कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा | कार्तिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी की कहानी

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत, कार्तिक संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कहलाता है। इसे करवा चतुर्थी भी कहते हैं । इस दिन ‘पिंग’ गणेश की पूजा की जाती है । सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन अपने पति के लम्बी उम्र के लिये व्रत रखती है। गणेश जी को करवा अर्पित करती हैं। यह व्रत स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य प्रदान करती है। इस व्रत से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि जब मन संकटों से घिरा महसूस करे, तो गणेश चतुर्थी का व्रत करें । इससे कष्ट दूर होते हैं और धर्म, अर्थ, मोक्ष, विद्या, धन व आरोग्य की प्राप्ति होती है । कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा  पार्वती जी कहती है कि हे भाग्यशाली! लम्बोदर! भाषणकर्ताओं में श्रेष्ठ! कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को किस नाम वाले गणेश जी की पूजा किस भांति करनी चाहिए। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि अपनी माता की बात सुनकर गणेश जी ने कहा कि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का नाम संकटा है। उस दिन पिंग नामक गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। पूजन पूर्वोक्त विधि से करना उचित हैं। भोजन एक बार करना चाहिए। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करना चाहिए। मैं इस व्रत का महात्म्य कह रहा हूँ, सावधानी पूर्वक श्रवण कीजिये। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को घी और उड़द मिलाकर हवन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती हैं। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि वृत्रासुर दैत्य ने त्रिभुवन को जीत करके सम्पूर्ण देवों को परतंत्र कर दिया। उसने देवताओं को उनके लोकों से निष्काषित कर दिया। परिणामस्वरूप देवता लोग दसों दिशाओं में भाग गए। तब सभी देव इंद्र के नेतृत्व में भगवान विष्णु के शरणागत हुए। देवों की बात सुनकर विष्णु ने कहा कि समुद्री द्वीप में बसने के कारण वे निरापद होकर बलशाली हो गए हैं। पितामह ब्रह्मा जी से किसी देवों के द्वारा न मरने का उन्होंने वर प्राप्त कर लिया हैं। अतः आप लोग अगस्त्य मुनि को प्रसन्न करे। वे मुनि समुद्र को पी जाएंगे। तब दैत्य लोग अपने पिता के पास चले जाएंगे। आप लोग सुख पूर्वक स्वर्ग में निवास करने लगेंगे। अतः आप लोगों का कार्य अगस्त्य मुनि की सहायता से पूरा होगा। ऐसा सुनकर सब देवगण अगस्त्य मुनि के आश्रम में गये और स्तुति के द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि हे देवताओं! डरने की कोई बात नहीं हैं, आप लोगों को मनोरथ अवशय ही पूरा होगा। मुनि की बात से सब देवता अपने अपने लोक को चले गए। इधर मुनि को चिंता हुई कि एक लाख योजन इस विशाल समुद्र को मैं कैसे पी सकूंगा? तब गणेश जी का स्मरण करके संकट चतुर्थी के उत्तम व्रत को विधिपूर्वक संपन्न किया। तीन महीने तक व्रत करने के बाद गणेश जी उन पर प्रसन्न हुए। उसी व्रत के प्रभाव से अगस्त्य जी ने समुद्र को सहज ही पान करके सूखा डाला। गणेश जी की इस बात से पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुई। कृष्ण जी कहते है कि हे महाराज युधिष्ठिर! आप भी चतुर्थी का व्रत कीजिये। इसके करने से आप शीघ्र ही सब शत्रुओं को जीतकर अपना राज्य पा जायेंगे। श्रीकृष्ण के आदेशानुसार युधिष्ठिर ने गणेश जी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उन्होंने शत्रुओं को जीतकर अखंड राज्य प्राप्त कर लिया। कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजन विधि प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। श्री गणेश जी का पूजन पंचोपचार (धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, फूल) विधि से करें। इसके बाद हाथ में जल तथा दूर्वा लेकर मन-ही-मन श्री गणेश का ध्यान करते हुये व्रत का संकल्प करें। संध्या होने पर दुबारा स्नान कर स्वच्छ हो जायें। श्री गणेश जी के सामने सभी पूजन सामग्री के साथ बैठ जायें। विधि-विधान से गणेश जी का पूजन करें। वस्त्र अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में लड्डू अर्पित करें। चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य अर्पण करें। उसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। घी और उड़द मिला कर हवन करें। तत्पश्चात् गणेश जी की आरती करें। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण को भोजन करा कर खुद मौन रह कर भोजन करें। स्त्रियाँ चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात् अपने पति की आरती और पूजा करें।

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आस्था का केंद्र ही नहीं धरोहर भी है गोला का शिव मंदिर

गोला गोकर्णनाथ। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ के पौराणिक शिव मंदिर के महात्म्य और प्रसंग पुराणों और लोक कथाओं में मिलते हैं। यह पूरे तराई क्षेत्र का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। यह मंदिर प्रदेश की अनमोल धरोहर तो है ही, यहां होने वाले धार्मिक आयोजन और मेले सांस्कृतिक विरासत भी हैं। मान्यता है कि भगवान शंकर ने यहां मृग रूप में विचरण किया था। वराह पुराण में वर्णन है कि भगवान शंकर वैराग्य उत्पन्न होने पर यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण करने आए और रमणीक स्थल देखकर यही रम गए। ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र को चिंता हुई और वह उन्हें ढूंढने के लिए निकले तो इस वन प्रांत में विशाल मृग को सोते देखकर समझ गए कि यही शिव हैं। वे जैसे ही उनके निकट गए तो आहट पाकर मृग भागने लगा। कथा के अनुसार देवताओं ने उनका पीछा कर उनके सींग पकड़ लिए तो सींग तीन टुकड़ों में विभक्त हो गया। सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्ण नाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सींग का दूसरा टुकड़ा ब्रह्मा जी ने बिहार के श्रंगवेश्वर में स्थापित किया। तीसरा टुकड़ा देवराज इंद्र अपने साथ ले गए, जिसे उन्होंने अमरावती में स्थापित किया।यहां के महत्व का वर्णन शिव पुराण वामन, पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता है। पौराणिक शिव मंदिर से जुड़ी एक किवदंती भी लोक मान्यता का रूप ले चुकी है कि भगवान शिव लंकापति रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए और रावण भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाने लगा। भगवान शिव ने शर्त रखी कि उन्हें रास्ते में कहीं भी रखा, तो वह उस स्थान से नहीं जाएंगे। छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन शर्त के अनुसार रावण भगवान शिव को लेकर लंका के लिए चला। जब रावण गोला गोकर्णनाथ के पास पहुंचा तो उसे लघुशंका का आभास हुआ। रावण एक चरवाहे को इस हिदायत के साथ शिवलिंग देकर लघुशंका के लिए चला गया कि वह शिवलिंग भूमि पर नहीं रखेगा। काफी देर तक वापस ना आने पर चरवाहे ने भगवान शिवलिंग को भूमि पर रख दिया।वापस लौटे रावण ने शिवलिंग उठाने की कोशिश की मगर नहीं उठा सका। इस पर गुस्से में अपने अंगूठे से शिवलिंग को भूमि में दबा दिया। मान्यता है कि गोला के पौराणिक शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग में रावण के अंगूठे का निशान आज भी मौजूद है।भूतल से नौ फिट की गहराई में स्थापित है शिवलिंग – पौराणिक शिव मंदिर परिसर में प्रवेश द्वार सहित चारों दिशा में द्वार हैं। वहीं, मंदिर के तीन द्वार हैं। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग भूतल से नौ फीट की गहराई में है। शिवभक्त दंडवत करके ही दर्शन पाते हैं। पौराणिक शिव मंदिर के निकट गोकर्ण तीर्थ 5300 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में है। जिसका 2016 में आवास विकास योजना के तहत एक करोड़ 10 लाख रुपए की लागत से जीर्णोद्धार कराया गया था। वहीं वर्ष 2014 में शिव सेवार्थ समिति द्वारा शिव भक्तों के सहयोग से तीर्थ के मध्य विशालकाय भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित कराई थी।डेढ़ शताब्दी पहले जूना अखाड़ा के नागा साधु करते थे मंदिर की देखभाल – पौराणिक शिव मंदिर कमेटी अध्यक्ष जनार्दन गिरी ने बताया कि करीब डेढ़ सदी पहले जूना अखाड़ा के नागा पंथ शिव मंदिर की देखरेख करता था, जो हाथियों पर आसीन होकर यहां आते थे। जूना अखाड़ा के नागा पंथ ने ही गोस्वामी समाज को मंदिर की देखरेख का जिम्मा दिया था।मंदिर निर्माण सर्वप्रथम किसने कराया, इसके प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, पूर्वज बताते थे कि यहां एक गोल गुंबद का छोटा मंदिर हुआ करता था। जिसे शिव भक्तों ने जीर्णोद्धार करा कर भव्य रुप दिया। वर्तमान में शिव मंदिर का जो स्वरूप है उसका जीर्णोद्धार बरेली के शिवभक्त परिवार के डॉ. संजय अग्रवाल. डा.ॅ रेनू अग्रवाल, डॉ. हिमांशु अग्रवाल, डॉ. प्रियंका अग्रवाल ने कराया है।

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छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन

सावन का पवित्र माह चल रहा है और इस समय भक्त भगवान शिव के दर्शन करने लिए शिवनगरी जाते हैं। कोई कांवड़ यात्रा में शामिल होकर तो कोई अन्य माध्यमों से भोलेनाथ का आर्शीवाद लेने के लिए उनकी शरण में जाता है। यूपी के लखीमपुरी खीरी जिले की गोला तहसील में भी छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला गोकर्णनाथ है, जहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। गोला के गोकर्णनाथ के बारे में कहा जाता है कि सतयुग में लंका का राजा रावण भगवान शिव को यहां लाया था। नवरात्रि में मां दुर्गा के इन 8 मंदिरों में आप भी दर्शन करने पहुंचें, मुरादे होंगी पूरी गोला गोकर्णनाथ के बारे में प्राचीन कथा जैसा की प्राचीन कथाओं में बताया गया है कि लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की। रावण की तपस्या से खुश होकर भगवान ने उससे वरदान मांगने को कहा तो रावण ने कहा कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। यह सुनकर सभी देवता परेशान हो गए और ब्रह्माजी के पास गए और कहा कि अगर शिव रावण के साथ लंका चले तो सृष्टि का कार्य कैसे होगा? इसके बाद ब्रह्माजी ने भगवान शिव को सोच समझकर वरदान देने के लिए कहा। इस पर शिवजी ने रावण से कहा कि यदि तुम मुझे लंका ले जाना चाहते हो तो ले चलो लेकिन मेरी एक शर्त रहेगी। भगवान शिव ने रावण से कहा कि जहां भी मुझे भूमि स्पर्श हो जाएगी, मैं वही स्थापित हो जाउंगा। इस बात पर रावण सहमत हो गया। भगवान ने एक शिवलिंग का रूप धारण कर लिया। इसके बाद रावण शिवलिंग को लेकर जा रहा था। इसी दौरान भगवान शिव ने रावण को लघुशंका की इच्छा जगा दी। काफी समय तक बर्दाश्त करने के बाद रावण ने एक चरवाहे को शिवलिंग पकड़ाकर लघुशंका करने लगा। इसी समय भगवान ने अपना वजन बढ़ा दिया और इससे चरवाहे ने रावण को आवाज लगाकर कहा कि वह अब इस शिवलिंग को उठाए नहीं रह सकता है। रावण लघुशंका करने में व्यस्त होने के कारण सुन नहीं पाया। इधर चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। जब रावण वापस आया और वह चरवाहे का मारने के लिए दौड़ा तो चरवाहे कुएं में गिर गया। इसके बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह असफल रहा। इससे क्रोधित होकर रावण ने अंगुठे से शिवलिंग को जोर से दबा दिया, आज भी शिवलिंग पर रावण के अंगुठे का निशान है। रावण निराश होकर वापस लंका चला गया। इसके बाद भगवान शिव ने चरवाहे की आत्मा को बुलाकर कहा कि आज के बाद लोग तुम्हें भूतनाथ के नाम से जानेंगे और मेरे दर्शन के बाद तुम्हारे दर्शन करने पर भक्तों को विशेष पूण्यलाभ मिलेगा। इसके बाद से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने के लिए गोला के गोकर्णनाथ आते हैं। सावन के महीने में भगवान शिव दर्शनों को आने वाले लाखों भक्त शिवलिंग के दर्शनों के बाद बाबा भूतनाथ के भी दर्शन अवश्य करते हैं। लखीमपुर खीरी जिले की गोला तहसील में स्थित गोकर्णनाथ लखीमपुर और शाहजहांपुर के रूट पर है। लखीमपुर से मंदिर की दूरी 35 किलोमीटर है। गोला के लिए बस और ट्रेन आसानी से उपलब्ध हैं।

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नवरात्रि में मां दुर्गा के इन 8 मंदिरों में आप भी दर्शन करने पहुंचें, मुरादे होंगी पूरी

वैष्णो देवी मंदिर मनसा देवी नैना देवी कामाख्या देवी मंदिर चामुंडा देवी मंदिर करणी माता मंदिर मां ब्रह्मचारिणी मंदिर\ अम्बा मंदिर देवी दुर्गा भारत में हिन्दू धर्म के सबसे पूजनीय देवी में से एक हैं। मां दुर्गा को भारत में कष्ट हरणी, पाप नाशनी आदि कई शक्ति के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के पावन दिनों में भक्त भी मां दुर्गा के दर्शन करने के लिए फेमस और पवित्र मंदिरों में जाते रहते हैं। ऐसे में अगर आप भी नवरात्रि में माता का दर्शन करना चाहते हैं तो इन पवित्र मंदिरों में जा सकते हैं। आइए जानते हैं। 1. वैष्णो देवी मंदिर समुद्र तल से लगभग 15 हज़ार से भी अधिक मीटर की ऊंचाई पर त्रिकुट पहाड़ियों में स्थित वैष्णो देवी मां दुर्गा का पवित्र स्थान है। मान्यताओं के अनुसार जो भी वैष्णो देवी का दर्शन करता है तो उनकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। नवरात्रि में यहां लाखों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 2. मनसा देवी कहा जाता है कि उत्तराखंड में स्थित मनसा देवी का नाम इस विश्वास से पड़ा कि देवी अपने भक्तों की सभी मुरादे पूरी कर देती हैं। यह मंदिर इस कदर पवित्र है कि उत्तराखंड के लगभग हर शहर से मां का दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि में यहां हर दिन कार्यक्रम का आयोजन होता है। 3. नैना देवी उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित नैना देवी मंदिर भारत के लगभग हर शहर, जिला और कस्बों में फेमस है। इस मंदिर को भारत में स्थित 51 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर देवी सती की आंखों के लिए समर्पित है। कहा जाता है कि मंदिर उसी जगह बना है जहां देवी सती की नज़र पृथ्वी पर गिरी थी। 4. कामाख्या देवी मंदिर असम की राजधानी गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी के मध्य में स्थित कामाख्या देवी मंदिर एक विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। कामाख्या मंदिर देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस पवित्र मंदिर का जिक्र पौराणिक कथाओं में भी है। नवरात्रि में यहां हर रोज हजारों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। 5. चामुंडा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश में स्थित चामुंडा देवी का मंदिर प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में से एक है। चामुंडा देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहां स्थापित देवी को दुर्गा मां के सबसे शक्तिशाली अवतारों में एक माना जाता है। कहा जाता है कि मंदिर के अंदर एक तलब है जिसमें डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं। 6. करणी माता मंदिर भारत के पवित्र दुर्गा मंदिरों में से एक करणी माता राजस्थान के बीकानेर शहर में मौजूद है। यह मंदिर दुर्गा के अवतारों में से एक करणी माता को समर्पित है। इस मंदिर की अनूठी विशेषता चूहों की आबादी हैं जो मंदिर के अंदर निवास करते हैं।   7. मां ब्रह्मचारिणी मंदिर उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित मां ब्रह्मचारिणी का मंदिर भी एक प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर है। गंगा किनारे स्थित इस मंदिर में नवरात्र के दिनों में भक्तों की लाइन लगी रहती हैं। कहा जाता है कि जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में पहुंचते हैं उसकी सभी मुरादे पूरी हो जाती हैं। 8. अम्बा मंदिर गुजरात के जूनागढ़ में स्थित अंबा मंदिर देवी 51 शक्ति पीठो में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार अगर नवविवाहित जोड़े दर्शन करते हैं तो उनकी सभी मुराद पूरी हो जाती है। नवरात्र के दिनों में यहां देश के हर कोने से लोग पहुंचते हैं।

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भगवान श्री राम जी के 9 सबसे प्रसिद्ध मंदिर

1. त्रिप्रायर श्री राम मंदिर, केरल 2. कालाराम मंदिर, नासिक 3. सीता रामचंद्रस्वामी मंदिर, तेलंगाना 4. राम राजा मंदिर, मध्य प्रदेश 5. कनक भवन मंदिर, अयोध्या 6. श्री राम तीर्थ मंदिर, अमृतसर 7. कोंडांडा रामास्वामी मंदिर, चिकमंगलूर 8. रामास्वामी मंदिर, तमिलनाडु 9. रघुनाथ मंदिर, जम्मू देश में मौजूद अन्य राम मंदिरों की जानकारी शायद ही हर किसी को हो। बता दें कि भारत में कई राम मंदिर विद्यमान हैं।  1. त्रिप्रायर श्री राम मंदिर, केरल यह मंदिर केरल के त्रिशूर जिले में स्थित है। यहां स्थापित मूर्ति के पीछे बहुत ही आकर्षक कहानी है। कहा जाता है कि यहां स्थापित मूर्ति का इस्तेमाल भगवान कृष्ण द्वारा किया जाता था। यह मूर्ति समुद्र में डूबी हुई थी और केरेला के चेट्टुवा क्षेत्र के एक मछुआरे द्वारा स्थापित की गई थी। इसके बाद शासक वक्कायिल कैमल ने उस मूर्ति को त्रिपयार मंदिर में स्थापित किया। यह मंदरि बेहद ही खुबसूरत है। मान्यता है कि जो भक्त यहां दर्शन करता है वो अपने आसपास की सभी बुरी आत्माओं से मुक्त हो जाता है। प्रसिद्ध 10 गणेश मंदिर, जहां जाने से होती हैं मुरादें पूर्ण 2. कालाराम मंदिर, नासिक: कालाराम मंदिर महाराष्ट्र के नासिक के पंचवटी क्षेत्र में स्थित है। इसका शाब्दिक अर्थ काला राम है। यहां पर भगवान राम की 2 फीट ऊंची काली प्रतिमा स्थापित है। माता सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां भी स्थापित हैं। ऐसा माना जाता है कि 14 वर्ष के वनवास के लिए जब श्री राम, माता सीत और लक्ष्मण आए थे तब 10वे वर्ष बाद वह पंचवटी में गोदावरी नदी के किनारे रहे थे। इस मंदिर का निर्माण सरदार रंगारू ओढेकर ने किया था। इन्होंने एक सपना देखा था कि गोदावरी नदी में राम की एक काली मूर्ति है। इस मूर्ति को इन्होंने अगले ही दिन निकाला और कालाराम मंदिर की स्थापना की। 3. सीता रामचंद्रस्वामी मंदिर, तेलंगाना: यह मंदिर तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम जिले के भद्राचलम में स्थित है। यह मंदिर वहां खड़ा है जहां श्री राम ने लंका से माता सीता को वापस लाने के लिए गोदावरी नदी को पार किया था। मंदिर के अंदर भगवान राम की धनुष और बाण के साथ त्रिभंगा के रुख में मूर्ति स्थापित है। देवी सीता हाथ में कमल लेकर उनके बगल में खड़ी हैं। 4. राम राजा मंदिर, मध्य प्रदेश: यह मंदिर मध्य प्रदेश के ओरछा में स्थित है। राम राजा मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां श्री राम को भगवान के रूप में नहीं बल्कि राजा के रूप में पूजा जाता है। यहां हर दिन गार्ड ऑफ ऑनर किया जाता है। श्री राम को शस्त्र सलामी दी जाती है। 5. कनक भवन मंदिर, अयोध्या: राम जन्मभूमि यानी अयोध्या भगवान राम का जन्म स्थान है। यहां पर स्थित कनक भवन मंदिर, अयोध्या में सबसे अच्छे राम मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर के नाम के पीछे भी एक कहानी है। इसका नाम सोने के आभूषणों और राम और सीता की मूर्तियों के स्वर्ण सिंहासन के कारण रखा गया है। इस मंदिर को इस तरह बनाया गया है कि इसकी मुख्य दीवार पूर्व दिशा की तरफ है। जब भी सूर्योदय होता है तो उसकी दीवारें तेजस्वी दिखती हैं। 6. श्री राम तीर्थ मंदिर, अमृतसर: यह मंदिर अमृतसर, पंजाब में स्थित है। जब लंका से आने के बाद माता सीत को राम जी ने त्याग दिया था तब उन्हें ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में आश्रय मिला था। माना जाता है कि यह मंदिर उसी स्थान पर बना है। यही वह जगह है जहां माता सीता ने जुड़वां बच्चों लव और कुश को जन्म दिया था। 7. कोंडांडा रामास्वामी मंदिर, चिकमंगलूर: यह मंदिर कर्नाटक के चिक्कमगलुरु जिले में स्थित है। हिरामगलूर में, परशुराम ने भगवान राम से अपनी शादी के दृश्य दिखाने का अनुरोध किया। इसी के चलते कोंडंडा में रमास्वामी की मूर्तियां हिंदू विवाह समारोहों की परंपराओं के अनुसार ही स्थित हैं। यह भारत का एकमात्र मंदिर है जहां माता सीता राम और लक्ष्मण के दाहिनी ओर खड़ी दिखाई देंगी। 8. रामास्वामी मंदिर, तमिलनाडु: रामास्वामी मंदिर तमिलनाडु में स्थित है। रामास्वामी मंदिर को दक्षिणी भारत का अयोध्या कहा जाता है। यह एकमात्र मंदिर है जहां भरत और शत्रुघ्न के साथ राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर परिसर में अलवर सन्नथी, श्रीनिवास सननाथी और गोपालन सन्नथी तीन अन्य मंदिर भी स्थित हैं। 9. रघुनाथ मंदिर, जम्मू: यह मंदिर जम्मू में स्थित है। यह बेहद प्रसिद्ध मंदिर है। रघुनाथ मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर के अलावा लगभग सात अन्य मंदिर हैं जहां हिंदू धर्म के अन्य देवताओं को पूजा जाता है। रघुनाथ मंदिर की वास्तुकला में मुगल शैली की वास्तुकला का एक टिंट देखा जा सकता है।

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श्री गंगा दशहरा कब है? क्या है इस दिन का महत्व?

प्रतिवर्ष वैशाख माह में गंगा सप्तमी और ज्येष्‍ठ माह में गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। दोनों पर्वों का ही अलग-अलग महत्व है। कहा जाता हैं कि गंगा सप्तमी के दिन मां गंगा भगवान शिव जी की जटाओं में उतरी थीं तथा इसके बाद गंगा दशहरा को धरती पर उनका अवतरण हुआ था। वर्ष 2023 में गंगा दशहरा पर्व दिन मंगलवार, 30 मई 2023 को मनाया जाएगा। इस बार हस्त नक्षत्र में तथा व्यतीपात योग में गंगा दशहरा पर्व मनाया जाएगा।  गंगा दशहरा महत्व शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को दशहरा कहते हैं। इसमें स्नान, दान और व्रत का विशेष महत्व होता है। इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना जाता है। श्री गंगा दशहरा पर्व हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इन अवसरों पर गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पर्व के लिए गंगा मंदिरों सहित अन्य मंदिरों पर भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। गंगाजल को सबसे अधिक पवित्र माना जाता है, जिसका उपयोग पूजा-पाठ में सबसे अधिक किया जाता है।  पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। गंगा दशहरा वो समय होता है जब मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था जबकि गंगा जयंती (गंगा सप्तमी) वह दिन होता है जब गंगा का पुनः धरती पर अवतरण हुआ था। गंगा दशहरा के दिन सभी गंगा मंदिरों में भगवान भोलेनाथ का अभिषेक किया जाता है तथा मोक्षदायिनी गंगा का पूजन-अर्चना किया जाता है। मान्यतानुसार गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश-सम्मान तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगा दशहरा पर्व कब है, जानिए पूजा का शुभ समय  गंगा दशहरा 30 मई 2023 मंगलवार को  गंगा अवतरण पूजा समय ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि का प्रारंभ- सोमवार, 29 मई 2023 को 11.49 ए एम से,  ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि का समापन- मंगलवार, 30 मई 2023 को 01.07 पी एम पर।  हस्त नक्षत्र का प्रारंभ- 30 मई 2023 को 04.29 ए एम से,  हस्त नक्षत्र की समाप्ति- 31 मई 2023 को 06.00 ए एम पर। व्यतीपात योग का प्रारंभ- 30 मई 2023 को 08.55 पी एम से,  व्यतीपात योग का समापन- 31 मई 2023 को 08.15 पी एम पर।  30 मई दिन का चौघड़िया चर- 08.51 ए एम से 10.35 ए एम लाभ- 10.35 ए एम से 12.19 पी एम अमृत- 12.19 पी एम से 02.02 पी एम शुभ- 03.46 पी एम से 05.30 पी एम रात्रि का चौघड़िया लाभ- 08.30 पी एम से 09.46 पी एम शुभ- 11.02 पी एम से 31 मई को 12.19 ए एम तक।  अमृत- 12.19 ए एम से 31 मई को 01.35 ए एम तक। चर- 01.35 ए एम से 31 मई को 02.51 ए एम तक।

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प्रसिद्ध 10 गणेश मंदिर, जहां जाने से होती हैं मुरादें पूर्ण

1. सिद्धि विनायक गणेश मंदिर मुंबई 2. चिंतामन गणपति उज्जैन 3. रॉकफोर्ट उच्ची पिल्लयार मंदिर, तमिलनाडु 4. कनिपकम विनायक मंदिर, चित्तूर 5. मनकुला विनायगर मंदिर, पुडुचेरी 6. मधुर महागणपति मंदिर, केरल 7. डोडा गणपति मंदिर, बेंगलुरु 8. रणथंबौर गणेश मंदिर, राजस्‍थान 9. गणेश टोक मंदिर, गंगटोक (सिक्किम) 10. डोडीताल, उत्तराखंड यूं तो संसार में हजारों गणेश मंदिर हैं। देश-विदेश में भगवान गणेश की कई प्राचीन प्रतिमाएं विराजमान हैं परंतु देश में कुछ ऐसे खास मंदिर हैं जिनकी प्रसिद्धि और प्रताप दूर-दूर तक फैला और जहां लाखों की संख्यां में भक्त एकत्रित होते हैं। आओ जानते हैं ऐसे ही खास 10 मंदिरों की संक्षिप्त जानकारी के अलावा सभी महत्वपूर्ण मंदिरों की भी जानकारी। 1. सिद्धि विनायक गणेश मंदिर मुंबई इस मंदिर का निर्माण 19 नवंबर सन 1801 में गुरूवार के दिन पूर्ण हुआ था। मुंबई प्रभादेवी में काका साहेब गाडगिल मार्ग और एस.के. बोले मार्ग के कोने पर वह मंदिर स्थित है। माटूंगा के आगरी समाज की स्वर्गीय श्रीमती दिउबाई पाटिल के निर्देशों और आर्थिक सहयोग से एक व्यावसायिक ठेकेदार स्वर्गीय लक्ष्मण विथु पाटिल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। आज इस मंदिर को गजानन के विशेष मंदिर का दर्जा प्राप्त है। मंदिर की सिद्ध‍ि और प्रसिद्ध‍ि इतनी है कि आम हो या खास, सभी बप्पा के दर पर खिंचे चले आते हैं। महाराष्‍ट्र में सिद्धि विनायक मंदिर की तरह भी दगड़ू सेठ गणपति का मंदिर भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है यह महाराष्ट्र का दूसरा सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। इसे आम बोलचाल में दगडू सेठ का मंदिर भी कहते हैं। इसे श्रीमंत दग्‍दूशेठ नाम के हलवाई ने अपने बेटे की प्‍लेग से मौत हो जाने के बाद बनवाया था।  जिस प्रकार भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है वैसे ही गणपति उपासना के लिए महाराष्ट्र के अष्टविनायक मंदिरों का विशेष महत्व है। महाराष्ट्र में पुणे के समीप अष्टविनायक के आठ पवित्र मंदिर 20 से 110 किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित हैं। इन मंदिरों का पौराणिक महत्व और इतिहास है। इनमें विराजित गणेश की प्रतिमाएं स्वयंभू मानी जाती हैं। इन सभी मंदिरों के बारें में गणेश और मुद्गल पुराण में बताया गया। ये मंदिर हैं- 1,मयूरेश्वर या मोरेश्वर मंदिर, पुणे, 2. सिद्धिविनायक मंदिर, अहमदनगर, 3. बल्लालेश्वर मंदिर, रायगढ़, 4. वरदविनायक मंदिर, रायगढ़, 5. चिंतामणी मंदिर, पुणे, 6. गिरिजात्मज अष्टविनायक मंदिर, पुणे, 7. विघ्नेश्वर अष्टविनायक मंदिर, ओझर और 8. महागणपति मंदिर, राजणगांव। 2. चिंतामन गणपति उज्जैन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से करीब 6 किलोमीटर दूर ग्राम जवास्या में भगवान गणेश का प्राचीनतम मंदिर स्थित है। इसे चिंतामण गणेश के नाम से जाना जाता है। गर्भगृह में प्रवेश करते ही गणेश जी की तीन प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। पहला चिंतामण, दूसरा इच्छामन और तीसरा सिद्धिविनायक। यह स्वयंभू मूर्तियां हैं। ऐसी मान्यता है कि चिंतामण चिंता से मुक्ति प्रदान करते हैं, इच्छामन अपने भक्तों की कामनाएं पूर्ण करते हैं जबकि सिद्धिविनायक स्वरूप सिद्धि प्रदान करते हैं। चिंतामण गणेश मंदिर परमारकालीन है, जो कि 9वीं से 13वीं शताब्दी का माना जाता है। इस मंदिर के शिखर पर सिंह विराजमान है। वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में हुआ। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चिंतामण गणेश मंदिर माता सीता द्वारा स्थापित षट् विनायकों में से एक हैं।  उज्जैन में बड़ा गणेश का मंदिर भी चमत्कारिकक है। लाल रंग के बड़े से गणेश पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के साथ यहां विराजमान हैं। इस मंदिर में पंचमुखी हनुमान भी मौजूद हैं। इस मंदिर की खासियत ये है कि यहां पर ज्योतिष और संस्कृति भाषा का ज्ञान भी दिया जाता है। 7 चमत्कारिक शिव मंदिर, जहां भगवान के दर्शन मात्र से होती है सारी मुरादें पूरी खजराना गणेश मंदिर, इंदौर मध्यप्रदेश में चिंतामण गणपति की तरह इंदौर का खजराना गणेश मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। वक्रतुंड श्रीगणेश की 3 फुट प्रतिमा चांदी का मुकुट धरे रिद्धी-सिद्धी के साथ विराजमान हैं जिनका नित्य पूजन विधि-विधान से होता है। गणेशजी की यह मूर्ति भी मंदिर के सामने बावड़ी से निकाली गई थी। इसके बावड़ी में होने का संकेत मंदिर के पुजारी भट्टजी के पूर्वजों को स्वप्न के माध्यम से मिला। जिसे आपने श्रद्धापूर्वक वर्तमान स्थान पर विराजित किया तब मंदिर काफी छोटा था। बाद में 1735 में मंदिर का पहली बार जीर्णोद्धार देवी अहिल्याबाई ने कराया। इसके बाद 1971 से लगातार इसकी सज्जा का कार्य जारी है। 3. रॉकफोर्ट उच्ची पिल्लयार मंदिर, तमिलनाडु तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली (त्रिचि) में रॉक फोर्ट नामक पहाड़ी के सबसे उपर स्थित उच्ची पिल्लयार मंदिर बहुत ही प्राचीन माना जाता है। इससे जुड़ी एक मान्यता है कि यहां रावण के भाई विभीषण ने एक बार भगवान गणेशजी पर वार किया था। कथा अनुसार राम ने उन्हें विष्णु की मूर्ति लंका में विराजमान करने के लिए दी थी और शर्त यह कि ले जाते वक्त भूमि पर न रखें अन्यथा ये मूर्ति वहीं विराजमान हो जाएगी। इधर, देवता लोग नहीं चाहते थे कि यह मूर्ति राक्षस राज्य में विराजमान हो तब उन्होंने गणेशजी को पाठ पढ़ा दिया। बिचारे गणेश जी एक बालक का वेशधारण करके विभीषण के पीछे हो लिए। रास्त में विभीषण ने सोच थोड़ा स्नान ध्यान कर लिया जाए। उन्होंने उस बालक को देखकर कहा कि ये मूर्ति संभालों इसे नीचे मत रखना मैं अभी नदी में स्नान करके आता हूं। बालरूप में गणेशजी ने वह मूर्ति ले ली और उनके जाने के बाद भूमि पर रख दी और जाकर उक्त पहाड़ी पर छुप गए। जब वि‍भीषण को पता चला तो दिमाग खराब हो गया वह उस बालक को ढूंढते हुए उसी पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए जहां उन्होंने उस बालक को देखकर उसके सिर पर प्रहार किया। तब गणेशजी अपने असली रूप में प्रकट हो गए तो यह देखकर विभीषण पछताए और उन्होंने क्षमा मांगी तभी से इस चोटी पर गणेशजी विराजमान हैं। हालांकि इसका संबंध 7वीं शताब्दी से बताया जाता है। 273 फुट की ऊंचाई पर बसे इस मंदिर में 400 के लगभग सीढ़ियां हैं। 4. कनिपकम विनायक मंदिर, चित्तूर यह मंदिर आंधप्रदेश के चित्‍तूर जिले में तिरूपति मंदिर से 75 किमी दूर स्थित है। यहां दर्शन के लिए आने वाले भक्‍त अपने पाप धोने के लिए मंदिर के पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं। 5. मनकुला विनायगर मंदिर, पुडुचेरी यह भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के

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7 चमत्कारिक शिव मंदिर, जहां भगवान के दर्शन मात्र से होती है सारी मुरादें पूरी

भगवान शिव की किसी पर कृपा हो तो वह मनुष्य जीवन के सारे ही सांसारिक सुख भोगता है। इसलिए शिव जी की कृपा पाने के लिए मनुष्य को उनके कम से कम उनके सात मंदिरों का दर्शन जरूर करना चाहिए। मान्यता है कि यदि शिव जी के इन सात मंदिरों का दर्शन जीवन में मनुष्य कर ले तो उसके सभी पापकर्म नष्ट होते हैं और उसकी कामनाएं जरूर परी होती हैं। भगवान शिव बहुत ही भोले माने गए हैं और वह अपने भक्तों में भी वहीं भोलापन खोजते हैं। यही कारण है कि देश के इन 7 मंदिरों में कहते हैं कि मनुष्य यदि सच्चे और निश्चल भाव से शिवजी का दर्शन कर ले तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। अमरनाथ मंदिर जम्मू-कश्मीर में स्थित अमरनाथ मंदिर हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ स्थ्ज्ञल है और यहां दर्शन करना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। यह मंदिर एक गुफा के रूप स्थित है। पवित्र गुफा में बर्फ से प्राकृतिक शिव लिंग का निर्मित होना है। प्राकृतिक बर्फ से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू बर्फ का शिवलिंग भी कहते हैं यह शिवलिंग लगभग 10 फुट ऊचा बनता है। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखो लोग यहां आते है। चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ इस बर्फ का आकार भी घटता-बढ़ता रहता है। श्रावण पूर्णिमा को यह अपने पूरे आकार में आ जाता है और अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग अलग हिमखंड हैं। केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ का मंदिर चार धाम यात्रा में गिना जाता है। यह मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है। ओंकारेश्वर मंदिर मध्य प्रदेश के खंडवा स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में ओमकारेश्वर मंदिर भी‌ प्रमुख शिव मंदिर में गिना जाता है। चार धाम यात्रा के बाद यहां ओमारेश्वर महादेव का दर्शन करना जरूरी होता है, तभी चार धाम यात्रा का पुण्य मिलता है। सोमनाथ मंदिर गुजरात  के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों से एक है। सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराणादि में उल्लेखित है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया। त्रयंबकेश्वर मंदिर महाराष्ट्र में गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर हिंदुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। काले पत्थरों से बना ये मंदिर चमत्कारिक माना गया है। कहते हैं यहां शिव जी को कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। दक्षेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित कनखल में दक्षेश्वर मंदिर अपनी आस्था और चमत्कार के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर में जगह पर स्थित है। मान्यता है कि आज के दिन जो व्यक्ति दक्षेश्वर महादेव स्थित शिव लिंग का जलाभिषेक करता है, उसे अन्य स्थान पर जल चढ़ाने से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। अन्नामलाई मंदिर आदि अन्नामलाई मंदिर तिरुवन्नमलई सबसे पुराना मंदिर माना गया है। अरुणाचलेश्वर मंदिर का निर्माण को लगभग 2000 साल पुराना माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि आरंभ में यह मंदिर साधारण सी लकड़ी से बना था, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित थी। बाद में गोपुरम जोड़े गए और ईंटों व पत्थरों से एक मंदिर बनाने के लिए इस लकड़ी की संरचना को नीचे लाया गया था। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर कर वर्तमान स्वरूप 1200 सालों से अस्तित्व में है।

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भगवान हनुमान के 10 खास मंदिर, जहां है भक्तों की सबसे अधिक आस्था

 हनुमान मंदिर, इलाहबाद (उत्तर प्रदेश) इलाहबाद किले से सटा यह मंदिर लेटे हुए भगवान हनुमान की प्रतिमा वाला प्राचीन मंदिर है। इसमें हनुमान जी लेटी हुई मुद्रा में हैं। मूर्ति 20 फीट लम्बी है। जब बारीश में बाढ़ आती है तो मंदिर जलमग्न हो जाता है, तब मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है।  हनुमानगढ़ी, अयोध्याअयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। हनुमानगढ़ी मंदिर प्रसिद्ध है। यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर बना है। मंदिर के चारों ओर निवास साधु-संत रहते हैं। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला व अंगद टीला नामक जगह हैं। मंदिर की स्थापना 300 साल पहले स्वामी अभयारामदासजी ने की थी। सालासर हनुमान मंदिर, सालासर(राजस्थान)यह मंदिर राजस्थान के चूरू जिले में है। गांव का नाम सालासर है, इसलिए सालासर बालाजी के नाम यह प्रसिद्ध है। यह प्रतिमा दाड़ी व मूंछ वाली है। यह एक किसान को खेत में मिली थी, जिसे सालासर में सोने के सिंहासन पर स्थापित किया गया है।  हनुमान धारा, चित्रकूटउत्तर प्रदेश में सीतापुर के पास यह हनुमान मंदिर है। यह पर्वतमाला के मध्य में है। हनुमान की मूर्ति के ठीक ऊपर दो कुंड हैं, जो हमेशा भरे रहते हैं। उनमें से पानी बहता रहता है। इस धारा का जल मूर्ति के ऊपर से बहता है। इसीलिए, इसे हनुमान धारा कहते हैं। भारत के प्रसिद्ध 9 श्रीकृष्ण मंदिर, किस्मत वालों को ही मिलते हैं दर्शन श्री संकटमोचन मंदिर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)यह मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में है। इस मंदिर के चारों ओर एक छोटा सा वन है। मंदिर के प्रांगण में भगवान हनुमान की दिव्य प्रतिमा है। ऐसी मान्यता है कि हनुमानजी की यह मूर्ति गोस्वामी तुलसीदासजी के तप एवं पुण्य से प्रकट हुई स्वयंभू मूर्ति है। भेट-द्वारका, गुजरातभेज-द्वारका से चार मील की दूरी पर मकरध्वज के साथ में भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित है। कहते हैं कि पहले मकरध्वज की मूर्ति छोटी थी परंतु अब दोनों मूर्तियां एक सी ऊंची हो गई हैं। मकरध्वज को हनुमान जी का पुत्र बताया गया है, जिसका जन्म हनुमानजी के पसीने द्वारा एक मछली से हुआ था।  बालाजी हनुमान मंदिर, मेहंदीपुर (राजस्थान)राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ मेहंदीपुर है। यह मंदिर जयपुर-बांदीकुई-बस मार्ग पर जयपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर है। यह मंदिर करीब 1 हजार साल पुराना है। यहां चट्टान में हनुमान की आकृति स्वयं उभर आई थी। इसे ही श्री हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है। डुल्या मारुति, पूना (महाराष्ट्र)पूना के गणेशपेठ में बना यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है। श्रीडुल्या मारुति का मंदिर संभवत: 350 वर्ष पुराना है। मूल रूप से डुल्या मारुति की मूर्ति एक काले पत्थर पर अंकित की गई है। इस मूर्ति की स्थापना श्रीसमर्थ रामदास स्वामी ने की थी।  श्री कष्टभंजन हनुमान मंदिर, सारंगपुर (गुजरात)अहमदाबाद-भावनगर के पास स्थित बोटाद जंक्शन से सारंगपुर 12 मील दूर है। महायोगिराज गोपालानंद स्वामी ने इस मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी। जनश्रुति है कि प्रतिष्ठा के समय मूर्ति में भगवान हनुमान का आवेश हुआ और यह हिलने लगी। यह मंदिर स्वामीनारायण सम्प्रदाय का एकमात्र हनुमान मंदिर है।  हंपी, कर्नाटकबेल्लारी जिले के हंपी शहर में एक हनुमान मंदिर है। इन्हें यंत्रोद्धारक हनुमान कहा जाता है। यही क्षेत्र प्राचीन किष्किंधा नगरी है। संभवतः यहीं किसी समय वानरों का विशाल साम्राज्य स्थापित था। आज भी यहां अनेक गुफाएं हैं। 

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भारत के प्रसिद्ध 9 श्रीकृष्ण मंदिर, किस्मत वालों को ही मिलते हैं दर्शन

द्वारकाधीश मंदिर द्वारका, गुजरात यह गुजरात का सबसे फेमस कृष्ण मंदिर है इसे जगत मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर चार धाम यात्रा का भी मुख्य हिस्सा है। चारों धामों में से यह पश्चिमी धाम है। यह मंदिर गोमती क्रीक पर स्थित है और 43 मीटर की ऊंचाई पर मुख्य मंदिर बना है। इस मंदिर की यात्रा के बिना आपकी गुजरात में धार्मिक यात्रा पूरी नहीं मानी जाएगी। जन्माष्टमी के दौरान यहां बेहद उमंग भरा माहौल देखने को मिलता है। पूरा मंदिर अंदर और बाहर से खूबसूरत तरीके से सजाया जाता है। श्री बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन भगवान श्री कृष्ण ने अपने बचपन का समय वृंदवन में ही बिताया था। यह सबसे फेमस और प्राचीन मंदिर भी है। भगवान कृष्ण को बांके बिहारी भी कहा जाता है इसलिए उनके नाम पर ही इस मंदिर का नाम भी श्री बांके बिहारी रखा गया है। जन्माष्टमी के दिन मंगला आरती होने के बाद यहा श्रद्धालुओं के लिए रात 2 बजे ही मंदिर के दरवाजे खुल जाते हैं। मंगला आरती साल में केवल एक बार होती है। भगवान कृष्ण के जन्म के बाद यहां श्रद्धालुओं के बीच खिलौने, कपड़े और दूसरी चीजें बेची जाती हैं। द्वारकाधीश मंदिर, मथुरा यह मथुरा का दूसरा सबसे फेमस मंदिर है यहां पर भगवान कृष्ण की काले रंग की प्रतिमा की पूजा की जाती है। हालांकि यहां राधा की मूर्ति सफेद रंग है। प्राचीन मंदिर होने के कारण इसकी वास्तुकला भी भारत की प्रचीन वास्तुकला से प्रेरित है। यहां आकर आपको अलग ही सुकून का अहसास होगा। जन्माष्टमी का त्योहार यहां धूमधाम से मनाया जाता है। जन्माष्टमी के दौरान यहां का माहौल काफी शानदार होता है। श्रीकृष्ण मठ मंदिर, उडुपी यह कर्नाटक का सबसे फेमस पर्यटन स्थल भी है इस मंदिर की खासियत है कि यहां भगवान की पूजा खिड़की के नौ छिद्रो में से ही की जाती है। यह हर साल पर्यटक का तांता लगा रहता है लेकिन जन्माष्टमी के दिन यहां की रौनक देखते ही बनती है। पूरे मंदिर को फूलो और लाइट्स से सजाया जाता है। त्योहार के दिन यहां काफी भीड़ होती है और आपको दर्शन के लिए 3-4 घंटे तक इंतजार करना पड़ सकता है। जगन्नाथ पुरी, उड़ीसा उड़ीसा के पुरी में स्थित जगन्‍नाथ मंदिर में भगवान कृष्‍ण अपने बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। जन्‍माष्‍टमी से अधिक रौनक यहां वार्षिक रथ यात्रा के दौरान होती है। यह रथ यात्रा धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें भाग लेने और भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। हर साल इस रथ यात्रा का आयोजन होता है। इसके लिए तीन विशाल रथ तैयार किए जाते हैं। सबसे आगे बलराम जी का रथ रहता है, फिर बहन सुभद्रा का रथ रहता है और उसके भी भगवान कृष्‍ण अपने रथ में सवार होकर चलते हैं। बेट द्वारका मंदिर, गुजरात गुजरात में द्वारिकाधीश के मंदिर के अलावा एक और फेमस मंदिर है बेट द्वारका। वैसे इसका नाम भेंट द्वारका है, लेकिन गुजराती में इसे बेट द्वारका कहा जाता है। भेंट का मतलब मुलाकात और उपहार भी होता है। इस नगरी का नाम इन्हीं दो बातों के कारण भेंट पड़ा। दरअसल ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण की अपने मित्र सुदामा से भेंट हुई थी। इस मंदिर में कृष्‍ण और सुदामा की प्रतिमाओं की पूजा होती है। सुदामा जी जब अपने मित्र से भेंट करने यहां आए थे तो एक छोटी सी पोटली में चावल भी लाए थे। इन्‍हीं चावलों को खाकर भगवान कृष्‍ण ने अपने मित्र की दरिद्रता दूर कर दी थी। इसलिए यहां आज भी चावल दान करने की परंपरा है। ऐसी मान्‍यता है कि मंदिर में चावल दान देने से भक्‍त कई जन्मों तक गरीब नहीं होते। सांवलिया सेठ मंदिर, राजस्‍थान यह गिरिधर गोपालजी का फेमस मंदिर है। यहां वे व्‍यापारी भगवान को अपना बिजनस पार्टनर बनाने आते हैं, जिन्‍हें अपने व्‍यापार में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा होता है। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर है जिनका संबंध मीरा बाई से भी बताया जाता है। यहां मीरा के गिरिधर गोपाल को बिजनस पार्टनर होने के कारण श्रद्धालु सेठ जी नाम से भी पुकारते हैं और वह सांवलिया सेठ कहलाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सांवलिया सेठ ही मीरा बाई के वो गिरधर गोपाल हैं, जिनकी वह दिन रात पूजा किया करती थीं। गुरुवयूर मंदिर, केरल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिर से सत्‍ता में आने के बाद सबसे पहले यहां 8 जून कोदर्शन करने आए थे। केरल के इस प्राचीन मंदिर का संबंध गुजरात से माना जाता है। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा होती है। इसके अलावा मंदिर में भगवान विष्णु के दस अवतारों को भी दर्शाया गया है। इस मंदिर को दक्षिण की द्वारका और भूलोक के बैकुंठ के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में दिन में दो बार भक्तों के लिए मुफ्त भोजन यानी भंडारे की व्यवस्था है। मंदिर में एकादशी का पर्व शिवेली का त्योहार बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है। गुरुवायूर मंदिर का नाम देवताओं के गुरु बृहस्पति, पवनदेव वायु और ऊर यानी पृथ्वी के नाम से मिलकर बना है। भालका तीर्थ, गुजरात सोमनाथ स्थित भालका तीर्थ वह स्थान है, जहां पेड़ के नीचे ध्यान मग्न बैठे श्रीकृष्ण को एक शिकारी ने हिरण के भ्रम से तीर मार दिया था। यही वह स्थान है, जहां से श्रीकृष्ण पृथ्वी छोड़कर स्वर्ग लोक चले गए। साथ ही इस स्थान को हीरान, कपिला और सरस्वती नदी का संगम कहा जाता है। यह मंदिर श्रीकृष्ण के साथ ही उस बरगद के पेड़ को समर्पित है, जिसके नीचे कान्हा बैठे थे।

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दुर्गा अष्टमी व्रत कथा और पूजन विधि 2023

नवरात्रि या दुर्गा पूजा के आठवें दिन को अष्टमी या दुर्गा अष्टमी के रूप में जाना जाता है. हिन्दू धर्म के अनुसार इस दिन को सबसे शुभ दिन माना जाता है. सबसे महत्वपूर्ण दुर्गा अष्टमी जिसे महाष्टमी भी कहा जाता है. यह अश्विनी के महीने में नौ दिनों की नवरात्री उत्सव के दौरान मनाई जाती है. साथ ही अन्य देवों की भी पूजा की जाती है. दुर्गा अष्टमी को मासिक दुर्गा अष्टमी या मास दुर्गा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. लोग अपने मनोवांछित फल को प्राप्त करने के उदेश्य से जैसे की जीवन में चल रही किसी समस्या के समाधान के लिए या किसी भी दुःख का निवारण करने के लिए माँ दुर्गा अष्टमी का पूजन करते है. इस दिन भक्त दिव्य आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए सख्त उपवास रखते है हिन्दू धर्म के अनुयायीयों के लिए दुर्गा अष्टमी व्रत एक महत्वपूर्ण आराधना है पूजन विधि दुर्गा अष्टमी तिथि परम कल्याणकारी, पवित्र, सुख देने वाली और धर्म की वृद्धि करने वाली है। अष्टमी को मां भगवती का पूजन करने से कष्ट, दुःख मिट जाते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती। मां की शास्त्रीय पद्धति से पूजा करने वाले रोगों से मुक्त होकर धन-वैभव से संपन्न होते हैं। देव, दानव, राक्षस, गंधर्व, नाग, यक्ष, किन्नर, मनुष्य आदि सभी अष्टमी और नवमी को ही पूजते हैं। कथाओं के अनुसार इसी तिथि को मां ने चंड-मुंड राक्षसों का संहार किया था।  महा अष्टमी के दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है। महाष्टमी के दिन स्नान के बाद मां दुर्गा का षोडशोपचार पूजन करें। महाष्टमी के दिन मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है इसलिए इस दिन मिट्टी के नौ कलश रखे जाते हैं और देवी दुर्गा के नौ रूपों का ध्यान कर उनका आह्वान किया जाता है। अष्टमी के दिन कुल देवी की पूजा के साथ ही मां काली, दक्षिण काली, भद्रकाली और महाकाली की भी आराधना की जाती है। अष्टमी माता को नारियल का भोग लगा सकते हैं, लेकिन इस दिन नारियल खाना निषेध है, क्योंकि इसके खाने से बुद्धि का नाश होता है।  माता महागौरी अन्नपूर्णा का रूप हैं। इस दिन माता अन्नपूर्णा की भी पूजा होती है इसलिए अष्टमी के दिन कन्या भोज और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। 1. खीर, 2. मालपुए, 3. मीठा हलुआ, 4. पूरणपोळी, 5. केले, 6. नारियल, 7. मिष्ठान्न, 8. घेवर, 9. घी-शहद और 10. तिल और गुड़ माता को अर्पित करें।  यदि अष्टमी को पारणा कर रहे हैं तो विविध प्रकार से महागौरी का पूजन कर भजन, कीर्तन, नृत्यादि उत्सव मनाना चाहिए। विविध प्रकार से पूजा-हवन कर 9 कन्याओं को भोजन खिलाना चाहिए। हलुआ आदि प्रसाद वितरित करना चाहिए। दुर्गा अष्टमी इतिहास और कथा प्राचीन समय में दुर्गम नामक एक दुष्ट और क्रूर दानव रहता था, वह बहुत ही शक्तिशाली था, अपनी क्रूरता से उसने तीनों लोकों में अत्याचार कर रखा था. उसकी दुष्टता से पृथ्वी, आकाश और ब्रह्माण्ड तीनों जगह लोग पीड़ित थे. उसने ऐसा आतंक फैलाया था, कि आतंक के डर से सभी देवता कैलाश में चले गए, क्योंकि देवता उसे मार नहीं सकते थे, और न ही उसे सजा दे सकते थे. सभी देवता ने भगवान शिव जी से इस बारे में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया अंत में विष्णु, ब्रह्मा और सभी देवता के साथ मिलकर भगवान शंकर ने एक मार्ग निकाला और सबने अपनी उर्जा अर्थात अपनी शक्तियों को साझा करके संयुकत रूप से शुक्ल पक्ष अष्टमी को देवी दुर्गा को जन्म दिया. उसके बाद उन्होंने उन्हें सबसे शक्तिशाली हथियार को देकर दानव के साथ एक कठोर युद्ध को छेड़ दिया, फिर देवी दुर्गा ने उसको बिना किसी समय को लगाये तुरंत दानव का संहार कर दिया. वह दानव दुर्ग सेन के नाम से भी जाना जाता था. उसके बाद तीनों लोकों में खुशियों के साथ ही जयकारे लगने लगे, और इस दिन को ही दुर्गाष्टमी की उत्पति हुई. इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत हुई.   दुर्गा अष्टमी के दिन का महत्व दुर्गा अष्टमी के व्रत को अध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए और देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है. संस्कृत की भाषा में दुर्गा शब्द का अर्थ होता है अपराजित अर्थात जो किसी से भी कभी पराजित या हारा नहीं हो उसको अपराजित कहते है और अष्टमी का अर्थ होता है आठवा दिन. इस अष्टमी के दिन महिषासुर नामक राक्षस पर देवी दुर्गा ने जीत हासिल की थी. हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन देवी ने अपने भयानक और रौद्र रूप को धारण किया था, इसलिए इस दिन को देवी भद्रकाली के रूप में भी जाना जाता है. इस दिन का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योकि इस दिन दुष्ट और क्रूर राक्षस को उन्होंने मार कर सारे ब्रह्माण्ड को भय मुक्त किया था. साथ ही यह माना जाता है कि इस दिन जो भी पूरी भक्ति और श्रधा से पूर्ण समर्पण के साथ दुर्गा अष्टमी का व्रत करता है उसके जीवन में खुशी और अच्छे भाग्य का आगमन होता है. दुर्गा अष्टमी का महत्त्व इसलिए ज्यादा बढ़ जाता है क्योकि इस दिन देवी भक्तो पर अपनी विशेष कृपा की बरसात करती है. इस दिन देवी का उपवास करने वाले भक्तों को जीवन में दिव्य सरंक्षण, समृधि, व्यापार में लाभ, विकास, सफलता और शांति की प्राप्ति होती है. सभी बीमारियों से शरीर को छुटकारा प्राप्त होता है अर्थात शरीर रोग मुक्त और भय मुक्त होता है.   2023 में होने वाली मासिक दुर्गा अष्टमी की तारीख और तिथि    शुक्ल पक्ष के अष्टमी तिथि के दौरान हर महीने में दुर्गा अष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन भक्त शारदा दुर्गा का पूजन करके उपवास भी करते है. इस वर्ष होने वाली मासिक दुर्गा अष्टमी के दिन, तारीखों और उनके पूजन के समय को बताया गया है. जो पूजन का समय है उस समय के बीच में आप किसी भी वक्त अष्टमी पूजन कर सकते है. सभी जानकारियों को नीचे दिए गए टेबल में प्रदर्शित किया गया है, जो निम्नवत है तारीख महीना दुर्गा अष्टमी 29 जनवरी मासिक दुर्गाष्टमी 27 फरवरी मासिक दुर्गाष्टमी 29 मार्च चैत्र दुर्गाष्टमी 28 अप्रैल मासिक दुर्गाष्टमी 28 मई मासिक दुर्गाष्टमी 26 जून मासिक दुर्गाष्टमी 26 जुलाई मासिक

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गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है 

पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन माता पार्वती के पुत्र गणेश जी का जन्म हुआ था. इसलिए भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन हर साल गणेश चतुर्थी मनाई जाती है पूरे भारत वर्ष में गणेश चतुर्थी उत्सव दस दिनों तक उत्साह के साथ मनाया जाता है. लेकिन बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि,  गणेश चतुर्थी के पीछे छिपी कहानी क्या हैं और इसे दस दिनों तक क्यों मनाया जाता है? गणेश चतुर्थी की कहानी भारत त्योहारों का देश है. प्रतिदिन यहां कोई ना व्रत, पर्व या त्योहार होता है. दीपाेत्सव की तरह ही गणेश चतुर्थी भी भारतीयों का प्रमुख त्यौहार है. भारतीय हिन्दू महीनें में प्रत्येक चंद्र माह में दो चतुर्थी तिथियां होती हैं. पूर्णिमासी या कृष्ण पक्ष के दौरान पूर्णिमा को संकष्टी चतुर्थी के रूप में जाना जाता है. वहीं शुक्ल पक्ष के दौरान अमावस्या के बाद एक विनायक चतुर्थी के रूप में जाना जाता है. लेकिन आप में से ऐसे बहुत से लोग है जिन्हें इस बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी कि, क्यों गणेश चतुर्थी मनाया जाता है? जानना जरूरी है कि, गणेश चतुर्थी भगवान गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. श्रीगणेश भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं. गणेश चतुर्थी वैसे तो भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है, लेकिन भारत के महाराष्ट्र प्रांत में इसे वृहद स्तर पर बनाया जाता है. मुंबई के लोगों का इस त्यौहार का बेसब्री से इंतज़ार होता है. भारतीय पुराणों के अनुसार भगवान गणेश ज्ञान, समृद्धि और सौभाग्य के देवता है. भारतीय द्वारा कोई भी शुभ कार्य करने के पूर्व भगवान गणेश को पूजा जाता है. सरल शब्दों में कहा जाएं तो कार्य को विघ्न पूर्ण पूरा करने के लिए विघ्नहर्ता गणेश की पूजा करते है. भगवान गणेश को विनायक और विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है. गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि व बुद्धि का दाता भी माना जाता है. इसलिए आज हम आपकों पोस्ट के जरिए आप लोगों की गणेश चतुर्थी क्या हैं इसे क्यों मनाया जाता है के विषय में विस्तार से जानकारी देने जा रही है. आशा करते हैं कि, आप लेख को शुरू से लेकर अंत तक पढ़ेंगे. तो फिर चलिए शुरू करते हैं. गणेश चतुर्थी  को विनायक चतुर्थी भी कहते हैं, यह असल में एक हिंदू त्योहार है. इस दौरान लोग भगवान श्री गणेश का पूजन करते है. गणेश चतुर्थी की शुरुआत वैदिक भजनों, प्रार्थनाओं और हिंदू ग्रंथों जैसे गणेश उपनिषद को पढ़कर कि जाती है. प्रार्थना के बाद गणेश जी को उनका पंसदीदा प्रसाद मोदक का भोग लगाकर आरती पूर्ण की जाती है. गणेश उत्सव के दौरान पंडालों में आकृर्षक विद्युत साज सज्जा की जाती है. इन दस दिनों के उत्सव में पूरा भारत गणेश जी की भक्ति से सराबोर रहता है. मुंबई के लाल बाग के राजा गणेश को पूरे विश्व में प्रसिद्धि हासिल है. लाल बाग के राजा को देखने के लिए विदेशी पर्यटक भी मुंबई पहुंचते है गणेश चतुर्थी क्यों मनाते हैं? हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य भगवान गणेश को माना जाता है. इन्हें विघ्गहर्ता इसलिए ही कहा जाता है, क्योंकि इनके नाम मात्र स्मरण से सभी कार्य बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाते है. गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए लोग गणेश जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है. करीब-करीब हर भारतीय घर में गणेश प्रतिमा की स्थापना की जाती है. दोनों समय भगवान की आरती की जाती है. भगवान के भोग के लिए प्रतिदिन नए-नए पकवान बनाए जाते है. हिंदू धर्म में गणेश जी की पूजा करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. पौराणिक मान्यता है कि जो लोग पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी पूजा करते हैं, उन्हें खुशी, ज्ञान, धन और लंबी आयु प्राप्त होगी. और उनकी सभी मनोकामना पूरी होती है. गणेश चतुर्थी का महत्व भारतीय देवी-देवताओं के अवतार को लेकर कहानियां बेहद ही रोचक और शिक्षाप्रद होती है. ठीक उसी प्रकार भगवान श्री गणेश के जन्म की कहानी भी बेहद ही रोचक है. चलिए आज उसी के विषय में विस्तार में जानते हैं. एक पौराणिक कथा में उल्लेख मिलता है कि, भगवान शिव ने गणेश का सिर अपने त्रिशूल से अलग कर दिया था और फिर उसकी जगह हाथी का सिर लगाया गया था. क्या आप जानते कि हाथी का ही सिर क्यों लगाया गया. मनुष्य और हाथी के शरीर में काफी हद तक समानता हैं. हाथियों में बुद्धिमान प्रजातियों के वो सभी गुण पायें जाते हैं. जो किसी प्राइमेट में होती हैं. प्राइमेट स्‍तनपायी प्राणियों में सर्वोच्‍च श्रेणी के जीव होतें हैं. संरचना और जटिलता के आधार पर हाथी और मनुष्य के दिमाग में भी काफी समानता हैं. यही नहीं एक हाथी के कोर्टेक्स में उतने ही न्यूरोंस होते हैं जितने कि एक सामान्य मनुष्य के मस्तिष्ट में पाए जाते हैं, हाथियों में कई ऐसे व्यवहार भी पाए जाते हैं जो आम मनुष्य में भी पाए जाते हैं. जैसे दुखी होना, सीखना या किसी की मदद करना. हाथियों के दिमाग में मौजूद हिप्पोकैम्पस उतना ही विकसित हैं जितना एक मनुष्य का होता हैं. ये हिस्सा भावनाओं से संबंधित होता हैं. हाथी को भी एक साधारण मनुष्य की भांति मानसिक बीमारी हो सकती हैं. एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थी. तब उन्होंने द्वार पर पहरेदारी करने के लिए अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया. और उसमें प्राण डालकर एक सुन्दर बालक का रूप दे दिया. माता पार्वती, बालक को कहती हैं कि मै स्नान करने जा रही हु, तुम द्वार पर खड़े रहना और बिना मेरी आज्ञा के किसी को भी द्वार के अंदर मत आने देना. यह कहकर माता पार्वती, उस बालक को द्वार पर खड़ा करके स्नान करने चली जाती हैं. वह बालक द्वार पर पहरेदारी कर रहा होता है कि तभी वहां पर भगवान् शंकर जी आ जाते हैं और अंदर जैसे ही अंदर जाने वाले होते तो वह बालक उनको वहीँ रोक देता है. भगवान शंकर जी उस बालक को उनके रास्ते से हटने के लिए कहते हैं लेकिन वह बालक माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए, भगवान शंकर को अंदर प्रवेश करने से रोकता है. जिसके कारण भगवान शंकर क्रोधित हो जाते हैं और क्रोध में अपनी त्रिशूल

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