नवरात्रि का नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि महत्व….

नवरात्रि नवम दिन – मां सिद्धिदात्री नवरात्रि का नवम और अंतिम दिन देवी दुर्गा के नवम रूप, मां सिद्धिदात्री की पूजा-अर्चना को समर्पित होता है। मां सिद्धिदात्री का नाम दो शब्दों “सिद्धि” और “दात्री” से मिलकर बना है। “सिद्धि” का अर्थ है विशेष उपलब्धियां या अद्वितीय शक्तियां, और “दात्री” का अर्थ है देने वाली। अर्थात, मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली देवी हैं। नवरात्रि के अंतिम दिन उनकी पूजा करने से भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं, जिससे वे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकते हैं। नवरात्रि मां सिद्धिदात्री का स्वरूप मां सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली देवी हैं, जिन्हें सामान्यतः कमल के फूल पर विराजित दर्शाया जाता है। उनके एक हाथ में गदा, दूसरे में चक्र, तीसरे में शंख और चौथे में कमल का फूल होता है। नवरात्रि मां का रंग हल्का लाल या गुलाबी होता है, जो सौम्यता और दिव्यता का प्रतीक है। उनकी सुंदरता, शांति और कांति से संसार भरपूर हो जाता है। मां सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। मां सिद्धिदात्री की उत्पत्ति पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब संसार की रचना हो रही थी और देवता, ऋषि, मुनि अपनी आध्यात्मिक शक्तियों की खोज कर रहे थे, तब भगवान शिव ने भी सिद्धियों की प्राप्ति के लिए मां सिद्धिदात्री की पूजा की। मां ने भगवान शिव को अष्ट सिद्धियों से विभूषित किया। यही कारण है नवरात्रि कि भगवान शिव को अर्धनारीश्वर रूप में भी पूजा जाता है, जिसमें आधा भाग देवी का और आधा भाग शिव का होता है। मां सिद्धिदात्री ने ही देवताओं और ऋषियों को भी इन अष्ट सिद्धियों का ज्ञान दिया था। अष्ट सिद्धियों के नाम हैं: आध्यात्मिक महत्ता मां सिद्धिदात्री की उपासना से साधक को सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है, और वह सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर हो सकता है। नवरात्रि इस दिन का ध्यान विशेष रूप से ध्यान और समाधि में लीन साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन साधक के सभी चक्र जाग्रत हो जाते हैं, और वह पूर्ण रूप से आत्मा और परमात्मा के मिलन की ओर बढ़ता है। कुंडलिनी जागरण के संदर्भ में भी मां सिद्धिदात्री की पूजा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जब साधक की कुंडलिनी शक्ति सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होती है, तब मां सिद्धिदात्री की कृपा से उसे ब्रह्मांडीय शक्ति की प्राप्ति होती है, जिससे उसे सभी सिद्धियों और दिव्य शक्तियों का अनुभव होता है। भक्तों के लिए लाभ मां सिद्धिदात्री की पूजा करने वाले भक्तों को कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। ये लाभ न केवल भौतिक जीवन में होते हैं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी सुनिश्चित करते हैं। भक्त को स्वास्थ्य, धन, वैभव और सफलता प्राप्त होती है। इसके अलावा, मां सिद्धिदात्री की कृपा से जीवन के सभी कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं, और व्यक्ति के भीतर एक दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। साधक को मानसिक शांति, धैर्य और संतुलन की प्राप्ति होती है, जिससे वह जीवन की चुनौतियों का सामना कर सकता है। पूजा विधि नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा विशेष रूप से की जाती है। भक्त प्रातः स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं और मां की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीप जलाते हैं। इसके बाद फूल, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। मां को सफेद फूल अर्पित करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसके अलावा, मां को मिठाई, विशेषकर खीर, अर्पित की जाती है। मां के मंत्र का जाप भी इस दिन किया जाता है: “ॐ सिद्धिदात्री नमः“ इस मंत्र का जाप करने से भक्त को सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सुखमय और समृद्धिशाली हो जाता है। मां सिद्धिदात्री और नवमी का महत्व नवमी का दिन देवी की पूर्णता का प्रतीक होता है। नवरात्रि के नौ दिन, एक साधक के लिए आत्मशुद्धि, ध्यान और साधना के दिन होते हैं। यह दिन साधक की यात्रा का अंतिम चरण होता है, जहां उसे मां सिद्धिदात्री की कृपा से समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है और वह जीवन के हर पहलू में संतुलन और सफलता प्राप्त करता है। नवमी के दिन कन्या पूजन का भी विशेष महत्व होता है। मां सिद्धिदात्री को कन्याओं का रूप माना जाता है, इसलिए इस दिन छोटी कन्याओं को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह पूजा इस बात का प्रतीक है कि हर कन्या में देवी का वास होता है और उनकी सेवा से देवी की कृपा प्राप्त होती है। निष्कर्ष मां सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि के अंतिम दिन भक्तों को आध्यात्मिक शांति, सिद्धियों की प्राप्ति और सांसारिक सुखों की प्राप्ति का मार्ग प्रदान करती है। मां सिद्धिदात्री की कृपा से भक्त अपने जीवन के सभी कठिनाइयों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। उनकी भक्ति और उपासना से साधक को मानसिक शांति, आंतरिक शक्ति और संतुलित जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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Bhagavad Gita:क्या आपने सपने में गीता पढ़ते देखा ? मिल सकता है शुभ समाचार

Bhagavad Gita:स्वप्नों का संसार हमारे मन की गहराइयों से जुड़ा होता है। स्वप्न मनुष्य के विचारों, अनुभवों और भावनाओं का एक प्रतिबिंब हो सकते हैं। यदि आपने किसी सपने में गीता देखी है या खुद को Bhagavad Gita भगवद् गीता पढ़ते हुए देखा है, तो यह आपके अंदर की आत्मिक, आध्यात्मिक, या मानसिक स्थिति को दर्शा सकता है। Bhagavad Gita:भगवद् गीता को हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ माना जाता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान दिया है। इसे आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा का एक स्रोत माना जाता है, और इसके विभिन्न श्लोक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहरा प्रभाव डालते हैं। Bhagavad Gita:सपने में काले वस्त्र में दिखी महिला, जानिए अर्थ कानपुर से जयमंगल शर्मा लिखते हैं कि उन्हें सपने में एक महिला दिखाई है. वह काले वस्त्र में है, वह अपना चेहरा ढंकी हुई है. उसका चेहरा मैं नहीं देख पाया. इसके क्या संकेत हैं? इस पर आचार्य विक्रमादित्य कहते हैं कि सपने में अगर कोई महिला अपना चेहरा ढंकी हुई दिखाई दे. या वह नकाब पहनी हुई हो. तो इसका अर्थ है कि आपका कोई घनिष्ट मित्र, संबंधी, आपके साथ बहुत बड़ा विश्वासघात करने वाला है. Bhagavad Gita:सपने में गीता देखना या पढ़ना:प्रतीक और अर्थ Bhagavad Gita:आध्यात्मिक जागरूकता: यदि आप सपने में गीता को देखते हैं या उसे पढ़ते हुए खुद को पाते हैं, Bhagavad Gita तो यह एक संकेत हो सकता है कि आपकी आत्मा आध्यात्मिक ज्ञान की ओर अग्रसर हो रही है। यह आपके अंदर किसी गहरी प्रश्नात्मकता, सत्य की खोज, या ईश्वर की ओर खिंचाव का प्रतीक हो सकता है। Bhagavad Gita गीता की शिक्षा जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं, जैसे कर्म, धर्म, मोक्ष, और भक्ति पर आधारित होती है, और सपने में इसे देखना इस ओर संकेत कर सकता है कि आप अपने जीवन के उद्देश्य को लेकर विचारशील हो रहे हैं। आत्म-निरीक्षण और मार्गदर्शन: गीता के श्लोक जीवन की कठिनाइयों और संदेहों के समय मार्गदर्शन देने वाले माने जाते हैं। यह सपना दर्शा सकता है कि आपके जीवन में किसी ऐसे समय का आगमन हो रहा है जहां आपको सही निर्णय लेने में सहायता की आवश्यकता है। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जीवन के संघर्षों से निपटने और सही दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित किया था। इसी तरह, यह सपना आपको अपने जीवन में आत्म-निरीक्षण करने और सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर सकता है। धर्म और कर्तव्य के प्रति जागरूकता: भगवद् गीता में धर्म और कर्तव्य को जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सपने में गीता का दिखना इस बात का संकेत हो सकता है कि आपको अपने जीवन में धर्म और कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। यह सपना आपको यह समझने की प्रेरणा दे सकता है कि आपके जीवन में कौन से कार्य या जिम्मेदारियां आपके लिए महत्वपूर्ण हैं और आपको उन्हें किस प्रकार निभाना चाहिए। आंतरिक शांति और स्थिरता: गीता की शिक्षा आत्मा की शांति और मानसिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए एक मार्गदर्शन का काम करती है। यदि आप अपने जीवन में किसी प्रकार के तनाव, संदेह, या अस्थिरता का अनुभव कर रहे हैं, तो गीता का सपना आपको आंतरिक शांति प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। यह सपना आपको यह बताने का प्रयास कर सकता है कि मानसिक शांति केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और आध्यात्मिक ज्ञान से प्राप्त होती है। नैतिक संघर्ष और समाधान: अर्जुन के नैतिक संघर्ष और उसके समाधान के रूप में गीता का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। अगर आप अपने जीवन में किसी प्रकार के नैतिक या व्यक्तिगत संघर्ष का सामना कर रहे हैं, तो गीता का सपना इस बात का संकेत हो सकता है कि आपको उस संघर्ष से निपटने के लिए किसी उच्च मार्गदर्शन की आवश्यकता है। गीता के श्लोक आपके लिए वह समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं, जो आपको सही निर्णय लेने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगे। Bhagavad Gita:व्यक्तिगत जीवन से जुड़ाव Bhagavad Gita:गीता का सपना व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक स्थिति से गहरे रूप में जुड़ा हो सकता है। हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई स्थिति होती है जो उसे अपने जीवन के गहरे अर्थों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। हो सकता है कि यह सपना आपके जीवन के किसी ऐसे मोड़ का संकेत हो, जहां आप अपने वर्तमान निर्णयों पर पुनर्विचार कर रहे हों। यह संभव है कि आप अपने जीवन के किसी महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान देने की कोशिश कर रहे हों और यह सपना आपको उन विचारों को स्पष्ट करने में मदद कर रहा हो। Bhagavad Gita:क्या करना चाहिए? निष्कर्ष कुल मिलाकर, सपने में गीता देखना या गीता पढ़ते हुए देखना एक अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। यह सपना आपके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर आपको ध्यान देने के लिए प्रेरित कर सकता है, चाहे वह आध्यात्मिक जागरूकता हो, आत्म-निरीक्षण, या नैतिक संघर्ष। गीता का सपना जीवन के उस गूढ़ ज्ञान को आपके सामने लाने का प्रयास हो सकता है, जिसे आप अपने जीवन में लागू कर सकते हैं। ऐसे सपने जीवन में आत्मिक उन्नति के लिए एक संकेत हो सकते हैं, जो आपको अपने जीवन के गहरे उद्देश्यों को समझने में सहायता कर सकते हैं। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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नवरात्रि का आठवां दिन: माँ महागौरी की पूजा विधि महत्व….

नवरात्रि आठवां दिन: माँ महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवें दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप, माँ महागौरी की पूजा की जाती है। माँ महागौरी का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और उज्ज्वल है। उनके इस स्वरूप को पवित्रता, शुद्धता, और तप की देवी के रूप में जाना जाता है। माँ महागौरी की पूजा अष्टमी तिथि को की जाती है, जिसे “महाअष्टमी” भी कहते हैं। इस दिन को अत्यधिक शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह दिन भक्तों के लिए जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति दिलाने वाला और मनोवांछित फल देने वाला होता है। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का स्वरूप नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का वर्ण अत्यंत गोरा और चमकदार है, जिसके कारण उन्हें ‘गौरी’ कहा जाता है। उनकी चार भुजाएँ हैं—एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरू और अन्य दो हाथ वरदान और अभय मुद्रा में हैं। वे सफेद रंग के वस्त्र धारण करती हैं और उनकी सवारी बैल है। उनका यह रूप शांति, पवित्रता और शक्ति का प्रतीक है। माँ महागौरी के इस स्वरूप का ध्यान करने से भक्तों के जीवन से अज्ञान, अंधकार और अशांति का नाश होता है। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी का महत्व नवरात्रि माँ महागौरी की उपासना का महत्व अत्यधिक है। मान्यता है कि माँ महागौरी की पूजा करने से साधक के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। उनका यह स्वरूप भक्तों के मन की शांति, संयम, और संतोष को बढ़ाता है। जो व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों और दुखों से गुजर रहे होते हैं, वे माँ महागौरी की पूजा से समस्त संकटों का समाधान पाते हैं। माँ महागौरी को आठवीं तिथि पर पूजने से व्यक्ति की समृद्धि, ऐश्वर्य, और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। उनके भक्तों को धन, वैभव और सभी सुखों की प्राप्ति होती है। इसके अलावा, माँ महागौरी का आशीर्वाद विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करता है, खासकर उन कन्याओं के लिए जो विवाह योग्य हैं। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आ रही हों, वे भी माँ की कृपा से संतान सुख प्राप्त करते हैं। नवरात्रि का आठवां दिन व्रत का महत्व माँ महागौरी के दिन व्रत रखना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। इस दिन उपवास करने से साधक के मन में शुद्धता और साधना में दृढ़ता आती है। अष्टमी का व्रत रखने से जीवन की सभी कठिनाइयों का अंत होता है और घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। जिन लोगों को आर्थिक समस्याएं हैं, वे इस व्रत को रखने से धन की प्राप्ति करते हैं। अष्टमी व्रत विशेष रूप से कन्या पूजन के लिए भी प्रसिद्ध है। इस दिन घर में कन्या पूजन करके उन्हें भोजन कराना बहुत ही शुभ माना जाता है। यह पूजन न केवल नारी शक्ति का सम्मान है बल्कि माँ महागौरी की कृपा प्राप्त करने का सशक्त माध्यम भी है। कन्या पूजन करने से घर में सुख और शांति का वास होता है और घर के सभी सदस्य निरोगी रहते हैं। नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी पूजा विधि माँ महागौरी की पूजा करने के लिए भक्तों को शुद्ध मन और तन से पूजा करनी चाहिए। इस दिन पूजा विधि इस प्रकार है: नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी को भोग माँ महागौरी को सफेद वस्त्र और सफेद मिठाइयों का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। विशेष रूप से खीर, नारियल, और हलवे का भोग चढ़ाने से माँ प्रसन्न होती हैं। सफेद रंग की मिठाइयों का भोग उनकी शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है। उपासना के विशेष लाभ माँ महागौरी की पूजा से भक्तों को विशेष लाभ प्राप्त होते हैं: निष्कर्ष नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी की पूजा और व्रत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उनकी उपासना से जीवन की सभी समस्याओं का अंत होता है और भक्तों को शांति, समृद्धि, और संतोष की प्राप्ति होती है। माँ महागौरी की कृपा से भक्तों का जीवन सुख-शांति से भर जाता है, और उनके सभी कार्य सिद्ध होते हैं।

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नवरात्रि का सातवां दिन: माँ कालरात्रि की पूजा विधि महत्व….

नवरात्रि का सातवां दिन: माँ कालरात्रि की पूजा नवरात्रि के सातवें दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप, माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है। माँ कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत उग्र और भयानक है, परंतु वे भक्तों के लिए अत्यंत शुभकारी मानी जाती हैं। उनके इस स्वरूप को ‘काल का नाश करने वाली’ के रूप में जाना जाता है। उनका यह रूप विशेषतः तामसिक और आसुरी शक्तियों का विनाश करने के लिए प्रकट हुआ था। माँ कालरात्रि का स्वरूप नवरात्रि का सातवां दिन:माँ कालरात्रि का रंग काला है और उनके चार हाथ हैं। एक हाथ में तलवार, दूसरे में लोहे की कांटी (लौह शस्त्र), तीसरे हाथ से वे अभय मुद्रा में हैं, और चौथे हाथ से वरदान देती हैं। उनकी सवारी गधा है, और उनके गले में नरमुंडों की माला है। उनका यह उग्र स्वरूप विनाशकारी शक्तियों और दुष्ट आत्माओं को नष्ट करने वाला है, लेकिन उनके भक्तों को माँ हमेशा रक्षा का आश्वासन देती हैं। माँ कालरात्रि का दर्शन मात्र ही सभी प्रकार के भय से मुक्ति दिलाता है। नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि का महत्व नवरात्रि का सातवां दिन :माँ कालरात्रि की पूजा जीवन से नकारात्मकता को दूर करती है। इस दिन पूजा करने से शत्रुओं का नाश होता है और बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है। माना जाता है कि माँ कालरात्रि की उपासना से भक्त सभी प्रकार के भय, संकट और दु:खों से मुक्त हो जाता है। यह दिन भक्तों के लिए शक्ति, साहस और आत्म-नियंत्रण प्राप्त करने का समय होता है। माँ कालरात्रि उन भक्तों को विशेष आशीर्वाद देती हैं, जो निर्भय और दृढ़ निश्चयी होते हैं। उनका एक नाम “शुभंकरी” भी है, क्योंकि वे अपने भक्तों के लिए शुभ फल प्रदान करती हैं। माँ कालरात्रि की पूजा विशेष रूप से उन व्यक्तियों के लिए लाभकारी मानी जाती है, जिन्हें अपने जीवन में भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उनकी उपासना से सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। व्रत का महत्व नवरात्रि के सातवें दिन का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों को अन्न का त्याग करना चाहिए और फलाहार या केवल जल ग्रहण करके व्रत करना चाहिए। यह व्रत साधकों को मानसिक और शारीरिक शक्ति प्रदान करता है। माँ कालरात्रि की कृपा से भक्तों को कठिन परिस्थितियों में विजय प्राप्त होती है और उनका आत्मबल बढ़ता है। इस व्रत का पालन करने से बुरी शक्तियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में शांति व सुख की प्राप्ति होती है। यह व्रत संयम, अनुशासन और दृढ़ संकल्प का प्रतीक होता है। नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि पूजा विधि माँ कालरात्रि की पूजा के लिए विशेष विधि अपनाई जाती है। आइए जानते हैं इस पूजा की विधि: नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि को भोग माँ कालरात्रि को विशेष रूप से गुड़ का भोग लगाया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि गुड़ से बने प्रसाद का भोग लगाने से माँ शीघ्र प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। गुड़ के साथ इमरती या हलवा का भोग भी चढ़ाया जा सकता है। उपासना के विशेष लाभ माँ कालरात्रि की पूजा से जो विशेष लाभ प्राप्त होते हैं, वे इस प्रकार हैं: निष्कर्ष नवरात्रि का सातवां दिन माँ कालरात्रि की पूजा और उपासना के लिए समर्पित होता है। उनकी पूजा से न केवल मानसिक शांति और आत्मविश्वास मिलता है, बल्कि सभी प्रकार के भय और दु:खों से भी मुक्ति मिलती है। यह दिन शक्ति, साहस और साधना का प्रतीक है। माँ कालरात्रि की कृपा से भक्त जीवन के हर क्षेत्र में सफल होते हैं और सभी संकटों का समाधान होता है।

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Shiv Chalisa:शिव चालीसा

Shiv Chalisa:शिव चालीसा: भोलेनाथ की स्तुति Shiv Chalisa:शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में लिखा गया एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह चालीसा भगवान शिव के विभिन्न रूपों और उनके महात्म्य का वर्णन करती है। भक्तगण भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए इस चालीसा का पाठ करते हैं। Shiv Chalisa:शिव चालीसा का महत्व Shiv Chalisa:शिव चालीसा का पाठ कैसे करें Shiv Chalisa:शिव चालीसा के लाभ शिव चालीसा (Shiv Chalisa) ॥ दोहा ॥जय गणेश गिरिजा सुवन,मंगल मूल सुजान ।कहत अयोध्यादास तुम,देहु अभय वरदान ॥ ॥ चौपाई ॥जय गिरिजा पति दीन दयाला ।सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।कानन कुण्डल नागफनी के ॥ अंग गौर शिर गंग बहाये ।मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥ वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4 मैना मातु की हवे दुलारी ।बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥ नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥ कार्तिक श्याम और गणराऊ ।या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8 देवन जबहीं जाय पुकारा ।तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥ किया उपद्रव तारक भारी ।देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥ तुरत षडानन आप पठायउ ।लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥ आप जलंधर असुर संहारा ।सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12 त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥ किया तपहिं भागीरथ भारी ।पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥ वेद नाम महिमा तव गाई।अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16 प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।जरत सुरासुर भए विहाला ॥ कीन्ही दया तहं करी सहाई ।नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥ पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ सहस कमल में हो रहे धारी ।कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20 एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।कमल नयन पूजन चहं सोई ॥ कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥ जय जय जय अनन्त अविनाशी ।करत कृपा सब के घटवासी ॥ दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24 त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥ लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।संकट से मोहि आन उबारो ॥ मात-पिता भ्राता सब होई ।संकट में पूछत नहिं कोई ॥ स्वामी एक है आस तुम्हारी ।आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28 धन निर्धन को देत सदा हीं ।जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥ अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ शंकर हो संकट के नाशन ।मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥ योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32 नमो नमो जय नमः शिवाय ।सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥ जो यह पाठ करे मन लाई ।ता पर होत है शम्भु सहाई ॥ ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।पाठ करे सो पावन हारी ॥ पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36 पण्डित त्रयोदशी को लावे ।ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥ धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥ जन्म जन्म के पाप नसावे ।अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40 कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥ ॥ दोहा ॥नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥ मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

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Maa Maha Kali Jai Kali Kankal Malini:माँ महाकाली – जय काली कंकाल मालिनी

Maa Maha Kali:काली चालीसा: शक्ति और तांत्रिक साधना का एक महत्वपूर्ण मंत्र Maa Maha Kali:काली चालीसा हिंदू धर्म में माता काली को समर्पित एक प्रसिद्ध स्तुति है। यह चालीसा माता काली के विभिन्न रूपों और उनके महात्म्य का वर्णन करती है। इसे भक्तगण माता काली की कृपा प्राप्त करने के लिए पाठ करते हैं। Maa Maha Kali:काली चालीसा का महत्व Maa Maha Kali:काली चालीसा का पाठ कैसे करें Maa Maha Kali:काली चालीसा के लाभ माँ महाकाली – जय काली कंकाल मालिनी! (Maa Maha Kali Jai Kali Kankal Malini) ॥ दोहा ॥जय जय सीताराम के मध्यवासिनी अम्ब,देहु दर्श जगदम्ब अब करहु न मातु विलम्ब ॥जय तारा जय कालिका जय दश विद्या वृन्द,काली चालीसा रचत एक सिद्धि कवि हिन्द ॥प्रातः काल उठ जो पढ़े दुपहरिया या शाम,दुःख दरिद्रता दूर हों सिद्धि होय सब काम ॥ ॥ चौपाई ॥जय काली कंकाल मालिनी,जय मंगला महाकपालिनी ॥ रक्तबीज वधकारिणी माता,सदा भक्तन की सुखदाता ॥ शिरो मालिका भूषित अंगे,जय काली जय मद्य मतंगे ॥ हर हृदयारविन्द सुविलासिनी,जय जगदम्बा सकल दुःख नाशिनी ॥ ४ ॥ ह्रीं काली श्रीं महाकाराली,क्रीं कल्याणी दक्षिणाकाली ॥ जय कलावती जय विद्यावति,जय तारासुन्दरी महामति ॥ देहु सुबुद्धि हरहु सब संकट,होहु भक्त के आगे परगट ॥ जय ॐ कारे जय हुंकारे,महाशक्ति जय अपरम्पारे ॥ ८ ॥ कमला कलियुग दर्प विनाशिनी,सदा भक्तजन की भयनाशिनी ॥ अब जगदम्ब न देर लगावहु,दुख दरिद्रता मोर हटावहु ॥ जयति कराल कालिका माता,कालानल समान घुतिगाता ॥ जयशंकरी सुरेशि सनातनि,कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनी ॥ १२ ॥ कपर्दिनी कलि कल्प विमोचनि,जय विकसित नव नलिन विलोचनी ॥ आनन्दा करणी आनन्द निधाना,देहुमातु मोहि निर्मल ज्ञाना ॥ करूणामृत सागरा कृपामयी,होहु दुष्ट जन पर अब निर्दयी ॥ सकल जीव तोहि परम पियारा,सकल विश्व तोरे आधारा ॥ १६ ॥ प्रलय काल में नर्तन कारिणि,जग जननी सब जग की पालिनी ॥ महोदरी माहेश्वरी माया,हिमगिरि सुता विश्व की छाया ॥ स्वछन्द रद मारद धुनि माही,गर्जत तुम्ही और कोउ नाहि ॥ स्फुरति मणिगणाकार प्रताने,तारागण तू व्योम विताने ॥ २० ॥ श्रीधारे सन्तन हितकारिणी,अग्निपाणि अति दुष्ट विदारिणि ॥ धूम्र विलोचनि प्राण विमोचिनी,शुम्भ निशुम्भ मथनि वर लोचनि ॥ सहस भुजी सरोरूह मालिनी,चामुण्डे मरघट की वासिनी ॥ खप्पर मध्य सुशोणित साजी,मारेहु माँ महिषासुर पाजी ॥ २४ ॥ अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका,सब एके तुम आदि कालिका ॥ अजा एकरूपा बहुरूपा,अकथ चरित्रा शक्ति अनूपा ॥ कलकत्ता के दक्षिण द्वारे,मूरति तोरि महेशि अपारे ॥ कादम्बरी पानरत श्यामा,जय माँतगी काम के धामा ॥ २८ ॥ कमलासन वासिनी कमलायनि,जय श्यामा जय जय श्यामायनि ॥ मातंगी जय जयति प्रकृति हे,जयति भक्ति उर कुमति सुमति हे ॥ कोटि ब्रह्म शिव विष्णु कामदा,जयति अहिंसा धर्म जन्मदा ॥ जलथल नभ मण्डल में व्यापिनी,सौदामिनी मध्य आलापिनि ॥ ३२ ॥ झननन तच्छु मरिरिन नादिनी,जय सरस्वती वीणा वादिनी ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे,कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा ॥ जय ब्रह्माण्ड सिद्धि कवि माता,कामाख्या और काली माता ॥ हिंगलाज विन्ध्याचल वासिनी,अटठहासिनि अरु अघन नाशिनी ॥ ३६ ॥ कितनी स्तुति करूँ अखण्डे,तू ब्रह्माण्डे शक्तिजित चण्डे ॥ करहु कृपा सब पे जगदम्बा,रहहिं निशंक तोर अवलम्बा ॥ चतुर्भुजी काली तुम श्यामा,रूप तुम्हार महा अभिरामा ॥ खड्ग और खप्पर कर सोहत,सुर नर मुनि सबको मन मोहत ॥ ४० ॥ तुम्हारी कृपा पावे जो कोई,रोग शोक नहिं ताकहँ होई ॥ जो यह पाठ करै चालीसा,तापर कृपा करहिं गौरीशा ॥ ॥ दोहा ॥जय कपालिनी जय शिवा,जय जय जय जगदम्ब,सदा भक्तजन केरि दुःख हरहु,मातु अविलम्ब ॥

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नवरात्रि के चौथे दिन होती है माता कूष्मांडा की पूजा, नोट कर लें पूजा-विधि,मंत्र……

नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा की जाती है, जिन्हें सृष्टि की रचनाकार और सौम्यता का प्रतीक माना जाता है। कूष्मांडा देवी को उनके मुस्कान से अंड (ब्रह्मांड) की उत्पत्ति करने वाली शक्ति के रूप में जाना जाता है। इनकी उपासना से भक्तों को लंबी आयु, समृद्धि, स्वास्थ्य, और उन्नति का वरदान मिलता है। नवरात्रि माता कूष्मांडा का स्वरूप: नवरात्रि माता कूष्मांडा का स्वरूप आठ भुजाओं वाला होता है, इसीलिए इन्हें “अष्टभुजा देवी” भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला होती है। इनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। पूजा-विधि: माता कूष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। इस दिन पूजा करते समय निम्न विधि अपनाई जाती है: नवरात्रि माता कूष्मांडा का मंत्र: माता कूष्मांडा का जाप करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं। निम्न मंत्र का जाप करें: ॐ देवी कूष्मांडायै नमः। यह मंत्र कम से कम 108 बार जपना चाहिए। यदि संभव हो तो मंत्र जाप के साथ दीप जलाकर पूजा करें। शुभ रंग: नवरात्रि के चौथे दिन हरा रंग शुभ माना जाता है। इस दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करना या पूजा में हरे रंग का कपड़ा इस्तेमाल करना विशेष फलदायी होता है। हरा रंग जीवन में उन्नति, समृद्धि, और स्वास्थ्य का प्रतीक है। माता कूष्मांडा की महिमा: माता कूष्मांडा सृष्टि की रचयिता मानी जाती हैं। कहते हैं कि जब संसार में कुछ भी नहीं था, तब देवी कूष्मांडा ने अपनी हल्की मुस्कान के द्वारा ब्रह्मांड की रचना की। इनकी उपासना से हमारे सभी प्रकार के कष्ट, रोग, और शोक समाप्त होते हैं। विशेष रूप से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए माता की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है। उनकी कृपा से जीवन में उत्साह और सकारात्मकता आती है। नवरात्रि के चौथे दिन क्या करें और क्या न करें: क्या करें: क्या न करें: निष्कर्ष: माता कूष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन बेहद महत्वपूर्ण होती है। उनकी उपासना से व्यक्ति के जीवन में रोग, भय और कष्टों का नाश होता है। माता की कृपा से साधक को समृद्धि, यश, और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। उनका सान्निध्य हमारे जीवन में नई ऊर्जा और उमंग का संचार करता है।

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Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा

Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा: माता वैष्णो देवी की भक्ति में डूब जाइए Vaishno Chalisha:आपने वैष्णो चालीसा के बारे में पूछा है। माता वैष्णो देवी हिंदू धर्म में एक बहुत ही लोकप्रिय देवी हैं। उन्हें शक्ति की देवी माना जाता है और उनकी पूजा बहुत ही श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। वैष्णो देवी चालीसा, माता वैष्णो देवी की स्तुति में गाया जाने वाला एक भजन है। यह भजन माता के प्रति भक्तिभाव को बढ़ाता है और मान्यताओं के अनुसार, इसका जाप करने से मन शांत होता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा का महत्व Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा का जाप कैसे करें? वैष्णो चालीसा का जाप करना बहुत ही आसान है। आप इसे किसी भी समय और किसी भी जगह कर सकते हैं। जाप करते समय आप माता वैष्णो देवी की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठ सकते हैं। आप मन में या जोर से जाप कर सकते हैं। यदि आप वैष्णो चालीसा का हिंदी में पाठ करना चाहते हैं, तो आप इसे ऑनलाइन आसानी से खोज सकते हैं। क्या आप वैष्णो चालीसा का हिंदी में पाठ पढ़ना चाहते हैं या इसके बारे में और जानना चाहते हैं? मुझे यह बताने में खुशी होगी कि मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूँ। यहाँ कुछ अतिरिक्त जानकारी दी गई है जो आपके लिए उपयोगी हो सकती है: Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा एक भक्ति गीत है जो वैष्णो माता पर आधारित है। ॥ दोहा ॥गरुड़ वाहिनी वैष्णवी,त्रिकुटा पर्वत धाम।काली, लक्ष्मी, सरस्वती,शक्ति तुम्हें प्रणाम॥ ॥ चौपाई ॥नमो: नमो: वैष्णो वरदानी।कलि काल मे शुभ कल्याणी॥मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी।पिंडी रूप में हो अवतारी॥ देवी देवता अंश दियो है।रत्नाकर घर जन्म लियो है॥करी तपस्या राम को पाऊँ।त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥ कहा राम मणि पर्वत जाओ।कलियुग की देवी कहलाओ॥विष्णु रूप से कल्की बनकर।लूंगा शक्ति रूप बदलकर॥ तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ।गुफा अंधेरी जाकर पाओ॥काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ।करेंगी शोषण-पार्वती माँ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे।हनुमत भैरों प्रहरी प्यारे॥रिद्धि, सिद्धि चंवर डुलावें।कलियुग-वासी पूजत आवें॥ पान सुपारी ध्वजा नारियल।चरणामृत चरणों का निर्मल॥दिया फलित वर माँ मुस्काई।करन तपस्या पर्वत आई॥ कलि कालकी भड़की ज्वाला।इक दिन अपना रूप निकाला॥कन्या बन नगरोटा आई।योगी भैरों दिया दिखाई॥ रूप देख सुन्दर ललचाया।पीछे-पीछे भागा आया॥कन्याओं के साथ मिली माँ।कौल-कंदौली तभी चली माँ॥ देवा माई दर्शन दीना।पवन रूप हो गई प्रवीणा॥नवरात्रों में लीला रचाई।भक्त श्रीधर के घर आई॥ योगिन को भण्डारा दीना।सबने रूचिकर भोजन कीना॥मांस, मदिरा भैरों मांगी।रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥ बाण मारकर गंगा निकाली।पर्वत भागी हो मतवाली॥चरण रखे आ एक शिला जब।चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥ पीछे भैरों था बलकारी।छोटी गुफा में जाय पधारी॥नौ माह तक किया निवासा।चली फोड़कर किया प्रकाशा॥ आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी।कहलाई माँ आद कुंवारी॥गुफा द्वार पहुँची मुस्काई।लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥ भागा-भागा भैरों आया।रक्षा हित निज शस्त्र चलाया॥पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर।किया क्षमा जा दिया उसे वर॥ अपने संग में पुजवाऊंगी।भैरों घाटी बनवाऊंगी॥पहले मेरा दर्शन होगा।पीछे तेरा सुमरन होगा॥ बैठ गई माँ पिण्डी होकर।चरणों में बहता जल झर-झर॥चौंसठ योगिनी-भैंरो बरवन।सप्तऋषि आ करते सुमरन॥ घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे।गुफा निराली सुन्दर लागे॥भक्त श्रीधर पूजन कीना।भक्ति सेवा का वर लीना॥ सेवक ध्यानूं तुमको ध्याया।ध्वजा व चोला आन चढ़ाया॥सिंह सदा दर पहरा देता।पंजा शेर का दु:ख हर लेता॥ जम्बू द्वीप महाराज मनाया।सर सोने का छत्र चढ़ाया॥हीरे की मूरत संग प्यारी।जगे अखंड इक जोत तुम्हारी॥ आश्विन चैत्र नवराते आऊँ।पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ॥सेवक ‘शर्मा’ शरण तिहारी।हरो वैष्णो विपत हमारी॥ ॥ दोहा ॥कलियुग में महिमा तेरी,है माँ अपरम्पार।धर्म की हानि हो रही,प्रगट हो अवतार॥

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नवरात्रि 2024: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, भोग, और क्या करें और क्या न करें

नवरात्रि 2024: मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, भोग, और क्या करें और क्या न करें नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है, जो साहस, शक्ति और सौम्यता की देवी मानी जाती हैं। इनका रूप बहुत ही अद्भुत और शक्तिशाली है, जो भक्तों को जीवन में साहस और संतुलन बनाए रखने का आशीर्वाद देती हैं। अगर आप मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (Puja Vidhi), मंत्र (Mantras), भोग (Offerings), और पूजा के दौरान क्या करें और क्या न करें (Do’s and Don’ts) के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह पोस्ट आपके लिए है। मां चंद्रघंटा की पूजा विधि (Maa Chandraghanta Puja Vidhi) मां चंद्रघंटा के मंत्र (Mantras for Worship) मंत्रों का जाप करते हुए मां का ध्यान करें और उनसे साहस और संतुलन की प्रार्थना करें। मां चंद्रघंटा को भोग (Prasad to Offer) मां को दूध, खीर, और शहद का भोग विशेष रूप से प्रिय है। इन वस्तुओं को मां को अर्पित करने से स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मां चंद्रघंटा की पूजा में क्या करें (What to Do) मां चंद्रघंटा की पूजा में क्या न करें (What Not to Do) निष्कर्ष (Conclusion) मां की पूजा साहस, शक्ति और मानसिक संतुलन का प्रतीक है। सही विधि से की गई पूजा जीवन में शांति, साहस और संतुलन लाती है। इस नवरात्रि, मां चंद्रघंटा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा विधि, मंत्र जाप, और पूजा के नियमों का पालन करना अति महत्वपूर्ण है। उनकी कृपा से आपके जीवन में समृद्धि, साहस, और शक्ति का संचार होगा। इस नवरात्रि, मां की पूजा से अपने जीवन में साहस और संतुलन लाएं। Tags: Navratri2024 #MaaChandraghanta #PujaVidhi #NavratriThirdDay #ChandraghantaMantra #NavratriBhog #NavratriDoAndDonts #PujaSteps #SpiritualWorship #MantraJap #HinduRituals #NavratriSpecial #ChandraghantaPuja

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Maa Chandraghanta Aarti Navratri नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की करें आरती

चंद्रघंटा नवरात्रि के तीसरे दिन मां के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, मां दुर्गा का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। माता रानी के मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान हैं, इस वजह से मां का नाम चंद्रघंटा पड़ा। मां चंद्रघंटा की सवारी शेर है। दस हाथों में कमल और कमडंल के अलावा अस्त-शस्त्र हैं। माथे पर अर्ध चंद्र ही इनकी पहचान है। इनके कंठ में श्वेत पुष्प की माला और शीर्ष पर रत्नजड़ित मुकुट विराजमान है। माता युद्ध की मुद्रा में विराजमान रहती हैं। न्यता है कि मां की पूजा करने से मन को शांति प्राप्त होती है। मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप की अराधना करने से परम शक्ति का अनुभव होता है। मान्यता है कि मां की पूजा में दूध का प्रयोग करना परम कल्याणकारी होता है। मां की कृपा से जीवन सुखमय हो जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन पर देवी का आशीर्वाद पाने के लिए विधिवत पूजा करने के साथ माता की आरती जरूर करें। चंद्रघंटा जय मां चंद्रघंटा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे सभी काम। चंद्र समान तुम शीतल दाती।चंद्र तेज किरणों में समाती। क्रोध को शांत करने वाली। मीठे बोल सिखाने वाली। मन की मालक मन भाती हो। चंद्र घंटा तुम वरदाती हो। सुंदर भाव को लाने वाली। हर संकट मे बचाने वाली। हर बुधवार जो तुझे ध्याये। श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं। मूर्ति चंद्र आकार बनाएं। सन्मुख घी की ज्योति जलाएं। शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगदाता। कांचीपुर स्थान तुम्हारा। करनाटिका में मान तुम्हारा। नाम तेरा रटूं महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी।

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Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा

Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी माता को शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे विंध्य पर्वत की अधिष्ठात्री देवी हैं और माता पार्वती का एक स्वरूप मानी जाती हैं। विन्ध्येश्वरी माता की पूजा विशेष रूप से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में की जाती है। Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा का महत्व विन्ध्येश्वरी चालीसा का पाठ करने से मन में शक्ति और शांति का अनुभव होता है। यह माना जाता है कि चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वे मोक्ष प्राप्त करते हैं। Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा का पाठ कैसे करें? Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा के लाभ Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा ॥ दोहा ॥नमो नमो विन्ध्येश्वरी,नमो नमो जगदम्ब ।सन्तजनों के काज में,करती नहीं विलम्ब ॥ जय जय जय विन्ध्याचल रानी।आदिशक्ति जगविदित भवानी ॥ सिंहवाहिनी जै जगमाता ।जै जै जै त्रिभुवन सुखदाता ॥ कष्ट निवारण जै जगदेवी ।जै जै सन्त असुर सुर सेवी ॥ महिमा अमित अपार तुम्हारी ।शेष सहस मुख वर्णत हारी ॥ दीनन को दु:ख हरत भवानी ।नहिं देखो तुम सम कोउ दानी ॥ सब कर मनसा पुरवत माता ।महिमा अमित जगत विख्याता ॥ जो जन ध्यान तुम्हारो लावै ।सो तुरतहि वांछित फल पावै ॥ तुम्हीं वैष्णवी तुम्हीं रुद्रानी ।तुम्हीं शारदा अरु ब्रह्मानी ॥ रमा राधिका श्यामा काली ।तुम्हीं मातु सन्तन प्रतिपाली ॥ उमा माध्वी चण्डी ज्वाला ।वेगि मोहि पर होहु दयाला ॥ 10 तुम्हीं हिंगलाज महारानी ।तुम्हीं शीतला अरु विज्ञानी ॥ दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता ।तुम्हीं लक्ष्मी जग सुख दाता ॥ तुम्हीं जाह्नवी अरु रुद्रानी ।हे मावती अम्ब निर्वानी ॥ अष्टभुजी वाराहिनि देवा ।करत विष्णु शिव जाकर सेवा ॥ चौंसट्ठी देवी कल्यानी ।गौरि मंगला सब गुनखानी ॥ पाटन मुम्बादन्त कुमारी ।भाद्रिकालि सुनि विनय हमारी ॥ बज्रधारिणी शोक नाशिनी ।आयु रक्षिनी विन्ध्यवासिनी ॥ जया और विजया वैताली ।मातु सुगन्धा अरु विकराली ॥ नाम अनन्त तुम्हारि भवानी ।वरनै किमि मानुष अज्ञानी ॥ जापर कृपा मातु तब होई ।जो वह करै चाहे मन जोई ॥ 20 कृपा करहु मोपर महारानी ।सिद्ध करहु अम्बे मम बानी ॥ जो नर धरै मातु कर ध्याना ।ताकर सदा होय कल्याना ॥ विपति ताहि सपनेहु नाहिं आवै ।जो देवीकर जाप करावै ॥ जो नर कहँ ऋण होय अपारा ।सो नर पाठ करै शत बारा ॥ निश्चय ऋण मोचन होई जाई ।जो नर पाठ करै चित लाई ॥ अस्तुति जो नर पढ़े पढ़अवे ।या जग में सो बहु सुख पावे ॥ जाको व्याधि सतावे भाई ।जाप करत सब दूर पराई ॥ जो नर अति बन्दी महँ होई ।बार हजार पाठ करि सोई ॥ निश्चय बन्दी ते छुट जाई ।सत्य वचन मम मानहु भाई ॥ जापर जो कछु संकट होई ।निश्चय देविहिं सुमिरै सोई ॥ 30 जा कहँ पुत्र होय नहिं भाई ।सो नर या विधि करे उपाई ॥ पाँच वर्ष जो पाठ करावै ।नौरातन महँ विप्र जिमावै ॥ निश्चय होहिं प्रसन्न भवानी ।पुत्र देहिं ता कहँ गुणखानी ॥ ध्वजा नारियल आन चढ़ावै ।विधि समेत पूजन करवावै ॥ नित प्रति पाठ करै मन लाई ।प्रेम सहित नहिं आन उपाई ॥ यह श्री विन्ध्याचल चालीसा ।रंक पढ़त होवे अवनीसा ॥ यह जन अचरज मानहु भाई ।कृपा दृश्टि जापर होइ जाई ॥ जै जै जै जग मातु भवानी ।कृपा करहु मोहि निज जन जानी ॥ 40

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Kali Mata Chalisa-माँ काली चालीसा

Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा Kali Mata Chalisa:माँ काली को शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। Kali Mata Chalisa वे हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में से एक हैं। माँ काली की शक्ति को असीम माना जाता है और वे अपने भक्तों की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं। Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा का महत्व माँ काली की चालीसा का पाठ करने से मन में शक्ति और शांति का अनुभव होता है। Kali Mata Chalisa यह माना जाता है कि चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वे मोक्ष प्राप्त करते हैं। Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा का पाठ कैसे करें? Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा के लाभ Kali Mata Chalisa -माँ काली चालीसा ॥दोहा॥जयकाली कलिमलहरण,महिमा अगम अपार ।महिष मर्दिनी कालिका,देहु अभय अपार ॥ ॥ चौपाई ॥अरि मद मान मिटावन हारी ।मुण्डमाल गल सोहत प्यारी ॥ अष्टभुजी सुखदायक माता ।दुष्टदलन जग में विख्याता ॥ भाल विशाल मुकुट छवि छाजै ।कर में शीश शत्रु का साजै ॥ दूजे हाथ लिए मधु प्याला ।हाथ तीसरे सोहत भाला ॥4॥ चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे ।छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे ॥ सप्तम करदमकत असि प्यारी ।शोभा अद्भुत मात तुम्हारी ॥ अष्टम कर भक्तन वर दाता ।जग मनहरण रूप ये माता ॥ भक्तन में अनुरक्त भवानी ।निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी ॥8॥ महशक्ति अति प्रबल पुनीता ।तू ही काली तू ही सीता ॥ पतित तारिणी हे जग पालक ।कल्याणी पापी कुल घालक ॥ शेष सुरेश न पावत पारा ।गौरी रूप धर्यो इक बारा ॥ तुम समान दाता नहिं दूजा ।विधिवत करें भक्तजन पूजा ॥12॥ रूप भयंकर जब तुम धारा ।दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा ॥ नाम अनेकन मात तुम्हारे ।भक्तजनों के संकट टारे ॥ कलि के कष्ट कलेशन हरनी ।भव भय मोचन मंगल करनी ॥ महिमा अगम वेद यश गावैं ।नारद शारद पार न पावैं ॥16॥ भू पर भार बढ्यौ जब भारी ।तब तब तुम प्रकटीं महतारी ॥ आदि अनादि अभय वरदाता ।विश्वविदित भव संकट त्राता ॥ कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा ।उसको सदा अभय वर दीन्हा ॥ ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा ।काल रूप लखि तुमरो भेषा ॥20॥ कलुआ भैंरों संग तुम्हारे ।अरि हित रूप भयानक धारे ॥ सेवक लांगुर रहत अगारी ।चौसठ जोगन आज्ञाकारी ॥ त्रेता में रघुवर हित आई ।दशकंधर की सैन नसाई ॥ खेला रण का खेल निराला ।भरा मांस-मज्जा से प्याला ॥24॥ रौद्र रूप लखि दानव भागे ।कियौ गवन भवन निज त्यागे ॥ तब ऐसौ तामस चढ़ आयो ।स्वजन विजन को भेद भुलायो ॥ ये बालक लखि शंकर आए ।राह रोक चरनन में धाए ॥ तब मुख जीभ निकर जो आई ।यही रूप प्रचलित है माई ॥28॥ बाढ्यो महिषासुर मद भारी ।पीड़ित किए सकल नर-नारी ॥ करूण पुकार सुनी भक्तन की ।पीर मिटावन हित जन-जन की ॥15॥ तब प्रगटी निज सैन समेता ।नाम पड़ा मां महिष विजेता ॥ शुंभ निशुंभ हने छन माहीं ।तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं ॥32॥ मान मथनहारी खल दल के ।सदा सहायक भक्त विकल के ॥ दीन विहीन करैं नित सेवा ।पावैं मनवांछित फल मेवा ॥17॥ संकट में जो सुमिरन करहीं ।उनके कष्ट मातु तुम हरहीं ॥ प्रेम सहित जो कीरति गावैं ।भव बन्धन सों मुक्ती पावैं ॥36॥ काली चालीसा जो पढ़हीं ।स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं ॥ दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा ।केहि कारण मां कियौ विलम्बा ॥ करहु मातु भक्तन रखवाली ।जयति जयति काली कंकाली ॥ सेवक दीन अनाथ अनारी ।भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी ॥40॥ ॥दोहा॥प्रेम सहित जो करे,काली चालीसा पाठ ।तिनकी पूरन कामना,होय सकल जग ठाठ ॥

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