काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास, इससे जुड़ी पौराणिक कथा, दर्शन-पूजन का समय समेत समस्त जानकारी

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। हिंदू पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है। इस मंदिर को इतिहास में कई बार नुकसान भी पहुंचाया गया लेकिन आज भी इसका महत्व बरकरार है। काशी विश्वनाथ मंदिर  भगवान शिव  से जुड़े 12 ज्योतिर्लिंग में से एक भी है। वाराणसी  में स्थित इस मंदिर का हिंदू धर्म में बेहद खास स्थान है। वाराणसी को ही बनारस या काशी भी कहते हैं। उत्तर प्रदेश में स्थित इस शहर को लेकर ऐसी मान्यता है कि ये भगवान शंकर के त्रिशूल पर टिका है और ये भारत के सबसे पुराने और आध्यात्मिक शहरों में से एक है। ऐसे तो इस शहर में कई मंदिर, घाट और पर्यटन स्थल है लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर का अलग ही महत्व है।  काशी विश्वनाथ मंदिर की विशेषता क्या है, इस मंदिर को कब बनाया गया, ये मंदिर कब खुलता है, कैसे यहां पहुंच सकते हैं और भगवान के दर्शन कर सकते हैं और वाराणसी में कहां ठहरें, इन सभी बातों की जानकारी हम देने जा रहे हैं।  जानें, बाबा की नगरी काशी के विश्वनाथ मंदिर की पौराणिक कथा काशी विश्वनाथ मंदिर की कहानी पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी घाट पर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर एक बेहद दिलचस्प पौराणिक कहानी है। इस कथा के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा में इस बात को लेकर बहस हो गई कि कौन अधिक शक्तिशाली या महत्वपूर्ण है। इस विवाद के बीच भगवान शिव मध्यस्थता करने पहुंचे और एक विशाल प्रकाश स्तंभ या कह लीजिए कि ज्योतिर्लिंग का रूप धारण कर लिया।  इसके बाद उन्होंने ब्रह्मा और विष्णुजी से इसके स्रोत और ऊंचाई का पता लगाने के लिए कहा। ये बात सुनकर ब्रह्मा अपने हंस पर हवार हो गए और आकाश में ऊंचे उड़ने लगे ताकि ऊंचाई का पता लगाया जा सके।  दूसरी ओर भगवान विष्णु एक शूकर का रूप धारण करके पृथ्वी के अंदर खुदाई करने लगे। कहते हैं कि कई युगों तक दोनों इस बात का पता लगाने की कोशिश करते रहे। अंत में विष्णुजी हारकर वापस आते हैं और शिव के इस रूप के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। दूसरी ओर ब्रह्मा अपनी हार स्वीकार नहीं करते और झूठ बोल देते हैं कि उन्होंने स्तंभ का ऊपरी सिरा देखा है।  इस झूठ पर शिव उन्हें शाप देते हैं कि उनकी कभी पूजा नहीं होगी। ऐसी मान्यता है कि इसीलिए आज भी ब्रह्मा का कोई मंदिर नहीं है। बहरहाल, इस स्तभ के कारण वो स्थान जहां-जहां से पृथ्वी के भीतर से शिव का दिव्य प्रकाश निकला था, वे ही 12 ज्योतिर्लिंग कहलाए।  काशी विश्वनाथ मंदिर भी इन्ही में से एक हैं। इन सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थान पर बने मंदिर में शिवलिंग चमकदार रूप में मौजूद हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर ज्ञानवापी मस्जिद विवाद हजारों साल पुराने काशी विश्वनाथ मंदिर पर समय और उसके हिसाब से राजनीति का असर भी देखने को मिलता रहा है। इस मंदिर का पहली बार निर्माण कब हुआ होगा, इसे लेकर अभी भी कुछ कहना मुश्किल है। हालांकि, पुराणों में इसका जिक्र जरूर है। इतिहास में काशी के इस मंदिर को 1194 में कुतुब-उद-दीन ऐबक द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने का उल्लेख मिलता है, जब उसने कन्नौज के राजा को हराया। इल्तुतमीश के काल में इसे दोबारा बनाया गया लेकिन बाद में फिर इसे तोड़ा गया। मुगल शासक अकबर के काल में भी इसे फिर से राजा मान सिंह द्वारा बनवाए जाने का उल्लेख मिलता है। काशी विश्वनाथ मंदिर की कहानी और इतिहास बाद में अकबर के शासन काल में ही राजा टोडरमल द्वारा मंदिर के पुनरोद्धार कराए जाने का भी उल्लेख इतिहास में है। कुछ दशकों बाद औरंगजेब ने इसे फिर नुकसान पहुंचाया और मंदिर के एक स्थान पर मस्जिद बनवाया। बहरहाल, इन तमाम उठापटक के बीच आज जो मंदिर हम देखते हैं उसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में बनाया। ये मस्जिद से ठीक सटा हुआ है। काशी विश्वनाथ मंदिर कब खुलता है और दर्शन का समय काशी विश्वनाथ मंदिर हर दिन तड़के 2.30 बजे खुलता है और दिन भर में 5 आरती यहां की जाती है। दिन की पहली आरती तड़के 3 बजे की जाती है। वहीं, आखिरी आरती रात 10.30 बजे होती है।  काशी विश्वनाथ मंदिर में सुबह 3 बजे होती है पहली आरती भक्तों के लिए मंदिर सुबह 4 बजे खुल जाता है। भक्तगण दिन में कभी भी जाकर मंदिर में दर्शन-पूजन कर सकते हैं। वैसे आप ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के जरिए भी पूजा और दर्शन का समय पहले से फिक्स कर सकते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए ऑनलाइन आवेदन कैसे करें? काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए श्रद्धालुओं को इसमें आरती, रूद्राभिषेक कराने, सुगम दर्शन, पूजा, यात्रा आदि में से आपको विकल्प चुनने होंगे और तमाम विवरण भरने होंगे। इसी वेबसाइट पर हेल्प डेस्क नंबर भी है, जहां से आप और विस्तृत जानकारी हासिल कर सकते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए बनारस कैसे पहुंचे और कहां ठहरे बनारस देश के लगभर हर बड़े शहर से फ्लाइट, ट्रेन और बस सेवा से जुड़ा है। आप किसी भी माध्यम से यहां पहुंच सकते हैं। बनारस एक बड़ा पर्यटन और धार्मिक स्थल है। ऐसे में यहां पर आपको सस्ते और महंगे हर तरह से होटल और लॉज मिल जाएंगे।  एक अनुमान के अनुसार इस शहर में 3000 से अधिक मंदिर हैं। गंगा आरती भी यहां देखी जा सकती है। यह आरती दशाश्वमेध घाट पर होती है। बनारस के घाटों को देखने और आध्यात्मिक अनुभव को भी हासिल करने के लिए यहां देश-विदेश से हजारों पर्यटक आते हैं।  एक खास बात ये भी है वाराणसी कई शताब्दियों से हिन्दू मोक्ष तीर्थस्थल माना जाता रहा है। मान्यता है कि काशी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्ति देते हैं। इसीलिए अधिकतर लोग यहां काशी में अपने जीवन का अंतिम समय व्यतीत करने आते हैं।

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जानें, बाबा की नगरी काशी के विश्वनाथ मंदिर की पौराणिक कथा

धार्मिक किदवंती के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवान ब्रह्मा देव और विष्णु जी से पूछा कि- हे जगत के रचयिता और पालनहार कृपा कर बताएं कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन है? देवताओं के इस सवाल से ब्रह्मा और विष्णु जी में श्रेष्ठता साबित करने की होड़ लग गई। दैविक काल से बनारस देव भूमि के नाम से जाना जाता है। यह शहर पवित्र गंगा नदी के किनारे बसा है। गंगा के किनारे कुल 88 घाट हैं . बनारस अपनी धार्मिक महत्व के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। हर साल दुनियाभर से पर्यटक बनारस घूमने आते हैं। लोग गंगा आरती में शामिल होकर ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। साथ ही काशी विश्वनाथ मंदिर में जाकर बाबा के दरेशन करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि दैविक काल में महादेव काशी में ही रहते थे। आइए, काशी विश्वनाथ मंदिर की पौराणिक कथा जानते हैं आखिर क्यों हुआ था समुद्र मंथन? जानिए रोचक कहानी धार्मिक किदवंती के अनुसार, एक बार देवताओं ने भगवान ब्रह्मा देव और विष्णु जी से पूछा कि- हे जगत के रचयिता और पालनहार कृपा कर बताएं कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन है? देवताओं के इस सवाल से ब्रह्मा और विष्णु जी में श्रेष्ठता साबित करने की होड़ लग गई। इसके बाद सभी देवतागण, ब्रह्मा और विष्णु जी सहित कैलाश पहुंचे और भगवान भोलेनाथ से पूछा गया कि- हे देवों के देव महादेव आप ही बताएं कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं? शिव जी के शरीर से ज्योति कुञ्ज निकली देवताओं के इस सवाल पर तत्क्षण भगवान शिव जी के तेजोमय और कांतिमय शरीर से ज्योति कुञ्ज निकली, जो नभ और पाताल की दिशा में बढ़ रही थी। तब महादेव ने ब्रह्मा और विष्णु जी से कहा- आप दोनों में जो सबसे पहले इस ज्योति की अंतिम छोर पर पहुंचेंगे। वहीं, सबसे श्रेष्ठ है। इसके बाद ब्रह्मा और विष्णु जी अनंत ज्योति की छोर तक पहुंचने के लिए निकल पड़े। कुछ समय बाद ब्रम्हा और विष्णु जी लौट आए तो शिव जी ने उनसे पूछा-हे देव क्या आपको अंतिम छोर प्राप्त हुआ। ब्रम्हा जी झूठ बोल गए इस पर विष्णु जी ने कहा-हे महादेव यह ज्योति अनंत है, इसका कोई अंत नहीं है। जबकि ब्रम्हा जी झूठ बोल गए, उन्होंने कहा- मैं इसके अंतिम छोर तक पहुंच गया था। यह जान शिव जी ने विष्णु जी को श्रेष्ठ घोषित कर दिया। इससे ब्रह्मा जी क्रोधित हो उठें, और शिव जी के प्रति अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करने लगे। काल भैरव देव के जयकारे लगने लगे यह सुन भगवान शिव क्रोधित हो उठें और उनके क्रोध से काल भैरव की उत्पत्ति हुई, जिन्होंने ब्रम्हा जी के चौथे मुख को धड़ से अलग कर दिया। उस समय ब्रह्मा जी को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने तत्क्षण भगवान शिव जी से क्षमा याचना की। इसके बाद कैलाश पर्वत पर काल भैरव देव के जयकारे लगने लगे। यह ज्योति द्वादश ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ कहलाया।

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आखिर क्यों हुआ था समुद्र मंथन? जानिए रोचक कहानी

हिंदू धर्म में बहुत सारी देवताओं और असुरों के युद्ध की कथाएं प्रचलित हैं। मगर, सबसे ज्यादा जिस कथा के बारे में लोग जानते हैं वह है ‘समुद्र मंथन’। समुद्र मंथन पहला ऐसा काम था जिसे देवताओं और असुरों ने मिलकर किया था। इससे पहले असुरों को देवताओं से हमेश लड़ते हुए ही देखा गया था। अधिकांश लोगों को यही पता है कि समुद्र मंथन पृथ्वी के निर्माण के लिए हुआ था। मगर, विष्णु पुराण में समुद्र मंथन की कुछ और ही कथा छुपी हुई है। समुद्र मंथन का कारण था देवी लक्ष्मी की खोज। जी हां, देवी लक्ष्मी के क्षीर सागर में विलुप होने के बाद जब उनकी तलाश की गई तब हुआ था समुद्र मंथन। आइए जानते हैं इस दिव्य घटना के बारे में।  कैसे शुरू हुई शुभ कावड़ यात्रा, कौन थे पहले कावड़िया ? कथा के अनुसार जब बृह्मा जी ने भगवान विष्णु से पृथ्वी के निर्माण के विषय में बात की तब एक बार फिर भगवान विषणु और देवी लक्ष्मी को एक दूसरे से बिछड़ना पड़ा। उस वक्त देवी लक्ष्मी नाराज हो कर क्षीर सागर की गहराइयों में समाहित हो गई। वहीं भगवान विषणु पृथ्वी लोक को बसाने के बारे में विचार करने लगे। तब पृथ्वी के लगभग पूरे हिस्से में पानी ही पानी था ऐसे में उसे बसाने के लिए बहुत सारी वस्तुओं की जरूरत थी। यह वस्तुएं क्षीर सागर में छुपे हुए थे। तब भगवान विष्णु ने तय किया कि वह समुद्र का मंथन कराएंगे। मगर, इस मंथन के लिए न तो देवता गण तैयार थे और नहीं वह इसे अकेले कर पाने में समर्थ थे। वहीं दूसरी तरफ देवी लक्ष्मी के रुष्ट होने से पूरे बृह्मांड में सभी देवता और असुर श्रीहीन हो गए थे। सभी चाहते थे कि देवी लक्ष्मी वापिस आ जाएं।  भगवान विष्णु ने तब देवताओं को श्री का लोभ और असुरों को अमृत का लोभ दे कर समुद्र मंथन के लिए तैयार किया था। इसके बावजूद समुद्र को मथना आसान नहीं था। तब भगवान विष्णु ने अपनी माया से मंदार पर्वत को समुद्र के बीचो बीच ला खड़ा किया। इसके बाद मंदार पर्वत से समुद्र को मथने के लिए एक मजबूत रस्सी की जरूरत थी। तब भगवान विष्णु ने भगवान शिव से उनके गले में वास करने वाले नाग वासुकी को समुद्र मंथन के लिए देने के लिए आग्रह किया। इसके बाद बारी आई कि वासुकी के मुंह का हिस्सा कौन पकड़गा और पूछ का हिस्सा कौन पकड़ेगा। वासुकी के मुंह से जैहरीली हवा निकलती थी मगर वह हिस्सा मजबूत था। वहीं पूंछ का हिस्सा कमजोर था। तब असुरों ने तय किया कि वह मजबूत भाग को पकड़ेंगे। हालाकि यह भगवान विषणु की एक चाल थी।  इसके बाद बारी आई कि मंदार पर्वत के भार को कौन उठाएगा। तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण किया और अपनी पीठ पर मंदार पर्वत को रख लिया। तब कई वर्षों तक समुद्र मंथन का काम चलता रहा। तब जाकर सबसे पहले मंथन से हलाहल निकला। इसे भगवान शिव ने पी लिया। तब ही से उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा। इसके बाद कामधेनू गाय, उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी,  कौस्तुभमणि हीरा, कल्पवृष पेड़ और ऐसे 13 रत्न निकले। सबसे आखिर में देवी लक्ष्मी समुद्र मंथन से निकलीं। जैसे ही देवी लक्षमी समुद्र से बाहर आईं सभी देवताओं के गहने और धन वापिस आ गया।

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कैसे शुरू हुई शुभ कावड़ यात्रा, कौन थे पहले कावड़िया ?

सावन का महीना शुरू हो गया है और इसके साथ ही केसरिया कपड़े पहने शिवभक्तों के जत्थे गंगा का पवित्र जल शिवलिंग पर चढ़ाने निकल पड़े हैं। ये जत्थे जिन्हें हम कावड़ियों के नाम से जानते हैं उत्तर भारत में सावन का महीना शुरू होते ही सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं। पिछले दो दशकों से कावड़ यात्रा की लोकप्रियता बढ़ी है और अब समाज का उच्च एवं शिक्षित वर्ग भी कावड यात्रा में शामिल होने लगा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कावड़ यात्रा का इतिहास, सबसे पहले कावड़िया कौन थे। इसे लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यता है  छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन 1. परशुराम थे पहले कावड़िया  कुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित ‘पुरा महादेव’का कावड़ से गंगाजल लाकर जलाभिषेक किया था। परशुराम, इस प्रचीन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाए थे। आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर लाखों लोग ‘पुरा महादेव’ का जलाभिषेक करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर का वर्तमान नाम ब्रजघाट है। 2. श्रवण कुमार थे पहले कावड़िया वहीं कुछ विद्वानों का कहना है कि सर्वप्रथम त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कावड़ यात्रा की थी।  माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के क्रम में श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना क्षेत्र में थे जहां उनके अंधे माता-पिता ने उनसे मायापुरी यानि हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा प्रकट की। माता-पिता की इस इच्छा को पूरी करने के लिए श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कावड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए और उन्हें गंगा स्नान कराया. वापसी में वे अपने साथ गंगाजल भी ले गए। इसे ही कावड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है। 3. भगवान राम ने की थी कावड़ यात्रा की शुरुआत कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम पहले कावडिया थे। उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कावड़ में गंगाजल भरकर, बाबाधाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। 4. रावण ने की थी इस परंपरा की शुरुआत- पुराणों के अनुसार कावड यात्रा की परंपरा, समुद्र मंथन से जुड़ी है। समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। परंतु विष के नकारात्मक प्रभावों ने शिव को घेर लिया। शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया।तत्पश्चात कावड़ में जल भरकर रावण ने ‘पुरा महादेव’ स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जल अभिषेक किया। इससे शिवजी विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हुए और यहीं से कावड़ यात्रा की परंपरा का प्रारंभ हुआ। 5. देवताओं ने सर्वप्रथम शिव का किया था जलाभिषेककुछ मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल के प्रभावों को दूर करने के लिए  देवताओं ने शिव पर पवित्र नदियों का शीतल जल चढ़ाया था। सभी देवता शिवजी पर गंगाजी से जल लाकर अर्पित करने लगे। सावन मास में कावड़ यात्रा का प्रारंभ यहीं से हुआ।

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छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन

यूपी के लखीमपुरी खीरी जिले की गोला तहसील में भी छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला गोकर्णनाथ है, जहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दूर से सावन का पवित्र माह चल रहा है और इस समय भक्त भगवान शिव के दर्शन करने लिए शिवनगरी जाते हैं। कोई कांवड़ यात्रा में शामिल होकर तो कोई अन्य माध्यमों से भोलेनाथ का आर्शीवाद लेने के लिए उनकी शरण में जाता है। यूपी के लखीमपुरी खीरी जिले की गोला तहसील में भी छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला गोकर्णनाथ है, जहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। गोला के गोकर्णनाथ के बारे में कहा जाता है कि सतयुग में लंका का राजा रावण भगवान शिव को यहां लाया था। गोला गोकर्णनाथ के बारे में प्राचीन कथा जैसा की प्राचीन कथाओं में बताया गया है कि लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की। रावण की तपस्या से खुश होकर भगवान ने उससे वरदान मांगने को कहा तो रावण ने कहा कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। यह सुनकर सभी देवता परेशान हो गए और ब्रह्माजी के पास गए और कहा कि अगर शिव रावण के साथ लंका चले तो सृष्टि का कार्य कैसे होगा? इसके बाद ब्रह्माजी ने भगवान शिव को सोच समझकर वरदान देने के लिए कहा। इस पर शिवजी ने रावण से कहा कि यदि तुम मुझे लंका ले जाना चाहते हो तो ले चलो लेकिन मेरी एक शर्त रहेगी। भगवान शिव ने रावण से कहा कि जहां भी मुझे भूमि स्पर्श हो जाएगी, मैं वही स्थापित हो जाउंगा। इस बात पर रावण सहमत हो गया। भगवान ने एक शिवलिंग का रूप धारण कर लिया। इसके बाद रावण शिवलिंग को लेकर जा रहा था। इसी दौरान भगवान शिव ने रावण को लघुशंका की इच्छा जगा दी। काफी समय तक बर्दाश्त करने के बाद रावण ने एक चरवाहे को शिवलिंग पकड़ाकर लघुशंका करने लगा। इसी समय भगवान ने अपना वजन बढ़ा दिया और इससे चरवाहे ने रावण को आवाज लगाकर कहा कि वह अब इस शिवलिंग को उठाए नहीं रह सकता है। रावण लघुशंका करने में व्यस्त होने के कारण सुन नहीं पाया। इधर चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। यह है भूतनाथ की कहानी जब रावण वापस आया और वह चरवाहे का मारने के लिए दौड़ा तो चरवाहे कुएं में गिर गया। इसके बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह असफल रहा। इससे क्रोधित होकर रावण ने अंगुठे से शिवलिंग को जोर से दबा दिया, आज भी शिवलिंग पर रावण के अंगुठे का निशान है। रावण निराश होकर वापस लंका चला गया। इसके बाद भगवान शिव ने चरवाहे की आत्मा को बुलाकर कहा कि आज के बाद लोग तुम्हें भूतनाथ के नाम से जानेंगे और मेरे दर्शन के बाद तुम्हारे दर्शन करने पर भक्तों को विशेष पूण्यलाभ मिलेगा। इसके बाद से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने के लिए गोला के गोकर्णनाथ आते हैं। सावन के महीने में भगवान शिव दर्शनों को आने वाले लाखों भक्त शिवलिंग के दर्शनों के बाद बाबा भूतनाथ के भी दर्शन अवश्य करते हैं।

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इस कारण भगवान शिव को प्रिय है सावन मास, जानिए पौराणिक कथा

 सावन माह 14 जुलाई 2022 से शुरू हो रहा है। सावन मास भगवान शिव का सबसे प्रिय मास है। सावन में भगवान शिव की विशेष पूजा होती है। जानिए भगवाव शिव को ये माह क्यों पसंद है। इसे सावन मास के नाम से भी जानते हैं। यह पूरा माह भगवान शिव को ही समर्पित होता है। इसी कारण इसे भोलेनाथ का सबसे प्रिय मास कहा जाता है।  इस साल सावन 14 जुलाई से शुरू हो रहे हैं। इस पूरे मास में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की विधिवत पूजा करने का विधान है। शिव पुराण के अनुसार, सावन मास में भगवान शिव और माता पार्वती भू-लोक में निवास करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर सावन मास को भी भगवान शिव का प्रिय माह क्यों कहा जाता है। जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा। इस साल 59 दिनों का होगा सावन, इस विधि से करें महादेव को प्रसन्न इस कारण भगवान शिव को पसंद है सावन माह धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव को सावन माह काफी प्रिय है। क्योंकि दक्ष की पुत्री माता सती ने अपने जीवन को त्याग कर कई वर्षों तक शापित जीवन जिया। इसके बाद वह हिमालयराज के घर में पुत्री के अवतार में जन्म लिया। जहां उनका नाम पार्वती रखा गया। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने का दृढ़ निश्चय लिया। ऐसे में मां पार्वती ने कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके विवाह करने का प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इसके बाद सावन माह में ही शिव जी का विवाह माता पार्वती से हुआ था।  सावन मास में भगवान शिव अपने ससुराल आए थे, जहां पर उनका अभिषेक करके धूमधाम से स्वागत किया गया था। इस वजह से भी सावन माह में अभिषेक का महत्व है। सावन की पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, सावन मास में ही समुद्र मंथन हुआ था। इस मंथन से हलाहल विष निकला तो चारों तरफ हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने विष को कंठ में धारण कर लिया। विष की वजह से कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष का प्रभाव कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने भगवान शिव को जल अर्पित किया, जिससे उन्हें राहत मिली। इससे वे प्रसन्न हुए। तभी से हर साल सावन मास में भगवान शिव को जल अर्पित करने या उनका जलाभिषेक करने का रिवाज शुरू हो गया।

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गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है और गुरु पूर्णिमा का इतिहास

हमारे भारत देश में हजारों वर्षों पहले से ही गुरुओं को एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाता आ रहा है। माना जाता है कि गुरु एक ऐसा मार्ग बनाता है, जिसके जरिए कोई भी व्यक्ति अज्ञानता से ज्ञान की ओर अग्रसर होता है। इतना ही नहीं ऐसा भी मानना हैं कि गुरु से दीक्षा के बिना मोक्ष की प्राप्ति भी नहीं हो पाती है। प्राचीन काल से ही सनातन धर्म में गुरुओं को ज्ञानदाता, मोक्षदाता तथा ईश्वर के समतुल्य महत्वता प्रदान की जाती है। वेदों और पुराणों के अनुसार गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के सामान्य पूज्य माना जाता है। हमारे देश में गुरुओं को और भी महत्वता प्रदान करने के लिए एक विशेष दिवस भी गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरी तरह से गुरु को समर्पित होता है। आज हम इस लेख के माध्यम से गुरु पूर्णिमा क्या है, गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है, गुरु पूर्णिमा का इतिहास तथा गुरु पूर्णिमा कब हैं? इन सभी विषयों पर आपको विस्तार पूर्वक से जानकारी प्रदान करने का प्रयास करेंगे। आज के हमारे इस महत्वपूर्ण एवं गुरु को पूरी तरह से समर्पित लेख को कृपया अंतिम तक अवश्य पढ़ें। गुरु पूर्णिमा क्या है? गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरी तरह से गुरु को समर्पित होता है। इस पावन दिवस के अवसर पर सभी शिष्य अपने गुरुओं को आदर, सम्मान और कृतज्ञता पूर्ण रूप से उनकी पूजा अर्चना करते हैं। हमारे देश में तो वैसे इस पर्व को लगभग बहुत कम ही लोग मनाते हैं, परंतु ऐसे भी बहुत से व्यक्ति आज भी मौजूद हैं, जो गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर इसे बहुत ही भव्यता पूर्ण तरीके से मनाना पसंद करते हैं। गुरु पूर्णिमा का पर्व शिष्य और गुरु के बीच एक दूसरे की महत्वता को समझाने का कार्य करता है। हमारे हिंदू धर्म की मान्यता है कि बिना गुरु के ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। यही कारण है कि सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा को बहुत महत्व प्रदान किया जाता है। हिंदू धर्म के मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेद व्यास को मानव जाति का गुरु माना जाता है और गुरु पूर्णिमा का भी रिश्ता महर्षि वेदव्यास के साथ जुड़ा हुआ है। इस पावन दिवस के दिन सभी छात्र अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेते अपने जीवन को सफल बनाते हैं। गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ माह में ही क्यों मनाया जाता है और इसका महत्त्व क्या है? आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेद व्यास का आज से करीब 3000 वर्षों पूर्व जन्म हुआ था। मान्यता है कि उनके जन्म दिवस के अवसर पर ही गुरु पूर्णिमा जैसे महान पर्व को मनाने की परंपरा को शुरू किया गया है। गुरु पूर्णिमा महोत्सव पूरी तरह से महर्षि वेदव्यास को समर्पित है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ माह में मनाने के पीछे बहुत ही सुंदर व्याख्यान है। जो आषाढ़ माह में आसमान में घने-घने काले बादलों का ज्यादा झुंड मौजूद होता है और उन्हीं काले घने बादलों के बीच में चंद्रमा अपनी रोशनी से पृथ्वी को प्रकाशमय करता है। काले घने बादलों का तात्पर्य अज्ञान रूपी शिष्य है और काले घने बादलों के बीच चंद्रमा ज्ञान रूपी गुरु की छवि को व्यक्त करता है। अनेकों प्रकार के शिष्य हो सकते हैं और वे सभी काले घने बादलों के समान ही अज्ञानता से भरे होते हैं और जो व्यक्ति अज्ञान शिष्य को अपने ज्ञान के माध्यम से ज्ञानवान बनाता है, वह केवल गुरु ही हो सकता है। गुरु एक ऐसा जरिया होते हैं, जो अज्ञानता को ज्ञान के प्रकाश में परिवर्तित करने की शक्ति रखता है। जहां पर गुरु और शिष्य का मिलन होता है, वहीं पर सार्थकता होती है। गुरु की महत्वता सदैव बनी रहे और गुरु के बिना किसी भी प्रकार का ज्ञान संभव नहीं है, इन्हीं चीजों के मुख्य बिंदुओं पर गुरु पूर्णिमा के पर्व को आषाढ़ माह मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर्व से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं जैसा कि गुरु पूर्णिमा का महान पर्व पूरी तरह से महर्षि वेदव्यास को समर्पित है तो त्यौहार को महर्षि वेद व्यास के जन्म उत्सव के दिन ही मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त मान्यता है कि इसी शुभ दिवस के अवसर पर आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों को भागवत गीता का ज्ञान प्रदान किया था। इसके अतिरिक्त गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी लोग जानते हैं। महर्षि वेद व्यास को हिंदू धर्म में तीनों कालों का ज्ञाता माना जाता है। महाऋषि वेद व्यास ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदू धर्म के चारों वेदों का विभाजन किया। महर्षि वेद व्यास ने श्रीमद्भागवत गीता की रचना के समेत 18 पुराणों की भी रचना की थी। गुरु पूर्णिमा उत्सव से जुड़ी मान्यताएं हमारे हिंदू धर्म में सनातन धर्म के संस्कृत में गुरु को सदैव पूजनीय माना जाता है। जैसा कि हम सभी लोगों ने पौराणिक कथाएं और कहानियां भी सुनी है, जिसमें स्वयं ईश्वर भी गुरु के समक्ष नतमस्तक रहते हैं। हमारे हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में भगवान ने भी गुरु को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है और यह कहा है कि गुरु का स्थान सबसे ऊंचा है और गुरु की जगह सदैव कोई भी नहीं ले सकता है। माता-पिता भले ही जन्म देते हैं, परंतु किसी भी व्यक्ति को बिना गुरु के किसी भी प्रकार का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। अगर गुरु ना हो तो दुनिया का हर एक इंसान अज्ञानता के अंधेरे में सदैव डूबा रहेगा। गुरु एक ऐसा ज्ञान तब प्रकाश का प्रतीक होता है, जो अंधेरे रूपी अज्ञानता को अपने ज्ञान के जरिए अज्ञानता के अंधेरे को प्रकाशित करता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा जी को गुरु का दर्जा दिया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान ब्रह्मा जी ही सभी जीवो एवं प्राणियों के सृजनकर्ता है और उसी प्रकार से गुरु भी अपने शिष्यों के सृजनकर्ता कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर के दिन ही भगवान शिव ने सभी सप्त ऋषि यों को योग्य विद्या सिखाई थी, जिससे वह आगे चलकर आदि योगी और

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क्यों मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा का त्योहार? नोट कर लें डेट, शुभ मुहूर्त और महत्व

मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु के आशीर्वाद से धन-संपत्ति और सुख-शांति का आशीर्वाद पाया जा सकता है।  सनातन हिंदू परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी उपर माना गया है। गुरु की पूजा के लिए हर साल आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु के आशीर्वाद से धन-संपत्ति और सुख-शांति का आशीर्वाद पाया जा सकता है। इस साल गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई, सोमवार को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व। गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त गुरु पूर्णिमा के दिन इस बार कई शुभ योगों का निर्माण होने जा रहा है। इस दिन ब्रह्म योग और इंद्र योग बनेंगे। हिंदू पंचांग के अनुसार, 2 जुलाई के दिन रविवार की शाम 6 बजकर 2 मिनट पर आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत हो रही है। जबकि यह 3 जुलाई को सोमवार की रात 11 बजकर 8 मिनट पर खत्म हो जाएगी। लेकिन उदयातिथि के अनुसार गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई को मनाई जाएगी। पूजा विधिमान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्यक्ति को स्नान-ध्यान करने के बाद गुरु के पास जाकर उनकी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। यदि आप किसी कारण से अपने गुरु के पास नहीं जा सकते हैं तो आप अपने घर में ही पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनके चित्र का पुष्प, चंदन, धूप, दीप आदि से पूजन करें। इस दिन गुरु वेदव्यास के साथ-साथ शुक्रदेव और शंकराचार्य आदि गुरुओं का भी आवाहन करें और ”गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये” मंत्र का जाप करें। इस साल 59 दिनों का होगा सावन, इस विधि से करें महादेव को प्रसन्न कौन थे महर्षि वेदव्याससनातन धर्म में महर्षि वेदव्यास को प्रथम गुरु का दर्जा प्राप्त है। महर्षि वेदव्यास ने हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण महाकाव्य महाभारत, श्रीमद्भगवतगीता, 18 पूराणों के साथ ही वेदों का भी संकलन किया है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार महर्षि वेदव्यास स्वंय भगवान विष्णु के एक रूप थे। मान्यताओं के अनुसार वेदों को विभक्त करने के कारण उनका नाम वेदव्यास परा था। गुरु पूर्णिमा को वेद व्यास जयंतीगुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा या वेद व्यास जयंती नाम से भी जानते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को हुआ था, इस वजह से इस दिन को व्यास जयंती या व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं. उन्होंने महाकाव्य महाभारत की रचना की थी. गुरु पूर्णिमा के दिन वेद व्यास जी की पूजा करते हैं.

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इस साल 59 दिनों का होगा सावन, इस विधि से करें महादेव को प्रसन्न

अधिमास के कारण 59 दिनों का होगा सावन: महादेव को समर्पित सावन मास में इस बार अधिमास लग रहा है। 19 वर्षों बाद ऐसा संयोग हो रहा है, जब सावन माह में अधिमास लग रहा है। अधिमास के कारण 59 दिनों का होगा सावन: महादेव को समर्पित सावन मास में इस बार अधिमास लग रहा है। 19 वर्षों बाद ऐसा संयोग हो रहा है, जब सावन माह में अधिमास लग रहा है। ऐसे में यह सावन लगभग दो माह 59 दिनों का होगा। पंचांग के अनुसार श्रावन मास की शुरुआत चार जुलाई 2023 से हो रही है और यह 31 अगस्त-2023 को समाप्त होगा। शिव भक्तों को महादेव की उपासना के लिए दो माह का सावन मिलेगा। इस दौरान आठ सोमवारी होगी। सावन 2023 की तिथियां, त्योहार और शिवजी की पूजा से जुड़ी सभी खास बातें, यहां जानें पूजा- विधि सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें। स्नान करने के बाद साफ- स्वच्छ वस्त्र पहन लें। घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। अगर संभव है तो व्रत करें। भगवान भोलेनाथ का गंगा जल से अभिषेक करें। भगवान भोलेनाथ को पुष्प अर्पित करें। भोलेनाथ के साथ ही माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा भी करें। किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है।  भगवान शिव को भोग लगाएं। इस बात का ध्यान रखें भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान शिव की आरती करें।  इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें। शिव पूजा- सामग्री पुष्प, पंच फल पंच मेवा, रत्न, सोना, चांदी, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, कुशासन, दही, शुद्ध देशी घी, शहद, गंगा जल, पवित्र जल, पंच रस, इत्र, गंध रोली, मौली जनेऊ, पंच मिष्ठान्न, बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, बेर, आम्र मंजरी, जौ की बालें,तुलसी दल, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, ईख का रस, कपूर, धूप, दीप, रूई, मलयागिरी, चंदन, शिव व मां पार्वती की श्रृंगार की सामग्री आदि।\

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सावन 2023 की तिथियां, त्योहार और शिवजी की पूजा से जुड़ी सभी खास बातें, यहां जानें

सावन का महीना शिवजी की अराधना के लिए समर्पित होता है. इस बार अधिकमास पड़ने के कारण सावन एक नहीं बल्कि दो महीने का होगा. सावन 4 जुलाई से शुरू होकर 31 अगस्त 2023 को समाप्त होगा. सावन का महीना भगवान शिवजी का प्रिय महीना है और इस पूरे महीने भगवान शिव जी पूजा-अराधना की जाती है और व्रत रखे जाते हैं. लेकिन शिव भक्तों के लिए इस साल सावन का महीना बहुत खास रहने वाला है, जिसमें शिवजी की दोगुनी कृपा बरसेगी. दरअसल इस साल अधिकमास पड़ने के कारण सावन एक नहीं बल्कि दो महीने का होगा और 8 सावन सोमवार के व्रत रखे जाएंगे. ऐसा दुर्लभ संयोग पूरे 19 साल बाद बना हैं जिसमें, सावन पूरे 59 दिनों का होगा. जानते हैं सावन महीने से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें. इस साल क्यों खास रहेगा सावन इस साल सावन महीने की शुरुआत 04 जुलाई से होगी और 31 अगस्त को इसकी समाप्ति होती है. सावन महीने में इस साल पूरे 59 दिनों तक भगवान शिव की उपासना की जाएगी. बता दें कि, अधिकमास लगने के कारण इस साल सावन दो महीने का होगा. इसमें अधिकमास की अवधि 18 जुलाई से 16 जुलाई तक होगी. सावन महीने का आखिर इतना महत्व क्यों सावन वह महीना होता है, जिसमें शिवभक्त भगवान की भक्ति में रम जाते हैं. सावन में पूरे महीने शिवालयों में भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है. मान्यता है कि सावन में किए गए पूजा-व्रत से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है और भगवान अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. खासकर सावन में पड़ने वाले सोमवार का विशेष महत्व होता है. सावन 2023 में कितने सोमवार और कब सावन का पहला सोमवार: 10 जुलाई सावन का दूसरा सोमवार: 17 जुलाई सावन का तीसरा सोमवार: 24 जुलाई (अधिकमास) सावन का चौथा सोमवार: 31 जुलाई (अधिकमास) सावन का पांचवा सोमवार: 7 अगस्त (अधिकमास) सावन का छठवां सोमवार: 14 अगस्त (अधिकमास) सावन का सातवां सोमवार: 21 अगस्त सावन का आठवां सोमवार: 28 अगस्त शिवजी को क्यों प्रिय है सावन का महीना? सावन को शिवजी का प्रिय महीना कहा जाता है. इसे लेकर ऐसी पौराणिक और धार्मिक मान्यता है कि, दक्ष पुत्री माता सती ने अपने जीवन को त्याग कर कई हजार वर्षों तक श्रापित जीवन व्यतीत किया. इसके बाद उनका जन्म हिमालय राज के घर माता पार्वती के रूप में हुआ. माता पार्वती ने भोलेनाथ को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए सावन में कठोर तप किए. इसके बाद भगवान शिव माता पार्वती से प्रसन्न हुए और पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया. इसके साथ ही एक मान्यता यह भी है कि, सावन में भगवान शिव कैलाश छोड़कर धरती पर निवास करते हैं. सावन में शिवजी धरती पर आककर सृष्टि का संचालन करते हैं. इन्हीं कारणों से सावन माह का महत्व और भी बढ़ जाता है. सावन माह 2023 व्रत-त्योहारों की सूची दिनांक दिन व्रत-त्योहार 4 जुलाई मंगलवार सावन मास आरंभ, पहला मंगला गौरी व्रत 6 जुलाई गुरुवार संकष्टी चतुर्थी 11 जुलाई मंगलवार दूसरा मंगला गौरी व्रत 13 जुलाई गुरुवार कामिका एकादशी 14 जुलाई शुक्रवार प्रदोष व्रत  15 जुलाई शनिवार मासिक शिवरात्रि 16 जुलाई रविवार कर्क संक्रांति 17 जुलाई सोमवार सावन मास अमावस्या 18 जुलाई मंगलवार तीसरा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 25 जुलाई मंगलवार चौथा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 29 जुलाई शनिवार पद्मिनी एकादशी 30 जुलाई रविवार प्रदोष व्रत 1 अगस्त मंगलवार पूर्णिमा व्रत,पांचवा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 4 अगस्त शुक्रवार संकष्टी चतुर्थी 8 अगस्त मंगलवार छठा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 12 अगस्त शनिवार परम एकादशी 13 अगस्त रविवार प्रदोष व्रत 14 अगस्त सोमवार मासिक शिवरात्रि 15 अगस्त मंगलवार सातवां मंगला गौरी व्रत (अधिकमास), स्वतंत्रता दिवस 16 अगस्त बुधवार अमावस्या 17 अगस्त गुरुवार सिंह संक्रांति,हरियाली तीज 21 अगस्त सोमवार नाग पंचमी 22 अगस्त मंगलवार आठवां मंगला गौरी व्रत 27 अगस्त रविवार श्रावण पुत्रदा एकादशी 28 अगस्त सोमवार प्रदोष व्रत 29 अगस्त मंगलवार ओणम/थिरुवोणम, नौवां मंगला गौरी व्रत 30 अगस्त बुधवार रक्षा बंधन 31 अगस्त गुरुवार श्रावण पूर्णिमा

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भारत के 10 रहस्यमय मंदिर..

प्राचीनकाल में जब मंदिर बनाए जाते थे तो वास्तु और खगोल विज्ञान का ध्यान रखा जाता था। इसके अलावा राजा-महाराजा अपना खजाना छुपाकर इसके ऊपर मंदिर बना देते थे और खजाने तक पहुंचने के लिए अलग से रास्ते बनाते थे। इसके अलावा भारत में कुछ ऐसे मंदिर भी हैं जिनका संबंध न तो वास्तु से है, न खगोल विज्ञान से और न ही खजाने से इन मंदिरों का रहस्य आज तक कोई जान पाया है। ऐसे ही 10 मंदिरों के बारे में हमने आपके लिए जानकारी जुटाई है। भारत में वैसे तो हजारों रहस्यमय मंदिर हैं लेकिन यहां प्रस्तुत हैं कुछ खास 10 प्रसिद्ध रहस्यमय मंदिरों की संक्षिप्त जानकारी जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। कैलाश मानसरोवर यहां साक्षात भगवान शिव विराजमान हैं। यह धरती का केंद्र है। दुनिया के सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित कैलाश मानसरोवर के पास ही कैलाश पर्वत और आगे मेरू पर्वत स्थित है। यह संपूर्ण क्षेत्र शिव और देवलोक कहा गया है। रहस्य और चमत्कार से परिपूर्ण इस स्थान की महिमा वेद और पुराणों में भरी पड़ी है। कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22,068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है, जो चार धर्मों- तिब्बती धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिन्दू का आध्यात्मिक केंद्र है। कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है- ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज व करनाली। कन्याकुमारी मंदिर समुद्री तट पर ही कुमारी देवी का मंदिर है, जहां देवी पार्वती के कन्या रूप को पूजा जाता है। मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं। प्रचलित कथा के अनुसार देवी का विवाह संपन्न न हो पाने के कारण बच गए दाल-चावल बाद में कंकर बन गए। आश्चर्यजनक रूप से कन्याकुमारी के समुद्र तट की रेत में दाल और चावल के आकार और रंग-रूप के कंकर बड़ी मात्रा में देखे जा सकते हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त कन्याकुमारी अपने सूर्योदय के दृश्य के लिए काफी प्रसिद्ध है। सुबह हर होटल की छत पर पर्यटकों की भारी भीड़ सूरज की अगवानी के लिए जमा हो जाती है। शाम को अरब सागर में डूबते सूरज को देखना भी यादगार होता है। उत्तर की ओर करीब 2-3 किलोमीटर दूर एक सनसेट प्वॉइंट भी है। करनी माता का मंदिर  करनी माता का यह मंदिर जो बीकानेर (राजस्थान) में स्थित है, बहुत ही अनोखा मंदिर है। इस मंदिर में रहते हैं लगभग 20 हजार काले चूहे। लाखों की संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामना पूरी करने आते हैं। करणी देवी, जिन्हें दुर्गा का अवतार माना जाता है, के मंदिर को ‘चूहों वाला मंदिर’ भी कहा जाता है। यहां चूहों को काबा कहते हैं और इन्हें बाकायदा भोजन कराया जाता है और इनकी सुरक्षा की जाती है। यहां इतने चूहे हैं कि आपको पांव घिसटकर चलना पड़ेगा। अगर एक चूहा भी आपके पैरों के नीचे आ गया तो अपशकुन माना जाता है। कहा जाता है कि एक चूहा भी आपके पैर के ऊपर से होकर गुजर गया तो आप पर देवी की कृपा हो गई समझो और यदि आपने सफेद चूहा देख लिया तो आपकी मनोकामना पूर्ण हुई समझो। शनि शिंगणापुर  देश में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर। विश्वप्रसिद्ध इस शनि मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थित शनिदेव की पाषाण प्रतिमा बगैर किसी छत्र या गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजित है। यहां शिगणापुर शहर में भगवान शनि महाराज का खौफ इतना है कि शहर के अधिकांश घरों में खिड़की, दरवाजे और तिजोरी नहीं हैं। दरवाजों की जगह यदि लगे हैं तो केवल पर्दे। ऐसा इसलिए, क्योंकि यहां चोरी नहीं होती। कहा जाता है कि जो भी चोरी करता है उसे शनि महाराज सजा स्वयं दे देते हैं। इसके कई प्रत्यक्ष उदाहरण देखे गए हैं। शनि के प्रकोप से मुक्ति के लिए यहां पर विश्वभर से प्रति शनिवार लाखों लोग आते हैं। सोमनाथ मंदिर  सोमनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। प्राचीनकाल में इसका शिवलिंग हवा में झूलता था, लेकिन आक्रमणकारियों ने इसे तोड़ दिया। माना जाता है कि 24 शिवलिंगों की स्थापना की गई थी उसमें सोमनाथ का शिवलिंग बीचोबीच था। इन शिवलिंगों में मक्का स्थित काबा का शिवलिंग भी शामिल है। इनमें से कुछ शिवलिंग आकाश में स्थित कर्क रेखा के नीचे आते हैं। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। इस स्थान को सबसे रहस्यमय माना जाता है। यदुवंशियों के लिए यह प्रमुख स्थान था। इस मंदिर को अब तक 17 बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे, तब ही शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पद्मचिह्न को हिरण की आंख जानकर धोखे में तीर मारा था, तब ही कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया। इस स्थान पर बड़ा ही सुन्दर कृष्ण मंदिर बना हुआ है। कामाख्या मंदिर कामाख्या मंदिर को तांत्रिकों का गढ़ कहा गया है। माता के 51 शक्तिपीठों में से एक इस पीठ को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह असम के गुवाहाटी में स्थित है। यहां त्रिपुरासुंदरी, मतांगी और कमला की प्रतिमा मुख्य रूप से स्थापित है। दूसरी ओर 7 अन्य रूपों की प्रतिमा अलग-अलग मंदिरों में स्थापित की गई है, जो मुख्य मंदिर को घेरे हुए है।  पौराणिक मान्यता है कि साल में एक बार अम्बूवाची पर्व के दौरान मां भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भगृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर 3 दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। इस मंदिर के चमत्कार और रहस्यों के बारे में किताबें भरी पड़ी हैं। हजारों ऐसे किस्से हैं जिससे इस मंदिर के चमत्कारिक और रहस्यमय होने का पता चलता है। अजंता-एलोरा के मंदिर  अजंता-एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर

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विवाद का कारण क्यों बनती हैं पौराणिक कथाएं

राजनीतिक दायरे में इधर जिस तरह राम को लेकर कहासुनी हुई, उसकी एक परंपरा ही बनती जा रही है..प्रारंभिक समय में पौराणिक कथाएं गाई या सुनाई जाती थीं। लिखने की परंपरा बहुत बाद में आई। वाचक अपनी इच्छा या प्रचलित मान्यताओं के आधार पर उनमें जोड़ना, घटाना करते रहते थे। इसी कारण एक ही पात्र या कथा से जुड़े कई-कई रूप मिलते थे। कईं बार ये परस्पर विरोधी भी हुआ करते थे। इसके बावजूद हम धर्म से जुड़ी हर बात को लेकर आज तक इतने संवेदनशील क्यों हैं? बाल्मीकि रामायण सब रामायणों का मूलाधार है, पर उसमें भी प्रक्षिप्त अंश मिलते हैं। सीता रामायण की प्रमुख और महत्वपूर्ण पात्र हैं। अचरज की बात है कि उनके माता-पिता के बारे में निश्चित और विस्तृत जानकारी न होने के कारण उनके जन्म के विषय में कई कहानियां मिलती हैं। विद्वानों का ध्यान इस विविधता से जन्म लेने वाली समस्या की ओर गया। फादर कामिल बुल्के ने सीता जन्म से जुड़ी प्रत्येक कहानी की पुरातनता और उससे जुड़े महत्व को दृष्टि में रखकर उन कथाओं को क्रम में लगाकर रखना चाहा। जब श्री राम मां चंडी के चरणों में अर्पित करने वाले थे अपना नेत्र, पढ़ें रामायण से जुड़ी यह कथा बाल्मीकि रामायण पर आधारित रामोपाख्यान, हरिवंश रामायण आदि में सीता को ‘जनकस्य कुले जाता’ कहा गया। पर बाल्मीकि रामायण में ही दो जगह उनके चमत्कारी जन्म की कथा भी मिलती है। हो सकता है कि यह बाद में जोड़ी गई हो। पहली के अनुसार सीता को भूमिजा कहा गया और ज्यादातर रामकथाओं ने इसे ही स्वीकार किया। इसके अनुसार राजा जनक पूजा हेतु धरती पर हल चला रहे थे, तभी हल रेखा से एक बालिका मिली, जिसे अपनाकर उन्होंने सीता नाम दिया। बाल्मीकि रामायण के बांग्ला और उत्तर पश्चिमी संशोधित संस्करणों में चमत्कारिक जन्म कथा को विस्तार दिया गया। जन संस्करण में सीता अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया को अपने जन्म की कथा सुनाती हैं। दो अन्य संस्करणों में भी यह कथा काफी लंबी दी हुई है। इसके अनुसार सीता के धरती से निकलने पर आकाश वाणी हुई, ‘जनक, यह बालिका मेनका से उत्पन्न तुम्हारी मानस पुत्री है।’ क्षेमेंद्र की रामायण मंजरी में भी यही कहानी मिलती है। रावण से रिश्ता बाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के सत्रहवें खंड में वेदवती की कहानी मिलती है। इसके अनुसार सीता पूर्वजन्म में लक्ष्मी का अवतार थीं और वे विष्णु को पाने के लिए हिमालय पर तप कर रही थीं। उनके सौंदर्य से अभिभूत रावण उन्हें पाने के लिए जबरदस्ती करता है तो वे खुद को बचाकर उसे श्राप देती हैं कि जल्द ही वे चमत्कारी जन्म लेकर उसे नष्ट करेंगी। इस कथा के कुछ भिन्न रूप श्रीमद् भागवत् पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी मिलते हैं। बाल्मीकि की दूसरी चमत्कारिक कथा में सीता को रावण के नाश हेतु अवतरित होते बताया गया है। ईसा के बाद की 9वीं शताब्दी से आगे तक न केवल भारत वरन् पड़ोसी देशों में भी प्रचलित मान्यता पर आधारित कहानी के अनुसार सीता रावण की पुत्री थीं। भारत, तिब्बत, खोटान, इंडोनेशिया, इंडोचीन आदि में इसका प्रचार हुआ। भारत में यह पहली बार जैन लेखक गुणभद रचित उत्तर पुराण में मिलती है। इस कथा के कई रूप मिले। कुछ में उन्हें मंदोदरी से पैदा बताया गया है, जिसने यह जानकर कि बालिका उनके पति के नाश का कारण बनेगी, उसका त्याग कर दिया था। वह किसानों को मिली, जिन्होंने उसे राजा जनक को दे दिया। 18वीं शताब्दी की कश्मीरी रामायण में भी यहीं कथा मिलती है। जावनी सेरत कांड की कहानी मिलती-जुलती है, पर पालने वाले ऋ षि मेतिली बताए गए हैं। इस कथा में बालिका का नाम सिंता है। इसी समय की स्यामी रामायण में समुद्र में फेंकी गई बालिका को देवता उस दिशा में ले जाते हैं कि वह लंका से मिथिला पहुंचकर जनक को मिलती है। कंबोडिया की रामकथा में लंका से संबंध नहीं जोड़ा है। ये सारी कथाएं गुणभद से प्रेरित कही जा सकती हैं। अद्भुत रामायण के अनुसार सीता ऋ षियों के रक्त से जन्मीं और आनंद रामायण के अनुसार अग्नि से उत्पन्न हुई थीं। दशरथ जातक के अनुसार दशरथ की पहली पत्नी से राम, लक्ष्मण के साथ सीता भी जनमी थीं। जावा की राम कलिंग और मलाया की सेरीराम में भी उन्हें दशरथ पुत्री बताया गया है। पेरिस में फादर बुशे के रखे पत्रों में निहित कहानी के अनुसार केहुमी समुद मंथन से जन्मी थीं। उन्हें वेदमुनि ने पाला था। वे विष्णु से उनका विवाह करना चाहते थे जो तब तक रामेन के रूप में जन्म ले चुके थे। बाद में वे उन्हीं से ब्याही गई थीं। क्या ये विभिन्न कथाएं हमें सीता का अपमान लगनी चाहिए? पौराणिक पात्रों को लेकर कही गई हर बात हमारे यहां विवाद का रूप ले लेती है। कितने अचरज की बात है कि हम अपनी आस्था और ज्ञान के अहंकार में, अपनी मान्यता के गर्व में किसी दूसरे की बात को न सुनना चाहते हैं, न समझना चाहते हैं। जबकि अपने धर्म से जुड़ी हर बात को जानने की जिज्ञासा हममें होनी चाहिए। आस्था और संदेह मनुष्य के लिए आस्था और संदेह, दोनों ही आवश्यक हैं, क्योंकि ये ही हमें अज्ञात मोड़ों से निकालते हैं। विदेशों तक फैली कथाएं हमारे पौराणिक नायकों का आदर करती हैं। अगर कभी वे किसी चरित्र को लेकर जिज्ञासा व्यक्त करती हैं तो इसे उसका अनादर नहीं समझा जाना चाहिए। इन भिन्न कथाओं को पढ़कर हम एक अलग सोच से रूबरू होते हैं। धर्म का मूल एक अच्छी सोच में ही निहित है। व्यक्ति धामिर्क हो या धर्मनिरपेक्ष, अभिजन साहित्य का प्रेमी हो या लोक साहित्य का, यदि वह वास्तव में ज्ञान पिपासु है तो खुली दृष्टि से सब कुछ देखने-सुनने की कोशिश करेगा। सही यह होगा कि जो उसको अच्छा लगे उसे ग्रहण करे और जो अच्छा नहीं लगे, उसे छोड़ दे। इतना ही ठीक है। किसी अलग कथा या व्याख्या पर प्रहार करना अथवा उसे तोड़ना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

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