संकष्टी चतुर्थी व्रत की प्रामाणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवताओं के ऊपर भारी संकट आ गया. जब वह खुद से उस संकट का समाधान नहीं निकाल पाए तो भगवान शिव के पास मदद मांगने के लिए गए. भगवान शिव ने गणेश जी और कार्तिकेय से संकट का समाधान करने के लिए कहा तो दोनों भाइयों ने कहा कि वे आसानी से इसका समाधान कर लेंगे हिन्दू धर्मशास्त्रों में माघ महीने का बहुत महत्व माना गया है। मान्यतानुसार माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी गणेश चतुर्थी भी कहते हैं। इस दिन तिल चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत घर-परिवार पर आ रही विपदा दूर करने में सक्षम है। इतना ही नहीं यह व्रत रुके मांगलिक कार्य संपन्न करवाता है तथा भगवान श्री गणेश जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति कराते हैं। संकष्टी चतुर्थी व्रत की पौराणिक गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेश जी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेश जी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परंतु गणेश जी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा।  गणेश जी अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिव जी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा। तब उन्होंने कहा- ‘माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं। यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार शिव जी ने श्री गणेश को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। इस व्रत से व्रतधारी के सभी तरह के दुख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की ख्याति तथा सुख-समृद्धि बढ़ेगी तथा पुत्र-पौत्रादि, धन-ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी। अत: यह चतुर्थी हर विपदा दूर करने वाली मानी जाती है।

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रोहिणी व्रत सूची 2023

महत्वपूर्ण जानकारी रोहिणी व्रत मई में रविवार, 21 मई 2023 रोहिणी व्रत प्रारंभ : 20 मई 2023 को प्रातः 07:35 बजे रोहिणी व्रत समाप्त: 21 मई 2023 को सुबह 08:31 बजे रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों का महत्वपूर्ण व्रत है इस व्रत को जैन समुदाय के लोग करते है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के दिन किया जाता हैं। इसलिए इसे व्रत को रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर रोहिणी व्रत का पारण किया जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र आता है। रोहिणी व्रत एक वर्ष में 12 होते है अर्थात् यह प्रत्येक महीनें में आता है। फलाहार सूर्यास्त से पहले किया जाता है क्योंकि रात को भोजन नहीं किया जाता है।ऐसा माना जाता है कि इस व्रत का पालन 3, 5 या 7 वर्षों तक लगातार किया जाता है। अगर उचित अवधि की बात करें तो यह 5 वर्ष और 5 महीने है। इस व्रत का समापन उद्यापन द्वारा ही किया जाता है। यह व्रत पुरुष और स्त्रियां दोनों कर सकते हैं। हालांकि, स्त्रियों के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। जैन समुदाय में यह मान्यता है कि यह व्रत विशेष फल देता है तथा कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने में सहायक होता हे। रोहिणी व्रत पूजा विधिः इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाना चाहिए और घर की साफ सफाई भी अच्छे से कर लेनी चाहिए। इसके बाद सभी नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर घर की साफ-सफाई करनी चाहिए। गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान करें और फिर व्रत का संकल्प लें। आमचन कर अपने आप को शुद्ध करें। पहले सूर्य भगवान को जल का अर्घ्य दें। इस व्रत के दौरान जैन धर्म में रात का भोजन करने की मनाही होती है। फलाहार सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए। रोहिणी नक्षत्र समय के साथ रोहिणी व्रत सूची 2023 जनवरी रोहिणी व्रत 2023 बुधवार, 04 जनवरी 2023प्रारंभ: 03 जनवरी 2023 अपराह्न 05:48 बजेसमाप्त: 04 जनवरी 2023 अपराह्न 07:17 बजे मंगलवार, 31 जनवरी 2023प्रारंभ : 31 जनवरी 2023 दोपहर 01:13 बजेसमाप्त: 01 फरवरी 2023 पूर्वाह्न 02:36 बजे फरवरी रोहिणी व्रत 2023 मंगलवार, 28 फरवरी 2023प्रारंभ: 27 फरवरी 2023 पूर्वाह्न 08:43 बजेसमाप्त: 28 फरवरी 2023 पूर्वाह्न 09:59 बजे मार्च रोहिणी व्रत 2023 सोमवार, 27 मार्च 2023प्रारंभ : 26 मार्च 2023 अपराह्न 04:17 बजेसमाप्त: 27 मार्च 2023 को शाम 05:26 बजे अप्रैल रोहिणी व्रत 2023 रविवार, 23 अप्रैल 2023प्रारंभ: 22 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 11:53 बजेसमाप्त: 24 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 12:56 बजे मई रोहिणी व्रत 2023 रविवार, 21 मई 2023प्रारंभ: 20 मई 2023 पूर्वाह्न 07:35 बजेसमाप्त: 21 मई 2023 पूर्वाह्न 08:31 बजे जून रोहिणी व्रत 2023 शनिवार, 17 जून 2023प्रारंभ: 16 जून 2023 अपराह्न 03:21 बजेसमाप्त: 17 जून 2023 अपराह्न 04:10 बजे जुलाई रोहिणी व्रत 2023 शुक्रवार, 14 जुलाई 2023प्रारंभ: 13 जुलाई 2023 पूर्वाह्न 11:07 बजेसमाप्त: 14 जुलाई 2023 पूर्वाह्न 11:50 बजे अगस्त रोहिणी व्रत 2023 शुक्रवार, 11 अगस्त 2023प्रारंभ : 10 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 06:55 बजेसमाप्त: 11 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 07:31 बजे सितंबर रोहिणी व्रत 2023 गुरुवार, 07 सितंबर 2023प्रारंभ: 06 सितंबर 2023 अपराह्न 02:39 बजेसमाप्त: 07 सितंबर 2023 अपराह्न 03:07 बजे अक्टूबर रोहिणी व्रत 2023 बुधवार, 04 अक्टूबर 2023प्रारंभ: 03 अक्टूबर 2023 रात 10:22 बजेसमाप्त: 04 अक्टूबर 2023 रात 10:44 बजे मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023प्रारंभ : 31 अक्टूबर 2023 पूर्वाह्न 06:09 बजेसमाप्त: 01 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 06:23 बजे नवंबर रोहिणी व्रत 2023 मंगलवार, 28 नवंबर 2023प्रारंभ: 27 नवंबर 2023 दोपहर 01:52 बजेसमाप्त : 28 नवंबर 2023 अपराह्न 01:58 बजे दिसंबर रोहिणी व्रत 2023 सोमवार, 25 दिसंबर 2023प्रारंभ: 24 दिसंबर 2023 अपराह्न 09:34 बजेसमाप्त: 25 दिसंबर 2023 अपराह्न 09:34 बजे

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रोहिणी व्रत क्या होता है? कैसे किया जाता है? कौन कर सकता है?

जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। जैन समुदाय में रोहिणी व्रत 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत किया जाता होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्‍व है, क्योंकि यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंध से छुटकारा दिलाने में सहायक है जब उदियातिथि अर्थात सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है, उस दिन रोहिणी व्रत किया जाता है। ये व्रत विशेष रूप से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा किया जाता है। यह व्रत एक त्योहार की तरह माना गया है। इस दिन भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है। इस व्रत को नियमित 3, 5 या 7 वर्षों तक करने के बाद ही उद्यापन किया जा सकता है। जैन परिवारों की महिलाओं के लिए तो इस व्रत का पालन करना अति आवश्यक माना गया है। यह व्रत महिलाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। इस दिन महिलाएं प्रात: जल्दी उठकर स्नान करके पवित्र होकर पूजा करती हैं। इस दिन पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा के लिए वासुपूज्य भगवान की पांचरत्न, ताम्र या स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना की जाती है। वैसे पुरुष भी ये व्रत कर सकते हैं। इस पूजा में जैन धर्म के लोग भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं। महिलाएं अपने पति की लंबी आयु एवं स्वास्थ्य के लिए करती हैं। इस दिन गरीबों को दान देने का भी महत्व होता है। व्रत से जुड़ी खास बातें यह व्रत महिलाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। जैन परिवारों की महिलाओं के लिए तो इस व्रत का पालन करना अति आवश्यक बताया गया है। इस दिन पूरे विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है। वैसे पुरुष भी ये व्रत कर सकते हैं। इस पूजा में जैन धर्म के लोग भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं। महिलाएं अपने पति की लम्बी आयु एवं स्वास्थ्य के लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं प्रात: जल्दी उठकर स्नान करके पवित्र होकर पूजा करती हैं। इस व्रत में भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है। पूजा के लिए वासुपूज्य भगवान की पांचरत्न, ताम्र या स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना की जाती है। उनकी आराधना करके दो वस्त्रों, फूल, फल  और नैवेध्य का भोग लगाया जाता है। इस दिन गरीबों को दान देने का भी महत्व होता है।   रोहिणी व्रत कथा रोहिणी व्रत के संबंध में पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्‍या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ। एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्‍या उत्पन्‍न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्‍होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्मकार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो। तब स्वामी ने कहा- सम्‍यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्‍याग करें और श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित 16 प्रहर व्‍यतीत करें अर्थात सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्‍वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई। इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्‍वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्‍यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्‍वरूप स्वर्गों में उत्‍पन्‍न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्‍त हुए।

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गणेश जी की कथा

गणेश जी की कथा एक बार गणेश जी महाराज एक सेठ जी के खेत में से जा रहे थे तो उन्होंने बारह दाने अनाज के तोड़ लिए। फिर गणेश जी के मन में पछतावा हुआ कि मैंने तो सेठ जी के यहां चोरी कर ली ।  तो गणेश जी सेठ जी के बारह साल की नौकरी करने लग गए। एक दिन सेठानी  राख से हाथ धोने लगी तो  गणेश जी ने  सेठानी का हाथ  पकड़ कर मिट्टी से हाथ  धुला दिया। सेठानी सेठ जी से बोली कि  ऐसा क्या नौकर रखा है नौकर होकर उसने मेरा हाथ  पकड़ लिया। सेठ जी  ने गणेश को बुलाकर पूछा कि तुमने  सेठानी का हाथ क्यों पकड़ा।  तो गणेश जी ने बोला कि मैंने तो एक सीख की बात बताई है। राख से हाथ धोने से घर की लक्ष्मी  नाराज होकर घर से चली जाती है और  मिट्टी से हाथ धोने से आती है। सेठ जी ने सोचा कि गणेश  है तो  सच्चा । थोड़े दिनों बाद कुंभ का मेला आया। सेठ जी ने कहा गणेश सेठानी को कुंभ के मेले में स्नान कराके ले आओ ।  पति की लम्बी आयु प्राप्त करने के लिए रखें वट सावित्री व्रत सेठानी किनारे पर बैठकर सेठानी किनारे पर बैठकर नहा रही थी तो गणेश जी उनका हाथ पकड़कर आगे डुबकी  लगवा लाये। घर आकर सेठानी ने सेठ से कहा कि  गणेश ने तो मेरी इज्जत ही नहीं रखी और इतने सारे आदमियों के बीच में मुझे घसीट कर आगे पानी में ले गए। तब सेठ जी ने गणेश जी को पूछा कि ऐसा क्यों किया तो गणेश जी ने कहा कि  सेठानी किनारे बैठकर गंदे पानी से नहा रही थी । तो मैं आगे अच्छे पानी में  डुबकी लगवाकर ले आया। इससे अगले जन्म में  बहुत बड़े राजा और राजपाट मिलेगा। सेठ जी ने सोचा कि गणेश  है तो सच्चा। एक दिन घर में पूजा पाठ हो रही थी।  हवन हो रहा था।  सेठ जी ने गणेश  को कहा की जाओ सेठानी को बुलाकर ले आओ ।   सेठानी काली चुनरी ओढ़ गणेश सेठानी को बुलाने गया तो सेठानी काली चुनरी ओढ़ कर चलने लगी तो गणेश जी ने काली चुनरी फाड़ दी और कहा कि लाल चुनरी ओढ़ के चलो। सेठानी नाराज होकर सो गई सेठ जी ने आकर पूछा क्या बात है तो सेठ ने बोला कि गणेश ने मेरी चुनरी फाड़ दी। सेठ जी ने गणेश को बुलाकर बहुत डांटा और कहा तुम बहुत बदमाशी करते हो । तो गणेश जी ने कहा पूजा पाठ में काला वस्त्र नहीं पहनते हैं इसलिए मैंने लाल वस्त्र के लिए  कहा ।  काला वस्त्र पहनने से कोई भी  शुभ काम सफल नहीं होता है। फिर  सेठजी ने सोचा कि गणेश है तो समझदार । एक दिन   सेठजी पूजा करने लगे तो पंडित जी ने बोला की वो गणेश जी की मूर्ति लाना भूल गया। अब क्या करें ?तो गणेश जी ने बोला कि मेरे को ही मूर्ति बनाकर विराजमान कर लो ।  आपके सारे काम सफल हो जाएंगे। यह बात सुनकर सेठ जी को भी बहुत गुस्सा आया। और वो बोले कि तुम तो अब तक सेठानी से ही मजाक करते थे मेरे से भी करने लग गए । तो गणेश जी ने कहा मैं मजाक नहीं कर रहा हूं।  गणेश जी का रूप धारण  मैं सच बात कह रहा हूं। इतने में ही गणेश ने गणेश जी का रूप धारण कर लिया । और सेठ और सेठानी ने ही गणेश जी की पूजा की। पूजा खत्म होते ही गणेश जी अंतर्धान हो गए। सेठ सेठानी को बहुत धोखा हुआ और उन्होंने कहा कि हमारे पास तो गणेश जी रहते थे और हमने उनसे इतना काम कराया।

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 पति की लम्बी आयु प्राप्त करने के लिए रखें वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण व्रत है जिसे पारंपरिक पंचांग के अनुसार ‘ज्येष्ठ’ के महीने में पूर्णिमा या ‘अमावस्या तिथि पर मनाया जाता है। इसका उपवास अनुष्ठान ‘त्रयोदशी’ से शुरू होता है और पूर्णिमा या अमावस्या पर समाप्त होता है। प्रायः अनेक हिंदू त्योहार पूर्णिमा या अमावस्या पर आयोजित होते हैं और केवल उसी एक दिन ही मनाए जाते हैं। केवल वट सावित्री व्रत एक ऐसा अपवाद है जो पूर्णिमा और अमावस्या दोनों दिनों में मनाया है। ज्येष्ठ अमावस्या वाले दिन इसे ‘शनि जयंती’ के रूप में भी मनाया जाता है। गुजरात, महाराष्ट्र और भारत के दक्षिणी राज्यों में विवाहित महिलाएं इसे पूर्णिमा वाले मनाती हैं और उत्तर भारत की महिलायें अमावस्या वाले दिन। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इस व्रत का संबंध वट के वृक्ष और सावित्री के साथ है, इसलिए इसे वट सावित्री व्रत के नाम से संबोधित किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन महिलाओं को व्रत के साथ-साथ मौन भी धारण करना चाहिए। मौन धारण करने से महिलाओं को हजारों गौओं के दान जितना पुण्य एकसाथ ही मिल जाता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष का पूजन और व्रत करके ही सावित्री ने यमराज से अपने पति को वापस पा लिया था। तभी से पति की लंबी आयु के लिए इस व्रत का विधान प्रचलित हो गया। वट सावित्री व्रत का महत्व वट सावित्री व्रत की महिमा का उल्लेख कई हिंदू पुराणों जैसे ‘भविष्योत्तर पुराण’ और ‘स्कंद पुराण’ में किया गया है। वट सावित्री व्रत पर ‘वट’ या बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, बरगद का पेड़ ‘त्रिमूर्ति’ अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है। पेड़ की जड़ें भगवान ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करती हैं, तना भगवान विष्णु का प्रतीक है और पेड़ का ऊपरी भाग भगवान शिव है। इसके अलावा पूरा ‘वट’ वृक्ष ‘सावित्री‘ का प्रतीक है। महिलाएं अपने पति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस दिन एक पवित्र उपवास रखती हैं और अपने अच्छे भाग्य और जीवन में सफलता के लिए प्रार्थना भी करती हैं। व्रत की विधि इस दिन सुबह स्नान आदि दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर एक बांस की टोकरी लेकर उसमें सात प्रकार के धान्य रखें और भगवान् ब्रह्मा की मूर्ति प्रतिष्ठापित करके उसके बाईं ओर एक दूसरी बांस की टोकरी रखें और इसी प्रकार उसमें सत्यवान् और सावित्री की मूर्ति प्रतिष्ठापित करके दोनों टोकरियों को वट के वृक्ष के नीचे ले जाकर रख दें। दोनों टोकरियों में प्रतिष्ठापित मूर्तियों की मौली, रोली, कच्च सूत, भीगे हुए चने और जल से पूजा आदि करके वट वृक्ष के मूल में जल का सिंचन करना चाहिये। वृक्ष का सिंचन करके वृक्ष के तने के चारों ओर सूत लपेटकर तीन बार वृक्ष की परिक्रमा और घर लौटकर अपनी सास आदि के पांव छूकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करें। वट सावित्री व्रत की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल मे एक राजा थे अश्वपति। उनकी एक ही संतान थी सावित्री। सावित्री वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से विवाह करना चाहती थी। नारद जी ने सावित्री को बताया कि सत्यवान की आयु बहुत कम है। फिर भी सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला और सत्यवान से ही विवाह के लिए अड़ी रही। विवाह के बाद वह राज वैभव त्याग कर सत्यवान के साथ उनके परिवार की सेवा करने के लिए वन में ही रहने लगी। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु हुई, उस दिन वह लकड़ियां काटने के लिए जंगल गए हुए थे। वहां वह अचानक मूर्च्छित होकर गिर पड़े। थोड़ी ही देर में यमराज ने सत्यवान के प्राण ले लिए। 3 दिनों से उपवास में रह रही सावित्री उस बात को जानती थी। इसलिए वह बिना व्याकुल हुए यमराज से सत्यवान के प्राण लौटाने की प्रार्थना करने लगीं। लेकिन यमराज ने उसकी नहीं सुनी और सत्यवान को लेकर यमलोक की तरफ चल दिये। यह देखकर सावित्री भी यमराज के पीछे पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री से बहुत बार लौटने के लिए कहा लेकिन सावित्री अपनी जिद पर अड़ी रही कि मैं बिना अपने पति के वापस नहीं जाऊंगी। अन्यथा मुझे भी अपने साथ ले चलो। सावित्री का यह साहस और त्याग देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए

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प्रदोष व्रत शिवजी का सबसे पावन और अचूक व्रत, जानिए कैसे करें

प्रदोष-व्रत चन्द्रमौलेश्वर भगवान शिव की प्रसन्नता व आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए किया जाता है। भगवान शिव को आशुतोष भी कहा गया है, जिसका आशय है-शीघ्र प्रसन्न होकर आशीष देने वाले। प्रदोष-व्रत को श्रद्धा व भक्तिपूर्वक करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आज हम वेबदुनिया के पाठकों को प्रदोष-व्रत की पूर्ण जानकारी देंगे। पूर्ण श्रद्धाभाव से किया गया व्रत निश्चय ही फलदायी होता है। हिन्दू धर्म में कई ऐसे व्रत हैं जिनके करने से व्यक्ति अपने जीवन में लाभ प्राप्त कर सकता है किन्तु प्रदोष-व्रत का सनातन धर्म में अति-महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रदोष-व्रत कैसे करें प्रदोष-व्रत प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को होता है। सभी पंचागों में प्रदोष-व्रत की तिथि का विशेष उल्लेख दिया गया होता है। दिन के अनुसार प्रदोष-व्रत के महत्त्व में और भी अधिक वृद्धि हो जाती है। जैसे सोमवार दिन होने वाला प्रदोष-व्रत सोम प्रदोष, मंगलवार के दिन होने वाला प्रदोष-व्रत भौम-प्रदोष के नाम से जाना जाता है। इन दिनों में आने वाला प्रदोष विशेष लाभदायी होता है। प्रदोष वाले दिन प्रात:काल स्नान करने के पश्चात भगवान शिव का षोडषोपचार पूजन करना चाहिए। दिन में केवल फलाहार ग्रहण कर प्रदोषकाल में भगवान शिव का अभिषेक पूजन कर व्रत का पारण करना चाहिए। प्रदोषकाल क्या है प्रदोष-व्रत में प्रदोषकाल का बहुत महत्व होता है। प्रदोष वाले दिन प्रदोषकाल में ही भगवान शिव की पूजन संपन्न होना आवश्यक है। शास्त्रानुसार प्रदोषकाल सूर्यास्त से 2 घड़ी (48 मिनट) तक रहता है। कुछ विद्वान मतांतर से इसे सूर्यास्त से 2 घड़ी पूर्व व सूर्यास्त से 2 घड़ी पश्चात् तक भी मान्यता देते हैं। किन्तु प्रामाणिक शास्त्र व व्रतादि ग्रंथों में प्रदोषकाल सूर्यास्त से 2 घड़ी (48 मिनिट) तक ही माना गया है। पांच प्रदोषों का है विशेष महत्त्व 1. रवि प्रदोष- रविवार के दिन होने वाले प्रदोष को रवि-प्रदोष कहा जाता है। रवि-प्रदोष व्रत दीर्घायु व आरोग्य प्राप्ति के लिए किया जाता है। रवि-प्रदोष व्रत करने से साधक को आरोग्यता व अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।  2. सोम प्रदोष- सोमवार के दिन होने वाले प्रदोष को सोम-प्रदोष कहा जाता है। सोम प्रदोष व्रत किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए किया जाता है। सोम-प्रदोष व्रत करने से साधक की अभीष्ट कार्य की सिद्धि होती है। 3. भौम प्रदोष- मंगलवार के दिन होने वाले प्रदोष को भौम-प्रदोष कहा जाता है। भौम-प्रदोष व्रत ऋण मुक्ति के लिए किया जाता है। भौम-प्रदोष व्रत करने से साधक ऋण एवं आर्थिक संकटों से मुक्ति प्राप्त करता है। 4. गुरु प्रदोष- गुरुवार के दिन होने वाले प्रदोष को गुरु-प्रदोष कहा जाता है। गुरु प्रदोष व्रत विशेषकर स्त्रियों के लिए होता है। गुरु प्रदोष व्रत दांपत्य सुख, पति सुख व सौभाग्य प्राप्ति के लिए किया जाता है। 5. शनि प्रदोष- शनिवार के दिन होने वाले प्रदोष को शनि-प्रदोष कहा जाता है। शनि प्रदोष व्रत संतान प्राप्ति एवं संतान की उन्नति व कल्याण के लिए किया जाता है। शनि-प्रदोष व्रत करने से साधक को संतान सुख की प्राप्ति होती है। कब से प्रारंभ करें प्रदोष-व्रत व्रतादि ग्रंथों में किसी भी व्रत को प्रारंभ करने की तिथि, मास, पक्ष व मुहूर्त का उल्लेख मिलता है। शास्त्रानुसार प्रदोष-व्रत किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से प्रारंभ किया जा सकता है। श्रावण व कार्तिक मास प्रदोष-व्रत को प्रारंभ करने के लिए अधिक श्रेष्ठ माने गए हैं। प्रदोष-व्रत का प्रारंभ  विधिवत् पूजन-अर्चन एवं संकल्प लेकर करना श्रेयस्कर रहता है। 

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प्रदोष व्रत से जुडी पौराणिक कथा

ऋषि शांडिल्य ने विधवा ब्राह्मणी को धर्म बुद्ध गुप्त की माता की मृत्यु के बारे में भी बताया. जब विधवा ब्राह्मणी को यह सभी बातें पता चली तो वह बहुत दुखी हुई. सब ऋषि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत के बारे में बताया. शांडिल्य ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए विधवा ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने प्रदोष व्रत करना आरंभ किया स्कंद पुराण में हिंदू धार्मिक तथ्यों के अनुसार प्रदोष व्रत का उल्लेख किया गया है. स्कंद पुराण में बताया गया है कि हर महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी के दिन शाम के समय को प्रदोष व्रत कहा जाता है. प्रदोष व्रत शिव जी को प्रसन्न करने और अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए किया जाता है.  पुराने समय में एक बहुत ही गरीब विधवा ब्राह्मणी थी. जीवन यापन करने के लिए वह विधवा ब्राम्हणी अपने पुत्र को साथ लेकर सुबह सुबह भिक्षा लेने निकल जाती थी और शाम होने पर अपने घर वापस आती थी .एक दिन जब वह विधवा ब्राह्मणी भिक्षा लेकर घर वापस आ रही थी तो उसे एक नदी के समीप एक खूबसूरत बालक बैठा दिखाई दिया पर वह विधवा ब्राह्मणी उस बालक को नहीं पहचानती थी. वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार धर्म गुप्त था. धर्म गुप्त को शत्रुओं ने युद्ध में हराकर उसे उसके राज्य से बाहर निकाल दिया था. एक युद्ध में धर्म गुप्त के शत्रुओं ने धर्म गुप्त के पिता की हत्या करके उसका राज्य छीन लिया. पिता की मृत्यु से धर्म गुप्त की माता को आघात लगा और उनकी भी मृत्यु हो गई. तब धर्म गुप्त अपना राज्य छोड़ कर एक नदी के किनारे उदास बैठा था. ब्राह्मणी को उस बालक पर दया आ गई और वह धर्म गुप्त को अपने घर ले गई और उसका पालन पोषण करने लगी. विधवा ब्राह्मणी धर्म गुप्त से अपने पुत्र के समान प्रेम करती थी. राजकुमार धर्म गुप्त भी उस विधवा ब्राह्मणी के साथ रहकर खुश थे. कुछ समय के बाद वह विधवा ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ मंदिर में दर्शन करने गई. मंदिर में उन्हें ऋषि शांडिल्य मिले. ऋषि शांडिल्य एक बहुत ही महान ऋषि थे. जिन्हें सभी कोई मानते थे. जब ऋषि शांडिल्य ने धर्म गुप्त को देखा तब उन्होंने विधवा ब्राह्मणी को बताया कि यह बालक विदर्भ देश के राजा का पुत्र धर्म गुप्त है. इसके पिता युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए हैं. ऋषि शांडिल्य ने विधवा ब्राह्मणी को धर्म बुद्ध गुप्त की माता की मृत्यु के बारे में भी बताया. जब विधवा ब्राह्मणी को यह सभी बातें पता चली तो वह बहुत दुखी हुई. सब ऋषि शांडिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत के बारे में बताया. शांडिल्य ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए विधवा ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने प्रदोष व्रत करना आरंभ किया. तीनों  ऋषि शांडिल्य द्वारा बताए गए नियमों का पालन करते हुए व्रत करने लगे पर उन्हें व्रत के फल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. कुछ समय व्यतीत होने के बाद एक दिन वह दोनों बालक जंगल में घूम रहे थे. तब उन्होंने वहां पर कुछ गंधर्व कन्याओं को घूमते हुए देखा. ब्राह्मणी का बालक अपने घर वापस आ गया पर राजकुमार धर्म गुप्त वहीं ठहर गए. धर्म गुप्त  गंधर्व कन्या  अंशुमती  की ओर आकर्षित हो गए और उससे बात करने लगे. बात करते-करते गंधर्व कन्या और राजकुमार दोनों को एक दूसरे से प्रेम हो गया. तब धर्म गुप्त अंशुमती  से विवाह करने के लिए उसके पिता से मिलने गए. जब अंशुमती  के पिता को यह पता चला कि यह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उन्होंने भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह धर्म गुप्त से कर दिया. अंशुमती  से विवाह होने के बाद राजकुमार चंद्रगुप्त की किस्मत के सितारे वापस पलटने लगे. राजकुमार धर्म गुप्त ने बहुत संघर्ष करके फिर से अपने गंधर्व सेना का निर्माण किया और विदर्भ देश पर आक्रमण करके विजय हासिल की. कुछ समय व्यतीत होने के बाद धर्म गुप्त को यह पता चला कि उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है वह विधवा ब्राम्हणी और राजकुमार के प्रदोष करने का फल है. उनके प्रदोष व्रत करने से शिव जी ने प्रसन्न होकर उनके जीवन की सभी कठिनाइयों को दूर किया है.

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सावन सोमवार व्रत कथा : सावन सोमवार की यह है व्रत कथा, जरूर पढ़ें पूरी होगी मनचाही मुराद

अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है अगर आपकी कोई मन्‍नत पूरी न हो रही हो या फ‍िर तमाम प्रयासों के बावजूद आपको कर‍ियर में सफलता न म‍िल रही हो या व्‍यक्तिगत जीवन में परेशानी चल रही हो। मसलन कोई भी द‍िक्‍कत हो तो परेशान होने के बजाए अबकी सावन सोमवार का व्रत करके यहां बताई गई व्रत कथा का पाठ करें। मान्‍यता है क‍ि सावन सोमवार के द‍िन अगर व्रत रखकर इस कथा का पाठ क‍िया जाए तो जातकों की मनचाही मुराद पूरी हो जाती है

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ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर कहां है? मंदिर से जुड़ी कथा

वेद और पुराणों की मानें तो हिंदू धर्म में हमारे 33 कोटि देवी-देवता हैं जिन्हें कुछ लोग 33 करोड़ मानते हैं तो कुछ कोटि को प्रकार. संख्या चाहे जो हो इनमें त्रिमूर्ति यानी 3 देवताओं को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है. ब्रह्मा विष्णु और महेश यानी भगवान शिव ब्रह्मदेव को संसार का रचनाकार माना जाता है, विष्णु को पालनहार और महेश यानी शिव को संहारक. लेकिन हैरानी की बात है कि जिन्होंने सृष्टि की रचना की, उसका निर्माण किया उनकी संसार में पूजा नहीं की जाती ब्रह्मा जी का मंदिर कहां है? भारत के राजस्थान राज्य के अजमेर ज़िले के पवित्र स्थल पुष्कर में ब्रह्मा जी का मंदिर बना हुआ है. इस मन्दिर में जगत पिता ब्रह्मा जी की मूर्ति को स्थापित किया गया है. इस मंदिर का निर्माण लगभग 14वी शताब्दी में हुआ था जो कि लगभग 700 वर्ष पुराना है. यह मन्दिर संगमरमर के पत्थरों से बना है. ब्रह्मा जी के इस मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है. कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने पुष्कर में कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही यह यज्ञ किया था. यही कारण है कि हर साल अक्टूबर, नवंबर के बीच पड़ने वाले कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में मेला लगता है. मंदिर से जुड़ी कथा भगवान ब्रह्मा इस संसार के पालनहार है. फिर भी उनका सिर्फ एक ही मंदिर है. ऐसा इसलिए है क्योंकि कहा जाता है कि ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री में ब्रह्मा जी को श्राप दिया था. सावित्री ने अपने पति ब्रह्मा को ऐसा श्राप क्यों दिया था. इसका उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है. कहा जाता है कि धरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने बहुत उत्पात मचाया हुआ था. उसके बढ़ते अत्याचारों को देख ब्रह्मा जी ने उसका वध कर दिया था. परंतु जब उस राक्षक का बध किया था तब वध करते समय ब्रह्मा जी के हाथों से तीन जगहों पर कमाल का फूल गिरा.जिसके कारण इन तीन जगहों पर तीन झीलें बन गई. वहीं कहा जाता हैं कि इसी घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ा गया. संसार की भलाई के लिए ब्रह्मा जी ने यज्ञ करने का फैसला किया. ब्रह्मा जी यज्ञ करने के लिए पुष्कर आए परंतु उनकी पत्नी सावित्री जी ठीक समय पर नहीं पहुंच पाई. इस यज्ञ को पूरा करने के लिए उनकी पत्नी का होना जरुरी था. पर सावित्री जी के यज्ञ में नहीं पहुंच पाने के कारण ब्रह्मा जी ने गुर्जर समुदाय की एक कन्या गायत्री के साथ विवाह कर यज्ञ को शुरू किया. जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत तभी उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंच गई और ब्रह्मा जी के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गई. उनहोंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद भी उनकी कभी भी पूजा नहीं होगी. सावित्री का यह रूप को देख सभी देवता डर गए और सावित्री जी से अपना श्राप वापस लेने की विनती करने लगे. लेकिन उन्होंने किसी की न सुनी और जब उनका गुस्सा शांत हुआ तब सावित्री जी ने कहा कि इस धरती पर केवल सिर्फ पुष्कर में ही आपकी पूजा होगी. कहते हैं कि भगवान भगवान विष्णु जी ने भी ब्रह्मा जी की मदद की थी लेकिन देवी सरस्वती ने विष्णु जी को श्राप दे दिया कि उन्हें पत्नी से अलग होने का कष्ट सहना पड़ेगा. इसी कारण भगवान विष्णु ने राम में 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी सीता से अलग रहना पड़ा था. आशा करते है कि यह लेख ब्रह्मा जी का एकमात्र मंदिर कहां है?

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 जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत

भगवान शिव को कालों के काल महाकाल हैं। साक्षात् मृत्यु में भी उनका सामना करने का साहस नहीं है। वे मृत्युंजय हैं, अविनाशी हैं, आदि हैं, अनंत हैं। भगवान शिव इतने भोले हैं कि वे अपने भक्त की पुकार पर दौड़े चले आते हैं। उसे मनचाहा वरदान देते हैं और उसके मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। आज हम आपको लिंगपुराण की एक कथा के बारे में बताते हैं, जिसमें काल को भगवान शिव ने प्राण दान दिया और अपने भक्त के विश्वास को टूटने नहीं दिया।  भगवान शिव के परमभक्त श्वेतमुनि पर्वत पर एकांत में अपने आराध्य का ध्यान करते और उनकी पूजा करते थे। वे कहते थे कि मृत्यु उनका क्या कर सकती है? उन्होंने तो साक्षात् महाकाल की शरण ली हुई है। उनके आश्रम में शांति और आत्मविश्वास की पवित्रता झलकती थी। उनके तप के बल से आश्रम दिव्यमान था। श्वेतमुनि अपने जीवन काल के अंतिम पड़ाव पर थे। वे मृत्यु से निडर होकर रुद्र अध्याय का पाठ कर रहे थे। उनके जीवन ​का अंतिम श्वास चल रहा था। अचानक वे चौंक पड़े, उनके समक्ष एक विकराल आकृति खड़ी थी। पूरा शरीर काला था और उसने काले वस्त्र धारण कर रखे थे। श्वेतमुनि ने अपने आश्रम के शिव लिंग को करुणामय होकर देखा और ओम नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण किया। उन्होंने शिव लिंग को स्पर्श किया और उस विकराल आकृति से पूछा कि तुमने इस पवित्र आश्रम को अपवित्र करने की हिम्मत कैसे की? इस आश्रम को तो भगवान शिव की कृपा से अभय का आशीष प्राप्त है। उन्होंने दोबारा शिव लिंग को स्पर्श किया। विकराल आकृति वाले काल ने अपना परिचय देते हुए ​​कहा कि अब आप पृथ्वी पर नहीं रह सकते हैं। आपको यमलोक चलना है। इस पर श्वेतमुनि ने शिवलिंग को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया और कहा कि तुमने शिव की भक्ति को चुनौती दी है, क्या तुम्हें नहीं पता है कि भगवान शिव तो स्वयं ही काल के भी काल महाकाल हैं। इस पर काल ने कहा कि शिवलिंग शक्तिविहीन है, निश्चेतन है, पत्थर में महादेव की कल्पना एक भूल है। काल ने श्वेतमुनि को पाश में बांध लिया। जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व मुनि ने कहा कि ये तुम्हारी भूल है। महादेव तो कण कण में व्याप्त हैं। विश्वास के साथ उनका आवाहन करने पर वे अपने भक्त की रक्षा करने आते हैं। तभी भगवान शिव माता पार्वती के साथ वहां प्रकट हो गए। उन्होंने काल को चेताते हुए कहा कि ठहरो! श्वेतमुनि का बात सत्य है। उनका प्रकट होना विश्वास के ही अधीन है। भगवान शिव को देखकर काल प्राणहीन समान हो गया। वह शक्तिहीन हो गया। श्वेतमुनि भगवान शिव की स्तुति करने लगे। इस महादेव ने कहा कि आपकी लिंग उपासना धन्य है। विश्वास की विजय होती है। नंदी के निवेदन करने पर महाकाल शिव ने काल को प्राण दान दे दिया और वे वहां से अंतर्धान हो गए।

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जाने रोहिणी व्रत कब है, व्रत कथा, व्रत के नियम और इसका महत्व

जैन समुदाय द्वारा किया जाने वाला रोहिणी व्रत पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध व्रत है। इसे देश के कोने कोने में मनाया जाता है। भगवान वासुपूज्य जी को रोहिणी व्रत समर्पित होता है। इस शुभ अवसर पर रोहिणी देवी के साथ साथ भगवान वासुपूज्य जी की विधिवत पूजा की जाती है। यह व्रत अन्य व्रतों से थोड़ा भिन्न होता है। इस व्रत को क्यों करना चाहिए  रोहिणी व्रत प्रत्येक माह आने वाला व्रत है और कई बार संयोग से एक माह में दो बार किया जाता है। यह व्रत लिंग विशिष्ट नहीं है, इसे कोई भी कर सकता है। महिलाओ द्वारा रोहिणी व्रत अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन को व्रत रखकर इसे त्योहार की भांति मनाया जाता है। प्राचीन काल से इसे त्योहार के रूप में जैन समुदाय द्वारा मनाया जाता आ रहा है।Rohini Vrat 2023   – इस व्रत के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। जिनमें से सबसे लोकप्रिय कथा के बारे में हम आपको आगे बताएंगे। इससे पहले यह जान लेते हैं कि रोहिणी व्रत वर्ष के किस समय किया जाता है। सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा जानिए 2023 में कब है रोहिणी व्रत  दिनांक  वार  पक्ष  तिथि  4 जनवरी 2023 बुधवार शुक्ल पक्ष त्रियोदशी 31 जनवरी 2023 मंगलवार शुक्ल पक्ष दशमी 27 फरवरी 2023 सोमवार शुक्ल पक्ष अष्टमी 27 मार्च  2023 सोमवार शुक्ल पक्ष षष्ठी 23 अप्रैल 2023 रविवार शुक्ल पक्ष तृतीया 21 मई  2023 रविवार शुक्ल पक्ष द्वितीय 17 जून 2023 शनिवार शुक्ल पक्ष चतुर्दशी 14 जुलाई 2023 शुक्रवार शुक्ल पक्ष द्वादशी 10 अगस्त 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष दशमी 7 सितम्बर 2023 गुरुवार कृष्ण पक्ष अष्टमी 4 अक्टूबर 2023 बुधवार कृष्ण पक्ष षष्ठी 31 अक्टूबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष तृतीया 28 नवंबर 2023 मंगलवार कृष्ण पक्ष प्रतिपदा 25 दिसम्बर 2023 सोमवार कृष्ण पक्ष चतुर्दशी रोहिणी व्रत कब होता है धार्मिक मान्ताओं के अनुसार नक्षत्रों की कुल संख्या 27 होती है। इन 27 नक्षत्रों में एक रोहिणी नक्षत्र होता है, जिसका संबंध इस व्रत से है। जब महीने में सूर्योदय के पश्चात रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है, उस समय इस व्रत को किया जाता है। एक वर्ष में कम से कम छह से सात बार यह व्रत आता है, और कई बार यह नक्षत्र माह में दो बार आ जाता है। रोहिणी व्रत के नियम  इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना बहुत आवश्यक होता है। माना जाता है तीन, पांच और सात साल निश्चित रूप से इस व्रत का पालन करना चाहिए। इस व्रत की उचित अवधि पांच वर्ष की मानी जाती है। जिन अनुयायियों द्वारा पांच वर्ष की अवधि तक व्रत का पालन करना संभव नहीं हो पाता। इसके लिए पांच माह का समय भी उत्तम माना गया है। रोहिणी व्रत को कितने समय तक करना इसका निर्णय स्वंय लिया जाता है। इस समय अवधि में व्रत करने का संकल्प लेने के पश्चात, इस व्रत का उद्यापन तभी किया जाता है, जब अवधि पूर्ण होे जाती है। इसलिए दृढ़ निश्चय के बाद ही संकल्प लेना चाहिए। व्रत का उद्यापन हो जाने के बाद गरीबों को भोजन कराना चाहिए और दान करना चाहिए। इसी के साथ साथ पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ वासुपूज्य की पूजा करनी चाहिए। भगवान वासुपूज्य जी के दर्शनों के साथ ही व्रत का उद्यापन उचित माना जाता है। इस दिन भगवान वासुपूज्य की ताम्र, पंचरत्न या स्वर्ण की मूर्ति की स्थापना की जाती है और पूरा दिन भगवान की आराधना करके स्थापित मूर्ति का पूजन किया जाता है। पूजा के पूर्ण हो जाने के बाद नैवेद्य, वस्त्र और पुष्प अर्पित करके फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है। इस व्रत को करते समय मन में ईर्ष्या और द्वेष जैसे भावों को नहीं लाना चाहिए।

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रोहिणी व्रत का महत्व एवं पौराणिक कथा

पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्‍या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ।  एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्‍या उत्पन्‍न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्‍होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्म कार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो।  तब स्वामी ने कहा- सम्‍यकदर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्‍याग करें और श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित 16 प्रहर व्‍यतीत करें अर्थात सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्‍वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई।  इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्‍वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्‍यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्‍वरूप स्वर्गों में उत्‍पन्‍न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख पाने के उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। रोहिणी व्रत महत्व दिगंबर जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। महिलाओं के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। हालांकि इस व्रत को कोई भी कर सकता है। इस व्रत को पुरुष और महिलाएं दोनों कर सकते हैं। यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंधन से छुटकारा दिलाने में सहायक है। इस व्रत में पूरे विधि विधान के सात भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है।  इस दिन जैन धर्म के अनुयायी वासुपूज्य स्वामी की पूजा और उपासना करके व्रत रखते है। इस दिन व्रत रखने से भगवान वासुपूज्य और माता रोहिणी के आशीर्वाद से घर से आर्थिक समस्या दूर होती हैं तथा उस घर में सदैव धन की देवी मां लक्ष्मी का वास होना, माना जाता है और ऋण मुक्त होने और आय बढ़ने का मार्ग मिल जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से पति की आयु लंबी हो जाती है और उनका स्वास्थ भी अच्छा रहता है। इससे ईर्ष्या, द्वेष, जैसे भाव भी दूर हो जाते हैं। घर में सुख, समृद्धि और धन-धान्य की निरंतर बढ़ोतरी होती है। इस व्रत का समापन उद्यापन के बाद ही किया जाता है।

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