जब हनुमान जी हारे एक तपस्वी से

श्रीराम के परम भक्त हनुमान जी को वीरों के वीर महावीर कहा जाता है। जिन्होंने अपने प्रभु राम की रक्षा करने के लिए बहुत से युद्ध किए और जीते। शास्त्रों में इन्हें संकटमोटन कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों को हर संकट से उबारते हैं। रामायण महाकाव्य में महर्षि वाल्मीकि ने राम चंद्र और हनुमान जी के कार्यो का बहूत ही सुंदर तरीके वर्णन किया है। रामायण के पान से यह पता चलता की हनुमान अपनी निस्वार्थ भक्ति से राम के मन मंदिर में बसे हुए हैं। राम जी के लिए बजरंगबली ने हर असंभव कार्य को भी संभव सिद्ध किया। इन्होंने अपने पराक्रम से बड़े-बड़ राक्ष्सों का नाश किया। इतना ही नहीं इन्होंने अपने पराक्रम से शनिदेव, बालि, अर्जुन, भीम जैसे बड़े-बड़े वीरों को युद्ध में पराजित करके उनका अभिमान चूर-चूर किया। लेकिन क्या आपको पता है कि संकटमोचन हनुमान ने अपने जीवन काल में अभिमान वश एक ऐसा भी युद्ध लड़ा जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इतना ही नहीं इस युद्ध में हनुमान जी को हराने वाला कोई और नहीं एक राम भक्त ही था। तो आईए जानें आख़िर कौन था ये राम भक्त दरअसल मच्छिंद्रनाथ नाम के बड़े तपस्वी थें, एक बार जब वो रामेश्वरम में आए तो रामजी का निर्मित सेतु देख कर वे भावविभोर हो गए और प्रभु राम की भक्ति में लीन होकर वे समुद्र में स्नान करने लगे। तभी वहां वानर वेश में उपस्थित हनुमान जी की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने मच्छिंद्रनाथ जी के शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। इसलिए हनुमान जी ने अपनी लीला आरंभ की, जिससे वहां जोरों की बारिश होने लगी, ऐसे में बानर रूपी हनुमान जी उस बारिश से बचने के लिए एक पहाड़ पर वार कर गुफा बनाने की कोशिश का स्वांग करने लगे। दरअसल उनका उद्देश्य था कि मच्छिंद्रनाथ का ध्यान टूटे और उन पर नज़र पड़े और वहीं हुआ मच्छिंद्रनाथ ने तुरंत सामने पत्थर को तोड़ने की चेष्टा करते हुए उस वानर से कहा, ‘हे वानर तुम क्यों ऐसी मूर्खता कर रहे हो, जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता, इससे पहले ही तुम्हें अपने घर का प्रबंध कर लेना चाहिए था।’ ये सुनते ही वानर रूपी हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ से पूछा, आप कौन हैं? जिस पर मच्छिंद्रनाथ ने स्वयं का परिचय दिया ‘मैं एक सिद्ध योगी हूं और मुझे मंत्र शक्ति प्राप्त है। जिस पर हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ की शक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा, वैसे तो प्रभु श्रीराम और महाबली हनुमान से श्रेष्ठ योद्धा इस संसार में कोई नहीं है, पर कुछ समय उनकी सेवा करने के कारण, उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का एक प्रतिशत हिस्सा मुझे भी दिया है, ऐसे में अगर आप में इतनी शक्ति है और आप पहुंचे हुए सिद्ध योगी है तो मुझे युद्ध में हरा कर दिखाएं, तभी मैं आपके तपोबल को सार्थक मानूंगा, अन्यथा स्वयं को सिद्ध योगी कहना बंद करें। इतना सुनते ही मच्छिंद्रनाथ ने उस वानर की चुनौती स्वीकार कर ली और युद्ध की शुरुआत हो गई। जिसमें वानर रुपी हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ पर एक-एक करके 7 बड़े पर्वत फेंके, पर इन पर्वतों को अपनी तरफ आते देख मच्छिंद्रनाथ ने अपनी मंत्र शक्ति का प्रयोग किया और उन सभी सातों पर्वतों को हवा में स्थिर कर उन्हें उनके मूल स्थान पर वापस भेज दिया। इतना देखते ही महाबली को क्रोध आया उन्होनें मच्छिंद्रनाथ पर फेंकने के लिए वहां उपस्थित सबसे बड़ा पर्वत अपने हाथ में उठा लिया। जिसे देखकर मच्छिंद्रनाथ ने समुंद्र के पानी की कुछ बूंदों को अपने हाथ में लेकर उसे वाताकर्षण मंत्र से सिद्ध कर उन पानी की बूंदों को हनुमान जी के ऊपर फेंक दिया। इन पानी की बूंदों का स्पर्श होते ही हनुमान का शरीर स्थिर हो गया और हलचल करने में भी असमर्थ हो गया, साथ ही उस मंत्र की शक्ति से कुछ क्षणों के लिए हनुमान जी की शक्ति छिन्न गई और ऐसे में वे उस पर्वत का भार न उठा पाने के कारण तड़पने लगे। तभी हनुमान जी का कष्ट देख उनके पिता वायुदेव वहां प्रगट हुए और मच्छिंद्रनाथ से हनुमान जी को क्षमा करने की प्रार्थना की। वायुदेव की प्रार्थना सुन मच्छिंद्रनाथ ने हनुमान जी को मुक्त कर दिया और हनुमान जी अपने वास्तविक रुप में आ गए । इसके बाद उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से कहा – हे मच्छिंद्रनाथ आप तो स्वयं में नारायण के अवतार हैं, ये मैं भलीभांति जानता था, फिर भी मैं आपकी शक्ति की परीक्षा लेने की प्रयास कर बैठा, इसलिए आप मेरी इस भूल को माफ करें। ये सुनकर और स्थिति को समझते हुए मच्छिंद्रनाथ ने हनुमान जी को माफ़ कर दिया।

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कब मनाई जाएगी भगवान नरसिंह जयंती? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान नरसिंह जयंती मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु और नरसिंह भगवान की विधि-विधान उपासना करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु के पांचवे अवतार नरसिंह का जन्मोत्सव वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अधर्म और अहंकार का नाश करने के लिए भगवान नारायण ने यह अवतार लिया था। श्री हरि विष्णु के सभी अवतारों में नरसिंह को अति उग्र माना गया है। लेकिन यह अपने भक्तजनों के लिए सदैव सरल और सौम्य रहते हैं। जन्मोत्सव का दिन नरसिंह जन्मोत्सव वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि यानी 3 मई की रात 11 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगा। वहीं, इसका समापन 4 मई को रात 11 बजकर 44 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार, नरसिंह जयंती 4 मई, गुरुवार के दिन मनाई जाएगी। प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन नरसिंह जयंती मनाई जाती है। बता दें कि भगवान नरसिंह भगवान विष्णु के चौथे अवतार थे, जिन्होंने हिरण्यकश्यप के वध के लिए धरती पर अवतरण लिया था। इस विशेष दिन पर भगवान नरसिंह एवं भगवान विष्णु की उपासना करने से सभी दुख दूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं, वर्ष 2023 में कब मनाई जाएगी नरसिंह जयंती, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि? नरसिंह जयंती 2023 शुभ मुहूर्त  हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि 03 मई 2023 को रात्रि 11 बजकर 49 मिनट पर प्रारंभ होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 04 मई 2023 को रात्रि 11 बजकर 44 मिनट पर होगा। नरसिंह जयंती पर भगवान नरसिंह की पूजा सायं काल में की जाती है। इसलिए पूजा का समय शाम 04 बजकर 18 मिनट से शाम 06 बजकर 58 मिनट तक ही रहेगा। वहीं व्रत का पारण अगले दिन यानी 5 मई को सुबह 05 बजकर 38 मिनट के बाद किया जाएगा। नरसिंह जयंती 2023 पूजा विधि नरसिंह जयंती के दिन साधक सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करें और साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान नरसिंह और माता लक्ष्मी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजा के समय विधि-विधान से नरसिंह भगवान की पूजा करें और उनकी मंत्रों का जाप करें। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान नरसिंह को लाल वस्त्र में नारियल लपेटकर अर्पित करने से विशेष लाभ मिलता है। इस दिन नरसिंह भगवान को मिठाई, फल, केसर, फूल और कुमकुम जरूर अर्पित करें। अंत में नरसिंह स्तोत्र का पाठ करें और आरती के साथ पूजा संपन्न करें। नरसिंह जयंती 2023 महत्त्व पौराणिक किवदंतियों के अनुसार, भगवान विष्णु ने दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध के लिए नरसिंह रूप में धरती पर अवतरण लिया था। साथ ही भगवान नरसिंह की परम भक्ति से ही भक्त प्रहलाद को बैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई थी। मान्यता है कि भगवान नरसिंह की पूजा करने से शारीरिक व मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं और कई प्रकार के भय से मुक्ति प्राप्त होती है। इसके साथ भगवान विष्णु के इन स्वरूप की उपासना करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं दूर हो जाती है।

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नारद जयंती पर 3 रोचक कथाएं जब श्रीहरि विष्णु ने नारद जी से किया मजाक

हिन्‍दू मान्‍यताओं के अनुसार नारद मुनि का जन्‍म सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी की गोद से हुआ था। ब्रह्मवैवर्तपुराण के मतानुसार ये ब्रह्मा के कंठ से उत्पन्न हुए थे। जोभी हो नारद को ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक माना गया है। आओ जानते हैं इसके संबंध में 3 रोचक कथाएं। 1. नारद बने स्त्री कहते हैं कि भगवान विष्णु ने नारद को माया के विविध रूप समझाए थे। एक बार यात्रा के दौरान एक सरोवर में स्नान करने से नारद को स्त्रीत्व प्राप्त हो गया था। स्त्री रूप में नारद 12 वर्षों तक राजा तालजंघ की पत्नी के रूप में रहे। फिर विष्णु भगवान की कृपा से उन्हें पुनः सरोवर में स्नान का मौका मिला और वे पुनः नारद के स्वरूप को लौटे।  2. नारद को मिला शाप एक अन्य कथा के अनुसार दक्षपुत्रों को योग का उपदेश देकर संसार से विमुख करने पर दक्ष क्रुद्ध हो गए और उन्होंने नारद का विनाश कर दिया। फिर ब्रह्मा के आग्रह पर दक्ष ने कहा कि मैं आपको एक कन्या दे रहा हूं, उसका कश्यप से विवाह होने पर नारद पुनः जन्म लेंगे। पुराणों में ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि राजा प्रजापति दक्ष ने नारद को शाप दिया था कि वह दो मिनट से ज्यादा कहीं रुक नहीं पाएंगे। यही वजह है कि नारद अक्सर यात्रा करते रहते हैं। अथर्ववेद में भी अनेक बार नारद नाम के ऋषि का उल्लेख है। भगवान सत्यनारायण की कथा में भी उनका उल्लेख है। यह भी कहते हैं कि दक्ष प्रजापति के 10 हजार पुत्रों को नारदजी ने संसार से निवृत्ति की शिक्षा दी जबकि ब्रह्मा उन्हें सृष्टिमार्ग पर आरूढ़ करना चाहते थे। ब्रह्मा ने फिर उन्हें शाप दे दिया था। इस शाप से नारद गंधमादन पर्वत पर गंधर्व योनि में उत्पन्न हुए। इस योनि में नारदजी का नाम उपबर्हण था। यह भी मान्यता है कि पूर्वकल्प में नारदजी उपबर्हण नाम के गंधर्व थे। कहते हैं कि उनकी 60 पत्नियां थीं और रूपवान होने की वजह से वे हमेशा सुंदर स्त्रियों से घिरे रहते थे। इसलिए ब्रह्मा ने इन्हें शूद्र योनि में पैदा होने का शाप दिया था इस शाप के बाद नारद का जन्म शूद्र वर्ग की एक दासी के यहां हुआ। जन्म लेते ही पिता के देहान्त हो गया। एक दिन सांप के काटने से इनकी माताजी भी इस संसार से चल बसीं। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गए। उस समय इनकी अवस्था मात्र पांच वर्ष की थी। एक दिन चतुर्मास के समय संतजन उनके गांव में ठहरे। नारदजी ने संतों की खूब सेवा की। संतों की कृपा से उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। समय आने पर नारदजी का पांचभौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अन्त में ब्रह्माजी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। 3. जब श्री हरि विष्णु ने नारद जी से किया मजाक ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णु जी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गए, क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। ‘हरि’ का एक अर्थ विष्णु होता है और एक अर्थ वानर भी होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया। नारद सीधे बैकुंठ पहुंचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा। इस कथा प्रसंग में भगवान गणेशजी का विष्णु और देवताओं द्वारा अपमान करने का भी उल्लेख मिलता है जिसके चलते विष्णुजी बारात लेकर निकले तब रास्ते में गणेशजी ने अपने मूषक से कहकर संपूर्ण रास्ता खुदवा दिया था। बाद में गणेशजी को मनाया और उनकी पूजा की गई थी तब बारात आगे बढ़ सकी थी।

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जानिए कब है नारद जयंती? आखिर नारद जी ने क्यों दिया विष्णु भगवान को श्राप ?

ऋषि नारद, जिन्हें देवर्षि नारद या नारद मुनि के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण देवता हैं। वह भगवान ब्रह्मा के पुत्र हैं, जो तीन सर्वोच्च देवताओं में से एक हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया था। नारद, देवताओं के दिव्य दूत और भगवान विष्णु के एक समर्पित अनुयायी के रूप में पूजनीय हैं। वह अपने मन में लगातार “नारायण नारायण” का जप करने के लिए जाने जाते हैं। हर साल, हिंदू इस श्रद्धेय ऋषि की जयंती मनाने के लिए नारद जयंती मनाते हैं। देवर्षि नारद, जिन्हें नारद मुनि के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में देवताओं के एक दिव्य दूत हैं और उन्हें भगवान विष्णु का एक स्नेही भक्त माना जाता है। अपनी आध्यात्मिक खोज के अलावा, नारद एक प्रतिभाशाली संगीतकार हैं जो करथल और वीणा धारण करते हैं। वह अपने ज्ञान और कहानी कहने की क्षमताओं के लिए भी जाने जाते हैं, जिन्हें महाभारत और रामायण सहित विभिन्न हिंदू महाकाव्यों में प्रलेखित किया गया है। नारद ने भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद के जीवन में उन्हें शिक्षा और मार्गदर्शन प्रदान करके महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि, हिंदू मान्यता के अनुसार, नारद को एक बार ब्रह्मा के प्रसिद्ध पुत्र दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था। नारद जयंती 2023 हिंदू धर्म में पूर्णिमांत कैलेंडर के अनुसार, नारद जयंती ज्येष्ठ के महीने में कृष्ण पक्ष के दौरान प्रतिपदा तिथि को होती है। हालाँकि, अमावसंत कैलेंडर में, नारद जयंती वैशाख महीने के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। हालाँकि चंद्र मास के अलग-अलग नाम हैं, नारद जयंती का पालन दोनों हिंदू कैलेंडर में समान है। नारद जयंती 2023: तिथि और समय नारद जयंती: शनिवार, 6 मई, 2023 प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 05 मई, 2023 को रात्रि 11:03 बजे प्रतिपदा तिथि समाप्त: 06 मई, 2023 को रात्रि 09:52 बजे ऋषि नारद कौन हैं हिंदू पौराणिक कथाओं में, ऋषि नारद को भगवान ब्रह्मा का मानस पुत्र या मन से जन्मे पुत्र माना जाता है, जो तीन त्रिदेवों में से एक हैं जिनमें ब्रह्मा निर्माता, विष्णु अनुरक्षक और महेश विनाशक शामिल हैं। कुछ सूत्र यह भी बताते हैं कि नारद मुनि महर्षि कश्यप के पुत्र हैं, जबकि अन्य मानते हैं कि वे संत त्यागराज और पुरंदरदास के अवतार हैं। भगवान नारायण या विष्णु के कट्टर भक्त के रूप में, ऋषि नारद अपनी संगीत क्षमताओं के लिए जाने जाते हैं और अक्सर उन्हें करथल और वीणा के साथ चित्रित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने कभी शादी नहीं की और एक ब्रह्मचारी बने रहे। विष्णु पुराण और अन्य पुराणों के अनुसार, ऋषि नारद को अस्तित्व के तीनों क्षेत्रों में भटकने के लिए जाना जाता है: स्वर्ग लोक (स्वर्ग), पाताल लोक (नीदरवर्ल्ड), और मृत्यु लोक पृथ्वी लोक (पृथ्वी)। जब वह यात्रा करते हैं, तो वह “नारायण, नारायण” कहते हुए भगवान विष्णु के नाम का जाप करते हैं। उनके पास जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति, मोक्ष की ओर आत्माओं या आत्मा का मार्गदर्शन करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है। इसलिए, नारद जयंती 2023 का उत्सव हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण महत्व रखता है। इस दिन, लोग ऋषि नारद को उनकी बुद्धिमान सलाह और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए सम्मान और पूजा करते हैं। नारद मुनि जयंती की कथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पिछले एक कल्प में, नारद एक गंधर्व के रूप में प्रकट हुए थे, लेकिन उनके अभद्र व्यवहार के कारण, भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक शूद्रदासी के पुत्र के रूप में जन्म लेने का दंड दिया। बच्चा बड़ा हुआ और उसने गुरुओं और विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की, जिससे उसे रजोगुण और तमोगुण को समाप्त करने वाले समर्पण को प्राप्त करने में मदद मिली। भगवान विष्णु की पूजा करते समय उन्हें भगवान के दर्शन हुए। अपनी आत्मा में नारायण के रूप को देखने की बार-बार कोशिश करने के बावजूद, वह ऐसा करने में असमर्थ थे। अंततः, भगवान नारायण ने उन्हें अगले जन्म में उनके सलाहकार बनने का वरदान दिया। हजारों वर्षों के बाद, जब ब्रह्मा ने सृजन करना चाहा, नारद मुनि ने मानस पुत्र के रूप में जन्म लिया और ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में जाने गए। तब से, नारद मुनि भगवान नारायण के आशीर्वाद के लिए स्वतंत्र रूप से वैकुंठ सहित तीनों लोकों की खोज कर रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि नारद मुनि वीणा बजाते हैं और ब्रह्म मुहूर्त के दौरान सभी मनुष्यों के कार्यों की निगरानी करते हुए भगवान की स्तुति करते हैं। रामायण की कहानी के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम को माता सीता से अलग करने के लिए नारद मुनि जिम्मेदार थे। नारायण के प्रति नारद की भक्ति इतनी प्रबल हो गई थी कि कामदेव भी उन्हें अपनी पवित्रता भंग करने के लिए प्रलोभित नहीं कर सके। नारद के अहंकार को शांत करने के लिए, भगवान विष्णु ने एक मायावी महल बनाया जहां राजकुमारी का स्वयंवर आयोजित किया जा रहा था। नारद को राजकुमारी ने मोहित कर लिया और भगवान नारायण से उसे सुंदर बनाने के लिए कहा ताकि वह उससे शादी कर सके। लेकिन जब वह स्वयंवर में पहुंचे, तो उन्होंने एक बंदर का रूप धारण कर लिया था, जिससे राजकुमारी चली गई। नारद ने क्रोधित होकर भगवान नारायण को मानव रूप में अपनी पत्नी से अलग होने की पीड़ा का अनुभव करने का श्राप दिया। बाद में नारद को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने भगवान नारायण से माफी मांगी। नारद जयंती के अनुष्ठान क्या हैं अन्य हिंदू त्योहारों की तरह, नारद जयंती पर सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करना पवित्र माना जाता है। स्नान के बाद, भक्त स्वच्छ और ताजा पूजा वस्त्र (पूजा वस्त्र) पहनते हैं। भक्त भगवान विष्णु की पूजा करते हैं क्योंकि नारद मुनि देवता के समर्पित भक्त थे। भक्त देवता को चंदन, तुलसी के पत्ते, कुमकुम, अगरबत्ती, फूल और मिठाई चढ़ाते हैं। नारद जयंती व्रत (व्रत) का पालन करना अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, और दाल या अनाज के सेवन से बचना आवश्यक है। दुग्ध उत्पादों और फलों की अनुमति है। पर्यवेक्षकों को भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए मंत्रों का जाप करते हुए रात बितानी चाहिए और सोने की अनुमति नहीं है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। सभी अनुष्ठानों को

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जानिए कैसे हुआ भगवान गणेशजी का जन्म

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। शास्त्रों के अनुसार बुधवार का दिन भगवान गणेश की पूजा के लिए विशेष फलदायी होता है। इस बार बुधवार के दिन से 10 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव पर्व का शुभारंभ हो रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था इस कारण से हर माह में आने वाली दोनों चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की विशेष रूप से पूजा आराधना की जाती है। जब भाद्रपद माह की चतुर्थी आती है तब भगवान गणेश का जन्मोत्सव विधि-विधान और धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट में जगह-जगह गणेश पंडालों में गणपति की विशाल प्रतिमा स्थापित की जाती है और 10 दिनों तक लगातार सिद्धिदाता और विध्नहर्ता की उपासना की जाती है। भगवान गणेश की सभी देवी-देवताओं में सबसे पहले पूजा की जाती है। हर शुभ काम से पहले भगवान गणेश की पूजा और ऊं गणेशाय नम: का जाप किया जाता है। गणेश उत्सव के मौके पर आइए जानते हैं गणेश जन्म कथा के बारे में। ऐसे हुआ गणेशजी का जन्म गणेश चतुर्थी की कथा के अनुसार,एक बार माता पार्वती ने स्न्नान के लिए जाने से पूर्व अपने शरीर के मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसे गणेश नाम दिया। पार्वतीजी ने उस बालक को आदेश दिया कि वह किसी को भी अंदर न आने दे,ऐसा कहकर पार्वती जी अंदर नहाने चली गई। जब भगवान शिव वहां आए ,तो बालक ने उन्हें अंदर आने से रोका और बोले अन्दर मेरी मां नहा रही है,आप अन्दर नहीं जा सकते। शिवजी ने गणेशजी को बहुत समझाया,कि पार्वती मेरी पत्नी है। पर गणेश जी नहीं माने तब शिवजी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने गणेशजी की गर्दन अपने त्रिशूल से काट दी और अन्दर चले गये।  जब पार्वतीजी ने शिवजी को अन्दर देखा तो बोली कि आप अन्दर कैसे आ गए। मैं तो बाहर गणेश को बिठाकर आई थी। तब शिवजी ने कहा कि मैंने उसको मार दिया। तब पार्वती जी रौद्र रूप धारण कर लिया और कहा कि जब आप मेरे पुत्र को वापस जीवित करेंगे तब ही मैं यहां से चलूंगी अन्यथा नहीं। शिवजी ने पार्वती जी को मनाने की बहुत कोशिश की पर पार्वती जी नहीं मानी।  सारे देवता एकत्रित हो गए सभी ने पार्वतीजी को मनाया पर वे नहीं मानी। तब शिवजी ने विष्णु भगवान से कहा कि किसी ऐसे बच्चे का सिर लेकर आये जिसकी मां अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही हो। विष्णुजी ने तुरंत गरूड़ जी को आदेश दिया कि ऐसे बच्चे की खोज करके तुरंत उसकी गर्दन लाई जाए। गरूड़ जी के बहुत खोजने पर एक हथिनी ही ऐसी मिली जो कि अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही थी। गरूड़ जी ने तुरंत उस बच्चे का सिर लिया और शिवजी के पास आ गये। शिवजी ने वह  सिर गणेश जी के लगाया और गणेश जी को जीव दान दिया,साथ ही यह वरदान भी दिया कि आज से कही भी कोई भी पूजा होगी उसमें गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम होगी । इसलिए हम कोई भी कार्य करते है तो उसमें हमें सबसे पहले गणेशजी की पूजा करनी चाहिए,अन्यथा पूजा सफल नहीं होती। 

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श्री गणेश चतुर्थी व्रत कथा 

पौराणिक एवं प्रचलित श्री गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेश जी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। भगवान श्री गणेश का जन्म भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था, इस दिन को गणेश जन्मोत्सव के रूप में बनाया जाता है। यदि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को रविवार या मंगलवार दिन पड़ता है तो इस व्रत को महाचतुर्थी व्रत कहा जाता है। यह व्रत करने से भगवान गणेश का आर्शीवाद प्राप्त होता है। व्रत की विधि व विधान : गणेश चतुर्थी के दिन प्रात काल स्न्नानादि से निवूत होकर सोना, चाँदी, ताँबा, मिट्टी या गोबर से एक दन्त गणेश की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की जाती है तथा इक्कीस मोदकों का भोग लगाते है तथा हरित दुर्वा के इक्कीस अंकुर निम्न दस नाम लेकर चढ़ाने चाहिए १. गतापि, २. गोरी सुमन, ३. अधनाशक, ४. एकदन्त, ५. ईशपुत्र, ६. सर्वसिद्धिप्रद, ७. विनायक, ८. कुमार गुरु, १०. इंभवकवाय और १०. मूषक वाहन। इक्कीस मोदकों में से दस मोदक ब्राह्मणों को दान देना तथा ग्यारह मोदक घर में रखें और स्वमं प्रसाद रूप में ग्रहण करे। किन किन बातो का ध्यान रखे : ब्रह्मचर्य का पालन करे।दिन में निंद्रा ना ले।झूठ, गुस्सा, वाद – विवाद व् किसी को दंड ना दे।कम बोले व् भगवान् का ध्यान करे।और इस दिन “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। गणेश चतुर्थी व्रत की प्रथम कथा श्री गणेश चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव व माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे हुए थे, जहां माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने को कहा। शिव जी ने बोला खेल तो लेंगे परन्तु खेल में हार-जीत का फैसला करने के लिए हमें एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी रहेगी जो इस खेल में हार जीत को सुनियोजित करेगा। इस पर पार्वती जी भी राजी हो गई थी तद पच्यात शिव जी ने एक पुतले की प्राण-प्रतिष्ठा की और उस से कहा – “बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, और खेल में हार-जीत का फैसला तुमको करना होगा कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता?” और उसके बाद भगवान शिव व माता पार्वती ने चौपड़ खेल खेलना शुरू किया। खेल को 3 बार खेला गया और तीनों ही बार माता पार्वती ने ही खेल को जीता। परन्तु खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया तो उस बालक ने महादेव को ही विजयी बताया। ऐसा फैसला सुनकर माता पार्वती को क्रोध आना निश्चय था और उन्होंने क्रोध वश उस में उन्होंने बालक को श्राप दे दिया की तुम लंगड़े और कीचड़ में पड़े रहोगें। जिसके बाद बालक ने माता पार्वती से माफी मांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश हुआ है, मैंने किसी द्वेष भाव से ऐसा नहीं किया था। जब बालक द्वारा क्षमा मांगी तो माता ने कहा- ‘यहां पर गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने पर तुम मुझे प्राप्त करोगे।’ ऐसा बताकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत पर लौट आई। पुरे एक वर्ष के बाद वह स्थान पर नागकन्याएं आईं, तब नागकन्याओं से श्री गणेश के व्रत की संपूर्ण विधि मालूम कर उस बालक ने 21 दिन तक लगातार गणेश जी का व्रत पूजन किया। उस बालक की सच्ची श्रद्धा को देखकर गणेश जी प्रसन्न हुए। उन्होंने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए बोला। उस बालक ने कहा- ‘हे विनायक! मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से स्वयं चलकर कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुंच सकूं और वे यह देख कर प्रसन्न हों सके।’ बालक को वरदान देकर श्री गणेश अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद वह बालक कैलाश पर्वत पर स्वयं पहुंच गया और कैलाश पर्वत पर पहुंचने की अपनी कथा उसने भगवान शिव जी को सुनाई। चौपड़ वाले दिन से माता पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं अत: देवी के रुष्ट होने पर भगवान शिव ने भी बालक के बताए अनुसार 21 दिनों तक श्री गणेश का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती के मन से भगवान शिव के लिए जो नाराजगी थी, वह समाप्त हो गई। तब यह व्रत विधि भगवान शंकर ने माता पार्वती को बताई। यह सुनकर माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागृत हुई। तब माता पार्वती ने भी 21 दिन तक श्री गणेश का व्रत किया तथा दूर्वा, फूल और लड्डूओं से गणेश जी का पूजन-अर्चन किया। व्रत के 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं माता पार्वतीजी से आ मिले। उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का यह व्रत समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला व्रत माना जाता रहा है। इस व्रत को करने से मनुष्‍य के सारे कष्ट दूर होकर मनुष्य को समस्त सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। गणेश चतुर्थी व्रत की द्वितीय कथा श्री गणेश चतुर्थी व्रत की एक और पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सभी देवता एक विपदा में उलझे थे। जिसके निवारण के लिए वे सभी देवता भगवान् शिव के निकट आये, उस समय  शिव जी के दोनों सुपुत्र बैठे थे। देवताओं की सभी बात सुनकर शिव जी ने अपने बेटों कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण करना चाहता है। इस पर दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। भगवान शिव के ऐसा कहने पर कार्तिकेय बिना समय गवाए अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल जाते है, और गणेश जी इस सोच में पड़ गए कि वह चूहे की सवारी करके ऐसा कार्य करने में तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्होंने अपनी सोच समझ से एक उपाय सूझा। गणेश

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रामायण की कहानी हनुमान जी का जन्म

रामभक्त हनुमान को कई नामों से जाना जाता है, जैसे मारुति नंदन, पवनपुत्र व संकटमोचन आदि। माना जाता है कि वह भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार थे और उनके जन्म का उल्लेख कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। इस कहानी में हम हनुमान जी के जन्म से जुड़ी ऐसी ही एक प्रचलित कथा बता रहे हैं। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। इस प्रकार भगवान शिव के आशीर्वाद से हुआ था केसरीनंदन हनुमान का जन्म हनुमान जी के जन्म की कथा बहुत रोचक है। वे माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र थे। माना जाता है हनुमान जी जन्म कोई साधारण संयोग नहीं था, बल्कि देवतागण, नक्षत्र और सारे भगवान के आशीर्वाद से पृथ्वी से पाप का विनाश करने के लिए हुआ था। मान्यताओं के अनुसार, माता अंजनी को यह वरदान मिला हुआ था कि उनका होने वाला पुत्र शिव का अंश होगा। इसके अलावा, एक मान्यता यह भी है कि जब बजरंगबली का जन्म हुआ था, उसी समय रावण के घर भी एक पुत्र ने जन्म लिया था। यह संयोग दुनिया में अच्छाई और बुराई का संतुलन बनाए रखने के लिए हुआ था। बात सतयुग की है, जब माता अंजनी एक जंगल में बैठकर पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शिव की पूजा कर रही थीं। वह हाथ जोड़कर और आंखें बंद करके आराधना में लीन थी, तभी उनकी सामने रखी कटोरी में एक फल आकर गिरा। माता अंजनी ने जब उस फल को देखा, तो उन्होंने उसे प्रसाद समझ कर सेवन कर लिया। दरअसल, जब माता अंजनी जंगल में पूजा कर रही थी, तब वहां से दूर अयोध्या में राजा दशरथ भी पुत्र प्राप्ति के लिए शिव-यज्ञ करवा रहे थे। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के जन्म स्थान का वर्णन वाल्मीकि रामायण मे किष्किंधाकांड में सबसे पहले हनुमान जी के जन्म और उनके जन्म स्थान का वर्णन मिलता है. प्रसंग यह है कि जब सारे वानर माता सीता की खोज में समुद्र के किनारे पहुंचते हैं तो लंका जाने के लिए समुद्र कौन पार करेगा इसको लेकर सभी संशय में पड़ जाते हैं. जाम्बवंत जी हनुमान जी को समुद्र पार कर लंका जाने के लिए उत्साहित करते हैं और हनुमान जी को उनके दिव्य जन्म की कथा सुनाते हैं. वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुसार महावीर हनुमान जी की माता अंजना पहले स्वर्ग में पुंजकस्थली नामक अप्सरा थी, जिन्हें एक शाप (लोकश्रुतिओं के अनुसार ये शाप दुर्वासा ऋषि ने दिया था) की वजह से धरती पर एक वानरी के रुप में जन्म लेना पड़ता है. जो कभी भी अपना रुप एक इंसान की तरह कर सकती थीं

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काली की रचना कैसे हुई शिव शंकर भगवान की कथा

प्राचीन काल में राक्षस अपनी तपस्या के बल पर ऐसी शक्तियां प्राप्त कर लेते थे, जिनके सामने टिकना देवताओं के लिए भी मुश्किल हो जाता था। राक्षस अपनी शक्तियों का प्रयोग करके आतंक और भय फैलाते थे। ऐसी ही एक घटना रक्तबीज नाम से राक्षस से जुड़ी है। रक्तबीज का अंत मां काली के हाथों हुआ, लेकिन इस दौरान गलती से मां काली का पांव भगवान शिव के ऊपर आ गया था। आइये, जानते हैं उस घटना के बारे में एक बार रक्तबीज नाम के एक राक्षस ने भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे एक वरदान हासिल कर लिया। रक्तबीज को यह वरदान मिला था कि उसका खून जहां भी गिरेगा, वहां से उसी के समान राक्षस पैदा हो जाएगा। रक्तबीज को अपने इस गुण पर बहुत अभिमान था, इसलिए उसने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। घमंड में चूर रक्तबीज ने देवताओं को युद्ध के लिए ललकारा। देवता रक्तबीज से लड़ने के लिए आ गए, लेकिन जहां भी रक्त बीज का रक्त गिरता, वहां से एक और रक्त बीज पैदा हो जाता। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुत सारे रक्तबीज पैदा हो गए, जिन्हें हराने का कोई रास्ता देवताओं को दिखाई नहीं दे रहा था। दुर्गा अथवा पार्वती के प्रचंड अवतार को ही कहा निकाली कहते हैं। असुरों से युद्ध करते समय दुर्गा ने सोचा कि चंद और मुंड नाम के असुरों को मारने के लिए हिंसक और विनाशक रूप धारण करना चाहिए। गुस्से में आकर दुर्गा ने अपने तीसरे नेत्र से तेज बिजली निकाल दी। इस बिजली से नारी की एक काली आकृति प्रकट हुई। उसकी आंखें सुलग रही थी और बाल बिखरे हुए थे। उसकी लाल जीव चमक रही थी। हीरे या सोने के गहनों के बजाय वह मनुष्य  की खोपड़ी की माला पहने हुए थी। उसके तीन हाथों में त्रिशूल तलवार और मनुष्य की खोपड़ी थी। चौथे हाथ से वह आशीर्वाद दे रही थी।  पूरी तरह से रक्त पिपासु दिख रही वह देवी असुरों को मारने चल पड़ी। उसने चंद और मुंड को मार डाला। इस तरह उसका नाम चामुंडा पड़ गया।  इसके बाद शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने काली के विनाश को रोकने के लिए अपने आप को उसके पैरों पर गिरा दीया। शिव को अपने पैरों के नीचे गिरा दे काली को अपनी गलती महसूस हुई और उसने मारकाट बंद कर दी।

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शिव और पार्वती का विवाह

भगवान शिव की पत्‍नी मां पार्वती हैं और इन दोनों का जन्म जन्मांतरोंं का संबंध है. पुराणों में इनके विवाह की कई तरह की कथाएं हैं. लोकमान्‍यताओं के अनुसार, शिवजी ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में पार्वती से विवाह किया था. जहां के लोग कहते हैं कि आज भी वहां अग्नि की अखंड ज्योति जल रही है. वो ज्‍योति कभी बुझती नहीं हैं. बताया जाता है कि, शिव-पार्वती उसी ज्योति के सामने विवाह बंधन में बंधे थे. हिमालय के राजा हिमवंत और उनकी पत्नी मेनादेवी शिव जी के भक्त थे। उनकी इच्छा एक ऐसी पुत्री पाने की थी जिसका विवाह में शिव जी के साथ कर सके। मेनादेवी ने शिवजी की पत्नी गौरीदेवी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी। कई दिनों तक वह बिना खाए पिए तप करती रही। गौरीदेवी ने प्रसन्न होकर मेनादेवी की बेटी के रूप में जन्म लेने का वचन दे दिया। गौरीदेवी ने आग में कूदकर अपनी जान दे दी। इसके बाद उन्होंने मेनादेवी की बेटी के रूप में जन्म लिया, जिसका नाम पार्वती रखा गया। पार्वती ने जब बोलना शुरू किया तो उनके मुंह में पहला शब्द शिव ही निकला। बड़ी होकर वह बहुत सुंदर युवती बनी। इस बीच शिवजी ने अपनी पत्नी की मृत्यु से दुखी होकर लंबा ध्यान शुरू कर दिया था। हिमवंत को आशंका हो रही थी की शायद शिवजी गहन ध्यान मैं होने के कारण पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार ना करें। उन्होंने समस्या के समाधान के लिए नारद को बुलाया। नारद ने उनसे कहा कि पार्वती तपस्या के जरिए शिव जी का हृदय जीत सकती थी। हिमवंत ने पार्वती को शिव जी के पास ही भेज दिया। पार्वती ने दिन-रात उनकी पूजा और सेवा की। शिवजी पार्वती की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए, लेकिन उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने युवा ब्राह्मण का रूप धारण किया और पार्वती के पास जाकर कहने लगे कि भिकारी की तरह रहने वाले शिवजी से विवाह करना सही नहीं होगा। पार्वती यह सुनकर बहुत क्रोधित हुई। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वे शिव को छोड़कर और किसी के साथ विवाह नहीं करेंगी। उनके उत्तर से संतुष्ट होकर शिव अपने असली रूप में आ गए और पार्वती से विवाह करने को तैयार हो गए। हिमवंत ने धूमधाम से दोनों का विवाह कर दिया।

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जगत के पालनहार भगवान विष्णु के निवास स्थान बदरीनाथके खुले कपाट, जानें इससे जुड़ी रोचक बातें

सनातन शास्त्रों की मानें तो कालांतर में बदरीनाथ में देवों के देव महादेव का निवास स्थान था। जगत का पालनहार भगवान विष्णु को यह स्थान बहुत पसंद आया। इसके लिए भगवान विष्णु ने महादेव से निवास के लिए मांग लिया। उस समय महादेव ने विष्णु जी को निवास हेतु बदरीनाथ देकर कैलाश पर चले गए बदरीनाथ मंदिर को बदरीनारायण मंदिर भी कहा जाता है। जो अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है। यह हिन्दुओं के चार धाम मेें से एक धाम है। ऋषिकेश से यह 294 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। ये पंच बदरी में से एक बद्री भी है। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिंदू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। देवों की भूमि उत्तराखंड स्थित बदरीनाथ धाम के कपाट आज सुबह 7 बजकर 10 मिनट पर विधि पूर्वक श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं। इस शुभ और पावन अवसर पर हेलीकॉप्टर के माध्यम से बदरीनाथ धाम में पुष्प वर्षा की गई। जिस समय जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु निवास स्थान के कपाट खोले गए। उस समय 10 हजार से अधिक श्रद्धालु उपस्थित थे। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलते ही श्रीहरि के नाम का उद्घोष होने लगा। श्रद्धालुओं ने नारायण का जयकारा लगाया। पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। इसके पश्चात, श्रद्धालुओं ने नारायण श्री हरि विष्णु और अखंड ज्योति के दर्शन किए। इसके साथ ही चारधाम यात्रा की शुरुआत हो गई। आइए, बदरीनाथ से जुड़ी कुछ रोचक बातें जानते हैं कैसे नाम पड़ा बदरीनाथ पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, चिरकाल में एक बार भगवान श्रीहरि विष्णु से अप्रसन्न होकर माता लक्ष्मी अपने मायके चली गईं। उस समय भगवान विष्णु वियोग में क्षीर सागर से पृथ्वी पर तप करने आ गए। तत्कालीन समय में उस स्थान पर घना जंगल था। वहीं, चारों तरफ ऊंचे पहाड़ थे। इसके लिए भगवान विष्णु को एकांतवास के लिए यह स्थान उपयुक्त लगा। कालांतर में भगवान विष्णु ने कठिन तपस्या और साधना की। कुछ दिनों के बाद माता लक्ष्मी को अपनी गलती का अहसास हुआ। इसके पश्चात भगवान विष्णु को ढूंढते-ढूंढते मां इसी स्थान पर आ गईं। माता लक्ष्मी को देख भगवान प्रसन्न हुए। चारों तरफ बेर फल का पेड़ देख माता लक्ष्मी ने स्थान को बदरीनाथ नाम दिया

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जानें, कैसे हुई तुलसी की उत्पत्ति और क्या हैं इसकी पूजा विधि और महत्व

वृंदा के शाप से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तब माता लक्ष्मी की याचना पर वृंदा ने शाप वापस लिया और विष्णु जी को शाप मुक्त कर खुद पति जलंधर के साथ सती हो गईं। वृंदा के सती राख से एक पौधा का सृजन हुआ, जिसे तुलसी कहा गया। कालांतर में विष्णु जी ने वृंदा को वरदान दिया कि मेरे साथ आपकी पूजा-उपासना जरूर की जाएगी तुलसी का जन्म  तुलसी को हिंदू शास्त्रों में वृंदा के नाम से जाना जाता है। वह कालनेमि नामक राक्षस राजा की एक सुंदर राजकुमारी थी। उनका विवाह जालंधर से हुआ था जो भगवान शिव का एक शक्तिशाली हिस्सा था। जालंधर में अपार शक्ति थी क्योंकि वह भगवान शिव के तीसरे नेत्र से अग्नि से उत्पन्न हुआ था। जालंधर को राजकुमारी वृंदा से प्यार हो गया, जो एक बेहद पवित्र और एक समर्पित महिला थी।  सनातन धर्म में तुलसी का विशेष महत्व है। हर रोज लोग स्नान-ध्यान के बाद तुलसी जी की पूजा आराधना जरूर करते हैं। ऐसी मान्यता है कि अगर भगवान विष्णु जी और माता लक्ष्मी की कृपा पाना है तो रोजाना सुबह में तुलसी को जल का अर्घ्य देना चाहिए और शाम में दीपक जलाकर आरती करनी चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति के घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। धार्मिक ग्रंथों में लिखा है कि तुलसी जी भगवान विष्णु जी की अर्धांगनी हैं, जो माता लक्ष्मी की स्वरूप हैं। आइए जानते हैं कि क्यों तुलसी पूजा क्यों की जाती है और पूजा कैसे करनी चाहिए- सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा क्या बताती है, नहीं जानते हैं तो यहां पढ़ें तुलसी जी की पूजा क्यों की जाती है पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, चिरकाल में वृंदा नामक एक युवती रहती थी, जो कि भगवान विष्णु जी की परम भक्त थीं, लेकिन वह राक्षस कुल की थीं। कालांतर में वृंदा की शादी जलंधर नामक राक्षस से हुई। इसके बाद वह कुशल गृहिणी बनकर गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगीं। इसके बावजूद वह भगवान विष्णु जी की नित्य पूजा किया करती थीं। इस युद्ध में देवता जलंधर को हरा न सके इसी दौरान एक बार देवताओं और दानवों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में जलंधर भी दानवों की तरफ से युद्ध करने गए। उस समय वृंदा ने कहा कि-हे स्वामी आप युद्ध में जा रहे हैं और मैं पूजा करने जा रही हूं। आप युद्ध और मैं तप करूंगी। इस तप में विष्णु जी से आपकी सलामती की प्रार्थना करूंगी। इसके बाद वृंदा विष्णु जी की तपस्या में लग गई। इस युद्ध में देवता जलंधर को हरा न पाए। विष्णु जी शालिग्राम पत्थर बन गए इसके बाद विष्णु जी जलंधर रूप धारण कर वृंदा के पास पहुंचे। अपने पति को देख वृंदा झट से विष्णु जी के मायारूपी जलंधर के चरण स्पर्श की। उसी समय देवताओं ने जलंधर को युद्ध में परास्त कर उसका वध कर दिया। इसके बाद जलंधर का सर वृंदा के पास आकर गिरा। यह देख वृंदा समझ गई कि उसके साथ छल किया गया। उसी समय वृंदा ने छली विष्णु जी को पत्थर होने का शाप दिया। इस शाप के फलस्वरूप विष्णु जी शालिग्राम पत्थर बन गए। वृंदा के शाप से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तब माता लक्ष्मी की याचना पर वृंदा ने शाप वापस लिया और विष्णु जी को शाप मुक्त कर खुद पति जलंधर के साथ सती हो गईं। वृंदा के सती राख से एक पौधा का सृजन हुआ, जिसे तुलसी कहा गया। कालांतर में विष्णु जी ने वृंदा को वरदान दिया कि मेरे साथ आपकी पूजा-उपासना जरूर की जाएगी।  रोजाना तुलसी जी की पूजा कैसे करें हर रोज स्नान-ध्यान के बाद तुलसी जी के साथ शालिग्राम (प्राण प्रतिष्ठा कर ) पत्थर को भी जल का अर्घ्य दें। इसके बाद तुलसी स्थल का चार बार परिक्रमा करें। जब आप तुलसी जी की परिक्रमा करें तो निम्न मंत्र का उच्चारण जरूर करें। वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।। एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम। यः पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।। इसके बाद भगवान श्रीहरि विष्णु जी और माता तुलसी से घर की सुख, शांति और समृद्धि के प्रार्थना करें। इसी तरह शाम में तुलसी जी की रोजाना आरती करें। आरती ज्योति स्थल पर तंदुल से स्वस्तिक का चिन्ह जरूर बनाएं। उसी स्थान पर आरती ज्योति रखें।

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दुर्गा अष्टमी की कहानी

नमस्कार दोस्तों, हम आपके सामने एक ऐसी कथा लेकर आ रहे हैं जो पौराणिक और धार्मिक है, जिसे शायद बहुत कम ही लोगों को पता होता है। लेकिन न पता होने के कारण भी हम उस को मानते है। हम जिस त्यौहार को मनाते, उसके विषय मे जानकारी जरूर होनी चाहिए तभी त्यौहार भी अच्छा होता है और खुशी मनाने में भी अच्छा लगता है। साल में 365 दिन होते है, उनमें से कुछ खास महीनों में 9 दिन ऐसे है आते है, जो माता रानी के होते है। जिनमें 9  देवियों की पूजा की जाती है। इस 9 दिन को ही नवरात्रि कहा जाता है। भारत मे लोग इस समय को बड़े ही सुंदर ढंग से मनाते है। इसमें झाँकीय सजाई जाती है, माता की आरती की जाती है, पूजा भी होती है और लोग अपनी मनोकामना के लिए उपवास भी रखते है। नवरात्रि ग्रीष्म के समय अप्रैल माह के दूसरे सप्ताह में होती है और शीतकालीन समय मे यह अक्टूबर माह में पड़ती है। इस 9 दिनों में किये गए कार्य बड़े ही शुभ माने जाते है, जो अत्यंत ही सुंदर ढंग से मनाए जाते है। लोग इस नवरात्रि में ही घर के लिए समान खरीदते है। इस समय के बीच 8वें दिन एक ऐसे दिन माना जाता है, जो एक ऐसी देवी की पूजा की जाती है। जिन्होंने ने इस जीवन जगत में असुरों का नास किया था और इस दिन को अष्टमी के नाम से जाना जाने लगा था। तो चलिए जानते है इसे क्यों मानते है। दुर्गा अष्टमी की कहानी प्राचीन समय मे जब स्वर्ग पर असुरों ने अपना कब्जा जमाने का सोच और उस पर चढ़ाई करके स्वर्ग के राजा इंद्र से युद्ध किया। उन असुरों में से सबसे शक्तिशाली असुर महिसशुर था, जिसमें स्वर्ग के राजा इंद्र की हार हो जाती है। तब इंद्र तीनों लोकों के स्वामी भगवान शिव के पास जाते है और उनसे प्रार्थना करते है। फिर वे भगवान विष्णु के पास जाते है तथा ब्रम्हा के पास जाते है। तब तीनों देवता मिल कर एक ऐसी आदिशक्ति को प्रकट करते है, जो अत्यंत ही शक्तिशाली होती है। जब आदि शक्ति का जन्म होता है तभी सभी देवता वही उपस्थित होते है, जिन्होंने आदि शक्ति को अपनी ही  इच्छानुशार शक्ति देते है, जिससे आदि शक्ति और भी शक्तिशाली हो जाती है। महिषासुर सभी जगह अपना आधिपत्य जमा रहा था, उसने ऋषि मुनियों को भी असुर बना दिया था और अगर जो इसकी बात नहीं मानता था, वह उसे मार देता था। जगह-जगह पर हो रहे यज्ञ को उसने भंग कर दिया था। बहुत ही दुष्ट था, वह बहुत अत्याचार कर रहा था। तभी महिसशुर और माँ दुर्गा के बीच लड़ाई होती है, जिसमें मां दुर्गा सभी असुरों का नाश कर देती है। अपने त्रिसूल से महिषाशुर का वध कर देती है और इसी दिन को दुर्गा अष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। इसे लोग बहुत ही धूम धाम से मनाते है। अच्छे अच्छे पकवान भी बनाते है और गीत संगीत होता है लोग ढोल मंजीरा से नाच गाना करते है। सभी देवियों में दुर्गा को ही सबसे सर्वोपरी माना गया है, जिन्होंने असुरों का वध करने के साथ ही अपने भक्तों के द्वारा प्रसंसा करने पर उन्हें वरदान देती है और मुसीबतों से बचाती है। आप सबको इन सबका उदाहरण फिल्मों में देखने को मिल ही गया होगा, लेकिन यह सभी घटना सत्य है। इनकी आरती में भी कहा गया है कि “सूदन को आंख दे कोढ़िन को काया, मझींन को पुत्र दे” अर्थात अन्धो को आंखे दे और जो व्यक्ति गरीब होते है, उनको धन से भर दे, मंझिन को पुत्र दे अर्थात जिन स्त्रियों को पुत्र नसीब नहीं होता है, उन्हें पुत्र देती है। नवरात्रि में नव देवियों की पूजा की जाती है। नौ रूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी (दुर्गा) का नाम दिया गया है।

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