नर और नारायण की कहानी जानना जरूरी है

परमेश्वर सदाशिव (शिव, शंकर, रुद्र या महेश नहीं) के तीन प्रकट रूपों में से प्रथम भगवान विष्णु के 24 अवतार माने गए हैं, उनमें से ही दो अवतार हैं- नर और नारायण। हम जिन्हें नारायण कहते हैं वे विष्णु के अवतार हैं। उनका भजन भी आपने सुना होगा- श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि। तेरी लीला सबसे न्यारी न्यारी, हरि हरि। नर और नारायण की कहानी को जानना जरूरी है। यहां उनके जीवन की कहानी नहीं बल्कि संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। इन्हीं दो भाइयों के कारण धर्म और सत्य का भारत में विस्तार हुआ। अधिकतर हिन्दू इनकी कथा को नहीं जानते और वे यह मानते हैं कि ये विष्णु ही है। अवतार का अर्थ किसी में विष्णु का अवतरण होना। भगवान राम भी विष्णु के अवतार थे लेकिन वे स्वयं विष्‍णु नहीं थे। वे भी ‍ब्रह्मा और वशिष्ठ की अनुशंसा पर विष्णु के अवतार घोषित किए गए थे। अर्थात राम एक माध्यम थे और विष्णु ने उनमें उतरकर लीला रची थी। अवतार का अर्थ किसी में किसी दूसरे का अवतरण होना। हालांकि कुछ अवतारों में विष्णु स्वयं प्रकट हैं। 24 अवतारों का क्रम निम्न है-1.आदि परषु, 2.चार सनतकुमार, 3.वराह, 4.नारद, 5.नर और नारायण, 6.कपिल, 7दत्तात्रेय, 8.याज्ञ, 9.ऋषभ, 10.पृथु, 11.मतस्य, 12.कच्छप, 13.धनवंतरी, 14.मोहिनी, 15.नृसिंह, 16.हयग्रीव, 17.वामन, 18.परशुराम, 19.व्यास, 20.राम, 21.बलराम, 22.कृष्ण, 23.बुद्ध और 24.कल्कि। भगवान ब्रह्मा के पुत्र धर्म की पत्नी रुचि के माध्यम से श्रीहरि विष्णु ने नर और नारायण नाम के दो ऋषियों के रूप में अवतार लिया। जन्म लेते ही वे बदरीवन में तपस्या करने के लिए चले गए। उसी बदरीवन में आज बद्रीकाश्रम बना है। वहीं नर और नारायण नामक दो पहाड़ है। वहीं पास में केदारनाथ का पवित्र शिवलिंग है जिसे नर और नारायण ने मिलकर ही स्थापित किया था। यह लगभग 8 हजार ईसा पूर्व की बात है। नर और नारायण की तपस्या से ही संसार में सुख और शांति का विस्तार हुआ। आज भी केदानाथ और बद्रीकाश्रम में भगवान नर-नारायण निरन्तर तपस्या में रत रहते हैं। इन्होंने ही द्वापर में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतार लेकर लीला रची थी। लीला का अर्थ नाटक नहीं होता। उनकी तपस्या को देखकर देवराज इंद्र ने दी जब चुनौती… एक बार नर और नारायण की तपस्या को देखकर देवराज इंद्र ने सोचा कि ये तप के द्वारा मेरे इंद्रासन को लेना चाहते हैं। ऐसे सोचकर इंद्र ने उनकी तपस्या को भंग करने के लिए कामदेव, वसंत तथा अप्सराओं को भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, ‘तुम लोग  मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।’ यहां बजरंगबली भगवान शिव को अपने कंधे पर लाए थे भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं। कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं। नर नारायण ने कहा- ‘तुम इन स्त्रियों में से किसी एक को मांगकर स्वर्ग में ले जा सकते हो, वह स्वर्ग के लिए भूषण स्वरूप होगी।’ उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र चकित और भयभीत हो गए। इंद्र को श्री नर और नारायण के प्रति अपनी दुर्भावना और दुष्कृति पर विशेष पश्चाताप हुआ। महाभारत के अनुसार केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम के दो भाइयों ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी। केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति की कथा शिव पुराण में तब आती है जब नर और नारायण शिव की अराधना कर रहे होते हैं। भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें। नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो। नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए। दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है। महाभारत अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

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यहां बजरंगबली भगवान शिव को अपने कंधे पर लाए थे

आज तक हम आपको बहुत से ऐसे शिव मंदिरों के बारे में बता चुके हैं, जिनका रहस्य या कहें कि उनसे जुड़े पौराणिक तत्थ अपने आप में एक मिसाल है। कहने का मतलब है कि इन मंदिर से जुड़ी कथाएं इतनी रहस्यमयी और दिलचस्प हैं कि लोग खुद इनकी तरफ़ खींचते चले आते हैं। तो आज हम भी आपको एक ऐसे ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके बारे में शायद किसी को पता नहीं होगा। इस मंदिर का रहस्य हिंदू धर्म के प्रमुख देवता यानि देवों के देव महादेव से जुड़ा हुआ है। गणेश जी का सिद्धिविनायक मंदिर है बेहद चमत्कारी, जानिए इससे जुड़े रोचक तथ्य  हम बात कर रहें है छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के महादेव घाट पर स्थित चमत्कारिक हटकेश्वर मंदिर की। कहा जाता है कि खारुन नदी के तट पर स्थित इस मंदिर के पीछे त्रेतायुग की एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। जिसके अनुसार पवनपुत्र हनुमान शिव शंकर को अपने कंधे पर बिठा कर यहां लाए थे। कहा जाता है कि ये मंदिर भगवान श्रीराम के वनवास काल के दौरान का है। लोक मान्यता के अनुसार जब श्रीराम भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ यहां से यानि छत्तीसगढ़ के इस इलाके से गुज़र रहे थे यहां लक्ष्मण ने शिव लिंग की स्थापना की थी। हटकेश्वर महादेव मंदिर पौराणिक कथाओं के अनुसार हनुमान जी अपने कंधे पर शिवजी को लेकर निकल पड़े। बाद में ब्राह्मण देवता को आमंत्रण करने गए जिसमें उन्हें काफ़ी देर हो गई। इधर लक्ष्मण जी देरी होने से क्रोधित हो रहे थे। स्थापना के समय में देर हो गई थी। इसलिए स्थापना के समय को देखते हुए उन्होंने शिवलिंग को खारुन नदी के तट पर ही स्थापित कर दिया। ऐसा माना जाता है कि ये मंदिर रायपुर शहर से 8 कि.मी. दूर स्थित 500 साल पुराना है। बता दें कि इस मंदिर को भगवान शिव के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से भक्तों की हर इच्छा पूरी हो जाती है। इस भव्य मंदिर की आंतरिक और बाहरी कक्षों की शोभा देखते ही बनती है। परिसर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के पास ही राम, जानकी, लक्ष्मण और अन्य कई प्रतिमाएं हैं। बताया जाता है खारुन नदी पर पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान भी किया जाता है। गया और काशी की तरह यहां विशेष पूजा पाठ भी किया जाता है। यहां कार्तिक-पूर्णिमा के समय एक बड़ा मेला लगता है। पौराणिक इतिहास के मुताबिक राजा ब्रह्मदेव के विक्रम संवत 1458 अर्थात 1402 ई. के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि हाजीराज ने यहां मंदिर का निर्माण कराया था।

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गणेश जी का सिद्धिविनायक मंदिर है बेहद चमत्कारी, जानिए इससे जुड़े रोचक तथ्य 

महाराष्ट्र के मुंबई शहर स्थित सिद्धिविनायक मंदिर भगवान गणेश को समर्पित एक प्रसिद्ध मंदिर है, जिसकी गिनती देश के सबसे व्यस्त धार्मिक स्थलों में की जाती है। गणपति बप्पा के दर्शन के लिए यहां हजारों की तादाद में देश-विदेश से श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आगमन होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद जरूर पूरी होती है। सिद्धिविनायक मंदिर हर साल भारी दान प्राप्त करता है, इसलिए इसकी गितनी भारत के सबसे अमीर मंदिरों में भी होती है। यहां दर्शन करने के लिए बॉलीवुड स्टार से लेकर नेता, बड़े उद्योगपति मत्था टेकने जरूर पहुंचते हैं।  खासकर गणेश चतुर्थी के दौरान यहां भक्तों का भारी जमावड़ा लगता है। इस दौरान मंदिर में भव्य आयोजन किए जाते हैं। आज हमआपको इस मंदिर और यहां विराजमान भगवान गणेश से जुड़ी दिलचस्प बातों को बताएंगे सिद्धिविनायक, भगवान गणेश जी का सबसे लोकप्रिय रूप है, जिसमें उनकी सूंड दाईं और मुडी होती है, जानकारी के अनुसार गणेश की ऐसी प्रतिमा वाले मंदिर सिद्धपीठ कहलाते हैं, और इसलिए उन्हें सिद्धिविनायक मंदिर की संज्ञा दी जाती है। माना जाता है सिद्धिविनायक सच्चे मन से मांगी गई भक्तों की मुराद अवश्य पूरी करते हैं। सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण 19 नवंबर 1801 को एक लक्ष्मण विथु पाटिल नाम के एक स्थानीय ठेकेदार द्वारा किया गया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस मंदिर के निर्माण में लगने वाली राशि एक कृषक महिला ने दी थी, जिसकी कोई संतान नहीं थी। वो इस मंदिर को बनवाने में मदद करना चाहती थी, ताकि भगवान के आशीर्वाद से कोई भी महिला बांझ न हो, सबको संतान प्राप्ति हो। सिद्धी विनायक मंदिर अपनी मंगलवार की आरती के लिए बहुत प्रसिद्ध है जिसमें श्रद्धालुओं की कतार कभी-कभी 2 किलोमीटर तक पहुंच जाती है।  आपको बता दें कि मंदिर की मूल संरचना पहले काफी छोटी थी, बाद में इस मंदिर का पुननिर्माण कर आकार को बढ़ाया गया। सिद्धिविनायक मंदिर की गिनती भारत के सबसे अमीर मंदिरों में की जाती है, जानकारी के अनुसार यह मंदिर हर साल 100 मिलियन से 150 मिलियन धनराशी दान के रूप में प्राप्त करता है। इस मंदिर की देखरेख करने वाली संस्था मुंबई की सबसे अमीर ट्रस्ट है।  माना जाता है कि यहां भगवान गणेश की प्रतिमा काले पत्थर से बनाई गई है, जिसकी सूंड दाई तरफ है। इस मंदिर में भगवान गणेश अपनी दोनों पत्नी रिद्धि और सिद्धि के साथ विराजमान हैं। ये प्रतिमाएं देखने में काफी आकर्षक लगती हैं। मंदिर के दर्शन करना शुभ माना जाता है सिद्धिविनायक एक लोकप्रिय मंदिर हैं, जहां दर्शन के लिए आम श्रद्धालुओं के अलावा राजनेता, बॉलीवुड स्टार, बड़े उद्योगपति समय समय पर आते रहते हैं। न सिर्फ भारत के नामचीन लोग बल्कि यहां दर्शन के लिए ऐप्पल के सीईओ टिम कुक जैसी हस्तियां भी आ चुकी हैं।  बता दें कि अंदर चांदी से बनी चूहों की दो बड़ी मूर्तियां मौजूद हैं, माना जाता है कि अगर आप उनके कानों में अपनी इच्छाएं प्रकट करते हैं वे आपका संदेश भगवान गणेश तक पहुंचाते हैं।

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कैसे हुई भगवान गणेश की उत्पत्ति, जानें इससे जुड़ी प्रचलित पौराणिक कथा

शिवपुराण के अनुसार एक बार माता पार्वती ने स्नान से पूर्व शरीर पर हल्दी का उबटन लगाया था। इसके बाद जब उन्होंने उबटन उतारा तो इससे एक पुतला बना दिया और उसमें प्राण डाल दिए। इस तरह भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई। ऐसे हुआ भगवान गणेश का जन्म शिवपुराण के अनुसार एक बार माता पार्वती ने स्नान से पूर्व शरीर पर हल्दी का उबटन लगाया था। इसके बाद जब उन्होंने उबटन उतारा तो इससे एक पुतला बना दिया और उसमें प्राण डाल दिए। इस तरह भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई। इसके बाद माता पार्वती स्नान करने चली गई और गणपति को आदेश दिया कि तुम द्वार पर बैठ जाओ और किसी को भी अंदर मत आने देना।  कुछ देर बाद वहां  भगवान शिव आए और कहा कि उन्हें पार्वती जी से मिलना है। द्वारपाल बने भगवान गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इसके बाद शिवगणों और भगवान गणेश के बीच भयंकर युद्ध किया लेकिन कोई भी उन्हें हरा नहीं सका फिर क्रोधित शिवजी ने अपने त्रिशूल से बालक गणेश का सिर काट डाला। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला तो रोने लगीं और प्रलय करने का निश्चय कर लिया। इससे देवलोक भयभीत हो उठा फिर देवताओं ने उनकी स्तुति कर उन्हें शांत किया। भगवान शिव ने गरुड़ जी से कहा कि उत्तर दिशा में जाओ और जो भी मां अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के सो रही हो उस बच्चे का सिर ले आओ। गरुड़ जी की काफी देर बाद तक ऐसा कोई नहीं मिला। अंततः एक हथिनी नजर आई। हथिनी का शरीर ऐसा होता है कि वो बच्चे की तरह मुंहकर नहीं सो सकती। तो गरुड़ जी उस शिशु हाथी का सिर काट कर ले आए।शिव ने उसे बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। पार्वती उसे पुनः जीवित देख बहुत खुश हुई और तब समस्त देवताओं ने बालक गणेश को आशीर्वाद दिए। भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत अगर गणेश पूजा से होगी तो वो सफल होगा। उन्होंने गणेश को अपने समस्त गणों का अध्यक्ष घोषित करते हुए आशीर्वाद दिया कि विघ्न नाश करने में गणेश का नाम सर्वोपरि होगा। इसीलिए भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है।

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भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?’ कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।’ उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’ यह है कृष्ण जन्म की कथा।

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रोहिणी व्रत होता है बेहद खास, यहां जानिए इसकी कथा, महत्व और उपवास की तारीख

इस बार रोहिणी व्रत 17 जून दिन शनिवार को रखा जाएगा. यह उपवास हिन्दू और जैन धर्म में बहुत महत्व रखता है. यह दिन दोनों धर्मों के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. आपको बता दें कि आषाढ़ मास में पड़ने वाले रोहिणी व्रत का उपवास खास तौर से महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए करती हैं. आपको बता दें कि रोहिणी 27 नक्षत्रों में से एक है, जो हर महीने आता है. आज इस लेख में इस व्रत के पीछे की कथा क्या है उसके बारे में बताएंगे ताकि आपको इसके महत्व के बारे में पता चल सके. रोहिणी व्रत पूजा विधि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर घर की साफ सफाई करें. इसके बाद गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान से निवृत होकर व्रत संकल्प लें. इसके बाद आमचन कर अपने आप को शुद्ध करें. अब सबसे पहले सूर्य भगवान को जल का अर्घ्य दें. कनकधारा स्तोत्र का पाठ भी किया जाता है. गरीबों और जरूरतमंदों को दान दिया जाता है जैन धर्म में रात्रि के समय भोजन करने की मनाही है. मृगशिरा नक्षत्र के आकाश में उदय होने पर व्रत समाप्त हो जाता है. अतः इस व्रत को करने समय फलाहार सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए. रोहिणी व्रत का समापन उद्यापन से करना चाहिए. रोहिणी व्रत की कथा इसकी कहानी है एक बदबूदार रानी की. असल में प्राचीन काल में एक राजा थे जिनका नाम था माधव अपनी पत्नी लक्ष्मीपति के साथ राज करता था. उनकी एक पुत्री थी रोहिणी जिसके विवाह की बड़ी चिंता थी. एक दिन उसने एक ज्योतिषी को बुलाकर बेटी रोहिणी के विवाह के बारे में पूछा, तब ज्योतिषी ने कहा इसका विवाह हस्तीनापुर के राजा अशोक से होना है. उनकी बात मानकर राजा ने अशोक से बेटी की शादी करा दी.  इसके पश्चात दोनों हस्तीनापुर में राज करने लगे. एक दिन उनके वन में चारण मुनि आते हैं. राजा रानी उनके पास जाते हैं. तब राजा ने ऋषि से पूछा मुनि मेरी रानी इतनी शांत चुप चाप क्यों रहती हैं. इसपर ऋषि मुनि ने रानी के पिछले जन्म की कथा सुनाई. हस्तीनापुर में ही एक वस्तुपाल नाम का एक राजा राज करता था. उसके प्रिय मित्र धनमित्र को दुर्गंधा नाम की एक कन्या हुई जिसके शरीर से इतनी गंदी बदबू आती थी कि उससे कोई विवाह करने को तैयार नहीं था. ऐसे में धनमित्र में पैसों का लालच देकर वस्तुपाल के बेटे से विवाह करा दिया. लेकिन वास्तुपाल का बेटा उसकी दुर्गंध बर्दाश नहीं कर सका और एक महीने में उसे छोड़कर चला गया. इसके बाद दुर्गंधा और उसके पिता को दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा था, तबी वहां पर अमृतसेन मुनि राज आए. तब उन्होंने अपनी सारी कहानी मुनि को बताई जिसके बाद ऋषि ने बताया, वह पिछले जन्म में गिरनार के राजा की रानी थीं. एक बार जब दोनों वन में विचरण कर रहे थे तो उनके सामने मुनिराज आए. तब मुनि ने रानी से उनके लिए भोजन बनाने के लिए कहा. लेकिन रानी ने गुस्से में खाना बहुत कड़वा बनाया. जिसे खाकर मुनि की मृत्यु हो गई. इस पाप के चलते रानी को राज्य से निकाल दिया गया. फिर रानी को कोढ़ हो गया और कष्ट सहने के बाद उसकी भी मृत्यु हो गई. इसके बाद वह पशु योनि में फिर दुर्गंधा के रूप में जन्म लिया. इस पर धनमित्र ने मुनि से पूछा, इस पाप से कैसे छुटकारा पाया जाए? तो मुनि ने उन्हें रोहिणी व्रत का महत्व बताया. इसके बाद दुर्गंधां ने इस व्रत को विधि विधान के साथ किया जिससे उनके सारे पाप दूर हो गए और वह स्वर्गसिधार गईं. इसके बाद वह रोहिणी के रूप में जन्म लेती हैं.

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स्वर्ग छोड़कर क्यों चली गईं माता लक्ष्मी? पढ़ें यह पौराणिक कथा

आज शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी (Mata Lakshmi) की पूजा के लिए समर्पित है. आज मैं आपको माता लक्ष्मी से जुड़ी एक कथा के बारे में बताता हूं, जिसमें माता लक्ष्मी स्वर्ग छोड़कर चली जाती हैं. इसके फलस्वरूप सभी देवता श्रीहीन हो जाते हैं. धन संपदा के साथ ही उनका बल भी खत्म हो जाता है. ऐसे में असुर उन पर आक्रमण करके स्वर्ग पर अधिकार कर लेते हैं. आइए पढ़ते हैं माता लक्ष्मी से जुड़ी यह कथा. एक समय की बात है. दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश जा रहे थे. तभी रास्ते में उनको देवराज इंद्र मिले. वे ऐरावत पर सवार थे. उन्होंने दुर्वासा जी को प्रणाम किया, तो उन्होंने आशीर्वाद देते हुए भगवान विष्णु का दिव्य पुष्प पारिजात इंद्र को दे दिया. इंद्र ने उस पुष्प को ऐरावत हाथी के सिर पर रख दिया. यह इंद्र के अहंकार का प्रमाण था. दिव्य पुष्प के प्रभाव से ऐरावत हाथी भी तेजस्वी हो गया और वह इंद्र को छोड़कर पुष्प को रौंदते हुए वन में चला गया. यह देखकर दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए. उन्होंने इंद्र को श्राप दे दिया कि तुम श्रीहीन हो जाओगे. दुवार्सा जी के श्राप के कारण माता लक्ष्मी तुरंत स्वर्ग छोड़कर चली गईं. इस वजह से सभी देवता धन-वैभव और शक्ति से हीन हो गए. तब असुरों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया, जिसमें देवगण पराजित हो गए. स्वर्ग पर असुरों का राज्य हो गया. देवराज इंद्र समेत सभी देवगण ब्रह्मा जी के पास गए और माता लक्ष्मी को वापस लाने का उपाय पूछा. तब ब्रह्म देव ने कहा कि आपने भगवान विष्णु के दिव्य पुष्प का अपमान किया है, जिसके कारण देवी लक्ष्मी नाराज होकर स्वर्ग से चली गई हैं. इसके लिए तुम सब भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करो, ताकि देवी लक्ष्मी प्रसन्न होकर वापस यहां आ जाएं. जब सभी देवगण भगवान विष्णु के पास गए, तब उन्होंने समुद्र मंथन का सुझाव दिया. समुद्र मंथन के बाद ही माता लक्ष्मी फिर से स्वर्ग वापस आईं और देवताओं को खोया हुआ धन, वैभव और बल प्राप्त हुआ. अहंकार के कारण आपका बल और धन दोनों ही चला जाता है.

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लक्ष्मी माता की कहानी लक्ष्मी माता की कथा

मां लक्ष्मी सुख, समृद्धि और धन की देवी है। जब लक्ष्मी माता का व्रत किया जाता है तो लक्ष्मी माता की कहानी सुनकर व्रत पूर्ण किया जाता है। लक्ष्मी माता के व्रत को ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है। वैभव लक्ष्मी व्रत शुक्रवार के दिन रखा जाता है। इस व्रत को स्त्री या पुरुष कोई भी कर सकता है लक्ष्मी माता का व्रत रखने से सुख समृद्धि और धन की प्राप्ति होती हैं। दिवाली वाले दिन माता लक्ष्मी का व्रत किया जाता है और लक्ष्मी माता की कहानी सुनी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करने आती है। जो भी मां लक्ष्मी के सच्चे मन से आराधना करती है मां लक्ष्मी उस पर अपनी कृपा बरसाती हैं। दिवाली वाले दिन कई लोग व्रत रखते हैं और शाम के समय विधि विधान से व्रत खोलते हैं और लक्ष्मी माता की कहानी सुनी जाती है। तो आइए जानते हैं लक्ष्मी माता की पावन कथा लक्ष्मी माता की कहानी एक गांव में एक साहूकार रहता था। साहूकार के एक बेटी थी । वह हर रोज पीपल सींचने जाती थी । पीपल के वृक्ष में से लक्ष्मी जी प्रकट होती थी और चली जातीं । एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा – तू मेरी सहेली बन जा । तब लड़की ने कहा कि मैं अपने पिता से पूछकर कल आऊंगी । साहूकार की बेटी ने घर जाकर अपने पिता को सारी बात कह दी । तब उसके पिताजी बोले वह तो लक्ष्मी जी हैं । अपने को और क्या चाहिए तू लक्ष्मी जी की सहेली बन जा । दूसरे दिन वह लड़की फिर गईं । तब लक्ष्मी जी पीपल के पेड़ से निकल कर आई और कहा सहेली बन जा तो लड़की ने कहा , बन जाऊंगी और दोनों सहेली बन गई । लक्ष्मी जी ने उसको खाने का न्यौता दिया । घर आकर लड़की ने मां – बाप को कहा कि मेरी सहेली ने मुझे खाने का न्योता दिया है । तब बाप ने कहा कि सहेली के जीमने जाइयो पर घर को संभाल कर जाना । तब वह लक्ष्मी जी के यहां जीमने गई तो लक्ष्मी जी ने उसे शाल दुशाला ओढ़ने के लिए दिया , रुपये दिये , सोने की चौकी , सोने की थाली में छत्तीस प्रकार का भोजन(व्यंजन) करा दिया । जीम कर जब वह जाने लगी तो लक्ष्मी जी ने पल्ला पकड़ लिया और कहा कि में भी तेरे घर जीमने आऊंगी । तो उसने कहा आ जाइयो । वह घर जाकर चुपचाप बैठ गई । तब बाप ने पूछा कि बेटी सहेली के यहां जीमकर आ गईं ? और तू उदास क्यों बैठी है ? तो उसने कहा पिताजी मेरे को लक्ष्मी जी ने इतना दिया अनेक प्रकार के भोजन कराए परन्तु मैं कैसे जिमाऊंगी ? अपने घर में तो कुछ भी नहीं है । तब उसके पिता ने कहा कि गोबर मिट्टी से चौका लगाकर घर की सफाई कर ले । चार मुख वाला दीया जलाकर लक्ष्मी जी का नाम लेकर रसोई में बैठ जाना। लड़की सफाई करके लड्डू लेकर बैठ गई । उसी समय एक रानी नहा रही थी । उसका नौलखा हार चील उठा कर ले गई और उसके घर वह नौलखा हार डाल गई और उसका लड्डु ले गई। बाद में वह हार को तोड़कर बाजार में गई और सामान लाने लगी तो सुनार ने पूछा कि क्या चाहिए ? तब उसने कहा कि सोने की चौकी , सोने का थाल , शाल दुशाला दे दें , मोहर दें और सामग्री दें । छत्तीस प्रकार का भोजन हो जाए इतना सामान दें । सारी चीजें लेकर बहुत तैयारी करी और रसोई बनाई तब गणेश जी से कहा कि लक्ष्मी जी को बुलाओ । आगे – आगे गणेशजी और पीछे – पीछे लक्ष्मी जी आई । उसने फिर चौकी डाल दी और कहा , सहेली चौकी पर बैठ जा । जब लक्ष्मी जी ने कहा सहेली चौकी पर तो राजा रानी के भी नहीं बैठी , किसी के भी नहीं बैठी तो उसने कहा कि मेरे यहां तो बैठना पड़ेगा । फिर लक्ष्मीजी चौकी पर बैठ गई । तब उसने बहुत खातिर की । जैसे लक्ष्मी ने करी थी , वैसे ही उसने करी । लक्ष्मी जी उस पर खुश हो गईं । घर में खूब रुपया एवं लक्ष्मी हो गई । साहूकार की बेटी ने कहा , मैं अभी आ रही हूँ । तुम यहीं बैठी रहना और वह चली गई । लक्ष्मी जी गई नहीं और चौकी पर बैठी रहीं । उसको बहुत दौलत दी । हे लक्ष्मी जी जैसा तुमने साहूकार की बेटी को दिया वैसा सबको देना । कहते सुनते , हुंकारा भरते अपने सारे परिवार को दियो । पीहर में देना , ससुराल में देना । बेटे पोते को देना । है लक्ष्मी माता ! सबका कष्ट दूर करना , दरिद्रता दूर करना , सबकी मनोकामना पूर्ण करना ।

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भगवान श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा पढ़ने और सुनने से मिलता है कई गुना पुण्य फल

महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया। जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ। सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम राम चन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। आयु बढ़ने के साथ ही साथ राम चन्द्र गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। उनमें अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरूप अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गए। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरन्तर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देख कर गर्व और आनन्द से भर उठता था।

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हनुमान जी के जन्म के पीछे की पौराणिक कथा

महाबली हनुमान के नाम लेने से ही सभी कष्ट दूर हो जाते है। संकटमोचन हनुमान का सुमिरन करने से न सिर्फ भय, बल्कि सभी प्रकार के संकट भी छू-मंतर हो जाते है। बजरंगबली की महिमा से तो हम सभी भली-भांति परिचित है, लेकिन क्या आप हनुमान जी के जन्म के पीछे की पौराणिक कथा जानते है? हनुमान जी भगवान शिव के 11 वें रुद्र के रूप में जाने जाते है। आपको बता दें, रामचरितमानस में बजरंगबली के जन्म के बारे में वर्णन किया गया है। माना जाता है की हनुमान जी का जन्म ऋषियों-मुनियों द्वारा दिए गए वरदान से हुआ था, ऐसे में आइये विस्तार से जानते है हनुमान जी के धरती पर अवतरित होने की कथा। ऋषियों द्वारा वरदान प्राप्ति पवनसुत हनुमान का जन्म मंगलवार के दिन चैत्र माह की पूर्णिमा को हुआ था। हनुमान जी के पिता का नाम वानरराज केसरी था, वहीं माता का नाम अंजनी था। वेद पुराणों में ऐसा बताया जाता है की जब एक बार वानरराज केसरी प्रभास नामक तीर्थ स्थान पर गए, तब उन्होंने देखा की वहां समुद्र के किनारे बैठ कुछ ऋषि गण पूजन कर रहे है। वे सभी शांति से पूजा-पाठ कर ही रहे थे, की इतनी देर में वहां एक विशाल हाथी आ पहुंचा। वह हाथी उपद्रव मचाने लगा जिसके कारण ऋषियों के पूजा में खलल पड़ गया। राजा केसरी पर्वत पर बैठकर यह पूरा दृश्य देख रहे थे और यह देखकर वह तुरंत ऋषियों की मदद के लिए वहां पहुंचे। वानरराज ने उस उपद्रवी हाथी के दांत तोड़ कर उसे मौत के घाट उतार दिया। जिसके बाद वहां मौजूद समस्त ऋषि गण वानरराज केसरी से बहुत अधिक प्रसन्न हुए। उनके कार्य से प्रसन्न होकर ऋषियों ने उन्हें रूप बदलने वाले, वायु के समान तेज और बुद्धिवान पुत्र होने का वरदान दिया। भगवान शिव रूप में लिया था जन्म एक और कथा के अनुसार बताया जाता है की जब माता अंजनी सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए रुकी तो अचानक से बहुत तेज हवा चलने लगी। जब माता अंजनी ने अपने आस पास देखा तो उन्हें अहसास हुआ की यह सामान्य हवा नहीं है बल्कि कोई अपनी मायावी शक्तियों से हवा को उनकी ओर प्रवाहित कर रहा है। उन्होंने यह पता लगाने के लिए अपने चारों ओर देखा पर उन्हें वहां कोई भी नज़र नहीं आया, इसके बाद माता अंजनी क्रोधित हो गयी और उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा की आखिर ऐसा कौन व्यक्ति है जो एक पतिव्रता स्त्री का अपमान करने का दुस्साहस कर रहा है? उनके यह कहने के बाद वहां पवन देव प्रकट हुए और माता अंजनी से क्षमा मांगने लगे। पवन देव ने कहा- “मुझे क्षमा कर दीजिये, लेकिन आपके पति को ऋषि गणों ने मेरे समान पुत्र होने का वरदान दिया था इसी कारण मुझे यहां प्रकट होना पड़ा। मेरे अंश के माध्यम से अब आपको एक पराक्रमी और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। मेरे स्पर्श से भगवान रूद्र बालक के रूप में प्रविष्ट हुए है जो की आपके पुत्र के रूप में प्रकट होंगे।” इसी प्रकार भगवान शिव के रूद्र अवतार ने माता अंजनी के गर्भ से जन्म लिया और यही कारण है की हनुमान जी को अंजनी पुत्र और केसरी नंदन के नाम से भी जाना जाता है।

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महाभारत के युद्ध के बाद श्री कृष्ण की मृत्यु कैसी हुई थी, आखिर क्या है इसका रहस्य

भगवान् श्री कृष्ण के भक्त उनका नाम सुनते ही उनके जन्म से जुड़ी न जाने कितनी कथाएं बताने लगते हैं। कोई कृष्ण जी के जन्म के बारे में बताता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ और फिर वो गोकुल में पीला बढ़े। कुछ लोग उनकी बाल लीलाओं की कहानियां सुनाते हैं। आपमें से सभी लोग ये भी जानते हैं कि महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु युद्ध के बाद कैसे हुई। दरअसल इस बात से लोग अब तक अंजान हैं कि युद्ध के बाद श्री कृष्ण की मृत्यु कब और कैसे हुई। ये वास्तव में ऐसा सवाल है जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है। हमने भी इस सवाल का जवाब जानने की इच्छा रखते हुए इस बात का पता लगाने की कोशिश की। आइए आपको भी बताते हैं कृष्ण की मृत्यु से जुड़े कुछ रहस्यों के बारे में। श्री कृष्ण के जन्म से जुड़ी बातें पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था। वैसे ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, लेकिन उनके बचपन की लीलाएं गोकुल, वृंदावन, नंदगांव और बरसाना में हुईं। वहीं ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने 36 वर्षों तक द्वारिका नगरी में राज किया। महाभारत युद्ध के बाद क्या हुआ था ऐसा माना जाता है कि जब महाभारत युद्ध के बाद दुर्योधन के पूरे वंशजों का अंत हो गया तब उनकी माता दुखी अवस्था में आ गयीं। उस समय जब वो कौरवों की मृत्यु पर शोक दिखाते हुए युद्ध भूमि में गयीं तब उनके साथ श्री कृष्ण और पांडव भी गए। दुखी अवस्था में गांधारी ने भगवान कृष्ण को 36 वर्षों के बाद मृत्यु का अभिशाप दे दिया। ये सुनकर सभी पांडव चकित रह गए लेकिन भगवान कृष्ण विचलित न हुए और मुस्कुराते हुए उन्होंने ये अभिशाप स्वीकार कर लिया। एक शिकारी के तीर से हुई श्री कृष्ण की मृत्यु गांधारी के श्राप की वजह से जब कृष्ण जी युद्ध के 36 सालों के बाद द्वारका में बसने के बाद एक दिन एक वृक्ष के नीचे रात्रि में विश्राम कर रहे थे। उस समय उनके पैर में लगी हुई मणि तेजी से चमक रही थी। उस चमकती मणि को देखकर एक शिकारी जिसका नाम जरा था। उस समय शिकारी ने श्री कृष्ण के पैरों को देखकर यह अनुमान लगाया कि वह कोई मृग है। उस समय शिकारी जरा ने कृष्ण जी के पैरों में तीर से प्रहार कर दिया। जरा के तीर से घायल श्री कृष्ण ने वहीं पर देह त्यागने का निर्णय लिया। इस प्रकार युद्ध के समाप्त होने के 36 साल बाद यानी जब श्री कृष्ण की आयु लगभग 125 साल थी, उस समय प्रभु श्री कृष्ण ने अपनी देह त्याग दी और वापस स्वर्ग लोक को चले गए। रामायण काल के बाली ने लिया था कृष्ण से बदला ऐसी मान्यता है कि रामायण काल में श्री राम (भगवान राम की मृत्यु से जुड़े ये रोचक तथ्य) ने बाली के ऊपर छिपकर प्रहार किया था और उसका बदला लेने के लिए ही द्वापर युग में जब राम जी ने कृष्ण जी के रूप में जन्म लिया तब बाली ने उनसे बदला लेने के लिए एक शिकारी जरा का रूप धारण किया और कृष्ण जी से बदला लिया। इस प्रकार महाभारत युद्ध के बाद श्री कृष्ण की मृत्यु हुई और उन्होंने मनुष्य रूप से भगवान् का रूप पुनः धारण कर लिया। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर जरूर शेयर करें और इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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आखिर कैसे हुई थी भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु, आपको भी जानना चाहिए ये रोचक रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कैसे हुआ? यह बात हम सभी लोग बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन भगवान कृष्ण की मृत्यु कैसे हुई थी? उनके शरीर का दाह संस्कार (Cremation) किसने किया? इन सवालों के जवाब शायद आपको पता नहीं होंगे. इनके बारे में जानने के लिए सभी लोग उत्सुक हैं. तो आज हम आपको बताते हैं कि आखिर भगवान होते हुए भी श्रीकृष्ण की मृत्यु कैसे हो गई? पुराणों में मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था. श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, लेकिन उनका बचपन गोकुल, वृंदावन, नंदगांव, बरसाना और द्वारिका आदि जगहों पर बीता था. कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने 36 वर्षों तक द्वारिका पर राज किया. इसके बाद उन्होंने अपनी देह त्याग दी. मान्यता है कि उस समय उनकी आयु 125 वर्ष थी.भागवत पुराण में बताया गया है कि एक बार श्रीकृष्ण के पुत्र सांबा को एक शरारत सूझी. वो एक स्त्री का वेश धारण कर अपने दोस्तों के साथ ऋषि-मुनियों से मिलने गए. स्त्री के वेश में सांबा ने ऋषियों से कहा कि वो गर्भवती है. जब उन यदुवंश कुमारों ने इस प्रकार ऋषियों को धोखा देना चाहा तो ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने स्त्री बने सांबा को शाप दिया कि तुम एक ऐसे लोहे के तीर को जन्म दोगी, जो तुम्हारे कुल और साम्राज्य का विनाश कर देगा.ऋषियों के इस शाप सुनकर सांबा बहुत डर गए. उन्होंने तुरंत ये सारी घटना जाकर उग्रसेन को बताई, जिसके बाद उग्रसेन ने सांबा से कहा कि वे तीर का चूर्ण बनाकर प्रभास नदी में प्रवाहित कर दें, इस तरह उन्हें उस शाप से छुटकारा मिल जाएगा. इसके बाद सांबा ने ऐसा ही किया. साथ ही उग्रसेन ने ये भी आदेश पारित कर दिया कि यादव राज्य में किसी भी प्रकार की नशीली सामग्रियों का ना तो उत्पादन किया जाएगा और ना ही वितरण होगा. इस घटना के बाद द्वारका के लोगों ने कई अशुभ संकेतों का अनुभव किया, जिसमें सुदर्शन चक्र, श्रीकृष्ण का शंख, उनका रथ और बलराम के हल का अदृश्य हो जाना शामिल है. इसके अलावा वहां अपराधों और पापों में बढ़ोतरी होने लगी द्वारिका में चारों ओर अपराध और पाप का माहौल व्याप्त हो गया. ये देखकर श्रीकृष्ण बहुत दुखी हो गए और उन्होंने अपनी प्रजा से ये जगह छोड़कर प्रभास नदी के तट पर जाकर अपने पापों से मुक्ति पाने को कहा. उनकी बात को सबलोग मानकर प्रभास नदी के तट पर गए, लेकिन वहां जाकर सभी मदिरा के नशे में चूर हो गए और एक दूसरे से बहस करने लगे. इसके बाद उनकी बहस ने लड़ाई का रूप धारण कर लिया और वो आपस में ही लड़ने-मरने लगे. इस तरह आपस में ही लड़कर सभी लोग मारे गए. भागवत पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण एक दिन एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे, तभी जरा नामक एक बहेलिए ने श्रीकृष्ण को हिरण समझकर दूर से उनपर तीर चला लिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई. आपको बता दें कि ऋषि द्वारा कृष्ण के पुत्र सांब को दिए शाप के अनुसार, श्रीकृष्ण को लगे तीर में उसी लोहे के तीर का अंश था, जो सांबा के पेट से निकला था और जिसे उग्रसेन ने चूर्ण बनवाकर नदी में प्रवाहित करा दिया था. इस तरह ऋषि के शाप के अनुसार समस्त यदुवंशियों का नाश भी हो गया था और गांधारी के शाप के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद श्रीकृष्ण के 36 वर्ष भी पूरे गए थे.

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