नवरात्री की पूजा कैसे करें NAVRATRI 2023 PUJA VIDHI

नवरात्री का त्योहार हिन्दू धर्म में मां दुर्गा की पूजा और आराधना के रूप में मनाया जाता है। यह पूजा नौ दिनों तक चलती है और इसके दौरान नौ रूपों की पूजा की जाती है, जिनका नाम है – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री। नवरात्रि की पूजा करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ हैं: पूजा सामग्री पूजा विधि नवरात्रि के दौरान व्रत नवरात्रि के दौरान, कई लोग व्रत रखते हैं। व्रत रखने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। नवरात्रि के दौरान व्रत रखने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए: नवरात्रि के दौरान अन्य अनुष्ठान नवरात्रि के दौरान, कई अन्य अनुष्ठान भी किए जाते हैं, जैसे कि:

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शारदीय नवरात्रि 2023 विशेष क्या है  NAVRATRI

2023 की शारदीय नवरात्रि कई मायनों में विशेष है। इस बार नवरात्रि की शुरुआत रविवार के दिन हो रही है, जो एक शुभ दिन माना जाता है। इसके अलावा, इस बार नवरात्रि के दौरान कई दुर्लभ संयोग भी बन रहे हैं। इनमें से कुछ संयोग निम्नलिखित हैं: इन दुर्लभ संयोगों के कारण, इस बार की शारदीय नवरात्रि को बहुत ही शुभ माना जा रहा है। इस दौरान मां दुर्गा की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होने की संभावना है। उदाहरण सहित रवियोग के उदाहरण के लिए, हम कह सकते हैं कि इस योग में मां दुर्गा की पूजा करने से आत्मिक और बौद्धिक उन्नति की संभावना बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो किसी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, वह इस योग में मां दुर्गा की पूजा करके परीक्षा में सफलता प्राप्त कर सकता है। या, एक व्यक्ति जो अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है, वह इस योग में मां दुर्गा की पूजा करके अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है। विस्तारित इसके अलावा, 2023 की शारदीय नवरात्रि भारत के लिए एक ऐतिहासिक अवसर भी है। इस बार नवरात्रि के दौरान, भारत में होने वाले विधानसभा चुनावों के नतीजे आने की संभावना है। इसलिए, इस बार की नवरात्रि देश के लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस अवसर पर, देश के सभी लोग मां दुर्गा की पूजा करके देश में शांति, समृद्धि और विकास की कामना कर सकते हैं। वे मां दुर्गा से यह भी प्रार्थना कर सकते हैं कि वे देश के नेताओं को सही दिशा में ले जाने की शक्ति प्रदान करें। कुल मिलाकर, 2023 की शारदीय नवरात्रि कई मायनों में विशेष है। इस दौरान मां दुर्गा की पूजा करके देश और समाज को नई ऊर्जा और शक्ति प्रदान करने की कोशिश करनी चाहिए। NAVRATRI KAB HAI , NAVRATRI KA YOG

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Hanuman Putra:जानिये कौन हैं हनुमान पुत्र और क्या है उनके जन्म की कथा?

Hanuman Putra वह प्रभु राम और लक्ष्मण को पाताल लोक लेकर चला गया था। तब हनुमान जी प्रभु राम और लक्ष्मण को खोजते हुए पाताल लोक पहुंच गए। वहां उन्होंने अपने जैसे पहरेदार को देखकर अचंम्भा हो गए। भगवान हनुमान प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हैं। हम सभी जानते हैं कि पवनपुत्र हनुमानजी बाल ब्रह्मचारी थे। इसी वजह से उनका एक पुत्र होने की बात पर आश्चर्य होना स्वभाविक है। हालांकि महर्षि वाल्मीकि के रामायाण में बताया गया है कि भगवान हनुमान का एक पुत्र भी था। वाल्मीकि रामायण में इससे संबंधित एक प्रसंग का वर्णन भी मिलता है। आइए पढ़ते हैं उससे जुड़ी कथा के बारे में। हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा जब पाताल लोक के असुरराज अहिरावण ने भाई रावण के कहने पर प्रभु राम और लक्ष्मण को बंदी बना लिया था। वह प्रभु राम और लक्ष्मण को पाताल लोक लेकर चला गया था। तब हनुमान जी प्रभु राम और लक्ष्मण को खोजते हुए पाताल लोक पहुंच गए। वहां उन्होंने अपने जैसे पहरेदार को देखकर अचंभित हो गए। हनुमान जी की तरह दिखाई देने वाले पहरे पर खड़े हुए मकरध्वज ने स्वयं को हनुमान का पुत्र बताया। हनुमान जी इस बात को मानने को तैयार नहीं हुए, तो मकरध्वज Makardhwaj ने अपनी उत्पत्ति की कथा सुनाई। मकरध्वज ने हनुमान जी से बोला कि आप जब माता सीता की खोज में लंका पहुंचे। आपको मेघनाद द्वारा पकड़कर रावण के दरबार में प्रस्तुत किया गया। वहां पर रावण ने आपकी पूंछ में आग लगवा दी थी, जिसके बाद आप अपनी जलती पूंछ की आग बुझाने के लिए समुद्र तट पर पहुंचे। आग बुझाते हुए आपके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी, जिसे एक बड़ी मछली ने पी लिया था। उसी एक बूंद की वजह से वह मछली गर्भवती हो गई।  क्या आपको पता है हनुमान जी के पांच भाईयो के बारे में ? एक दिन पाताल के असुरराज अहिरावण के सेवकों ने खाने के लिए उस मछली को पकड़ लिया। लेकिन जब उसका पेट चीर रहे थे, तभी उसमें से वानर की आकृति का एक मनुष्य निकला, जो कि मैं था। सेवक बालक को अहिरावण के पास लेकर गए। अहिरावण ने मुझे पाताल पुरी का रक्षक नियुक्त कर दिया। वह मैं ही हूं, जो मकरध्वज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया। इसके बाद उन्होंने अपने पुत्र मकरध्वज को पाताल लोक का राजा नियुक्त कर दिया। हनुमान जी ने मकरध्वज को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। हनुमान पुत्र मकरध्वज हनुमान जी के एक पुत्र थे, जिनका नाम मकरध्वज था। मकरध्वज का जन्म एक मछली के गर्भ से हुआ था। पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, जब हनुमान जी ने लंका पर चढ़ाई की थी, तब उन्हें मेघनाद ने पकड़ लिया था। मेघनाद ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी थी। हनुमान जी अपनी जलती हुई पूंछ की आग बुझाने के लिए समुद्र तट पर पहुंचे। आग बुझाते हुए उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी, जिसे एक बड़ी मछली ने पी लिया था। उसी एक बूंद की वजह से वह मछली गर्भवती हो गई। जब मछली ने एक बच्चे को जन्म दिया, तो उसने उस बच्चे का नाम मकरध्वज रखा। मकरध्वज एक शक्तिशाली वानर था। उसने अपने पिता हनुमान जी की तरह ही भगवान राम की सेवा की। मकरध्वज की कथा का एक और संस्करण मकरध्वज की कथा का एक और संस्करण भी है। इस संस्करण के अनुसार, मकरध्वज हनुमान जी के पुत्र नहीं थे, बल्कि उनके शिष्य थे। मकरध्वज एक शक्तिशाली वानर थे, जिन्हें हनुमान जी ने अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया था। कथा का विश्लेषण हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा एक पौराणिक कथा है। इस कथा का कोई भी प्रमाण नहीं है। हालांकि, यह कथा हनुमान जी की भक्ति और शक्ति का एक प्रतीक है। कथा का महत्व हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा हिंदू धर्म में बहुत लोकप्रिय है। यह कथा हनुमान जी की भक्ति और शक्ति का एक प्रतीक है। यह कथा यह भी बताती है कि भगवान राम की भक्ति सभी को आशीर्वाद देती है, चाहे वह मनुष्य हो या पशु। कथा का नैतिक हनुमान पुत्र मकरध्वज की कथा से हमें यह नैतिक शिक्षा मिलती है कि हमें भगवान की भक्ति करनी चाहिए। भगवान की भक्ति से हमें सभी सुख और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। कथा का अंत मकरध्वज ने अपने पिता हनुमान जी की तरह ही भगवान राम की सेवा की। उसने रावण के साथ लड़ाई में भी हिस्सा लिया। मकरध्वज एक शक्तिशाली योद्धा था। उसने कई राक्षसों को मार डाला। अंत में, मकरध्वज ने रावण के पुत्र इंद्रजीत को भी मार डाला। इस तरह, मकरध्वज ने भगवान राम की मदद से रावण का वध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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 क्या आपको पता है हनुमान जी के पांच भाईयो के बारे में ?

ब्रह्मांडपुराण के अनुसार, हनुमान जी के पांच भाई थे, जिनके नाम हैं: इन सभी भाइयों का जन्म अंजना और केसरी के गर्भ से हुआ था। हनुमान जी इन सबमें बड़े थे। मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान सभी विवाहित थे और सभी संतान से युक्त थे। हनुमान जी के इन भाइयों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। केवल उनके नाम ही ब्रह्मांडपुराण में उल्लिखित हैं। कुछ लोगों का मानना ​​है कि हनुमान जी के ये भाई भी भगवान शिव के अवतार थे। हालांकि, इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। हनुमान जी के भाइयों के नाम और उनके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए और शोध की आवश्यकता है। देवराज इंद्र के लोक में एक अप्सरा कुंजीस्थली रहती थी जब एक बार दुर्वासा ऋषि इंद्र की सभा में उपस्थित थे जब अप्सरा बार-बार अंदर बाहर आकर सभा में विघ्न उत्पन्न कर रही थी जिससे दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए और उन्होंने उस अप्सरा को बंदरिया हो जाने का श्राप दे दिया इसके बाद अप्सरा ने ऋषि से श्राप वापस लेने के लिए बहुत प्रार्थना की तब दुर्वासा ऋषि ने उन्हें इच्छा अनुसार रूप धारण करने का वरदान दिया कुछ वर्षों बाद अप्सरा कुंजीस्थली ने वानर श्रेष्ठ ब्रज के यहां वानरी रूप में जन्म लिया और उनका नाम अंजनी रखा गया विवाह योग्य होने पर उनके पिता ने अपनी पुत्री अंजनी का विवाह महान पराक्रमी, शिरोमणि वानरराज केसरी से कर दिया बहुत समय तक जब अंजनी मां को संतान नहीं हुई तब उन्होंने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप किया फिर एक बार वानर राज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट थे तब उन्होंने देखा की वहां बहुत से साधु ध्यान लगाकर पूजा अर्चना कर रहे हैं तभी एक विशाल हाथी आया और उसने वहां बैठे ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया वहीं ऋषि भरद्वाज Bhardwaj अपने आसन पर ध्यान लगाकर बैठे थे वह हाथी उनकी ओर बढ़ रहा था तभी वानर राज केसरी ने बलपूर्वक हाथी के दांतो को पकड़कर उसे मार डाला तब सभी ऋषियों ने प्रसन्न होकर राजा केसरी को वरदान मांगने को कहा,तब उन्होंने इच्छा अनुसार रूप धारण करने वाला पवन के समान तेज तथा रूद्र के समान पुत्र प्राप्त करने का वरदान मांगा था इसके बाद सभी ऋषि उन्हें यह वरदान देकर वहां से चले गए | बजरंगबली क्यों कहा जाता है  हनुमान जी भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार है जो सबसे बलशाली और बुद्धिमान है हनुमान जी का जन्म श्री राम और श्री राम भक्तों की सहायता करने के लिए हुआ है इस संपूर्ण कलयुग में हनुमान जी उपस्थित रहकर श्री राम भक्तों की सहायता अवश्य करते हैं जो सच्चे मन, कर्म, और वचन से श्री राम जी का भक्त हैं स्वयं हनुमान जी की कृपा उस पर हमेशा बनी रहती है इस पृथ्वी पर जिन 7 ऋषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है उनमें हनुमान जी भी शामिल है हनुमान जी के पराक्रम की अनेक कथाएं रामायण एवं अन्य ग्रंथों में प्रचलित है इनका शरीर वज्र के समान होने के कारण इन्हें “बजरंगबली” और पवन के समान वेग होने के कारण इन्हें “मारुति” कहा जाता है बचपन में मां अंजनी और पिता केसरी ने इनका नाम मारुति रखा था लेकिन जब सूर्य को निगल लेने पर इंद्र ने मारुति पर वज्र प्रहार किया तब मारुति की टोडी का रूप बिगड़ गया जब से इनका नाम हनुमान पड़ गया हनुमान का अर्थ होता है बिगड़ी हुई टोंडी हनुमान जी के 108 और नाम है और हर नाम का अलग-अलग अर्थ है इन के 108 नामों का जप करने से समस्त दुख रोगों का नाश हो जाता है कहते हैं कि हनुमान जी आज भी अयोध्या में श्री राम नवमी पर सरयू नदी के किनारे साधु का वेश धारण कर ब्राह्मणों को भोजन कराने आते हैं |  Hanuman Putra:जानिये कौन हैं हनुमान पुत्र और क्या है उनके जन्म की कथा? हनुमान जी के पांच भाई  एक बार हनुमान जी ने श्रीराम की याद में अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया था क्योंकि उन्होंने 1 दिन माता सीता को सिंदूर लगाते हुए देख लिया था जब उन्होंने माता सीता से इसका कारण पूछा तो माता सीता ने कहा यह सिंदूर श्री राम के प्रति प्रेम और सम्मान का प्रतीक है यह जानने के बाद हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया यह दर्शाने के लिए कि वह भी श्री राम से बहुत प्रेम करते हैं इस घटना के बाद हनुमान जी का लाल रंग में उनका रूप बहुत ही प्रचलित हुआ महाभारत काल में भीम Bheem अपने बल के कारण जाने जाते थे वह भी हनुमान जी के भाई थे  इनके अलावा हनुमान जी के पांच भाई और भी थे हनुमान जी के पांच सगे भाई और भी थे और वह सभी विवाहित थे इस बात का उल्लेख ब्रह्मांड पुराण में मिलता है पांचों भाइयों में बजरंगबली सबसे बड़े थे हनुमान जी को शामिल करने के बाद वानर राज केसरी के 6 पुत्र थे सभी में सबसे बड़े बजरंगबली थे इनके बाद मति मान, श्रुति मान ,केतु मान, गतिमान धूती मान थे इन सभी की संताने भी थी जिसके कारण इनका वंश कई वर्षों तक चला था | हनुमान जी की सत्य घटना  जब बाली को यह वरदान मिला कि जो भी उस से युद्ध करने उसके सामने आएगा तो उसकी आदि शक्ति वाली में चली जाएगी और बाली हर युद्ध में जीत जाएगा सुग्रीव और बाली दोनों ब्रह्मा के औरस पुत्र थे बाली पर ब्रह्मा जी की सदैव कृपा बनी रहती थी बाली को अपनी शक्ति पर बहुत ही घमंड था उसका घमंड और भी अधिक बढ़ गया जब उसने तीनों लोकों के सबसे शक्तिशाली योद्धा रावण से युद्ध किया था बाली ने रावण को अपनी पूंछ से बांधकर पूरी दुनिया में भ्रमण किया था रावण जैसे योद्धा को हराकर बाली के घमंड की कोई सीमा नहीं रही थी इसके बाद बाली अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था 1 दिन बाली अपने घमंड में हरे भरे पौधों को तिनके के समान उखाड़ कर फेंक रहा था बाली अपनी ताकत के नशे में पूरे जंगल को उजाड़ रहा था और वह बार-बार युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था उसी जंगल में

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कौन हैं हनुमान जी जानें संपूर्ण जानकारी

रामायण के अनुसार हनुमान जी माता जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान (संस्कृत: हनुमान्, आंजनेय और मारुति भी) परमेश्वर की भक्ति (हिंदू धर्म में भगवान की भक्ति) की सबसे लोकप्रिय अवधारणाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में प्रधान हैं। वह कुछ विचारों के अनुसार भगवान शिवजी के ११वें रुद्रावतार, सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं। रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं। इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएं प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से राक्षसों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है। हनुमान जी हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। वे भगवान शिव के अवतार हैं और भगवान राम के सबसे भक्त हैं। उन्हें “बजरंगबली”, “पवनपुत्र”, “महावीर”, “अंजनीपुत्र” और “केसरीनंदन” जैसे कई नामों से भी जाना जाता है। जन्म हनुमान जी का जन्म अंजना और केसरी के पुत्र के रूप में हुआ था। अंजना एक वानर थी और केसरी एक वानरराज था। हनुमान जी का जन्म अंजना की तपस्या के फलस्वरूप हुआ था। अंजना ने भगवान शिव से एक पुत्र की कामना की थी, और भगवान शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें हनुमान जी का वरदान दिया। शक्ति हनुमान जी को भगवान शिव के सबसे शक्तिशाली अवतारों में से एक माना जाता है। उन्हें अष्ट सिद्धियों और नव निधियों का स्वामी माना जाता है। हनुमान जी के पास कई चमत्कारिक शक्तियां हैं, जिनमें शामिल हैं: भक्ति हनुमान जी भगवान राम के सबसे भक्त हैं। उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य भगवान राम की सेवा करना माना है। हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा में कई चमत्कारिक कार्य किए हैं, जिनमें शामिल हैं: Hanuman Putra:जानिये कौन हैं हनुमान पुत्र और क्या है उनके जन्म की कथा? पूजा हनुमान जी की पूजा हिंदू धर्म में बहुत लोकप्रिय है। उन्हें बुद्धि, शक्ति, और भक्ति का देवता माना जाता है। हनुमान जी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हनुमान जी की पूजा विधि हनुमान जी की पूजा करने के लिए सबसे पहले एक स्वच्छ स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। फिर, हनुमान जी को रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप, और प्रसाद अर्पित करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। अंत में, हनुमान जी से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करें। हनुमान जी के कुछ प्रसिद्ध मंत्र हनुमान जी के कुछ प्रसिद्ध मंदिर हनुमान जी हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। वे भगवान शिव के अवतार हैं और भगवान राम के सबसे भक्त हैं। हनुमान जी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ज्योतिषीयों के सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म 58 हजार 112 वर्ष पहले तथा लोकमान्यता के अनुसार त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 6.03 बजे भारत देश में आज के झारखंड राज्य के गुमला जिले के आंजन नाम के छोटे से पहाड़ी गाँव के एक गुफा में हुआ था। कौन थे हनुमान के पिता? भगवान हनुमान का जन्म वानर रूप में हुआ था। उनके पिता का नाम केसरी था, जो कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक बृहस्पति देव के पुत्र थे। हनुमान की माता ‘अंजनी’ एक अप्सरा थीं जो एक श्राप के चलते वानर रूप में धरती पर अपनी जीवन व्यतीत कर रही थीं। हनुमान का जन्म माता अंजनी की कोख से भगवान शिव से मिले वरदान के परिणाम से हुआ था।  भगवान हनुमान का जन्म अंजनी एक अप्सरा की पुत्री थी मगर एक ऋषि से मिले श्राप की वजह से वे धरती पर आ गई और एक साधारण वानर स्त्री के रूप में जीवन व्यतीत करने लगी। एक पुत्र को जन्म देने के बाद ही वह श्राप से मुक्त हो सकती थी। धरती पर आकर अंजनी का विवाह वानरों के राजा केसरी से हुआ। दोनों ने मिलकर भगवान शिव की अराधना की और वरदान हेतु अंजनी को पुत्र रूप में ‘मारुति’ (हनुमान) की प्राप्ति हुई। इस तरह हनुमान शिव के अंश बताए जाते हैं। वायु देव के पुत्र हनुमान ‘एकनाथ भावार्थ रामायण’ में दर्ज एक कथा के अनुसार हनुमान वायु देव के पुत्र थे। इसलिए उन्हें पवनपुत्र के नाम से भी संबोधित किया जाता है। कथा के मुताबिक त्रेता युग में राजा दशरथ पुत्रों की प्राप्ति के लिए महायज्ञ (वायु देव को समर्पित) करवा रहे थे। उस यज्ञ में खास प्रकार का प्रसाद ‘पयासम’ तैयार किया गया था। यह प्रसाद राजा की तीनों पत्नियों को ग्रहण करना था। मगर अचानक ही एक पक्षी आया और उसने अपने पंजों में इस पवित्र प्रसाद का कुछ भाग दबोच लिया और वहा उड़ गया। वह पंछी उस जंगल के ऊपर से गुजरा जहां माता अंजनी तपस्या आकार रही थीं। उसके पंजों से प्रसाद छोट आज्ञा और सीधा माता अंजनी के हाथों में जाकर गिरा। अंजनी ने उसे शिव का प्रसाद समझ ग्रहण कर लिया। यही कारण है कि वायु देव को हनुमान का पिता बताया जाता है। और इसलिए हनुमान में वायु की तरह उड़ने की चमत्कारी शक्ति भी थी। भगवान हनुमान का परिवार केसरीनंदन हनुमान राजा केसरी और माता अंजनी की ज्येष्ठ संतान थे। उनके बाद केसरी और अंजनी के पांच पुत्र और हुए। इनके नाम इस प्रकार हैं – मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान। इन सभी का विवाह हुआ था और धार्मिक ग्रंथों में इनकी संतानों का उल्लेख भी मिलता है। पौराणिक कथाओं में भगवान हनुमान की संतान को ‘मकरध्वज’ के नाम से जाना जाता है। 

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निधिवन का रहस्य, क्या सच में रास रचाने आते हैं रात में राधा कृष्ण ?

धार्मिक नगरी वृन्दावन में निधिवन एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। मान्यता है कि निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा आज भी अर्द्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद निधिवन परिसर में स्थापित रंग महल में शयन करते हैं। रंग महल में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए पलंग लगाया जाता है। सुबह बिस्तरों के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं। निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट एवं धुपद के जनक श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थान है। निधिवन दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा निधिवन के बारे में जो जानकारी दी जाती है, उसके अनुसार निधिवन में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। सुबह मिलती है गीली दातून इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं। और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है। इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि निधिवन में जो 16000 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो। निधिवन के रहस्य का असली कारण सच तो यह है, कि निधिवन का वास्तु ही कुछ ऐसा है, जिसके कारण यह स्थान रहस्यमय-सा लगता है और इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपने स्वार्थ के खातिर इस भ्रम तथा छल को फैलाने में वहां के पंडे-पुजारी और गाईड लगे हुए हैं, जबकि सच इस प्रकार है – अनियमित आकार के निधिवन के चारों तरफ पक्की चारदीवारी है। परिसर का मख्यद्वार पश्चिम दिशा में है। परिसर का नऋत्य कोण बढ़ा हुआ है और पूर्व दिशा तथा पूर्व ईशान कोण दबा हुआ है। गाइर्ड जो 16000 वृक्ष होने की बात करते हैं वह भी पूरी तरह झूठ है क्योंकि परिसर का आकार इतना छोटा है कि 1600 वृक्ष भी मुश्किल से होंगे और छतरी की तरह फैलाव लिए हुए कम ऊँचाई के वृक्षों की शाखाएं इतनी मोटी एवं एवं मजबूत भी नहीं है कि दिन में दिखाई देने वाले बंदर रात्रि में इन पर विश्राम कर सकें इसी कारण वह रात्रि को यहाँ से चले जाते हैं। इसलिए मिलती है गीली दातून इस परिसर की चारदीवारी लगभग 10 फीट ऊंची है और बाहर के चारों ओर रिहायशी इलाका है जहां चारों ओर दो-दो, तीन-तीन मंजिला ऊँचे मकान बने हुए है और इन घरों से निधिवन की चारदीवार के अन्दर के भाग को साफ-साफ देखा जा सकता है। वह स्थान जहाँ रात्रि के समय रासलीला होना बताया जाता है वह निधिवन के मध्य भाग से थोड़ा दक्षिण दिशा की ओर खुले में स्थित है। यदि सच में रासलीला देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा हो जाए या मर जाए तो ऐसी स्थिति में निश्चित ही आस-पास के रहने वाले यह इलाका छोड़कर चले गए हाते। निधिवन के अन्दर जो 15-20 समाधियां बनी हैं वह स्वामी हरिदास जी और अन्य आचार्यों की समाधियां हैं जिन पर उन आचार्यों  के नाम और मृत्यु तिथि के शिलालेख लगे है। इसका उल्लेख निधिवन में लगे उत्तरप्रदेश पर्यटन विभाग के शिलालेख पर भी किया गया है। इन्हीं समाधियों की आड़ में ही गाईड यह भम्र फैलाते है कि जो रासलीला देख लेता है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाता है और यह सभी उन्हीं की समाधियां हैं। रंगमहल के अन्दर जो दातून गीली और सामान बिखरा हुआ मिलता है। यह भ्रम इस कारण फैला हुआ है कि रंग महल के नैऋत्य कोण में रंग महल के अनुपात में बड़े आकार का ललित कुण्ड है जिसे विशाखा कुण्ड भी कहते हैं। जिस स्थान पर नैऋत्य कोण में यह स्थिति होती है वहां इस प्रकार का भ्रम और छल आसानी से निर्मित हो जाता है। यहां जो वृक्ष आपस में गुंथे हुए हैं इसी प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में सेवाकुंज एवं यमुना के तटीय स्थानों पर भी देखने को मिलते है। निधिवन के प्रसिद्घ होने के कारण वास्तुशास्त्र के अनुसार किसी भी स्थान की प्रसिद्धि के लिए उसकी उत्तर दिशा में नीचाई होना आवश्यक होता है और यदि इस नीचाई के साथ वहां पानी भी आ जाता है तो पानी प्रसिद्धि को बढ़ाने में बूस्टर की तरह काम करता है। विश्व में जो भी स्थान प्रसिद्धि प्राप्त किया हुआ है उसकी उत्तर दिशा में नीचाई के साथ-साथ भारी मात्रा में पानी का जमाव या बहाव अवश्य होता है। यदि उत्तर दिशा के साथ पूर्व दिशा और ईशान कोण में नीचाई एवं पानी आ जाए तो यह सभी मिलकर उस स्थान को और अधिक प्रसिद्धि दिलाने के साथ-साथ आस्था बढ़ाने में भी सहायक होता है। यहां यमुना नदी वृंदावन की उत्तर दिशा से पूर्व दिशा की ओर घुमकर दक्षिण दिशा की ओर निकल गई है। वृंदावन की उत्तर दिशा में यमुना नदी के होने से वृन्दावन प्रसिद्ध है। और निधिवन वृन्दावन नगर के उत्तरी भाग में स्थित है जहां से यमुना नदी लगभग 300 मीटर दूरी पर स्थित है। उत्तर दिशा की वास्तुनुकूलता के कारण निधिवन प्रसिद्ध है। इसी के साथ निधिवन परिसर को उत्तर ईशान, पूर्व ईशान और दक्षिण आग्नेय का मार्ग प्रहार हो रहा

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आखिर हम 90 फीसदी सपने देखने के बाद उन्हें भूल क्यों जाते हैं, जान लीजिए कारण

सोने के दौरान हम कई बार रैपिड आई मूवमेंट से गुजरते हैं और इसी दौरान हमें सपने दिखाई देते हैं. यह मूवमेंट सोने के 10 मिनट बाद ही शुरू हो जाता है. सोते समय सपने देखना हमारे जीवन के काफी करीब से जुड़ा हुआ है. यूं तो सपनों पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं होता, इसी वजह से हमें अच्छे और बुरे सपने दोनों आते हैं. हालांकि, सपनों में दिखाई देने वाले दृश्य बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन थोड़े बहुत हमारी जिंदगी से अवश्य जुड़े होते हैं. अब सपनों को लेकर जो कुछ साधारण बातें हैं, उनके बारे में बताने की कोई खास जरूरत नहीं है क्योंकि आप भी सपने देखते हैं और आप अगर सपने देखते हैं तो आप ये भी जानते होंगे कि आप रात में सोते हुए जितने सपने देखते हैं, उनमें से ज्यादातर सपने नींद खुलते ही भूल जाते हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि हम कुल देखे जाने वाले सपनों में से करीब 90 फीसदी सपनों को याद नहीं रख पाते और उन्हें भूल जाते हैं. लेकिन ऐसा होता क्यों है कि हम ज्यादातर सपने भूल जाते हैं? आज हम आपको इसी सवाल का जवाब देंगे. सोने के दौरान रैपिड आई मूवमेंट से गुजरते हैं हम सपनों को लेकर वैज्ञानिकों ने तमाम रिसर्च और स्टडी की है. वैज्ञानिकों की मानें तो सोने के दौरान हम कई बार रैपिड आई मूवमेंट से गुजरते हैं और इसी दौरान हमें सपने दिखाई देते हैं. यह मूवमेंट सोने के 10 मिनट बाद ही शुरू हो जाता है. दरअसल, सोते वक्त के दौरान हमारा दिमाग पूरी तरह से शांत नहीं होता और एक्टिव मोड में रहता है. इस समय दिमाग में कुछ न कुछ चीजें चल रही होती हैं और यही वजह है कि हमें सपने दिखाई देते हैं. रात में सोने के बाद हर डेढ़ घंटे के अंतराल में हम में होते हैं. की ये अवधि करीब 20 से 25 मिनट तक रहती है और इसी दौरान हम तरह-तरह के सपने देखते हैं. इस तरह के लोगों को नहीं याद रहते सपने अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में नींद को लेकर स्टडी करने वाले रॉबर्ट स्टिकगोल्ड ने बीबीसी के साथ बातचीत करते हुए बताया कि कई लोग सपने में देखे गए दृश्यों को भूल जाते हैं जबकि कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपने सपने याद रहते हैं. स्टिकगोल्ड के मुताबिक इन दोनों परिस्थितियों के पीछे अलग-अलग वजह होती हैं. रॉबर्ट स्टिकगोल्ड की मानें तो जो लोग एक निश्चित समय पर सोते हैं और अलार्म बजने के बाद उठकर तुरंत ऑफिस जाने की तैयारियों में लग जाते हैं, ऐसे लोगों को सपने याद रखने की संभावना बहुत कम होती है. वहीं दूसरी ओर, जिन लोगों के पास ज्यादा काम नहीं होता और नींद खुलने के बाद भी आंखें बंद किए रहते हैं, उन्हें सपने भूलने की संभावना बहुत कम होती है. आपको बता दें कि कई रिपोर्ट में ये भी कहा जाता है कि जो लोग सपने भूल जाते हैं, वे मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं जबकि जिन लोगों को कई सपने याद रहते हैं वे मानसिक रूप से थोड़े अस्थिर हो सकते हैं. अधूरी नींद है कारण परेशान कर देने वाले सपनों का आना हमारी नींद के पूरी न होने से संबंध है.हमारा दिमाग नींद की कमी को पूरा करने के के लिए इस तरह के सपने दिखाता है. परेशान कर देने वाले सपने आने की यह प्रक्रिया नींद की रैपिड आई मूवमेंट स्टेज में होती है.  रैपिड आई मूवमेंट का मतलब होता है नींद के हर एक चक्र की आखिरी स्टेज पर आती है. यह वो समय है जिसमें व्यक्ति को सबसे ज्यादा सपने आते हैं.आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रात की नींद के कुल 4 से 6 चक्र होते है. तनाव है बड़ा कारण अक्सर काम का तनाव अन्य तमाम वजहों से होने वाले वाले तनाव की वजह से लोगों को नींद नहीं आती है. ऐसे में नींद के अधूरेपन के बीच व्यक्ति को जब भी गहरी और भरपूर नींद आती है तो रैपिड आई मूवमेंट नींद की स्टेज बढ़ जाती है .इसकी वजह से व्यक्ति को अधिक गहरे सपने आते हैं और कई बार ये सपने बहुत डरावने होते हैं.

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आपके सपने में कोई दूसरा व्यक्ति क्यों आता है

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पेट की गड़बड़ी के कारण भी सपने अजीबोगरीब आते हैं. यानी अगर आपका पेट गड़बड़ है तो आपको बुरे सपने आ सकते हैं. सपने हर सजीव जीव को आते हैं. खासतौर से इंसान सपने ज्यादा देखते हैं. कई बार हम ऐसे सपने देखते हैं जिनका कोई सिरपैर नहीं होता. वहीं कुछ सपने ऐसे होते हैं, जिनमें हम अपने जीवन का एक हिस्सा जी रहे होते हैं. यानी उस सपने में हम वह कार्य कर रहे होते हैं, जिसके बारे में हमने सोने से पहसे सोचा था. या फिर वो बात हमारे दिमाग में काफी दिनों से चल रही थी. लेकिन इन सब के बीच एक सपना ऐसा होता है, जिसे लेकर सब हैरान होते हैं. ये सपने होते तो आपके हैं, लेकिन उनमें दिखाई दूसरे लोग देते हैं, कई बार ये दूसरे लोग आप पर हावी भी हो जाते हैं. आज इस आर्टिकल में इसी के पीछे की साइंस समझने की कोशिश करेंगे. कोई आपके सपने में क्यों आता है? द ओरेकल ऑफ नाइट: द हिस्ट्री ऑफ साइंस ऑफ ड्रीम्स के लेखक और न्यूरोसाइंटिस्ट सिद्धार्थ रिबेइरो मानते हैं कि जब आपके सपने में कोई दूसरा व्यक्ति आता है तो इसका मतलब है कि वह व्यक्ति आपके जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है. आप भावनात्मक रूप से इस व्यक्ति से बहुत जुड़े हुए हैं. ये भावनात्मक जुड़ाव प्रेम, नफरत, गुस्सा किसी भी भाव का हो सकता है और जैसा भाव आपके मन में उस व्यक्ति के प्रति होगा वह उसी तरह का बर्ताव आपसे आपके सपने में करता है. जैसे कि अगर आपके मन में किसी के लिए प्रेम है तो वह व्यक्ति सपने में आपसे प्रेम करेगा और अगर आपके मन में उस व्यक्ति के लिए गुस्सा, डर या नफरत है तो वह व्यक्ति आपके सपने में आपके साथ उसी तरह का बर्ताव करेगा. क्या हम सपनों को समझ सकते हैं? मनोचिकित्सक रेचल राइट अपने एक इंटरव्यू में बताती हैं कि आप हर रोज कई तरह के सपने देखते हैं, ऐसे में उनकी व्याख्या करना और उन्हें असली जिंदगी में समझना बेहद मुश्किल होता है. कई बार हम सपने में खुद को उड़ता देखते हैं तो कई बार हम सपने में खुद को अमीर देखते हैं या फिर सपने में हम डर रहे होते हैं. ये हर भाव हमारे दिमाग की उपज होती है. हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि पेट की गड़बड़ी के कारण भी सपने अजीबोगरीब आते हैं. यानी अगर आपका पेट गड़बड़ है तो आपको बुरे सपने आ सकते हैं. सपनों को ऐसे समझें तो सुलझ जाएगा रहस्य कभी आप सपने में  कभी आप किसी जंगल में भटक जाते हैं तो कभी आप देखते हैं कि आप एग्जाम दे रहे हैं या कभी आप सपने में देखते हैं कि आप किसी ऊंची बिल्डिंग से गिर रहे हैं.  हम सब कुछ एक सपना समझकर भूल जाते हैं लेकिन हर सपने का कुछ मतलब होता है. सपने अचेतन अवस्था में बोले गए शब्दों की तरह हैं. सपने में हम जो भी देखते हैं, उसका कोई ना कोई अर्थ जरूर होता है. हम अपने सपने पढ़ सकते हैं अगर हम उन्हें समझने की कोशिश करें तो. आइए जानते हैं आखिर ये सपने हमसे क्या कहना चाहते हैं..किसी दोस्त या रिश्तेदार की मौत को देखना:  किसी प्रिय या करीबी की मौत देखने का मतलब है कि आपके जीवन में कुछ बदलाव आने वाले हैं.  कुछ पुरानी चीजें आपकी जिंदगी से बाहर निकलेंगी और नई चीजें उनकी जगह लेंगी. इसका मतलब यह भी हो सकता है कि आप किसी बुरे दौर से निकलने की कोशिश कर रहे हों.अगर आप सपने में देखते हैं कि कोई आपका पीछा कर रहा है तो इसका मतलब यह है कि आप अपनी लाइफ में किसी समस्या को सुलझाने के बजाए उससे भाग रहे हैं. आपका मस्तिष्क आपको यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि आपको अपनी जिंदगी की उलझनों का सामना करना चाहिए, उनसे भागना नहीं चाहिए. या फिर आप अगर देखते हैं कि आप भागना चाह रहे हैं लेकिन आपका कदम ही नहीं उठ रहा है तो इसके मायने यह है कि आपके अंदर आत्मविश्वास की कमी है.कई बार आप सपने में देखते हैं कि आप अंधेरे में फंसे हुए हैं. यह सपना कहता है कि आप किसी काम में बार-बार असफल हो रहे हैं. इस तरह के सपने किसी तरह के डर, बुराई, अज्ञानता, अचेतन अवस्था से है. आप अपनी जिंदगी में किसी विषय पर निर्णय नहीं ले पा रहे हैं और उसे लेकर संशय में हैं. अंधेरे में भटकने का मतलब है कि आपके अंदर निराशा, असुरक्षा या अवसाद है.कई बार आप सपने में देखते हैं कि आप ऊंचाई से गिर रहे हैं. इस सपने का संकेत यह है कि आपको कोई फिक्र सता रही है. आपको सफलता की सीढ़ी चढ़ने के बाद असफलता से डर लग रहा है.सपने में रोते हैं:  सपने में खुद को रोते हुए या चिल्लाते हुए देखना यह बताता है कि आप अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. इसका एक दूसरा मतलब यह है कि आपको बेचैनी, दुख, पीड़ा, उलझन, तनाव, अवसाद जैसी भावनाएं घेरे हुए हैं. अगर आपने सपने में देखा है कि आप किसी को मार रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप मर्डरर हैं. इसका मतलब है कि आपके अंदर खुद को लेकर या किसी और के प्रति गुस्सा भरा हुआ है. आपके अंदर किसी से बदला लेने की तीव्र भावना है या फिर आप अपनी किसी आदत से छुटकारा पाना चाह रहे हैं. कई बार आप बेहद अटपटे से सपने देखते हैं. आप अगर अपने सपने में देखते हैं कि आप न्यूड हैं तो इसकी सामान्य व्याख्या यह हो सकती है कि असुरक्षा, अपमान, शर्म या फिर आहत होने की भावनाएं आपको घेरे हुए हैं. एक दूसरा मतलब यह हो सकता है कि आप अपने मुखौटे को हटाकर बिल्कुल नैचुरल होना चाहते हैं. सपने में न्यूडिटी देखने को आजादी पाने और बंधन तोड़ने की इच्छा से भी देखा जा सकता है. कई बार आप देखते होंगे कि आप एग्जाम दे रहे हैं या फिर आपका एग्जाम देने जा रहे हैं. आपके व्यक्तित्व और जिंदगी का मूल्यांकन किया जा रहा

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Bhai Dooj 2023 : भाई दूज 2023 में कब है, यहां देखें भैया दूज की तारीख और समय

इस वर्ष कार्तिक माह में दीपावली के बाद शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 14 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 36 मिनट से 15 नवंबर को 1 बजकर 47 मिनट तक है. उदया तिथि के अनुसार भाई दूज 14 नवंबर को मनाई जाएगी. हिंदू कैलेंडर में कार्तिक मास खास माना जाता है। इस मास में दिवाली, छठ पूजा जैसे त्योहार व पर्व आते हैं। इसी महीने में भाई दूज भी मनाया जाता है। भाई दूज को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इसका एक और नाम यम द्वितीया भी है। इसी दिन चित्रगुप्त पूजा भी होती है। यहां देखें भाई दूज 2023 में कब है, भाई दूज 2023 की डेट और कब है भाई दूज तथा तिलक का शुभ मुहूर्त इस वर्ष कार्तिक माह में दीपावली के बाद शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 14 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 36 मिनट से 15 नवंबर को 1 बजकर 47 मिनट तक है. उदया तिथि के अनुसार भाई दूज 14 नवंबर को मनाई जाएगी. कैसे मनाया जाता है भाई दूज  भाई दूज के दिन बहनें भाई को तिलक लगाती हैं. तिलक लगाते समय भाई का मुख उत्तर या उत्तर पश्चिम दिशा में होना चाहिए. इस दिन रोली की जगह अष्टगंध से भाई को तिलक करना चाहिए. बहनों को शाम को दक्षिण मुखी दीप जलाना चाहिए. इसे भाई के लिए शुभ माना जाता है. इस दिन कमल की पूजा और नदी स्नान विशेष रूप से यमुना स्नान का भी विधान है. बनाएं भाई दूज स्पेशल लड्‌डू भाई दूज के दिन प्यारे भाई का मुंह मीठा करने के लिए बाजार से मिठाई लाने के बजाए घर में भाई दूज स्पेशल लड्‌डू बनाएं. सामग्री- विधि Diwali 2023 Date: इस साल कब है दिवाली, जानें तारीख और पूजा … Bhai Dooj कैसे मनाया जाता है इस दिन बहनें अपने भाइयों को पीढ़े पर बैठाकर उनको तिलक लगाती हैं और उनकी आरती करती हैं। फिर उनको उनकी पसंद का खाना बनाकर खिलाती हैं। भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया को ही यमुना जी ने यमराज को अपने घर पर सत्कारपूर्वक भोजन कराया था। इस पूजा व विधि से यमलोक के राज्य को सुख प्राप्ति हुई थी। मान्यता है कि तभी से इस त्योहार को मनाने की परंपरा चल रही है। Bhai Dooj Names in Hindi भाई दूज को यम द्वितीया, भाऊ बीज, भातृ द्वितीया, भाई द्वितीया और भातरु द्वितीया भी कहा जाता है। दिवाली के पांच दिन के पर्व भाई दूज पर आकर खत्म होते हैं। इसी दिन चित्रगुप्त भगवान की पूजा भी की जाती है।

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वेदों का अध्ययन कैसे करना चाहिए How should one study the Vedas

वेदों के अध्ययन को यादगार बनाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा रहे हैं: 1. **आचार्य के मार्गदर्शन में:** अगर संभव हो, एक गुरु या आचार्य के मार्गदर्शन में वेदों का अध्ययन करें। उनके प्रेरणास्त्रोत से आपको सही मार्ग दिखाया जा सकता है। 2. **नियमितता:** एक नियमित समय चुनें जब आप वेदों का अध्ययन कर सकते हैं, जैसे कि प्रातःकाल या शामकाल। 3. **मनोनिबद्धता:** अध्ययन के समय अपने मन को एकाग्र करने का प्रयास करें। अन्य विचारों को दूर रखें और ध्यान केंद्रित करें। 4. **समझने का प्रयास:** कोशिश करें कि आप वेदों के शब्दों के माध्यम से उनका अर्थ समझने का प्रयास करें, न कि सिर्फ रटने का। 5. **अध्ययन के नोट्स:** अध्ययन करते समय, महत्वपूर्ण बिंदुओं को नोट्स बनाएं, ताकि आप बाद में उन्हें दोहरा सकें। 6. **संवाद:** वेदों के बारे में दोस्तों और ज्ञानी लोगों के साथ विचारविमर्श करें, जिससे आपका ज्ञान विस्तार हो सकता है। 7. **आध्यात्मिक प्रयास:** अपने अध्ययन को सिर्फ विद्वान्ग्रंथों के रूप में नहीं देखें, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव के रूप में भी देखें। 8. **समर्पण:** वेदों के अध्ययन में समर्पण और धैर्य बनाए रखें, क्योंकि यह एक गहरा और लम्बा प्रक्रिया हो सकता है। 9. **स्वाध्याय:** वेदों के अध्ययन से प्राप्त ज्ञान को अपने जीवन में अमल में लाने का प्रयास करें और स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) का महत्व समझें। यदि आप इन सुझावों का पालन करते हैं, तो वेदों के अध्ययन को यादगार और सार्थक बना सकते हैं।

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एकादशी 2024 तारीखें, 2024 एकादशी व्रत के दिन, एकादशी 2024 कैलेंडर, 2024 में एकादशी list hindi mai

एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक महत्वपूर्ण दिन है। हिंदू कैलेंडर में प्रत्येक चंद्र पखवाड़े के ग्यारहवें दिन एकादशी आती है। हिंदू महीने में दो एकादशियां होती हैं एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। नीचे 2024 में एकादशी तिथियों की सूची दी गई है। सभी तिथियां भारत में अपनाए जाने वाले हिंदू कैलेंडर के अनुसार हैं। आपके स्थान और लोगों के संप्रदाय के अनुसार एकादशी का दिन एक दिन बदल सकता है। दिनांक त्यौहार रविवार, 07 जनवरी सफला एकादशी रविवार, 21 जनवरी पौष पुत्रदा एकादशी मंगलवार, 06 फरवरी षटतिला एकादशी मंगलवार, 20 फरवरी जया एकादशी बुधवार, 06 मार्च विजया एकादशी बुधवार, 20 मार्च आमलकी एकादशी शुक्रवार, 05 अप्रैल पापमोचिनी एकादशी शुक्रवार, 19 अप्रैल कामदा एकादशी शनिवार, 04 मई वरुथिनी एकादशी रविवार, 19 मई मोहिनी एकादशी रविवार, 02 जून अपरा एकादशी मंगलवार, 18 जून निर्जला एकादशी मंगलवार, 02 जुलाई योगिनी एकादशी बुधवार, 17 जुलाई देवशयनी एकादशी बुधवार, 31 जुलाई कामिका एकादशी शुक्रवार, 16 अगस्त श्रावण पुत्रदा एकादशी गुरुवार, 29 अगस्त अजा एकादशी शनिवार, 14 सितंबर परिवर्तिनी एकादशी शनिवार, 28 सितंबर इन्दिरा एकादशी सोमवार, 14 अक्टूबर पापांकुशा एकादशी सोमवार, 28 अक्टूबर रमा एकादशी मंगलवार, 12 नवंबर देवुत्थान एकादशी मंगलवार, 26 नवंबर उत्पन्ना एकादशी बुधवार, 11 दिसंबर मोक्षदा एकादशी गुरुवार, 26 दिसंबर सफला एकादशी एकादशी व्रत से जुड़ा यह पृष्ठ यह जानकारी तो देता ही है कि एकादशी कब है, लेकिन साथ ही इस पर्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं की भी विस्तार से विवेचना करता है। हिंदू धर्म में एकादशी या ग्यारस एक महत्वपूर्ण तिथि है। एकादशी व्रत की बड़ी महिमा है। एक ही दशा में रहते हुए अपने आराध्य देव का पूजन व वंदन करने की प्रेरणा देने वाला व्रत ही एकादशी व्रत कहलाता है। पद्म पुराण के अनुसार स्वयं महादेव ने नारद जी को उपदेश देते हुए कहा था, एकादशी महान पुण्य देने वाली होती है। कहा जाता है कि जो मनुष्य एकादशी का व्रत रखता है उसके पितृ और पूर्वज कुयोनि को त्याग स्वर्ग लोक चले जाते हैं। आइए, एकादशी से जुड़े अनेकानेक आयामों को गहराई से देखते हैं क्या है एकादशी ? हिंदू पंचांग की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। एकादशी संस्कृत भाषा से लिया गया शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘ग्यारह’। प्रत्येक महीने में एकादशी दो बार आती है–एक शुक्ल पक्ष के बाद और दूसरी कृष्ण पक्ष के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं। प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना अलग महत्व है। वैसे तो हिन्दू धर्म में ढेर सारे व्रत आदि किए जाते हैं लेकिन इन सब में एकादशी का व्रत सबसे पुराना माना जाता है। हिन्दू धर्म में इस व्रत की बहुत मान्यता है। एकादशी का महत्व पुराणों के अनुसार एकादशी को ‘हरी दिन’ और ‘हरी वासर’ के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत को वैष्णव और गैर-वैष्णव दोनों ही समुदायों द्वारा मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि एकादशी व्रत हवन, यज्ञ , वैदिक कर्म-कांड आदि से भी अधिक फल देता है। इस व्रत को रखने की एक मान्यता यह भी है कि इससे पूर्वज या पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्कन्द पुराण में भी एकादशी व्रत के महत्व के बारे में बताया गया है। जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है उनके लिए एकादशी के दिन गेहूं, मसाले और सब्जियां आदि का सेवन वर्जित होता है। भक्त एकादशी व्रत की तैयारी एक दिन पहले यानि कि दशमी से ही शुरू कर देते हैं। दशमी के दिन श्रद्धालु प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान करते हैं और इस दिन वे बिना नमक का भोजन ग्रहण करते हैं। एकादशी व्रत का नियम एकादशी व्रत करने का नियम बहुत ही सख्त होता है जिसमें व्रत करने वाले को एकादशी तिथि के पहले सूर्यास्त से लेकर एकादशी के अगले सूर्योदय तक उपवास रखना पड़ता है। यह व्रत किसी भी लिंग या किसी भी आयु का व्यक्ति स्वेच्छा से रख सकता है। एकादशी व्रत करने की चाह रखने वाले लोगों को दशमी (एकादशी से एक दिन पहले) के दिन से कुछ जरूरी नियमों को मानना पड़ता है। दशमी के दिन से ही श्रद्धालुओं को मांस-मछली, प्याज, दाल (मसूर की) और शहद जैसे खाद्य-पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। रात के समय भोग-विलास से दूर रहते हुए, पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह दांत साफ़ करने के लिए लकड़ी का दातून इस्तेमाल न करें। इसकी जगह आप नींबू, जामुन या फिर आम के पत्तों को लेकर चबा लें और अपनी उँगली से कंठ को साफ कर लें। इस दिन वृक्ष से पत्ते तोड़ना भी ‍वर्जित होता है इसीलिए आप स्वयं गिरे हुए पत्तों का इस्तेमाल करें और यदि आप पत्तों का इतज़ाम नहीं कर पा रहे तो आप सादे पानी से कुल्ला कर लें। स्नान आदि करने के बाद आप मंदिर में जाकर गीता का पाठ करें या फिर पंडितजी से गीता का पाठ सुनें। सच्चे मन से ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जप करें। भगवान विष्णु का स्मरण और उनकी प्रार्थना करें। इस दिन दान-धर्म की भी बहुत मान्यता है इसीलिए अपनी यथाशक्ति दान करें। एकादशी के अगले दिन को द्वादशी के नाम से जाना जाता है। द्वादशी दशमी और बाक़ी दिनों की तरह ही आम दिन होता है। इस दिन सुबह जल्दी नहाकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और सामान्य भोजन को खाकर व्रत को पूरा करते हैं। इस दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न और दक्षिणा आदि देने का रिवाज़ है। ध्यान रहे कि श्रद्धालु त्रयोदशी आने से पहले ही व्रत का पारण कर लें। इस दिन कोशिश करनी चाहिए कि एकादशी व्रत का नियम पालन करें और उसमें कोई चूक न हो। एकादशी व्रत का भोजन शास्त्रों के अनुसार श्रद्धालु एकादशी के दिन आप इन वस्तुओं और मसालों का प्रयोग अपने व्रत के भोजन में कर सकते हैं ताजे फलमेवे–  चीनी–  कुट्टू–  नारियल–  जैतून–  दूध–  अदरक–  काली मिर्च–  सेंधा नमक–  आलू–  साबूदाना–  शकरकंद एकादशी व्रत का भोजन सात्विक होना चाहिए। कुछ व्यक्ति यह व्रत बिना पानी पिए संपन्न करते हैं जिसे निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। एकादशी को क्या न करें ●  वृक्ष से पत्ते न तोड़ें।●  घर में झाड़ू न लगाएं। ऐसा इसीलिए किया जाता है क्यूंकि घर में झाड़ू आदि लगाने से चीटियों या छोटे-छोटे जीवों

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 Masik Kalashtami 2023- मासिक कालाष्टमी आज, जानें शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और उपाय

महत्वपूर्ण जानकारी अश्विन, कृष्ण अष्टमी, अक्टूबर कालाष्टमी व्रत 2023 शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2023 अष्टमी तिथि प्रारम्भ: 06 अक्टूबर 2023 प्रातः 6:35 बजे अष्टमी तिथि समाप्त: 07 अक्टूबर 2023 को सुबह 8:08 बजे कालाष्टमी व्रत भगवान भैरव के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। यह व्रत प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान भैरव के भक्त पूरे दिन उपवास रखते है और वर्ष में सभी कालाष्टमी के दिन उनकी पूजा करते हैं। कालाष्टमी, जिसे काला अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण कालाष्टमी, जिसे कालभैरव जयंती के रूप में जाना जाता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव उसी दिन भैरव के रूप में प्रकट हुए थे। कालभैरव जयंती को भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कालाष्टमी व्रत सप्तमी तीथ पर मनाया जा सकता है। धार्मिक पाठ के अनुसार व्रतराज कालाष्टमी का व्रत उस दिन मनाया जाना चाहिए जब अष्टमी तिथि रात्रि के समय रहती है। कालाष्टमी व्रत का महत्व काल-भैरव भगवान शिव का ही एक रूप हैं, ऐसे में कहा जाता है कि जो कोई भी भक्त इस दिन सच्ची निष्ठा और भक्ति से कालभैरव की पूजा करता है, भगवान शिव उस व्यक्ति के जीवन से सभी नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालकर उसे सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. काल भैरव पूजा विधि इस दिन सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करके व्रत करना चाहिए और फिर किसी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव या भैरव के मंदिर में जा कर पूजा करनी चाहिए. शाम के समय शिव और पार्वती और भैरव जी की पूजा करें. क्योंकि भैरव को तांत्रिकों का देवता माना जाता है इसलिए इनकी पूजा रात में भी की जाती है.काल भैरव की पूजा में दीपक, काले तिल, उड़द और सरसों के तेल को अवश्य शामिल करें. व्रत पूरा करने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियां खिलाएं. काल भैरव मंत्र- ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम: इन उपायों से करें काल भैरव को प्रसन्न काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए कालाष्टमी के दिन भगवान भैरव की प्रतिमा के आगे सरसों के तेल का दीपक जलाएं. इस दिन श्रीकालभैरवाष्टकम् का पाठ करें और 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ‘ॐ नम: शिवाय’ लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं. कालाष्टमी के दिन काले कुत्ते को मीठी रोटी खिलाना काफी शुभ माना जाता है अगर आसपास कोई काला कुत्ता नहीं है तो किसी भी कुत्ते को मीठी रोटी खिला सकते हैं. इस दिन किसी गरीब, भिखारी या कोढ़ी को वस्त्र का दान करना काफी शुभ माना जाता है. कालाष्टमी व्रत तिथि 2023 इस प्रकार है :- कालाष्टमी व्रत दिनांक 2023 इस प्रकार है:- कालाष्टमी व्रत जनवरी में शनिवार, 14 जनवरी 2023माघ, कृष्ण अष्टमी14 जनवरी 2023 शाम 7:23 बजे – 15 जनवरी 2023 शाम 7:45 बजे कालाष्टमी व्रत फरवरी में सोमवार, 13 फरवरी 2023फाल्गुन, कृष्ण अष्टमी13 फरवरी 2023 सुबह 9:46 बजे – 14 फरवरी 2023 सुबह 9:04 बजे मार्च में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 14 मार्च 2023चैत्र, कृष्ण अष्टमी14 मार्च 2023 को रात 8:22 बजे – 15 मार्च 2023 को शाम 6:46 बजे कालाष्टमी व्रत अप्रैल में गुरुवार, 13 अप्रैल 2023वैशाख, कृष्ण अष्टमी13 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 3:44 – 14 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 1:34 बजे मई में कालाष्टमी व्रत शुक्रवार, 12 मई 2023ज्येष्ठ, कृष्ण अष्टमी12 मई 2023 सुबह 9:07 बजे – 13 मई 2023 सुबह 6:51 बजे जून में कालाष्टमी व्रत शनिवार, 10 जून 2023आषाढ़, कृष्ण अष्टमी10 जून 2023 दोपहर 2:02 बजे – 11 जून 2023 दोपहर 12:06 बजे कालाष्टमी व्रत जुलाई में रविवार, 09 जुलाई 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी09 जुलाई 2023 रात 8:00 बजे – 10 जुलाई 2023 शाम 6:44 बजे अगस्त में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 08 अगस्त 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी08 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 4:14 बजे – 09 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 3:52 बजे कालाष्टमी व्रत सितंबर में बुधवार, 06 सितंबर 2023भाद्रपद, कृष्ण अष्टमी06 सितंबर 2023 अपराह्न 3:38 बजे – 07 सितंबर 2023 अपराह्न 4:14 बजे कालाष्टमी व्रत अक्टूबर में शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2023अश्विना, कृष्ण अष्टमी06 अक्टूबर 2023 सुबह 6:35 बजे – 07 अक्टूबर 2023 सुबह 8:08 बजे कालाष्टमी व्रत नवंबर में रविवार, 16 नवंबर 2023कार्तिका, कृष्ण अष्टमी05 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 1:00 बजे – 06 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 3:18 बजे दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे

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