जानिए दानव गुरु शुक्राचार्य क्यों कहलाए शिव पुत्र

भगवान शिव को समर्पित ग्रंथ शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव ने दैत्य गुरु शुक्राचार्य को निगल लिया था। पर उन्होंने ऐसा क्यों किया इसके पिछे एक रोचक कथा है। आइये जानते है शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे। देवताओं के गुरु बृहस्पति अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों बालकों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की। आचार्य अंगीरस ने विद्या सिखाने में शुक्र के प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के यहां जाकर विद्यादान करने की प्रार्थना की। गौतम मुनि ने शुक्र को समझाया, बेटे! इस समस्त जगत् के गुरु केवल ईश्वर ही हैं। इसलिए तुम उनकी आराधना करो। तुम्हें समस्त प्रकार की विद्याएं और गुण स्वत: प्राप्त होंगे। गौतम मुनि की सलाह पर शुक्र ने गौतमी तट पर पहुंचकर शिव जी का ध्यान किया। शिव जी ने प्रत्यक्ष होकर शुक्र को मृत संजीवनी विद्या का उपदेश दिया। शुक्र ने मृत संजीवनी विद्या के बल पर समस्त मृत राक्षसों को जीवित करना आरंभ किया। परिणामस्वरूप दानव अहंकार के वशीभूत हो देवताओं को यातनाएं देने लगे, क्योंकि देवता और दानवों में सहज ही जाति-वैर था। फलत: देवता और दानवों में निरंतर युद्ध होने लगे। मृत संजीवनी विद्या के कारण दानवों की संख्या बढ़ती ही गई। देवता असहाय हो गए। वे युद्ध में दानवों को पराजित नहीं कर पाए। देवता हताश हो गए। कोई उपाय ना पाकर वे शिव जी की शरण में गए, क्योंकि शिव जी ने शुक्राचार्य को मृत संजीवनी विद्या प्रदान की थी। इसलिए देवताओं ने शिव जी से शिकायत की, महादेव! आपकी विद्या का दानव लोग दुरुपयोग कर रहे हैं। आप तो समदर्शी हैं। शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से मृत दानवों को जिलाकर हम पर भड़का रहे हैं। यही हालत रही तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे। कृपया आप हमारा उद्धार कीजिए। शुक्राचार्य द्वारा मृत संजीवनी विद्या का इस प्रकार अनुचित कार्य में उपयोग करना शिव जी को अच्छा न लगा। शिव जी क्रोध में आ गए और शुक्राचार्य को पकड़कर निगल डाला। महादेव द्वारा शुक्राचार्य को निगलने के बाद राक्षसों की सेना कमजोर हो गई और अंत में देवताओं की विजय हुई। इधर भगवान शिव के पेट में शुक्राचार्य बाहर आने का रास्ता खोजने लगे। शुक्राचार्य को महादेव के पेट में सातों लोक, ब्रह्मा, नारायण, इंद्र आदि पूरी सृष्टि के दर्शन हुए। इस तरह शुक्राचार्य सौ सालों तक महादेव के पेट में ही रहे। अंत में जब शुक्राचार्य बाहर नहीं निकल सके तो वे शिवजी के पेट में ही मंत्र जाप करने लगे। इस मंत्र के प्रभाव से शुक्राचार्य महादेव के शुक्र रूप में लिंग मार्ग से बाहर निकले। तब उन्होंने शिवजी को प्रणाम किया। शुक्राचार्य को लिंग मार्ग से बाहर निकला देख भगवान शिव ने उनसे कहा कि- चूंकि तुम मेरे लिंग मार्ग से शुक्र की तरह निकलो हो, इसलिए अब तुम मेरे पुत्र कहलाओगे। महादेव के मुख से ऐसी बात सुनकर शुक्राचार्य ने उनकी स्तुति की। माता पार्वती ने भी शुक्राचार्य को अपना पुत्र मानकर बहुत से वरदान दिए। एक अन्य कथा के अनुसार-शुक्राचार्य ने किसी प्रकार छल-कपट से एक बार कुबेर की सारी संपत्ति का अपहरण किया। कुबेर को जब इस बात का पता चला, तब उन्होंने शिव जी से शुक्राचार्य की करनी की शिकायत की। शुक्राचार्य को जब विदित हुआ कि उनके विरुद्ध शिव जी तक शिकायत पहुंच गई, वे डर गए और शिव जी के क्रोध से बचने के लिए झाडि़यों में जा छिपे। आखिर वे इस तरह शिव जी की आंख बचाकर कितने दिन छिप सकते थे। एक बार शिव जी के सामने पड़ गए। शिव स्वभाव से ही रौद्र हैं। शुक्राचार्य को देखते ही शिव जी ने उनको पकड़कर निगल डाला। शिव जी की देह में शुक्राचार्य का दम घुटने लगा। शिव जी का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने रोष में आकर अपने शरीर के सभी द्वार बंद किए। अंत में शुक्राचार्य मूत्रद्वार से बाहर निकल आए। इस कारण शुक्राचार्य पार्वती-परमेश्वर के पुत्र समान हो गए। शुक्राचार्य को बाहर निकले देख शिव जी का क्रोध पुन: भड़क उठा। वे शुक्राचार्य की कुछ हानि करें, इस बीच पार्वती ने परमेश्वर से निवेदन किया, यह तो हमारे पुत्र समान हो गया है। इसलिए इस पर आप क्रोध मत कीजिए। यह तो दया का पात्र है। पार्वती की अभ्यर्थना पर शिव जी ने शुक्राचार्य को अधिक तेजस्वी बनाया। अब शुक्राचार्य भय से निरापद हो गए थे। उन्होंने प्रियव्रत की पुत्री ऊर्जस्वती के साथ विवाह किया। उनके चार पुत्र हुए-चंड, अमर्क, त्वाष्ट्र और धरात्र।

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3 जून को वट पूर्णिमा व्रत, जानें पूजा के लिए शुभ मुहूर्त

वट पूर्णिमा का व्रत रा ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यानी 3 जून को रखा जाएगा। वट पूर्णिमा का व्रत महाराष्ट्र, गुजरात सहित दक्षिण भारत के कई राज्यों में रखा जाएगा। आइए जानते हैं वट पूर्णिमा व्रत का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि। वट सावित्री का व्रत साल में 2 बार रखा जाता है। पहला ज्येष्ठ अमावस्या और दूसरा ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन रखा जाता है। सुहागिन महिलाएं अपनी पति की लंबी आयु के लिए इस व्रत को रखती है। इस बार दूसरे ज्येष्ठ अमावस्या के दिन यानी 3 जून को वट पूर्णिमा का व्रत किया जाएगा। इस दिन वट वृक्ष की पूजा कर महिलाएं अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करते हैं। साथ ही दांपत्य जीवन में खुशहाली बनी रहती है। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, वट पूर्णिमा का व्रत शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन रखा जाता है। वट पूर्णिमा व्रत की पूजा के लिए 3 जून को सुबह और दोपहर में अच्छा मुहूर्त है। सुबह के समय पूजा के लिए 7 बजकर 7 मिनट से 8 बजकर 51 मिनट तक मुहूर्त रहेगा। इसके बाद दोपहर में 12 बजकर 20 मिनट से 2 बजकर 2 मिनट तक रहेगा। बता दें कि वट पूर्णिमा का व्रत मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र समेत दक्षिण भारत के राज्यों में मनाया जाता है। वट पूर्णिमा पूजन विधि वट पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठने और स्नान आदि के बाद सुहागन महिलाएं पूजा के लिए अपनी थाली में रोली, चंदन, फूल, धूप, दीप आदि सब रख लें। इसके बाद सभी सामग्री वट वृक्ष पर अर्पित कर दें। साथ ही कच्चे सूत स वट की परिक्रमा करें। इसके बाद वट वृक्ष के नीचे बैठकर सत्यवान सावित्री की कथा पढ़ें। इस व्रत का पारण अगले दिन सात चने के दाने और पानी के साथ किया जाता है।

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शनिदेव को क्यों चढ़ाया जाता है सरसों का तेल? पढ़ें यह पौराणिक कथा

आज शनिवार है। आज का दिन शनिदेव को समर्पित है। इन्हें कर्म फलदाता कहा गया है। क्योंकि शनिदेव लोगों को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्यक्ति के हर फल का हिसाब शनिदेव के पास ही होता है। आज शनिवार है। आज का दिन शनिदेव को समर्पित है। इन्हें कर्म फलदाता कहा गया है। क्योंकि शनिदेव लोगों को उनके कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्यक्ति के हर फल का हिसाब शनिदेव के पास ही होता है। शनिवार के दिन शनिदेव को सरसों का सरसों का तेल चढ़ाया जाता है। लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है यह शायद हर किसी को नहीं पता होगा। जागरण अध्यात्म के इस लेख में हम आपको यह बता रहे हैं कि आखिर शनि देव को सरसों का तेल क्यों चढ़ाया जाता है। इसके पीछे कई कथाएं हैं जिनमें से पौराणिक कथा हम आपको बता रहे हैं। पहली धार्मिक कथा के अनुसार, सभ ग्रहों को रावण ने अपने बल से बंदी बना लिया था। इनमें शनिदेव भी शामिल थे। रावण अपने अहंकार में अधिक चूर था और इसी के चलते उसने शनिदेव को कारागार में उल्टा लटका दिया था। इसी दौरान माता सीता की खोज में हनुमान जी श्रीराम के दूत बनकर लंका पहुंचे थे। लेकिन रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी और हनुमान जी ने उससे पूरी लंका जला दी। जब पूरी लंका जल गई तो सारे ग्रह भी मुक्त हो गए। लेकिन शनिदेव उल्टे ही लटके रहे। ऐसे में वो मुक्त नहीं हो पाए। वो काफी समय से उल्टा लटका थे इसी के चलते उनका शरीर बहुत दर्द कर रहा था। उन्हें असहनीय पीड़ा हो रही थी। शनिदेव को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए हनुमान जी ने शनि देव के शरीर पर सरसों के तेल की मालिश की। मालिश से शनिदेव को दर्द से राहत मिल गई। फिर शनिदेव ने कहा कि जो भी सच्चे मन से उन्हें सरसों का तेल चढ़ाएगा उसकी सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी। बस तभी से शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।

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शनि देव कैसे बने कर्मफल दाता? पढ़ें यह पौराणिक कथा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनि देव न्याय के देवता और कर्मफल दाता  हैं. जो जैसा कर्म करता है, उसे वे वैसा ही फल देते हैं. वे सबके साथ न्याय करते हैं, इसलिए न्याय के देवता हैं. लेकिन जब ये राहु के साथ युति करते हैं, तो दंडनायक की भूमिका में होते हैं. दुष्ट लोगों को उनके कर्मों के लिए दंड भी देते हैं. तभी तो राहु के प्रभाव में आकर उन्होंने अपने वाहन काकोल की मां को भस्म करने के लिए इंद्र देव को दंडित किया था. शनि देव प्रारंभ से ही ऐसे नहीं थे. अपने पिता सूर्य देव से बार बार अपमानित होने के कारण शनि देव कठोर हो गए. आखिर शनि देव कर्मफल दाता कैसे बनें? शिव कृपा से शनि देव बने श्रेष्ठ पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव जब अपनी पत्नी छाया के पास गए तो उनकी तेज से पत्नी ने आंखें बंद कर ली. कुछ समय बाद शनि देव का जन्म हुआ. माता छाया के आंखें बंद कर लेने के कारण वे श्यामवर्ण के हो गए. सूर्य देव उनके रंग को देखकर दुखी हो गए. उन्होंने अपनी पत्नी छाया से कहा कि शनि उनका पुत्र नहीं हो सकता है. इससे उनकी पत्नी बहुत दुखी हुईं और शनि देव यह देखकर क्रोधित हो गए.माता छाया के प्रति पिता सूर्य देव के व्यवहार से शनि देव काफी दुखी और क्रोधित रहते ​थे. उन्होंने शिव उपासना का प्रण लिया. उन्होंने हजारों वर्षों तक भगवान शिव की तपस्या की, जिससे उनका शरीर काला पड़ गया. शनि देव की कठोर तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और वरदान मांगने को कहा l तब शनि देव ने कहा कि उनके पिता सूर्य देव ने हमेशा उनकी माता छाया का अपमान किया है. वह चाहते हैं कि सूर्य देव का अभिमान टूट जाए. तब भगवान शिव ने कहा कि तुम सभी ग्रहों में श्रेष्ठ होगे. आज से तुम सभी लोगों को उनके कर्मों के आधार पर फल दोगे. तुम सबके साथ न्याय करोगे और न्याय के देवता होगे. भगवान शिव की कृपा से ही शनि देव कर्मफल दाता बनें और सभी ग्रहों में श्रेष्ठ हुए.

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रामायण की वास्तविकता के ये हैं 10 सबूत, सच्चाई जान रह जाएंगे हैरान

सतयुग काल में धरती पर भगवान राम के होने की बात कही जाती है। इस पूरे घटनाक्रम का विवरण हिंदू ग्रंथ रामायण में देखने को मिलता है। इसमें रामायण से जुड़े कई ऐसे रहस्यों के बारे में बताया गया है, जो भगवान के धरती पर मौजूद होने का सबूत देते हैं। तो कौन-सी हैं वो बातें आइए जानते हैं। 1.भगवान राम के धरती पर होने का सबसे बड़ा सबूत रामसेतु का होना है। समुद्र के ऊपर श्रीलंका तक बने इस सेतु के बारे में रामायण में लिखा है गया है। इस पुल को पत्थर से बनाया था। 2.पुरातत्व विभाग के अनुसार 1,750,000 साल पहले श्रीलंका में सबसे पहले इंसानों के घर होने की बात सामने आई थी। राम सेतु भी उसी काल का है। 3.रावण की सेना से युद्ध के दौरान लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर हनुमान जी संजीवनी लेने द्रोणागिरी पर्वत गए थे। जड़ी बूटी की पहचान न होने पर वे पूरा पर्वत ले गए थे। युद्ध के बाद उन्होंने द्रोणागिरी को वापस अपनी जगह पहुंचा दिया। पर्वत पर आज भी वो निशान मौजूद हैं जहां से हनुमान जी ने उसे तोड़ा था। 4.श्रीलंका में जिस स्थान पर लक्ष्मण जी को संजीवनी दी गई थी वहां आज भी हिमालय की ऐसी दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं जो दूसरे हिस्सों में नहीं मिलती है। 5.लंकापति रावण जब सीता का हरण कर ले गया था, तब उसने देवी सीता को अशोक वाटिका में रखा था। ये जगह आज भी लंका में मौजूद है। 6.रामायण के सुंदर कांड में बताया गया कि श्रीलंका की रखवाली के लिए रावण ने एक विशालकाय हाथी रखा था। हनुमान जी ने इसे धराशायी किया था। पुरातत्व विभाग को श्रीलंका में ऐसे हाथियों के अवशेष मिले हैं जिनका आकार आम हाथियों से बहुत ज़्यादा था। 7.हनुमान जी के लंका जलाने से रावण डर गया था। दोबारा हमले से बचने के लिए रावण ने सीता जी को अशोक वाटिका से हटा कर कोंडा कट्टू गाला में रखा था। यहां पुरातत्व विभाग को कई गुफ़ाएं मिली हैं जो रावण के महल तक जाती हैं। 8.रावण के मरने के बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया था। उन्होंने अपना महल कालानियां में बनवाया था। यह एक नदी के किनारे बसा है। पुरातत्व विभाग को कैलानी नदी से उस महल के कुछ अवशेष मिले हैं। 9.रामायण ग्रंथ के अनुसार हनुमान जी ने लंका की सोने की नगरी जलाकर स्वाहा कर दी थी। तभी आज भी श्रीलंका में कुछ जगहों की मिट्टी बिल्कुल काली है। 10.रावण ने कोणेश्वरम मंदिर के पास गर्म पानी के कुएं बनवाए थे। ये कुएंजो आज भी वहां मौजूद हैं और इनसे गर्म पानी निकलता है।

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सत्यनारायण की कथा क्यों की जाती है, जानिए व्रत पूजा, महत्व और मंत्र

स्कंद पुराण के रेवाखंड में भगवान श्री सत्यनारायण की कथा का उल्लेख किया गया है। यह कथा सभी प्रकार के मनोरथ पूर्ण करने वाली, अनेक दृष्टि से अपनी उपयोगिता सिद्ध करती है। यह कथा समाज के सभी वर्गों को सत्यव्रत की शिक्षा देती है। भगवान श्री सत्यनारायण की व्रत कथा आस्थावान हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए जानी-मानी कथा है। संपूर्ण भारत में इस कथा के प्रेमी अनगिनत संख्या में हैं, जो इस कथा और व्रत का नियमित पालन व पारायण करते हैं। श्री सत्यनारायण व्रत गुरुवार को भी किया जाता है।  सत्यनारायण पूजा का महत्व सत्य को ईश्वर मानकर, निष्ठा के साथ समाज के किसी भी वर्ग का व्यक्ति यदि इस व्रत व कथा का श्रवण करता है, तो उसे इससे निश्चित ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि सत्यनारायण कथा कराने से हजारों साल तक किए गए यज्ञ के बराबर फल मिलता है। साथ ही सत्यनारायण कथा सुनने को भी सौभाग्य की बात माना गया है। आमतौर पर देखा जाता है किसी भी शुभ काम से पहले या मनोकामनाएं पूरी होने पर सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है।  श्री सत्यनारायण की व्रत की पौराणिक कथा  चिरकाल में एक बार जब भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में विश्राम कर रहे थे। उसी समय नारद जी वहां पधारे। नारद जी को देख भगवान श्री हरि विष्णु बोले- हे महर्षि आपके आने का प्रयोजन क्या है? तब नारद जी बोले- नारायण नारायण प्रभु! आप तो पालनहार हैं। सर्वज्ञाता हैं। प्रभु-मुझे ऐसी कोई सरल और छोटा-सा उपाय बताएं, जिसे करने से पृथ्वीवासियों का कल्याण हो। इस पर भगवान श्री हरि विष्णु बोले- हे देवर्षि! जो व्यक्ति सांसारिक सुखों को भोगना चाहता है और मरणोपरांत परलोक जाना चाहता है। उसे सत्यनारायण पूजा अवश्य करनी चाहिए। विष्णु जी द्वारा बताए गए व्रत का वृत्तांत व्यास मुनि जी द्वारा स्कंद पुराण में वर्णन करना। नैमिषारण्य तीर्थ में सुखदेव मुनि जी द्वारा ऋषियों को इस व्रत के बारे में बताना। सुखदेव मुनि जी ने कहा और इस सत्यनारायण कथा के व्रत में आगे जिन लोगों ने व्रत किया जैसे बूढ़ा लकड़हारा, धनवान सेठ, ग्वाला और लीलावती कलावती की कहानी इत्यादि और आज यही एक सत्यनारायण कथा का भाग बन चुका है। यही है सत्यनारायण कथा का उद्गम नारद जी और विष्णु जी का संवाद। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को क्यों दिया था श्राप? पढ़ें यह पौराणिक कथा व्रत-पूजन कैसे करें इसके बाद नारद जी ने भगवान श्रीहरि विष्णु से व्रत विधि बताने का अनुरोध किया। तब भगवान श्रीहरि विष्णु जी बोले-  सत्यनारायण व्रत करने के लिए व्यक्ति को दिन भर उपवास रखना चाहिए।  श्री सत्यनारायण व्रत पूजनकर्ता को स्नान करके कोरे अथवा धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहनें। माथे पर तिलक लगाएं और शुभ मुहूर्त में पूजन शुरू करें। इस हेतु शुभ आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके सत्यनारायण भगवान का पूजन करें।  इसके पश्चात्‌ सत्यनारायण व्रत कथा का वाचन अथवा श्रवण करें। संध्याकाल में किसी प्रकांड पंडित को बुलाकर सत्य नारायण की कथा श्रवण करवाना चाहिए।  भगवान को भोग में चरणामृत, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, फल, फूल, पंचगव्य, सुपारी, दूर्वा आदि अर्पित करें। इससे सत्यनारायण देव प्रसन्न होते हैं।  सत्यनारायण व्रत पूर्णिमा के दिन करने का विशेष महत्व है, क्योंकि पूर्णिमा सत्यनारायण का प्रिय दिन है, इस दिन चंद्रमा पूर्ण कलाओं के साथ उदित होता है और पूर्ण चंद्र को अर्घ्य देने से व्यक्ति के जीवन में पूर्णता आती है।  पूर्णिमा के चंद्रमा को जल से अर्घ्य देना चाहिए।  घर का वातावरण शुद्ध करके चौकी पर कलश रखकर भगवान श्री विष्णु की मूर्ति या सत्यनारायण की फोटो रख कर पूजन करें। परिवारजनों को एकत्रित करके भजन, कीर्तन, नृत्य गान आदि करें। सबके साथ प्रसाद ग्रहण करें, तदोपरांत चंद्रमा को अर्घ्य दें। यही सत्यनारायण भगवान की कृपा पाने का मृत्यु लोक में सरल उपाय है। श्री सत्यनारायण मंत्र ‘ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः’ का 108 बार जाप करें।

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भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को क्यों दिया था श्राप? पढ़ें यह पौराणिक कथा

लोग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के उपाय करते हैं. जिन पर माता लक्ष्मी की कृपा हो जाती है, वह धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है. हर कोई उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेना चाहता है. कोई नहीं चाहता कि माता लक्ष्मी उससे नाराज हो जाएं. हालांकि एक बार भगवान विष्णु   माता लक्ष्मी से नाराज हो गए थे और उनको श्राप दे दिया था. आखिर ऐसा क्यों हुआ? पढ़ें यह पौराणिक कथा. जब माता लक्ष्मी को मिला श्राप एक समय की बात है माता लक्ष्मी एक सुंदर अश्व को देखने में इतनी ध्यानमग्न थीं, कि उन्होंने भगवान विष्णु की बातों पर ध्यान नहीं दिया. इससे क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने उनको पृथ्वी लोक पर अश्वी बनने का श्राप दे दिया. इससे माता लक्ष्मी दुखी हो गईं, तो भगवान विष्णु ने कहा कि आपको कुछ समय के लिए अश्व की योनी में रहना होगा. फिर आपको एक पुत्र होगा. उसके बाद ही उस योनी से मुक्ति मिलेगी. जब समय आया तो माता लक्ष्मी पृथ्वी पर अश्व की योनी में जीवन व्यतीत करने लगीं. उन्होंने काफी समय तक भगवान शिव की आराधना की. अपने तप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न किया. भगवान शिव ने कहा कि आपके पति भगवान विष्णु इस पूरे संसार के पालनहार हैं. एक स्त्री का पति ही उसका भगवान होता है. आपको केवल भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए. इस पर माता लक्ष्मी ने कहा कि आप में और श्रीहरि में कोई भेद नहीं हैं. बस दोनों का स्वरूप अलग अलग है. आप यह दुख दूर कीजिए ताकि वह अश्व की योनी से मुक्त हों. इस पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको आशीष दिया और भगवान विष्णु को पृथ्वी लोक पर जाने के बारे में अवगत कराने का वचन दिया. कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अश्व रुप में अवतार लिया और माता लक्ष्मी के साथ अश्व योनी में समय व्यतीत किया. माता लक्ष्मी ने कुछ समय बाद एकवीर नामक पुत्र को जन्म दिया. उसके फलस्वरूप माता लक्ष्मी श्राप से मुक्त होकर वैकुंठ धाम चली गईं. एकवीर से हैहय वंश की उत्पत्ति हुई.

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 जनवरी से लेकर दिसंबर तक कब करा सकते हैं सत्यनारायण की कथा? जानिए तिथि और मुहूर्त

सत्यनारायण की कथा आमतौर पर सुबह और शाम दोनों समय की जाती है। लेकिन शाम के समय कथा करना काफी शुभ माना जाता है। क्योंकि कई बार पंचांग के अनुसार तिथि सुबह ही समाप्त हो जाती है। ऐसे में नए मास की शुरुआत में सत्यनारायण की कथा कराने के बजाय शाम के समय करना अच्छा होता है। 2023 पंचांग के अनुसार हर मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन भगवान विष्णु के अवतार सत्यनारायण की पूजा और कथा करने का विधान है। इस साल में हर मास में सत्यनारायण कथा करने के शुभ मुहूर्त बन रहे हैं। हिंदू धर्म में भगवान सत्यनारायण का विशेष महत्व है। भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों में से एक भगवान सत्यनारायण माना जाता है। इस रूप में भगवान को सत्य का अवतार माना गया है। सत्यनारायण पूजा सदियों से ऐसे ही चली आ रही है। परिवार में सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए सत्यनारायण कथा की जाती है। पंचांग के अनुसार, सत्यनारायण की कथा किसी भी मास की शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा तिथि को जाती है। जानिए साल 2023 में कब-कब करना सकते हैं सत्यनारायण की कथा। सत्यनारायण की कथा आमतौर पर सुबह और शाम दोनों समय की जाती है। लेकिन शाम के समय कथा करना काफी शुभ माना जाता है। क्योंकि कई बार पंचांग के अनुसार तिथि सुबह ही समाप्त हो जाती है। ऐसे में नए मास की शुरुआत में सत्यनारायण की कथा कराने के बजाय शाम के समय करना अच्छा होता है। साल 2023 में सत्यनारायण पूजा-व्रत के लिए तिथि और मुहूर्त की सूची 6 जनवरी 2023, शुक्रवार- पौष पूर्णिमा प्रारंभ – 6 जनवरी को सुबह 02 बजकर 14 मिनट से समाप्त – 7 जनवरी सुबह 04 बजकर 37 मिनट तक 5 फरवरी 2023 रविवार- माघ पूर्णिमा प्रारंभ – 4 फरवरी को रात 09 बजकर 29 मिनट से शुरू समाप्त – 5 फरवरी को रात 11 बजकर 58 मिनट तक 7 मार्च 2023 मंगलवार- फाल्गुन पूर्णिमा प्रारंभ – 6 मार्च को शाम 04 बजकर 17 मिनट से शुरू समाप्त -7 मार्च को शाम 06 बजकर 09 मिनट तक 5 अप्रैल 2023 बुधवार- चैत्र पूर्णिमा प्रारंभ – 5 अप्रैल को सुबह 09 बजकर 19 मिनट से समाप्त – 6 अप्रैल को सुबह 10 बजकर 04 मिनट तक 5 मई 2023 शुक्रवार- वैशाख पूर्णिमा प्रारंभ – 04 मई को रात 11 बजकर 44 मिनट से समाप्त – 5 मई को रात 11 बजकर 03 मिनट तक 3 जून 2023 शनिवार- ज्येष्ठ पूर्णिमा प्रारंभ – 3 जून को को रात 11 बजकर 16 मिनट से शुरू समाप्त – 4 जून को रात 09 बजकर 11 मिनट तक 3 जुलाई 2023 सोमवार- आषाढ़ पूर्णिमा प्रारंभ – 2 जुलाई को रात 08 बजकर 21 मिनट से शुरू समाप्त – 3 जुलाई को शाम 05 बजकर 08 मिनट पर समाप्त 1 अगस्त 2023, मंगलवार – श्रावण पूर्णिमा प्रारंभ – 1 अगस्त को सुबह 3 बजकर 51 मिनट से समाप्त – 2 जुलाई को सुबह 12 बजकर 1 मिनट तक 30 अगस्त 2023 बुधवार- श्रावण पूर्णिमा प्रारंभ – 30 अगस्त को रात 10 बजकर 58 मिनट से शुरू समाप्त – 31 अगस्त को सुबह 07 बजकर 05 मिनट में समाप्त 29 सितंबर 2023 शुक्रवार- भाद्रपद पूर्णिमा प्रारंभ – 28 सितंबर को शाम 06 बजकर 49 मिनट पर शुरू समाप्त – 29 सितंबर को दोपहर 03 बजकर 26 मिनट तक 28 अक्टूबर 2023 शनिवार- अश्विन पूर्णिमा प्रारंभ – 28 अक्टूबर को सुबह 04 बजकर 17 मिनट तक समाप्त – 29 अक्टूबर को सुबह 01 बजकर 53 मिनट तक 27 नवंबर 2023 सोमवार- कार्तिक पूर्णिमा प्रारंभ – 26 नवंबर को दोपहर 03 बजकर 53 मिनट से समाप्त – 27 नवंबर को दोपहर 02 बजकर 45 मिनट तक 26 दिसंबर 2023 मंगलवार, मार्गशीर्ष पूर्णिमा प्रारंभ – 26 दिसंबर को सुबह 05 बजकर 46 मिनट से शुरू समाप्त – 27 दिसंबर को सुबह 06 बजकर 02 मिनट तक

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वैष्णो देवी गुफा मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा

वैष्णो देवी का विश्व प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में कटरा नगर के समीप की पहाड़ियों पर स्थित है। इन पहाड़ियों को त्रिकुटा पहाड़ी कहते हैं। यहीं पर लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मातारानी का मंदिर। यह भारत में तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ स्थल है। मंदिर परिचय त्रिकुटा की पहाड़ियों पर स्थित एक गुफा में माता वैष्णो देवी की स्वयंभू तीन मूर्तियां हैं। देवी काली (दाएं), सरस्वती (बाएं) और लक्ष्मी (मध्य), पिण्डी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों पिण्डियों के सम्मि‍लित रूप को वैष्णो देवी माता कहा जाता है। इस स्थान को माता का भवन कहा जाता है। पवित्र गुफा की लंबाई 98 फीट है। इस गुफा में एक बड़ा चबूतरा बना हुआ है। इस चबूतरे पर माता का आसन है जहां देवी त्रिकुटा अपनी माताओं के साथ विराजमान रहती हैं। भवन वह स्थान है जहां माता ने भैरवनाथ का वध किया था। प्राचीन गुफा के समक्ष भैरो का शरीर मौजूद है और उसका सिर उड़कर तीन किलोमीटर दूर भैरो घाटी में चला गया और शरीर यहां रह गया। जिस स्थान पर सिर गिरा, आज उस स्थान को ‘भैरोनाथ के मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। कटरा से ही वैष्णो देवी की पैदल चढ़ाई शुरू होती है जो भवन तक करीब 13 किलोमीटर और भैरो मंदिर तक 14.5 किलोमीटर है। मंदिर की पौराणिक कथा मंदिर के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। एक बार त्रिकुटा की पहाड़ी पर एक सुंदर कन्या को देखकर भैरवनाथ उससे पकड़ने के लिए दौड़े। तब वह कन्या वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं। भैरवनाथ भी उनके पीछे भागे। माना जाता है कि तभी मां की रक्षा के लिए वहां पवनपुत्र हनुमान पहुंच गए। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। फिर वहीं एक गुफा में गुफा में प्रवेश कर माता ने नौ माह तक तपस्या की। हनुमानजी ने पहरा दिया। फिर भैरव नाथ वहां आ धमके। उस दौरान एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्द्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। अंत में गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया और भैरवनाथ वापस जाने का कह कर फिर से गुफा में चली गईं, लेकिन भैरवनाथ नहीं माना और गुफा में प्रवेश करने लगा। यह देखकर माता की गुफा कर पहरा दे रहे हनुमानजी ने उसे युद्ध के लिए ललकार और दोनों का युद्ध हुआ। युद्ध का कोई अंत नहीं देखकर माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का वध कर दिया। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी। तब उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। मंदिर की कथा उपरोक्त कथा को वैष्णो देवी के भक्त श्रीधर से जोड़कर भी देखा जाता है। 700 वर्ष से भी अधिक समय पहले कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वे नि:संतान और गरीब थे। लेकिन वे सोचा करते थे कि एक दिन वे माता का भंडारा रखेंगे। एक दिन श्रीधर ने आस-पास के सभी गांव वालों को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया और भंडारे वाले दिन श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बनाकर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके। जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे। वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे। वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए, दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे, श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी-सी कुटिया में आसानी से बैठ गए। श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था। भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णोदेवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया। श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े और कुछ दिनों बाद उन्हें वह गुफा मिल गई। तभी से वहां पर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु जाने लगे। 

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कामिका एकादशी व्रत कथा व्रत विधि महत्व

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से हर बिगड़े काम बनते हैं। व्रत करने से उपासकों के साथ-साथ उनके पित्रों के कष्ट भी दूर हो जाते हैं और उपासकों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। संसार सागर तथा पापों में फँसे हुए मनुष्यों को इनसे मुक्ति के लिये कामिका एकादशी का व्रत करना चाहिये। कामिका एकादशी के उपवास से भी पाप नष्ट हो जाते हैं, संसार में इससे अधिक पापों को नष्ट करने वाला कोई और उपाय नहीं है। कामिका एकादशी व्रत कथा एक नगर में एक ठाकुर और एक ब्राह्मण रहते थे। दोनों की एक दूसरे से बनती नहीं थी। आपसी झगड़े के कारण ठाकुर ने ब्राह्मण को मार डाला। इस पर नाराज ब्राह्मणों ने ठाकुर के घर खाना खाने से मना कर दिया। ठाकुर अकेला पड़ गया और वह खुद को दोषी मानने लगा। ठाकुर को अपनी गलती महसूस हुई और उसने एक मुनी से अपने पापों का निवारण करने का तरीका पूछा। इस पर, मुनी ने उन्हें कामिका एकादशी का उपवास करने के लिए कहा। निर्जला एकादशी व्रत की पूजा में जरुर शामिल करें ये 4 खास चीज, इनके बिना अधूरी है विष्णु पूजा ठाकुर ने ऐसा ही किया। ठाकुर ने व्रत करना शुरू कर दिया। एक दिन कामिका एकादशी के दिन जब ठाकुर भगवान की मूर्ति के निकट सोते हुए एक सपना देखा, भगवान ने उसे बताया, “ठाकुर, सभी पापों को हटा दिया गया है और अब आप ब्राह्मण हटिया के पाप से मुक्त हैं”।इसलिए, इस एकादशी को आध्यात्मिक साधकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह चेतना से सभी नकारात्मकता को नष्ट करता है और मन और हृदय को दिव्य प्रकाश से भर देता है। कामिका एकादशी व्रत विधि एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के पश्चात संकल्प करके श्री विष्णु के विग्रह की पूजन करना चाहिए। भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि नाना पदार्थ निवेदित करके, आठों प्रहर निर्जल रहकर विष्णु जी के नाम का स्मरण एवं कीर्तन करना चाहिए। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का बड़ा ही महत्व है अत: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजना ग्रहण करें। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी के दिन किया जाता है। अतः द्वादशी के दिन घर पर ब्राह्मण को बुलाएं और उन्हें खाना खिलाएं और सामर्थ्य अनुसार उन्हें दान दक्षिणा दें। उसके बाद स्वयंं पारण करें। ध्यान रहे कि पारण के समय के दौरान ही पारण किया जाना चाहिए। अगर ब्राह्मण को घर बुलाकर भोजन कराने का सामर्थ्य नहीं है तो आप एक व्यक्ति के भोजन के बराबर अनाज किसी गरीब को या मंदिर में दान कर दें। यह भी आपको उतना ही फल प्रदान करेगा। इस प्रकार जो कामिका एकादशी का व्रत रखता है उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं। कामिका एकादशी व्रत के नियम एकादशी व्रत का तीन दिन का नियम होता है। यानी दशमी, एकादश और द्वादशी को कामिका एकादशी के नियमों का पालन होता है। इन तीन दिनों के दौरान जातकों को चावल नहीं खाने चाहिए। इसके साथ ही लहसुन, प्याज और मसुर की दाल का सेवन वर्जित है। मांस और मदिरा का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिए। दशमी के दिन एक समय भोजन ग्रहण करना चाहिए और सूर्यास्त के बाद कुछ भी नहीं खाना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए। एकादशी की रात को जागरण करना चाहिए। एकादशी के दिन जागरण करना भी व्रत का ही हिस्सा है। द्वादशी के दिन पूजा कर पंडित को यथाशक्ति दान देना चाहिए और उसके बाद पारण करना चाहिए। एकादशी के दिन दातुन नहीं करना चाहिए। अपनी उंगली से ही दांत साफ करें। क्योंकि एकादशी के दिन पेड़ पौधों को तोड़ते नहीं है। इस दिन किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। कामिका एकादशी महत्व इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। कामिका एकादशी के उपवास में शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन होता है। जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें गंगा स्नान के फल से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण में केदार और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है, वह पुण्य कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करने से प्राप्त हो जाता है। आभूषणों से युक्त बछड़ा सहित गौदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल कामिका एकादशी के उपवास से मिल जाता है। जो उत्तम द्विज श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का उपवास करते हैं तथा भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उनसे सभी देव, नाग, किन्नर, पितृ आदि की पूजा हो जाती है, इसलिये पाप से डरने वाले व्यक्तियों को विधि-विधान सहित इस उपवास को करना चाहिये। संसार सागर तथा पापों में फँसे हुए मनुष्यों को इनसे मुक्ति के लिये कामिका एकादशी का व्रत करना चाहिये। कामिका एकादशी के उपवास से भी पाप नष्ट हो जाते हैं, संसार में इससे अधिक पापों को नष्ट करने वाला कोई और उपाय नहीं है। इस कामिका एकादशी की रात्रि को जो मनुष्य जागरण करते हैं और दीप-दान करते हैं, उनके पुण्यों को लिखने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं।

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निर्जला एकादशी व्रत की पूजा में जरुर शामिल करें ये 4 खास चीज, इनके बिना अधूरी है विष्णु पूजा

निर्जला एकादशी 31 मई 2023 को है. इस व्रत-पूजा में कोई अवरोध न हो इसलिए आज ही पूजा की सामग्री एकत्रित कर लें. आइए जानते हैं निर्जला एकादशी की पूजा सामग्री और विधि. निर्जला एकादशी को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ये व्रत किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है. निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है. द्वापर युग में भीम ने भी निर्जला एकादशी का व्रत किया था, इस वजह से इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं. इस साल निर्जला एकादशी 31 मई 2023 को है. ये व्रत आत्म संयम सिखाता है. निर्जला एकादशी व्रत में विष्णु जी की पूजा करने से सभी 24 एकादशियों का फल मिलता है, ऐसे में व्रत-पूजा में कोई अवरोध न हो इसलिए आज ही पूजा की सामग्री एकत्रित कर लें. आइए जानते हैं निर्जला एकादशी की पूजा सामग्री और विधि. निर्जला एकादशी पूजा सामग्री भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र, पूजा की चौकी, पीला कपड़ा पीले फूल, पीले वस्त्र, फल (केला, आम, ऋतुफल), कलश, आम के पत्ते पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर, शहद), तुलसी दल, केसर, इत्र, इलायची पान, लौंग, सुपारी, कपूर, पानी वाली नारियल, पीला चंदन, अक्षत, पंचमेवा कुमकुम, हल्दी, धूप, दीप, तिल, आंवला, मिठाई, व्रत कथा पुस्तक, मौली दान के लिए- मिट्‌टी का कलश, सत्तू, फल, तिल, छाता, जूते-चप्पल निर्जला एकादशी पूजा विधि निर्जला एकादशी की पूजा तिल, गंगाजल, तुलसी पत्र, श्रीफल बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा के साथ मां लक्ष्मी और तुलसी की उपासना भी जरुर करें. मान्यता है तुलसी पूजा के बिना एकादशी का व्रत-पूजन अधूरा रहता है. इस दिन विष्णु जी का जल में तिल मिलाकर ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप हुए विष्णु जी का अभिषेक करें. समस्त पूजन सामग्री लक्ष्मी-नारायण को अर्पित करें. मिठाई में तुलसी दल डालकर विष्णु जी को चढ़ाएं. किसी गौशाला में गायों की देखभाल के लिए दान-पुण्य करें. गरीबों को गर्मी से राहत पाने की चीजों का दान करें. शाम को तुलसी में घी का दीपक लगाकर उसमें काला या सफेद तिल डालें. मान्यता है इससे लक्ष्मी जी प्रसन्न रहती हैं और साधक को धन-धान्य से परिपूर्ण रहने का आशीर्वाद देती है. निर्जला एकादशी 2023 मुहूर्त  ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि शुरू – 30 मई 2023, दोपहर 01.09 ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि समाप्त – 31 मई 2023, दोपहर 01.47 लाभ (उन्नति) – सुबह 05.24 – सुबह 07.08 अमतृ (सर्वोत्तम) – सुबह 07.08 – सुबह 08.51 शुभ (उत्तम) – सुबह 10.35 – दोपहर 12.19 व्रत पारण समय – सुबह 05.23 – सुबह 08.09 (1 जून 2023)

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निर्जला एकादशी पढ़ें पौराणिक व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है- भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता। निर्जला एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है- भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता। इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूं कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है। अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है। व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और कांपकर कहने लगे कि अब क्या करूं? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हां वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूं। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए। यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है। यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है। व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए। इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूं, दूसरे दिन भोजन करूंगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूंगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएं। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढंक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है। हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए।  जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

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