Pitru Paksha:पितरपक्ष का महत्व क्या है? जानें इसका धार्मिक और वेदिक प्रमाण

पितरपक्ष का महत्व क्या है? जानें इसका धार्मिक और वेदिक प्रमाण (श्राद्ध पक्ष) हिंदू धर्म में पूर्वजों (पितरों) के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण समय है। यह समय पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए विशेष रूप से समर्पित होता है।श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस ब्लॉग में हम पितरपक्ष का महत्व, उसके धार्मिक और वेदिक प्रमाणों के बारे में विस्तार से जानेंगे। पितरपक्ष का महत्व हिंदू धर्म में यह माना जाता है कि पितरों का आशीर्वाद परिवार के लिए अत्यंत शुभ होता है। पितरपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। यह समय पूर्वजों की आत्मा को शांति देने और उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक दृष्टिकोण से पितरपक्ष का महत्व: वेदिक प्रमाण से पितरपक्ष का महत्व वेदों और शास्त्रों में विशेष रूप से उल्लेखित किया गया है। यहां कुछ वेदिक प्रमाण दिए जा रहे हैं जो इस पक्ष की महत्ता को दर्शाते हैं: 1. विष्णु धर्मसूत्र (74.31): “श्राद्धकाले पितरः स्वर्गलोकात् पृथिवीं समायान्ति, पुत्रैः दत्तं तिलजलं तृप्तिं कुर्वन्ति।”अर्थ: श्राद्ध के समय पितर स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आते हैं और पुत्रों द्वारा दी गई तिलयुक्त जल से तृप्त होते हैं। 2. महाभारत (आनुशासन पर्व, अध्याय 88.22): “तस्माद् यत्नेन कुर्वीत पितृणां तु विशेषतः। तस्मात् स्वधाकृतं श्राद्धं पितृणां त्रिप्तिकरं भवेत्।”अर्थ: पितरों के लिए विशेष रूप से श्राद्ध कर्म करना चाहिए, जिससे पितर संतुष्ट होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। 3. मनुस्मृति (3.203): “यत्तु श्राद्धं पितृणां क्रियते नियमपूर्वकम्। तेन पितृणां प्रसादो भवति।”अर्थ: जो श्राद्ध नियमपूर्वक पितरों के लिए किया जाता है, उससे पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। 4. गर्ग संहिता (1.11.23): “श्राद्धेन पितरः तृप्यन्ति, तर्पणेन च देवताः।”अर्थ: श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और तर्पण से देवता प्रसन्न होते हैं। 5. वायु पुराण (70.21): “पितरः श्राद्ध तृप्ताः पुत्र-पौत्रादिकं वंशं पुष्टिं कुर्वन्ति।”अर्थ: श्राद्ध से तृप्त पितर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं और उनके वंश की समृद्धि करते हैं। पितरपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण विधि पितरपक्ष में पालन करने योग्य बातें: निष्कर्ष: पितरपक्ष का धार्मिक और वेदिक महत्व अत्यधिक है। यह समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का होता है। वेदों और शास्त्रों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है कि कैसे श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितर तृप्त होते हैं और उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है। यदि आप भी अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध करना चाहते हैं, तो किसी योग्य पंडित से संपर्क करें और विधिपूर्वक इन कर्मकांडों का पालन करें। FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न):

Pitru Paksha:पितरपक्ष का महत्व क्या है? जानें इसका धार्मिक और वेदिक प्रमाण Read More »

Aaj Ka Panchang (आज का पंचांग) 18/09/2024

Aaj Ka Panchang Aaj Ka Panchang🌞~ आज का हिन्दू पंचांग ~🌞⛅दिनांक – 19 सितम्बर 2024⛅दिन – गुरूवार⛅विक्रम संवत् – 2081⛅अयन – दक्षिणायन⛅ऋतु – शरद⛅मास – आश्विन⛅पक्ष – कृष्ण⛅तिथि – द्वितीया रात्रि 12:39 सितम्बर 20 तक तत्पश्चात तृतीया⛅नक्षत्र – उत्तर भाद्रपद प्रातः 08:04 तक तत्पश्चात रेवती प्रातः 05:15 सितम्बर 20 तक तत्पश्चात अश्विनी⛅योग – वृद्धि शाम 07:19 तक तत्पश्चात ध्रुव Aaj Ka Panchang⛅राहु काल – दोपहर 02:05 से दोपहर 03:36 तक⛅सूर्योदय – 06:31⛅सूर्यास्त – 06:36⛅दिशा शूल – दक्षिण दिशा में⛅ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:53 से 05:40 तक⛅अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:09 से दोपहर 12:57 तक⛅निशिता मुहूर्त- रात्रि 12:10 सितम्बर 20 से रात्रि 12:57 सितम्बर 20 तकव्रत पर्व विवरण – द्वितीया श्राद्ध, सर्वार्थ सिद्धि योग (प्रातः 08:04 से प्रातः 06:28 सितम्बर 20 तक)⛅विशेष – द्वितीया को बृहती (छोटा बैगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) 🔹स्नान कैसे करना चाहिये ??🔹 🔸जहाँ से प्रवाह आता हो वहाँ पहले सिर की डुबकी मारें । घर में भी स्नान करे तो पहले जल सिर पर डालें…. पैरों पर पहले नहीं डालना चाहिए । शीतल जल सिर को लगने से सिर की गर्मी पैरों के तरफ जाती है । 🔸और जहाँ जलाशय है, स्थिर जल है वहाँ सूर्य पूर्वमुखी होकर स्नान करें । 🔸घर में स्नान करें तो उस बाल्टी के पानी में जौ और तिल अथवा थोड़ा गोमूत्र अथवा तिर्थोद्क पहले (गंगाजल आदि) डाल कर फिर बाल्टी भरें तो घर में भी तीर्थ स्नान माना जायेगा l Aaj Ka Panchang🔹 गुरुवार विशेष 🔹 🔸 हर गुरुवार को तुलसी के पौधे में शुद्ध कच्चा दूध गाय का थोड़ा-सा ही डाले तो, उस घर में लक्ष्मी स्थायी होती है और गुरूवार को व्रत उपवास करके गुरु की पूजा करने वाले के दिल में गुरु की भक्ति स्थायी हो जाती है । 🔸 गुरुवार के दिन देवगुरु बृहस्पति के प्रतीक आम के पेड़ की निम्न प्रकार से पूजा करें : 🔸 एक लोटा जल लेकर उसमें चने की दाल, गुड़, कुमकुम, हल्दी व चावल डालकर निम्नलिखित मंत्र बोलते हुए आम के पेड़ की जड़ में चढ़ाएं । Aaj Ka Panchang:ॐ ऐं क्लीं बृहस्पतये नमः । फिर उपरोक्त मंत्र बोलते हुए आम के वृक्ष की पांच परिक्रमा करें और गुरुभक्ति, गुरुप्रीति बढ़े ऐसी प्रार्थना करें । थोड़ा सा गुड़ या बेसन की मिठाई चींटियों को डाल दें । 🌹पितृ-पक्ष कैलेंडर 2024 (तिथि अनुसार श्राद्ध) (श्राद्ध पक्ष – 17 सितम्बर से 2 अक्टूबर 2024) 🔸 17 सितम्बर 2024, मंगलवार- पूर्णिमा का श्राद्ध महालय श्राद्धारम्भ🔸 18 सितम्बर 2024, बुधवार – प्रतिपदा का श्राद्ध🔸 19 सितम्बर 2024, गुरुवार – द्वितीया का श्राद्ध🔸 20 सितम्बर 2024, शुक्रवार – तृतीया का श्राद्ध🔸 21 सितम्बर 2024, शनिवार – चतुर्थी का श्राद्ध🔸 22 सितम्बर 2024, रविवार – पंचमी का श्राद्ध🔸 23 सितम्बर 2024, सोमवार – षष्ठी व सप्तमी का श्राद्ध 🔸 24 सितम्बर 2024, मंगलवार – अष्टमी का श्राद्ध🔸 25 सितम्बर 2024, बुधवार – नवमी का श्राद्ध🔸 26 सितम्बर 2024, गुरुवार – दशमी का श्राद्ध🔸 27 सितम्बर 2024, शुक्रवार – एकादशी का श्राद्ध🔸 29 सितम्बर 2024, रविवार – द्वादशी का श्राद्ध🔸 30 सितम्बर 2024, सोमवार – त्रयोदशी का श्राध्द🔸 1 अक्टूबर 2024, मंगलवार- चतुर्दर्शी का श्राध्द आग-दुर्घटना-अस्त्र-शस्त्र- अपमृत्यु से मृतक का श्राद्ध🔸 2 अक्टूबर 2024, बुधवार- अमावश्या * का* श्राध्द व सर्वपित्री अमावस्या (अज्ञात तिथीवालों का श्राध्द) 🔸 श्राद्ध पक्ष में पालनीय आवश्यक नियम व श्राद्ध संबंधित सम्पूर्ण जानकारी के लिए पढ़े आश्रम सत्साहित्य “श्राद्ध महिमा” में…🚩🚩 ” ll जय श्री राम ll ” 🚩🚩

Aaj Ka Panchang (आज का पंचांग) 18/09/2024 Read More »

Siddha Kunjika Stotram सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्

Siddha Kunjika Stotram:सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्: एक शक्तिशाली मंत्र Siddha Kunjika Stotram:सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् देवी दुर्गा का एक अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमय स्तोत्र है। यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती का मूल मंत्र माना जाता है और इसमें कई प्रभावशाली बीज मंत्र भी शामिल हैं। इस स्तोत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति को कई लाभ प्राप्त होते हैं। Siddha Kunjika Stotram:स्तोत्र का महत्व Siddha Kunjika Stotram:स्तोत्र का पाठ कैसे करें Siddha Kunjika Stotram:स्तोत्र के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक स्तोत्र का लाभ ध्यान दें: सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram) ॥ दुर्गा सप्तशती: सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥शिव उवाच:शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत ॥1॥ न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥2॥ कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥3॥ गोपनीयं प्रयत्‍‌नेनस्वयोनिरिव पार्वति ।मारणं मोहनं वश्यंस्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।पाठमात्रेण संसिद्ध्येत्कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥ ॥ अथ मन्त्रः ॥ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे ॥ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वलऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥ ॥ इति मन्त्रः ॥नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥1॥ नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ॥2॥ ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥ चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥4॥ धां धीं धूं धूर्जटेः पत्‍‌नी वां वीं वूं वागधीश्‍वरी ।क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥5॥ हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥6॥ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ।धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥7॥ पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥8॥ इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रंमन्त्रजागर्तिहेतवे ।अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति ॥यस्तु कुञ्जिकाया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।न तस्य जायतेसिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra) (Maa Durga Maa Kali Aarti) अम्बे तू है जगदम्बे काली माँ दुर्गा, माँ काली आरती दुर्गा कवच (Durga Kavach) श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name)

Siddha Kunjika Stotram सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् Read More »

सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra)

सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् Saptashloki Durga Stotra Saptashloki Durga Stotra॥ अथ सप्तश्लोकी दुर्गा ॥शिव उवाच:देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥ देव्युवाच:शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम् ।मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥ विनियोग:ॐ अस्य श्री दुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः । ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हिसा ।बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥1॥ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोःस्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।दारिद्र्‌यदुःखभयहारिणि त्वदन्यासर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥2॥ सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ॥3॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ॥4॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ॥5॥ रोगानशोषानपहंसि तुष्टा रूष्टातु कामान्‌ सकलानभीष्टान्‌ ।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणांत्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति ॥6॥ सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि ।एवमेव त्वया कार्यमस्यद्वैरिविनाशनम्‌ ॥7॥ ॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा संपूर्णम्‌ ॥ (Maa Durga Maa Kali Aarti) अम्बे तू है जगदम्बे काली माँ दुर्गा, माँ काली आरती दुर्गा कवच (Durga Kavach) श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name)

सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra) Read More »

(Maa Durga Maa Kali Aarti) अम्बे तू है जगदम्बे काली माँ दुर्गा, माँ काली आरती

Maa Durga Maa Kali Aarti:माँ दुर्गे का साप्ताहिक दिन शुक्रवार, दोनों नवरात्रि, अष्टमी, माता की चौकी एवं जगराते में सबसे अधिक गाई जाने वाली आरती। Maa Durga Maa Kali Aarti Maa Durga Maa Kali Aarti:अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ तेरे भक्त जनो पर,भीर पडी है भारी माँ ।दानव दल पर टूट पडो,माँ करके सिंह सवारी ।सौ-सौ सिंहो से बलशाली,अष्ट भुजाओ वाली,दुष्टो को पलमे संहारती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ माँ बेटे का है इस जग मे,बडा ही निर्मल नाता ।पूत – कपूत सुने है पर न,माता सुनी कुमाता ॥सब पे करूणा दरसाने वाली,अमृत बरसाने वाली,दुखियो के दुखडे निवारती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ नही मांगते धन और दौलत,न चांदी न सोना माँ ।हम तो मांगे माँ तेरे मन मे,इक छोटा सा कोना ॥सबकी बिगडी बनाने वाली,लाज बचाने वाली,सतियो के सत को सवांरती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ चरण शरण मे खडे तुम्हारी,ले पूजा की थाली ।वरद हस्त सर पर रख दो,मॉ सकंट हरने वाली ।मॉ भर दो भक्ति रस प्याली,अष्ट भुजाओ वाली,भक्तो के कारज तू ही सारती ।ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली,जय दुर्गे खप्पर वाली ।तेरे ही गुण गाये भारती,ओ मैया हम सब उतरें, तेरी आरती ॥ Durga Kavach:दुर्गा कवच: देवी का अचूक कवच

(Maa Durga Maa Kali Aarti) अम्बे तू है जगदम्बे काली माँ दुर्गा, माँ काली आरती Read More »

दुर्गा कवच (Durga Kavach)

Durga Kavach:दुर्गा कवच: देवी का अचूक कवच Durga Kavach:दुर्गा कवच एक शक्तिशाली मंत्र है जो देवी दुर्गा की स्तुति करता है। Durga Kavach यह कवच भक्तों को दुष्ट शक्तियों से बचाने और जीवन में सफलता प्राप्त करने में मदद करता है। यह माना जाता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से दुर्गा कवच का पाठ करता है, उसे देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है और वह सभी प्रकार के संकटों से मुक्त हो जाता है। Durga Kavach:दुर्गा कवच का महत्व श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name) Durga Kavach:दुर्गा कवच का पाठ कैसे करें Durga Kavach:दुर्गा कवच के लाभ Durga Kavach:दुर्गा कवच के श्लोक Durga Kavach:दुर्गा कवच के श्लोक बहुत लंबे और जटिल होते हैं। इन्हें किसी अनुभवी पंडित या गुरु से सीखना चाहिए। ध्यान दें: दुर्गा कवच का पाठ करते समय सही उच्चारण का बहुत महत्व होता है। Durga Kavach इसलिए किसी अनुभवी व्यक्ति से मार्गदर्शन लेना जरूरी है। देवी कवच | श्री दुर्गा कवच Durga Kavachकवच का अर्थ होता है रक्षा करने वाला, अपने चारों ओर एक प्रकार का आवरण बना देना। यह बहुत अच्छा / उत्तम है। देवी कवच के तहत हम देवी माँ के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हैं, जो हमारे इर्द-गिर्द, हमारे शरीर के चारो ओर एक कवच का निर्माण कर देते हैं। इसका अनुष्ठान विशेष कर नवरात्रि के सभी नवों दिन में किया जाता है Durga Kavach देवी कवच पाठ से शरीर के सभी अंगों की रक्षा होती है, यह पाठ महामारी से बचाव की शक्ति भी प्रदान करता है, देवी कवच पाठ सम्पूर्ण आरोग्य के लिए मानवता पर शुभ वरदान है। देवी कवच को पूरी पवित्रता के साथ पाठ करना चाहिए। ॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।ॐ नमश्‍चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेय उवाचॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥ ब्रह्मोवाचअस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥ प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥ अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥ न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥ यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥ प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥ माहेश्‍वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना।लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥ श्‍वेतरुपधरा देवी ईश्‍वरी वृषवाहना।ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥ इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥ दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥ खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥ दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥ नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥ त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥ दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥ उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥ एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥ अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥ मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥ शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥ नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥ दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥ कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥ नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।स्कन्धयोः खङ्‍गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥ हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्‍वरी॥२८॥ स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥ नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा।पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥ कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥ गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥ नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी।रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा॥३३॥ रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी॥३४॥ पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥ शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्‍वरी तथा।अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥ प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥ रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।सत्त्वं रजस्तमश्‍चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥ आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥ गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥ पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥ रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥ पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥ तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः।यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम्।परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥ निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥ इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥ दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥ नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥ अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः॥४९॥ सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः॥५०॥ ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥ नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥ यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥ यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥ देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥ लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।

दुर्गा कवच (Durga Kavach) Read More »

श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name)

Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा के 108 नाम: देवी के विभिन्न रूपों का मंत्र Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा हिंदू धर्म की एक प्रमुख देवी हैं और उन्हें शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनके 108 नाम उनके विभिन्न रूपों और गुणों को दर्शाते हैं। इन नामों का जाप करने से भक्तों को शक्ति, ज्ञान और मोक्ष प्राप्त होता है। Shri Durga 108 Name:108 नामों का महत्व Shri Durga 108 Name:जाप करने का तरीका Shri Durga 108 Name:कब करें आप किसी भी समय श्री दुर्गा के 108 नामों का जाप कर सकते हैं। लेकिन नवरात्रि जैसे विशेष अवसरों पर इनका जाप करना और भी अधिक फलदायी होता है। Shri Durga 108 Name:ध्यान रखें Shri Durga 108 Name:अतिरिक्त जानकारी श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name) 1. सती- अग्नि में जल कर भी जीवित होने वाली2. साध्वी- आशावादी3. भवप्रीता- भगवान् शिव पर प्रीति रखने वाली4. भवानी- ब्रह्मांड की निवास5. भवमोचनी- संसार बंधनों से मुक्त करने वाली6. आर्या- देवी7. दुर्गा- अपराजेय8. जया- विजयी9. आद्य- शुरूआत की वास्तविकता10. त्रिनेत्र- तीन आँखों वाली11. शूलधारिणी- शूल धारण करने वाली12. पिनाकधारिणी- शिव का त्रिशूल धारण करने वाली13. चित्रा- सुरम्य, सुंदर14. चण्डघण्टा- प्रचण्ड स्वर से घण्टा नाद करने वाली, घंटे की आवाज निकालने वाली15. महातपा- भारी तपस्या करने वाली16. मन – मनन- शक्ति17. बुद्धि- सर्वज्ञाता 18. अहंकारा- अभिमान करने वाली19. चित्तरूपा- वह जो सोच की अवस्था में है20. चिता- मृत्युशय्या21. चिति- चेतना22. सर्वमन्त्रमयी- सभी मंत्रों का ज्ञान रखने वाली23. सत्ता- सत्-स्वरूपा, जो सब से ऊपर है24. सत्यानन्दस्वरूपिणी- अनन्त आनंद का रूप25. अनन्ता- जिनके स्वरूप का कहीं अन्त नहीं26. भाविनी- सबको उत्पन्न करने वाली, खूबसूरत औरत27. भाव्या- भावना एवं ध्यान करने योग्य28. भव्या- कल्याणरूपा, भव्यता के साथ29. अभव्या – जिससे बढ़कर भव्य कुछ नहीं30. सदागति- हमेशा गति में, मोक्ष दान31. शाम्भवी- शिवप्रिया, शंभू की पत्नी32. देवमाता- देवगण की माता33. चिन्ता- चिन्ता34. रत्नप्रिया- गहने से प्यार35. सर्वविद्या- ज्ञान का निवास36. दक्षकन्या- दक्ष की बेटी 37. दक्षयज्ञविनाशिनी- दक्ष के यज्ञ को रोकने वाली38. अपर्णा- तपस्या के समय पत्ते को भी न खाने वाली39. अनेकवर्णा- अनेक रंगों वाली40. पाटला- लाल रंग वाली41. पाटलावती- गुलाब के फूल या लाल परिधान या फूल धारण करने वाली42. पट्टाम्बरपरीधाना- रेशमी वस्त्र पहनने वाली43. कलामंजीरारंजिनी- पायल को धारण करके प्रसन्न रहने वाली44. अमेय- जिसकी कोई सीमा नहीं45. विक्रमा- असीम पराक्रमी46. क्रूरा- दैत्यों के प्रति कठोर47. सुन्दरी- सुंदर रूप वाली48. सुरसुन्दरी- अत्यंत सुंदर49. वनदुर्गा- जंगलों की देवी50. मातंगी- मतंगा की देवी 51. मातंगमुनिपूजिता- बाबा मतंगा द्वारा पूजनीय52. ब्राह्मी- भगवान ब्रह्मा की शक्ति53. माहेश्वरी- प्रभु शिव की शक्ति54. इंद्री- इन्द्र की शक्ति55. कौमारी- किशोरी56. वैष्णवी- अजेय57. चामुण्डा- चंड और मुंड का नाश करने वाली58. वाराही- वराह पर सवार होने वाली59. लक्ष्मी- सौभाग्य की देवी60. पुरुषाकृति- वह जो पुरुष धारण कर ले61. विमिलौत्त्कार्शिनी- आनन्द प्रदान करने वाली62. ज्ञाना- ज्ञान से भरी हुई63. क्रिया- हर कार्य में होने वाली64. नित्या- अनन्त 65. बुद्धिदा- ज्ञान देने वाली66. बहुला- विभिन्न रूपों वाली67. बहुलप्रेमा- सर्व प्रिय68. सर्ववाहनवाहना- सभी वाहन पर विराजमान होने वाली69. निशुम्भशुम्भहननी- शुम्भ, निशुम्भ का वध करने वाली70. महिषासुरमर्दिनि- महिषासुर का वध करने वाली71. मधुकैटभहंत्री- मधु व कैटभ का नाश करने वाली72. चण्डमुण्ड विनाशिनि- चंड और मुंड का नाश करने वाली73. सर्वासुरविनाशा- सभी राक्षसों का नाश करने वाली74. सर्वदानवघातिनी- संहार के लिए शक्ति रखने वाली75. सर्वशास्त्रमयी- सभी सिद्धांतों में निपुण76. सत्या- सच्चाई77. सर्वास्त्रधारिणी- सभी हथियारों धारण करने वाली78. अनेकशस्त्रहस्ता- हाथों में कई हथियार धारण करने वाली79. अनेकास्त्रधारिणी- अनेक हथियारों को धारण करने वाली80. कुमारी- सुंदर किशोरी81. एककन्या- कन्या 82. कैशोरी- जवान लड़की83. युवती- नारी84. यति- तपस्वी85. अप्रौढा- जो कभी पुराना ना हो86. प्रौढा- जो पुराना है87. वृद्धमाता- शिथिल88. बलप्रदा- शक्ति देने वाली89. महोदरी- ब्रह्मांड को संभालने वाली90. मुक्तकेशी- खुले बाल वाली91. घोररूपा- एक भयंकर दृष्टिकोण वाली92. महाबला- अपार शक्ति वाली93. अग्निज्वाला- मार्मिक आग की तरह94. रौद्रमुखी- विध्वंसक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा95. कालरात्रि- काले रंग वाली 96. तपस्विनी- तपस्या में लगे हुए97. नारायणी- भगवान नारायण की विनाशकारी रूप98. भद्रकाली- काली का भयंकर रूप99. विष्णुमाया- भगवान विष्णु का जादू100. जलोदरी- ब्रह्मांड में निवास करने वाली101. शिवदूती- भगवान शिव की राजदूत102. करली – हिंसक103. अनन्ता- विनाश रहित104. परमेश्वरी- प्रथम देवी105. कात्यायनी- ऋषि कात्यायन द्वारा पूजनीय106. सावित्री- सूर्य की बेटी107. प्रत्यक्षा- वास्तविक108. ब्रह्मवादिनी- वर्तमान में हर जगह वास करने वाली

श्री दुर्गा के 108 नाम (Shri Durga 108 Name) Read More »

Aaj Ka Panchang (आज का पंचांग) 18/09/2024

Aaj Ka Panchang Aaj Ka Panchang 🌞~ आज का हिन्दू पंचांग ~🌞⛅दिनांक – 18 सितम्बर 2024⛅दिन – बुधवार⛅विक्रम संवत् – 2081⛅अयन – दक्षिणायन⛅ऋतु – शरद⛅मास – भाद्रपद⛅पक्ष – शुक्ल⛅तिथि – पूर्णिमा प्रातः 08:04 तक तत्पश्चात प्रतिपदा प्रातः 04:19 सितम्बर 19 तक, तत्पश्चात द्वितीया⛅नक्षत्र – पूर्व भाद्रपद प्रातः 11:00 तक तत्पश्चात उत्तर भाद्रपद⛅योग – गंड रात्रि 11:29 तक तत्पश्चात वृद्धि⛅राहु काल – दोपहर 12:33 से दोपहर 02:05 तक⛅सूर्योदय – 06:27 Aaj Ka Panchang ⛅सूर्यास्त – 06:40⛅दिशा शूल – उत्तर दिशा में⛅ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:53 से 05:40 तक⛅अभिजीत मुहूर्त – कोई नहीं⛅निशिता मुहूर्त- रात्रि 12:10 सितम्बर 19 से रात्रि 12:57 सितम्बर 19 तकव्रत पर्व विवरण – संन्यासी चतुर्मास समाप्त, आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा का श्राद्ध⛅विशेष – पूर्णिमा के दिन स्त्री-सहवास और तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है व प्रतिपदा को कुष्मांड (कुम्हड़ा, पेठा) न खायें क्योंकि यह धन का नाश करनेवाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) Aaj Ka Panchang 🔹श्राद्धयोग्य तिथियाँ (भाग -२)🔹 🔹प्रतिपदा धन-सम्पत्ति के लिए होती है एवं श्राद्ध करनेवाले की प्राप्त वस्तु नष्ट नहीं होती । 🔹द्वितिया को श्राद्ध करने वाला व्यक्ति राजा होता है । 🔹उत्तम अर्थ की प्राप्ति के अभिलाषी को तृतिया विहित है। यही तृतिया शत्रुओं का नाश करने वाली और पाप नाशिनी है । 🔹जो चतुर्थी को श्राद्ध करता है वह शत्रुओं का छिद्र देखता है अर्थात उसे शत्रुओं की समस्त कूटचालों का ज्ञान हो जाता है । 🔹पंचमी तिथि को श्राद्ध करने वाला उत्तम लक्ष्मी की प्राप्ति करता है । 🔹जो षष्ठी तिथि को श्राद्धकर्म संपन्न करता है उसकी पूजा देवता लोग करते हैं । 🔹जो सप्तमी को श्राद्धादि करता है उसको महान यज्ञों के पुण्यफल प्राप्त होते हैं और वह गणों का स्वामी होता है । 🔹जो अष्टमी को श्राद्ध करता है वह सम्पूर्ण समृद्धियाँ प्राप्त करता है । 🔹नवमी तिथि को श्राद्ध करने वाला प्रचुर ऐश्वर्य एवं मन के अनुसार अनुकूल चलने वाली स्त्री को प्राप्त करता है । 🔹दशमी तिथि को श्राद्ध करने वाला मनुष्य ब्रह्मत्व की लक्ष्मी प्राप्त करता है । Aaj Ka Panchang🔹एकादशी का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान है। वह समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कराता है । उसके सम्पूर्ण पापकर्मों का विनाश हो जाता है तथा उसे निरंतर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । 🔹द्वादशी तिथि के श्राद्ध से राष्ट्र का कल्याण तथा प्रचुर अन्न की प्राप्ति कही गयी है । 🔹त्रयोदशी के श्राद्ध से संतति, बुद्धि, धारणाशक्ति, स्वतंत्रता, उत्तम पुष्टि, दीर्घायु तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है । 🔹चतुर्दशी का श्राद्ध जवान मृतकों के लिए किया जाता है तथा जो हथियारों द्वारा मारे गये हों उनके लिए भी चतुर्दशी को श्राद्ध करना चाहिए । 🔹अमावस्या का श्राद्ध समस्त विषम उत्पन्न होने वालों के लिए अर्थात तीन कन्याओं के बाद पुत्र या तीन पुत्रों के बाद कन्याएँ हों उनके लिए होता ह । जुड़वे उत्पन्न होने वालों के लिए भी इसी दिन श्राद्ध करना चाहिए । 🔹सधवा अथवा विधवा स्त्रियों का श्राद्ध आश्विन (गुजरात-महाराष्ट्र के मुताबिक भाद्रपद) कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि के दिन किया जाता है । 🔹बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है । 🔹दुर्घटना में अथवा युद्ध में घायल होकर मरने वालों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है । 🔹जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं । मघा नक्षत्र पितरों को अभीष्ट सिद्धि देने वाला है । अतः उक्त नक्षत्र के दिनों में किया गया श्राद्ध अक्षय कहा गया है । पितृगण उसे सर्वदा अधिक पसंद करते हैं । 🔹जो व्यक्ति अष्टकाओं में पितरों की पूजा आदि नहीं करते उनका यह जो इन अवसरों पर श्राद्धादि का दान करते हैं वे देवताओं के समीप अर्थात् स्वर्गलोक को जाते हैं और जो नहीं करते वे तिर्यक्(पक्षी आदि अधम) योनियों में जाते हैं । 🔶 रात्रि के समय श्राद्धकर्म निषिद्ध है । (वायु पुराणः 78.3) 🌞🚩🚩 ” ll जय श्री राम ll ” 🚩🚩🌞 Aaj Ka Panchang English Me 18/09/2024 Aaj Ka Panchang ~ Today’s Hindu Calendar Till 04:19 am on September 19, thereafter Dwitiya ⛅Nakshatra – Purva Bhadrapada till 11:00 am thereafter Uttar Bhadrapada ⛅Yoga – Gand till 11:29 pm and then increase ⛅Rahu Kaal – 12:33 pm to 02:05 pm ⛅Sunrise – 06:27 ⛅sunset – 06:40⛅Disha Shool – in the north direction⛅Brahma Muhurta – from 04:53 to 05:40 in the morning⛅Abhijit Muhurta – none ⛅Nishita Muhurta – from 12:10 am September 19 to 12:57 pm September 19Vrat festival details – Sanyasi Chaturmas ends, Shraddha of Ashvin Krishna Paksha Pratipada⛅Special – On the day of Purnima, sexual intercourse with a woman and eating and applying sesame oil is prohibited and on Pratipada do not eat Kushmanda (pumpkin, pumpkin) because it destroys wealth. (Brahma Vaivart Purana) , Brahma Khand: 27.29-34) 🔹 Dates suitable for Shraddha (Part 2)🔹 🔹 Pratipada is for wealth and property and the thing obtained by the person performing Shraddha does not get destroyed. 🔹The person who performs Shraadh on Dwitiya becomes a king. 🔹Tritiya is prescribed for the one who desires to attain the best wealth. This Tritiya is the destroyer of enemies and destroys sins. 🔹The one who performs Shraadh on Chaturthi sees the weakness of the enemies i.e. he gets the blessings of the king. One gets to know all the tricks of the enemies. 🔹One who performs Shraddha on Panchami Tithi attains the best Lakshmi. 🔹One who performs Shraddha on Shashthi Tithi is worshipped by the gods. 🔹One who performs Shraddha on Saptami Tithi is worshipped by great yagyas. One gets the fruits of his virtues and becomes the lord of the Ganas. 🔹One who performs Shraadh on Ashtami day gets complete prosperity. 🔹The one who performs Shradh on Navami Tithi gets abundant wealth and a woman who behaves according to his wishes. 🔹The person who performs Shradh on Dashami Tithi gets the Lakshmi of Brahmatva. 🔹Shradh on Ekadashi is the best donation. It gives the knowledge of all the Vedas. All his sins are destroyed and he gets continuous prosperity. 🔹The Shraddh of Dwadashi Tithi is said to be beneficial for the nation and to get abundant food grains.

Aaj Ka Panchang (आज का पंचांग) 18/09/2024 Read More »

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa)

Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा: शक्ति की स्तुति Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा हिंदू धर्म में माँ दुर्गा की स्तुति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह चालीसा माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों और उनकी शक्ति का वर्णन करती है। इसे भक्तों द्वारा माँ दुर्गा को प्रसन्न करने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाया जाता है। Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा का महत्व Durga Chalisa ka Arth दुर्गा चालीसा का अर्थ दुर्गा चालीसा में माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों, जैसे कि महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी का वर्णन किया गया है। इसमें माँ दुर्गा के शौर्य, दया और करुणा का भी वर्णन है। यह चालीसा भक्तों को माँ दुर्गा के प्रति समर्पण और भक्ति भावना जगाती है। Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा का पाठ कब करें? दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें? दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी ॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥ शशि ललाट मुख महाविशाला ।नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ रूप मातु को अधिक सुहावे ।दरश करत जन अति सुख पावे ॥ ४ तुम संसार शक्ति लै कीना ।पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ प्रलयकाल सब नाशन हारी ।तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ८ रूप सरस्वती को तुम धारा ।दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ धरयो रूप नरसिंह को अम्बा ।परगट भई फाड़कर खम्बा ॥ रक्षा करि प्रह्लाद बचायो ।हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १२ क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।महिमा अमित न जात बखानी ॥ मातंगी अरु धूमावति माता ।भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥ श्री भैरव तारा जग तारिणी ।छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १६ केहरि वाहन सोह भवानी ।लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ कर में खप्पर खड्ग विराजै ।जाको देख काल डर भाजै ॥ सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ नगरकोट में तुम्हीं विराजत ।तिहुँलोक में डंका बाजत ॥ २० शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।रक्तबीज शंखन संहारे ॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी ।जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ रूप कराल कालिका धारा ।सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ परी गाढ़ सन्तन पर जब जब ।भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २४ अमरपुरी अरु बासव लोका ।तब महिमा सब रहें अशोका ॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।तुम्हें सदा पूजें नरनारी ॥ प्रेम भक्ति से जो यश गावें ।दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।जन्ममरण ताकौ छुटि जाई ॥ २८ जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥ शंकर आचारज तप कीनो ।काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥ निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ शक्ति रूप का मरम न पायो ।शक्ति गई तब मन पछितायो ॥ ३२ शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥ भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥ मोको मातु कष्ट अति घेरो ।तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ आशा तृष्णा निपट सतावें ।मोह मदादिक सब बिनशावें ॥ ३६ शत्रु नाश कीजै महारानी ।सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ करो कृपा हे मातु दयाला ।ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ॥ जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ ।तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥ श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै ।सब सुख भोग परमपद पावै ॥ ४० देवीदास शरण निज जानी ।कहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥ ॥दोहा॥शरणागत रक्षा करे,भक्त रहे नि:शंक ।मैं आया तेरी शरण में,मातु लिजिये अंक ॥॥ इति श्री दुर्गा चालीसा ॥

दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) Read More »

दामोदर अष्टकम (Damodarastakam)

Damodarastakam:दामोदर अष्टकम: श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मधुर वर्णन Damodarastakam:दामोदर अष्टकम भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण स्तुति है। यह अष्टकम कार्तिक मास में विशेष रूप से गाया जाता है और इसे सत्यव्रत मुनि द्वारा रचित माना जाता है। इस स्तुति में भगवान श्रीकृष्ण के दामोदर रूप का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया गया है, जब माता यशोदा ने उन्हें मक्खन चोरी करते हुए पकड़ा था और रस्सी से बांध दिया था। Damodarastakam:दामोदर अष्टकम का महत्व Damodarastakam:दामोदर अष्टकम के कुछ प्रमुख बिंदु Damodarastakam:दामोदर अष्टकम का पाठ करने का तरीका Damodarastakam:अंतिम शब्द Damodarastakam:दामोदर अष्टकम एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण स्तुति है। इसका नियमित पाठ करने से मन शांत होता है और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति बढ़ती है। यदि आप भगवान श्रीकृष्ण के भक्त हैं, तो आपको दामोदर अष्टकम का पाठ अवश्य करना चाहिए। दामोदर अष्टकम (Damodarastakam) नमामीश्वरं सच्-चिद्-आनन्द-रूपंलसत्-कुण्डलं गोकुले भ्राजमनम्यशोदा-भियोलूखलाद् धावमानंपरामृष्टम् अत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥ १॥ रुदन्तं मुहुर् नेत्र-युग्मं मृजन्तम्कराम्भोज-युग्मेन सातङ्क-नेत्रम्मुहुः श्वास-कम्प-त्रिरेखाङ्क-कण्ठस्थित-ग्रैवं दामोदरं भक्ति-बद्धम् ॥ २॥ इतीदृक् स्व-लीलाभिर् आनन्द-कुण्डेस्व-घोषं निमज्जन्तम् आख्यापयन्तम्तदीयेषित-ज्ञेषु भक्तैर् जितत्वंपुनः प्रेमतस् तं शतावृत्ति वन्दे ॥ ३॥ वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वान चन्यं वृणे ‘हं वरेषाद् अपीहइदं ते वपुर् नाथ गोपाल-बालंसदा मे मनस्य् आविरास्तां किम् अन्यैः ॥ ४॥ इदं ते मुखाम्भोजम् अत्यन्त-नीलैर्वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश् च गोप्यामुहुश् चुम्बितं बिम्ब-रक्ताधरं मेमनस्य् आविरास्ताम् अलं लक्ष-लाभैः ॥ ५॥ नमो देव दामोदरानन्त विष्णोप्रसीद प्रभो दुःख-जालाब्धि-मग्नम्कृपा-दृष्टि-वृष्ट्याति-दीनं बतानुगृहाणेष माम् अज्ञम् एध्य् अक्षि-दृश्यः ॥ ६॥ कुवेरात्मजौ बद्ध-मूर्त्यैव यद्वत्त्वया मोचितौ भक्ति-भाजौ कृतौ चतथा प्रेम-भक्तिं स्वकां मे प्रयच्छन मोक्षे ग्रहो मे ‘स्ति दामोदरेह ॥ ७॥ नमस् ते ‘स्तु दाम्ने स्फुरद्-दीप्ति-धाम्नेत्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्नेनमो राधिकायै त्वदीय-प्रियायैनमो ‘नन्त-लीलाय देवाय तुभ्यम् ॥ ८॥ पवित्र कार्तिक मास में भक्तों द्वारा सबसे अधिक मनन किया जाने वाला मन्त्र। ISKCON के अनुयायी दामोदर अष्टकम का पाठ लगभग सभी प्रमुख उत्सवों पर भजते हैं।

दामोदर अष्टकम (Damodarastakam) Read More »

श्री विश्वकर्मा 108 नाम (Vishwakarma 108 Naam)

श्री विश्वकर्मा के 108 नाम: एक पवित्र मंत्र श्री विश्वकर्मा, हिंदू धर्म में कर्मकारों और शिल्पकारों के देवता हैं। वे सभी प्रकार के निर्माण कार्य के देवता माने जाते हैं। मान्यता है कि उनके 108 नामों का जाप करने से व्यक्ति को आशीर्वाद प्राप्त होता है और उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं। विश्वकर्मा जी के 108 नामों का महत्व: कब करें जाप: कैसे करें जाप: विश्वकर्मा जी के 108 नामों का महत्व: विश्वकर्मा जी के 108 नामों का जाप करने से व्यक्ति को कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। यह एक बहुत ही पवित्र और प्रभावी मंत्र है। श्री विश्वकर्मा 108 नाम (Vishwakarma 108 Naam) भगवान श्री विश्वकर्मा जी के 108 नामॐ विश्वकर्मणे नमःॐ विश्वात्मने नमःॐ विश्वस्माय नमःॐ विश्वधाराय नमःॐ विश्वधर्माय नमःॐ विरजे नमःॐ विश्वेक्ष्वराय नमःॐ विष्णवे नमःॐ विश्वधराय नमःॐ विश्वकराय नमः ।10 ॐ वास्तोष्पतये नमःॐ विश्वभंराय नमःॐ वर्मिणे नमःॐ वरदाय नमःॐ विश्वेशाधिपतये नमःॐ वितलाय नमःॐ विशभुंजाय नमःॐ विश्वव्यापिने नमःॐ देवाय नमःॐ धार्मिणे नमः ।20 ॐ धीराय नमःॐ धराय नमःॐ परात्मने नमःॐ पुरुषाय नमःॐ धर्मात्मने नमःॐ श्वेतांगाय नमःॐ श्वेतवस्त्राय नमःॐ हंसवाहनाय नमःॐ त्रिगुणात्मने नमःॐ सत्यात्मने नमः ।30 ॐ गुणवल्लभाय नमःॐ भूकल्पाय नमःॐ भूलेंकाय नमःॐ भुवलेकाय नमःॐ चतुर्भुजय नमःॐ विश्वरुपाय नमःॐ विश्वव्यापक नमःॐ अनन्ताय नमःॐ अन्ताय नमःॐ आह्माने नमः ।40 ॐ अतलाय नमःॐ आघ्रात्मने नमःॐ अनन्तमुखाय नमःॐ अनन्तभूजाय नमःॐ अनन्तयक्षुय नमःॐ अनन्तकल्पाय नमःॐ अनन्तशक्तिभूते नमःॐ अतिसूक्ष्माय नमःॐ त्रिनेत्राय नमःॐ कंबीघराय नमः ।50 ॐ ज्ञानमुद्राय नमःॐ सूत्रात्मने नमःॐ सूत्रधराय नमःॐ महलोकाय नमःॐ जनलोकाय नमःॐ तषोलोकाय नमःॐ सत्यकोकाय नमःॐ सुतलाय नमःॐ सलातलाय नमःॐ महातलाय नमः ।60 ॐ रसातलाय नमःॐ पातालाय नमःॐ मनुषपिणे नमःॐ त्वष्टे नमःॐ देवज्ञाय नमःॐ पूर्णप्रभाय नमःॐ ह्रदयवासिने नमःॐ दुष्टदमनाथ नमःॐ देवधराय नमःॐ स्थिर कराय नमः ।70 ॐ वासपात्रे नमःॐ पूर्णानंदाय नमःॐ सानन्दाय नमःॐ सर्वेश्वरांय नमःॐ परमेश्वराय नमःॐ तेजात्मने नमःॐ परमात्मने नमःॐ कृतिपतये नमःॐ बृहद् स्मणय नमःॐ ब्रह्मांडाय नमः ।80 ॐ भुवनपतये नमःॐ त्रिभुवनाथ नमःॐ सतातनाथ नमःॐ सर्वादये नमःॐ कर्षापाय नमःॐ हर्षाय नमःॐ सुखकत्रे नमःॐ दुखहर्त्रे नमःॐ निर्विकल्पाय नमःॐ निर्विधाय नमः ।90 ॐ निस्माय नमःॐ निराधाराय नमःॐ निकाकाराय नमःॐ महदुर्लभाय नमःॐ निमोहाय नमःॐ शांतिमुर्तय नमःॐ शांतिदात्रे नमःॐ मोक्षदात्रे नमःॐ स्थवीराय नमःॐ सूक्ष्माय नमःॐ निर्मोहय नमः ।100 ॐ धराधराय नमःॐ स्थूतिस्माय नमःॐ विश्वरक्षकाय नमःॐ दुर्लभाय नमःॐ स्वर्गलोकाय नमःॐ पंचवकत्राय नमःॐ विश्वलल्लभाय नमः।108

श्री विश्वकर्मा 108 नाम (Vishwakarma 108 Naam) Read More »

गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि (Gananaykay Gandevatay Ganadhyakshay Dheemahi)

अर्थ: यह संस्कृत मंत्र भगवान गणेश को समर्पित है, जिन्हें बाधाओं को दूर करने वाले हिंदू देवता के रूप में जाना जाता है। यहाँ शब्दों का विवरण दिया गया है: समग्र अर्थ: मंत्र का अर्थ है, “हम भगवान गणेश, गणों के नेता, देवता और प्रमुख का ध्यान करते हैं।” यह उनके आशीर्वाद और मार्गदर्शन की प्रार्थना है। गण: हिंदू पौराणिक कथाओं में, गण दिव्य प्राणियों का एक समूह है जो भगवान गणेश की सेवा करते हैं। उन्हें अक्सर हाथी जैसी विशेषताओं के साथ दर्शाया जाता है। महत्व: इस मंत्र का जाप आमतौर पर किसी भी नए उद्यम या उपक्रम को शुरू करने से पहले किया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इससे भगवान गणेश का आशीर्वाद मिलता है और किसी भी संभावित बाधा को दूर किया जाता है। गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि (Gananaykay Gandevatay Ganadhyakshay Dheemahi) गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि ।गुणशरीराय गुणमण्डिताय गुणेशानाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥ गानचतुराय गानप्राणाय गानान्तरात्मने,गानोत्सुकाय गानमत्ताय गानोत्सुकमनसे ।गुरुपूजिताय गुरुदेवताय गुरुकुलस्थायिने,गुरुविक्रमाय गुह्यप्रवराय गुरवे गुणगुरवे ।गुरुदैत्यगलच्छेत्रे गुरुधर्मसदाराध्याय,गुरुपुत्रपरित्रात्रे गुरुपाखण्डखण्डकाय ।गीतसाराय गीततत्त्वाय गीतगोत्राय धीमहि,गूढगुल्फाय गन्धमत्ताय गोजयप्रदाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि,एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥ ग्रन्थगीताय ग्रन्थगेयाय ग्रन्थान्तरात्मने,गीतलीनाय गीताश्रयाय गीतवाद्यपटवे ।गेयचरिताय गायकवराय गन्धर्वप्रियकृते,गायकाधीनविग्रहाय गङ्गाजलप्रणयवते ।गौरीस्तनन्धयाय गौरीहृदयनन्दनाय,गौरभानुसुताय गौरीगणेश्वराय ।गौरीप्रणयाय गौरीप्रवणाय गौरभावाय धीमहि,गोसहस्राय गोवर्धनाय गोपगोपाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि,एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥

गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि (Gananaykay Gandevatay Ganadhyakshay Dheemahi) Read More »