Ahoi Ashtami 2024: महिलाएं क्यों पहनती हैं खास स्याहु माला? जानिए इसका धार्मिक महत्व

Ahoi Ashtami 2024: महिलाएं क्यों पहनती हैं खास स्याहु माला? जानिए इसका धार्मिक महत्व 🌸 Ahoi Ashtami एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जब माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन स्याहु माता की पूजा की जाती है और विशेष स्याहु माला को धारण किया जाता है। आइए जानें, इस माला का महत्व और इसे पहनने का धार्मिक कारण। Ahoi Ashtami का महत्व अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं स्याहु माता की पूजा करती हैं, जो संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद देती हैं। इस व्रत को संतान प्राप्ति के लिए भी किया जाता है, और मान्यता है कि स्याहु माता कभी भी अपनी भक्तों को निराश नहीं करतीं। यह व्रत विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो अपनी संतान की भलाई और उनके जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए पूजा करती हैं। स्याहु माला का धार्मिक महत्व अहोई अष्टमी पर स्याहु माला पहनना एक महत्वपूर्ण परंपरा है। यह माला आमतौर पर चांदी की होती है और इसे लाल या सफेद धागे में पिरोया जाता है, जिसमें स्याहु माता की तस्वीर और चांदी के मोती लगे होते हैं। हर साल माला में दो चांदी के मोती जोड़े जाते हैं, जो संतान की वृद्धि और उनकी सुरक्षा का प्रतीक हैं। इसे पहनने से माना जाता है कि स्याहु माता प्रसन्न होती हैं और संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद देती हैं। How to Worship Syahu Mata on Ahoi Ashtami स्याहु माला कब तक पहनें? इस माला को दिवाली तक पहना जाता है और फिर इसे संभालकर रख दिया जाता है। पूजा के दौरान रखा गया मिट्टी के घड़े का पानी दिवाली के दिन संतान को नहलाने के लिए उपयोग किया जाता है। यह माना जाता है कि यह स्याहु माता का आशीर्वाद होता है, जिससे संतान को लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य का वरदान मिलता है निष्कर्ष: Ahoi Ashtami का व्रत और स्याहु माला का धार्मिक महत्व माताओं के लिए बेहद खास है। इस दिन की पूजा और व्रत से संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 🌸 #AhoiAshtami2024 #SyahuMala #AhoiMata #SantanKiKhushhali #ReligiousTradition

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Ahoi Ashtami 2024: अहोई अष्टमी के दिन इस स्तोत्र का पाठ करने से मिलेगा सभी क्षेत्रों में सफलता

अहोई अष्टमी:धराधरेन्द्र नन्दिनी शशंक मालि संगिनी, सुरेश शक्ति वर्धिनी नितान्तकान्त कामिनी। निशाचरेन्द्र मर्दिनी त्रिशूल शूल धारिणी, मनोव्यथा विदारिणी शिव तनोतु पार्वती । भुजंग तल्प शामिनी महोग्रकान्त भागिनी, प्रकाश पुंज दायिनी विचित्र चित्र कारिणी। प्रचण्ड शत्रुधर्षिणी दया प्रवाह वर्षिणी, सदा सुभग्य दायिनी शिव तनोतु पार्वती। । प्रकृष्ट सृष्टि कारिका प्रचण्ड नृत्य नर्तिका , पिनाक पाणिधारिका गिरिश ऋग मालिका। समस्त भक्त पालिका पीयूष पूर्ण वर्षिका, कुभाग्य रेखमर्जिका शिव तनोतु पार्वती । तपश्चरी कुमारिका जगत्परा प्रहेलिका, विशुद्ध भाव साधिका सुधा सरित्प्रवाहिका। प्रयत्न पक्ष पौसिका सदार्धि भाव तोषिका, शनि ग्रहादि तर्जिका शिव तनोतु पार्वती । शुभंकरी शिवंकरी विभाकरी निशाचरी, नभश्चरी धराचरी समस्त सृष्टि संचरी । तमोहरी मनोहरी मृगांक मालि सुन्दरी, सदोगताप संचरी,शिवं तनोतु पार्वती।। पार्वती पंचक नित्यमधीयते यत कुमारिका, दृष्कृतं निखिलं हत्वा वरं प्रप्नोति सुन्दरम।। अहोई अष्टमी :पार्वती पंचक स्तोत्र: देवी पार्वती की स्तुति पार्वती पंचक स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है जो देवी पार्वती की स्तुति करता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए लाभदायक माना जाता है जो विवाह योग्य हैं या सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। यह स्तोत्र देवी पार्वती से सुंदर वर प्राप्त करने और दाम्पत्य जीवन में सुख-शांति लाने के लिए मांगा जाता है। अहोई अष्टमी:स्तोत्र का महत्व अहोई अष्टमी :स्तोत्र का पाठ पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ संस्कृत में होता है। आप इस स्तोत्र का पाठ किसी अनुभवी ब्राह्मण से करवा सकते हैं या स्वयं भी कर सकते हैं। स्तोत्र का अर्थ समझने के लिए आप हिंदी अनुवाद भी देख सकते हैं। अहोई अष्टमी:यहाँ स्तोत्र का एक अंश दिया गया है: धराधरेन्द्र नन्दिनी शशंक मालि संगिनी, सुरेश शक्ति वर्धिनी नितान्तकान्त कामिनी। निशाचरेन्द्र मर्दिनी त्रिशूल शूल धारिणी, मनोव्यथा विदारिणी शिव तनोतु पार्वती । अर्थ: धरती के स्वामी शंकर की पत्नी, चंद्रमा के साथ विहार करने वाली, देवों की शक्ति को बढ़ाने वाली, अत्यंत मनोहारी और कामना पूर्ण करने वाली, राक्षसों के चंद्रमा का नाश करने वाली, त्रिशूल धारण करने वाली, मन के दुःखों को दूर करने वाली, शिवजी पार्वती को प्रदान करें। अहोई अष्टमी:स्तोत्र का जाप कैसे करें अहोई अष्टमी:स्तोत्र के लाभ पार्वती पंचक स्तोत्र का नियमित जाप करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं, जैसे कि: यदि आप पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ करना चाहते हैं, तो आप किसी अनुभवी ब्राह्मण से संपर्क कर सकते हैं या फिर इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। अस्वीकरण: यह जानकारी केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले किसी विद्वान से सलाह लेना उचित होता है। क्या आप पार्वती पंचक स्तोत्र के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं? यदि आप स्तोत्र का पूरा पाठ, इसका हिंदी अनुवाद, या इसके जाप के तरीके के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, तो कृपया मुझे बताएं। आप यह भी पूछ सकते हैं: मुझे आपकी मदद करने में खुशी होगी।

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Ahoi Ashtami 2024 Bhog: संतान की खुशहाली और समृद्धि के लिए विशेष भोग

Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी 2024: संतान की खुशहाली और समृद्धि के लिए विशेष भोग Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जहाँ माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन विशेष भोग अहोई माता को अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें संतान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी 2024 के लिए विशेष भोग: भोग लगाते समय ध्यान रखने योग्य बातें: अहोई अष्टमी का महत्व: Ahoi Ashtami अहोई अष्टमी का व्रत माताओं के लिए संतान की दीर्घायु, सुख, और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस दिन माता अहोई का व्रत रखने से माना जाता है कि संतान के जीवन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और उनके जीवन में खुशियां आती हैं। व्रत के नियम: SEO के अनुसार उपयोगी टिप्स: निष्कर्ष: अहोई अष्टमी का व्रत और पूजा माता-पिता के लिए संतान की दीर्घायु और समृद्धि की कामना का एक पवित्र अवसर है। इस दिन के भोग और पूजा से संतान की सभी बाधाओं को दूर करने में सहायता मिलती है।

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Ram Chalisa:राम चालीसा

Ram Chalisa:श्री राम चालीसा: भगवान राम की स्तुति का एक पवित्र गीत Ram Chalisa:श्री राम चालीसा भगवान राम के प्रति भक्ति और श्रद्धा का एक प्रतीक है। यह चालीसा भगवान राम के जीवन, उनके कार्यों और उनके गुणों का वर्णन करती है। राम चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है Ram Chalisa और आत्मविश्वास बढ़ता है। Ram Chalisa:श्री राम चालीसा की विशेषताएं Ram Chalisa:श्री राम चालीसा का पाठ कैसे करें? Ram Chalisa श्री राम चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके भगवान राम के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए। Ram Chalisa नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है और आत्मिक शक्ति मिलती है। Ram Chalisa:राम चालीसा ॥ दोहा ॥आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनंवैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं ॥ चौपाई ॥श्री रघुबीर भक्त हितकारी ।सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥ निशि दिन ध्यान धरै जो कोई ।ता सम भक्त और नहिं होई ॥ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥ जय जय जय रघुनाथ कृपाला ।सदा करो सन्तन प्रतिपाला ॥ दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ॥ तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला ।रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥ तुम अनाथ के नाथ गोसाईं ।दीनन के हो सदा सहाई ॥ ब्रह्मादिक तव पार न पावैं ।सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥ चारिउ वेद भरत हैं साखी ।तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥ गुण गावत शारद मन माहीं ।सुरपति ताको पार न पाहीं ॥ 10 ॥ नाम तुम्हार लेत जो कोई ।ता सम धन्य और नहिं होई ॥राम नाम है अपरम्पारा ।चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥ गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों ।तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ॥ शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।महि को भार शीश पर धारा ॥ फूल समान रहत सो भारा ।पावत कोउ न तुम्हरो पारा ॥ भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।तासों कबहुँ न रण में हारो ॥ नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा ।सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥ लषन तुम्हारे आज्ञाकारी ।सदा करत सन्तन रखवारी ॥ ताते रण जीते नहिं कोई ।युद्ध जुरे यमहूँ किन होई ॥ महा लक्ष्मी धर अवतारा ।सब विधि करत पाप को छारा ॥ 20 ॥ सीता राम पुनीता गायो ।भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥ घट सों प्रकट भई सो आई ।जाको देखत चन्द्र लजाई ॥ सो तुमरे नित पांव पलोटत ।नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥ सिद्धि अठारह मंगल कारी ।सो तुम पर जावै बलिहारी ॥ औरहु जो अनेक प्रभुताई ।सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥ इच्छा ते कोटिन संसारा ।रचत न लागत पल की बारा ॥ जो तुम्हरे चरनन चित लावै ।ताको मुक्ति अवसि हो जावै ॥ सुनहु राम तुम तात हमारे ।तुमहिं भरत कुल- पूज्य प्रचारे ॥ तुमहिं देव कुल देव हमारे ।तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥ जो कुछ हो सो तुमहीं राजा ।जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥ 30 ॥ रामा आत्मा पोषण हारे ।जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥ जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा ।निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥ सत्य सत्य जय सत्य- ब्रत स्वामी ।सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥ सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।सो निश्चय चारों फल पावै ॥ सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ॥ ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा ।नमो नमो जय जापति भूपा ॥ धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।नाम तुम्हार हरत संतापा ॥ सत्य शुद्ध देवन मुख गाया ।बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥ सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।तुमहीं हो हमरे तन मन धन ॥ याको पाठ करे जो कोई ।ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥ 40 ॥ आवागमन मिटै तिहि केरा ।सत्य वचन माने शिव मेरा ॥और आस मन में जो ल्यावै ।तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥ साग पत्र सो भोग लगावै ।सो नर सकल सिद्धता पावै ॥ अन्त समय रघुबर पुर जाई ।जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥ श्री हरि दास कहै अरु गावै ।सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥ ॥ दोहा ॥सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय ।हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ॥ राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय ।जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय ॥

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Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा

Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा: जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा जैन धर्म के पहले तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की स्तुति में लिखा गया एक भक्ति गीत है। यह चालीसा भगवान आदिनाथ के जीवन, उनके कर्मों और उनके उपदेशों का वर्णन करता है। Shri Aadinath Chalisa जैन धर्म में भगवान आदिनाथ को पहले तीर्थंकर होने के कारण बहुत सम्मान दिया जाता है। Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा की विशेषताएं Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ कैसे करें? Shri Aadinath Chalisa श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके भगवान आदिनाथ के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए। नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है Shri Aadinath Chalisa और आत्मिक शक्ति मिलती है। Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा ॥ दोहा॥शीश नवा अरिहंत को,सिद्धन को, करूं प्रणाम ।उपाध्याय आचार्य का,ले सुखकारी नाम ॥ सर्व साधु और सरस्वती,जिन मन्दिर सुखकार ।आदिनाथ भगवान को,मन मन्दिर में धार ॥ ॥ चौपाई ॥जै जै आदिनाथ जिन स्वामी ।तीनकाल तिहूं जग में नामी ॥ वेष दिगम्बर धार रहे हो ।कर्मो को तुम मार रहे हो ॥ हो सर्वज्ञ बात सब जानो ।सारी दुनियां को पहचानो ॥ नगर अयोध्या जो कहलाये ।राजा नाभिराज बतलाये ॥4॥ मरुदेवी माता के उदर से ।चैत वदी नवमी को जन्मे ॥ तुमने जग को ज्ञान सिखाया ।कर्मभूमी का बीज उपाया ॥ कल्पवृक्ष जब लगे बिछरने ।जनता आई दुखड़ा कहने ॥ सब का संशय तभी भगाया ।सूर्य चन्द्र का ज्ञान कराया ॥8॥ खेती करना भी सिखलाया ।न्याय दण्ड आदिक समझाया ॥ तुमने राज किया नीति का ।सबक आपसे जग ने सीखा ॥ पुत्र आपका भरत बताया ।चक्रवर्ती जग में कहलाया ॥ बाहुबली जो पुत्र तुम्हारे ।भरत से पहले मोक्ष सिधारे ॥12॥ सुता आपकी दो बतलाई ।ब्राह्मी और सुन्दरी कहलाई ॥ उनको भी विध्या सिखलाई ।अक्षर और गिनती बतलाई ॥ एक दिन राजसभा के अंदर ।एक अप्सरा नाच रही थी ॥ आयु उसकी बहुत अल्प थी ।इसलिए आगे नहीं नाच रही थी ॥16॥ विलय हो गया उसका सत्वर ।झट आया वैराग्य उमड़कर ॥ बेटो को झट पास बुलाया ।राज पाट सब में बंटवाया ॥ छोड़ सभी झंझट संसारी ।वन जाने की करी तैयारी ॥ राव हजारों साथ सिधाए ।राजपाट तज वन को धाये ॥20॥ लेकिन जब तुमने तप किना ।सबने अपना रस्ता लीना ॥ वेष दिगम्बर तजकर सबने ।छाल आदि के कपड़े पहने ॥ भूख प्यास से जब घबराये ।फल आदिक खा भूख मिटाये ॥ तीन सौ त्रेसठ धर्म फैलाये ।जो अब दुनियां में दिखलाये ॥24॥ छै: महीने तक ध्यान लगाये ।फिर भजन करने को धाये ॥ भोजन विधि जाने नहि कोय ।कैसे प्रभु का भोजन होय ॥ इसी तरह बस चलते चलते ।छः महीने भोजन बिन बीते ॥ नगर हस्तिनापुर में आये ।राजा सोम श्रेयांस बताए ॥28॥ याद तभी पिछला भव आया ।तुमको फौरन ही पड़धाया ॥ रस गन्ने का तुमने पाया ।दुनिया को उपदेश सुनाया ॥ पाठ करे चालीसा दिन ।नित चालीसा ही बार ॥ चांदखेड़ी में आय के ।खेवे धूप अपार ॥32॥ जन्म दरिद्री होय जो ।होय कुबेर समान ॥ नाम वंश जग में चले ।जिनके नहीं संतान ॥ तप कर केवल ज्ञान पाया ।मोक्ष गए सब जग हर्षाया ॥ अतिशय युक्त तुम्हारा मन्दिर ।चांदखेड़ी भंवरे के अंदर ॥36॥ उसका यह अतिशय बतलाया ।कष्ट क्लेश का होय सफाया ॥ मानतुंग पर दया दिखाई ।जंजीरे सब काट गिराई ॥ राजसभा में मान बढ़ाया ।जैन धर्म जग में फैलाया ॥ मुझ पर भी महिमा दिखलाओ ।कष्ट भक्त का दूर भगाओ ॥40॥ ॥ सोरठा ॥पाठ करे चालीसा दिन,नित चालीसा ही बार ।चांदखेड़ी में आय के,खेवे धूप अपार ॥ जन्म दरिद्री होय जो,होय कुबेर समान ।नाम वंश जग में चले,जिनके नहीं संतान ॥

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Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा

Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा: ग्रहों की शांति के लिए Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा एक हिंदू धार्मिक ग्रंथ है जो नवग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु) की स्तुति में लिखा गया है। यह माना जाता है कि नवग्रह हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं Navgrah Chalisa और इनकी कृपा पाने के लिए नवग्रह चालीसा का पाठ किया जाता है। Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा की विशेषताएं: Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा का पाठ कैसे करें? Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके सभी नवग्रहों को प्रणाम करना चाहिए। Navgrah Chalisa नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से ग्रहों की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा ॥ दोहा ॥श्री गणपति गुरुपद कमल,प्रेम सहित सिरनाय ।नवग्रह चालीसा कहत,शारद होत सहाय ॥ जय जय रवि शशि सोम बुध,जय गुरु भृगु शनि राज।जयति राहु अरु केतु ग्रह,करहुं अनुग्रह आज ॥ ॥ चौपाई ॥॥ श्री सूर्य स्तुति ॥प्रथमहि रवि कहं नावौं माथा,करहुं कृपा जनि जानि अनाथा ।हे आदित्य दिवाकर भानू,मैं मति मन्द महा अज्ञानू ।अब निज जन कहं हरहु कलेषा,दिनकर द्वादश रूप दिनेशा ।नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर,अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर । ॥ श्री चन्द्र स्तुति ॥शशि मयंक रजनीपति स्वामी,चन्द्र कलानिधि नमो नमामि ।राकापति हिमांशु राकेशा,प्रणवत जन तन हरहुं कलेशा ।सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर,शीत रश्मि औषधि निशाकर ।तुम्हीं शोभित सुन्दर भाल महेशा,शरण शरण जन हरहुं कलेशा । ॥ श्री मंगल स्तुति ॥जय जय जय मंगल सुखदाता,लोहित भौमादिक विख्याता ।अंगारक कुज रुज ऋणहारी,करहुं दया यही विनय हमारी ।हे महिसुत छितिसुत सुखराशी,लोहितांग जय जन अघनाशी ।अगम अमंगल अब हर लीजै,सकल मनोरथ पूरण कीजै । ॥ श्री बुध स्तुति ॥जय शशि नन्दन बुध महाराजा,करहु सकल जन कहं शुभ काजा ।दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना,कठिन कष्ट हरि करि कल्याणा ।हे तारासुत रोहिणी नन्दन,चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन ।पूजहिं आस दास कहुं स्वामी,प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी । ॥ श्री बृहस्पति स्तुति ॥जयति जयति जय श्री गुरुदेवा,करूं सदा तुम्हरी प्रभु सेवा ।देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी,इन्द्र पुरोहित विद्यादानी ।वाचस्पति बागीश उदारा,जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा ।विद्या सिन्धु अंगिरा नामा,करहुं सकल विधि पूरण कामा । ॥ श्री शुक्र स्तुति ॥शुक्र देव पद तल जल जाता,दास निरन्तन ध्यान लगाता ।हे उशना भार्गव भृगु नन्दन,दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन ।भृगुकुल भूषण दूषण हारी,हरहुं नेष्ट ग्रह करहुं सुखारी ।तुहि द्विजबर जोशी सिरताजा,नर शरीर के तुमही राजा । ॥ श्री शनि स्तुति ॥जय श्री शनिदेव रवि नन्दन,जय कृष्णो सौरी जगवन्दन ।पिंगल मन्द रौद्र यम नामा,वप्र आदि कोणस्थ ललामा ।वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा,क्षण महं करत रंक क्षण राजा ।ललत स्वर्ण पद करत निहाला,हरहुं विपत्ति छाया के लाला । ॥ श्री राहु स्तुति ॥जय जय राहु गगन प्रविसइया,तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया ।रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा,शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा ।सैहिंकेय तुम निशाचर राजा,अर्धकाय जग राखहु लाजा ।यदि ग्रह समय पाय हिं आवहु,सदा शान्ति और सुख उपजावहु । ॥ श्री केतु स्तुति ॥जय श्री केतु कठिन दुखहारी,करहु सुजन हित मंगलकारी ।ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला,घोर रौद्रतन अघमन काला ।शिखी तारिका ग्रह बलवान,महा प्रताप न तेज ठिकाना ।वाहन मीन महा शुभकारी,दीजै शान्ति दया उर धारी । ॥ नवग्रह शांति फल ॥तीरथराज प्रयाग सुपासा,बसै राम के सुन्दर दासा ।ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी,दुर्वासाश्रम जन दुख हारी ।नवग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु,जन तन कष्ट उतारण सेतू ।जो नित पाठ करै चित लावै,सब सुख भोगि परम पद पावै ॥ ॥ दोहा ॥धन्य नवग्रह देव प्रभु,महिमा अगम अपार ।चित नव मंगल मोद गृह,जगत जनन सुखद्वार ॥ यह चालीसा नवोग्रह,विरचित सुन्दरदास ।पढ़त प्रेम सुत बढ़त सुख,सर्वानन्द हुलास ॥ ॥ इति श्री नवग्रह चालीसा ॥

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Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा

Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा: भगवान विष्णु की भक्ति का एक मार्ग Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा भगवान विष्णु की स्तुति में लिखा गया एक भक्ति गीत है। यह चालीसा भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों और उनके गुणों का वर्णन करता है। भक्तजन इस चालीसा का पाठ करते हुए Vishnu Chalisa भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा की विशेषताएं: Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा का पाठ कैसे करें? विष्णु चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके भगवान विष्णु के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए। Vishnu Chalisa नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है और आत्मिक शक्ति मिलती है। Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा ॥ दोहा॥विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय । ॥ चौपाई ॥नमो विष्णु भगवान खरारी ।कष्ट नशावन अखिल बिहारी ॥ प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी ।त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥ सुन्दर रूप मनोहर सूरत ।सरल स्वभाव मोहनी मूरत ॥ तन पर पीतांबर अति सोहत ।बैजन्ती माला मन मोहत ॥4॥ शंख चक्र कर गदा बिराजे ।देखत दैत्य असुर दल भाजे ॥ सत्य धर्म मद लोभ न गाजे ।काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥ संतभक्त सज्जन मनरंजन ।दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ॥ सुख उपजाय कष्ट सब भंजन ।दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥8॥ पाप काट भव सिंधु उतारण ।कष्ट नाशकर भक्त उबारण ॥ करत अनेक रूप प्रभु धारण ।केवल आप भक्ति के कारण ॥ धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा ।तब तुम रूप राम का धारा ॥ भार उतार असुर दल मारा ।रावण आदिक को संहारा ॥12॥ आप वराह रूप बनाया ।हरण्याक्ष को मार गिराया ॥ धर मत्स्य तन सिंधु बनाया ।चौदह रतनन को निकलाया ॥ अमिलख असुरन द्वंद मचाया ।रूप मोहनी आप दिखाया ॥ देवन को अमृत पान कराया ।असुरन को छवि से बहलाया ॥16॥ कूर्म रूप धर सिंधु मझाया ।मंद्राचल गिरि तुरत उठाया ॥ शंकर का तुम फन्द छुड़ाया ।भस्मासुर को रूप दिखाया ॥ वेदन को जब असुर डुबाया ।कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया ॥ मोहित बनकर खलहि नचाया ।उसही कर से भस्म कराया ॥20॥ असुर जलंधर अति बलदाई ।शंकर से उन कीन्ह लडाई ॥ हार पार शिव सकल बनाई ।कीन सती से छल खल जाई ॥ सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी ।बतलाई सब विपत कहानी ॥ तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी ।वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥24॥ देखत तीन दनुज शैतानी ।वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ॥ हो स्पर्श धर्म क्षति मानी ।हना असुर उर शिव शैतानी ॥ तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे ।हिरणाकुश आदिक खल मारे ॥ गणिका और अजामिल तारे ।बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥28॥ हरहु सकल संताप हमारे ।कृपा करहु हरि सिरजन हारे ॥ देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे ।दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥ चहत आपका सेवक दर्शन ।करहु दया अपनी मधुसूदन ॥ जानूं नहीं योग्य जप पूजन ।होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥32॥ शीलदया सन्तोष सुलक्षण ।विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ॥ करहुं आपका किस विधि पूजन ।कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥ करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण ।कौन भांति मैं करहु समर्पण ॥ सुर मुनि करत सदा सेवकाई ।हर्षित रहत परम गति पाई ॥36॥ दीन दुखिन पर सदा सहाई ।निज जन जान लेव अपनाई ॥ पाप दोष संताप नशाओ ।भव-बंधन से मुक्त कराओ ॥ सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ ।निज चरनन का दास बनाओ ॥ निगम सदा ये विनय सुनावै ।पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥40॥

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Best Time for Mala Jaap and Correct Rules:माला जपने का सही समय और सटीक नियम

Mala Jaap:माला जपने का सही समय और सटीक नियम | Best Time for Mala Jaap and Correct Rules Mala Jaap:माला जपना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो हमारे मन और आत्मा को शुद्ध करती है। सही समय और सही तरीके से माला जपने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। आइए जानते हैं माला जपने का सही समय और उसके महत्वपूर्ण नियम। 1. Best Time for Mala Jaap | माला जपने का सही समय 2. माला जपने के सही नियम | Correct Rules for Mala Jaap 3. Additional Tips for Mala Jaap | माला जपने के अतिरिक्त सुझाव माला जपने के इन सरल और प्रभावी नियमों को अपनाकर आप अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और भी अधिक सार्थक बना सकते हैं। सही समय और सही नियमों का पालन करने से जप का असर कई गुना बढ़ जाता है।

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Ganga Chalisa:गंगा चालीसा

Ganga Chalisa:गंगा चालीसा: माँ गंगा की भक्ति और आशीर्वाद का मंत्र Ganga Chalisa:गंगा चालीसा माँ गंगा की स्तुति में लिखा गया एक भक्ति गीत है।Ganga Chalisa यह चालीसा माँ गंगा को जगदंबा, पापनाशिनी और मोक्षदायिनी के रूप में मानते हुए उनकी स्तुति करता है। यह चालीसा हिंदू धर्म में विशेषकर उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय है। Ganga Chalisa:गंगा चालीसा का महत्व: Ganga Chalisa:कब और कैसे पढ़ें: आप Ganga Chalisa गंगा चालीसा को किसी भी शुभ मुहूर्त में पढ़ सकते हैं। विशेषकर Ganga Chalisa गंगा स्नान के दिन या माँ गंगा से जुड़े किसी भी त्योहार पर इसका पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है। सनातन मान्यताओं के अनुसार, गंगा दुनिया की सबसे पवित्रतम नदी है। और गंगा नदी को माँ गंगा के नाम से सम्मानित किया गया है। शास्त्रों में इसे पतितपावनी अर्थात लोगों के पाप को धोने वाली नदी कहकर प्रशंसा की गई है| किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में गंगा जल काGanga Chalisa प्रयोग पूजा की बस्तुओं को पवित्र करने के लिए किया जाता है। Ganga Chalisa माँ गंगा की आरती के साथ भक्तजन गंगा चालीसा को भी अपनी पूजा में शामिल करते हैं। ॥दोहा॥जय जय जय जग पावनी,जयति देवसरि गंग ।जय शिव जटा निवासिनी,अनुपम तुंग तरंग ॥ ॥चौपाई॥जय जय जननी हराना अघखानी ।आनंद करनी गंगा महारानी ॥ जय भगीरथी सुरसरि माता ।कलिमल मूल डालिनी विख्याता ॥ जय जय जहानु सुता अघ हनानी ।भीष्म की माता जगा जननी ॥ धवल कमल दल मम तनु सजे ।लखी शत शरद चंद्र छवि लजाई ॥ ४ ॥ वहां मकर विमल शुची सोहें ।अमिया कलश कर लखी मन मोहें ॥ जदिता रत्ना कंचन आभूषण ।हिय मणि हर, हरानितम दूषण ॥ जग पावनी त्रय ताप नासवनी ।तरल तरंग तुंग मन भावनी ॥ जो गणपति अति पूज्य प्रधान ।इहूं ते प्रथम गंगा अस्नाना ॥ ८ ॥ ब्रह्मा कमंडल वासिनी देवी ।श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि ॥ साथी सहस्त्र सागर सुत तरयो ।गंगा सागर तीरथ धरयो ॥ अगम तरंग उठ्यो मन भवन ।लखी तीरथ हरिद्वार सुहावन ॥ तीरथ राज प्रयाग अक्षैवेता ।धरयो मातु पुनि काशी करवत ॥ १२ ॥ धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीधी ।तरनी अमिता पितु पड़ पिरही ॥ भागीरथी ताप कियो उपारा ।दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा ॥ जब जग जननी चल्यो हहराई ।शम्भु जाता महं रह्यो समाई ॥ वर्षा पर्यंत गंगा महारानी ।रहीं शम्भू के जाता भुलानी ॥ १६ ॥ पुनि भागीरथी शम्भुहीं ध्यायो ।तब इक बूंद जटा से पायो ॥ ताते मातु भें त्रय धारा ।मृत्यु लोक, नाभा, अरु पातारा ॥ गईं पाताल प्रभावती नामा ।मन्दाकिनी गई गगन ललामा ॥ मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी ।कलिमल हरनी अगम जग पावनि ॥ २० ॥ धनि मइया तब महिमा भारी ।धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी ॥ मातु प्रभवति धनि मंदाकिनी ।धनि सुर सरित सकल भयनासिनी ॥ पन करत निर्मल गंगा जल ।पावत मन इच्छित अनंत फल ॥ पुरव जन्म पुण्य जब जागत ।तबहीं ध्यान गंगा महं लागत ॥ २४ ॥ जई पगु सुरसरी हेतु उठावही ।तई जगि अश्वमेघ फल पावहि ॥ महा पतित जिन कहू न तारे ।तिन तारे इक नाम तिहारे ॥ शत योजन हूं से जो ध्यावहिं ।निशचाई विष्णु लोक पद पावहीं ॥ नाम भजत अगणित अघ नाशै ।विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे ॥ २८ ॥ जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना ।धर्मं मूल गंगाजल पाना ॥ तब गुन गुणन करत दुख भाजत ।गृह गृह सम्पति सुमति विराजत ॥ गंगहि नेम सहित नित ध्यावत ।दुर्जनहूं सज्जन पद पावत ॥ उद्दिहिन विद्या बल पावै ।रोगी रोग मुक्त हवे जावै ॥ ३२ ॥ गंगा गंगा जो नर कहहीं ।भूखा नंगा कभुहुह न रहहि ॥ निकसत ही मुख गंगा माई ।श्रवण दाबी यम चलहिं पराई ॥ महं अघिन अधमन कहं तारे ।भए नरका के बंद किवारें ॥ जो नर जपी गंग शत नामा ।सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा ॥ ३६ ॥ सब सुख भोग परम पद पावहीं ।आवागमन रहित ह्वै जावहीं ॥ धनि मइया सुरसरि सुख दैनि ।धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ॥ ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा ।सुन्दरदास गंगा कर दासा ॥ जो यह पढ़े गंगा चालीसा ।मिली भक्ति अविरल वागीसा ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥नित नए सुख सम्पति लहैं, धरें गंगा का ध्यान ।अंत समाई सुर पुर बसल, सदर बैठी विमान ॥ संवत भुत नभ्दिशी, राम जन्म दिन चैत्र ।पूरण चालीसा किया, हरी भक्तन हित नेत्र ॥

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Rama Ekadashi 2024:27 या 28 अक्टूबर, कब है रमा एकादशी? जानें सही डेट और शुभ मुहूर्त

Rama Ekadashi:रमा एकादशी 2024 में 28 अक्टूबर को मनाई जाएगी। यह एकादशी भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित होती है और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है, Rama Ekadashi जो दीपावली से चार दिन पहले होती है। इसे “रम्भा एकादशी” भी कहा जाता है। Rama Ekadashi:शुभ मुहूर्त: Rama Ekadashi:पूजा विधि: Rama Ekadashi 2024:व्रत के नियम: Rama Ekadashi:महत्व: Rama Ekadashi:रमा एकादशी का व्रत व्यक्ति के सभी पापों का नाश करता है और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। इसे रखने से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। Rama Ekadashi व्रत के पुण्य फल को हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञों के बराबर माना गया है। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति देता है, बल्कि जीवन में शांति और समृद्धि लाता है। रमा एकादशी से जुड़ी एक प्रमुख कथा राजा मुचुकुंद और उनकी पुत्री चंद्रभागा से संबंधित है। इस व्रत का पालन करने से राजा के दामाद शोभन को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और व्रत की महिमा का महत्व बताता है कि यह न केवल सांसारिक जीवन में लाभ देता है बल्कि मृत्यु के बाद भी व्यक्ति को पुण्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है कथा- रमा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा के अनुसार प्राचीन काल में मुचकुंद नाम का एक राजा था। Rama Ekadashi उसकी इंद्र के साथ मित्रता थी और साथ ही यम, कुबेर, वरुण और विभीषण भी उसके मित्र थे। यह राजा बड़ा धर्मात्मा, विष्णुभक्त और न्याय के साथ राज करता था। उस राजा की एक कन्या थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उस कन्या का विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था।  एक समय वह शोभन ससुराल आया। उन्हीं दिनों जल्दी ही पुण्यदायिनी एकादशी ‘रमा’ भी आने वाली थी। जब व्रत का दिन समीप आ गया तो चंद्रभागा के मन में अत्यंत सोच उत्पन्न हुआ कि मेरे पति अत्यंत दुर्बल हैं Rama Ekadashi और मेरे पिता की आज्ञा अति कठोर है। दशमी को राजा ने ढोल बजवा कर सारे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। ढोल की घोषणा सुनते ही शोभन को अत्यंत चिंता हुई और अपनी पत्नी से कहा कि हे प्रिये! अब क्या करना चाहिए, मैं किसी प्रकार भी भूख सहन नहीं कर सकूंगा। ऐसा उपाय बताओ कि जिससे मेरे प्राण बच सकें, अन्यथा मेरे प्राण अवश्य चले जाएंगे।  चंद्रभागा कहने लगी कि हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। Rama Ekadashi हाथी, घोड़ा, ऊंट, बिल्ली, गौ आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं कर सकते, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है। यदि आप भोजन करना चाहते हैं तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहीं रहना चाहते हैं तो आपको अवश्य व्रत करना पड़ेगा। ऐसा सुनकर शोभन कहने लगा कि हे प्रिये! मैं अवश्य व्रत करूंगा, Rama Ekadashi जो भाग्य में होगा, वह देखा जाएगा। इस प्रकार से विचार कर शोभन ने व्रत रख लिया और वह भूख व प्यास से अत्यंत पीड़ित होने लगा। जब सूर्य नारायण अस्त हो गए और रात्रि को जागरण का समय आया जो वैष्णवों को अत्यंत हर्ष देने वाला था, परंतु शोभन के लिए अत्यंत दु:खदायी हुआ। प्रात:काल होते शोभन के प्राण निकल गए। तब राजा ने सुगंधित काष्ठ से उसका दाह संस्कार करवाया। परंतु चंद्रभागा ने अपने पिता की आज्ञा से अपने शरीर को दग्ध नहीं किया और शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के बाद अपने पिता के घर में ही रहने लगी।  रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से युक्त तथा शत्रुओं से रहित एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ। वह अत्यंत सुंदर रत्न और वैदूर्यमणि जटित स्वर्ण के खंभों पर निर्मित अनेक प्रकार की स्फटिक मणियों से सुशोभित भवन में बहुमूल्य वस्त्राभूषणों तथा छत्र व चंवर से विभूषित, गंधर्व और अप्सराओं से युक्त सिंहासन पर आरूढ़ ऐसा शोभायमान होता था मानो दूसरा इंद्र विराजमान हो।  एक समय मुचुकुंद नगर में रहने वाले एक सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ घूमता-घूमता उधर जा निकला और उसने शोभन को पहचान कर कि यह तो राजा का जमाई शोभन है, Rama Ekadashi उसके निकट गया। शोभन भी उसे पहचान कर अपने आसन से उठकर उसके पास आया और प्रणामादि करके कुशल प्रश्न किया।  ब्राह्मण ने कहा कि राजा मुचुकुंद और आपकी पत्नी कुशल से हैं। नगर में भी सब प्रकार से कुशल हैं, परंतु हे राजन! हमें आश्चर्य हो रहा है। आप अपना वृत्तांत कहिए कि ऐसा सुंदर नगर जो न कभी देखा, न सुना, आपको कैसे प्राप्त हुआ। तब शोभन बोला कि कार्तिक कृष्ण की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह नगर प्राप्त हुआ, परंतु यह अस्थिर है। यह स्थिर हो जाए ऐसा उपाय कीजिए।  ब्राह्मण कहने लगा कि हे राजन! यह स्थिर क्यों नहीं है और कैसे स्थिर हो सकता है आप बताइए, फिर मैं अवश्यमेव वह उपाय करूंगा। मेरी इस बात को आप मिथ्या न समझिए। शोभन ने कहा कि मैंने इस व्रत को श्रद्धा रहित होकर किया है। अत: यह सब कुछ अस्थिर है। यदि आप मुचुकुंद की कन्या चंद्रभागा को यह सब वृत्तांत कहें तो यह स्थिर हो सकता है। ऐसा सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने नगर लौटकर चंद्रभागा से सब वृत्तांत कह सुनाया।  ब्राह्मण के वचन सुनकर चंद्रभागा बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण से कहने लगी कि हे ब्राह्मण! ये सब बातें आपने प्रत्यक्ष देखी हैं या स्वप्न की बातें कर रहे हैं। ब्राह्मण कहने लगा कि हे पुत्री! मैंने महावन में तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है। साथ ही किसी से विजय न हो ऐसा देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिर नहीं है।  जिस प्रकार वह स्थिर रह सके सो उपाय करना चाहिए। चंद्रभागा कहने लगी हे विप्र! तुम मुझे वहां ले चलो, मुझे पतिदेव के दर्शन की तीव्र लालसा है। मैं अपने किए हुए पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूंगी। आप ऐसा कार्य कीजिए जिससे उनका हमारा संयोग हो क्योंकि वियोगी को मिला देना महान पुण्य है।  ब्राह्मण सोम शर्मा यह बात सुनकर चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर गया।

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करवा चौथ माता की आरती karwa mata ki aarti

करवा चौथ माता की आरती〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।। ओम जय करवा मैया। सब जग की हो माता, तुम हो रुद्राणी।यश तुम्हारा गावत, जग के सब प्राणी।।कार्तिक कृष्ण चतुर्थी, जो नारी व्रत करती।दीर्घायु पति होवे , दुख सारे हरती।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया। जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।होए सुहागिन नारी, सुख संपत्ति पावे। गणपति जी बड़े दयालु, विघ्न सभी नाशे।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया। जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।करवा मैया की आरती, व्रत कर जो गावे। व्रत हो जाता पूरन, सब विधि सुख पावे।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया। जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।

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करवा चौथ कथा karwa chauth vrat katha

करवा चौथ प्रथम कथा〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है। सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है। वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

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