सपने में भगवान शिव का आना, देता है ये खास संकेत

नींद में आने वाले सपने आपके अच्छे और बुरे भविष्य की ओर इशारा करते हैं। सपनों में मिले इन संकेतों से आप जीवन में होने वाली घटनाओं के बारे में जान सकते हैं। आज यहां हम जानेंगे कि अगर आपको सपने में भगवान शिव जी दिखाई देते हैं तो उन सपनों का क्या अर्थ होता है। सपने में शिवलिंग देखना अगर आप सपने में शिवलिंग देखते हैं तो ये आपके लिए शुभ संकेत है। इस सपने का अर्थ है कि आप पिछले जन्म में भगवान शिव के भक्त थे। अब आपकी सभी समस्याओं के खत्म होने का वक्त आ गया है। आपको जल्द ही तरक्की होने वाली है और यश मिलने वाला है। सपने में त्रिशूल दिखनासपने में त्रिशूल का दिखना भी शुभ संकेत हैं। इसका मतलब है कि सभी कष्ट दूर होने वाले हैं।  सपने में शिवजी का उग्र रूप यदि सपने में भगवान शिव उग्र रूप में तांडव करते हुए नजर आते हैं तो आपको सतर्क रहने की जरूरत है। यह अशुभ संकेत देता है। शिव जी का रौद्र रूप उनके क्रोध को दर्शाता है। सपने में भगवान शिव का आना नींद में सपना आना कोई नई बात नहीं है, लेकिन क्या आपको पता है कि ये सपने आने वाले भविष्य की ओर भी इशारा करते हैं। स्वप्नों में मिलने वाले इन्हीं संकेतों को समझाने के लिए जहां कुछ लोग स्वप्न शास्त्र की मदद लेते हैं, वहीं कुछ लोग इस संबंध में या तो जानकारों से मदद लेते है या कुछ लोग इसकी जानकारी के अभाव में कुछ समझ ही नहीं पाते। शिवजी को क्यों प्रिय है सावन का महीना, जानिए 5 रहस्य

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सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा, मिलेगी श‍िव-पार्वती की कृपा – KARMASU

सोमवार का दिन शंकर भगवान को समर्पित होता है. आज के दिन भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. कुछ लोग आज के दिन व्रत भी रखते ॐ जय शिव ओंकारा… आरती जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा ।ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥ॐ जय शिव ओंकारा हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है. माना जाता है सोमवार के दिन भगवान शिव की आराधना करने से मन चाहा फल मिलता है. सोमवार का व्रत दिन के तीसरे पहर तक होता है. इस व्रत मे फलाहार का कोई खास नियम नहीं है. इस व्रत में रात मे केवल एक बार भोजन किया जाता है. व्रत में शिव, पार्वती की पूजा करते हैं. सोमवार के व्रत में पूजा के बाद कथा सुननी चाहिए. सोमवार भगवान शिव व्रत कथा एक बार की बात है एक शहर में एक साहूकार रहता था। उनके घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी, जिससे वे बहुत दुखी रहते थे। पुत्र प्राप्ति के लिए वे प्रत्येक सोमवार का व्रत रखते थे और शिव मंदिर में जाकर पूरी श्रद्धा से भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करते थे। उनकी भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती प्रसन्न हुई और उन्होंने भगवान शिव से उस साहूकार की इच्छा पूरी करने का अनुरोध किया। पार्वती की इच्छा सुनकर, भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस दुनिया में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और उसके भाग्य में जो कुछ भी है उसे भुगतना पड़ता है।’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का सम्मान करने के लिए उसकी इच्छाओं को पूरा करने की इच्छा व्यक्त की। माता पार्वती के अनुरोध पर शिव ने साहूकार को पुत्र प्राप्त करने का वरदान दिया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बच्चे की उम्र केवल बारह वर्ष होगी। साहूकार माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत सुन रहा था। वह इससे न तो खुश था और न ही दुखी। वह पहले की तरह शिव की पूजा करता रहा। कुछ समय बाद साहूकार के एक पुत्र का जन्म हुआ। जब बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया। साहूकार ने बेटे के मामा को बुलाकर ढेर सारा पैसा दिया और कहा कि वह इस बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी ले जाए और रास्ते में यज्ञ करे। जहां कहीं भी यज्ञ किया जाता है, वहां ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दी जाती है। इसी प्रकार दोनों चाचा-भतीजे यज्ञ करके और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर काशी की ओर चले गए। रात के समय एक नगर था जहाँ नगर के राजा की पुत्री का विवाह हुआ था। लेकिन जिस राजकुमार से वह शादी करने वाली थी, वह अंधी थी। राजकुमार ने इस तथ्य को छिपाने की एक योजना के बारे में सोचा कि उसके बेटे की एक आंख नहीं है। सोमवार को करें शिव मंत्र का जाप, पूरी होगी मनोकामना साहूकार के बेटे को देखकर उसके मन में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बना कर राजकुमारी से शादी करा दी जाए। शादी के बाद, मैं इसे पैसे के साथ भेज दूंगा और राजकुमारी को अपने शहर ले जाऊंगा। लड़के की शादी दूल्हे के कपड़े पहन कर राजकुमारी से कर दी गई। लेकिन साहूकार का बेटा ईमानदार था। उसे यह उचित नहीं लगा। मौका पाकर उसने राजकुमारी की चुन्नी के किनारे पर लिखा कि ‘तुम्हारी शादी तो मुझसे हो गई है, लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जाएगा, वह आंख का कान है। मैं काशी पढ़ने जा रहा हूँ। जब शिव मृत बालक के पास गए तो उन्होंने कहा कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। अब इसकी उम्र हो गई है। लेकिन माता पार्वती ने कहा, हे महादेव, कृपया इस बच्चे को और उम्र दें, नहीं तो इसके माता-पिता भी इसके अलग होने के कारण तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। माता पार्वती के अनुरोध पर भगवान शिव ने बालक को जीवित रहने का वरदान दिया। शिव की कृपा से बालक जीवित हो गया। लड़का अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने मामा के साथ अपने शहर चला गया। दोनों उसी शहर पहुंचे जहां उनकी शादी हुई थी। उस नगर में यज्ञ का भी आयोजन किया। लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी देखभाल की और अपनी बेटी को विदा किया। यहां साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे अपने बेटे का इंतजार कर रहे थे। उसने कसम खाई थी कि अगर उसे अपने बेटे की मौत की खबर मिली तो वह भी अपनी जान दे देगा, लेकिन अपने बेटे के जीवित रहने की खबर पाकर वह बहुत खुश हुआ। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के सपने में आकर कहा – हे श्रेष्ठी, मैंने सोमवार का व्रत करके और व्रत कथा सुनकर प्रसन्न होकर आपके पुत्र को लंबी आयु दी है। इसी प्रकार जो कोई भी सोमवार का व्रत रखता है या कथा को सुन और पढ़ता है, उसके सभी दुख दूर हो जाते हैं और उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सोमवार को जरूर करें ये महाउपाय, आत्मविश्वास में होगी वृद्धि और दूर होगी धन से जुड़ी समस्या  मान्यताओं के अनुसार जो भक्त सच्चे मन से सोमवार के दिन व्रत करता है और भगवान भोलेनाथ की विधिवत पूजा अर्चना करता है उस पर शिव शम्भू के साथ मां पार्वती भी प्रसन्न होती हैं। हिंदू धर्म में देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने के लिए सोमवार का दिन सबसे उत्तम माना जाता है। इस दिन शिव जी के भक्त व्रत रखते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भक्त सच्चे मन से सोमवार के दिन व्रत करता है और भगवान भोलेनाथ की विधिवत पूजा अर्चना करता है उस पर शिव शम्भू के साथ मां पार्वती भी प्रसन्न होती हैं। इसके अलावा अविवाहित लड़कियां यदि सोमवार का व्रत करती हैं, तो उन्हें योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। वहीं ज्योतिष शास्त्र में महादेव को प्रसन्न करने के लिए सोमवार के कुछ उपाय बताए गए हैं, जिन्हें करने से

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सोमवार के व्रत में जरूर सुनें ये कथा, मिलेगी श‍िव-पार्वती की कृपा

सोमवार का दिन शंकर भगवान को समर्पित होता है. आज के दिन भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. कुछ लोग आज के दिन व्रत भी रखते हैं ताकि शिव की विशेष कृपा प्राप्त की जा सके. बाबा भोलेनाथ के आशिर्वाद के लिए आप भी सोमवार का व्रत कर रहे हैं, तो शिव व्रत कथा को पढ़कर या सुनकर इस उपवास को पूरा करें (सोमवार व्रत कथा) पौराणिक कथा के अनुसार, किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसका घर धन-धान्य से भरा हुआ था। लेकिन वह निःसंतान था। जिसके कारण वह बहुत दुखी रहता था। संतान प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार के दिन व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव संग माता पार्वती की पूजा करता था। उसकी भक्ति देख मां पार्वती प्रसन्न हो गईं। फिर भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूरी करने का निवेदन किया। माता पार्वती की इच्छा सुनकर शिवजी ने कहा ‘हे पार्वती! इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है। जिसके भाग्य में जो होता है उसे भोगना ही पड़ता है।’ पर फिर भी पार्वती जी अपनी बातों पर अड़ी रही और साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई। महाश‍िवरात्रि पर जानें श‍िव-पार्वती के अप्रत‍िम प्रेम और व‍िवाह की यह रोचक कथा माता पार्वती के अनुरोध पर भगवान ने साहूकार को संतान-प्राप्ति का वरदान तो दिया। लेकिन उस बालक की आयु कम यानी केवल बारह वर्ष होगी कहकर चले गए। ये सारी बात उधर साहूकार सुन रहा था। वह न तो खुश था और न ही दुखी। वह पहले की तरह ही शिवजी की विधिवत पूजा करता रहा। कुछ समय के बाद साहूकार के पुत्र का जन्म हुआ। जब वह बालक 11वर्ष का हुआ तो साहूकार ने उसे उसके मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेज दिया। उसके साथ पिता ने बहुत सारा धन दिया और काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाने की आज्ञा दी। साथ ही जाते जाते मार्ग में यज्ञ कराने का भी उपदेश दिया। इसके अलावा जहां भी यज्ञ हो वहां ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा जरूर देने का सलाह देते हुए जाने को कह दिया। इस तरह दोनों मामा-भांजे साहूकार की आज्ञा का पालन करते हुए चल पड़े। रात में एक नगर में विश्राम करने के लिए रुके। उस नगर में एक राजकुमारी का विवाह था। लेकिन जिस राजकुमार से विवाह होने जा रहा था वह वास्तव में एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता इस बात को छिपाने के लिए एक चाल सोची। कपटी राजा ने साहूकार के पुत्र को देखकर राजकुमारी से विवाह कराने और विवाह के बाद धन का लालच देकर इसे विदा करने का निर्णय लिया। इसी तरह लड़के को जबरदस्ती दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया। लेकिन साहूकार के पुत्र को यह बात न्यायसंगत नहीं लगी। उसने मौका मिलते ही राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर अपनी बात लिख दी कि ‘तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुम्हें विदा किया जाएगा वह असल में एक आंख से काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा था।’ जैसे ही राजकुमारी की नजर चुन्नी पर पड़ी तो वह अपने माता-पिता को यह बात बताई। राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया और बारात वापस लौटा दी। दूसरी ओर, मामा-भांजा काशी पहुंचे। वहां जाकर उन्होंने यज्ञ कराया। जिस दिन लड़के की आयु 12 साल होने वाली थी, उसी दिन यज्ञ रखवाया गया था। लड़के तबीयत कुछ खराब होने लगती है। तब उसके मामा ने कहा कि तुम कमरे के अंदर आराम कर लो। कुछ ही देर में उस बालक की मृत्यु हो गई। मृत भांजे की हालत देख मामा ने विलाप शुरू कर दिया। संयोगवश उसी समय माता पार्वती और शिव जी गुजर रहे थे। पार्वती ने एक बार फिर भगवान से कहा- हे स्वामी! मैं इसके रोने का स्वर सहन नहीं कर पा रही हूं। कृपा कर के आप इस व्यक्ति के कष्ट को दूर करें। शिवजी उस मृत बालक को देखकर बोले यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था और अब इसकी 12 वर्ष पूरी हो चुकी है। लेकिन माता पार्वती इस बात से काफी दुखी थी। उन्होंने महादेव से आग्रह किया और बोलीं, हे महादेव! आप इस बालक की आयु देने की कृपा करें। इस पर भगवान शिव ने उस लड़के को पुनः जीवित होने का वरदान दे दिया। लड़के का प्राण उसके शरीर में वापस आ गया। फिर शिक्षा पूरी करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर वापस चल पड़ा। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां लड़के का विवाह एक राजकुमारी से हुआ था। नगर के राजा ने उस लड़के को पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की। फिर खूब सारा धन और आशीर्वाद देकर अपनी पुत्री को विदा किया। इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने अपने बेटे की मृत्यु के समाचार पर प्राण त्याग देने का प्रण कर रखा था। लेकिन बेटे कोणाही सलामत और जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए। उसी रात भगवान शिव साहूकार के सपने में आए और बोले – हे मनुष्य! मैंने तुम्हारे सोमवार व्रत रखने, इसे विधिवत पूरा करने और व्रत कथा को सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है। उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई. माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात

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महाश‍िवरात्रि पर जानें श‍िव-पार्वती के अप्रत‍िम प्रेम और व‍िवाह की यह रोचक कथा

माता पार्वती और महादेव का अप्रत‍िम प्रेम माता पार्वती और महादेव के अप्रत‍िम प्रेम से पूरा संसार वाक‍िफ है। कहते हैं क‍ि उनके आगे प्रेम की पराकाष्‍ठा भी छोटी महसूस होने लगती है। कई ऐसे पौराण‍िक क‍िस्‍से भी सुनने को म‍िलते हैं जहां देवी-देवताओं ने स्‍वयं भोलेनाथ के प्रेम को असीम और अनन्‍य बताया है। शायद यही वजह है क‍ि महादेव ने मां पार्वती को अपने आधे अंग पर स्‍थान द‍िया और स्‍वयं अर्धनारीश्‍वर कहलाए। तो आइए आज महा श‍िव रात्रि के पव‍ित्र मौके पर आपको बताते हैं मां पार्वती और महादेव के प्रेम और उनके व‍िवाह की रोचक कथा सोमवार को करें शिव मंत्र का जाप, पूरी होगी मनोकामना महादेव को पाने के ल‍िए मां का कठोर संकल्‍प माता पार्वती भगवान शिव को मन ही मन अपना पति मान चुकी थीं। वह दृढ़ संकल्पित थीं कि विवाह करेंगी तो भोलेनाथ के साथ ही करेंगी। उधर देवता भी यही चाहते थे। देवताओं ने माता पार्वती के विवाह का प्रस्‍ताव कन्‍दर्प से भगवान शिव के पास भेजा। जिसे भोलेनाथ ने ठुकरा दिया और उसे अपने तीसरे नेत्र से भस्‍म भी कर दिया। लेकिन माता इससे भी विचलित नहीं हुईं और कठोर तपस्‍या शुरू कर दी। तब रीझ गए भोलेबाबा माता पार्वती पर देवी पार्वती की तपस्‍या से तीनों लोक में हाहाकार मच गया। बडे़-बड़े पहाड़ डगमगाने लगे। देवता भी मदद के लिए भगवान शिव के पास पहुंचे। भोले बाबा भी पार्वती के तप से प्रसन्‍न हुए और उन्‍हें दर्शन देकर कहा कि वह किसी राजकुमार से विवाह कर लें। उन्‍होंने कहा कि उनके साथ रहना आसान नहीं होगा। लेकिन माता पार्वती ने कहा कि वह उन्‍हें ही अपना पति मान चुकी हैं। अब उनके सिवा किसी और से विवाह नहीं करेंगी। पार्वती के इस असीम प्रेम को देखकर भोलेनाथ विवाह के लिए मान गए। जब अनोखी बारात लेकर श‍िव चले ब्‍याहने पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव जब माता पार्वती को ब्‍याहने पहुंचे तो उनके साथ संपूर्ण जगत के भूत-प्रेत थे। इसके अलावा डाकिनियां, शाकिनियां और चुड़ैलें भी शिव जी की बारात में शामिल थीं। उन्‍होंने ने ही भोलेनाथ का भस्‍म से श्रृंगार किया। हड्डियों की माला पहनाई। इस अनोखी बारात को देखकर तो रानी मैना देवी यानी कि माता पार्वती की मां हैरान रह गईं। उन्‍होंने अपनी बेटी का विवाह करने से इंकार कर दिया। प्रेम की प्राप्ति के ल‍िए जब मां को मनाया शिव के इस रूप को देखकर माता पार्वती ने उनसे आग्रह किया कि वह विवाह की परंपरा के अनुसार तैयार होकर आएं। इसके बाद भोलेनाथ ने उनकी विनती स्‍वीकार की और दुल्‍हे के रूप में तैयार हुए। उनके इस अनुपम सौंदर्य को देखकर रानी मैना देवी चकित रह गईं। इसके बाद सृष्टि रचयिता श्री ब्रह्मा जी की मौजूदगी में देवी पार्वती और भोलेनाथ का विवाह संपन्‍न हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव -पार्वती के विवाह की यह तिथि ही महा शिव रात्रि कहलाई। इसल‍िए व‍िशेष है महाश‍िवरात्रि का द‍िन मान्‍यता है कि महा शिव रात्रि का व्रत करने से भक्‍तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और शिव जी के साथ-साथ माता पार्वती का भी आशीर्वाद मिलता है। कुंवारी कन्‍याओं को मनचाहा वर मिलता है। इसके लिए विद्वानजन बताते हैं कि कुंवारी कन्‍याओं को इस दिन नित्‍य कर्म से निवृत्‍त होकर व्रत करना चाहिए। इसके बाद किसी भी ऐसे शिव मंदिर में जाएं जहां पर शिव-पार्वती एक साथ विराजते हों। पार्वतीजी को सुहाग का समान अर्पित करते हुए पार्वती और शिव को लाल रंग कलावे से 7 बार बांध देना चाहिए। इसके बाद शीघ्र विवाह की प्रार्थना करनी चाहिए। वहीं सुहागिन स्त्रियों को इस पूजा से अखंड सौभाग्‍य का वरदान मिलता है।

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सोमवार को करें शिव मंत्र का जाप, पूरी होगी मनोकामना

सोमवार का दिन भोलेनाथ का होता है. इस दिन महादेव के मंत्रों का जाप करने से महादेव जल्द प्रसन्न होते हैं. सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए सर्वोत्तम दिन होता है. सभी देवी देवताओं में सबसे सरल स्वभाव के देवता भोलेनाथ को माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन पूजा अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. यहां हम आपको भगवान शिव के कुछ ऐसे मंत्र बता रहें हैं, जिनका जाप सोमवार को करने से भगवान शिव अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. सावन में क्यों होता है भगवान शिव का जलाभिषेक जानें वजह भगवान शिव के कुछ मंत्र शिव नमस्कार मंत्रनम: श‍िव जी को प्रसन्‍न करना है तो इस मंत्र का जाप पूजन से पहले करें.शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिमहिर्बम्हणोधपतिर्बम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। पंचाक्षरी मंत्रइस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से सभी संकटों तथा कष्टों से मुक्ति मिलती है ॐ नम: शिवाय। श‍िव नामावली मंत्रसोमवार को पूजा करते समय नामावली मंत्रों का जाप करना अधिक फलदायी माना जाता है.।। श्री शिवाय नम:।।।। श्री शंकराय नम:।।।। श्री महेश्वराय नम:।।।। श्री सांबसदाशिवाय नम:।।।। श्री रुद्राय नम:।।।। ओम पार्वतीपतये नम:।।।। ओम नमो नीलकण्ठाय नम:।। महामृत्युंजय मंत्रइस मंत्र का जाप नियमित रूप से करने से रोग, दोष तथा सभी सकंट समाप्त हो जाते हैं.ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ शिव गायत्री मंत्रगायत्री मंत्र का जाप करने से पितृ दोष, कालसर्प दोष, राहु केतु तथा शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है.।। ओम तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात ।। लघु महामृत्युंजय मंत्रजिन लोगों के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना कठिन होता, उन्हें लघु महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए इससे असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं.ॐ हौं जूं सः

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सावन में क्यों होता है भगवान शिव का जलाभिषेक जानें वजह

सावन माह की शुरूआत आज से हुई है. यह माह भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है. इस माह में विशेषकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है. हालांकि वर्ष में आप ​किसी भी दिन भोलेनाथ का जलाभिषेक कर सकते हैं. श्रावण मास में देशभर के शिव मंदिरों में भक्त अपने भगवान महादेव की पूजा करने और उनका जलाभिषेक करने के लिए आते हैं. भगवान शिव का सावन माह में जलाभिषेक क्यों किया जाता है? इसे प्रश्न के जवाब में ही आपको पता चल जाएगा कि सावन माह शिव जी को प्रिय क्यों है. इसके बारे में बता रहे हैं शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं भगवान शिव सावन में शिव जी के जलाभिषेक की कथाशिव पुराण की कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन हुआ था, तो उसमें से सबसे पहले विष निकला था. उस विष के कारण पूरे संसार पर संकट छा गया क्योंकि वह देव, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि सभी के जीवन के लिए हानिकारक था. अब समस्या यह थी कि उस विष का क्या होगा? इस संकट का क्या हल है? तब देवों के देव महादेव ने इस संकट से पूरी सृष्टि को बचाने का निर्णय लिया. उन्होंने उस पूरे विष को पीना शुरु कर दिया, उसी समय माता पार्वती ने उस विष को भगवान शिव के कंठ में ही रोक दिया. इस वजह से वह विष शिव जी के कंठ में ही रह गया और शरीर में नहीं फैला. विष के कारण शिव जी का कंठ नीला हो गया, जिस वजह से शिव जी को नीलकंठ भी कहते हैं.

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शिवजी को क्यों प्रिय है सावन का महीना, जानिए 5 रहस्य

भगवान शिव को सावन का महीना अत्यंत ही प्रिय है। जो भी भक्त इस माह में उनकी विधिवतरूप से पूजा करता है उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। आओ जानते हैं कि आखिर शिवजी को क्यों प्रिय है सावना का महीना। जानें कब और कैसे प्रकट हुए थे भगवान भोलेनाथ, पढ़ें यह पौराणिक कथा 1. राजा दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह करने के बाद माता सती का दूसरा जन्म माता पार्वती के रूप में हुआ था। माता पार्वती ने शिवजी को प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था जिसके चलते सावन के माह में शिवजी ने माता से विवाह किया था। इसलिए उन्हें यह माह प्रिय है। इस संबंध में ब्रह्मा के पुत्र सनत कुमारों ने शिवजी से प्रश्न किया था कि आपको सावन का माह क्यों प्रिय है तो शिवजी ने उपरोक्त बात बताई थी। 2. देव और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। मंथन करने से सबसे पहले विष निकला था। विष को शिवजी ने अपने गले में धारण कर लिया था। इसके कारण वे नीलकंठ कहलाने लगे। विष के काणण उनके शरीर का तापमान बढ़ने लगा तो देवताओं ने उन पर शीतल जल डालकर उस ताप को शांत किया। तभी से शिवजी को जल अतिप्रिय लगने लगता है। 3. कई जगहों पर बारिश में शिवलिंग पानी में डूबे रहते हैं। शिवलिंग के उपर एक कलश लटका रहता है जिससे बूंद-बूंद जल टपकता रहता है उसे जलाधारी कहती हैं। जहां भी प्राकृति शिवलिंग है वहां जल की धारा भी है। 4. शिवजी के मस्तक पर चंद्रमा और गंगा मैया विराजमान है जिनका संबंध में जल से ही है।  कैलाश पर्वत के चारों और बर्फ जमी रहती है और उसके पास है मान सरोवार। शिवजी को जल अति प्रिय है जबकि विष्णुजी तो जल में ही निवास करते हैं।  5. यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव सावन के महीने में धरती पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्ध्य देकर, जलाभिषेक कर किया गया था। अत: माना जाता है, कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। इसीलिए यह माह उन्हें प्रिय है। यही उपरोक्त सभी कारण है कि बारिश का मौसम और उसमें भी श्रावण का माह उन्हें अति प्रिय है जबकि सभी ओर हरियाली और शीतलता व्याप्त हो जाती है।

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बैद्यनाथ (शिव) ज्योतिर्लिंग प्रादुर्भाव पौराणिक कथा

श्री बैद्यनाथ महादेव की कथा एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर स्थिर होकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। उस राक्षस ने अपना एक-एक सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दिये। इस प्रकिया में उसने अपने नौ सिर चढ़ा दिया तथा दसवें सिर को काटने के लिए जब वह उद्यत (तैयार) हुआ, तब तक भगवान शंकर प्रसन्न हो उठे। प्रकट होकर भगवान शिव ने रावण के दसों सिरों को पहले की ही भाँति कर दिया। उन्होंने रावण से वर माँगने के लिए कहा। रावण ने भगवान शिव से कहा कि मुझे इस शिवलिंग को ले जाकर लंका में स्थापित करने की अनुमति प्रदान करें। शंकरजी ने रावण को इस प्रतिबन्ध के साथ अनुमति प्रदान कर दी कि यदि इस लिंग को ले जाते समय रास्ते में धरती पर रखोगे, तो यह वहीं स्थापित (अचल) हो जाएगा। जब रावण शिवलिंग को लेकर चला, तो मार्ग में चिताभूमि में ही उसे लघुशंका (पेशाब) करने की प्रवृत्ति हुई। उसने उस लिंग को एक अहीर को पकड़ा दिया और लघुशंका से निवृत्त होने चला गया। इधर शिवलिंग भारी होने के कारण उस अहीर ने उसे भूमि पर रख दिया। वह लिंग वहीं अचल हो गया। वापस आकर रावण ने काफ़ी ज़ोर लगाकर उस शिवलिंग को उखाड़ना चाहा, किन्तु वह असफल रहा। अन्त में वह निराश हो गया और उस शिवलिंग पर अपने अँगूठे को गड़ाकर (अँगूठे से दबाकर) लंका के लिए ख़ाली हाथ ही चल दिया। इधर ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र आदि देवताओं ने वहाँ पहुँच कर उस शिवलिंग की विधिवत पूजा की। उन्होंने शिव जी का दर्शन किया और लिंग की प्रतिष्ठा करके स्तुति की। उसके बाद वे स्वर्गलोक को चले गये। कोटि रुद्र संहिता के अनुसार कथा श्री शिव महापुराण के कोटि रुद्र संहिता में श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार लिखी गई है–राक्षसराज रावण अभिमानी तो था ही, वह अपने अहंकार को भी शीघ्र प्रकट करने वाला था। एक समय वह कैलास पर्वत पर भक्तिभाव पूर्वक भगवान शिव की आराधना कर रहा था। बहुत दिनों तक आराधना करने पर भी जब भगवान शिव उस पर प्रसन्न नहीं हुए, तब वह पुन: दूसरी विधि से तप-साधना करने लगा। उसने सिद्धिस्थल हिमालय पर्वत से दक्षिण की ओर सघन वृक्षों से भरे जंगल में पृथ्वी को खोदकर एक गड्ढा तैयार किया। राक्षस कुल भूषण उस रावण ने गड्ढे में अग्नि की स्थापना करके हवन (आहुतियाँ) प्रारम्भ कर दिया। उसने भगवान शिव को भी वहीं अपने पास ही स्थापित किया था। तप के लिए उसने कठोर संयम-नियम को धारण किया। जानें कब और कैसे प्रकट हुए थे भगवान भोलेनाथ, पढ़ें यह पौराणिक कथा वह गर्मी के दिनों में पाँच अग्नियों के बीच में बैठकर पंचाग्नि सेवन करता था, तो वर्षाकाल में खुले मैदान में चबूतरे पर सोता था और शीतकाल (सर्दियों के दिनों में) में आकण्ठ (गले के बराबर) जल के भीतर खड़े होकर साधना करता था। इन तीन विधियों के द्वारा रावण की तपस्या चल रही थी। इतने कठोर तप करने पर भी भगवान महेश्वर उस पर प्रसन्न नहीं हुए। ऐसा कहा जाता है कि दुष्ट आत्माओं द्वारा भगवान को रिझाना बड़ा कठिन होता है। कठिन तपस्या से जब रावण को सिद्धि नहीं प्राप्त हुई, तब रावण अपना एक-एक सिर काटकर शिव जी की पूजा करने लगा। वह शास्त्र विधि से भगवान की पूजा करता और उस पूजन के बाद अपना एक मस्तक काटता तथा भगवान को समर्पित कर देता था। इस प्रकार क्रमश: उसने अपने नौ मस्तक काट डाले। जब वह अपना अन्तिम दसवाँ मस्तक काटना ही चाहता था, तब तक भक्तवत्सल भगवान महेश्वर उस पर सन्तुष्ट और प्रसन्न हो गये। उन्होंने साक्षात प्रकट होकर रावण के सभी मस्तकों को स्वस्थ करते हुए उन्हें पूर्ववत जोड़ दिया। भगवान ने राक्षसराज रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम बल और पराक्रम प्रदान किया। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद ग्रहण करने के बाद नतमस्तक होकर विनम्रभाव से उसने हाथ जोड़कर कहा– ‘देवेश्वर! आप मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं आपकी शरण में आया हूँ और आपको लंका में ले चलता हूँ। आप मेरा मनोरथ सिद्ध कीजिए।’ इस प्रकार रावण के कथन को सुनकर भगवान शंकर असमंजस की स्थिति में पड़ गये। उन्होंने उपस्थित धर्मसंकट को टालने के लिए अनमने होकर कहा– राक्षसराज! तुम मेरे इस उत्तम लिंग को भक्तिभावपूर्वक अपनी राजधानी में ले जाओ, किन्तु यह ध्यान रखना- रास्ते में तुम इसे यदि पृथ्वी पर रखोगे, तो यह वहीं अचल हो जाएगा। अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो प्रसन्नोभव देवेश लंकां च त्वां नयाम्यहम् ।सफलं कुरू मे कामं त्वामहं शरणं गत: ॥इत्युक्तश्च तदा तेन शम्भुर्वै रावणेन स: ।प्रत्युवाच विचेतस्क: संकटं परमं गत: ॥श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ वचो मे सारवत्तया ।नीयतां स्वगृहे मे हि सदभक्त्या लिंगमुत्तमम् ॥भूमौ लिंगं यदा त्वं च स्थापयिष्यसि यत्र वै ।स्थास्यत्यत्र न सन्देहो यथेच्छसि तथा कुरू ॥भगवान शिव द्वारा ऐसा कहने पर ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहता हुआ राक्षसराज रावण उस शिवलिंग को साथ लेकर अपनी राजधानी लंका की ओर चल दिया। भगवान शंकर की मायाशक्ति के प्रभाव से उसे रास्ते में जाते हुए मूत्रोत्सर्ग (पेशाब करने) की प्रबल इच्छा हुई। सामर्थ्यशाली रावण मूत्र के वेग को रोकने में असमर्थ रहा और शिवलिंग को एक ग्वाल के हाथ में पकड़ा कर स्वयं पेशाब करने के लिए बैठ गया। एक मुहूर्त बीतने के बाद वह ग्वाला शिवलिंग के भार से पीड़ित हो उठा और उसने लिंग को पृथ्वी पर रख दिया। पृथ्वी पर रखते ही वह मणिमय शिवलिंग वहीं पृथ्वी में स्थिर हो गया। काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास, इससे जुड़ी पौराणिक कथा, दर्शन-पूजन का समय समेत समस्त जानकारी जब शिवलिंग लोक-कल्याण की भावना से वहीं स्थिर हो गया, तब निराश होकर रावण अपनी राजधानी की ओर चल दिया। उसने राजधानी में पहुँचकर शिव लिंग की सारी घटना अपनी पत्नी मंदोदरी से बतायी। देवपुर के इन्द्र आदि देवताओं और ऋषियों ने लिंग सम्बन्धी समाचार को सुनकर आपस में परामर्श किया और वहाँ पहुँच गये। भगवान शिव में अटूट भक्ति होने के कारण उन लोगों ने अतिशय प्रसन्नता के साथ शास्त्र विधि से उस लिंग की पूजा की। सभी ने भगवान शंकर का प्रत्यक्ष दर्शन किया-तस्मिँल्लिंगे स्थिते तत्र सर्वलोकहिताय वै ।रावण: स्वगृहं गत्वा वरं प्राप्य महोत्तमम् ॥तच्छुत्वा सकला देवा: शक्राद्या मुनयस्तथा ।परस्परं समामन्त्र्य शिवसक्तधियोऽमला: ॥तस्मिन् काले सुरा: सर्वे हरिब्रह्मदयो मुने ।आजग्मुस्तत्र सुप्रीत्या पूजां चक्रुर्विशेषत: ॥प्रत्यक्षं तं तदा दृष्टवा प्रतिष्ठाप्य

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जानें कब और कैसे प्रकट हुए थे भगवान भोलेनाथ, पढ़ें यह पौराणिक कथा

विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान विष्ण की नाभि से जो कमल निकला था उसमें से ब्रह्मा पैदा हुए थे। वहीं, विष्णु जी के तेज से शिवजी पैदा हुए थे। साथ ही इसमें यह भी बताया गया है कि श्री हरि के माथे के तेज से उत्पन्न होने के चलते ही शिव हमेशा ही योगमुद्रा में रहे थे। वहीं, श्रीमद् भागवत के अनुसार, एक बार विष्णु जी और ब्रह्मा खुद को एक-दूसरे से बेहतर बताते हुए लड़ रहे थे। तब एक जलते हुए खंभे से भगवान शिव प्रकट हुए। विष्णु पुराण के अनुसार, ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी। इसके लिए उन्होंने तपस्या की थी। इसी दौरान अचानक से उनकी गोद में एक बालक प्रकट हुआ जो रो रहा था। जब ब्रह्मा जी ने इस बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने बेहद ही मासूमियत से जवाब दिया कि वो इसलिए रो रहा है क्योंकि उसका कोई नाम नहीं है। तब ब्रह्मा ने उसका नाम रुद्र रखा। इसका मतलब होता है रोने वाला। नाम पड़ने के बाद भी वो चुप नहीं हुए। ऐसे में ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया। हालांकि, शिव तब भी चुप नहीं हुए। ऐसे में शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा जी ने उन्हें 8 नाम दिए। ये 8 नाम हैं रूद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव। साथ ही इनके नाम पृथ्वी पर भी लिखे गए। ऐसा शिव पुराण में कहा गया है। ब्रह्मा पुत्र के रूप में जन्म लेने के पीछे भी एक पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार, जब धरती, आकाश, पाताल समेत पूरा ब्रह्माण्ड जलमग्न हो गया था। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) के अलावा कोई भी देव या प्राणी मौजूद नहीं था। इस दौरान केवल विष्णु जी ही शेषनाग पर जल सतह पर नजर आ रहे थे। तब उनकी नाभि से कमल पर ब्रह्मा जी पर प्रकट हुए थे। जब ब्रह्मा और विष्णु धरती के बारे में बात कर रहे थे तब शिवजी प्रकट हुए थे। लेकिन ब्रह्मा ने उन्हें पहचानने से मना कर दिया। कहीं शिवजी रूठ न जाएं तो विष्णु जी ने अपनी दिव्य दृष्टि प्रदान कर ब्रह्मा को शिवजी याद दिलाई। तब ब्रह्मा जी को अपनी गलत समझ आई और उन्होंने शिवजी से माफी मांगी। शिव से क्षमा मांगते हुए उन्होंने उनसे अपने पुत्र रूप में पैदा होने का आशीर्वाद मांगा जिसे शिवजी ने स्वीकार किया। जब सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने शउरू कि उन्हें एक बच्चे की जरूरत थी। तब भगवान शिव का ध्यान ब्रह्मा जी को आया। अत: ब्रह्मा ने तपस्या की और बालक शिव बच्चे के रूप में उनकी गोद में प्रकट हुए। 

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शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं भगवान शिव

लक्ष्मी-गणेश, राधा-कृष्ण, राम-सीता, विष्णु, ब्रह्मा आदि अनेकों भगवान भारी-भारी गहनों और वस्त्रों से लदे होते हैं. इन भगवानों की मूर्तियां मंदिरों में देखें या फिर इनके चित्रों पर गौर करें. हर जगह यह सभी सोने-चांदी से जड़े आभूषणों में दिखाई देते हैं. लेकिन कभी आपने सोचा है कि आखिर भगवान शिव क्यों बिना आभूषणों के रहते हैं. उनके गले में माला के नाम पर सांप, सिर पर मुकुट की जगह जटाएं, शरीर पर मलमल के कपड़ों के बजाय बाघ की खाल और शरीर पर चंदन के लेप के बजाय भस्म क्यों है?  कहते हैं भगवान शिव भोले हैं, क्योंकि वे अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले हैं। वे अपने भक्तों के समक्ष स्वयं प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं एवं मन मुताबिक वरदान देते हैं। हिंदू धर्म में शिवजी की बड़ी महिमा हैं। शिवजी का न आदि है ना ही अंत। शास्त्रों में शिवजी के स्वरूप के संबंध कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। इनका स्वरूप सभी देवी-देवताओं से बिल्कुल भिन्न है। जहां सभी देवी-देवता दिव्य आभूषण और वस्त्रादि धारण करते हैं वहीं शिवजी ऐसा कुछ भी धारण नहीं करते, वे शरीर पर भस्म रमाते हैं, उनके आभूषण भी विचित्र है। शिवजी शरीर पर भस्म क्यों रमाते हैं? इस संबंध में धार्मिक मान्यता यह है कि शिव को मृत्यु का स्वामी माना गया है और शिवजी शव के जलने के बाद बची भस्म को अपने शरीर पर धारण करते हैं। इस प्रकार शिवजी भस्म लगाकर हमें यह संदेश देते हैं कि यह हमारा यह शरीर नश्वर है और एक दिन इसी भस्म की तरह मिट्टी में विलिन हो जाएगा। अत: हमें इस नश्वर शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए। कोई व्यक्ति कितना भी सुंदर क्यों न हो, मृत्यु के बाद उसका शरीर इसी तरह भस्म बन जाएगा। अत: हमें किसी भी प्रकार का घमंड नहीं करना चाहिए। जब भगवान शिव और माता सति को यज्ञ के लिए निमंत्रण ना मिलने पर सति ने क्रोध में आकर खुद को अग्नि के हवाले कर दिया था. उस वक्त भगवान शिव माता सति का शव लेकर धरती से लेकर आकाश तक हर जगह घूमे. विष्णु जी भगवान शिव की ये दशा देख ना पाए और माता सति के शव को छूकर उन्होंने उसे भस्म में बदल दिया. अपने हाथों में सति की जगह भस्म देखकर शिव जी और परेशान हो गए और बाद में भस्म को देखकर माता सति को याद कर वो राख उन्होंने अपने शरीर पर लगा ली इस संबंध में एक अन्य तर्क भी है कि शिवजी कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, जहां का वातावरण अत्यंत ही ठंडा है और भस्म शरीर का आवरण का काम करती हैं। यह वस्त्रों की तरह ही उपयोगी होती है। भस्म बारिक लेकिन कठोर होती है जो हमारे शरीर की त्वचा के उन रोम छिद्रों को भर देती है जिससे सर्दी या गर्मी महसूस नहीं होती हैं। शिवजी का रहन-सहन सन्यासियों सा है। सन्यास का यही अर्थ है कि संसार से अलग प्रकृति के सानिध्य में रहना। संसारी चीजों को छोड़कर प्राकृतिक साधनों का उपयोग करना। ये भस्म उन्हीं प्राकृतिक साधनों में शामिल है।

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कब से शुरू होगी कांवड़ यात्रा और कब शिवलिंग पर चढ़ाया जाएगा जल, जानें शिव पूजा का शुभ समय

भगवान शिव की भक्ति में भिगोने वाला श्रावण मास कब शुरू होगा? इस साल कब कांवड़ यात्रा पर निकलेंगे भोले के भक्त और कब चढ़ाया जाएगा भगवान शिव को जल? जानने के लिए पढ़ें ये लेख. भगवान शिव की पूजा के लिए श्रावण मास को सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी माना गया है. हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान शिव को श्रावण का महीना बहुत ज्यादा प्रिय है. यही कारण है कि भोले के भक्त इस पूरे माह उनकी पूजा में मगन रहते हैं. महादेव की पूजा से जुड़ा श्रावण मास इस साल 4 जुलाई 2023 को प्रारंभ होगा और इसकी समाप्ति 31 अगस्त 2023 को होगी. ऐसे में इस साल शिव के भक्त अपने आराध्य देवता की तकरीबन दो महीने पूजा कर सकेंगे. आइए जानते हैं इस साल कांवड़ यात्रा कब शुरु होगी और कब शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाएगा. सावन में यह 5 काम जरूर करें, इन 7 कामों से बचें कब शुरू होगी कांवड़ यात्रा इस साल कावड़ यात्रा श्रावण मास के पहले दिन यानि 4 जुलाई 2023 से प्रारंभ होगी और 15 जुलाई 2023 तक चलेगी. इस साल 15 जुलाई 2023 को शिवरात्रि पड़ेगी और इसी दिन शिव भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाएंगे. शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए शुभ मुहूर्त रात्रि 08:32 बजे प्रारंभ होकर 16 जुलाई 2023 तक रहेगा. इस बार महादेव को जल चढ़ाने के लिए 2 दिन का मुहूर्त है. ऐसे में शिव भक्त दो दिन शिव को जल चढ़ाकर उनकी साधना-आराधना कर सकेंगे. वहीं चतुर्दशी तिथि 15 जुलाई को 8:32 से प्रारंभ होगी 16 जुलाई को 10:08 तक रहेगी. भले ही इस साल शिव भक्त दो दिन जल चढ़ा सकते हैं लेकिन इसका सबसे उत्तम मुहूर्त 15 जुलाई 2023 शिवरात्रि को 8:32 पर रहेगा. किसने की थी पहली कांवड़ यात्रा हरिद्वार स्थित गंगा सभा के स्वागत मंत्री आचार्य चक्रपाणि के अनुसार भले ही इस साल श्रावण मास दो महीने तक रहेगा, लेकिन कांवड़ यात्रा पहले की तरह होगी. जिसके लिए शिवभक्त 04 जुलाई से अपने-अपने स्थान से हर की पौड़ी जल लेने के लिए निकलेंगे और और 15 जुलाई 2023 को अपने आराध्य को अर्पित करेंगे. हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान शिव की साधना से जुड़ी पहली कांवड़ यात्रा भगवान परशुराम जी ने की थी और उन्होंने हरिद्वार से गंगाजल लेकर पुरा महादेव में जाकर चढ़ाया था. मान्यता है कि पुरा महादेव में शिवलिंग की स्थापना भी भगवान परशुराम जी ने की थी. वर्तमान में लोग अपनी-अपनी श्रद्धा और विश्वास से जुड़े शिव धाम जाकर महादेव की पूजा करते हैं. क्यों चढ़ाया जाता है शिव को जल हिंदू मान्यता के अनुसार जब देवताओं और दैत्यों द्वारा किए गये समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला तो भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उसे पीकर अपने गले में रोक लिया. जिसके बाद महादेव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए. मान्यता है कि भगवान शिव के गले में इकट्ठे हुए विष की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए शिव भक्त विशेष रूप से शिवरात्रि के दिन जल चढ़ाते हैं ताकि उनके गले में स्थित नकारात्म्क उर्जा दूर हो सके.

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सावन में यह 5 काम जरूर करें, इन 7 कामों से बचें

सावन मास में क्या करें, क्या न करें इस सवाल का जवाब हर कोई जानना चाहता है। आइए जानें महत्वपूर्ण जानकारी श्रावण मास में क्या करें और क्या न करें इसका विचार हर शिव भक्त को करना चाहिए। सावन मास की सावन के प्रत्येक सोमवार हर किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए सर्वोत्तम माना गया है। जानें, बाबा की नगरी काशी के विश्वनाथ मंदिर की पौराणिक कथा सावन का पहला सोमवार इस बार 30 जुलाई को है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार इस बार सावन का हर सोमवार बेहद खास है।मनोकामना पूर्ति के लिए इस बार सावन का हर सोमवार अत्यधिक महत्व का माना जा रहा है। सावन में शिव कैलाश त्यागकर भूलोक पर निवास करते हैं।इसलिए सावन में भगवान शिव की आराधना सर्वोपरि है। इतना ही नहीं शिव को प्रसन्न करने के लिए सावन का हर दिन विशेष महत्व का होता है। यह करें  1. धतूरा और भांग भगवान श‌िव को अर्प‌ित करें।  2. म‌िट्टी से श‌िवल‌िंग बनाकर न‌ियम‌ित इसकी पूजा करें।  3. दूध दान करें।  4. शाम के समय भगवान श‌िव की आरती पूजा करें। 5. इस महीने में अगर घर के दरवाजे पर सांड आ आए तो उसे कुछ खाने को दें। यह न करें   1. शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिए  2. कांसे के बर्तन में नहीं खाना चाहिए।  3. पूजा के समय में शिवलिंग पर हल्दी न चढ़ाएं। 4. सावन के महीने में दूध का सेवन अच्छा नहीं होता है। 5. सावन के महीने में द‌िन के समय नहीं सोना चाह‌िए।  6 . सावन के महीने में बैंगन नहीं खाना चाह‌िए। बैंगन को अशुद्ध माना गया है।  7. भगवान शिव को केतकी का फूल भूल कर भी न चढ़ाएं।

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