जब श्री राम मां चंडी के चरणों में अर्पित करने वाले थे अपना नेत्र, पढ़ें रामायण से जुड़ी यह कथा

 दुर्गा मां की यह कथा रामायण से जुड़ी हुई है। जब लंकापति रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया था। तब ब्रह्मा जी ने रावण का वध करने के लिए श्री राम को मां चंडी की पूजा करने का सुझाव दिया था। दुर्गा मां की यह कथा रामायण से जुड़ी हुई है। जब लंकापति रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया था। तब ब्रह्मा जी ने रावण का वध करने और लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए श्री राम को मां दुर्गा के स्वरूप मां चंडी की पूजा करने का सुझाव दिया था। इस पूजा के लिए श्री राम को मां को 108 नीलकमल के पुष्प अर्पित करने थे। ब्रह्मा जी का सुझाव मानकर श्री राम ने मां चंडी का आह्वान शुरू किया और 108 नीलकमल के फूल मंगवा लिए। जब यह बात रावण को पता चली तो उसने इस पूजा में खलल डालने की कोशिश और अपनी माया से एक नीलकमल गायब कर दिया। पृथ्वी पर कलयुग का आगमन कैसे हुआ और क्यों हुआ मां चंडी की पूजा करते समय जब श्री राम को एक नीलकमल का पुष्प गायब होने की बात का पता चला तो श्री राम को लगा कि उनकी पूजा सफल नहीं होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि नीलकमल का फूल बेहद दुर्लभ है और आसानी से पाया नहीं जाता है। लेकिन बाद में उन्हें याद आया कि उनके भक्त उन्हें नीलकमल से संबोधित कते हैं। ऐसे में श्री राम ने मां चंडी को नीलकमल की जगह अपना नेत्र अर्पित करने का ​फैसला किया। श्री राम ने एक-एक कर 107 नीलकमल के पुष्प मां चंडी को अर्पित कर दिए। आखिरी फूल अर्पित करने के लिए उन्होंने अपने तरकश से तीर निकाला और अपनी आंख निकालकर मां के चरणों में चढ़ाने का फैसला लिया। श्री राम तीर से अपना नेत्र निकालने की जा रहे थे कि तभी मां जगदम्बा उनके समक्ष प्रकट हुईं। मां ने कहा कि वो उनकी पूजा से बेहद प्रसन्न हैं। ऐसे में श्री राम को उनका नेत्र अर्पित करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद मां जगदम्बा ने श्री राम को लंका विजय का आशीर्वाद प्रदान किया। फिर श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त कर रावण का वध किया और माता सीता को बंधनमुक्त कराया। 

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पृथ्वी पर कलयुग का आगमन कैसे हुआ और क्यों हुआ

हमारे पुराणों में चार युगों का वर्णन मिलता है सतयुग, त्रेतायुग. द्वापरयुग और कलयुग। कलयुग को एक श्राप कहा जाता है। पर क्या आपको पता है कि इस पृथ्वी पर कलयुग कैसे आया और कैसे हुई थी पृथ्वी पर कलयुग का शुरुआत? चलिए आज आपको हम बताते हैंक्या हम सब ने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि ऐसे क्या कारण रहे होंगे जिसके चलते कलयुग को धरती पर आना पड़ा। कलयुग का प्रभाव पृथ्वी पर जब दिखना शुरू हुआ जब महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो ने अपना राजपाठ अर्जुन के बेटे, परीक्षित को सौप कर स्वर्ग की ओर चले गए। वही भगवान श्री कृष्ण भी मानव शरीर त्याग कर वैकुण्ठ लोक चले गए। पांडवो और भगवान श्री कृष्ण के जाने के बाद कलियुग ने प्रभाव दिखाना शुरू किया। कलयुग की की शुरुआत कैसे हुई कलयुग की शुरुआत एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है। जिसके अनुसार एक बार राजा परीक्षित भ्रमण करने निकले थे रास्ते में उन्होंने देखा, कलि (कलि के युग को ही कलियुग कहते हैं) एक बैल को मार रहा है, उस बैल का एक टांग ही है। यह बैल धर्म था। यह देख राजा परीक्षित को काफी क्रोध आया कलि को मारने दौड़े। कलि(कलयुग) राजा परीक्षित को आते देख डर गया और राजा परीक्षित से रहम की मांग करने लगा। इस पर राजा परीक्षित ने दया दिखाते हुए कहा कि “तू मेरे राज्य से निकल जा और कही और जा कर रह”। ये सुन कलि(कलयुग) ने कहा की “पूरे धरती पर आपका ही राज है, मैं धरती छोड़ का कहाँ जाऊ”। इस बात पर राजा परीक्षित ने दया दिखाते हुए कहा “जहां अधर्म, चोरी, झूठ हो वहां चले जा और वहां जाकर रह”।लेकिन इन सब स्थानों से कलि(कलयुग) को संतुष्टी नहीं हुई और एक बेहतर जगह मांगने लगा। इस पर राजा परीक्षित ने कलि (कलयुग) को सोने में रहने के लिए कह दिया। यह सुन कलि(कलयुग) काफी खुश हो गया और मान गया। कलि (कलयुग) ने मौका देखकर राजा के सोने के मुकुट में प्रवेश कर लिया। इससे राजा परीक्षित की मानसिक क्षमता (मति) ख़राब हो गयी। राजा परीक्षित के मस्तिस्क में नकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगे। राजा परीक्षित ने पास में गुजर रहे एक सांप को मार दिया और उसे ध्यान लगा कर बैठे, एक साधू के गले में डाल दिया। साधू ने जब अपनी आँखे खोली तो उसने अपने गले में मारा हुआ सांप देखा। यह देख साधू को राजा परीक्षित पर काफी क्रोध आया। साधू ने तुरंत राजा परीक्षित को श्राप दिया कि “तेरी मौत आज से सातवे दिन हो जाएगी”।राजा परीक्षित वापस राजमहल आये और माथे से सोने का मुकुट उतारा। सोने का मुकुट उतारते ही उन्हें आपकी गलती का एहसास हुआ। एहसास होते ही राजा परीक्षित दौड़े-दौड़े साधू के पास गए और क्षमा याचना करने लगे। इसपर साधू ने कहा दिया हुआ श्राप वापस नहीं हो सकता लेकिन तुम्हारे पास सात दिन है। इन सात दिनों में जितना अच्छा कर्म कर सकते हो कर लो। इसके बाद राजा परीक्षित वापस राजमहल आ गए और सात दिन बात राजा परीक्षित की मौत हो गयी। राजा परीक्षित के मरने के बाद कलियुग ने पूरे धरती को अपनी चपेट में ले लिया और हर तरफ पाप और अधर्म करने लगा। फिर इसी तरह से कलयुग का आगमन धरती पर हुआ कितने वर्षो का होगा कलयुग वैदिक आलेख के अनुसार चार युग होते हैं।सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग। हिन्दू सनातन धर्म के अनुसार हर चार युग बाद ब्रह्माण्ड में जीवन बनता है और नष्ट होता है। सत्ययुगसतयुग चार युगों में से धरती पर पहला युग था। इस युग में बुराई , झूठ ,क्रोध ,वासना और अहंकार नहीं था। नहीं थे। इस युग में ना किसी को कोई बीमारी थी ना किसी को कोई दुख था। कहा जाता है कि सतयुग में मानव अपनी इच्छा से मृत्यु प्राप्त करता था। सतयुग का कुल समय 17,28,000 मानव वर्ष का था। सत्ययुग में मानव का औसत जीवनकाल 1,00,000 वर्ष होता था। सतयुग में धर्म के चार पांव थे। इस युग का अंत भगवान परशुराम के जन्म के बाद हुआ। त्रेतायुगसतयुग के बाद त्रेतायुग आया। इस यूग में राज्यों और प्रान्तों का जन्म हुआ कई राजा दुसरे देशो परआक्रमण कर उसे जीत कर अपना बल और प्रभुत्व दिखाते थे। इस युग में धर्म के तीन पांव रह गए थे। एक चौथाई लोग बुराई, पाप और हिंसा करने लगे थे। इस युग में मनुष्य के कद की लम्बाई 21 फीट रह गयी थी। त्रेतायुग का कुल समय 12,96,000 मानव वर्ष का था। त्रेतायुग में मानव का औसत जीवनकाल 10,000 वर्ष होता था। भगवन राम का जन्म इसी युग में हुआ था। द्वापरयुगत्रेतायुग युग के बाद तीसरा युग द्वापरयुग था। इस युग में लालच, क्रोध, झूठ फ़ैल गया था। इस युग में मनुष्य के कद की लम्बाई 12 फीट रह गयी थी। इस युग में धर्म के दो पांव रह गए थे। द्वापरयुग का कुल समय 8,64,000 मानव वर्ष का था। द्वापरयुग में मानव का औसत जीवनकाल 1000 वर्ष होता था। द्वापरयुग में ही भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था और महाभारत भी इसी युग में हुआ था। कलियुगकलियुग चौथा और अंतिम युग है। इस युग में अधर्म अपने चरम पर पहुंच जाएगा। इस युग में देवता मात्र 10000 वर्षो तक ही धरती पर रहेंगे इसके बाद देवता भी धरती से चले जाएंगे। इस युग में धर्म के एक पांव रह गए है। कलियुग का कुल समय 4,32,000 मानव वर्ष का होगा। अभी कलयुग के मात्र 5000 वर्ष ही पूरे हुए हैं। कलियुग में मानव का औसत जीवनकाल 100 वर्ष होता है।जैसे जैसे कलियुग बढ़ता जायेगा वैसे पाप, क्रोध, लालच, हिंसा, वासना, स्वार्थ, बुराई बढती जाएगी और अच्छे कर्म जैसे की दया, क्षमा, सत्य, धर्म ख़त्म होते जायेंगे। जब घोर कलियुग आएगा तब मनुष्य की आयु मात्र 12 वर्षो की रह जाएगी और मनुष्य का आकार घटकर मात्र 4 इंच की रह जाएगी। इस युग का अंत भगवान विष्णु द्वारा कल्कि के अवतार में होगा जो बुराई का अंत करेंगे। कलियुग ख़त्म होने के बाद फिर से एक नए सतयुग की शुरुआत होगी।

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29 जून को देवशयनी एकादशी, जानें क्यों इस बार 5 माह का होगा चातुर्मास

देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास से जाने देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व, मुहूर्त उपाय और इसके नियम आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं. इस साल देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा करने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है. देवशयनी एकादशी के दिन से ही जगत के पालनहार भगवान विष्णु का निद्राकाल शुरू हो जाता है, यानी इसी दिन से चतुर्मास की शुरुआत होती है. चतुर्मास शुरू होने के बाद से सारे शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. 5 माह का होगा चातुर्मास देवशयनी एकादशी से चार माह तक भगवान विष्णु देवोत्थानी एकादशी तक के लिए योग निद्रा में चले जाएंगे. फिर वे देवउठनी एकादशी को योग निद्रा से बाहर आएंगे, तब चातुर्मास का समापन होगा. देवउठनी एकादशी 23 नवंबर को है। इस तरह से चातुर्मास 30 जून से लगेगा और 23 नवंबर को खत्म हो जाएगा. इस बार श्रावण पुरुषोत्तम मास होने की वजह से दो माह तक है, इसलिए चातुर्मास की अवधि पांच माह होग. इस दौरान सभी मांगलिक कार्य बंद रहेंगे. हिंदू धर्म में चातुर्मास का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ माह से शुरू होती है और कार्तिक की एकादशी के दिन खत्म होते हैं. योग निद्रा से कब जागेंगे देव ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चार माह की निद्रा के बाद कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को जब भगवान विष्णु योग निद्रा से उठते हैं तब फिर से सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं. इस बार चातुर्मास चार माह की बजाय पांच माह तक रहेंगे. देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के अलावा कुछ उपाय करने से जीवन में खुशियां आती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हैं. इन चार महीनों में सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. चातुर्मास में ये कार्य हैं वर्जित इस दौरान मुंडन, उपनयन संस्कार, विवाह इत्यादि जैसे महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं. मान्यता है कि भगवान विष्णु के शयनकाल में मांगलिक कार्य करने से व्यक्ति को उनका आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है, जिस वजह से विघ्न उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा. यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी का महत्व ज्योतिषाचार्य ने बताया कि देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व होते हैं. देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु के आराम का समय है, यानी एक दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए शयन करने के लिए चले जाते हैं. इसी के साथ इस दिन से चातुर्मास का आरंभ भी हो जाता है. ऐसे में अगले 4 महीने तक कोई भी शुभ कार्य का आयोजन करना वर्जित माना जाता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा, यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी पूजा मुहूर्त ज्योतिषाचार्य ने बताया कि पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 29 जून 2023 सुबह 03:18 मिनट पर होगा और इस तिथि का समापन 30 जून सुबह 02:42 मिनट पर हो जाएगा. पूजा तिथि के अनुसार, देवशयनी एकादशी व्रत गुरुवार 29 जून 2023 को रखा जाएगा. इस विशेष दिन पर रवि योग का निर्माण हो रहा है, जो सुबह 05:26 मिनट से दोपहर 04:30 मिनट तक रहेगा. भगवान शिव करेंगे सृष्टि का संचालन ज्योतिषाचार्य ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के विश्राम करने से सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं. इस दौरान सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, बस विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्य नहीं होते हैं. इस दौरान भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करना चाहिए. 5 महीने नहीं बजेगी शहनाई ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चतुर्मास का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार चतुर्मास आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि तक रहता है. साल 2023 में चतुर्मास 29 जून से शुरू होगा, इस दिन देवशयनी एकादशी भी है. 23 नवंबर 2023 को देवोत्थान एकादशी है। कहा जाता है कि इस दिन से भगवान विष्णु विश्राम काल पूरा करने के बाद क्षीर सागर से निकल कर सृष्टि का संचालन करते हैं. देवशयनी और देवउठनी एकादशी ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस साल 29 जून को देवशयनी एकादशी और 23 नवंबर को देव उठनी एकादशी रहेगी, इसलिए चातुर्मास 148 दिनों का रहेगा। इन दिनों में भगवान विष्णु योग निद्रा में रहेंगे. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इस अवधि में सृष्टि को संभालने और कामकाज संचालन का जिम्मा भगवान भोलेनाथ के पास रहेगा. इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकेंगे पर विवाह समेत मांगलिक काम नहीं होंगे. चतुर्मास में नहीं होते विवाह ज्योतिषाचार्य ने बताया कि भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा जाता है। श्रीहरि के विश्राम अवस्था में चले जाने के बाद मांगलिक कार्य जैसे- विवाह, मुंडन, जनेऊ आदि करना शुभ नहीं माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान मांगलिक कार्य करने से भगवान का आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है। शुभ कार्यों में देवी-देवताओं का आवाह्न किया जाता है। भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, इसलिए वह मांगलिक कार्यों में उपस्थित नहीं हो पाते हैं। जिसके कारण इन महीनों में मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। पाताल में रहते हैं भगवान ज्योतिषाचार्य ने बताया कि ग्रंथों के अनुसार पाताल लोक के अधिपति राजा बलि ने भगवान विष्णु से पाताल स्थिति अपने महल में रहने का वरदान मांगा था, इसलिए माना जाता है कि देवशयनी एकादशी से अगले 4 महीने

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देवों के राजा होने के बावजूद क्यों नहीं होती देवराज इंद्र की पूजा, जानिए रोचक कथा

हिंदू धर्म में 33 करोड़ (कोटि) देवी-देवताएं हैं। सभी देवी-देवताओं से जुड़ी कथा-कहानियां पौराणिक ग्रंथों में मिलती है। देवराज इंद्र की बात करें तो उन्हें देवताओं का राजा कहा जाता है। लेकिन इंद्र देवताओं की एक पदवी होती है। हिंदू धर्म में प्रमुख देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और मंदिर भी होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों इंद्र देव की पूजा नहीं की जाती और ना ही इंद्र देव की पूजा के लिए कोई मंदिर बनवाए गए हैं। कहा जाता है कि एक श्राप के कारण इंद्र देव की पूजा नहीं की जाती है। जानते हैं इस रोचक कहानी के बारे में विस्तार से.. आखिर क्यों नहीं होती देवराज इंद्र की पूजा पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के कारण इंद्र देव की पूजा नहीं की जाती है। शुरुआत में इंद्र देव की पूजा ‘इंद्रोत्सव’ नाम से पूरे उत्तर भारत में होती थी। इस अवसर पर बड़े त्यौहार का आयोजन भी किया जाता था। लेकिन भगवान कृष्ण के कारण इंद्र की पूजा पूरी तरह से बंद हो गई। इंद्र की पूजा के बजाय गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र देव की पूजा बंद कराने के लिए स्वर्ग में सभी देवी-देवताओं से निवेदन किया। भगवान श्री कृष्ण का मानना था कि ऐसे व्यक्ति की पूजा कभी नहीं करनी चाहिए जो ना ही ईश्वर है और ना ईश्वर के समान। जब इंद्र देव को पूजा बंद होने की बात का पता चला तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने तुरंत बादलों को आदेश दिया कि ऐसी वर्षा करो कि बृजवासी पूरी तरह से डूब जाए और उनसे क्षमा मांगने पर विवश हो जाए। इंद्र के आदेश पर ऐसी ही वर्षा हुई और इससे बृजवासी परेशान हो गए। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया और सभी बृजवासियों को गोवर्धन पर्वत के नीचे आने को कहा। इस तरह के बृजवासियों पर वर्षा का कोई असर नहीं हुआ और इंद्र का अभिमान भी टूट गया। इंद्र देव को मिला था 100 योनियों का श्राप इंद्र के चित्रों में उनके शरीर पर असंख्य आंखें दिखाई देती है। दरअसल ये आंखें गौतम ऋषि द्वारा मिले श्राप का परिणाम है। पद्ममपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार, इन्द्र स्वर्गलोक में अप्सराओं के साथ कामवासना से घिरे रहते थे। एक दिन जब वे धरती पर विचरण करने आए तो उन्होंने एक कुटिया के बाहर गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या को देखा। अहिल्या सुंदर और रूपवती थी, जिसे देखते ही इंद्र उनपर मोहित हो गए। छलपूर्वक अहिल्या को पाने के लिए  इंद्र ने अपनी माया से रात को सुबह जैसे वातावरण में बदल दिया। गौतम ऋषि को लगा कि सुबह हो गई और वे कुटिया से निकलकर स्नान और पूजा-पाठ के लिए बाहर चले गए। उनके जाते इंद्र गौतम ऋषि का वेश धारण कर कुटिया में चले गए। अहिल्या इंद्र को गौतम ऋषि के वेश में देख पति समझ बैठी। गौतम ऋषि ने नदी में आसपास का वातावरण देखा जिससे उन्हें अनुभव हुआ कि अभी सुबह नहीं हुई है और वो अपनी कुटिया की तरफ लौट गए। कुटिया लौटते ही उन्होंने देखा कि उनके वेश में कोई दूसरा पुरुष उनकी पत्नी के साथ रति क्रियाएं कर रहा है।  गौतम ऋषि ने क्रोध में आकर पत्नी अहिल्या को जीवनभर पत्थर की शील बनने का श्राप दे दिया। उन्होंने इंद्र से कहा कि तुमने यह सब केवल एक स्त्री की योनि पाने के लिए किया। तुम्हें योनि की इतनी लालसा है, तो तुम्हें वही मिलेगी। तब ऋषि ने इंद्र को हजार योनियों का श्राप दे दिया और इंद्र के शरीर पर हजार योनियां निकल आई। लेकिन इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने गौतम ऋषि से क्षमा मांगी। फिर गौतम ऋषि ने उन योनियों को आंखों में बदल दिया। यही कारण है कि इंद्र की अधिकतर तस्वीरों पर असंख्य आंखें दिखाई देती है।

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कलयुग में देवताओं के राजा इंद्र की पूजा क्यों नहीं होती है?

पौराणिक कथा के अनुसार जो स्वर्ग लोक के सिंहासन पर विराजमान होते और स्वर्ग का शासन करते हैं उन्हें इंद्रदेव के नाम से जाना जाता है. ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी स्वर्ग लोक के सिंहासन पर बैठता था उसे हमेशा स्वर्ग के सिंहासन को खोने का डर सताते रहता था इसलिए वह हमेशा स्वर्ग की अप्सरा रंभा, उर्वशी जैसी अप्सरा को तापस्वी के पास भेज कर उसकी तपस्या को भंग करवा देता था और राजाओं के युद्ध के अश्वमेघ घोड़े को चुरा लेता था.ऐसा माना जाता है कि अब तक कुल 14 इंद्र हो चुके हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- यज्न, विपस्चित, शीबि, विधु, मनोजव, पुरंदर, बाली, अद्भुत, शांति, विश, रितुधाम, देवास्पति और सुचि। तो चलिए है अब जानते कि कलयुग में देवताओं के राजा इंद्र की पूजा क्यों नहीं होती है? कलयुग में देवताओं के राजा इंद्र की पूजा क्यों नहीं होती है? हिंदू धर्म ग्रंथ में चार युगों का वर्णन किया गया है सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलयुग. भगवान श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में हुआ था,पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के बृज में अवतार लेने से पहले यहां इंद्र उत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता था. प्रत्येक साल इंद्र देव की पूजा की जाती है इंद्र उत्सव पूजा के अवसर पर बड़े ही मेले का आयोजन किया जाता था.परंतु जब श्री कृष्ण बड़े हुए तो उन्होंने देखा कि बृजवासी बड़े ही धूमधाम से इंद्र की पूजा कर रहे हैं. उन्होंने बृजवासी से कहा कि आप लोग किसी ऐसे व्यक्ति की पूजा क्यों करते हैं जो ना तो ईश्वर है ना ही ईश्वरतुल्य इसलिए आप लोग इंद्र की पूजा अब से नहीं करेंगे, गोवर्धन पर्वत और देवराज इंद्र की कथा इस पूजा के वजाइ गोवर्धन पूजा और उस गाय पूजा करने के लिए बोला,गाय से हम सभी का जीवन चलता है. यह सुनकर पहले तो ब्रिज वासियों ने कहा कि अगर हम लोग देवराज इंद्र की पूजा करने छोड़ दिया तो वे क्रोधित हो जाएंगे और फिर हमारे यहां वर्षा भी नहीं होगी,ऐसे में हम अपने गायों को चारा कैसे खिलाएंगे. तब श्री कृष्ण ने कहा इसीलिए हम क्यों ऐसे देवता की पूजा करते हैं जो हमें भय दिखाता है, हम सभी को किसी से डरने की जरूरत नहीं है,अगर हमें चढ़ावे और पूजा का आयोजन करना ही है तो गोपोत्सव मनाएंगे इंद्रत्सव नहीं. ऐसी भी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र देव की पूजा बंद कराने के लिए स्वर्ग में सभी देवी देवताओं से निवेदन किया. जब यह सभी बातें इंद्रदेव को पता चली तो वह क्रोधित हो गए उन्हें तुरंत अपने प्रलयकालीन बादलों को आदेश दिया की ब्रिज में ऐसी वर्षा करो कि बृजवासी पूरी तरह डूबने लगे और हम से माफी मांगने पर विवश हो जाए और फिर से मेरी पूजा करने लगे. इंद्र के आदेश पर भयंकर वर्षा होने लगी और इससे बृजवासी डरने लगे,तब भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया और सभी ब्रिज वासियों को गोवर्धन पर्वत के नीचे आने को कहा. सभी बृज वासियों ने ऐसा ही किया और इस प्रकार उन पर बादलों और वर्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ा.इस प्रकार इंद्र का अहंकार चूर-चूर हो गया.उसके बाद भगवान श्री कृष्ण और इंद्र देव के बीच युद्ध भी हुआ,जिसमें इंद्रदेव पराजित हुए और तभी से बृज में इंद्र देव की पूजा बंद हो गई और गोवर्धन पर्वत की पूजा होने लगी. देवराज इंद्र की पूजा नहीं होने की दूसरी कथा वहीं दूसरी कथाओं के अनुसार इंद्र के शरीर पर जो असंख्य नेत्र दिखाई देते हैं दरअसल यह आंखें गौतम ऋषि द्वारा दिए गए श्राप के परिणाम है. पौराणिक कथाओं के अनुसार पुराने समय में धरती लोक पर एक गौतम ऋषि हुआ करते थे वो बड़े ही ज्ञानी और योगी पुरुष थे. वह एक जंगल में अपनी पत्नी के साथ कुटिया बनाकर रहा करते थे,उनकी पत्नी का नाम अहिल्या था, अहिलया अत्यंत ही सुंदर होने के साथ-साथ एक पतिव्रता स्त्री थी. जो भी अहिल्या को देखता वह उनकी सुंदरता पर मोहित हो जाता. पद्म पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार इंद्र स्वर्गलोक में अप्सराओं के साथ हमेशा घिरे रहते थे. एक दिन जब वे धरती पर विचरण करने के लिए आए तो उन्होंने एक कुटिया के बाहर गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या को देखा. अहिल्या अपने कुटिया में अपने पति गौतम ऋषि की सेवा कर रही थी. ज़ब इंद्रदेव वहां से गुजरे तो वह अहिल्या को देखकर उन पर मोहित हो गए. अब इनके मन में देवी अहिल्या को पाने की लालसा जग गया, हालांकि उस समय इंद्रदेव धरती लोग से स्वर्ग लौट आए उनका मन अहिल्या पर ही बना रहा,सोचने लगे कि उस पर ऐसा क्या किया जाए कि एक पतिव्रता स्त्री उन पर आसानी से अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे. देवी अहिल्या को पाने के लिए उन्होंने छल के सहारा की योजना बनाई,उन्हें ज्ञात हुआ कि प्रत्येक सुबह गौतम ऋषि ध्यान करने के लिए अपने कुटिया के बाहर जाते हैं,तब  अहिल्या को पाया जा सकता है. गौतम ऋषि अहिल्या और इंद्र की कथा इंद्रदेव ने अपनी देवी शक्ति का सहारा लेकर अपनी माया से रात को सुबह जैसे वातावरण में बदल दिया. गौतम ऋषि को लगा कि सुबह हो गई और वह स्नान और पूजा पाठ के लिए बाहर चले गए,अब इंद्रदेव उनका रूप धारण कर कुटिया में प्रवेश किए,और अहिल्या के पास पहुंचे. यह देखकर पहले अहिल्या ने सोचा कि मेरे प्रभु आज इतनी जल्दी कैसे आ गए. लेकिन उन्होंने गौतम ऋषि के रूप में इंद्र से कोई सवाल नहीं किया और उनकी सेवा करने लगे. ज़ब गौतम ऋषि ने नदी के आसपास के वातावरण देखा तो उन्हें अनुभव हुआ कि अभी सुबह नहीं हुआ है और वह अपनी कुटिया की तरफ लौट चले. कुटिया में लौटते ही उन्होंने देखा कि उनके वेश में एक दूसरा पुरुष उनकी पत्नी के साथ है,उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि यह बहरूपिया और कोई नहीं बल्कि स्वर्ग के राजा इंद्र देव हैं जिन्होंने उनके साथ छल किया है. यह देखते ही वह आग बबूला हो गए और इसी गुस्से में उन्होंने देवराज इंद्र को श्राप दे दिया. उन्होंने इंद्र से कहा कि तुमने यह

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भगवान ब्रह्मा द्वारा बनाई गई इस सृष्टि की अद्भुत पौराणिक कथा

हिंदू धर्म के कुछ संप्रदाय पूरी सृष्टि और उसकी ब्रह्मांडीय गतिविधि को तीन देवताओं के प्रतीक के रूप में देखते हैं, जो हिंदू त्रिमूर्ति का गठन करते हैं: ब्रह्मा – निर्माता, विष्णु – पालनकर्ता, और शिव– संहारक। पौराणिक कथाओं के अनुसार संपूर्ण विश्व के निर्माण से पूर्व, दूध का केवल एक सफेद समुद्र मौजूद था, जिसे क्षीरसागर कहा जाता है। क्षीरसागर पर तैरता एक कमल का फूल था, जिसकी फीकी गुलाबी पंखुड़ियों के भीतर सो रहे थे विश्व के निर्माता, भगवान ब्रह्मा। जब भगवान ब्रह्मा सो रहे थे, तब कुछ भी नहीं था। न पृथ्वी और न आकाश, न प्रकाश या अंधकार, न अच्छा या बुरा, न मनुष्य या पशु। ब्रह्मांड बिल्कुल मौजूद नहीं था। शांत, खामोश, क्षीरसागर के अलावा कुछ भी नहीं था। इस ब्रह्मांड में जीवन तभी शुरू हुआ जब भगवान ब्रह्मा जाग गए।दस हजार साल बीत गए, एक अनंत काल बीत गया, लेकिन जब अचानक क्षीरसागर की शांत सतह कांपने लगी, तब भगवान ब्रह्मा ने अपनी आँखें खोली थीं। जब उन्होंने अपने चारों ओर देखा और कुछ नहीं पाया, उन्हें काफी खाली और अकेलापन महसूस हुआ। उनकी आँखों में बड़े-बड़े आँसू छलक पड़े। जब वे आँसू क्षीरसागर में गिरे तो उन्होंने पृथ्वी का रूप लिया और जिन आंसुओं को ब्रह्मा जी ने पौंछ दिया, वे वायु और आकाश बन गए। फिर वे खड़े हुए और स्वयं को तब तक खिंचा जब तक उनका शरीर ब्रह्मांड नहीं बन गया। वह बाईं ओर फैले और आकाश में सूर्य, चंद्रमा और सभी सितारों का निर्माण किया। उन्होंने इधर और उधर स्वयं को फैलाया और शुष्क मौसम और तूफानी मौसम, आग, हवा और बारिश का निर्माण किया। और फिर उन्होंने देवताओं को बनाया। सबसे पहले उन्होंने प्रकाश के देवता की रचना की। वे सुंदरता और अच्छाई से सुसज्जित थे, और उनके दोस्त देवदूत, संत, परी और अप्सरा थे।फिर उन्होंने असुरों, अंधकार के देवता, की रचना की। उनके दोस्त भूत, दानव और नाग थे। और इसलिए उन्होंने मित्र और शत्रु दोनों बनाए, क्योंकि देवता और असुर शत्रु होने के लिए बनाए गए थे। साथ ही उन्होंने बताया कि क्षीरसागर में अमृत नाम का एक चमत्कारी पदार्थ मौजूद है, जो भी उसे ग्रहण करता है, वह हमेशा के लिए अमर हो जाएगा। देव और असुर दोनों अमृत चाहते थे, लेकिन वे इसे समुद्र मंथन करके और मक्खन में बदलकर ही प्राप्त कर सकते थे। लेकिन उन्हें ऐसा मंथन कहां मिलेगा जो कार्य के लिए पर्याप्त शक्तिशाली हो? तभी असुर और देव मिलकर क्षीरसागर का मंथन करने के लिए मंथन और शक्तिशाली रस्सी की खोज करने लगे। देवों ने एक दिशा में खोज की और मंदरा नामक पर्वत को पाया, जो समुद्र से बाहर निकल रहा था। उन्होंने पर्वत को मंथन के लिए उपयोग करने का विचार किया और असुरों को सहायता करने के लिए बुलाया। हालांकि पर्वत इतना विशाल था कि कई देव और असुर थक गए और कई की जान भी चली गई। इस दृश्य को देख विष्णु भगवान ने सहायता करने का विचार किया। और क्षीरसागर के बीच पर्वत को रखा। वहीं मंथन की रस्सी के रूप में उन्होंने वासुकी (सबसे विशाल नाग) का उपयोग किया। असुरों ने सर्प का सिर, देवों ने पुंछ को पकड़ा और मंथन करना आरंभ किया। कई वर्षों के बाद मंथन से सबसे पहले एक भयंकर विष निकला, इस विष में संपूर्ण विश्व को समाप्त करने की शक्ति मौजूद थी। इसलिए भगवान शिव द्वारा उस विष का सेवन कर लिया गया और देवी पार्वती ने उस विष को भगवान शिव के कंठ में रोक दिया। इसके बाद अन्य कई वर्षों की कठोर मंथन के बाद क्षीरसागर से कई अद्भुत चीजें निकली, जिन्हें देवों और असुरों ने समान रूप से बिना लड़े बाँट दिया। लेकिन जैसे ही अमृत निकला, दोनों पक्षों में तीखी नोकझोंक होने लगी। तभी एक राक्षस ने देवदूत से प्याला छीन लिया, तुरंत अमृत की कुछ बूंदों को अपने मुंह में डाल दिया। हालांकि ब्रह्मा असुरों को अमर होने नहीं देना चाहते थे, तो इसलिए भगवान विष्णु ने तुरंत ही उनका गला काट दिया। वह राक्षस राहू था, और तब राहू की गर्दन से ऊपर का भाग चंद्रमा और सूर्य के चारों ओर पीछा करता रहता है, और कभी-कभी वह एक को निगल जाता था और पृथ्वी को अंधेरे में डुबो देता था। राहू का केवल गर्दन से ऊपर का हिस्सा अमर हो पाया था। और इसलिए दुनिया बनाई गई; अच्छाई और बुराई, प्रकाश और अंधकार, देवों और असुरों के बीच युद्ध शुरू हो गया था। इसलिए यह तब तक चलता रहेगा जब तक कि भगवान ब्रह्मा थक नहीं जाएंगे और एक बार फिर अपनी आँखें बंद नहीं कर लेते हैं। तब ब्रह्मांड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, सिवाय क्षीरसागर, एक कमल के फूल, और गहरी नींद में सृष्टि के भगवान के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

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सृष्टि उत्पत्ति का क्रम क्या है जाने पौराणिक कथा

कुछ लोग मानते हैं कि ईश्वर या परमेश्वर ने ब्रह्मांड या सृष्टि को छ दिन में रचा और सातवें दिन उसने आराम किया। धरती पर उसने सबसे पहले मानव को रचा और उसकी ही छाती की पसली से एक स्त्री को रचा। लेकिन क्या यह कहानी सच है? वैज्ञानिक शोध कतई इस तरह की कहानी को सच नहीं मान सकते। सृष्टि उत्पत्ति और विकास में क्रमविकास और कार्य-कारण का सिद्धांत कार्य करता है। वेदों में सृष्टि रचना को वैज्ञानिक तरीके से समझाया गया है। वेदों में ब्रह्मांड उत्पत्ति का जो सिद्धांत है विज्ञान आज उसके नजदिक पहुंच गया है। अब लोगों को कहानी से ज्यादा तथ्य पर विश्वास होता है। यहां वेद-गीता के उत्पत्ति के सिद्धांत को समझने का प्रयास करते हैं। ब्रह्म और ब्रह्मांड और आत्मा- तीनों ही आज भी मौजूद हैं। सर्वप्रथम ब्रह्म था आज भी ब्रह्म है और अनंत काल तक ब्रह्म ही रहेगा। यह ब्रह्म कौन है? ईश्वर है, परमेश्वर है या परमात्मा? यह तीनों नहीं है और तीनों ही है। यह ब्रह्म संपूर्ण विश्‍व के भीतर परिपूर्ण हैं तथा इस विश्‍व के बाहर भी है। ब्रह्म ने सृष्टि की रचना नहीं की। ब्रह्म की उपस्थिति से सृष्टि की रचना हो गई। यह सात दिन या सात करोड़ वर्ष का मामला नहीं है यह अनंत काल के अंधकार के बाद अरबों वर्ष के क्रमश: विकास का परिणाम है। उत्पत्ति और विकास अब सृष्टि की उत्पत्ति और विकास कैसे हुआ यह जानते हैं। ब्रह्म की जगह हम समझने के लिए अत्मा को रख देते हैं। आप पांच तत्वों को तो जानते ही हैं- आकाश, वायु, अग्नि, जल और ग्रह (धरती या सूर्य)। सब सोचते हैं कि सबसे पहले ग्रहों की रचना हुई फिर उसमें जल, अग्नि और वायु की, लेकिन यह सच नहीं है। ग्रह या कहें की जड़ जगत की रचना सबसे अंतिम रचना है। तब सबसे पहले क्या उत्पन्न हुआ? जैसे आप सबसे पहले हैं फिर आपका शरीर सबसे अंत में। आपके और शरीर के बीच जो है आप उसे जानें। अग्नि जल, प्राण और मन। प्राण तो वायु है और मन तो आकाश है। शरीर तो जड़ जगत का हिस्सा है। अर्थात धरती का। जो भी दिखाई दे रहा है वह सब जड़ जगत है। नीचे गिरने का अर्थ है जड़ हो जाना और ऊपर उठने का अर्थ है ब्रह्माकाश हो जाना। अब इन पांच तत्वों से बड़कर भी कुछ है क्योंकि सृष्टि रचना में उन्हीं का सबसे बड़ा योगदान रहा है। आकाश के पूर्व अंधकार आकाश एक अनुमान है। दिखाई देता है लेकिन पकड़ में नहीं आता। धरती के एक सूत ऊपर से, ऊपर जहां तक नजर जाती है उसे आकाश ही माना जाता है। लेकिन ऊपर अंतरिक्ष भी तो है। आकाश अर्थात वायुमंडल का घेरा- स्काई। खाली स्थान अर्थात स्पेस। जब हम खाली स्थान की बात करते हैं तो वहां अणु का एक कण भी नहीं होना चाहिए, तभी तो उसे खाली स्थान कहेंगे। है ना? हमारे आकाश-अंतरिक्ष में तो हजारों अणु-परमाणु घुम रहे हैं। खाली स्थान को अवकाश कहते हैं। अवकाश था तभी आकाश-अंतरिक्ष की उत्पित्ति हुई। अर्थात अवकाश से आकाश बना। अवकाश अर्थात अनंत अंधकार। अंधकार के विपरित प्रकाश होता है, लेकिन यहां जिस अंधकार की बात कही जा रही है उसे समझना थोड़ा कठिन जरूर है। यही अद्वैतवादी सिद्धांत है। जब तक एक है तो दूसरा भी होगा लेकिन अद्वैत सिद्धांत कहता है कि वह परम एक, शुद्ध एक। सारे धर्म द्वैतवादी है लेकिन हिंदू धर्म अद्वैतवादी है। सचमुच सबकुछ दो जैसा दिखाई देता है लेकिन है नहीं। अंत में एक ही हाथ लगेगा दो जैसा व्यवहार करता हुआ। नर और मादा सृष्टि की सबसे अंतिम रचना है। नकारात्मक और सकारात्म शक्तियां भी बाद की उत्पत्ति है। इसलिए कहना की ईश्वर के विपरित शैतान है यह ईश्वर के खिलाफ बात है। सबसे बड़ी ईशनिंदा यही है कि आपने शैतान को ईश्वर के विपरित माना या उसे ईश्वर के समकक्ष रखा। जो लोग द्वैतवादी है वह अधूरे हैं। सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से श्वास ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।’ -ऋग्वेद ब्रह्म (आत्मा) से आकाश अर्थात जो कारण रूप द्रव्य (ब्रह्माणु) सर्वत्र फैल रहा था उसको इकट्ठा करने से अवकाश उत्पन्न होता है। वास्तव में आकाश की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि बिना अवकाश (खाली स्थान) के प्रकृति और परमाणु कहां ठहर सके और बिना अवकाश के आकाश कहां हो। अवकाश अर्थात जहां कुछ भी नहीं है और आकाश जहां सब कुछ है। आकाश के पश्चात वायु आत्मा से अवकाश, अवकाश से आकाश और आकाश से वायु की उत्पत्ति हुई। वायु आठ तरह की होती है। सूर्य से धरती तक जो सौर्य तूफान आता है वह किसकी शक्ति से यहां तक आता है? संपूर्ण ब्रह्मांड में वायु का साम्राज्य है, लेकिन हमारी धरती की वायु और अंतरिक्ष की वायु में फर्क है। वायु को ब्रह्मांण का प्राण और आयु कहा जाता है। जैसे- हमारे शरीर में हमारे बाद मन की सत्ता है। फिर प्राण की और फिर जल, अग्नि और शरीर की। शरीर और हमारे बीच वायु का सेतु है। वायु के पश्चात अग्नि  वायु में ही अग्नि और जल तत्व छुपे हुए रूप में रहते हैं। वायु ठंडी होकर जल बन जाती है गर्म होकर अग्नि का रूप धारण कर लेती है। वायु का वायु से घर्षण होने से अग्नि की उत्पत्ति हुई। अग्नि की उत्पत्ति ब्रह्मांड की सबसे बड़ी घटना थी। वायु जब तेज गति से चलती है तो धरती जैसे ग्रहों को उड़ाने की ताकत रखती है लेकिन यहां जिस वायु की बात कही जा रही है वह किसी धरती ग्रह की नहीं अंतरिक्ष में वायु के विराट समुद्री गोले की बात कही जा रही है। अग्नि से जल की उत्पत्ति : वायु जब बदल गई विराट अग्नि के गोले में तो उसी में जल तत्व की उत्पत्ति हुई। अं‍तरिक्ष में आज भी ऐसे समुद्र घुम रहे हैं जिनके पास अपनी कोई धरती नहीं है लेकिन जिनके भीतर धरती बनने की प्रक्रिया चल रही है। जल से धरती की उत्पत्ति हुई :

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जब मां दुर्गा ने तोड़ा था एक तिनके से देवताओं का घमंड, पढ़ें यह पौराणिक कथा

नवरात्रि आज से शुरू हो गई है। आज से नवरात्रि का समापन होने तक जागरण अध्यात्म आपके लिए दुर्गां से संबंधित पौराणिक कथाएं लाएगा जिनके बारे में शायद कई लोग नहीं जानते होंगे। आज इस लेख में हम आपको उस पौराणिक कथा के बारे में बता रहे हैं… नवरात्रि आज से शुरू हो गई है। आज से नवरात्रि का समापन होने तक जागरण अध्यात्म आपके लिए दुर्गां से संबंधित पौराणिक कथाएं लाएगा जिनके बारे में शायद कई लोग नहीं जानते होंगे। आज इस लेख में हम आपको उस पौराणिक कथा के बारे में बता रहे हैं जिसमें उस वाक्ये का वर्णन किया गया है जिसमें माता दुर्गा ने एक तिनके से देवताओं का घमंड तोड़ दिया था। आइए पढ़ते हैं यह पौराणिक कथा। एक बार देवताओं और दैत्यों में बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में विजय देवताओं के हाथ लगी। इससे उनके मन में अहंकार आ गया। हर देवता को लगने लगा कि वो श्रेष्ठ है। सभी देवगण इस अहंकार से ग्रस्त हो गए। जब माता दुर्गा ने देवताओं को इस प्रकार अहंकार से ग्रस्त होते देखा तो उन्होंने उनका घमंड तोड़ने का निर्णय लिया। मां दुर्गा तेजपुंज के रूप में देवताओं के समक्ष प्रकट हुई। इतना बड़ा तेजपंज देख सभी देवगण घबरा गया। इंद्रदेव ने तेजपुंज का रहस्य जानना चाहा और वायुदेव से इसके लिए मदद मांगी। वायुदेव अपने अहंकर के साथ तेजपुंज में पहुंचे। तेजपुंज ने वायुदेव से उनके बारे में पूछा। वायुदेव ने खुद को प्राणस्वरूप तथा अतिबलवान देव बताया। फिर तेजपुंज ने जो कि मां दुर्गा थी, वायुदेव के सामने एक तिनका रखा। साथ ही उससे कहा कि अगर वो इतना ही बलवान है तो इस तिनके को उड़ाकर दिखाओ। वायुदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी लेकिन इसके बाद भी वो तिनका हिला नहीं पाए। वायुदेव वापस आए और इंद्रदेव को सभी बात बतलाई। फिर इंद्र ने अग्निदेव को उस तिनके को जलाने के लिए भेजा। लेकिन अग्निदेव भी इस काम में असफल रहे। यह देख इंद्रदेव का अभिमान चूर-चूर हो गया। फिर इंद्रदेव ने तेजपुंज की आराधना की। मां ने प्रसन्न होकर अपना असली रूप दिखाया। फिर उन्होंने ही इंद्र को बताया कि ये उनकी ही कृपा थी कि उन सभी ने असुरों पर विजय प्राप्त की। अत: इस झूठे अभिमान में आकर अपना पुण्य नष्ट न करें। यह सुन देवताओं को अपनी गलती का अहसास हुआ और सभी ने देवी की आराधना की।

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कैसे हुई दिव्य तेजस्वी मां दुर्गा की उत्पत्ति

असुरों के अत्याचार से तंग आकर देवताओं ने जब ब्रह्माजी से सुना कि दैत्यराज को यह वर प्राप्त है कि उसकी मृत्यु किसी कुंवारी कन्या के हाथ से होगी, तो सब देवताओं ने अपने सम्मिलित तेज से देवी के इन रूपों को प्रकट किया। विभिन्न देवताओं की देह से निकले हुए इस तेज से ही देवी के विभिन्न अंग बने। भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से मस्तक के केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से स्तन, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितंब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पौरों की ऊंगलियां, प्रजापति के तेज से सारे दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें, वायु के तेज से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने हैं।  फिर शिवजी ने उस महाशक्ति को अपना त्रिशूल दिया, लक्ष्मीजी ने कमल का फूल, विष्णु ने चक्र, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, वरुण ने दिव्य शंख, हनुमानजी ने गदा, शेषनागजी ने मणियों से सुशोभित नाग, इंद्र ने वज्र, भगवान राम ने धनुष, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्माजी ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह प्रदान किया।  इसके अतिरिक्त समुद्र ने बहुत उज्जवल हार, कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, दो कुंडल, हाथों के कंगन, पैरों के नूपुर तथा अंगुठियां भेंट कीं। इन सब वस्तुओं को देवी ने अपनी अठारह भुजाओं में धारण किया। मां दुर्गा इस सृष्टि की आद्य शक्ति हैं यानी आदि शक्ति हैं। पितामह ब्रह्माजी, भगवान विष्णु और भगवान शंकरजी उन्हीं की शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन-पोषण और संहार करते हैं। अन्य देवता भी उन्हीं की शक्ति से शक्तिमान होकर सारे कार्य करते हैं।

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बुधवार को जरूर सुनें गणेश जी की कहानी, म‍िलेगा सुहाग व भाई की लंबी आयु का आशीर्वाद

भगवान श्री गणेश की पूजा हर पूजा से पहले की जाती है। महिलाएं खासकर अपने पति की लंबी आयु के लिए भगवान श्री गणेश की पूजा जरूर करती है। ऐसी मान्यता हैं कि भगवान श्री गणेश की पूजा करने से पति की लंबी आयु होने के साथ-साथ ससुराल हमेशा खुशियों से भरा रहता हैं। वहां कोई भी दुख-दरिद्रता कभी नहीं आती हैं। तो आइए जाने सुहाग की लंबी आयु देने वाले भगवान श्री गणेश की अद्भुत कहानी। भगवान श्री गणेश की सुहाग का आशीर्वाद देने वाली कथा  एक समय की बात है एक भाई बहन रहते थे। बहन का नियम था कि वह अपने भाई का चेहरा देखे ही खाना खाती थी। हर रोज वह सुबह उठती थी और जल्दी-जल्दी सारा काम करके अपने भाई का मुंह देखने के लिए उसके घर जाती थी। एक दिन रास्ते में एक पीपल के नीचे गणेश जी की मूर्ति रखी थी। उसने भगवान के सामने हाथ जोड़कर कहा कि मेरे जैसा अमर सुहाग और मेरे जैसा अमर पीहर सबको दीजिए। यह कहकर वह आगे बढ़ जाती थी। जंगल के झाड़ियों के कांटे उसके पैरों में चुभा करते  जाते थे।  एक दिन भाई के घर पहुंची और भाई का मुंह देख कर बैठ गई, तो भाभी ने पूछा पैरों में क्या हो गया हैं। यह सुनकर उसने भाभी को जवाब दिया कि रास्ते में जंगल के झाड़ियों के गिरे हुए कांटे पांव में छुप गए हैं। जब वह वापस अपने घर आ जाए तब भाभी ने अपने पति से कहा कि रास्ते को साफ करवा दो, आपकी बहन के पांव में बहुत सारे कांटा चुभ गए हैं। भाई ने तब कुल्हाड़ी लेकर सारी झाड़ियों को काटकर रास्ता साफ कर दिया। जिससे गणेश जी का स्थान भी वहां से हट गया। यह देखकर भगवान गुस्सा हो गए और उसके भाई के प्राण हर लिए।  लोग अंतिम संस्कार के लिए  जब भाई को ले जा रहे थे, तब उसकी भाभी रोते हुए लोगों से कहीं थोड़ी देर रुक जाओ, उसकी बहन आने वाली है। वह अपने भाई का मुंह देखे बिना नहीं रह सकती है। उसका यह नियम है। तब लोगों ने कहा आज तो देख लेगी पर कल कैसे देखेगी। रोज दिन की तरह बहन अपने भाई का मुंह देखने के लिए जंगल में निकली। तब जंगल में उसने देखा कि सारा रास्ता साफ किया हुआ है। जब वह आगे बढ़ी तो उसने देखा कि सिद्धिविनायक को भी वहां से हट दिया गया हैं। तब उसने जाने से पहले गणेश जी को एक अच्छे स्थान पर रखकर उन्हें स्थान दिया और हाथ जोड़कर बोली भगवान मेरे जैसा अमर सुहाग और मेरे जैसा अमर पीहर सबको देना और फिर बोलकर आगे निकल गई।  भगवान तब भगवान सोचने लगे अगर इसकी नहीं सुनी तो हमें कौन मानेगा, हमें कौन पूजेगा। तब सिद्धिविनायक ने उसे आवाज दी, बेटी इस खेजड़ी की सात पत्तियां लेकर जा और उसे कच्चे दूध में घोलकर भाई के उपर छींटा मार देना वह  उठकर बैठ जाएगा। यह सुनकर जब बहन जब पीछे मुड़ी तो वहां कोई नहीं था। फिर वह यह सोचने लगी  कि ठीक है जैसा सुना वैसा कर लेती हूं। फिर वह 7 खेजड़ी की पत्तियां लेकर अपने भाई के घर पहुंची। उसने देखा वहां कई लोग बैठे हुए हैं। भाभी बैठी रो रही और भाई की लाश रखी हैं। तब उसने उस पत्तियों को बताए हुए नियम के तहत भाई के उपर  इस्तेमाल किया। तब भाई उठ कर बैठ गया। भाई बोला बहन से बोला मुझे बहुत ही गहरी नींद आ गई थी। तब बहन बोली यह नींद किसी दुश्मन को भी ना आए और उसने सारी बात अपने भाई को बता दी। 

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प्रभु श्री राम के जन्म की पौराणिक कथा

रामायण और रामचरित मानस हमारे पवित्र ग्रंथ हैं। तुलसीदास जी ने श्री राम को ईश्वर मान कर रामचरितमानस की रचना की है किन्तु आदिकवि वाल्मीकि ने अपने रामायण में श्री राम को मनुष्य ही माना है। तुलसीदास जी ने राम चरितमानस को राम के राज्यभिषेक के बाद समाप्त कर दिया है वहीं आदिकवि श्री वाल्मीकि ने अपने रामायण में कथा को आगे श्री राम के महाप्रयाण तक वर्णित किया है। महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया। जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम राम चन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। आयु बढ़ने के साथ ही साथ राम चन्द्र गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। उनमें अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरू अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गए। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरन्तर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देख कर गर्व और आनन्द से भर उठता था।

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शिव पार्वती विवाह की कथा

शिव विवाह कथा को भारत की आध्यात्मिक कथाओं में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। शिव विवाह में पार्वती के पिता शिव का वंश जानना चाहते थे। फिर शिव ने क्या जवाब दिया? कथा में बताया गया है कि शिव मौन बैठे रहे। पार्वती के पिता ने सोचा कि ये अपने कुल वंश के बारे में भी नहीं जानते। पढ़िए आगे की कथा भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते। आइये जानते हैं आगे क्या हुआ… हे भरद्वाजजी, त्रेता युग में एक बार भगवान शिव जी और उनकी धर्मपत्ना सती की कथा श्रवण की इच्छा हुई। वह दोनों कैलास से नीचे उतरे तथा अगत्स्य ऋषि के आश्रम में आए। अगत्स्य ऋषि ने शिव जी और सती का सम्मान करके पूजा की। शिव जी ने सोचा यह सन्त कितने सरल हैं। मैं इनके पास कथा श्रवण हेतु आया हूं, और यह वक्ता बनकर कथा कहेंगे। नियमानुसार तो श्रोता को वक्ता की पूजा करनी चाहिए। किन्तु धन्य है इस सन्त को कि वक्ता होने पर भी ये श्रोता की पूजा करते हैं। शिव जो ने अगत्स्यजी के भाव का सच्चा अर्थ किया। किन्तु शिव जी की पूजा करके अगत्स्यजी जब सतीकी पूजा करने लगे तब सती ने इसका गलत अर्थ किया। उन्होंने सोचा हम आए और अगत्स्यजा लगे बस करने हमारी पूजा। जो आदमी खुद घबरा गया वह कथा क्या कहेगा?  दक्ष की बेटी बुद्धिमान बाप की कन्या है। सती में बुद्धि तत्व अधिक काम कर रहा था, अतः उन्होंने पूजा का गलत अर्थ किया। सती में यदि सच्चा राम प्रेम होता तो वह कभा ऐसा विचार नहीं करती। भगवान शिव की शादी में आए हर तरह के प्राणी जब शिव और पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनकी शादी बहुत ही भव्य पैमाने पर हो रही थी। इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। शिव – जो दुनिया के सबसे तेजस्वी प्राणी थे – एक दूसरे प्राणी को अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले थे। उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे। उनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। मगर यह तो शिव का विवाह था, इसलिए उन्होंने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक बार एक साथ आने का मन बनाया। शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। यह एक शाही शादी थी, एक राजकुमारी की शादी हो रही थी, इसलिए विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह होना था। भगवान शिव और देवी पार्वती की वंशावली के बखान की रस्म वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। तो पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर शिव बैठे हुए थे। सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उसके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उसके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उसके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ आया था जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे। वे इंसानी भाषा तक नहीं बोल पाते थे और अजीब सी बेसुरी आवाजें निकालते थे। वे सभी नशे में चूर और विचित्र अवस्थाओं में लग रहे थे। भगवान शिव ने धारण किया मौन फिर पार्वती के पिता पर्वत राज ने शिव से अनुरोध किया, ‘कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।’ शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था। वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे और शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे क्योंकि कोई भी अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी क्योंकि शादी के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था। मगर शिव मौन रहे। समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई, ‘इसका वंश क्या है? यह बोल क्यों नहीं रहा है? हो सकता है कि इसका परिवार किसी नीची जाति का हो और इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही हो।’ नारद मुनि ने इशारे से बात समझानी चाही फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे – टोइंग टोइंग टोइंग। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे, ‘यह क्या बकवास है? हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं मगर वह कुछ बोल नहीं रहा। क्या मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से कर दूं? और आप यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?’ नारद ने जवाब दिया, ‘वर के माता-पिता नहीं हैं।’ राजा ने पूछा, ‘क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता?’ नारद

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