घर में है शिवलिंग तो कैसे करें पूजा, जानें सही विधि और नियम

शुद्ध, पवित्र और स्वच्छ मन से पूजा करने पर भगवान शिव भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. लेकिन घर पर शिवलिंग की पूजा करने के कुछ नियम होते हैं, जिनका पालन करना जरूरी होता है. देवों के देव महादेव भगवान शिव को सनातन धर्म में पंचदेवों में एक माना गया है. अपने नाम की तरह ही भोलेबाबा अत्यंत भोले हैं और उनकी पूजा विधि भी बहुत सरल है. भोलेबाबा अपने भक्त द्वारा सच्चे मन से चढ़ाए गए एक लोटा शुद्ध जल और बेलपत्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं. विधि-विधान से करें पूजा यदि आपके पूजाघर में शिवलिंग है तो इस बात का ध्यान रखें कि नियमित रूप से और पूरे विधि-विधान से पूजा करें. यदि किसी कारण आप शिवलिंग की पूजा नहीं कर पा रहे हैं तो शिवलिंग को घर पर स्थापित नहीं करें. क्योंकि शिवलिंग की पूजा न होने पर भोलेनाथ रुष्ट हो जाते हैं. शिवलिंग में न चढ़ाएं ये चीजें शिवजी की पूजा में केतकी के फूल नहीं चढ़ाने चाहिए. इसके साथ ही शिवलिंग पर कभी भी तुलसी दल या तुलसी के पत्ते भी नहीं चढ़ाने चाहिए. शिवलिंग पर हल्दी-कुमकुम चढ़ाना भी वर्जित होता है. घर पर शिवलिंग का आकार  मंदिरों और शिवालयों में विशाल शिवलिंग होते हैं. लेकिन घर पर बहुत बड़े आकार का शिवलिंग स्थापित नहीं करना चाहिए. घर पर नियमित पूजा के लिए शिवलिंग का आकार आपके अंगूठे से बड़ा नहीं होना चाहिए. क्योंकि शिवलिंग संवेदनशील होती है. इसलिए पूजाघर में छोटे आकार का शिवलिंग रखना ही शुभ होता है. शिवलिंग की स्थापना के नियमों को जरूर जान लें 1. घर के मंदिर में शिवलिंग की यदि आप स्थापना करने जा रहे तो याद रखें कि शिवलिंग की लंबाई या  ऊंचाई अंगूठे के ऊपरी पोर से बड़ा न हो। यदि आपने घर में इससे बड़ा शिवलिंग रखा तो आपके लिए ये फलीभूत नहीं होगा। बड़ा शिवलिंग रखने का मतलब है कि शिवजी को आप अपने घर में तांडव करते हुए देखना चाहते हैं। 2. जब भी आप अपने घर में शिवलिंग की स्थापना करें, वह अकेले नहीं होने चाहिए। उनके साथ उनका पूरा परिवार होना चाहिए। शिवलिंग के साथ में माता गौरी और गणेश जी की भी प्रतिमा होनी चाहिए। अकेले शिवलिंग की पूजा आपको वैराग्य की ओर ले जा सकती है। 3. शिवलिंग की स्थापना कभी भी ऐसी जगह नहीं करें जहां कमरा बंद हो। शिवलिंग खुली जगह पर स्थापति होना चाहिए। शिवलिंग किसी कमरे के अंदर स्थापति नहीं करना चाहिए। ये हैं भगवान शिव के 108 नाम, जिनको पढ़ने या सुनने मात्र से होती है शिव कृपा 4. घर में शिवलिंग स्थापित है तो पूजा होनी चाहिए और तांबे के लोटे से जल चढ़ाना भी जरूरी है। शिवलिंग पर हमेशा जलधारा बहती रहनी चाहिए। 5. घर पर अगर शिवलिंग  की स्थापना की गई तो कभी भी घर बंद नहीं होना चाहिए। घर पर कोई न कोई जरूर होना चाहिए जो उनकी पूजा जरूर करें। 6. अगर आप शिव जी को अपने घर में याघर के किसी मंदिर में स्थापित कर रहें है तो साफ सफाई को विशेष ध्यान रहें क्योकि शिव जी को साफ सफाई बहुत पसंद है। 7. शिवलिंग पर कभी तुलसी अपर्ण नहीं करनी चाहिए। तुलसी मां के साथ भगवान शालिग्राम की स्थापना होती है। 8. शिवलिंग की स्थापना कोशिश करें कि घर में स्थापित करने से बचें। इसकी जगह आप शिवजी की तस्वीर घर में रखें।

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शुक्रवार के दिन करें इन मंत्रों का जाप, नहीं होगी धन की कमी

हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन की देवी कहा जाता है। इन्हीं की कृपा से व्यक्ति को जीवन में धन-धान्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि जिन लोगों के ऊपर मां लक्ष्मी की कृपा नहीं रहती है, उनके घर में दरिद्रता का वास होता है। ऐसे घर में हमेशा पैसों की तंगी बनी रहती है। यही वजह है कि लोग नियमित रूप से विधि पूर्वक पूजा पाठ करके मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के प्रयत्न करते हैं। पूजा पाठ ही नहीं बल्कि धर्म ग्रंथों में मंत्रों की शक्ति का बहुत महत्व माना गया है। मान्यता मंत्र के जप से देवी-देवताओं की कृपा बहुत आसानी से पाई जा सकती है। ज्योतिष के अनुसार, यदि आप अपनी राशि के अनुसार मंत्र जाप करते हैं, तो ये और भी ज्यादा शुभ फलदायी रहता है। इसके अलावा मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना चाहिए। इससे आपकी रुपयों पैसों से संबंधित सभी समस्याएं दूर होंगी। तो चलिए जानते हैं मां लक्ष्मी के चमत्कारी मंत्रों के बारे में… शुक्रवार मंत्र के फायदे शुक्रवार के दिन उपर्युक्त मंत्र के साथ अगर मां लक्ष्मी की पूजा की जाए तो मां की कृपा सदैव बनी रहती है। मां लक्ष्मी बहुत जल्दी अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। ऐसे में इन मंत्रों के जाप से जीवन के हर क्षेत्र में आपको सफलता मिलती है। इसके साथ ही मंत्र जाप के प्रभाव से जीवन में खुशहाली, धन और संपत्ति का आगमन होता है। अगर आप मां लक्ष्मी की कृपा जीवन भर चाहते हैं तो हर रोज पूजा अर्चना के बाद इस मंत्र का जप जरूर करें। इससे आपके जीवन में धन की कभी कमी नहीं होती है। मां लक्ष्मी का बीज मंत्र मां लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए उनके बीज मंत्र का जाप कमल गट्टे की माला से करना चाहिए. ऊँ श्रींह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मी नम:।। मां लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। यदि आप कर्ज या धन संबधी समस्याओं से परेशान हैं तो मां लक्ष्मी के इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इस बार भोलेनाथ की उपासना के लिए मिलेंगे सावन के 8 सोमवार, जानिए क्यों बन रहा ये अद्भुत संयोग ऊँ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:। । मनोकामना पूर्ति मंत्र मां लक्ष्मी के इस मंत्र का जाप करने और उन्हें कमल या गुलाबी रंग के फूल अर्पित करने से सभी प्रकार की मनोकामाओं की पूर्ति होती है।  श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा। श्री लक्ष्मी महामंत्र मां लक्ष्मी का ये मंत्र धन, ऐशवर्य, सौभाग्य और यश प्रदान करने वाला होता है। इस मंत्र का शुक्रवार के दिन 108 बार तिल के तेल की दिया जला कर जाप करना चाहिए।  ऊँ श्रीं ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा।।

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 इस बार भोलेनाथ की उपासना के लिए मिलेंगे सावन के 8 सोमवार, जानिए क्यों बन रहा ये अद्भुत संयोग

हिंदू धर्म में भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के लिए सावन के महीने को सबसे उत्तम माना जाता है। इस पूरे माह में शिव जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस बार सावन माह को बेहद खास माना जा रहा है, क्योंकि इस साल सावन एक नहीं बल्कि दो माह का होने वाला है। ऐसा माना जा रहा है कि ये अद्भुद योग करीब 19 साल बाद बन रहा है। दरअसल हिंदी विक्रम संवत 2080 में इस साल एक अधिकमास पड़ रहा है। ऐसे में इस साल 12 महीने की बजाय कुल 13 महीने होंगे। वहीं सावन का महीना 30 नहीं बल्कि करीब 59 दिन का होने वाला है। यानी इस बार भोलेनाथ के भक्तों को उनकी उपासना करने के लिए 4 के बजाय 8 सोमवार मिलेंगे। सावन में भगवान शिव की उपासना से पूरी होती है मनोकामना हिन्दू धर्म में सावन के बड़ा महत्व माना जाता है. हिन्दू पंचांग के अनुसार इस बार एक नहीं दो महीने सावन के होंगे. सावन माह की शुरुआत 4 जुलाई से होगी और 31 अगस्त तक सावन मास रहेगा. इस बार सावन मास में 4 की बजाय 8 सोमवार आयेंगे. श्रद्धालु जो भगवान शिव की अराधना में सावन माह के सोमवार के व्रत रखते, उन्हें 8 सोमवार व्रत रखने होंगे.  देवों के देव महादेव भगवान शिव का पावन महीना सावन 2023 शुरू होने में केवल 2 महीने शेष हैं। इस बार सावन महीना बेहद ही खास होने वाला है। सावन 2023 में 4 सोमवार की जगह 8 सोमवार पड़ेगे। ऐसे में सावन माह का महत्व और भी बढ़ गया है। सावन को श्रावण मास भी कहा जाता है। श्रावण मास 2023 भगवान शिव की स्तुती का विशेष काल होता है। धार्मिक ग्रंथों में सावन के महीने का महत्व बताया गया है। सावन में जो भी भक्त भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करता है, उसकी हर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वहीं, सावन सोमवार के व्रत रखने से भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन आनंदमय हो जाता है। महाभारत में श्रीकृष्ण और अर्जुन के ये संवाद हैं जीवन का असली सूत्र, जरूर जानें साल 2023 में कब-कब है सावन सोमवारी व्रत सावन का पहला सोमवार: 10 जुलाईसावन का दूसरा सोमवार: 17 जुलाईसावन का तीसरा सोमवार: 24 जुलाईसावन का चौथा सोमवार: 31 जुलाईसावन का पांचवा सोमवार: 07 अगस्तसावन का छठा सोमवार:14 अगस्तसावन का सातवां सोमवार: 21 अगस्तसावन का आठवां सोमवार: 28 अगस्त सावन सोमवार का महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सावन माह भगवान शिव की उपासना के लिए विशेष काल माना गया है। सावन का पूरा महीना भोलेनाथ को समर्पित होता है। इस पूरे माह भक्त भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना कर व्रत रखते हैं। सावन महीन में बड़ी तादाद में शिव भक्त शिवालयों में पहुंचते हैं और शिवलिंग पर जल के साथ-साथ बेलपत्र, धतूरा, शमी आदि अर्पित कर महादेव को रिझाते हैं। सावन में ही कांवड़ यात्रा प्रारंभ होती है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त गंगा समेत पवित्र नदियों से जलकर लेकर आते हैं। इससे भगवान शिव प्रसन्न होकर भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। वहीं, सावन सोमवार का व्रत रखने से जीवन में सुख—समृद्धि के साथ सफलता आशीर्वाद मिलता है। अविवाहित कन्याओं के लिए भी सावन का महीना बेहद लाभदायक होता है। सावन सोमवारी का व्रत रखने से कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है।

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महाभारत में श्रीकृष्ण और अर्जुन के ये संवाद हैं जीवन का असली सूत्र, जरूर जानें

महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुछ उपदेश दिए, जिसके बाद अर्जुन ने युद्ध शुरू की और कौरवों को पराजित कर दिया. महाभारत के युद्ध को बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है. महाभारत के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए, उसे जीवन का असली सूत्र माना गया है. गीता में इन्हीं उपदेशों के माध्यम से व्यक्ति जीवन की कठिन से कठिन परिस्थिति का भी हल ढूंढ़ लेता है. श्रीकृष्ण ने ‘समय सबसे बलवान है’, ‘कर्म ही पूजा है’  भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए उपदेश के बारे में, जो जीवन का मूल मंत्र हैं. महाभारत के दौरान अर्जुन विचलित थे और उनसे शस्त्र भी नहीं उठ रहे थे. तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- समय बड़ा बलवान है. यदि तुम सोचते हो कि तुम शस्त्र नहीं उठाओगे तो इन पापियों का संहार नहीं होगा. अरे अर्जुन! तुम तो एक निमित्त हो, इनका संहार लिखा है और वह जरूर होगा. श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद – जो लोग कर्म नहीं करते हैं, झूठे मोह में फंसे रहते हैं, उनका मनुष्य जीवन व्यर्थ रहता है  भगवान श्रीकृष्ण को कौरव और पांडवों के भविष्य के बारे में पता था. वे चाहते थे कि युद्ध ना हो इसलिए, श्रीकृष्ण स्वयं तीन बार शांति दूत बनकर आए और कौरव-पांडवों के बीच सुलह करानी चाही, किन्तु दुर्योधन नहीं माना. तब श्री कृष्ण ने कहा कि तुम पांडवों को आधा राज्य दे दो और दोनों शांति पूर्वक रहो, लेकिन दुर्योधन नहीं माना. तब पांडवों ने कहा कि हमें राज्य की लालसा नहीं है. हमें केवल पांच गांव दिलवा दीजिए और पूरा राज्य चाहे दुर्योधन को दे दीजिए. लेकिन दुर्योधन ने साफ इंकार कर दिया और कहा कि पांच गांव तो क्या वह सुई की नोक जितनी जगह भी नहीं देगा. महाभारत में श्रीकृष्ण ने युद्ध टालने के लिए कई प्रयास किए थे, लेकिन दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की बातें नहीं मानी और वह समय आ गया जब कौरवों-पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। कौरव पक्ष में दुर्योधन की ओर भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महायौद्धा थे। पांडवों के साथ श्रीकृष्ण थे। ये हैं भगवान शिव के 108 नाम, जिनको पढ़ने या सुनने मात्र से होती है शिव कृपा युद्ध की शुरुआत में ही अर्जुन ने युद्ध करने से मना कर दिया था, क्योंकि वह अपने कुटुंब के लोगों पर प्रहार करना नहीं चाहता था। उस समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। श्रीमद् भगवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म का महत्व बताया है। इन बातों का ध्यान रखने पर हमारी भी कई समस्याएं खत्म हो सकती हैं।

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ये हैं भगवान शिव के 108 नाम, जिनको पढ़ने या सुनने मात्र से होती है शिव कृपा

यौगिक परंपरा में, शिव को एक गुरु के रूप में पूजा जाता है, एक देवता के रूप में नहीं। जिसे हम शिव कहते हैं वह बहुआयामी है। वे सभी गुण जो आप कभी भी किसी में बता सकते हैं, शिव में बताए गए हैं। जब हम शिव कहते हैं, तो हम यह नहीं कह रहे हैं कि वे इस तरह के व्यक्ति हैं या उस तरह के व्यक्ति हैं। महा शिवरात्रि पर भगवान शिव के 108 नाम के जाप का महत्व

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Kamika Ekadashi 2023: कामिका एकादशी व्रत आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय

प्रत्येक माह में दो एकादशी व्रत रखे जाते हैं। सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार कामिका एकादशी व्रत 13 जुलाई को है। सावन माह में पड़ने वाली एकादशी तिथि की कई विशेषताएं होती हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ ही तुलसी जी की भी विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु हर मनोकामना पूरी करते हैं। मान्यता है कि कामिका एकादशी का व्रत रखने वाले जातक को जीवन में किए गए समस्त पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही व्यक्ति के जीवन में धन धान्य की कमी नहीं होती है। तो चलिए जानते हैं कामिका एकादशी की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त के बारे में… कामिका एकादशी व्रत कथा एक गांव में एक बहुत ही बलवान क्षत्रिय रहता था। एक दिन उसकी किसी ब्राह्मण से हाथापाई हो गई और ब्राह्मण की मृत्यु हो गई। अपने हाथों से ब्राह्मण की मृत्यु होने के बाद उसकी क्रिया करना का विचार उसके मन में आया। लेकिन, बाकी पंडितों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। साथ ही उसे बताया की तुम पर ब्रह्म हत्या का दोष है। पहले तुम्हें इस पाप से मुक्ति पानी होगी। इसके लिए तुम्हें प्रायश्चित करना होगा। इस पर क्षत्रिय ने पूछा की पाप से मुक्त होने के क्या उपाय हैं। तब ब्राह्मणों ने बताया कि सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को भक्ति भाव से भगवान विष्णु का व्रत और पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराके दक्षिणा के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने से इस पाप से मुक्ति मिल जाएगी। क्षत्रिय ने पंडितों के बताए तरीके से व्रत किया।तब भगवान विष्णु ने उस क्षत्रिय को दर्शन दिए और उससे कहा कि तुम्हें ब्राह्मण हत्या से मुक्ति मिल गई है। अद्भुत पौराणिक कथा : शिव और सती का प्रेम कामिका एकादशी पूजा विधि मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शंख, चक्र, गदा धारण किए हुए भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए। पुराणों के अनुसार, कामिका एकादशी के दिन जो व्यक्ति भगवान के सामने घी अथवा तिल के तेल का दीपक जलाता है तो उनके पितर स्वर्गलोक में अमृत का पान करते हैं। साथ ही इस दिन जो व्यक्ति मंदिर, तुलसी के नीचे, केले के पेड़ के नीचे, पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाता है तो उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

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500 सालों से ज्यादा का इंतजार हुआ खत्म, तैयार है राम मंदिर का भूतल

अयोध्या के राम मंदिर की नई तस्वीर आई है. भव्य मंदिर का भूतल तैयार हो गया, अब दर्शन का इंतजार है. जनवरी से श्रद्धालु रामलला के दर्शन कर पाएंगे. भगवान राम की नगरी अयोध्या हजारों महापुरुषों की कर्मभूमि रही है। यह पवित्र भूमि हिन्दुओं के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां पर भगवान राम का जन्म हुआ था। यह राम जन्मभूमि है। इस राम जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर बना था जिसे तोड़ दिया गया था। आओ जानते हैं कि वह भव्य मंदिर किसने बनाया और कैसा था वह मंदिर। शोधानुसार पता चलता है कि भगवान राम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। चैत्र मास की नवमी को रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। अद्भुत पौराणिक कथा : शिव और सती का प्रेम पुरातात्विक तथ्‍य  अगस्त 2003 में पुरातात्विक विभाग के सर्वे में कहा गया कि जहां बाबरी मस्जिद बनी थी, वहां मंदिर होने के संकेत मिले हैं। भूमि के अंदर दबे खंबे और अन्य अवशेषों पर अंकित चिन्ह और मिली पॉटरी से मंदिर होने के सबूत मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा हर मिनट की वीडियोग्राफी और स्थिर चित्रण किया गया। इस खुदाई में कितनी ही दीवारें, फर्श और बराबर दूरी पर स्थित 50 जगहों से खंभों के आधारों की दो कतारें पाई गई थीं। एक शिव मंदिर भी दिखाई दिया। जीपीआरएस रिपोर्ट और भारतीय सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट अब उच्च न्यायालय के रिकार्ड में दर्ज हैं। 30 सितम्बर, 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ ने विवादित ढांचे के संबंध में ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति एसयू खान ने एकमत से माना कि जहां रामलला विराजमान हैं, वही श्री राम की जन्मभूमि है। कैसी थी अयोध्‍या  अयोध्या पहले कौशल जनपद की राजधानी थी। वाल्मीकि कृत रामायण के बालकाण्ड में उल्लेख मिलता है कि अयोध्या 12 योजन-लम्बी और 3 योजन चौड़ी थी। वाल्‍मीकि रामायण में अयोध्‍या पुरी का वर्णन विस्‍तार से किया गया है। रामायण में अयोध्या नगरी के सरयु तट पर बसे होने और उस नगरी के भव्य एवं समृद्ध होने का उल्लेख मिलता है। वहां चौड़ी सड़के और भव्य महल थे। ब‍गीचे और आम के बाग थे और साथ ही चौराहों पर लगने वाले बड़े बड़े स्तंभ थे। हर व्यक्ति का घर राजमहल जैसा था। यह महापुरी बारह योजन (96 मील) चौड़ी थी। इस नगरी में सुंदर, लंबी और चौड़ी सड़कें थीं। इन्द्र की अमरावती की तरह महाराज दशरथ ने उस पुरी को सजाया था।

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अद्भुत पौराणिक कथा : शिव और सती का प्रेम

इस बात से तो सब वाकिफ ही होंगे कि भगवान शिव का पहला विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री देवी सती से हुआ था। लेकिन क्या किसी को ये बात पता है कि सती का जन्म कैसे हुआ और कैसे उनके मन में भगवान शिव के प्रति इतना प्रेम उत्पन्न हुआ। तो चलिए आज हम आपको सती के अस्तित्व से जुड़ी इस कहानी के बारे में बताते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियां गुणवाण थीं लेकिन फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्ति-संपन्न हो। इसी बात को विचार करने हुए उन्होंने पुत्री के लिए तप करना शुरू कर दिया। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, ‘मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण तप कर रहे हो? दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी और मेरा नाम सती होगा। बुधवार व्रत और कथा कुछ समय बाद भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थी। सती ने बाल्यावस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मयता होती रहती थी। लेकिन जब सती विवाह योग्य हो गई तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती तो आद्या की अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। लेकिन दक्ष को शिव कुछ पसंद नहीं थे। उनका कहना था कि वे हमेशा गले में सांप और शेर की खाल पहने घूमते रहते हैं। लेकिन सती की जिद के कारण उनको मानना पड़ा। अंत में सती का विवाह भोलेनाथ से संपन्न हुआ। शिवजी और सती की कथा, कभी भी बिना बुलाए किसी के घर नहीं जाना चाहिए  इस दिन शिवजी की विशेष पूजा की जाती है। शिवजी से जुड़ी कई ऐसे प्रसंग हैं, जिनमें सुखी जीवन के सूत्र बताए गए हैं। शिवजी और देवी सती से जुड़ी एक कथा प्रचलित है, इस कथा का संदेश यह है कि हमें कभी भी किसी के घर बिना बुलाए नहीं जाना चाहिए। जानिए ये कथा… शिवजी और माता सती से जुड़ी कथा श्रीमद् देवी भागवत, शक्तिपीठांक सहित कई ग्रंथों में बताई गई है। इस कथा के अनुसार देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष थे। सती ने भगवान शिव से विवाह किया था। इस विवाह से दक्ष प्रसन्न नहीं थे। प्रजापित दक्ष ने हरिद्वार में भव्य यज्ञ का आयोजन किया और शिव-सती को छोड़कर सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया। सती को ये बात नारद से मालूम हुई तो वह यज्ञ में जाने के लिए तैयार हो गईं। शिवजी ने माता सती को समझाया कि बिना बुलाए यज्ञ में जाना ठीक नहीं है, लेकिन सती नहीं मानीं। शिवजी के मना करने के बाद भी सती अपने पिता के घर यज्ञ में चली गईं। जब सती यज्ञ स्थल पर पहुंची तो उन्हें मालूम हुआ कि यज्ञ में शिवजी के अतिरिक्त सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया है। ये देखकर सती ने पिता दक्ष से शिवजी को न बुलाने का कारण पूछा। जवाब में दक्ष ने शिवजी का अपमान किया। अपने पति का अपमान देवी सती से सहन नहीं हुआ और उन्होंने हवन कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। जब ये बात शिवजी को मालूम हुई तो वे बहुत क्रोधित हो गए और शिवजी के कहने पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया। जीवन प्रबंधन इस कथा से ये सीख मिलती है कि कभी भी बिना बुलाए किसी के घर या किसी कार्यक्रम में जाना ठीक नहीं है। अगर जीवन साथी सही बात कहे तो उसे तुरंत मान लेना चाहिए, उसका अनादर नहीं करना चाहिए। पुत्री या किसी अन्य स्त्री के सामने उसके पति की बुराई या अपमान नहीं करना चाहिए। देवी सती के शरीर के अंगों से हुई थी 51 शक्ति पीठों की स्थापना, इनके बारे में जानें देवी के 51 शक्ति पीठ बनने के पीछे की जो पौराणिक कथा है उसके अनुसार भगवान शिव की पहली पत्नी सती के पिता दक्ष प्रजापति ने कनखल जिसको वर्तमान में हरिद्वार के नाम से जाना जाता है में ‘बृहस्पति सर्व’ नाम का एक महा यज्ञ किया था. उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया था लेकिन भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था. लेकिन इसके बावजूद भगवान शिव की पत्नी जो कि दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं वह बिना आमंत्रित किये और अपने पति के रोकने के बावजूद उस यज्ञ में शामिल हो गयीं. उस समय यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता से भगवान शिव को आमंत्रित न करने की वजह पूछी और अपनी नाराज़गी प्रकट की. इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव को अपशब्द कहे. जिसके अपमान से पीड़ित होकर सती ने यज्ञ के अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी. भगवान शिव को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध की वजह से उनका तीसरा नेत्र खुल गया और वे क्रोध की वजह से तांडव करने लगे. इसके पश्चात भगवन शिव ने यज्ञ-स्थल पर पहुंच कर यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाला और कंधे पर उठा लिया और दुखी मन से वापस कैलाश पर्वत की ओर  जाने लगे. इस दौरान देवी सती के शरीर के अंग जिन जगहों पर गिरे वह स्थान शक्ति पीठ कहलाये. जो कि वर्तमान समय में भी उन जगहों पर स्थित हैं और आज भी पूजे जाते हैं.

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बुधवार व्रत और कथा

बुधवार व्रत, यह व्रत हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखता है। बुधवार का व्रत बुधदेवता की कृपा व आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने घर में शांति तथा सर्व सुखों की इच्छा रखता है तो उसके बुधवार का व्रत करना चाहिए। बुधवार के व्रत में दिन व रात में एक ही बार भोजन करना चाहिए। इस व्रत के दौरान हरी वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए – जैसे भोजन में हरी सब्जी, हरे रंग के वस्त्र इत्यादि। पूरे दिन का उपवास करने के बाद अंत में भगवान शिव की पूजा, धूप, बेल-पत्र आदि के साथ करनी चाहिए और बुधवार व्रत कथा सुनकर और बुधदेव की आरती के बाद प्रसारद ग्रहण करना चाहिए। प्रासरद में गुड़, भात और दही होना चाहिए और इस दिन भगवान को सफेद फूल चढ़ाने चाहिए। गणेश जी का दिन बुधवार को भगवान गणेश की पूजा का भी विधान है अतः बुधवार का दिन को भगवान गणेश का दिन भी माना जाता है। यदि की व्यक्ति की कुंडली में बुध ग्रह कमजोर होता है तो उसे बुधवार के भगवान गणेश की पूजा व व्रत करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है बुधवार के दिन कोई भी शुभ कार्य आरम्भ करना चाहिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान गणेश का जन्म हुआ था तो उस समय बुध देवता कैलाश में उपस्थित थे। बुध देव की उपस्थिति के कारण श्रीगणेश जी की आराधना के लिए वह प्रतिनिधि वार हुए यानी बुधवार के दिन गणेश जी पूजा का विधान बन गया। बुधवार व्रत कथा समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत धनवान था। मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की सुंदर लड़की संगीता से हुआ था। एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया। मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा। माता-पिता बोले- ‘बेटा, आज बुधवार है। बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते।’ लेकिन मधुसूदन नहीं माना। उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को न मानने की बात कही।दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की। दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया। वहां से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की। रास्ते में संगीता को प्यास लगी। मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया। थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था। संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई। वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई।मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा ‘तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?’ मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूं। लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?’ सपने में भगवान शिव का आना, देता है ये खास संकेत मधुसूदन ने कहा ‘तुम जरूर कोई चोर या ठग हो। यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था।’ इस पर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो।संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था। मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है। अब तुम चुपचाप यहां से चलते बनो। नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा।’ दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे। उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहां एकत्र हो गए। नगर के कुछ सिपाही भी वहां आ गए। सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए। सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया। संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी।राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा। राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा। तभी आकाशवाणी हुई- ‘मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया। यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।’ मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि ‘हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई। भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा।’मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया। तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया। राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए। भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया। कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई। बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था। दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए। मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे। इस तरह भगवान बुधदेव की कृपा से उनके यहां खुशियां बरसने लगीं। इस तरह जो स्त्री-पुरुष विधिवत बुधवार का व्रत करके व्रतकथा सुनते हैं, भगवान बुधदेव उनके सभी कष्ट दूर करते है।

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जानें, कैसे हुआ रुद्रावतार हनुमान जी का जन्म और कौन हैं इनके माता-पिता

हनुमान जी के जन्म को लेकर कई किदवंती है। इनमें एक कथा बेहद लोकप्रिय है। एक बार की बात है जब स्वर्ग में दुर्वासा द्वारा आयोजित सभा में स्वर्ग के राजा इंद्र भी उपस्थित थे। उस समय पुंजिकस्थली नामक अप्सरा ने देवगणों का ध्यान भटकाने की कोशिश की।मंगलवार का दिन भगवान रूद्र के 11वें अवतार हनुमान जी को समर्पित है। इस दिन संकट हरने वाले भगवान बजरंगबली की पूजा-उपासना की जाती है। इन्हें बल, बुद्धि और विद्या का दाता भी कहा जाता है। हनुमान चालीसा में हनुमान जी का विस्तार से वर्णन किया गया है। साथ ही कई शास्त्रों, पुराणों एवं वेदों में भी हनुमान जी की महिमा का बखान है। इन्हें कई नामों से जाना जाता है। इनके प्रिय नाम हनुमान जी, बजरंगबली, पवनसुत, मारुतनंदन हैं। धार्मिक मान्यता है कि बजरंगबली अजर-अमर हैं। उन्हें अमरता का वरदान मिला है। उनकी गिनती आठ अजर-अमरों में होती है। आइए, रुद्रावतार हनुमान जी की जन्म कथा जानते हैं क्या है कथा सनातन शास्त्रों में हनुमान जी के जन्म को लेकर कई किदवंती है। इनमें एक कथा बेहद लोकप्रिय है। एक बार की बात है जब स्वर्ग में दुर्वासा द्वारा आयोजित सभा में स्वर्ग के राजा इंद्र भी उपस्थित थे। उस समय पुंजिकस्थली नामक अप्सरा ने बिना किसी प्रयोजन के सभा में दखल देकर उपस्थित देवगणों का ध्यान भटकाने की कोशिश की। इससे क्रुद्ध होकर ऋषि दुर्वासा ने पुंजिकस्थली को बंदरिया बनने का श्राप दे दिया। यह सुन पुंजिकस्थली रोने लगी। तब ऋषि दुर्वासा ने कहा कि अगले जन्म में तुम्हारी शादी बंदरों के देवता से होगी। साथ ही पुत्र भी बंदर प्राप्त होगा। अगले जन्म में माता अंजनी की शादी बंदर भगवान केसरी से हुई। कालांतर में माता अंजनी के घर हनुमान जी का जन्म हुआ। एक अन्य किदवंती है कि राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ से प्राप्त हवि को खाकर राजा दशरथ की पत्नियां गर्भवती हुई। इस हवि के कुछ अंश को एक गरुड़ लेकर उड़ गया और उस जगह पर गिरा दिया। जहां माता अंजना पुत्र प्राप्ति के लिए तप कर रही थी। माता अंजनी ने हवि को स्वीकार कर ग्रहण किया। इस हवि से माता अंजनी गर्भवती हो गई। कालांतर में माता अंजनी के गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जन्म की कहानी  सूर्य के वर से सुवर्ण के बने हुए सुमेरु में केसरी का राज्य था। उसकी अति सुंदरी अंजना नामक स्त्री थी। एक बार अंजना ने शुचिस्नान करके सुंदर वस्त्राभूषण धारण किए। उस समय पवन देव ने उसके कर्णरन्ध्र में प्रवेश कर आते समय आश्वासन दिया कि तेरे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा और ऐसा ही हुआ भी।कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा में अंजना के उदर से हनुमानजी उत्पन्न हए। दो प्रहर बाद सूर्योदय होते ही उन्हें भूख लगी। माता फल लाने गई। इधर लाल वर्ण के सूर्य को फल मान कर हनुमान जी उसको लेने के लिए आकाश में उछल गए। उस दिन अमावस्या होने से सूर्य को ग्रसने के लिए राहु आया था, किंतु हनुमानजी को दूसरा राहु मान कर वह भाग गया। तब इंद्र ने हनुमानजी पर वज्र-प्रहार किया। उससे इनकी ठोड़ी टेढ़ी हो गई, जिससे ये हनुमान कहलाए।  सपने में भगवान शिव का आना, देता है ये खास संकेत इंद्र की इस दृष्टता का दंड देने के लिए पवन देव ने प्राणि मात्र का वायु संचार रोक दिया। तब ब्रह्मादि सभी देवों ने हनुमान को वर दिए।  ब्रह्माजी ने अमितायु का, इंद्र ने वज्र से हत न होने का, सूर्य ने अपने शतांश तेज से युक्त और संपूर्ण शास्त्रों के विशेषज्ञ होने का, वरुण ने पाश और जल से अभय रहने का, यम ने यमदंड से अवध्य और पाश से नाश न होने का, कुबेर ने शत्रुमर्दिनी गदा से निःशंख रहने का, शंकर ने प्रमत्त और अजेय योद्धाओं से जय प्राप्त करने का और विश्वकर्मा ने मय के बनाए हुए सभी प्रकार के दुर्बोध्य और असह्य, अस्त्र, शस्त्र तथा यंत्रादि से कुछ भी क्षति न होने का वर दिया। इस प्रकार के वरों के प्रभाव से आगे जाकर हनुमानजी ने अमित पराक्रम के जो काम किए, वे सब हनुमानजी के भक्तों में प्रसिद्ध हैं और जो अश्रुत या अज्ञात हैं, वे अनेक प्रकार की रामायणों, पद्म, स्कन्द और वायु आदि पुराणों एवं उपासना-विषय के अगणित ग्रंथों से ज्ञात हो सकते हैं।

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 भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिया गया वह ज्ञान जिससे आप भी बन सकते हैं सफल

भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के रणभूमि में अर्जुन के मन में धर्म और युद्ध के बीच चल रहे ध्वन्ध को गीता के उपदेश के माध्यम से समझाया था। उन्हीं उपदेशों को समझने से वर्तमान के समय में भी व्यक्ति सफलता हासिल कर सकता है। श्री कृष्ण का जीवन ऐसी ही बातों से भरा पड़ा है, ज़रूरत है नज़रिए की। उनका जीवन आपके लिए माइथोलॉजी का एक हिस्सा मात्र भी हो सकता है और आपका पूरा जीवन बदलकर रख देने वाला ज्ञान भी। यह हमें तय करना है कि हम उनके जीवन से लेना क्या चाहते हैं। श्री कृष्ण मात्र कथाओं में पढ़े या सुने जाने वाले पात्र नहीं, वह चरित्र और व्यवहार में उतारे जाने वाले देव हैं। वह हमें सीख देते हैं कि, सिर्फ मुर्दों को आराम है, ज़िंदगी संघर्ष का दूसरा नाम है कभी अगर आपको जीवन की स्थितियों पर रोना आए, तो एक बार श्री कृष्ण की जीवनी पर नज़र ज़रूर डाल लें। रोना बंद कर देंगे आप। श्री कृष्ण ने एक जेल में जन्म लिया था और जन्म लेने के तुरंत बाद ही उन्हें रात में ही उफनती यमुना पार कर गोकुल ले जाया गया। तीसरे दिन ही राक्षसनी पूतना उन्हें मारने आ पहुंची और यहां से जो संघर्ष का सिलसिला शुरू हुआ, वह देह त्यागने तक बना रहा। शिक्षा वही जो अज्ञान घटाए, कौशल बढ़ाए श्री कृष्ण ने अपनी शिक्षा मध्य प्रदेश के उज्जैन में सांदीपनि ऋषि के आश्रम में रहकर पूरी की थी। कहा जाता है कि 64 दिन में उन्होंने 64 कलाओं का ज्ञान हासिल कर लिया था। वैदिक ज्ञान के अलावा उन्होंने कलाएं सीखीं। शिक्षा ऐसी ही होनी चाहिए, जो हमारे व्यक्तित्व का रचनात्मक विकास करे। संगीत, नृत्य, युद्ध सहित 64 कलाएं कृष्ण के व्यक्तित्व का हिस्सा बनीं। अगर आप विद्यार्थी हैं, तो ख़ुद को सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित ना रखें। अपने कौशल पर ध्यान दें। हरफनमौला बनें। अगर आपके बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं, तो उन्हें अपने व्यक्तित्व को कौशल-समृद्ध करने को प्रोत्साहित करें। उनमें कोरा ज्ञान ना भरें। उनकी पढ़ाई ऐसी हो कि उनकी रचनात्मकता को नए आयाम मिलें। गीता के इन उपदेश से जानें सफलता का रहस्य  कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।। भगवद गीता के अनुसार केवल कर्म पर ही व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन उसका फल कैसा होगा यह कोई नहीं जानता है। इसलिए फल की चिंता किए बिना कर्म करते रहना ही समझदारी का काम है और इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उससे अधिक लगाव न हो। महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता से स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण ही पूर्ण सर्वोपरि सनातन ब्रह्मा हैं. लेकिन परमात्मा गुप्त रहते हैं और इस कारण मानव स्वयं को कर्ता मान बैठते हैं.

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सपने में सांप का दिखना होता है शुभ या अशुभ, जानें 

अकसर लोगों को सपने में जो चीजें दिखाई देती हैं, वे सुबह तक या तो उन्हें याद नहीं रहती या फिर कुछ धुंधला याद रहता है. अकसर लोगों को सपने में जो चीजें दिखाई देती हैं, वे सुबह तक या तो उन्हें याद नहीं रहती या फिर कुछ धुंधला याद रहता है. लेकिन कई बार सपने में कुछ ऐसा देख लेते हैं, जिन्हें देखते ही या तो डर के आंख खुल जाती है. या फिर सुबह आंख खुलते ही सपना आंखों के आगे घूमने लगता है और मन में ये ही ख्याल आता है कि क्या सपने में ये सब दिखना शुभ है या अशुभ. कई बार सपनों में लोगों को सांप दिखाई देता है. स्वप्नशास्त्र के अनुसार सांप का सपनों में दिखने का मतलब अच्छा भी हो सकता है या बुरा भी.  – अगर सपने में बहुत सारे सांप दिखाई देते हैं, तो सपने का मतलब अशुभ होता है. ऐसे में इस तरह का सपना देखना भविष्य में परेशानियां आने का संकेत देता है. वहीं, अगर आपको सपने में सांप दिखाई दे रहा है, और वे आपका पीछा कर रहा है और आप घबराए हुए हैं, तो इसका मतलब है कि आप किसी चीज को लेकर डरे हुए हैं. सपने में इस तरह का सपना देखना भी अशुभ ही माना जाता है.  सपने में दिख रहे हैं सांप तो हो जाए सतर्क,  हर सपने का अपना एक अलग मतलब होता है। स्वप्न शास्त्र नाम की किताब में हर सपने का अर्थ बताया गया है। आप में से कई लोगों को सांप से जुड़े सपने दिखाई देते होंगे। कई बार आप सांप को खुद के पीछे भागते हुए देखते होंगे तो कई बार सांप आपको काट रहा है ऐसा प्रतीत होता होगा। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, अगर किसी की कुंडली में काल सर्प दोष होता है और उसपर राहु केतु की दशा चल रही हो तो ऐसे समय में सांप के अधिक सपने आते हैं। वहीं, स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सांप से जुड़े कई सपने शुभ और कुछ अशुभ संकेत भी देते हैं। तोD आइए जानते हैं सपने में अलग अलग रूप में सांप देखने का क्या है मतलब। सपने में सांप मारना अगर आपको सपने में सांप दिखाई देता है और आप उस सपने को मार देते हैं तो स्वप्न शास्त्र के अनुसार, इस तरह के सपना शुभ संकेत देने वाला होता है। इस तरह के सपने आने का मतलब होता है कि आप जल्द ही अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले हैं।

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