बलि ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया. स्वर्ग पर फिर से देवतों का अधिपत्य हो, इसके लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया श्रीविष्णु के पास इस संसार के पालन का जिम्मा है और वो अपनी माया के माध्यम से इस संसार का संचालन करते हैं, लेकिन चार महीने के लिए श्रीविष्णु योग निंद्रा में चले जाते है। सनातन धर्म में भगवान विष्णु को समस्त देवताओं का स्वामी माना गया है। देवासुर संग्राम में भी स्वयं भगवान विष्णु देवताओं की सहायता करते हैं ऐसा पुराणों में उल्लेख है। भागवत पुराण के अनुसार जितने भी दिव्य संत, साधु, मुनि इस धरती पर जन्म लेते हैं वो सब विष्णु के अवतार हैं। राम, कृष्ण, परशुराम ये सब भी विष्णु के ही अवतार कहे जाते हैं। श्री विष्णु क्षीर सागर में निवास करते हैं और लक्ष्मी उनकी सेवा में रहती हैं। भगवान कौस्तुक मणि को धारण करते हैं और सर्प पर शयन करते हैं। उनका वाहन गरुड़ और चार भुजाएं हैं। श्री विष्णु के पास इस संसार के पालन का जिम्मा है और वो अपनी माया के माध्यम से इस संसार का संचालन करते हैं, लेकिन चार महीने के लिए श्रीविष्णु योग निंद्रा में चले जाते है। दरअसल धर्म ग्रन्थों की माने तो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक की अवधि को चार्तुमास कहा जाता है और इन चार महीनों में श्री विष्णु निंद्रा में चले जाते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है क्योंकि इसी दिन से देवताओं की रात शुरू होती है। इसके अलावा कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है और उसके बाद मांगलिक कार्य शुरू होते है। इन चार महीनों में जितने भी मांगलिक कार्य है वो सब निषेध होते हैं। भगवान विष्णु के निंद्रा में जाने के संदर्भ में दो मत है। पौराणिक कथा- बालि संग पाताललोक में करते हैं निवास एक मत यह है कि वे क्षीर सागर में ही निंद्रा में होते हैं और दूसरा मत यह है कि वो पाताललोक में बालि के यहां निवास करते हैं जिन्हे संकर्षण विष्णु कहा जाता है। दरअसल जब विष्णु ने वामन अवतार लिया तो बालि से उन्होंने तीन पग भूमि मांगी। दो पग में उन्होंने पूरा संसार मापकर तीसरा पग बालि के सिर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया, लेकिन वरदान के रूप में बालि ने विष्णु को ही मांग लिया। वरदान के कारण स्वयं विष्णु जब पाताल में बालि के साथ चले गए तो सभी मंगल कार्य बंद हो गए। इसके बाद खुद लक्ष्मी ने बालि को राखी बांधकर भगवान विष्णु को मुक्त करने का वचन लिया। तभी से विष्णु चार महीने बालि के पास निवास करने लगे और उन चार महीनों को चार्तुमास कहा जाने लगा। माना जाता है कि इन चार महीनों में शिव स्वयं सृष्टि की देखभाल करते हैं। श्री विष्णु मत्स्य अवतार पौराणिक कथा भगवान विष्णु योगनिद्रा को दिए वचन का करते हैं पालन एक दूसरी कथा के अनुसार योग माया जोकि सृष्टि का संचालन करती हैं, उन्होंने श्रीविष्णु से कहा कि आप मुझे भी अपने शरीर में स्थान दें। योग निंद्रा भगवान विष्णु के सृष्टि संचालन में उनकी सहायता करती हैं तो श्रीविष्णु उनसे मना नहीं कर पाए। श्रीविष्णु ने योग निंद्रा को आँखों में स्थान दे दिया और इसी मत के अनुसार इन चार महीनों में श्रीविष्णु रहते तो क्षीर सागर में ही है लेकिन वो योग निंद्रा में चले जाते है जिसके कारण कोई भी मांगलिक कार्य संभव नहीं है। चातुर्मास का जैन धर्म में महत्व इन चार महीनों का जैन और बौद्ध धर्म में भी बड़ा महत्व बताया गया है। अगर आप जैन मुनियों को देखें तो वो सारा वर्ष भ्रमण करते हैं, लेकिन इन चार महीनों में वो एक ही स्थान पर रहकर सभी नियमों का पालन करते हैं। पुराणों के अनुसार आषाढ़ में वामन पूजा, श्रावण में शिव पूजा, भाद्रपद में गणेश और श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। इन चार महीनों में धर्म, जप और तप का बड़ा महत्व कहा गया है। ये चार माह मनुष्य को भगवान की सेवा करने में, उनकी कथा सुनने में और उनकी भक्ति करने में बिताने चाहिए।

चातुर्मास कथा:-भगवान विष्णु आखिर चार महीने योग निंद्रा में क्यों जाते हैं Read More »

भगवान शिव ने किया था विष्णु जी के पुत्रों का वध, जानें पौराणिक कथा

शिव ने लिया वृषभ अवतार और किया संहारदेवताओं और मनुष्‍यों की गुहार पर भोलेनाथ ने वृषभ यानी कि बैल अवतार धारण किया और पाताल लोक पहुंच गए। इसके बाद उन्‍होंने एक-एक करके भगवान विष्‍णु के सभी पुत्रों का संहार कर दिया। इस तरह उन्‍होंने तीनों लोकों को विष्‍णु के दानवीय पुत्रों के आतंक से बचाया। हिंदू धर्म में गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए बेहद खास माना जाता है. कहते हैं सच्चे मन से उनकी पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं भगवान विष्णु जरूर पूरा करते हैं. हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार गुरुवार को भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी संकटों से छुटकारा मिलता है. भगवान विष्णु जगत के पालनहार कहलाते हैं. मान्यता है कि गुरुवार के दिन अगर भक्त विष्णु जी की विधिवत पूजा करते हैं और गुरुवार के उपायों को आजमाते हैं तो उनके जीवन में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं रहती है. शिव पुराण में एक कथा यह मिलती है कि तीनों लोकों को दानवों से बचाने के लिए भोलेनाथ ने भगवान विष्‍णु के पुत्रों का संहार किया था. आइए जानते हैं ये संपूर्ण कथा. शिवपुराण के अनुसार अमृत मंथन के दौरान समुद्र से निकले अमृत को धारण करने के लिए देवताओं और दानवों के बीच भीषण युद्ध हुआ. इसपर विराम लगाने के लिए भगवान विष्‍णु मोहिनी का रूप लेक पहुंचें. दानवों ने जब मोहिनी का इतना सुंदर रूप देखा तो वह उस पर मोहित हो उठे. मोहिनी का रूप बनाए हुए भगवान विष्‍णु ने दानवों को छल से अमृत का पान करने से रोक लिया. इससे दुखी होकर दानव फिर से देवताओं के साथ युद्ध करने लगे लेकिन उनकी एक न चली. अपनी हार देखते हुए देवता पाताल लोक की ओर चले गए. श्री विष्‍णु ने वहां भी उनका पीछा किया. भगवान विष्णु जब दानवों के पीछे पाताल लोक पहुंचें तो उन्‍होंने देखा कि उनकी कैद में कुछ अप्‍सराएं थीं. वह सभी शिव भक्‍त थीं. भगवान विष्‍णु ने उन्‍हें दानवों से मुक्‍त कराया. उनके अनुपम मनमोहक छवि को देखकर सभी अप्‍सराएं मोहित हो गईं. अप्‍सराओं ने भगवान शिव की अनन्‍य भक्ति की. साथ ही वरदान में विष्‍णु जी को पति रूप में मांगा. भोलेनाथ ने माया रची और भगवान विष्‍णु को उनका पति बना दिया. कथा के अनुसार विवाह के बाद कुछ दिनों तक भगवान विष्णु पाताल लोक में ही रुके. इसके बाद उन अप्‍सराओं से विष्‍णु के पुत्रों का जन्‍म हुआ लेकिन सभी में दानवीय अवगुण थे. धीरे-धीरे उन पुत्रों ने तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरू कर दिया. देवता-मनुष्‍य सभी परेशान होकर भोलेनाथ की शरण में पहुंचे. देवताओं और मनुष्‍यों की गुहार पर भोलेनाथ ने वृषभ यानी कि बैल अवतार धारण किया और पाताल लोक पहुंच गए. इसके बाद उन्‍होंने एक-एक करके भगवान विष्‍णु के सभी पुत्रों का संहार कर दिया. इस तरह उन्‍होंने तीनों लोकों को विष्‍णु के दानवीय पुत्रों के आतंक से बचाया. शिवपुराण की कथा के अनुसार जैसे ही भगवान विष्‍णु को वृषभ द्वारा अपने पुत्रों के संहार की खबर मिली तो वह अत्‍यंत क्रोधित हो गए. क्रोध में ही वह वृषभ से लड़ने पहुंच गए लेकिन दोनों ही देवता थे तो लड़ाई का अंत नहीं हो रहा था. तब अप्‍सराओं ने भगवान शिव से विष्‍णु जी को उनके वरदान से मुक्‍त करने की प्रार्थना की. जैसे ही भगवान विष्णु अपने वास्‍तविक रूप में आए तो उन्‍हें संपूर्ण घटनाक्रम का बोध हुआ. इसके बाद उन्‍होंने शिव जी से अपने लोक जाने की आज्ञा मांगी और वापस विष्‍णुलोक लौट गए.

भगवान शिव ने किया था विष्णु जी के पुत्रों का वध, जानें पौराणिक कथा Read More »

श्री विष्णु मत्स्य अवतार पौराणिक कथा

मत्स्यावतार (मत्स्य = मछली का) भगवान विष्णु का अवतार है जो उनके दस अवतारों में से प्रथम है। इस अवतार में भगवान विष्णु ने इस संसार को भयानक जल प्रलय से बचाया था। साथ ही उन्होंने हयग्रीव नामक दैत्य का भी वध किया था जिसने वेदों को चुराकर सागर की गहराई में छिपा दिया था एक बार ब्रह्मा जी के पास से वेदों को एक बहुत बड़े दैत्य हयग्रीव ने चुरा लिया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोल-बाला हो गया। तब भगवान ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके उस दैत्य का वध किया और वेदों की रक्षा की। कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था, सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात् जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। जैसे ही सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ना चाहा, मछली बोली: राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जायेगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। इसी तरह राजा जिस भी पात्र में उस मछली को रखते वही छोटा हो जाता और मछली का आकार बढ़ता जाता। तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल किया। आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली: राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला: मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? आपका शरीर जिस गति से प्रतिदिन बढ़ता है, उसे दृष्टि में रखते हुए बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है कि आप अवश्य परमात्मा हैं। यदि यह बात सत्य है, तो कृपा करके बताइये के आपने मत्स्य का रूप क्यों धारण किया है? सचमुच, वह भगवान श्रीहरि ही थे। मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया: राजन! एक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत् में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुंचेगी, आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्तऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइयेगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूंगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूंगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। जल उमड़कर अपनी सीमा से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्तऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए, उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए। नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्यरूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े। सत्यव्रत और सप्तर्षिगण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे: हे प्रभो! आप ही सृष्टि के आदि हैं, आप ही पालक है और आप ही रक्षक ही हैं। दया करके हमें अपनी शरण में लीजिए, हमारी रक्षा कीजिए। सत्यव्रत और सप्तऋषियों की प्रार्थना पर मत्स्यरूपी भगवान प्रसन्न हो उठे। उन्होंने अपने वचन के अनुसार सत्यव्रत को आत्मज्ञान प्रदान किया और बताया: सभी प्राणियों मे, मैं ही निवास करता हूं। न कोई ऊंच है, न नीच, सभी प्राणी एक समान हैं, जगत् नश्वर है। नश्वर जगत् में मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है। जो प्राणी मुझे सबमें देखता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह अंत में मुझमें ही मिल जाता है। मत्स्य रूपी भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने उस दैत्य को मारकर, उससे वेद छीन लिए। भगवान ने ब्रह्मा जी को पुनः वेद दे दिए।

श्री विष्णु मत्स्य अवतार पौराणिक कथा Read More »

बहुत सरल हैं केले के पेड़ के 4 उपाय, कभी नहीं होगी आर्थिक तंगी, जेब रहेगी हमेशा गर्म

बहुत से ऐसे पेड़-पौधे हैं, जिन्हें हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है. लोग इन पेड़-पौधों की पूजा-अर्चना करते हैं. मान्यता है कि इन पेड़-पौधों में भगवान का वास होता है. इनमें प्रमुख हैं, तुलसी का पौधा, पीपल का वृक्ष, आंवला वृक्ष, केले का पेड़ आदि. इन वृक्षों का पूजन करना हिंदू धर्म में बहुत लाभकारी बताया जाता है. धर्म शास्त्रों केले के पेड़ को खास महत्व दिया गया है. माना गया है कि केले के पेड़ में भगवान विष्णु का वास होता है और इसके पत्तों और जड़ों में देव गुरु बृहस्पति का. गुरुवार के दिन विधि-विधान से केले के पेड़ की पूजा की जाए तो व्यक्ति की सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं और मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं. केले के पेड़ की उपयोगिता के बारे में बता रहे है केले के पेड़ के उपाय 1. माना जाता है कि यदि आपके घर में केले का पेड़ सही दिशा में लगा हो तो आपको जीवन में कभी भी दुख और दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ेगा. साथ ही यदि केले के पेड़ से जुड़े कुछ उपाय करें, तो यह आपके लिए बेहद लाभकारी साबित होगा. 2. हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, गुरुवार के दिन केले के पेड़ का पूजन करने से जीवन में आ रही आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है. साथ ही घर में सुख-समृद्धि और खुशियां आती हैं. 3. यदि आप भी अपने घर में सुख-समृद्धि और धन दौलत की चाह रखते हैं. तो इसके लिए आप अपने घर में चुपचाप से केले के पेड़ की जड़ लाकर रख दें. इसके बाद इसे गंगाजल से धोकर इसपर पीले रंग का धागा बांध दें. केले की इस जड़ को घर की तिजोरी या अपने धन स्थान पर रखें. माना जाता है कि इस उपाय को यदि गुरुवार के दिन किया जाए तो ये ज्यादा लाभकारी सिद्ध होता है. 4. ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि गुरुवार के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र धारण कर केले के पेड़ के पास जाकर, अपनी मनोकामना कहें. ध्यान रखें इस दौरान आपको कोई रोक-टोक ना करें. माना जाता है कि ऐसा करने से जल्द ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी.

बहुत सरल हैं केले के पेड़ के 4 उपाय, कभी नहीं होगी आर्थिक तंगी, जेब रहेगी हमेशा गर्म Read More »

क्‍या आप जानते हैं पूजा में केले के पत्तों को क्यों इतना महत्व दिया जाता है

केले के फल, तना और पत्तों को हमारे पूजा विधान में अनेक तरह से उपयोग किया जाता है. इसे शुभ और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है. यह भी मान्यता है कि केले जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व हिन्दू धर्म में भगवान की पूजा करते समय नियमों के पालन के साथ ही पूजा सामग्री का उपस्थित होना बेहद महत्वपूर्ण है। इसी पूजा सामग्री में खास वस्तु है केले का पत्ता और पान का पत्ता। आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें और जानें इन दोनों पत्तों का पूजा में महत्व जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व केले का वृक्ष शुभ और संपन्नता का प्रतीक है। यही वजह है कि केले का पौधा, हिंदू धर्म में काफी पवित्र माना जाता है। कहते हैं केले के वृक्ष में साक्षात भगवान विष्णु का वास होता है। भगवत पूजा में इसका उपयोग करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है और केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व गुरुवार को भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा में केले का विशेष महत्व है। इतना ही नहीं केले के पत्ते पर भोजन ग्रहण करने वाले को उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व केले के पत्तों को घर के प्रवेश द्वार पर शादी विवाह और कथा के दौरान मंडप बनाने के काम में भी लाया जाता है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व किसी भी शुभ कार्य से पहले या पूजा पाठ के दौरान पान के पत्ते के जरिये भगवान का नमन किया जाता है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पान के एक पत्ते में विभिन्न देवी-देवताओं का वास है। स्कंद पुराण के मुताबिक देवताओं द्वारा समुद्र मंथन के समय पान के पत्ते का प्रयोग किया गया था। यही वजह है कि पूजा में पान के पत्ते के इस्तेमाल का विशेष महत्व है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व पूजा में इस्तेमाल होने वाला पान का पत्ता हमेशा सही सलामत रूप में, चमकदार और कहीं से भी सूखा नहीं होना चाहिए। नहीं तो इससे व्यक्ति की पूजा साकार नहीं होती।

क्‍या आप जानते हैं पूजा में केले के पत्तों को क्यों इतना महत्व दिया जाता है Read More »

केले के पेड़ के बारे में जानकारी और कथा जाने

पौराणिक कथाओं के अनुसार केले के पेड़ की बहुत बड़ी अहमियत है। इस पेड़ को बहुत पवित्र माना जाता है। भगवान विष्णु और देव गुरू वृहस्पति को केले के पेड़ से जोड़ कर देखा जाता है। विष्णुजी को और पूजन कार्यो में इसका भोग लगाया जाता है। और ज्यादातर दक्षिण भारत में इसका बहुत ही बड़ा महत्व है। वहाँ इसके पत्तों मे भोजन करने का भी प्रचलन है। आइए जानते हैं इसके बारे में जानकारी  प्रतिबंध के पेड़ की जानकारी केले के पेड़ का हर हिस्सा काम मे आता है, इसके फल हर महीने मिल जाते हैं। यह पेड़ नहीं है क्योंकि इसमे लकड़ी नहीं होती है, लेकिन पत्तों से ही तना बना होता है। किनारों उसमे लिपटे होते हैं। इस पेड़ की जिंदगी तब तक होती है जब तक उसमे फल नहीं लग जाते, फल लगते ही और पकते ही इस पेड़ को काट दिया जाता है। विज्ञान के अनुसार इसका लाभ विज्ञान के अनुसार इस मे मुख्य तो विटामिन – ए, विटामिन – सी, थायमिन, राईबो- फ्लेविन, नियासिन और अन्य खनिज पदार्थ होते हैं। इसमे जल की मात्रा – 64.3%, प्रोटीन – 1.3%, कार्बोहाइड्रेट – 24.7% और चिकनाई – 8.3% हैं। केले के आयुर्वेदिक लाभ केले का एक एसा फल है जो हर मौसम में मिलता है। यह अत्यंत मधुर और पोष्टिक फल है। केला बहुत शक्तिशाली, मधुर, वीर्य और मांस बढ़ाने वाला फल हैं। यह दृष्टि दोष मे भी हितकारी है। पके केले के नियमित सेवन करने से शारीरिक कमज़ोरी दूर होती है और शरीर पुष्ट रहता है। यह कफ, रक्त पित्त, वात को नष्ट करता है। केले के वास्तु टिप्स घर के मुख्य द्वार और पिछले हिस्से में प्रतिबंध के पेड़ को ना लगाया गया। प्रतिबंध के पेड़ के आसपास साफ – सफाई रखी गई। गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करने से गुरु ग्रह से संबंधित समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। इसकी पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं इसके ज्योतिषी लाभ – इसमे गुरु ग्रह का वास होता है जिससे इसकी पूजा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। गुरुवार के गुरुवार को इसकी पूजा करने से गुरु ग्रह बलवान होता है। जिससे वैवाहिक जीवन में आने वाले सभी विधाओं से दूर हो जाता है। और सन्तान संबंधी समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है। उच्च शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति मे भी सहायता मिलती है। धन संबंधी परेशानियां दूर हो जाती है।  आइए जानते हैं केले के पेड़ की कथा पौराणिक कथाओं और शिव महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार देव राज इंद्र और देव गुरू वृहस्पति को अभिमान आ गया. दोनों को अभिमान अपने अपने पद को लेकर, वृहस्पति को अभिमान हुआ कि मे देव गुरु हूं, और इंद्र को अभिमान हुआ कि मैं देव राज हू. इसी अभिमान वस दोनों में चर्चा हुई  कि सभी देवी-देवता हमारा सत्कार करते हैं, हमे प्रणाम करते हैं लेकिन महादेव शंकर हमारा सत्कार नहीं करते, हमे प्रणाम नहीं किया करते. दोनों ने अभिमान के वस मे यह बात कही, अब तो शिव जी से बात करनी ही पड़ेगी. यह कहते हुए दोनों (इंद्र और वृहस्पति) शिव जी से बात करने के लिए कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े उधर भगवान शिव ने दोनों (इंद्र और वृहस्पति) की बातों को भाप लिया और अपना फक्कड़ (भिकारी) का भेष बनाकर कैलाश पर्वत के बाहर बैठ गए. जैसे ही इंद्र और वृहस्पति  दोनों कैलाश पर्वत पहुंचे भगवान शिव से मिलने तो उन्होंने कैलाश पर्वत के बाहर बैठे भिखारि को देख कर, उससे कहा कि कहां है तेरा भोला शिव जा और उससे बोल की देवराज और देवगुरु आए हैं, आकार उनका सत्कार करो, लेकिन उस भिखारि ने कोई जवाब नहीं दिया. इंद्र और वृहस्पति के बार बार कहने पर भी जब भिखारि ने कोई जवाब नहीं दिया तो अभिमान से भरे हुए इंद्र और वृहस्पति को क्रोध आ गया. और इंद्र ने भिखारि के बाल पकड़कर उस पर बज्र का प्रहार कर दिया. इंद्र के बज्र से प्रहार करते ही भिखारि के भेष लिए स्वयं शिव के आँखों में से आंसू आ गए. और आंसू आते ही शिव असली रूप मे आ गए और दोनों को श्राप दे दिया. इंद्र को श्राप दिया कि हे इंद्र तू देवताओ का राजा होते हुए भी अभिमानी है, अतः तेरा राज्य दैत्यों के द्वारा छीन लिया जाएगा. और वृहस्पति को श्राप दिया कि हे वृहस्पति तू गुरु है, तेरे पास प्रेम और त्याग नाम की कोई वस्तु नहीं है, तू ज्ञानी होते हुए भी तेरी बुद्धी जड़ के समान है, अतः मैं तुझे श्राप देता हूं कि आज से तू जड़ वृक्ष बन जाए. श्राप मिलते ही इंद्र और वृहस्पति को ज्ञान हुआ, उनकी बुद्धी मे लगा अभिमान का पर्दा हटा और उनको एहसास हुआ कि ये हमने क्या कर दिया, दोनों महादेव शिव के चरणों में घिर गए और अपने किए हुए कृत्य के लिए क्षमा मांगने लग गए. तब शिव जी ने दोनों को क्षमा किया और दोनों को अपने चरणों से उठाकर कहा कि मेरा दिया हुआ श्राप तो झूठा नहीं हो सकता है. लेकिन हे इंद्र जब जब भी दानव तेरा राज्य छीन लेंगे तो तब तब हम देव (मैं शिव और विष्णु) तेरा राज्य दानवों से बचा लेंगे. और वृहस्पति से कहा कि हे वृहस्पति मेरे श्राप के कारण तू जड़ वृक्ष तो बनेगा, पर मैं शिव तुझे आशीर्वाद देता हूं कि तेरा वृक्ष सर्वश्रेष्ठ वृक्ष होगा और वह केले के पेड़ के नाम से प्रसिद्ध होगा. वह एसा वृक्ष होगा कि ना अग्नि उसे जला सकेगी और ना पानी उसे गला सकेगा और तेरा फल बारह मास में उपलब्ध होता रहेगा. और लोग इसकी पूजा करेंगे और इसमे स्वयं भगवान विष्णु का निवास होगा. तब से ही देवगुरु वृहस्पति पेड़ के रूप में प्रकट हुए और केले के पेड़ के रूप में सदा के लिए पुज्य हुए.

केले के पेड़ के बारे में जानकारी और कथा जाने Read More »