शिव के 10 अवतार के नाम

शिवजी त्रिदेवों में से एक हैं. ब्रह्मदेव जहां सृष्टि के रचयिता माने गए हैं, वहीं विष्णु पालक और शिव संहारक माने गए हैं. विष्णु को हरि और शिव को हर कहा जाता है. धर्मशास्त्रों में हरि के 24 अवतारों का वर्णन है, उसी प्रकार ‘हर’ के 19 अवतारों का उल्लेख है. यहां आज हम आपको शिव महापुराण में बताए गए शिव जी के कुछ अंश अवतारों का उल्लेख करेंगे. शिवजी ने कई रुद्रावतार लिए, जिनमें 11वें रुद्र अवतार महावीर हनुमान माने गए हैं. शिवजी का पहला स्वरूप ‘महाकाल’ को माना गया है. यही वह रूप है, जो संहार का प्रतीक है. इन्‍हें काल भी कहा जाता है. जब कोई भी प्राणी देह त्यागता है तो ‘काल’ का नाम आता है. बहुत सारे भक्तजन शिवजी को ‘महाकाल’ ही कहते हैं. 1.योगीश्वर सद्गुरु: योग के पथ पर होने का अर्थ है कि आप अपने जीवन में एक ऐसे चरण पर आ गए हैं जहाँ आपने अपने भौतिक शरीर की सीमाओं को जान लिया है। आपने भौतिक सीमाओं से परे जाने की आवश्यकता को महसूस किया है – आप स्वयं को इस असीम ब्रह्माण्ड में भी बँधा हुआ पा रहे हैं। आप यह देखने योग्य हो गए हैं कि अगर आप छोटी सीमा में बंध सकते हैं, तो आप कहीं न कहीं विशाल सीमा में भी बंध सकते हैं। आपको ये बात समझने के लिए ब्रह्माण्ड के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने की ज़रूरत नहीं है। यहीं बैठे आप जानते हैं कि अगर यह सीमा आपके लिए बाधा बन रही है तो विशाल ब्रह्माण्ड भी कभी आपके लिए बाधा बन जाएगा – दूरियाँ लांघने की क्षमता आने से ये आपके अनुभव में आ जाएगा। एक बार आपकी दूरियाँ लांघने की क्षमता बढ़ेगी, तो आपके लिए किसी भी तरह की सीमा बाधा बन जाएगी। जब आप इसे एक बार जान और समझ लेंगे, जब आप उस तड़प को जान लेंगे, जिसे भौतिक रूप से पूरा नहीं किया जा सकता – तो आप योग की खोज करना शुरू करते हैं। योग का अर्थ है भौतिक सीमाओं के बंधनों से आजाद होना। आपका प्रयास केवल भौतिकता पर महारत जासिल करना नहीं, पर इसकी सीमा को तोड़ते हुए, ऐसे आयाम को छूना है, जो भौतिक प्रकृति नहीं रखता। आप ऐसी दो चीज़ों को जोड़ना चाहते हैं – जिनमें एक सीमा में कैद तथा दूसरी असीम है। आप सीमाओं को अस्तित्व की असीम प्रकृति में विलीन करना चाहते हैं, इसलिए, योगेश्वराय। 2.भूतेश्वर यह सारी भौतिक सृष्टि – जिसे हम देख, सुन, सूंघ, छू व चख सकते हैं – यह देह, यह ग्रह, ब्रह्माण्ड, सब कुछ – यह सब कुछ पंच तत्वों का ही खेल है। केवल पंच तत्वों की मदद से कैसी अद्भुत शरारत – ये ‘सृष्टि’ रच दी गई है! केवल पंच तत्व, जिन्हें आप एक हाथ की अंगुलियों से गिन सकते हैं, इसने कितनी चीज़ें तैयार की गई हैं। सृजन इससे अधिक करुणामयी नहीं हो सकता। अगर ये कहीं पचास लाख तत्व होते तो आप कहीं खो कर रह जाते। पंच भूतों के रूप में जाने गए, इन तत्वों को साधना ही सब कुछ है – आपकी सेहत, आपका कल्याण, इस जगत में आपका बल और अपनी इच्छा से कुछ रचने की योग्यता। जाने-अनजाने, चेतन या अचेतन तौर पर, व्यक्ति किसी हद तक इन विभिन्न आयामों को साध लेते हैं। वे कितना नियंत्रण रखते हैं, उसी से उनकी देह, मन और उनके द्वारा होने वाले कामों और उनकी सफलता की प्रकृति सुनिश्चित होती है – या उनकी दृष्टि या समझ कहां तक जा सकती है आदि तय होता है। भूत भूत भूतेश्वराय का अर्थ है कि जो भी जीवन के पंच भूतों को साध लेता है, वह कम से कम भौतिक जगत में, अपने जीवन की नियति या भाग्य को तय कर सकता है। 3.कालेश्वर काल – समय। भले ही आपने पांचों तत्त्वों को अपने बस में कर लिया हो, इस असीम के साथ एकाकार हो गए हों या आपने विलय को जान लिया हो – जब तक आप यहाँ हैं, समय चलता जा रहा है। समय को साधना, एक बिलकुल ही अलग आयाम है। काल का अर्थ केवल समय नहीं, इसका एक अर्थ अंधकार भी है। समय अंधकार है। समय प्रकाश नहीं हो सकता क्योंकि प्रकाश समय में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाता है। प्रकाश समय का दास है। प्रकाश एक ऐसा तत्व है, जिसका एक आदि और अंत है। समय वैसा तत्व नहीं है। हिंदू जीवनशैली के अनुसार, वे समय के छह अलग-अलग आयाम हैं। एक बात तो आपको जाननी ही होगी – जब आप यहाँ बैठे हैं, तो आपका समय तेज़ी से भाग रहा है। मृत्यु के लिए तमिल में बहुत सटीक शब्द या अभिव्यक्ति है – कालम् आइटांगा- ‘उसका समय समाप्त हो गया।’ अंग्रेज़ी में भी हम कुछ समय पहले ऐसा कहते थे, ‘वह एक्सपायर हो गया।’ किसी दवा की तरह इंसान की भी एक्सपायरी डेट होती है। आपको लग सकता है कि आप कई जगहों पर जा रहे हैं। नहीं, जहाँ तक आपके शरीर का संबंध है, यह सीध कब्र की ओर जा रहा है, एक क्षण के लिए भी इसकी यात्रा नहीं थमती। आप इसे धीमा तो कर सकते हैं किंतु यह अपनी दिशा नहीं बदलता। जब आप बड़े होंगे तो धीरे-धीरे जान सकेंगे कि यह धरती आपको वापस निगलने की तैयारी में है। जीवन अपनी बारी पूरी करता है। समय जीवन का एक विशेष आयाम है – यह अन्य तीन आयामों के साथ मेल नहीं खाता। और ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं में से, यह सबसे अधिक रहस्यमयी है। आप इसकी व्याख्या नहीं कर सकते क्योंकि यह है ही नहीं। यह अस्तित्व के ऐसे किसी भी रूप में नहीं है, जिनकी आपको समझ है। यह सृष्टि का सबसे शक्तिशाली आयाम है, जो सारे ब्रह्माण्ड को एक साथ थामे रखता है। इसी के कारण आधुनिक भौतिकी भ्रम में है कि गुरुत्वाकर्षण कैसे काम करता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण है ही नहीं। यह समय ही है जो सब कुछ एक साथ बाँधे रखता है। 4.शिव-सर्वेश्वर-शंभो शिव का अर्थ है, ‘जो है ही नहीं, जो विलीन हो गया।’ जो है ही नहीं, हर चीज़ का आधार नहीं, और वही असीम सर्वेश्वर है। शंभो केवल एक मार्ग और एक कुँजी

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सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा क्या बताती है, नहीं जानते हैं तो यहां पढ़ें

20 अप्रैल 2023 को सूर्य ग्रहण है. करीब 19 साल बाद मेष राशि में सूर्य ग्रहण रहेगा. क्या आप जानते हैं ग्रहण का संबंध समुद्र मंथन से है. आइए जानते हैं कैसे 20 अप्रैल 2023 को सूर्य ग्रहण है.भारतीय समयानुसार, यह सूर्य ग्रहण इन देशों में सुबह 07 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 39 मिनट तक रहेगा. यह सूर्य ग्रहण अश्विनी नक्षत्र में लगेगा, इस नक्षत्र का स्वामी केतु है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार करीब 19 साल बाद मेष राशि में सूर्य ग्रहण रहेगा. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाता है तब सूर्य ग्रहण लगता है, जिससे सूर्य पूर्ण या आंशिक रूप से छिप जाता है. सूर्य का प्रकार पृथ्वी तक सीधे नहीं पहुंता, इस घटना को सूर्य ग्रहण करते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं ग्रहण का संबंध समुद्र मंथन से है. आइए जानते हैं कैसे. समुद्र मंथन से जुड़ी है ग्रहण की कथा  विष्णु पुराण के अनुसार प्राचीन काल में देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, इसमें से 14 रत्न निकले थे. मंथन के दौरान जब अमृत निकला तो असुर और देवता इसे ग्रहण करने के लिए युद्ध पर उतारु हो गए. कभी देवता कलश लेकर भागते तो कभी दैत्य. विवाद बढ़ता देख श्रीहरि विष्णु ने इस समस्या का समाधान निकाला और नारायण ने स्वंय मोहिनी बनकर अमृत पिलाने की जिम्मेदारी ले ली. मोहिनी का सुंदर रूप देखकर सभी दैत्य जैसे उन पर मोहित हो गए. मोहिनी के मायाजाल में फंसे असुर विष्णु जी जानते थे कि अगर दैत्यों ने अमृतपान कर लिया तो वह अमर हो जाएंगे और समस्त सृष्टि पर संकट में आ जाएगी. एक तरफ जहां देवता अमृतपान कर रहे थे, मोहिनी के मायाजाल में फंसकर दैत्य अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. दैत्यों में एक अति चतुर असुर था स्वरभानु, वह विष्णु जी की इस चाल को समझ गया. अमृत पाने के लिए उसने देवता का रुप धारण कर चुपचाप अमृत ग्रहण करने देवताओं की पंक्ति में जा बैठा. राहु-केतु के कारण लगता है ग्रहण चंद्र और सूर्य ने स्वरभानु को पहचान गए और सारा वृतांत विष्णु जी से कह दिया. नारायण अत्यंत क्रोधित हुए और सुदर्शन चक्र से राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया, चूंकि उस दैत्य ने अमृत की कुछ बूंदे ग्रहण कर ली थी इसलिए वह राहु और केतु के रूप में अमर हो गया. राक्षस का सिर राहु और धड़ केतु कहलाया. तभी से राहु-केतु, चंद्र और सूर्य को अपना शत्रु मानते हैं और समय-समय पर इन ग्रहों को ग्रसते (खाते) है. धर्म में इस घटना को सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण कहा जाता है. अक्सर पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण लगता है तो वहीं अमावस्या पर सूर्य ग्रहण. ग्रहण के समय राहु-केतु की अशुभ छाया से बचने के उपाय सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय राहु-केतु और नकारात्मक शक्तियों का संचार तेज हो जाता है. ग्रहण में पाप ग्रहों की अशुभ छाया से बचने के लिए शिव जी के मंत्रों का जाप करें. राहु-केतु शिव के परम भक्त हैं. महादेव साधना करने वालों पर बुरी शक्तियों, पाप ग्रहों के दुष्प्रभाव का असर नहीं होता. सूर्य ग्रहण की अवधि में ॐ शीतांशु, विभांशु अमृतांशु नम: या गायत्री मंत्र का निरंतर जाप करते रहना चाहिए. मान्यता है इससे मानसिक और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है और किसी तरह की आर्थिक हानि नहीं होती.

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हिंदू धर्म के 10 पवित्र वृक्ष, जानिए उनका रहस्य

हिंदू धर्म का वृक्ष से गहरा नाता है। हिंदू धर्म को वृक्षों का धर्म कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि हिंदू धर्म में वृक्षों का जो महत्व है वह किसी अन्य धर्म में शायद ही मिले। इस ब्रह्मांड को उल्टे वृक्ष की संज्ञा दी है। पहले यह ब्रह्मांड बीज रूप में था और अब यह वृक्ष रूप में दिखाई देता है। प्रलय काल में यह पुन: बीज रूप में हो जाएगा। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता। इसी तरह धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की विवेचना की गई है। यहां प्रस्तुत है ऐसे दस वृक्ष जिनकी रक्षा करना हर हिंदू का कर्तव्य है और इनको घर के आसपास लगाने से सुख, शांति और समृद्धि की अनुभूति होती है। किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता। पीपल देव  हिंदू धर्म में पीपल का बहुत महत्व है। पीपल के वृक्ष को संस्कृत में प्लक्ष भी कहा गया है। वैदिक काल में इसे अश्वार्थ इसलिए कहते थे, क्योंकि इसकी छाया में घोड़ों को बांधा जाता था। अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। औषधीय गुणों के कारण पीपल के वृक्ष को ‘कल्पवृक्ष’ की संज्ञा दी गई है। पीपल के वृक्ष में जड़ से लेकर पत्तियों तक तैंतीस कोटि देवताओं का वास होता है और इसलिए पीपल का वृक्ष प्रात: पूजनीय माना गया है। उक्त वृक्ष में जल अर्पण करने से रोग और शोक मिट जाते हैं। पीपल के प्रत्येक तत्व जैसे छाल, पत्ते, फल, बीज, दूध, जटा एवं कोपल तथा लाख सभी प्रकार की आधि-व्याधियों के निदान में काम आते हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पीपल को अमृततुल्य माना गया है। सर्वाधिक ऑक्सीजन निस्सृत करने के कारण इसे प्राणवायु का भंडार कहा जाता है। सबसे अधिक ऑक्सीजन का सृजन और विषैली गैसों को आत्मसात करने की इसमें अकूत क्षमता है। पीपल परिक्रमा स्कन्द पुराण में वर्णित पीपल के वृक्ष में सभी देवताओं का वास है। पीपल की छाया में ऑक्सीजन से भरपूर आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है। इस वातावरण से वात, पित्त और कफ का शमन-नियमन होता है तथा तीनों स्थितियों का संतुलन भी बना रहता है। इससे मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। पीपल की पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। इसके कई पुरातात्विक प्रमाण भी है। अश्वत्थोपनयन व्रत के संदर्भ में महर्षि शौनक कहते हैं कि मंगल मुहूर्त में पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढ़ाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है। पीपल के दर्शन-पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है। अश्वत्थ व्रत अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है। पीपल पूजा  शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और सात परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसो के तेल के दीपक को जलाकर छायादान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। अनुराधा नक्षत्र से युक्त शनिवार की अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के पूजन से शनि पीड़ा से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से सभी तरह के संकट से मुक्ति मिल जाती है। बरगद या वटवृक्ष बरगद को वटवृक्ष कहा जाता है। हिंदू धर्म में वट सावत्री नामक एक त्योहार पूरी तरह से वट को ही समर्पित है। पीपल के बाद बरगद का सबसे ज्यादा महत्व है। पीपल में जहां भगवान विष्णु का वास है वहीं बरगद में ब्रह्मा, विश्णु और शिव का वास माना गया है। हालांकि बरगद को साक्षात शिव कहा गया है। बरगद को देखना शिव के दर्शन करना है। हिंदू धर्मानुसार पांच वटवृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त पांच वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है। आम है खास हिंदू धर्म में जब भी कोई मांगलिक कार्य होते हैं तो घर या पूजा स्थल के द्वार व दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ लगाकर मांगलिक उत्सव के माहौल को धार्मिक और वातावरण को शुद्ध किया जाता है। अक्सर धार्मिक पंडाल और मंडपों में सजावट के लिए आम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। आम के वृक्ष की हजारों किस्में हैं और इसमें जो फल लगता है वह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आम के रस से कई प्रकार के रोग दूर होते हैं। भविष्यवक्ता शमी विक्रमादित्य के समय में सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर ने अपने ‘बृहतसंहिता’नामक ग्रंथ के ‘कुसुमलता’नाम के अध्याय में वनस्पति शास्त्र और कृषि उपज के संदर्भ में जो जानकारी प्रदान की है उसमें शमीवृक्ष अर्थात खिजड़े का उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है। बिल्व वृक्ष बिल्व अथवा बेल (बिल्ला) विश्व के कई हिस्सों में पाया जाने वाला वृक्ष है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम, पारिजात और पलाश आदि वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं। बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में ‘स्कंदपुराण’

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रोज 10 मिनट तक रगड़ें नाखून, बालों में दिखेंगे कई बड़े फायदे

नाखून रगड़ने की प्रकिया कोई नई नहीं है. कई सदियों से लोग ऐसा करते आ रहे हैं. एक्यूप्रेशर थैरेपी में भी नाखून रगड़ने को काफी अहमियत दी जाती है. आपने कुछ लोगों को बैठे-बैठे नाखून रगड़ते हुए देखा होगा तो आपके मन में सवाल आता होगा कि आखिर ये व्यक्ति ऐसा क्यों कर रहा है. ऐसे में आपको बता दें कि दुनिया के कई बड़े-बड़े योग गुरु नाखून रगड़ने की सलाह देते हैं. इससे आपको कई तरह की बीमारियों से निजात मिलेगी. इस प्रकिया को बालयाम कहा जाता है. ऐसा करने से आपके बालों को राहत मिलती है. होती है कई समस्याएं नाखून रगड़ने की प्रकिया कोई नई नहीं है. कई सदियों से लोग ऐसा करते आ रहे हैं. एक्यूप्रेशर थैरेपी में भी नाखून रगड़ने को काफी अहमियत दी जाती है. खराब लाइफ स्टाइल, जंक फूड खाना, प्रोटीन और कैल्शियम की कमी होना, समय पर खाना नहीं खाना आदि बातों से कई प्रकार की परेशानियां होने लग जाती हैं. नाखूनों को रगड़ने से आपके बालों का झड़ना, सफेद होना, कमजोर होना और गंजापन आने जैसी परेशानी से आपको राहत मिलेगी. इससे आपके शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है. जिससे आपके शरीर में ताकत आती है और चेहरे पर निखार आता है. इसके अलावा नाखून को बार-बार रगड़ने से आपकी त्वचा बेहतर होती है और चर्म रोग दूर हो सकता है. बालायाम करने से आपके झड़े हुए बालों को दोबारा उगाया जा सकता है. बालायाम करने के लिए आप अपने दोनों हाथों को सीने के पास लाए और अंगुलियों को अंदर की तरफ मोड़ें और रगड़ें. जितनी देर हो सके इस प्रक्रिया को करें. कम से कम आप रोजाना 5-10 मिनट ऐसा करें. बता दें कि प्रेग्नेंट महिलाएं ऐसा न करें क्योंकि ऐसा करने से गर्भाशय में संकुचन हो सकता है जो कि नुकसानदायक है.  

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भगवान विष्णु के चरणों से निकला अमृत है गंगा

नीराकार ब्रह्म अर्थात् जलरूप ब्रह्म या द्रवरूप में ब्रह्म कोई ‘नराकार ब्रह्म’ (राम, कृष्ण) को भजता है , तो कोई ‘निराकार ब्रह्म’ को; परन्तु कलियुग में मनुष्य के पाप-तापों की शान्ति ‘नीराकार ब्रह्म’ से ही होती है । हिन्दी में ‘नीर’ जल को कहते हैं । ‘द्रव’ तरल पदार्थ को कहते हैं । अत: नीराकार ब्रह्म का अर्थ है ‘भगवान का जलमय रूप’ और यह रूप है मां गंगा मनुष्यों के तापों की शान्ति के लिए ब्रह्म का द्रवरूप होना गंगा को ‘ब्रह्मद्रव’ भी कहते हैं । ‘ब्रह्मद्रव’ का अर्थ है आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक (शारीरिक, मानसिक और भौतिक)—इन तीनों तापों से पीड़ित मनुष्यों की दशा से परमात्मा (ब्रह्म) का द्रवित होकर उनके तापों की शान्ति के लिए जल रूप में अवतरित होना । ताप चाहे कैसा भी हो उसकी शान्ति जल से ही होती है ।  गंगा का एक नाम ‘ब्रह्माम्बु’ है । अम्बु जल को कहते हैं, इसलिए ब्रह्म + अम्बु अर्थात् जलरूप ब्रह्म । भगवान की प्रत्येक लीला के पीछे लोककल्याण ही छिपा होता है । भगवान के जलमय रूप होने के पीछे भी कलियुग में मानव का कल्याण ही छिपा है । यदि गंगा का धरती पर अवतरण न हुआ होता तो कलियुग में मनुष्यों के पापों का मल कैसे धुलता? गंगा सप्तमी 2023 देवी गंगा के सम्मान का दिन भगवान विष्णु का चरणामृत है गंगा आदिकवि वाल्मीकि ने अपने ‘गंगाष्टक’ में गंगा को ‘मुरारि का चरणामृत’ कहा है । अपने प्रभु विष्णु का चरणामृत जानकर भगवान शंकर ने ब्रह्मस्वरूपिणी गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया है । कवि रसखान ने तो यहां तक कह दिया कि गंगा समस्त व्याधियों की सर्वोत्तम औषधि है इसीलिए भगवान शंकर अपने मस्तक पर स्थित गंगा के भरोसे ही आक-धतूरे चबाते रहते हैं और उन्हीं के भरोसे उन्होंने हलाहल विष का पान कर लिया— ‘आक धतूरो चबात फिरैं,विष खात फिरैं सिव तोरे भरोसे ।। भगवान की विभूति है गंगा गंगा भगवान के चरणों से उत्पन्न हुई है, विष्णुपदी है, उसका महत्व केवल इतना ही नहीं है; अपितु गंगा साक्षात् परमात्मा की विभूति है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (१०।३१) में गंगा को अपना स्वरूप बतलाते हुए कहा है—‘स्तोत्रसामस्मि जाह्नवी ।’   गंगा ब्रह्मजल है, उसमें भगवान के गुण होने के कारण वह सदैव शुद्ध, पवित्र व निर्विकार रहने वाला दिव्य पदार्थ है । इसीलिए वह शारीरिक व मानसिक रोगों को दूर करने व सांसारिक भोगों के साथ मोक्ष प्रदान करने की भी क्षमता रखता है गंग सकल मुद मंगल मूला ।सब सुख करनि हरनि सब सूला ।। (राचमा २।८७।४) गंगा के द्रवरूप में आविर्भाव की कथाएं वास्तव में गंगा गोलोक या विष्णुलोक में भगवान श्रीहरि की ही एक स्वरूपाशक्ति हैं । गंगा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक कथाएं है । यहां गंगा के नीराकार ब्रह्मस्वरूप को दर्शाती दो पौराणिक कथाओं का उल्लेख किया जा रहा है । ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृतिखण्ड) में गंगा की द्रवरूप में उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है श्रीराधाकृष्ण का जलरूप है गंगा एक बार गोलोक में श्रीकृष्ण कार्तिक पूर्णिमा के दिन रासमहोत्सव मना रहे थे । रासमण्डल में श्रीकृष्ण श्रीराधा की पूजा कर विराजमान थे । उसी समय श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए सरस्वती प्रकट हुईं और उन्होंने अपनी मधुर स्वरलहरी में गीत गाकर और दिव्य वीणा के वादन से सारा वातावरण झंकृत कर दिया । उसी समय भगवान शंकर भी श्रीकृष्ण सम्बन्धी सरस पद गाने लगे । उसे सुनकर सभी देवगण मूर्छित हो गए । जब उनकी चेतना लौटी तब वहां श्रीराधाकृष्ण के स्थान पर सारे रासमण्डल में जल-ही-जल फैला हुआ था । सभी गोप-गोपी और देवगण भगवान श्रीराधाकृष्ण को न पाकर विलाप करते हुए उनसे पुन: प्रकट होने की प्रार्थना करने लगे । तब भगवान श्रीकृष्ण  ने आकाशवाणी द्वारा कहा मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण और मेरी स्वरूपाशक्ति श्रीराधा—हम दोनों ने ही भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए यह जलमय विग्रह (नीराकार स्वरूप) धारण कर लिया है ।’ यदि कोई मनुष्य गंगा का जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन नहीं करेगा वह नरक का भागी होगा । वे ही पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण और राधा जलरूप होकर गंगा बन गए और वह दिव्य जलराशि ही ‘देवनदी’ गंगा के नाम से प्रसिद्ध हुई । गोलोक से प्रकट होने वाली गंगा का यही रहस्य है । श्रीमद्देवीभागवत में गंगा के ब्रह्मद्रव रूप में आविर्भाव की कथा दक्षकन्या सती के देहत्याग करने पर जब भगवान शिव तप करने लगे, तब देवताओं ने जगन्माता की स्तुति कर उनसे दोबारा भगवान शंकर का वरण करने की प्रार्थना की । देवी ने तब प्रसन्न होकर कहा मैं दो रूपों में पर्वतराज हिमालय और मैना के घर प्रकट होऊंगी ।’ पहले वे अपने अंश रूप से वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को गंगा रूप में प्रकट हुईं फिर पूर्णावतार धारणकर पार्वती के रूप में प्रकट हुईं । हिमालय के घर में सती का अंशावतार गंगा के रूप में प्रकट होने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोचा कि सती के छायाशरीर को लेकर जब शिवजी ताण्डव कर रहे थे तो उनके पैरों के आघात से पृथ्वी रसातल में जाने लगी । जगत की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से छायासती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे, उस अपराध के कारण भगवान शिव अभी तक हमसे रुष्ट हैं । यदि हम गंगा को शिवजी को प्रदान कर दें तो वे हमसे अवश्य प्रसन्न हो जाएंगे जैसे छायासती भगवान शिव के सिर पर स्थित रहीं वैसे ही ये गंगा जलरूप में उनके सिर पर सुशोभित रहेंगी । गंगा की ब्रह्मलोक से भूलोक तक की यात्रा ब्रह्माजी सहित सभी देवगण हिमालय के घर गंगा को मांगने के लिए पहुंच गए और उन्हें सारी बात बता दी । गिरिसुता गंगा पिता की आज्ञा से सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी के कमण्डलु में निराकार रूप से स्थित हो कर स्वर्गलोक में आ गयीं ।  जब उनकी माता मैना को यह बात पता चली तो उन्होंने गुस्से में शाप देते हुए कहा माता से बिना बात किए तुम स्वर्ग चलीं गयीं, इसलिए तुम्हें जलरूप में पुन: पृथ्वी पर आना होगा ।’ ब्रह्माजी ने मूर्तिमान गंगा को शंकरजी को दे दिया और वे शंकरजी के साथ कैलास चली गयीं । ब्रह्माजी की प्रार्थना पर एक अंश से वे निराकार रूप में उनके कमण्डलु में स्थित हो गयीं और ब्रह्माजी उन्हें ब्रह्मलोक में ले गए । गंगा के शंकरजी

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गंगा सप्तमी 2023 देवी गंगा के सम्मान का दिन

गंगा सप्तमी को ज्यादातर भारत के उत्तरी भागों में बहुत जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में, गंगा नदी को सबसे पवित्र नदी माना जाता है और इसे देवी के रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार, गंगा सप्तमी को हिंदुओं के लिए एक शुभ दिन माना जाता है और यह देवी गंगा को समर्पित है। इसे जाह्नु सप्तमी के रूप में भी जाना जाता है, और गंगा पूजन वह दिन है जिसे देवी गंगा के पुनर्जन्म का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, गंगा सप्तमी वैशाख महीने के दौरान चंद्रमा के वैक्सिंग चरण के 7 वें दिन मनाई जाती है, जिसे बैशाख के नाम से भी जाना जाता है, यानी शुक्ल पक्ष की सप्तमी को। इस दिन, अधिकांश हिंदू तीर्थ स्थानों में भक्तों द्वारा विशेष पूजा और प्रार्थना की जाती है, जहां गंगा नदी उत्तराखंड में ऋषिकेश, इलाहाबाद में त्रिवेणी संगम आदि से गुजरती है। आइए जानते हैं गंगा सप्तमी का महत्व और इस पर्व के पीछे की कथा गंगा सप्तमी 2023 तिथि और समय इस वर्ष गंगा सप्तमी 27 अप्रैल, 2023 को मनाई जाएगी। महत्वपूर्ण समय नीचे दिए गए हैं गंगा सप्तमी मध्याह्न मुहूर्त – सुबह 11 बजे से दोपहर 01:38 बजे तकअवधि – 02 घंटे 38 मिनटसप्तमी तिथि शुरू – 26 अप्रैल 2023 को सुबह 11:27 बजेसप्तमी तिथि समाप्त – 27 अप्रैल 2023 को दोपहर 1:38 बजेगंगा सप्तमी की कथा और महत्व सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण और नारद पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में गंगा सप्तमी के पीछे के महत्व और कथा का उल्लेख है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि देवी गंगा सबसे पहले ‘गंगा दशहरा’ के दिन पृथ्वी पर आई थीं। लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि संत जह्नु ने गंगा नदी का जल पी लिया। हालांकि, देवताओं और राजा भगीरथ के अनुरोध के बाद, ऋषि जाह्नु ने वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन एक बार फिर गंगा को छोड़ दिया। तब से, इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है, और यह देवी गंगा के पुनर्जन्म का प्रतीक है। इसके अलावा, ऋषि जाह्नु की बेटी होने के कारण, देवी गंगा को ‘जाह्नवी’ भी कहा जाता है, और परिणामस्वरूप, इस दिन को ‘जह्नु सप्तमी’ भी कहा जाता है। भारत में गंगा नदी को बहुत पवित्र माना जाता है। गंगा सप्तमी पर किए जाने वाले समारोह और अनुष्ठान उन स्थानों में बहुत प्रसिद्ध हैं जहां गंगा और उसकी सहायक नदियां बहती हैं। हिंदू भक्तों के लिए, जो देवी गंगा की पूजा करते हैं, यह दिन बहुत ही आशाजनक है, और वे पवित्र जल में डुबकी भी लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि गंगा नदी में पवित्र स्नान करने से लोगों को उनके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कई हिंदू भक्त भी गंगा नदी के पास अंतिम संस्कार करने की इच्छा रखते हैं क्योंकि यह उन्हें मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है। ज्योतिष की दृष्टि से भी यह पर्व महत्वपूर्ण है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इस दिन देवी गंगा की पूजा करने से व्यक्ति मंगल दोष के प्रभाव को कम कर सकता है, क्योंकि यह जन्म कुंडली में ‘मंगल’ के प्रभाव को कम करता है। गंगा सप्तमी पर किए जाने वाले अनुष्ठान इस दिन आपको कुछ अनुष्ठानों का पालन करना चाहिए: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर गंगा नदी में पवित्र स्नान करें। इसके अलावा, देवी गंगा की पूजा करें, क्योंकि यह बहुत अनुकूल मानी जाती है।कोई गंगा नदी के पार एक माला विसर्जित कर सकता है और प्रसिद्ध गंगा आरती में भाग ले सकता है। गंगा आरती का विशेष महत्व है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन “माँ गंगा” स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होती है।यह कई घाटों पर किया जाता है और भारत के विभिन्न हिस्सों से लाखों भक्त इस आरती में भाग लेते हैं।गंगा आरती समाप्त होने के बाद, संत अपने आस-पास मौजूद सभी लोगों को दीपक प्रसारित करते हैं। अपने नीचे किए हुए हाथों को लौ पर रखें और शुद्धि और आशीर्वाद लेने के लिए अपनी हथेलियों को माथे पर उठाएं। यहां, आरती में छोटे दीये और फूल होते हैं जिन्हें बाद में नदी में बहा दिया जाता है।गंगा सप्तमी के दिन दीपदान की रस्म या दीप या दीपक का दान किया जाता है। पवित्र नदी के किनारे विशाल मेलों का भी आयोजन किया जाता है।गंगा सप्तमी के दिन गंगा सहस्रनाम स्तोत्र और ‘गायत्री मंत्र’ का पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है। अंत गंगा को हिंदुओं के लिए एक ‘देवी’ या देवी के रूप में देखा जाता है, और इस प्रकार, भक्त गंगा सप्तमी पर पूर्ण समर्पण और भक्ति के साथ उनकी पूजा करते हैं। इससे उन्हें सुख, यश और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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गंगा सप्तमी पर बन रहा है अत्यंत शुभ योग, जरूर करें ये खास उपाय

तिष पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन गंगा सप्तमी मनाई जाती है। गंगा सप्तमी के दिन मां गंगा की विशेष उपासना की जाती है और इस दिन को मां गंगा के धरती पर प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। बता दें कि इस वर्ष 27 अप्रैल 2023, गुरुवार के दिन गंगा सप्तमी मनाई जाएगी। इस विशेष दिन पर मां गंगा की उपासना करने से और पितरों को जल प्रदान करने से साधक को कई गुना लाभ मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में गंगा सप्तमी के संदर्भ में कई उपाय बताए गए हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि इस विशेष दिन पर गंगा स्नान करने के बाद पितरों को गंगा जल अर्पित करने से और दान-धर्म करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और साधकों को सुख-समृद्धि एवं ऐश्वर्य का आशीर्वाद मिलता है। गंगा सप्तमी 2023 शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का शुभारंभ 26 अप्रैल को सुबह 11:27 पर होगा और इस तिथि का समापन 27 अप्रैल को दोपहर 1:48 पर हो जाएगा। उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 27 अप्रैल 2023, गुरुवार के दिन मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर सर्वार्थ सिद्धि योग पूरे दिन रहेगा और गुरु पुष्य योग सुबह 7 बजे से अगली सुबह 5:43 मिनट तक रहेगा। गंगा सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:17 से सुबह 5:01 के बीच रहेगा। मान्यता है कि ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान करने से साधक के सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा गंगा सप्तमी के दिन जरूर करें यह कार्य गंगा सप्तमी के विशेष अवसर पर स्नान ध्यान के बाद मां गंगा की पूजा अवश्य करें। इसके लिए एक कटोरी में गंगा जल भर लें और उस कटोरी के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाकर मां गंगा की पूजा करें। इसके बाद आरती के साथ पूजा संपन्न करें। गंगा सप्तमी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इसलिए इस विशेष दिन पर किसी जरूरतमंद, गरीब, असहाय अथवा किसी ब्राह्मण को अन्न, धन या वस्त्र का दान अवश्य करें ऐसा करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है और कई जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं।गंगा सप्तमी के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक जरूर करें। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव की जटाओं से ही मां गंगा प्रवाहित होती हैं। ऐसे में इस दिन एक पात्र में गंगाजल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक करें और महादेव को बेलपत्र अर्पित करें।

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शनिवार को पीपल की पूजा करने से क्यों प्रसन्न होते हैं शनिदेव,जानिए पौराणिक कथा

पीपल का पेड़ वैज्ञानिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है धार्मिक दृष्टि से भी उतना ही महत्तवपूर्ण है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में पीपल के पेड़ पर पितरों का वास माना गया है अतः पितृ पूजा में पीपल के पेड़ का विशेष स्थान है । इसके अतिरिक्त स्कंदपुराण में पीपल के वृक्ष की तुलना श्री हरि विष्णु से की गई है। गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि वृक्षों में मैं पीपल हूं। इसलिए हिन्दू धर्म में पीपल के पेड़ को पूजनीय माना गया है। इसके साथ ही मान्यता है कि शनिवार के दिन पीपल के पेड़ का पूजन करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं, आज हम जानेगें इसके पीछे की पौराणिक कथा। ऋषि पिप्लाद की कथा पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि पिप्लाद के माता-पिता की मृत्यु शनि की महादशा के कारण अल्पायु में हो गई थी। जिससे क्रोधित हो कर ऋषि पिप्लाद ने पीपल के पेड़ के नीचे कई वर्षों तक केवल पीपल के पत्ते खा कर ब्रह्म देव का तप किया। ब्रह्म देव ने प्रसन्न होकर उन्हे वरदान में ब्रह्मदण्ड प्रदान किया। ऋषि पिप्लाद ने प्रतिशोध में ब्रह्मदण्ड का प्रहार शनिदेव पर किया, जिससे उनका एक पैर टूट गया। शनिदेव जीवन रक्षा के लिए भगवान शिव की शरण में जा पहुंचे। भगवान शिव ने ऋषि पिप्लाद का क्रोध शांत कराते हुए वरदान दिया कि शनिवार के दिन जो भी पीपल के पेड़ का पूजन करेगा, शनिदेव की महादशा का उस पर दुष्प्रभाव नहीं होगा। राक्षस कैटभ की कथा एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार स्वर्गलोक पर असुरों का राज हो गया था। तब कैटभ नाम का एक राक्षस पीपल के पेड़ का रूप धारण कर यज्ञों को नष्ट करने लगा। जब ऋषिगण यज्ञ समिधा लेने पीपल के पेड़ के पास जाते, तो राक्षस उनका भक्षण कर लेता था। ऋषियों ने शनि देव से सहायता मांगी। शनिदेव स्वयं ब्राह्मण कुमार का रूप लेकर पीपल के पेड़ के पास गए और राक्षस कैटभ का वध कर दिया। इस तरह शनिदेव ने पीपल के पेड़ और ऋषियों को राक्षस के आतंक से मुक्ति दिलाई। तब से मान्यता है कि जो भी शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करता है उस पर शनिदेव शीध्र प्रसन्न होते हैं।

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जानें भारत के प्राचीन मंदिरों के बारे में, जिसका वर्षों पुराना है इतिहास

भारत में ऐसे कई पुराने मंदिर हैं, जिनका इतिहास अति प्राचीन है। इनकी सुंदरता और प्रसिद्धि आज भी बरकरार है। आइए जानें इन मंदिरों के बारे में भारत की संस्कृति और आध्यात्मिकता की चर्चा विश्व भर में फैली हुई हैं। विभिन्न धर्मों के संगम की धरती भारत में एक से बढ़कर एक पुराने व भव्य कलात्मक मंदिर हैं, जिनकी सुंदरता देखने लायक है। हजारों साल पुराने इन मंदिरों की खूबसूरती व समृद्धि को देखकर आप भारत के विशाल इतिहास का अंदाजा लगा सकते हैं। इन मंदिरों की नक्काशी में भारतीय संस्कृति, कला व सौंदर्य का अनूठा संगम है, जिन्हें देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। आइए जानें भारत के प्राचीन और मशहूर इन मंदिरों के बारे में बृहदेश्वर मंदिर, तमिलनाडु तमिलनाडु के तंजौर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को 1002 ईस्वी में चोल शासक राजाराज चोल प्रथम ने निर्माण करवाया था। यह मंदिर द्रविड़ शैली का अनूठा उदाहरण है। इस मंदिर के शीर्ष की ऊंचाई 66 मीटर है। इसकी प्रसिद्धि को देखने लोग मीलों दूरी का सफर तय करते हैं। यह मंदिर अपने समय में विश्व की विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था। चेन्नाकेशव मंदिर, कर्नाटक कर्नाटक के बैलूर में स्थित चेन्नाकेशव मंदिर होयलस काल में बनाया गया है। यगाची नदी के किनारे स्थित यह मंदिर द्रविड़ शैली पर अधारित है। विष्णु भगवान को समर्पित इस मंदिर की दीवारों पर पौराणिक के पात्रों का चित्रांकन किया गया है। इसकी संरचना इतनी भव्य है कि इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा मान्यता दी गई है। इसके तीन प्रवेश द्वारों में से पूर्वी प्रवेश द्वार सबसे अच्छा माना जाता है। इस मंदिर को विजयनगर के शासकों द्वारा चोलों पर उनकी विजय को दर्शाने के लिए बनाया गया था। दिलवाड़ा मंदिर, राजस्थान राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू नगर में स्थित दिलवाड़ा मंदिर पांच मंदिरों का समूह है, जिसका निर्माण 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच हुआ था। जैन धर्म को समर्पित यह मंदिर में 48 स्तम्भ हैं, जिनमें नृत्यांगनाओं की बनी आकृतियां हैं, जो सबको अपनी और आकर्षित करती हैं। इस मंदिर की निर्माण कला अति उत्तम और दर्शनीय है। यह मंदिर जैन धर्म के सबसे सुंदर तीर्थ स्थलों में शामिल है द्वारकाधीश मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित द्वारकाधीश मंदिर को जगत मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। गुजरात में मौजूद इस मंदिर को चार धाम यात्रा में शामिल किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 2500 साल पुराना है। यह इतना पुराना है कि इस मंदिर की चर्चा पुरातात्विक तथ्यों में भी देखने को मिलता है। यह मंदिर पांच मंजिला है, जिसमें लगभग 72 खंभे हैं। इस मंदिर की विशालता अति प्राचीन है। श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में स्थित श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक विशाल व प्राचीन मंदिर है। ये मंदिर 108 दिव्य मंदिरों में से एक है। दक्षिण भारत के सबसे खूबसूरत और भव्य मंदिरों में शामिल इस मंदिर को छठी और नौवीं शताब्दी के बीच बनवाया गया था। यह लगभग 156 एकड़ में फैला हुआ है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर भी माना जाता है। इसकी सुंदरता देखने योग्य है। सोमनाथ मंदिर गुजरात सोमनाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम हैं। गुजरात में स्थित इस मंदिर को 7वीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर का निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इस वैभवशाली मंदिर को कई बार तोड़ा गया। फिर भी इस मंदिर की विशालता और भव्यता आज भी कायम है। ऋग्वेद में भी इस मंदिर का उल्लेख किया गया है।  ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान राजस्थान के पुष्कर में स्थित इस मंदिर की संरचना 14वीं शताब्दी की मानी जाती है। इस मंदिर को करीब 2000 साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर के बीचों-बीच ब्रह्मा और उनकी दूसरी पत्नी गायत्री की मूर्ति है। आपको बता दें कि यह मंदिर भारत का एक मात्र ब्रह्मा मंदिर है, जहां हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। यहां पर साल में दो बार मेले का भी आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश के बहुत सारे तीर्थ यात्री और पर्यटक भाग लेते हैं लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर ओडिशा के भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मंदिर भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण सोमवंशी राजा जजति केशरि ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। भगवान शिव के एक रूप हरिहारा को समर्पित यह मंदिर काफी विशाल है। इसकी अनुपम स्थापत्य कला बेहद अट्रैक्टिव है, जिसे देखने भारत के कोने-कोने से लोग आते हैं। कैलाश मंदिर, महाराष्ट्र महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित यह दो मंजिला मंदिर एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है। यह मंदिर एलोरा की गुफाओं में स्थित है। लगभग 12 हजार साल पुराने इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के शासकों ने करवाया था। इसे बनाने में करीब 150 साल लगे और 7000 मजदूरों ने इस पर लगातार काम किया। यह मंदिर प्राचीन भारतीय सभ्यता का जीवंत प्रदर्शन करता हुआ नजर आता है। दुनिया भर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति के लिए यह मंदिर मशहूर है।

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सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म कई रहस्यों से भरा हुआ है. जितना जानने की कोशिश करें उतना ही कम है. हिन्दू पुराणों में उल्लेख है कि सृष्टि की रचना परमपिता ब्रम्हा द्वारा की गई है. हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार संसार के जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नर-नारी सभी की रचना भगवान ब्रम्हा ने की है. यह कार्य उन्हें भगवान शिव ने सौंपा था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि की रचना के समय ब्रम्हा के 5 मुख हुआ करते थे, और इन्हीं से वह सभी दिशाओं में देखा करते थे, लेकिन आज हम जहां भी देखते हैं वहां तस्वीरों में ब्रम्ह देव के 4 मुख ही दिखाए जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्म देव का 5वां सिर कहां गया? आइए जानते हैं. माँ सरस्वती की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार हिन्दू पौराणिक कथाओं में सारी सृष्टि, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नर-नारी सभी भगवान ब्रम्हा द्वारा रचित बताए गए हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रम्हा के चार सिर हैं जो चारों वेदों के प्रतीक हैं. ब्रम्ह देव का एक सिर और हुआ करता था. मतलब उनके कुल 5 सिर थे. कथाओं में उल्लेख मिलता है कि जब ब्रह्म देव ने सारी सृष्टि की रचना कर ली, तब सृष्टि में मानव विकास के लिए उन्होंने एक बेहद सुन्दर स्त्री को बनाया. जिसका नाम सतरूपा था. देवी सतरूपा वैसे तो ब्रम्हा की पुत्री थीं. परन्तु वे इतनी सुन्दर थीं कि ब्रम्ह देव उनको देखते ही उनपर मोहित हो गए और उनको अपनाने के लिए आगे बढ़े, देवी सतरूपा उनसे बचने के लिए हर दिशा की तरफ जाने लगीं लेकिन ब्रम्ह देव ने अपने 3 सिर और उत्पन्न कर हर तरफ से देवी सतरूपा को देखना नहीं छोड़ा. जब सतरूपा ब्रम्ह देव की नजरों से नहीं बच पाईं. तब वे ऊपर की तरफ दौड़ने लगीं. उस समय ब्रम्ह देव ने अपने एक और सिर की उत्पत्ति की जो ऊपर की तरफ देख सके. देवी सतरूपा की ब्रम्हा से बचने की हर कोशिश नाकाम साबित हो गई. भगवान शिव ब्रम्ह देव की ये सब हरकतें देख रहे थे. शिव की दृष्टि में सतरूपा ब्रह्मा की पुत्री थीं, इसीलिए उन्हें यह घोर पाप लगा. इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने एक गण भगवान भैरव को प्रकट किया और भगवान भैरव ने ब्रह्म देव का पांचवा सिर काट दिया. ताकि सतरूपा को उनकी कुदृष्टि से बचाया जा सके. जब ब्रम्हा का पांचवां सिर कट गया तब उन्हें होश आया और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ.  (Disclaimer इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

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माँ सरस्वती की कथा

माँ सरस्वती की कथा हंस एवं मोर की सवारी करने वाली सरस्वती देवी हिन्दुओं की मुख्य देवी माना जाता हैं, इन्हें शारदा, शतरूपा, वीणावादिनी, वीणापाणि, वाग्देवी, वागेश्वरी, भारती आदि नामों से भी भक्त पुकारते हैं. विद्या की अधिष्ठात्री देवी की उपासना करने से ज्ञान तथा सद्बुद्धि की प्राप्ति होती हैं. कहा जाता हैं कि कालिदास अपने जमाने का सबसे बड़ा मुर्ख था जिसने माँ सरस्वती की आराधना की जिससे वों महान कवि बन गया. बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) को इनका जन्म दिवस हैं. माँ सरस्वती की कथा महासरस्वती या चामुंडा माता की कथा एक समय शुम्भ निशुम्भ के दो दैत्य बहुत बलशाली थे. उनमे युद्ध में मनुष्य तो क्या देवता भी हार गये. जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध में जीत नही सकते. तब वे स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे. उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि महासरस्वती थी. महासरस्वती अत्यंत रूपवान थी, उनका रूप देखकर वे दैत्य मुग्ध हो गये और अपना सुग्रीव नाम का  दूत उस देवी के पास अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए भेजा. उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया. उसके बाद उन दोनों ने सोच समझकर अपने सेनापति धुभ्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी  द्वारा सेना सहित मारा गया. फिर चंड मुंड लड़ने आए और वे भी मार डाले गये. इसके बाद रक्तबीज लड़ने आया, जिसके रक्त की एक बूंद जमीन पर गिरने से एक वीर पैदा होता था. वह बहुत बलवान था उसे भी देवी ने मार डाला. अंत में चामुंडा से शुम्भ निशुम्भ स्वयं दोनों लड़ने आए और देवी के हाथों मारे  गये. सभी देवता दैत्यों की मृत्यु के बाद बहुत खुश हुए और अपना अपना कार्य करने लगे. देवी सरस्वती को विद्या साहित्य एवं संगीत की देवी कहा जाता हैं, इन क्षेत्रों के लोगों एवं विद्यार्थियों द्वारा माँ सरस्वती की नित्य पूजा अर्चना की जाती हैं. माँ को खुश करने के लिए आरती, भजन, चालीसा, शारदे वंदना, शंखनाद आदि भी किए जाते हैं. हाथ में किताब एवं वाद्य यंत्र लिए पास में मोर की आकृति हरेक सरस्वती फोटो में देखने को मिलती हैं. शिक्षा को मानव का तीसरा चक्षु माना जाता हैं. शिक्षा एवं ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण बसंत पंचमी के दिन विद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों में सरस्वती वंदना के साथ विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत होती हैं. हिन्दू देवी सरस्वती का निवास स्थान सत्यलोक में माना जाता हैं. एक मुख चार हाथ एक में माला एक में किताब तथा दोनों हाथों में वीणा धारण करने वाली देवी का वाहन हंस को माना जाता हैं. सरस्वती का पिता ब्रह्मा जी को माना जाता हैं. सरस्वती मंत्र इस प्रकार हैं. जिसका पूजा के समय उच्चारण करना चाहिए. “ॐ एं सरस्वत्यै नमः” यहाँ दिए गये सरस्वती फोटो गैलरी, सरस्वती फोटो डाउनलोड, माँ सरस्वती फोटो गैलरी को आप अपने मोबाइल में डाउनलोड कर सकते हैं.  माँ सरस्वती फोटो डाउनलोड, सरस्वती माँ का फोटो, सरस्वती माता का फोटो को अपनी स्क्रीन वालपेपर के रूप में सेट कर देवी को सम्मान प्रदान कर सकते हैं. बंसत पंचमी सरसवती फोटो, सरस्वती माता फोटो hd के दिन बेहतरीन तस्वीरों का पूजन कर आप अपने घर में भी सजा सकते हैं. या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥॥ शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌। हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌ वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥॥ माँ सरस्वती का पूजन किस दिन करें? हिंदू कैलेंडर के माघ महीने के वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। पौराणिक ग्रंथों में ऐसा माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती जी ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट हुई थी। ‌] मां सरस्वती जी की पूजा बसंत पंचमी के पांचवे दिन की जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मां सरस्वती जी की पूजा फरवरी महीने में की जाती है वसंत ऋतु के समय माता सरस्वती जी की पूजा करते समय लोग पीले रंग का वस्त्र धारण करते हैं। माँ सरस्वती के नाम (उनका अर्थ) माता सरस्वती के कई नाम हैं लेकिन इनमें प्रमुख हैं – शारदा – शिक्षा की देवी हंसवाहिनी – हंस के ऊपर विराजने वाली देवी। बुद्धिमाता – ज्ञान और बुद्धि की देवी। वरदायिनी – वर देने वाली देवी। भुवनेशवरी – पृथ्वी की देवी। सरस्वती माता का व्रत किस दिन होता है वसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती का पूजन निर्जल व्रत रखकर की जाती हैं और अन्य दिनों में मां सरस्वती व विष्णु जी की पूजा व्रत के साथ गुरुवार के दिन करना सबसे योग्य माना जाता है। माँ सरस्वती के पति कौन है सरस्वती पुराण के अनुसार मां सरस्वती जी का विवाह अपने पिता ब्रह्मा जी के साथ हुआ था। मां सरस्वती जी के पति ब्रह्मा जी हैं। बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है? वसंत पंचमी का त्यौहार हर साल मनाया जाता है लेकिन वसंत पंचमी मनाए जाने के पीछे एक बहुत ही प्रचलित लोक गाथा है जिसके अनुसार जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा देव सृष्टि का निर्माण कर रहे थे तब उन्होंने जीव जंतु, पेड़ पौधे, प्राणी पक्षी सभी की रचना की थी। लेकिन सृष्टि का निर्माण करते समय ब्रह्मा जी से कोई कमी रह गई थी जिसके कारण सृष्टि में कहीं भी आवाज का नामोनिशान नहीं था। इसीलिए ब्रह्मा जी ने जब अपने कमंडल से जल छिड़का तो उस जल से एक बहुत ही सुंदर स्त्री प्रकट हुई। 4 हाथों वाली सुंदर स्त्री के हाथ में वीणा दूसरे हाथ में पुस्तक तीसरे हाथ में माला और छोटे हाथ से वर मुद्रा बनी हुई थी। इस सुंदर स्त्री को ब्रह्मा जी ने माता सरस्वती का नाम दिया और उनसे वीणा बजाने के लिए कहा। जब माता सरस्वती जी ने वीणा बजाई तो सृष्टि के हर कोने कोने में स्वर गूंजने लगा। माता सरस्वती वसंत पंचमी के दिन प्रकट हुई थी इसीलिए बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की पूजा हर साल की जाती हैं। मां सरस्वती का पूजन कैसे करें? विद्या की देवी मां सरस्वती जी की पूजा पूरे विधि विधान से की जाती हैं। वसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की पूजा करते समय लोग पीले रंग का वस्त्र पहनते हैं और पूर्व या उत्तर की ओर

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क्‍यों अपनी ही पुत्री सरस्वती की ओर आकर्षित हुए थे ब्रह्मा? जानें इससे जुड़ी दो भिन्न कथाएं

भारत वर्ष के दो ग्रंथों ‘सरस्वती पुराण’ और ‘मत्स्य पुराण’ में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का अपनी ही बेटी सरस्वती से विवाह करने का प्रसंग है पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी की पत्नी माँ सावित्री देवी हैं, पुराणों के ही अनुसार ब्रह्मा जी ने एक और स्त्री से विवाह किया था जिनका नाम माँ गायत्री है। इतिहास अनुसार यह गायत्री देवी राजस्थान के पुष्कर की रहने वाली थी जो वेदज्ञान में पारंगत होने के कारण महान मानी जाती थीं। कहा जाता है एक बार पुष्‍कर में ब्रह्माजी को एक यज्ञ करना था और उस समय उनकी पत्नीं सावित्री उनके साथ नहीं थी तो उन्होंने गायत्री से विवाह कर यज्ञ संपन्न किया। लेकिन बाद में जब सावित्री को पता चला तो उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया। पुराणों में माँ सरस्वती के बारे में अलग-अलग मत मिलते हैं। एक मान्यता अनुसार सरस्वती तो ब्रह्मा की पत्नी सावित्री की पुत्री थीं। दूसरे मत अनुसरा वह ब्रह्मा की मानसपुत्र थीं। मान्यता है ब्रह्मा ने उन्हें अपने मुख से प्रकट किया था। एक दुसरे पौराणिक उल्लेख अनुसार देवी महालक्ष्मी “लक्ष्मी देवी नहीं” से जो उनका सत्व प्रधान रूप उत्पन्न हुआ, देवी का वही रूप ‘सरस्वती‘ कहलाया। यह तो ज्ञात है कि देवी सरस्वती का वर्ण श्‍वेत है उनकी छवि बहुत सुंदर है। ब्रह्मा जी के अनेक पुत्र और पुत्रियां थे। सरस्वती देवी को शतरूपा, वाग्देवी, वागेश्वरी, शारदा, वाणी और भारती भी कहा जाता है। भारत वर्ष के दो ग्रंथों ‘सरस्वती पुराण’ और ‘मत्स्य पुराण’ में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का अपनी ही बेटी सरस्वती से विवाह करने का प्रसंग है जिसके फलस्वरूप इस धरती के प्रथम मानव ‘मनु’ का जन्म हुआ। सरस्वती पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा ने सीधे अपने वीर्य से सरस्वती को जन्म दिया था। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि सरस्वती की कोई मां नहीं केवल पिता, ब्रह्मा थे। स्वयं ब्रह्मा भी सरस्वती के आकर्षण से खुद को बचाकर नहीं रख पाए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने पर विचार करने लगे। इस कारण माँ सरस्वती ने अपने पिता की इस मनोभावना को भांपकर उनसे बचने के लिए चरों दिशाओं में छिपने का प्रयत्न किया लेकिन उनका हर प्रयत्न निष्फल हुआ। इसलिए माना जाता है विवश होकर उन्हें अपने पिता के साथ विवाह करना पड़ा। सरस्वती पुराण के अनुसार ब्रह्मा और सरस्वती करीब 100 वर्षों तक एक जंगल में पति-पत्नी की तरह रहे। इन दोनों का एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम रखा गया था स्वयंभु मनु। माँ सरस्वती उत्पत्ति कथा मत्स्य पुराण अनुसार मत्स्य पुराण में यह कथा थोड़ी सी भिन्न है। मत्स्य पुराण अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। कहा जाता है कालांतर में उनका पांचवां सिर काल भैरव ने काट डाला था। कहा जाता है जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो वह समस्त ब्रह्मांड में अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया। और ब्रह्मा अपनी ही बनाई हुई रचना, सरवस्ती के प्रति आकर्षित होने लगे और लगातार उन पर अपनी कू दृष्टि डाले रहे। ब्रह्मा की कू दृष्टि से बचने के लिए सरस्वती चारों दिशाओं में छिपती रहीं लेकिन वह उनसे नहीं बच पाईं। अंत में सरस्वती आकाश में जाकर छिप गईं, लेकिन अपने पांचवें सिर से ब्रह्मा ने उन्हें आकाश में भी खोज निकाला और उनसे सृष्टि की रचना में सहयोग करने का निवेदन किया। सरस्वती से विवाह करने के पश्चात सर्वप्रथम स्वयंभु मनु को जन्म दिया। इसी कारण ब्रह्मा और सरस्वती की यह संतान ‘मनु’ को पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है।

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