Sankashti Chaturthi Vrat 2024 Dates : साल 2024 में कब-कब है संकष्टी चतुर्थी व्रत, नोट कर लें

Sankashti Chaturthi Vrat 2024 List:संकष्टी चतुर्थी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो भगवान गणेश को समर्पित है। ‘संकष्टी’ का अर्थ है संकट से मुक्ति और ‘चतुर्थी’ का अर्थ है चंद्रमा के चौथे दिन। इस दिन भक्त गणेश जी की पूजा करते हैं और उनसे अपने जीवन की सभी समस्याओं का समाधान मांगते हैं। हिंदू धर्म में हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन गणेशजी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। Sankashti Chaturthi Vrat 2024 date :हिंदू पंचांग के अनुसार, हर माह के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। यह विशेष दिन गणेशजी की पूजा-आराधना के लिए समर्पित है। इस दिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखना और गणेशजी की विधिवत पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। जीवन के सभी विघ्न-बाधाओं से मुक्ति मिलती हैं और घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि साल 2024 में संकष्टी चतुर्थी व्रत की सही डेट और मुहूर्त… जनवरी 2024 में संकष्टी चतुर्थी Sankashti Chaturthi 29 जनवरी 2024 (सोमवार)- लंबोदर संकष्टी चतुर्थी Sankashti Chaturthi:शुभ मुहूर्त : साल 2024 में जनवरी माह में सकंष्टी चतुर्थी तिथि का आरंभ 29 जनवरी को सुबह 6 बजकर 11 मिनट पर होगा और 30 जनवरी को सुबह 8 बजकर 54 मिनट पर समाप्त होगा। फरवरी 2024 में संकष्टी चतुर्थी  28 फरवरी 2024 (बुधवार)- द्विजप्रिया संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त :2024 में फरवरी महीने में 28 फरवरी को सुबह 1 बजकर 53 मिनट पर संकष्टी चत्तुर्थी शुरू होगी और 29 फरवरी को सुबह 4 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगा। मार्च 2024 में संकष्टी चतुर्थी  29 मार्च 2024 (शुक्रवार)- भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी  Sankashti Chaturthi:शुभ मुहूर्त :साल 2024 में चैत्र यानी मार्च महीने में 28 मार्च को शाम 6 बजकर 57 मिनट पर कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ होगा और 29 मार्च को सुबह 8 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगा। उदयातिथि के अनुसार, 29 मार्च को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। Guru Purnima 2024:गुरु पूर्णिमा के दिन क्या करें, क्या न करें अप्रैल 2024 में संकष्टी चतुर्थी  27 अप्रैल 2024 (शनिवार)- विकट संकष्टी चतुर्थी  शुभ मुहूर्त :अप्रैल 2024 में संकष्टी चतुर्थी की शुरुआत 27 अप्रैल को सुबह 8 बजकर 18 मिनट पर होगी और 28 अप्रैल को सुबह 8 बजकर 28 मिनट पर समाप्त होगी। मई 2024 में संकष्टी चतुर्थी 26 मई 2024 (रविवार)- एकदंत संकष्टी चतुर्थी  शुभ मुहूर्त :साल 2024 में मई महीने में संकष्टी चतुर्थी की शुरुआत 26 मई को सुबह 6 बजकर 6 मिनट पर होगी और 27 मई को सुबह 4 बजकर 53 मिनट तक रहेगी। जून 2024 में संकष्टी चतुर्थी 25 जून 2024 (मंगलवार)- कृष्णापिंगला संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त :आषाढ़ माह की संकष्टी चतुर्थी 25 जून को सुबह 1 बजकर 13 मिनट पर शुरू होगी और  25 जून को ही 11 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। जुलाई 2024 में संकष्टी चतुर्थी  24 जुलाई 2024( बुधवार) -गजानन संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त :साल 2024 में जुलाई महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 24 जुलाई को सुबह 7 बजकर 30 मिनट पर होगा और 25 जुलाई को सुबह 4 बजकर 39 मिनट पर खत्म होगा। अगस्त 2024 में संकष्टी चतुर्थी 22 अगस्त 2024 ( गुरुवार)- हेरम्बा संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त :अगस्त माह के संकष्टी चतुर्थी 22 अगस्त को सुबह 1 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी और  23 अगस्त को सुबह 10 बजकर 39 मिनट तक रहेगी। सितंबर 2024 में संकष्टी चतुर्थी  21 सितंबर 2024 (शनिवार)- विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त : सितंबर माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 20 सितंबर को शाम 9 बजकर 15 मिनट पर शुरू होगी और 21 सितंबर को सुबह 6 बजकर 14 मिनट पर समाप्त होगी। अक्टूबर 2024 में संकष्टी चतुर्थी  20 अक्टूबर 2024 (रविवार)- वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त :साल 2024 में अक्टूबर महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 20 अक्टूबर को सुबह 6 बजकर 46 मिनट पर होगा और 21 अक्टूबर को सुबह 4 बजकर 17 मिनट पर खत्म होगा। नवंबर 2024 में संकष्टी चतुर्थी 19 नवंबर 2024 (मंगलवार)- गणाधिप संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त : नवंबर महीने में कृष्ण संकष्टी चतुर्थी की शुरुआत 18 नवंबर को शाम 6 बजकर 56 मिनट पर होगी और 19 नवंबर को शाम 5 बजकर 28 मिनट तक रहेगी। दिसंबर 2024 में संकष्टी चतुर्थी 18 दिसंबर 2024 (बुधवार)- अखुरठा संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त : साल 2024 के आखिरी महीने दिसंबर में संकष्टी चतुर्थी 18 दिसंबर को सुबह 10 बजकर 6 मिनट पर शुरू होगी और 19 दिसंबर को सुबह 10 बजकर 3 मिनट पर समाप्त होगी। संकष्टी चतुर्थी का महत्व Sankashti Chaturthi:संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा संकष्टी चतुर्थी से जुड़ी कई कथाएं हैं। इन कथाओं में भगवान गणेश की लीलाओं का वर्णन किया गया है। इन कथाओं को सुनने से मन शांत होता है और भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा बढ़ती है। Sankashti Chaturthi2024 puja vidhi:संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र को गंगाजल से स्नान कराकर शुद्ध किया जाता है। इसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उन्हें विभिन्न प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। पूजा के दौरान गणेश चालीसा, गणेश स्तोत्र आदि का पाठ किया जाता है। Sankashti Chaturthi 2024 date:संकष्टी चतुर्थी व्रत नियम Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि  KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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PITRU PAKSHA 2024 पितृ दोष: कारण, लक्षण और समाधान | जानें कैसे करें पितृ दोष निवारण

पितृ दोष: कारण, लक्षण और समाधान | जानें कैसे करें निवारण पितृ दोष हिंदू ज्योतिष में एक महत्वपूर्ण दोष माना जाता है, जो हमारे पूर्वजों की आत्मा या पितरों के असंतोष से उत्पन्न होता है। यह दोष कुंडली में राहु, केतु और सूर्य ग्रहों की अशुभ स्थिति से बनता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में होता है, तो उसे कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यह दोष व्यक्ति के जीवन में बाधाएँ, आर्थिक परेशानियाँ, स्वास्थ्य समस्याएँ और पारिवारिक तनाव उत्पन्न कर सकता है। पितृ दोष के कारण: पितृ दोष के लक्षण: निवारण के उपाय: निष्कर्ष: एक गंभीर ज्योतिषीय दोष है, जिसे नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। सही उपायों और पूजा-पाठ से इसे नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और खुशहाली आती है। यदि आपको अपने जीवन में बार-बार समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, तो किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें और की जाँच करवाएँ। Tags: पितृ दोष क्या है, पितृ दोष निवारण उपाय, पितृ दोष के लक्षण, पितृ दोष निवारण पूजा, पितरों की शांति, श्राद्ध तर्पण

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Pitru Paksha 2024: पितृपक्ष में कितने प्रकार के होते हैं श्राद्ध, जानें पितृदोष से मुक्ति के लिए सरल उपाय

Pitru Paksha 2024:पितृपक्ष में पितृदोष से मुक्ति के उपाय: पितृपक्ष में पितृदोष दूर करने के लिए कुछ विशेष उपाय जरूर करने चाहिए। इससे आपके जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और आप तरक्की की राह पर अग्रसर होते हैं। साथ ही पितृपक्ष में अलग-अलग स्थितियों में श्राद्ध के रूप बताए गए हैं। आइए, विस्तार से जानते हैं उनके बारे में। Pitru Paksha 2024:रामायण और महाभारत काल में भी श्राद्ध का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि हमारे पूर्वज इस काल के दौरान स्वर्ग से पृथ्वी पर आते हैं और अपने सम्बन्धियों से पिण्डदान प्राप्त करके आशीर्वाद देकर वापस लौट जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र में भी विशेष दोषों के निवारण के लिया इस समय का अपना महत्व है। शास्त्रों में 3 तरह के ऋण बताए गए हैं। आइए, जानते हैं पितृपक्ष की पौराणिक मान्यताएं। Pitru Paksha 2024:पितृपक्ष में कौवों के लिए खाना रखें Pitru Paksha 2024:पितृपक्ष में हर घरों के छत पर कौए के लिए खाना रखने की प्रथा आप जानते हैं कि ऐसा करने से सभी प्रकार के दोष और ऋण से मुक्ति मिल जाती है क्योंकि ऐसा करके जाने अनजाने में हम प्रकृति का संरक्षण कर रहे होते हैं क्योंकि असल में ऋण तो हम पर प्रकृति का ही होता है, जिस पंचतत्वों से हमारा शरीर बना होता है। हमारे ऋषियों ने कौवों को पितरों के रूप में माना जाता है क्योंकि प्रकृति के सरंक्षण का बोझ इन्हीं पर तो हैं। भादो में मादा कौआ नए जीव को जन्म देते है और इन्हें पौष्टिक आहार की जरुरत होती है। Pitru Paksha 2024:पीपल और बरगद की पूजा करें पीपल और बरगद के वृक्ष प्रकृति संरक्षण के लिया महत्वपूर्ण है क्योंकि ये दोनों ही वृक्ष धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टि से बहुत ज्यादा जरूरी है। श्राद्ध पूजा में भी इन दोनों ही वृक्षों की पूजा की जाती है। पितृ पक्ष में खाना खिलाकर अपने ऊपर के प्रकृति ऋण को भी कम करते हैं। Pitru Paksha 2024:पितृपक्ष में पितृदोष दूर करने का उपाय 18 वर्षों बाद ऐसा संयोग बन रहा है कि कन्या राशि में केतु के साथ सूर्य के रहेंगे और मीन राशि में राहु की दृष्टि भी सूर्य पर रहेगी। ऐसे में ग्रहों की शांति के लिए खीर में केसर मिला कर बनाएं और दान करें। अगर आपकी कुंडली में पितृदोष है, तो आपको यह विशेष उपाय जरूर करना चाहिए। इसके अलावा काले तिल वाला पानी दक्षिण दिशा में रखें, इससे पितरों की आत्मा तृप्त होती है। पितृपक्ष में श्राद्ध के कुछ प्रकार पंचमी श्राद्ध- जिन पितरों की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो या अविवाहित स्थिति में हुई है, तो उनके लिए पंचमी तिथि का श्राद्ध किया जाता है। नवमी श्राद्ध – नवमी तिथि को मातृनवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है। चतुर्दशी श्राद्ध- इस तिथि उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो। सर्वपितृ अमावस्या- जिन लोगों की मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।

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Pitru Paksha:श्राद्ध पक्ष की तिथियां

श्राद्ध पक्ष: पूर्वजों को याद करने का समय श्राद्ध पक्ष हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है। यह 16 दिनों का एक ऐसा समय होता है जब हिंदू धर्म के लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। श्राद्ध पक्ष क्यों मनाया जाता है? श्राद्ध पक्ष में क्या किया जाता है? श्राद्ध पक्ष की तिथियां श्राद्ध की तिथियां हर साल बदलती रहती हैं। यह भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। श्राद्ध पक्ष में क्या सावधानियां बरतनी चाहिए? श्राद्ध पक्ष की सभी तिथियां17 सितंबर पूर्णिमा श्राद्ध18 सितंबर प्रतिपदा श्राद्ध19 सितंबर द्वितीया श्राद्ध20 सितंबर तृतीया श्राद्ध21 सितंबर चतुर्थी श्राद्ध22 सितंबर पंचमी श्राद्ध23 सितंबर षष्ठी और सप्तमी श्राद्ध24 सितंबर अष्टमी श्राद्ध25 सितंबर नवमी श्राद्ध26 सितंबर दशमी श्राद्ध27 सितंबर एकादशी श्राद्ध29 सितंबर द्वादशी श्राद्ध30 सितंबर त्रयोदशी श्राद्ध1 अक्टूबर चतुर्दशी श्राद्ध2 अक्टूबर सर्व पितृ अमावस्या (समापन)

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Pitru Paksha (Shradh) 2024 Start Date and Time: श्राद्ध पक्ष की तिथियां, इस तरह करें पितरों को प्रसन्न, जानें श्राद्ध के प्रतीक और कौन सी चीजें हैं वर्जित

Pitru Paksha 2024 Date & Time: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक सोलह दिनों को पितृ पक्ष कहा जाता है। श्राद्ध करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है और पितरों का आशीर्वाद बना रहता है। श्राद्ध पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें पितृपक्ष के श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं। शास्त्रों में मनुष्यों पर उत्पन्न होते ही तीन ऋण बताए गए हैं- देव ऋण, ऋषिऋण और पितृऋण। जिसकी मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए। Pitru Paksha 2024 Start Date :ऋषियों ने हमारे संपूर्ण जीवन चक्र को सोलह संस्कारों में बांधा है। जहां गर्भाधान प्रथम संस्कार है तो पितृमेघ या अंत्येष्टि अंतिम। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों को Pitru Paksha पितृ पक्ष कहा जाता है। इस बार यह शुभ तिथियां 17 सितंबर से लेकर 2 अक्टूबर तक है। शास्त्रों में मनुष्यों पर उत्पन्न होते ही तीन ऋण बताए गए हैं- देव ऋण, ऋषिऋण और पितृऋण। श्राद्ध के द्वारा पितृ ऋण से निवृत्ति प्राप्त होती है। इसलिए पितृ पक्ष के दौरान भक्ति पूर्वक तर्पण (पितरों को जल देना) करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है। यह 16 दिनों का एक ऐसा समय होता है जब हिंदू धर्म के लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। Pitru Paksha:इस तरह करें पितरों को प्रसन्न आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में उनकी मृत्यु तिथि को (मृत्यु किसी भी मास या पक्ष में हुई हो) जल, तिल, चावल, जौ और कुश पिंड बनाकर या केवल सांकल्पिक विधि से उनका श्राद्ध करना, गौ ग्रास निकालना और उनके निमित्त ब्राह्मणों को भोजन करा देने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रसन्नता ही पितृ ऋण से मुक्त करा देती है। पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अनुष्ठान है श्राद्ध। पांच प्रकार के होते हैं श्राद्धश्राद्ध पांच प्रकार के होते हैं, जिनमें पितृपक्ष के श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं। इन में अपराह्न व्यापिनी तिथि की प्रधानता है। जिनकी मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए। श्राद्ध हमेशा मृत्यु होने वाले दिन करना चाहिए। अग्नि में जलकर, विष खाकर, दुर्घटना में या पानी में डूबकर, शस्त्र आदि से जिनकी मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध चर्तुदशी को करना चाहिए। आश्विन कृष्ण पक्ष में सनातन संस्कृति को मानने वाले सभी लोगों को प्रतिदिन अपने पूर्वजों का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करना चाहिए, इससे पितर संतृप्त हो कर हमें आशीर्वाद देते हैं। आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितरों के लिए पर्व का समय है। इसमें ये पिंडदान और तिलांजलि की आशा लेकर पृथ्वी लोक पर आते हैं। इसलिए श्राद्ध का परित्याग न करें, पितरों को संतुष्ट जरूर करें। Shradh:श्राद्ध के प्रतीक कुश, तिल, यव गाय, कौवा और कुत्ते को श्राद्ध के तत्व के प्रतीक के रूप में माना जाता है। कुशा के अग्रभाग में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और मूल भाग में भगवान शंकर का निवास माना गया है। कौवा यम का प्रतीक है, जो दिशाओं का फलित बताता है। गाय तो वैतरणी से पार लगाने वाली है ही। दैनिक जीवन में भी भोजन की पहली मढ़की गाय को देते हैं। Pitru Paksha श्राद्ध का एक अंश कुत्ते को देने से यमराज प्रसन्न होते हैं। Shradh:श्राद्ध में ब्राह्मण पूजा-अनुष्ठान, उद्यापन, कथा, विवाह आदि में चाहे ब्राह्मणों की परीक्षा न करें, लेकिन पितृ कार्य में अवश्य करें। समस्त लक्षणों से युक्त, हाथ का सच्चा, व्याकरण का विद्वान, शील एवं सद्‌गुणों से युक्त, तीन पीढ़ियों से विख्यात ब्राह्मणों के द्वारा संयत रहकर श्राद्ध सम्पन्न करें। श्राद्धकर्ता के लिए वर्जितश्राद्धकर्ता को पितृपक्ष में क्षौर कर्म यानी बाल या नाखून नहीं कटवाने चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन, पान खाना, किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन, तेल मालिश और परान्न भोजी ये सात बातें श्राद्धकर्ता के लिए वर्जित हैं। श्राद्ध के अंत में क्षमा प्रार्थना करें।

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गजाननं भूत गणादि सेवितं – गणेश मंत्र (Gajananam Bhoota Ganadhi Sevitam)

गजाननं भूत गणादि सेवितं – गणेश मंत्र का अर्थ और महत्व “गजाननं भूत गणादि सेवितं” यह गणेश स्तोत्र का एक बहुत ही प्रसिद्ध और शक्तिशाली श्लोक है। इस श्लोक में भगवान गणेश के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन किया गया है। आइए इस श्लोक का अर्थ और महत्व समझते हैं: श्लोक का अर्थ अर्थात: इस श्लोक में भगवान गणेश को हाथी के समान मुख वाले, भूत-गणों के सेवित, कपित्थ और जामुन के फल खाने वाले, उमा के पुत्र और सभी दुःखों को दूर करने वाले के रूप में वर्णित किया गया है। श्लोक का महत्व यह श्लोक गणेश जी के भव्य और दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है। यह श्लोक हमें भगवान गणेश की शक्ति और कृपा के प्रति विश्वास दिलाता है। इस श्लोक का जाप करने से मन शांत होता है और सभी प्रकार के विघ्न दूर होते हैं। श्लोक का उपयोग गजाननं भूत गणादि सेवितं – गणेश मंत्र (Gajananam Bhoota Ganadhi Sevitam) गजाननं भूत गणादि सेवितं,कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम् ।उमासुतं शोक विनाशकारकम्,नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम् ॥ मंत्र का मूल रूप:गजाननं भूतगणाधिसेवितं,कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।उमासुतं शोकविनाशकारकम्न,मामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ॥

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गणेश शुभ लाभ मंत्र (Ganesha Shubh Labh Mantra)

Ganesha Shubh Labh Mantra:गणेश शुभ लाभ मंत्र: धन और समृद्धि के लिए Ganesha Shubh Labh Mantra:गणेश जी को सभी कार्यों का आरंभ करने वाले देवता माना जाता है। व्यापार, उद्योग और धन से जुड़े मामलों में उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए कई मंत्र हैं। इन मंत्रों का जाप करने से धन लाभ, व्यापार में वृद्धि और समृद्धि प्राप्त होती है। कुछ प्रमुख गणेश शुभ लाभ मंत्र: Ganesha Shubh Labh Mantra:मंत्र जाप करने की विधि वक्रतुण्ड महाकाय – गणेश मंत्र (Vakratunda Mahakaya Ganesh Shlok) ध्यान रखें: अन्य उपाय: विशेष नोट: गणेश शुभ लाभ समृद्धि के लिए प्रार्थना है जो भगवान गणेश के बीज यानी बीज मंत्र पर आधारित है। गणेश शुभ लाभ मंत्र (Ganesha Shubh Labh Mantra) ॐ श्रीम गम सौभाग्य गणपतयेवर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नमः ॥ हिन्दी रूपांतरण:गम – भगवान गणेश के लिए बीज यानी बीज मंत्रसौभाग्य -सौभाग्यगणपतये – विघ्नहर्तावर्वर्द -ढेर सारी शुभकामनाएं और शुभकामनाएंसर्वजन्म में – हमारे वर्तमान और भविष्य के जीवन-काल के लिएवषमान्य – जो हमें स्वास्थ्य और खुशी के लंबे जीवन के साथ रक्षा करता हैनमः – नमन

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श्री गणेशपञ्चरत्नम् – मुदाकरात्तमोदकं (Shri Ganesha Pancharatnam – Mudakaratta Modakam)

Shri Ganesha Pancharatnam:श्री गणेशपञ्चरत्नम् – मुदाकरात्तमोदकं Shri Ganesha Pancharatnam:आपने बहुत ही सुंदर स्तोत्र का नाम लिया है! श्री गणेशपञ्चरत्नम्, विशेषकर ‘मुदाकरात्तमोदकं’ से शुरू होने वाला स्तोत्र, भगवान गणेश की अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली स्तुति है। Shri Ganesha Pancharatnam:स्तोत्र का अर्थ और महत्व श्री गणेशपञ्चरत्नम् – मुदाकरात्तमोदकं (Shri Ganesha Pancharatnam – Mudakaratta Modakam) श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र!मुदा करात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम् ।कलाधरावतंसकं विलासिलोक रक्षकम् ।अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकम् ।नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥ नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरम् ।नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्ढरम् ।सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरम् ।महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥ 2 ॥ समस्त लोक शङ्करं निरस्त दैत्य कुञ्जरम् ।दरेतरोदरं वरं वरेभ वक्त्रमक्षरम् ।कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करम् ।मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥ 3 ॥ अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनम् ।पुरारि पूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम् ।प्रपञ्च नाश भीषणं धनञ्जयादि भूषणम् ।कपोल दानवारणं भजे पुराण वारणम् ॥ 4 ॥ नितान्त कान्ति दन्त कान्ति मन्त कान्ति कात्मजम् ।अचिन्त्य रूपमन्त हीन मन्तराय कृन्तनम् ।हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनाम् ।तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥ 5 ॥ महागणेश पञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं ।प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम् ।समाहितायु रष्टभूति मभ्युपैति सोऽचिरात् ॥ 6 ॥श्रीमत् शंकर भगित्पादकृत श्रीगणेशपञ्चरत्न स्तोत्रम् संपूणकम्। मूल रूप: श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र! मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकंकलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम् ।अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकंनताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥१॥ नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरंनमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरंमहेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥२॥ समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरंदरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करंमनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥ अकिंचनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनंपुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणम्कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥४॥ नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजंअचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनांतमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥५॥ महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहंप्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतांसमाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥६॥ वक्रतुण्ड महाकाय – गणेश मंत्र (Vakratunda Mahakaya Ganesh Shlok) Shri Ganesha Pancharatnam:हिंदी रूपांतरणमैं मुक्ति के दाता-प्रदाता श्री गणेश भगवान को बहुत ही विनम्रता के साथ अपने हाथों से मोदक प्रदान (समर्पित) करता हूँ। जिनके सिर पर चंद्रमा एक मुकुट के समान विराजमान है, जो राजाधिराज हैं और जिन्होंने गजासुर नामक दानव हाथी का वध किया था, जो सभी के पापों का आसानी से विनाश कर देते हैं, ऐसे गणेश भगवान जी की मैं पूजा करता हूँ।1 मैं उन श्री गणेश भगवान पर सदा अपना मन और ध्यान अर्पित करता हूँ जो हमेशा उषा काल की तरह चमकते रहते हैं, जिनका सभी राक्षस और देवता सम्मान करते हैं, जो भगवानों में सबसे सर्वोत्तम हैं।2 मैं अपने मन को उस चमकते हुए गणपति भगवान के समक्ष झुकाता हूँ, जो पूरे संसार की खुशियों के दाता हैं, जिन्होंने दानव गजासुर का वध किया था, जिनका बड़ा सा पेट और हाथी की तरह सुन्दर चेहरा है, जो अविनाशी हैं, जो खुशियां और प्रसिद्धि प्रदान करते हैं और बुद्धि के दाता-प्रदाता हैं।3 मैं उन भगवान की पूजा-अर्चना करता हूँ जो गरीबों के सभी दुःख दूर करते हैं, जो ॐ का निवास हैं, जो शिव भगवान के पहले पुत्र (बेटे) हैं, जो परमपिता परमेश्वर के शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं, जो विनाश के समान भयंकर हैं, जो एक गज के समान दुष्ट और धनंजय हैं और सर्प को अपने आभूषण के रूप में धारण करते हैं।4 मै सदा उस भगवान को प्रतिबिंबित करता हूँ जिनके चमकदार दन्त (दांत) हैं, जिनके दन्त बहुत सुन्दर हैं, स्वरूप अमर और अविनाशी हैं, जो सभी बाधाओं को दूर करते हैं और हमेशा योगियों के दिलों में वास करते हैं।5 जो भी भक्त प्रातःकाल में गणेश पंचरत्न स्तोत्र का पाठ करता है, जो भगवान गणेश के पांच रत्न अपने शुद्ध हृदय में याद करता है तुरंत ही उसका शरीर दाग-धब्बों और दुखों से मुक्त होकर स्वस्थ हो जायगा, वह शिक्षा के शिखर को प्राप्त करेगा, जीवन शांति, सुख के साथ आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि के साथ सम्पन्न हो जायेगा।

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वक्रतुण्ड महाकाय – गणेश मंत्र (Vakratunda Mahakaya Ganesh Shlok)

Vakratunda Mahakaya:वक्रतुण्ड महाकाय मंत्र – गणेश जी की स्तुति Vakratunda Mahakaya:वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।। Vakratunda Mahakaya:यह मंत्र भगवान गणेश को समर्पित एक बहुत ही प्रसिद्ध और शक्तिशाली मंत्र है। इसका जाप करने से सभी कार्यों में सफलता मिलती है और विघ्न दूर होते हैं। Vakratunda Mahakaya:मंत्र का अर्थ Vakratunda Mahakaya:मंत्र का महत्व श्री गणेश आरती (Shri Ganesh Aarti) मंत्र का जाप कैसे करें यहाँ कुछ अतिरिक्त जानकारी दी गई है: अगर आप गणेश जी के बारे में अधिक जानना चाहते हैं तो आप इन विषयों पर खोज कर सकते हैं: वक्रतुण्ड महाकाय – गणेश मंत्र (Vakratunda Mahakaya Ganesh Shlok) किसी भी प्रकार के कार्य प्रारंभ करने के पूर्व श्री गणेश जी का स्मरण इस मंत्र के साथ अवश्य करना चाहिए, आपके शुभकार्य निश्चित ही सिद्ध होंगे।वक्रतुण्ड महाकायसूर्यकोटि समप्रभ ।निर्विघ्नं कुरु मे देवसर्वकार्येषु सर्वदा ॥ हिन्दी रूपांतरण:वक्रतुण्ड: घुमावदार सूंडमहाकाय: महा काया, विशाल शरीरसूर्यकोटि: सूर्य के समानसमप्रभ: महान प्रतिभाशालीनिर्विघ्नं: बिना विघ्नकुरु: पूरे करेंमे: मेरेदेव: प्रभुसर्वकार्येषु: सारे कार्यसर्वदा: हमेशा, सदैव घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली।मेरे प्रभु, हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करें (करने की कृपा करें)॥

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Sapne:सपने में अपनी या फैमिली (Family)मेंबर की मौत देखना शुभ या अशुभ! ज्योतिषी से जानें इसका मतलब

Sapne:सपने अक्सर रात में सोते समय हम सपने तो देखते ही हैं और कई बार सपने में कुछ ऐसे हादसे देखते हैं, जिसको देखते ही नींद में ही पसीने छूट जाते हैं. इसी में से एक सपना ऐसा है जिसे देखना किसी को पसंद नहीं होगा सपने और लोग डर भी जाते हैं. दरअसल, कई बार व्यक्ति नींद में खुद की मौत या फिर अपने परिजन की मौत देखता है तो वह घबरा जाता है. ज्योतिष शास्त्र में इस सपने का एक विशेष अर्थ बताया गया है. सपने में मौत देखना एक आम अनुभव है, और यह कई लोगों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। सपने हालांकि, सपनों का अर्थ व्यक्तिगत और जटिल होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सपने में मौत देखने के कई अर्थ हो सकते हैं, जो सपने के विशिष्ट विवरणों और व्यक्ति के जीवन की स्थिति पर निर्भर करते हैं। Sapne:सपने इस तरह के सपने आना आम बात है और लगभग हर एक व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी ऐसा सपने आते ही हैं और ऐसे सपने को देखकर डरना स्वाभाविक है, पर लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं, क्योंकि यह एक शुभ सपना माना जाता है. Sapne:क्या होता है इस सपने का मतलब Sapne:सपने आप सपने में खुद को मृत अवस्था में देखते हैं तो आप समझ जाइए कि आपकी आयु बढ़ गई है और सिर्फ आयु ही नहीं बल्कि, अगर आपके ऊपर कोई बड़ी मुसीबत आने को है तो वह भी सोचिए टल गई. तो ऐसे सपने देखना काफी शुभ माना जाता है. मौत का मतलब है अशुभ चीजों का आपके जीवन से समाप्त होना. Sapne:आपने अपनी किसी अपने या फिर अपने परिवार के किसी सदस्य की मौत देखी है तो यह उनके आयु में वृद्धि होने का संकेत है. उनके लिए कोई नया प्रारंभ या कोई नई शुभ चीज इंतजार कर रही है. सपने इससे आपके घर परिवार और खानदान में खुशहाली का माहौल रहेगा. इसलिए ऐसे सपने को देखकर घबराने वाली बात नहीं है. बल्कि, ऐसे सपने को देखकर आप बिल्कुल निश्चित और खुश हो जाइए. मृत्यु के संकेत होते हैं ये डरावने सपने, देखने पर न करें अनदेखी Sapne:सपने में मौत देखने के कुछ सामान्य अर्थ: Sapne:सपने में अपनी या परिवार के किसी सदस्य की मौत देखना: Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें

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दशरथकृत शनि स्तोत्र (Dashratha Shani Sotra)

Dashratha Shani Sotra:दशरथकृत शनि स्तोत्र: एक संक्षिप्त परिचय Dashratha Shani Sotra:दशरथकृत शनि स्तोत्र एक प्राचीन और प्रभावशाली स्तोत्र है जो भगवान शनि को समर्पित है। माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना स्वयं राजा दशरथ ने की थी। इस स्तोत्र में भगवान शनि की महिमा का वर्णन करते हुए उनसे आशीर्वाद मांगा गया है। Dashratha Shani Sotra:स्तोत्र का महत्व Dashratha Shani Sotra:स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करें? Dashratha Shani Sotra:स्तोत्र के कुछ लाभ दशरथ उवाच:प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः ॥ रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन् ।सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी ॥ याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं ।एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम् ॥ प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा ।पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ॥ Dashratha Shani Sotra:दशरथकृत शनि स्तोत्र:नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥ नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥2॥ नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: ।नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥ नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥ नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥ अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥ तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥ ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥ देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: ।त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥9॥ प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥ दशरथ उवाच:प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् ।अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित् ॥ हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण्ठ वाले।कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥ हे दाढ़ी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।हे दीर्घ नेत्र वाले, शुष्कोदरा निराले॥भय आकृति तुम्हारी, सब पापियों को मारे।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥ हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥ हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।हैं पूज्य चरण तेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ हे सूर्य-सुत तपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥विश्वास श्रद्धा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।स्वीकारो नमन मेरे। हे पूज्य देव मेरे॥ अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।तप-दग्ध-देहधारी, नित योगरत अपारी॥संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ नितप्रियसुधा में रत हो, अतृप्ति में निरत हो।हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि।वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥उत्तम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ हो वक्र दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ हो मूलनाश उनका, दुर्बुद्धि होती जिन पर।हो देव असुर मानव, हो सिद्ध या विद्याधर॥देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥ होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।स्वीकारो नमन मेरे। हैं पूज्य चरण तेरे॥

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संकट मोचन हनुमानाष्टक (Sankatmochan Hanuman Ashtak)

Hanuman Ashtak:संकटमोचन हनुमानाष्टक: एक संक्षिप्त परिचय Hanuman Ashtak:संकटमोचन हनुमानाष्टक एक प्रसिद्ध हिंदू स्तोत्र है जो Hanuman Ashtakभगवान हनुमान को समर्पित है। यह स्तोत्र आठ श्लोकों का बना हुआ है और इसमें भगवान हनुमान की महिमा का वर्णन किया गया है। यह माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। Hanuman Ashtak:स्तोत्र का महत्व स्तोत्र के कुछ श्लोक Hanuman Ashtak:संकटमोचन हनुमानाष्टक के सभी श्लोक बहुत ही प्रभावशाली हैं और भगवान हनुमान की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए: Hanuman Ashtak:कब और कैसे करें पाठ? श्री हनुमंत लाल की पूजा आराधना में संकट मोचन हनुमान अष्टक का नियमित पाठ करने से भक्तों पर आये गंभीर संकट का भी निवारण हो जाता है। Hanuman Ashtak Hanuman Ashtak॥ हनुमानाष्टक ॥बाल समय रवि भक्षी लियो तब,तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।ताहि सों त्रास भयो जग को,यह संकट काहु सों जात न टारो ।देवन आनि करी बिनती तब,छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।को नहीं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥ बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,जात महाप्रभु पंथ निहारो ।चौंकि महामुनि साप दियो तब,चाहिए कौन बिचार बिचारो ।कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥ अंगद के संग लेन गए सिय,खोज कपीस यह बैन उचारो ।जीवत ना बचिहौ हम सो जु,बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।हेरी थके तट सिन्धु सबै तब,लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥ रावण त्रास दई सिय को सब,राक्षसी सों कही सोक निवारो ।ताहि समय हनुमान महाप्रभु,जाए महा रजनीचर मारो ।चाहत सीय असोक सों आगि सु,दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥ बान लग्यो उर लछिमन के तब,प्राण तजे सुत रावन मारो ।लै गृह बैद्य सुषेन समेत,तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।आनि सजीवन हाथ दई तब,लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥ रावन युद्ध अजान कियो तब,नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,मोह भयो यह संकट भारो Iआनि खगेस तबै हनुमान जु,बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥ बंधु समेत जबै अहिरावन,लै रघुनाथ पताल सिधारो ।देबिहिं पूजि भलि विधि सों बलि,देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।जाय सहाय भयो तब ही,अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥ काज किये बड़ देवन के तुम,बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।कौन सो संकट मोर गरीब को,जो तुमसे नहिं जात है टारो ।बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,जो कछु संकट होय हमारो ॥ ८ ॥ ॥ दोहा ॥लाल देह लाली लसे,अरु धरि लाल लंगूर ।वज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर ॥ रामायण के बाद हनुमानजी यहां चले गए थे और अब वे इन जगहों पर मिलते हैं…

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