Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा कब है, जानें इस दिन का महत्‍व शुभ मुहूर्त और पूजाविधि 

Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा 2024: तिथि, महत्त्व, शुभ मुहूर्त और पूजाविधि Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा 2024 की तिथिSharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस दिन चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है, और इसे आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। Sharad Purnima 2024:में शरद पूर्णिमा की तिथि इसलिए, 17 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा मनाई जाएगी। Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा का महत्त्व शरद पूर्णिमा का विशेष महत्त्व हिंदू धर्म में है क्योंकि इस दिन चंद्रमा अपनी पूरी चमक और रूप में होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है। इसे धन, आरोग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस दिन कोजागरी व्रत करने और चंद्रमा की पूजा करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि आती है। शरद पूर्णिमा का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन गोपियों के साथ महारास का आयोजन किया था। इसलिए, इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं। यह दिन भक्ति और प्रेम का प्रतीक है और ब्रज में इसे विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन व्रत और पूजन का विशेष महत्त्व है। भक्तजन उपवास करते हैं और रात में चंद्रमा के प्रकाश में खीर बनाकर उसे बाहर रखते हैं ताकि चंद्रमा की किरणों का प्रभाव उस पर पड़ सके। मान्यता है कि इस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। Sharad Purnima 2024:शुभ मुहूर्त और पूजा विधि शरद पूर्णिमा की पूजा के लिए सही समय का निर्धारण बहुत महत्वपूर्ण है। चंद्रमा का पूजन रात के समय किया जाता है, जब वह अपनी पूर्ण कलाओं में होता है। Sharad Purnima 2024:शुभ मुहूर्तरात के समय चंद्रमा की पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए, रात्रि 11:45 बजे से लेकर 12:30 बजे के बीच चंद्रमा को अर्घ्य देकर पूजा करना शुभ होता है। यह समय खासतौर से लक्ष्मी पूजन और चंद्र पूजन के लिए उपयुक्त माना गया है। Sharad Purnima 2024:पूजा विधि शरद पूर्णिमा की पूजा विधि में खास ध्यान देने वाली बात यह है कि इस दिन देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मां लक्ष्मी के 108 नामों का जाप किया जाता है और साथ ही विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना भी शुभ माना जाता है। Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा पर क्या करें Sharad Purnima 2024:शरद पूर्णिमा पर क्या न करें निष्कर्षशरद पूर्णिमा का त्योहार श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है। इस दिन चंद्रमा की पूजा और देवी लक्ष्मी का आह्वान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और आरोग्य का वास होता है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा

Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा: एक शक्तिशाली स्तुति Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा हिंदू धर्म में एक लोकप्रिय और शक्तिशाली स्तुति है जो जाहरवीर जी को समर्पित है। जाहरवीर जी को एक लोक देवता के रूप में पूजा जाता है और माना जाता है Shri Jaharveer Chalisa कि वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, रोग मुक्ति और अन्य कई लाभ प्राप्त होते हैं। Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा का महत्व Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा का पाठ करने का समय आप जाहरवीर चालीसा का पाठ दिन में किसी भी समय कर सकते हैं। हालांकि, सुबह के समय इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। Shri Jaharveer Chalisa:जाहरवीर चालीसा के लाभ Shri Jaharveer Chalisa:श्री जाहरवीर चालीसा ॥ दोहा ॥सुवन केहरी जेवर,सुत महाबली रनधीर।बन्दौं सुत रानी बाछला,विपत निवारण वीर॥ जय जय जय चौहान,वन्स गूगा वीर अनूप।अनंगपाल को जीतकर,आप बने सुर भूप॥ ॥ चौपाई ॥जय जय जय जाहर रणधीरा।पर दुख भंजन बागड़ वीरा॥गुरु गोरख का है वरदानी।जाहरवीर जोधा लासानी॥ गौरवरण मुख महा विशाला।माथे मुकट घुंघराले बाला॥कांधे धनुष गले तुलसी माला।कमर कृपान रक्षा को डाला॥ जन्में गूगावीर जग जाना।ईसवी सन हजार दरमियाना॥बल सागर गुण निधि कुमारा।दुखी जनों का बना सहारा॥ बागड़ पति बाछला नन्दन।जेवर सुत हरि भक्त निकन्दन॥जेवर राव का पुत्र कहाये।माता पिता के नाम बढ़ाये॥ पूरन हुई कामना सारी।जिसने विनती करी तुम्हारी॥सन्त उबारे असुर संहारे।भक्त जनों के काज संवारे॥ गूगावीर की अजब कहानी।जिसको ब्याही श्रीयल रानी॥बाछल रानी जेवर राना।महादुःखी थे बिन सन्ताना॥ भंगिन ने जब बोली मारी।जीवन हो गया उनको भारी॥सूखा बाग पड़ा नौलक्खा।देख-देख जग का मन दुक्खा॥ कुछ दिन पीछे साधू आये।चेला चेली संग में लाये॥जेवर राव ने कुआ बनवाया।उद्घाटन जब करना चाहा॥ खारी नीर कुए से निकला।राजा रानी का मन पिघला॥रानी तब ज्योतिषी बुलवाया।कौन पाप मैं पुत्र न पाया॥ कोई उपाय हमको बतलाओ।उन कहा गोरख गुरु मनाओ॥गुरु गोरख जो खुश हो जाई।सन्तान पाना मुश्किल नाई॥ बाछल रानी गोरख गुन गावे।नेम धर्म को न बिसरावे॥करे तपस्या दिन और राती।एक वक्त खाय रूखी चपाती॥ कार्तिक माघ में करे स्नाना।व्रत इकादसी नहीं भुलाना॥पूरनमासी व्रत नहीं छोड़े।दान पुण्य से मुख नहीं मोड़े॥ चेलों के संग गोरख आये।नौलखे में तम्बू तनवाये॥मीठा नीर कुए का कीना।सूखा बाग हरा कर दीना॥ मेवा फल सब साधु खाए।अपने गुरु के गुन को गाये॥औघड़ भिक्षा मांगने आए।बाछल रानी ने दुख सुनाये॥ औघड़ जान लियो मन माहीं।तप बल से कुछ मुश्किल नाहीं॥रानी होवे मनसा पूरी।गुरु शरण है बहुत जरूरी॥ बारह बरस जपा गुरु नामा।तब गोरख ने मन में जाना॥पुत्र देन की हामी भर ली।पूरनमासी निश्चय कर ली॥ काछल कपटिन गजब गुजारा।धोखा गुरु संग किया करारा॥बाछल बनकर पुत्र पाया।बहन का दरद जरा नहीं आया॥ औघड़ गुरु को भेद बताया।तब बाछल ने गूगल पाया॥कर परसादी दिया गूगल दाना।अब तुम पुत्र जनो मरदाना॥ लीली घोड़ी और पण्डतानी।लूना दासी ने भी जानी॥रानी गूगल बाट के खाई।सब बांझों को मिली दवाई॥ नरसिंह पंडित लीला घोड़ा।भज्जु कुतवाल जना रणधीरा॥रूप विकट धर सब ही डरावे।जाहरवीर के मन को भावे॥ भादों कृष्ण जब नौमी आई।जेवरराव के बजी बधाई॥विवाह हुआ गूगा भये राना।संगलदीप में बने मेहमाना॥ रानी श्रीयल संग परे फेरे।जाहर राज बागड़ का करे॥अरजन सरजन काछल जने।गूगा वीर से रहे वे तने॥ दिल्ली गए लड़ने के काजा।अनंग पाल चढ़े महाराजा॥उसने घेरी बागड़ सारी।जाहरवीर न हिम्मत हारी॥ अरजन सरजन जान से मारे।अनंगपाल ने शस्त्र डारे॥चरण पकड़कर पिण्ड छुड़ाया।सिंह भवन माड़ी बनवाया॥ उसीमें गूगावीर समाये।गोरख टीला धूनी रमाये॥पुण्य वान सेवक वहाँ आये।तन मन धन से सेवा लाए॥ मनसा पूरी उनकी होई।गूगावीर को सुमरे जोई॥चालीस दिन पढ़े जाहर चालीसा।सारे कष्ट हरे जगदीसा॥ दूध पूत उन्हें दे विधाता।कृपा करे गुरु गोरखनाथ॥

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Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा

Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा: एक पवित्र स्तुति Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण स्तुति है जो तुलसी माता को समर्पित है। Tulasi Chalisa तुलसी को हिंदू धर्म में एक पवित्र पौधा माना जाता है और इसे घरों में लगाने का विशेष महत्व है। तुलसी चालीसा का पाठ करने से धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का महत्व Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का पाठ करने का समय Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा का पाठ करने का कोई विशेष समय नहीं है। Tulasi Chalisa आप इसे दिन में किसी भी समय पढ़ सकते हैं। हालांकि, सुबह के समय इसका पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है। Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा के लाभ Tulasi Chalisa:तुलसी चालीसा ॥ दोहा ॥जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी ।नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुन खानी ॥ श्री हरि शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब ।जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ॥ ॥ चौपाई ॥धन्य धन्य श्री तलसी माता ।महिमा अगम सदा श्रुति गाता ॥ हरि के प्राणहु से तुम प्यारी ।हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी ॥ जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो ।तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ॥ हे भगवन्त कन्त मम होहू ।दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ॥ ४ ॥ सुनी लक्ष्मी तुलसी की बानी ।दीन्हो श्राप कध पर आनी ॥ उस अयोग्य वर मांगन हारी ।होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ॥ सुनी तुलसी हीँ श्रप्यो तेहिं ठामा ।करहु वास तुहू नीचन धामा ॥ दियो वचन हरि तब तत्काला ।सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला ॥ ८ ॥ समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा ।पुजिहौ आस वचन सत मोरा ॥ तब गोकुल मह गोप सुदामा ।तासु भई तुलसी तू बामा ॥ कृष्ण रास लीला के माही ।राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ॥ दियो श्राप तुलसिह तत्काला ।नर लोकही तुम जन्महु बाला ॥ १२ ॥ यो गोप वह दानव राजा ।शङ्ख चुड नामक शिर ताजा ॥ तुलसी भई तासु की नारी ।परम सती गुण रूप अगारी ॥ अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ ।कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ ॥ वृन्दा नाम भयो तुलसी को ।असुर जलन्धर नाम पति को ॥ १६ ॥ करि अति द्वन्द अतुल बलधामा ।लीन्हा शंकर से संग्राम ॥ जब निज सैन्य सहित शिव हारे ।मरही न तब हर हरिही पुकारे ॥ पतिव्रता वृन्दा थी नारी ।कोऊ न सके पतिहि संहारी ॥ तब जलन्धर ही भेष बनाई ।वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई ॥ २० ॥ शिव हित लही करि कपट प्रसंगा ।कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ॥ भयो जलन्धर कर संहारा ।सुनी उर शोक उपारा ॥ तिही क्षण दियो कपट हरि टारी ।लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी ॥ जलन्धर जस हत्यो अभीता ।सोई रावन तस हरिही सीता ॥ २४ ॥ अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा ।धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा ॥ यही कारण लही श्राप हमारा ।होवे तनु पाषाण तुम्हारा ॥ सुनी हरि तुरतहि वचन उचारे ।दियो श्राप बिना विचारे ॥ लख्यो न निज करतूती पति को ।छलन चह्यो जब पारवती को ॥ २८ ॥ जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा ।जग मह तुलसी विटप अनूपा ॥ धग्व रूप हम शालिग्रामा ।नदी गण्डकी बीच ललामा ॥ जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं ।सब सुख भोगी परम पद पईहै ॥ बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा ।अतिशय उठत शीश उर पीरा ॥ ३२ ॥ जो तुलसी दल हरि शिर धारत ।सो सहस्त्र घट अमृत डारत ॥ तुलसी हरि मन रञ्जनी हारी ।रोग दोष दुःख भंजनी हारी ॥ प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर ।तुलसी राधा में नाही अन्तर ॥ व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा ।बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ॥ ३६ ॥ सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही ।लहत मुक्ति जन संशय नाही ॥ कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत ।तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ॥ बसत निकट दुर्बासा धामा ।जो प्रयास ते पूर्व ललामा ॥ पाठ करहि जो नित नर नारी ।होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥तुलसी चालीसा पढ़ही तुलसी तरु ग्रह धारी ।दीपदान करि पुत्र फल पावही बन्ध्यहु नारी ॥ सकल दुःख दरिद्र हरि हार ह्वै परम प्रसन्न ।आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ॥ लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम ।जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ॥ तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम ।मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ॥

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karwa chauth muhurat : करवा चौथ कब है, जानिए शुभ मुहूर्त, मंत्र, चंद्रोदय और पूजा विधि

karwa chauth:करवा चौथ 2024 हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 20 अक्टूबर 2024 को पड़ रहा है। करवा चौथ व्रत का विशेष महत्व है, और विवाहित महिलाएँ इस दिन अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। व्रत के दिन महिलाएँ सरगी लेकर व्रत की शुरुआत करती हैं और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह उनके पति के जीवन और उनकी खुशहाली के लिए होता है। साथ ही, इस व्रत को रखने से घर में सुख-समृद्धि आती है और पारिवारिक जीवन में शांति बनी रहती है। आइए जानते हैं इस दिन का शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय, पूजा विधि, और मंत्र: करवा चौथ 2024 तिथि और शुभ मुहूर्त karwa chauth:करवा चौथ व्रत विधि करवा चौथ के व्रत में महिलाओं द्वारा सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करके व्रत की शुरुआत की जाती है। सरगी को सास द्वारा दिया जाता है, जिसमें सूखे मेवे, मिठाई, फल, और कुछ तरल पदार्थ होते हैं। इसके बाद पूरे दिन निर्जल व्रत रखा जाता है, यानी न तो कुछ खाया जाता है और न ही पानी पिया जाता है। शाम के समय विशेष पूजा अर्चना की जाती है, और फिर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। 1. सरगी का सेवन: सरगी का सेवन सूर्योदय से पहले किया जाता है। इसे खाने से व्रत रखने वाली महिलाओं को पूरे दिन ऊर्जा मिलती है। सरगी में आमतौर पर सूखे मेवे, फल, मिठाई, और कभी-कभी हल्का भोजन भी होता है। यह सास द्वारा अपनी बहू को आशीर्वाद स्वरूप दिया जाता है। 2. पूजा की तैयारी: शाम के समय महिलाएँ सज-धजकर करवा चौथ की पूजा की तैयारी करती हैं। पूजन स्थान को अच्छे से सजाया जाता है, और देवी पार्वती, शिव, गणेश और करवा माता की प्रतिमाओं या चित्रों की पूजा की जाती है। पूजन के लिए करवा (मिट्टी का पात्र) का विशेष महत्व होता है, जिसमें जल भरकर भगवान को अर्पित किया जाता है। 3. karwa chauth:करवा चौथ कथा: करवा चौथ के व्रत के दौरान करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। यह कथा विवाहिता महिलाओं को व्रत के महत्व और इसके पीछे के धार्मिक कारणों को समझने में मदद करती है। कथा सुनने के बाद सभी महिलाएँ एक साथ अपने-अपने करवे को एक-दूसरे के साथ घुमाकर देवी-देवताओं को अर्पित करती हैं। 4. karwa chauth:चंद्रमा को अर्घ्य देना: रात में जब चंद्रमा निकलता है, तब महिलाएँ चंद्र दर्शन करके उन्हें अर्घ्य देती हैं। चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए एक थाली में दीपक, चावल, जल, और फूल रखकर उसे अर्पित किया जाता है। इसके बाद महिलाएँ छलनी से चंद्रमा और फिर अपने पति का दर्शन करती हैं। पति द्वारा जल पिलाने के बाद व्रत समाप्त होता है और महिलाएँ भोजन ग्रहण करती हैं। karwa chauth:करवा चौथ के मंत्र करवा चौथ की पूजा के दौरान कुछ विशेष मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। ये मंत्र देवी पार्वती और शिव जी की स्तुति के लिए होते हैं, जिससे व्रत का फल अधिक शुभकारी होता है। यहाँ कुछ प्रमुख मंत्र दिए गए हैं: 1. karwa chauth:करवा चौथ व्रत का मुख्य मंत्र: इस मंत्र का जाप करवा चौथ के व्रत के दौरान करने से शिव और पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 2. चंद्रमा को अर्घ्य देते समय मंत्र: चंद्रमा को अर्घ्य देते समय इस मंत्र का जाप करने से चंद्रमा के शुभ प्रभाव से जीवन में शांति और समृद्धि आती है। 3. पूजन मंत्र: पूजन के समय इस मंत्र का उच्चारण करने से परिवार की सुख-शांति और कल्याण की प्राप्ति होती है। karwa chauth:करवा चौथ के दिन ध्यान रखने योग्य बातें निष्कर्ष करवा चौथ का व्रत हिन्दू समाज में पति-पत्नी के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस दिन महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुखमय जीवन की कामना करती हैं। व्रत की पूजा और चंद्रोदय के समय का पालन करना आवश्यक होता है। साथ ही, विधिपूर्वक पूजा-अर्चना और व्रत के नियमों का पालन करने से यह व्रत अत्यंत फलदायी होता है।

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karwa chauth:करवा चौथ पर इन 10 कामों से अवश्य बचें तभी मिलेगा व्रत का फल

karwa chauth:करवा चौथ हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे विशेष रूप से विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए मनाती हैं। इस व्रत को करने के दौरान कई धार्मिक नियम और परंपराएँ निभाई जाती हैं। करवा चौथ के व्रत का फल तभी प्राप्त होता है जब इसे पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया जाए। karwa chauth लेकिन कुछ ऐसी गलतियाँ या काम होते हैं जो इस व्रत के दौरान नहीं करने चाहिए, अन्यथा व्रत का फल नहीं मिलता या इसका प्रभाव कम हो सकता है। यहाँ हम उन 10 कामों के बारे में चर्चा करेंगे जिनसे करवा चौथ के दिन अवश्य बचना चाहिए: 1. Karwa chauth:सूर्योदय के बाद भोजन या जल ग्रहण न करें करवा चौथ के दिन सूर्योदय से पहले ही सरगी का सेवन करना आवश्यक होता है। सरगी में सास द्वारा दी गई सामग्री का सेवन किया जाता है, लेकिन एक बार सूर्योदय के बाद कुछ भी खाना-पीना वर्जित होता है। karwa chauth अगर सूर्योदय के बाद गलती से कुछ खा या पी लिया, तो व्रत का फल प्राप्त नहीं होता। अत: पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। 2. क्रोध या झगड़ा करने से बचें व्रत के दिन मन और वचन को शांत रखना बहुत जरूरी होता है। यदि आप क्रोधित हो जाती हैं या किसी से झगड़ा करती हैं, तो इससे नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो व्रत के प्रभाव को कमजोर कर सकती है। शांति और संयम बनाए रखना व्रत की सफलता के लिए आवश्यक है। 3. झूठ न बोलें झूठ बोलना किसी भी धार्मिक कार्य में वर्जित होता है। karwa chauth करवा चौथ के दिन विशेष रूप से सच्चाई का पालन करना चाहिए। झूठ बोलने से व्रत की पुण्यता कम हो जाती है, इसलिए इस दिन किसी भी प्रकार का झूठ बोलने से बचें। 4. सूर्य या चंद्र दर्शन से पहले व्रत न तोड़ें करवा चौथ का व्रत तभी पूर्ण माना जाता है जब आप चंद्रमा का दर्शन करने के बाद व्रत खोलें। चंद्र दर्शन से पहले जल ग्रहण या भोजन करने से व्रत अधूरा माना जाता है, और इसका फल नहीं मिलता। इसलिए चंद्रमा निकलने के बाद ही व्रत खोलें। 5. अशुद्ध वस्त्र न पहनें धार्मिक कार्यों में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। व्रत के दिन अशुद्ध या बिना धुले कपड़े पहनने से बचें। karwa chauth करवा चौथ के दिन साफ-सुथरे वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है, खासकर लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ होता है। 6. सदाचार और नियमों का पालन न करना व्रत के दिन सदाचार, अनुशासन और नियमों का पालन करना बहुत आवश्यक है। karwa chauth धार्मिक नियमों और मर्यादाओं का पालन न करने से व्रत का पुण्य नष्ट हो सकता है। इस दिन हर काम को नियम और विधि-विधान के अनुसार करने का प्रयास करें। 7. व्रत के प्रति उदासीनता करवा चौथ का व्रत पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करना चाहिए। अगर आप व्रत के प्रति उदासीन रहती हैं karwa chauth या मन में असंतोष उत्पन्न होता है, तो इसका असर आपके व्रत पर पड़ सकता है। इस दिन सकारात्मकता और विश्वास बनाए रखना जरूरी है। 8. पति के प्रति नकारात्मक विचार न रखें करवा चौथ का व्रत पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। इस दिन पति के प्रति मन में कोई नकारात्मक भावना या विचार रखना व्रत के उद्देश्यों के विपरीत होता है। इसलिए, इस दिन पति के प्रति आदर और प्रेम बनाए रखें। 9. अन्य महिलाओं की निंदा न करें धार्मिक परंपराओं के अनुसार, करवा चौथ के दिन किसी की निंदा या बुराई नहीं करनी चाहिए। निंदा या आलोचना करने से व्रत की सकारात्मक ऊर्जा कम हो सकती है। इसलिए इस दिन केवल अच्छे और सकारात्मक विचारों को ही मन में रखें। 10. अपशब्दों का प्रयोग न करें व्रत के दिन वचन का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। अपशब्दों का प्रयोग करना या किसी के प्रति कठोर शब्दों का इस्तेमाल करना व्रत की शुद्धता को भंग कर सकता है। इसलिए व्रत के दिन अपने वचन और भाषा पर संयम रखें और केवल मधुर और स्नेहपूर्ण शब्दों का प्रयोग करें। निष्कर्ष: करवा चौथ का व्रत एक पवित्र और महत्वपूर्ण व्रत है, जिसे निभाने में पूरी श्रद्धा, भक्ति और नियमों का पालन करना चाहिए। इस व्रत से जुड़े नियमों का पालन करते हुए इन 10 कामों से बचें, ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। व्रत का उद्देश्य पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है, और इसे सही तरीके से करने पर ही इसका शुभ परिणाम प्राप्त होता है।

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Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा

Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा भगवान विश्वकर्मा की स्तुति और उनकी महानता का वर्णन करती है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के निर्माता और शिल्पकला, वास्तुकला, और निर्माण कार्यों के देवता के रूप में पूजा जाता है। उन्हें सभी प्रकार के शिल्पकारों, इंजीनियरों, और वास्तुकारों के आराध्य देव माना जाता है। विश्वकर्मा चालीसा का पाठ करने से भक्तों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं, जो उनके जीवन में सुख, समृद्धि, और सफलता लेकर आते हैं। Vishwakarma Chalisa:विश्वकर्मा चालीसा के लाभ: निष्कर्ष: विश्वकर्मा चालीसा का पाठ न केवल शिल्पकारों और तकनीकी कर्मियों के लिए बल्कि हर व्यक्ति के लिए लाभकारी होता है। यह पाठ जीवन के हर क्षेत्र में सफलता, सुरक्षा, और समृद्धि प्रदान करता है। विश्वकर्मा जी की कृपा से व्यक्ति के कार्य सुचारू रूप से संपन्न होते हैं और उसे जीवन में यश, कीर्ति, और सम्मान प्राप्त होता है। Vishwakarma Chalisa विश्वकर्मा चालीसा ॥ दोहा ॥श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊं,चरणकमल धरिध्यान ।श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण,दीजै दया निधान ॥ ॥ चौपाई ॥जय श्री विश्वकर्म भगवाना ।जय विश्वेश्वर कृपा निधाना ॥ शिल्पाचार्य परम उपकारी ।भुवना-पुत्र नाम छविकारी ॥ अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर ।शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर ॥ अद्‍भुत सकल सृष्टि के कर्ता ।सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्ता ॥ ४ ॥ अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं ।कोई विश्व मंह जानत नाही ॥ विश्व सृष्टि-कर्ता विश्वेशा ।अद्‍भुत वरण विराज सुवेशा ॥ एकानन पंचानन राजे ।द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे ॥ चक्र सुदर्शन धारण कीन्हे ।वारि कमण्डल वर कर लीन्हे ॥ ८ ॥ शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा ।सोहत सूत्र माप अनुरूपा ॥ धनुष बाण अरु त्रिशूल सोहे ।नौवें हाथ कमल मन मोहे ॥ दसवां हस्त बरद जग हेतु ।अति भव सिंधु मांहि वर सेतु ॥ सूरज तेज हरण तुम कियऊ ।अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ ॥ १२ ॥ चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका ।दण्ड पालकी शस्त्र अनेका ॥ विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं ।अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं ॥ इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा ।तुम सबकी पूरण की आशा ॥ भांति-भांति के अस्त्र रचाए ।सतपथ को प्रभु सदा बचाए ॥ १६ ॥ अमृत घट के तुम निर्माता ।साधु संत भक्तन सुर त्राता ॥ लौह काष्ट ताम्र पाषाणा ।स्वर्ण शिल्प के परम सजाना ॥ विद्युत अग्नि पवन भू वारी ।इनसे अद्भुत काज सवारी ॥ खान-पान हित भाजन नाना ।भवन विभिषत विविध विधाना ॥ २० ॥ विविध व्सत हित यत्रं अपारा ।विरचेहु तुम समस्त संसारा ॥ द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका ।विविध महा औषधि सविवेका ॥ शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला ।वरुण कुबेर अग्नि यमकाला ॥ तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ ।करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ ॥ २४ ॥ भे आतुर प्रभु लखि सुर-शोका ।कियउ काज सब भये अशोका ॥ अद्भुत रचे यान मनहारी ।जल-थल-गगन मांहि-समचारी ॥ शिव अरु विश्वकर्म प्रभु मांही ।विज्ञान कह अंतर नाही ॥ बरनै कौन स्वरूप तुम्हारा ।सकल सृष्टि है तव विस्तारा ॥ २८ ॥ रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा ।तुम बिन हरै कौन भव हारी ॥ मंगल-मूल भगत भय हारी ।शोक रहित त्रैलोक विहारी ॥ चारो युग परताप तुम्हारा ।अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा ॥ ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता ।वर विज्ञान वेद के ज्ञाता ॥ ३२ ॥ मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा ।सबकी नित करतें हैं रक्षा ॥ पंच पुत्र नित जग हित धर्मा ।हवै निष्काम करै निज कर्मा ॥ प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई ।विपदा हरै जगत मंह जोई ॥ जै जै जै भौवन विश्वकर्मा ।करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा ॥ ३६ ॥ इक सौ आठ जाप कर जोई ।छीजै विपत्ति महासुख होई ॥ पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा ।होय सिद्ध साक्षी गौरीशा ॥ विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे ।हो प्रसन्न हम बालक तेरे ॥ मैं हूं सदा उमापति चेरा ।सदा करो प्रभु मन मंह डेरा ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥करहु कृपा शंकर सरिस,विश्वकर्मा शिवरूप ।श्री शुभदा रचना सहित,ह्रदय बसहु सूर भूप ॥

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Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा

Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा भगवान परशुराम की स्तुति और उनके गुणों की महिमा का वर्णन करती है। भगवान परशुराम विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं, जिन्होंने पृथ्वी को पापियों और अत्याचारियों से मुक्त किया। परशुराम चालीसा का पाठ करने से कई आध्यात्मिक और जीवन में सकारात्मक लाभ मिलते हैं। आइए जानते हैं परशुराम चालीसा के लाभ: Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा के लाभ Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा Parshuram Chalisa:परशुराम चालीसा श्री परशुराम पर आधारित एक भक्ति गीत है। Parshuram Chalisa कई लोगों ने श्री परशुराम को समर्पित त्योहारों पर परशुराम चालीसा का पाठ किया। ॥ दोहा ॥श्री गुरु चरण सरोज छवि,निज मन मन्दिर धारि।सुमरि गजानन शारदा,गहि आशिष त्रिपुरारि॥ बुद्धिहीन जन जानिये,अवगुणों का भण्डार।बरणों परशुराम सुयश,निज मति के अनुसार॥ ॥ चौपाई ॥जय प्रभु परशुराम सुख सागर।जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर॥भृगुकुल मुकुट विकट रणधीरा।क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा॥ जमदग्नी सुत रेणुका जाया।तेज प्रताप सकल जग छाया॥मास बैसाख सित पच्छ उदारा।तृतीया पुनर्वसु मनुहारा॥ प्रहर प्रथम निशा शीत न घामा।तिथि प्रदोष व्यापि सुखधामा॥तब ऋषि कुटीर रूदन शिशु कीन्हा।रेणुका कोखि जनम हरि लीन्हा॥ निज घर उच्च ग्रह छः ठाढ़े।मिथुन राशि राहु सुख गाढ़े॥तेज-ज्ञान मिल नर तनु धारा।जमदग्नी घर ब्रह्म अवतारा॥ धरा राम शिशु पावन नामा।नाम जपत जग लह विश्रामा॥भाल त्रिपुण्ड जटा सिर सुन्दर।कांधे मुंज जनेऊ मनहर॥ मंजु मेखला कटि मृगछाला।रूद्र माला बर वक्ष विशाला॥पीत बसन सुन्दर तनु सोहें।कंध तुणीर धनुष मन मोहें॥ वेद-पुराण-श्रुति-स्मृति ज्ञाता।क्रोध रूप तुम जग विख्याता॥दायें हाथ श्रीपरशु उठावा।वेद-संहिता बायें सुहावा॥ विद्यावान गुण ज्ञान अपारा।शास्त्र-शस्त्र दोउ पर अधिकारा॥भुवन चारिदस अरु नवखंडा।चहुं दिशि सुयश प्रताप प्रचंडा॥ एक बार गणपति के संगा।जूझे भृगुकुल कमल पतंगा॥दांत तोड़ रण कीन्ह विरामा।एक दंत गणपति भयो नामा॥ कार्तवीर्य अर्जुन भूपाला।सहस्रबाहु दुर्जन विकराला॥सुरगऊ लखि जमदग्नी पांहीं।रखिहहुं निज घर ठानि मन मांहीं॥ मिली न मांगि तब कीन्ह लड़ाई।भयो पराजित जगत हंसाई॥तन खल हृदय भई रिस गाढ़ी।रिपुता मुनि सौं अतिसय बाढ़ी॥ ऋषिवर रहे ध्यान लवलीना।तिन्ह पर शक्तिघात नृप कीन्हा॥लगत शक्ति जमदग्नी निपाता।मनहुं क्षत्रिकुल बाम विधाता॥ पितु-बध मातु-रूदन सुनि भारा।भा अति क्रोध मन शोक अपारा॥कर गहि तीक्षण परशु कराला।दुष्ट हनन कीन्हेउ तत्काला॥ क्षत्रिय रुधिर पितु तर्पण कीन्हा।पितु-बध प्रतिशोध सुत लीन्हा॥इक्कीस बार भू क्षत्रिय बिहीनी।छीन धरा बिप्रन्ह कहँ दीनी॥ जुग त्रेता कर चरित सुहाई।शिव-धनु भंग कीन्ह रघुराई॥गुरु धनु भंजक रिपु करि जाना।तब समूल नाश ताहि ठाना॥ कर जोरि तब राम रघुराई।बिनय कीन्ही पुनि शक्ति दिखाई॥भीष्म द्रोण कर्ण बलवन्ता।भये शिष्या द्वापर महँ अनन्ता॥ शास्त्र विद्या देह सुयश कमावा।गुरु प्रताप दिगन्त फिरावा॥चारों युग तव महिमा गाई।सुर मुनि मनुज दनुज समुदाई॥ दे कश्यप सों संपदा भाई।तप कीन्हा महेन्द्र गिरि जाई॥अब लौं लीन समाधि नाथा।सकल लोक नावइ नित माथा॥ चारों वर्ण एक सम जाना।समदर्शी प्रभु तुम भगवाना॥ललहिं चारि फल शरण तुम्हारी।देव दनुज नर भूप भिखारी॥ जो यह पढ़ै श्री परशु चालीसा।तिन्ह अनुकूल सदा गौरीसा॥पृर्णेन्दु निसि बासर स्वामी।बसहु हृदय प्रभु अन्तरयामी॥ ॥ दोहा ॥परशुराम को चारू चरित,मेटत सकल अज्ञान।शरण पड़े को देत प्रभु,सदा सुयश सम्मान॥ ॥ श्लोक ॥भृगुदेव कुलं भानुं,सहस्रबाहुर्मर्दनम्।रेणुका नयना नंदं,परशुंवन्दे विप्रधनम्॥

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Papankusha Ekadashi 2024 Date : पापांकुशा एकादशी कब है, इस दिन क्‍यों नहीं देते तुलसी को जल, जानें महत्‍व, पूजाविधि…….

Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी हिंदू धर्म के 24 एकादशी व्रतों में से एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है। यह व्रत हर साल अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आता है। 2024 में पापांकुशा एकादशी 13 अक्टूबर को पड़ रही है। इस व्रत को करने से व्यक्ति अपने जीवन में किए गए पापों से मुक्ति पाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं पापांकुशा एकादशी की पूजा विधि, व्रत विधि, और क्या करें व क्या न करें। मान्‍यता है कि इस दिन भगवाव विष्‍णु को सबसे प्रिय तुलसी भी उनके लिए व्रत करती हैं। Papankusha Ekadashi यही वजह है कि इस दिन तुलसी को जल नहीं दिया जाता है। कहते हैं कि इस दिन तुलसी को जल देने से उनका व्रत खंडित हो जाता है, इसलिए पापांकुशा एकादशी के दिन तुलसी में जल नहीं देना चाहिए। इस दिन भगवान विष्‍णु को तुलसी दल अर्पित करने से वह बेहद प्रसन्‍न होते हैं और मनचाहा फल देते हैं। Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी का महत्व पापांकुशा एकादशी का महत्व हिंदू धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, Papankusha Ekadashi और उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। विष्णु पुराण और स्कंद पुराण में इसका उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, वह अपने जीवन के हर प्रकार के दुखों से मुक्ति पाता है और उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त, यह व्रत धन, समृद्धि, शांति, और संतोष प्रदान करने वाला माना गया है। Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी व्रत की पूजा विधि 1. व्रत की तैयारी: पापांकुशा एकादशी का व्रत करने के लिए भक्तों को एक दिन पूर्व (दशमी तिथि) से ही सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और मन को शांत रखते हुए भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा की तैयारी करें। 2. संकल्प: पूजा से पहले, भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। संकल्प के दौरान कहें कि “मैं पापांकुशा एकादशी व्रत का पालन करूंगा/करूंगी और भगवान विष्णु की पूजा करूंगा/करूंगी। भगवान मुझे सभी पापों से मुक्त करें और मोक्ष का मार्ग दिखाएं।” 3. भगवान विष्णु की पूजा: पापांकुशा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। पूजा की सामग्री में फूल, तुलसी के पत्ते, धूप, दीपक, चंदन, और फल शामिल करें। भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर को अपने पूजा स्थल पर रखें। Papankusha Ekadashi सबसे पहले भगवान को गंगाजल या स्वच्छ पानी से स्नान कराएं, फिर उन्हें चंदन, अक्षत (चावल), पुष्प और तुलसी अर्पित करें। दीपक जलाकर भगवान की आरती करें और विष्णु सहस्रनाम या अन्य विष्णु स्तोत्रों का पाठ करें। इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 4. तुलसी पूजा: भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व होता है। तुलसी के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। अतः पूजा में तुलसी के पत्तों का अर्पण अवश्य करें। 5. व्रत का पालन: इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। कुछ लोग निर्जल व्रत रखते हैं, Papankusha Ekadashi तो कुछ फलाहार करते हैं। व्रत रखने वाले व्यक्ति को तामसिक और मांसाहारी भोजन से दूर रहना चाहिए। व्रती को दिनभर उपवास रखकर भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करना चाहिए और उनकी लीलाओं का चिंतन करना चाहिए। 6. रात्रि जागरण: पापांकुशा एकादशी पर रात्रि जागरण का भी महत्व है। इस दिन रातभर जागकर भगवान विष्णु की स्तुति करें और भजन-कीर्तन में लीन रहें। ऐसा करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। 7. द्वादशी का पालन: व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि को किया जाता है। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देने का विशेष महत्व होता है। अन्न, वस्त्र, और दक्षिणा का दान करना चाहिए और इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें। Papankusha Ekadashi:व्रत के दौरान क्या करें और क्या न करें क्या करें: क्या न करें: Papankusha Ekadashi:पापांकुशा एकादशी का फल पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है Papankusha Ekadashi और वह मोक्ष की प्राप्ति करता है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, उसे भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम में स्थान मिलता है। इस व्रत का फल अन्य सभी व्रतों की तुलना में अधिक पुण्यदायक और प्रभावी माना जाता है।

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Dussehra 2024: कब है दशहरा, यहां देखें सही तारीख और इसके अलग-अलग रूप

दशहरा (Dussehra) 2024, जिसे विजयादशमी (Vijayadashami) के नाम से भी जाना जाता है, भारत के प्रमुख हिंदू त्योहारों में से एक है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इसे रावण पर भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार की तारीख हर साल हिंदू पंचांग के अनुसार तय होती है और यह अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। 2024 में, दशहरा 12 अक्टूबर को मनाया जाएगा। Dussehra 2024:दशहरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व Dussehra 2024:दशहरा का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है और इसे मुख्यतः दो प्रमुख धार्मिक कथाओं से जोड़ा जाता है: Dussehra 2024:दशहरा का आयोजन और परंपराएँ Dussehra 2024:भारत के विभिन्न हिस्सों में दशहरा को विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। लेकिन सभी स्थानों पर इसका मूल उद्देश्य एक ही है, जो है बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव। Dussehra 2024:दशहरे का सामाजिक और नैतिक संदेश Dussehra 2024:दशहरा का त्योहार केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामाजिक और नैतिक संदेश भी है। इस त्योहार के माध्यम से हमें यह संदेश मिलता है कि चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, अंततः सच्चाई और धर्म की जीत होती है। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें हमेशा अपने जीवन में नैतिकता, सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए और बुराई के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। दशहरा बुराई के खिलाफ अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इसका संदेश आधुनिक जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना प्राचीन समय में था। यह त्योहार हमें सिखाता है कि हमें अपने अंदर की बुरी आदतों, जैसे कि अहंकार, लालच, क्रोध आदि का त्याग करना चाहिए और सच्चाई, प्रेम, करुणा और दया के रास्ते पर चलना चाहिए। Dussehra 2024:दशहरे की वैश्विक पहचान भारत के अलावा, दशहरा दुनिया के कई अन्य देशों में भी मनाया जाता है, विशेष रूप से उन देशों में जहां भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। नेपाल, श्रीलंका, मलेशिया, मॉरिशस और फिजी में भी यह त्योहार विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। इनमें से कुछ देशों में रामलीला का आयोजन भी किया जाता है और रावण दहन की परंपरा भी निभाई जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि दशहरा केवल भारत का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं का वैश्विक स्वरूप भी है। निष्कर्ष दशहरा 2024 में 12 अक्टूबर को मनाया जाएगा और यह पर्व हर भारतीय के लिए खास महत्व रखता है। यह त्योहार हमें हमारे सांस्कृतिक धरोहरों की याद दिलाता है और हमें सिखाता है कि जीवन में अच्छाई और सच्चाई का हमेशा सम्मान करना चाहिए। चाहे यह त्योहार धार्मिक आस्था का प्रतीक हो या समाजिक संदेश का, इसका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है और हमें हमारे जीवन के संघर्षों में मार्गदर्शन करता है।

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Radha Chalisa राधा चालीसा

Radha Chalisa:राधा चालीसा, देवी राधा के प्रति समर्पित एक भक्ति स्तोत्र है, जिसे विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में पढ़ा जाता है। इसे पढ़ने से भक्तों को मां राधा और भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। हालांकि, राधा चालीसा विशेष रूप से अधिक प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन राधा रानी की भक्ति में अन्य प्रार्थनाएं और स्तोत्र अधिक प्रचलित हैं। Radha Chalisa:चालीसा, एक प्रकार का स्तोत्र होता है जिसमें 40 छंद होते हैं। अगर आप Radha Chalisa राधा चालीसा या इस से संबंधित किसी विशेष पाठ के लाभ के बारे में जानना चाहते हैं, Radha Chalisa तो आपको निम्न लाभ मिल सकते हैं: Radha Chalisa:अगर आप राधा चालीसा या कोई और राधा से संबंधित पाठ चाहते हैं, Radha Chalisa तो मैं वह भी उपलब्ध करा सकता हूँ। Radha Chalisa राधा चालीसा ॥ दोहा ॥श्री राधे वुषभानुजा,भक्तनि प्राणाधार ।वृन्दाविपिन विहारिणी,प्रानावौ बारम्बार ॥ जैसो तैसो रावरौ,कृष्ण प्रिया सुखधाम ।चरण शरण निज दीजिये,सुन्दर सुखद ललाम ॥ ॥ चौपाई ॥जय वृषभान कुँवरी श्री श्यामा ।कीरति नंदिनी शोभा धामा ॥ नित्य विहारिनि श्याम अधारा ।अमित मोद मंगल दातारा ॥ रास विलासिनि रस विस्तारिनि ।सहचरि सुभग यूथ मन भावनि ॥ नित्य किशोरी राधा गोरी ।श्याम प्राणधन अति जिय भोरी ॥ करुणा सागर हिय उमंगिनी ।ललितादिक सखियन की संगिनी ॥ दिनकर कन्या कूल विहारिनि ।कृष्ण प्राण प्रिय हिय हुलसावनि ॥ नित्य श्याम तुमरौ गुण गावैं ।राधा राधा कहि हरषावैं ॥ मुरली में नित नाम उचारें ।तुव कारण लीला वपु धारें ॥ प्रेम स्वरूपिणि अति सुकुमारी ।श्याम प्रिया वृषभानु दुलारी ॥ नवल किशोरी अति छवि धामा ।द्युति लघु लगै कोटि रति कामा ॥१० गौरांगी शशि निंदक बदना ।सुभग चपल अनियारे नयना ॥ जावक युत युग पंकज चरना ।नूपुर धुनि प्रीतम मन हरना ॥ संतत सहचरि सेवा करहीं ।महा मोद मंगल मन भरहीं ॥ रसिकन जीवन प्राण अधारा ।राधा नाम सकल सुख सारा ॥ अगम अगोचर नित्य स्वरूपा ।ध्यान धरत निशिदिन ब्रज भूपा ॥ उपजेउ जासु अंश गुण खानी ।कोटिन उमा रमा ब्रह्मानी ॥ नित्य धाम गोलोक विहारिणि ।जन रक्षक दुख दोष नसावनि ॥ शिव अज मुनि सनकादिक नारद ।पार न पाँइ शेष अरु शारद ॥ राधा शुभ गुण रूप उजारी ।निरखि प्रसन्न होत बनवारी ॥ ब्रज जीवन धन राधा रानी ।महिमा अमित न जाय बखानी ॥२० प्रीतम संग देइ गलबाँही ।बिहरत नित वृन्दावन माँही ॥ राधा कृष्ण कृष्ण कहैं राधा ।एक रूप दोउ प्रीति अगाधा ॥ श्री राधा मोहन मन हरनी ।जन सुख दायक प्रफुलित बदनी ॥ कोटिक रूप धरें नंद नंदा ।दर्शन करन हित गोकुल चंदा ॥ रास केलि करि तुम्हें रिझावें ।मान करौ जब अति दुःख पावें ॥ प्रफुलित होत दर्श जब पावें ।विविध भांति नित विनय सुनावें ॥ वृन्दारण्य विहारिणि श्यामा ।नाम लेत पूरण सब कामा ॥ कोटिन यज्ञ तपस्या करहु ।विविध नेम व्रत हिय में धरहु ॥ तऊ न श्याम भक्तहिं अपनावें ।जब लगि राधा नाम न गावें ॥ वृन्दाविपिन स्वामिनी राधा ।लीला वपु तब अमित अगाधा ॥३० स्वयं कृष्ण पावैं नहिं पारा ।और तुम्हें को जानन हारा ॥ श्री राधा रस प्रीति अभेदा ।सादर गान करत नित वेदा ॥ राधा त्यागि कृष्ण को भजिहैं ।ते सपनेहुँ जग जलधि न तरि हैं ॥ कीरति कुँवरि लाड़िली राधा ।सुमिरत सकल मिटहिं भव बाधा ॥ नाम अमंगल मूल नसावन ।त्रिविध ताप हर हरि मनभावन ॥ राधा नाम लेइ जो कोई ।सहजहि दामोदर बस होई ॥ राधा नाम परम सुखदाई ।भजतहिं कृपा करहिं यदुराई ॥ यशुमति नन्दन पीछे फिरिहैं ।जो कोऊ राधा नाम सुमिरिहैं ॥ रास विहारिणि श्यामा प्यारी ।करहु कृपा बरसाने वारी ॥ वृन्दावन है शरण तिहारी ।जय जय जय वृषभानु दुलारी ॥४० ॥ दोहा ॥श्री राधा सर्वेश्वरी,रसिकेश्वर धनश्याम ।करहुँ निरंतर बास मैं,श्री वृन्दावन धाम ॥॥ इति श्री राधा चालीसा ॥

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Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा 

Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा: धन और समृद्धि की देवी का स्तोत्र Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा हिंदू धर्म में धन, समृद्धि और सुख की देवी माता लक्ष्मी की स्तुति करने का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाया जाता है। माना जाता है कि इस चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन, वैभव और सुख की वृद्धि होती है। Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा का महत्व Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा का पाठ कब करें? Shri Mahalakshmi Chalisa:महालक्ष्मी चालीसा के कुछ प्रमुख पंक्तियाँ Shri Mahalakshmi Chalisa:श्री महालक्ष्मी चालीसा ॥ दोहा ॥जय जय श्री महालक्ष्मी,करूँ मात तव ध्यान।सिद्ध काज मम किजिये,निज शिशु सेवक जान॥ ॥ चौपाई ॥नमो महा लक्ष्मी जय माता।तेरो नाम जगत विख्याता॥आदि शक्ति हो मात भवानी।पूजत सब नर मुनि ज्ञानी॥ जगत पालिनी सब सुख करनी।निज जनहित भण्डारण भरनी॥श्वेत कमल दल पर तव आसन।मात सुशोभित है पद्मासन॥ श्वेताम्बर अरू श्वेता भूषण।श्वेतही श्वेत सुसज्जित पुष्पन॥शीश छत्र अति रूप विशाला।गल सोहे मुक्तन की माला॥ सुंदर सोहे कुंचित केशा।विमल नयन अरु अनुपम भेषा॥कमलनाल समभुज तवचारि।सुरनर मुनिजनहित सुखकारी॥ अद्भूत छटा मात तव बानी।सकलविश्व कीन्हो सुखखानी॥शांतिस्वभाव मृदुलतव भवानी।सकल विश्वकी हो सुखखानी॥ महालक्ष्मी धन्य हो माई।पंच तत्व में सृष्टि रचाई॥जीव चराचर तुम उपजाए।पशु पक्षी नर नारी बनाए॥ क्षितितल अगणित वृक्ष जमाए।अमितरंग फल फूल सुहाए॥छवि विलोक सुरमुनि नरनारी।करे सदा तव जय-जय कारी॥ सुरपति औ नरपत सब ध्यावैं।तेरे सम्मुख शीश नवावैं॥चारहु वेदन तब यश गाया।महिमा अगम पार नहिं पाये॥ जापर करहु मातु तुम दाया।सोइ जग में धन्य कहाया॥पल में राजाहि रंक बनाओ।रंक राव कर बिमल न लाओ॥ जिन घर करहु माततुम बासा।उनका यश हो विश्व प्रकाशा॥जो ध्यावै से बहु सुख पावै।विमुख रहे हो दुख उठावै॥ महालक्ष्मी जन सुख दाई।ध्याऊं तुमको शीश नवाई॥निज जन जानीमोहीं अपनाओ।सुखसम्पति दे दुख नसाओ॥ ॐ श्री-श्री जयसुखकी खानी।रिद्धिसिद्ध देउ मात जनजानी॥ॐह्रीं-ॐह्रीं सब व्याधिहटाओ।जनउन विमल दृष्टिदर्शाओ॥ ॐक्लीं-ॐक्लीं शत्रुन क्षयकीजै।जनहित मात अभय वरदीजै॥ॐ जयजयति जयजननी।सकल काज भक्तन के सरनी॥ ॐ नमो-नमो भवनिधि तारनी।तरणि भंवर से पार उतारनी॥सुनहु मात यह विनय हमारी।पुरवहु आशन करहु अबारी॥ ऋणी दुखी जो तुमको ध्यावै।सो प्राणी सुख सम्पत्ति पावै॥रोग ग्रसित जो ध्यावै कोई।ताकी निर्मल काया होई॥ विष्णु प्रिया जय-जय महारानी।महिमा अमित न जाय बखानी॥पुत्रहीन जो ध्यान लगावै।पाये सुत अतिहि हुलसावै॥ त्राहि त्राहि शरणागत तेरी।करहु मात अब नेक न देरी॥आवहु मात विलम्ब न कीजै।हृदय निवास भक्त बर दीजै॥ जानूं जप तप का नहिं भेवा।पार करो भवनिध वन खेवा॥बिनवों बार-बार कर जोरी।पूरण आशा करहु अब मोरी॥ जानि दास मम संकट टारौ।सकल व्याधि से मोहिं उबारौ॥जो तव सुरति रहै लव लाई।सो जग पावै सुयश बड़ाई॥ छायो यश तेरा संसारा।पावत शेष शम्भु नहिं पारा॥गोविंद निशदिन शरण तिहारी।करहु पूरण अभिलाष हमारी॥ ॥ दोहा ॥महालक्ष्मी चालीसा,पढ़ै सुनै चित लाय।ताहि पदारथ मिलै,अब कहै वेद अस गाय॥

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Surya Chalisa सूर्य चालीसा

Surya Chalisa:सूर्य चालीसा: सूर्य देव की भक्ति का एक अद्भुत स्तोत्र Surya Chalisa:सूर्य चालीसा हिंदू धर्म में सूर्य देव की स्तुति करने का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। सूर्य देव को सृष्टि का कारण माना जाता है और वे सभी जीवों को जीवन प्रदान करते हैं। सूर्य चालीसा में सूर्य देव के विभिन्न नामों और गुणों का वर्णन किया गया है। Surya Chalisa:सूर्य चालीसा का महत्व Surya Chalisa:सूर्य चालीसा का पाठ कब करें? Surya Chalisa:सूर्य चालीसा के कुछ प्रमुख पंक्तियाँ Surya Chalisa सूर्य चालीसा श्री सूर्य देव चालीसा ॥॥ दोहा ॥कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग,पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥ ॥ चौपाई ॥जय सविता जय जयति दिवाकर,सहस्त्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥ भानु पतंग मरीची भास्कर,सविता हंस सुनूर विभाकर॥ विवस्वान आदित्य विकर्तन,मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥ अम्बरमणि खग रवि कहलाते,वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥ 4 सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि,मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥ अरुण सदृश सारथी मनोहर,हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥ मंडल की महिमा अति न्यारी,तेज रूप केरी बलिहारी॥ उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते,देखि पुरन्दर लज्जित होते॥8 मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर,सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥ पूषा रवि आदित्य नाम लै,हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥ द्वादस नाम प्रेम सों गावैं,मस्तक बारह बार नवावैं॥ चार पदारथ जन सो पावै,दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥12 नमस्कार को चमत्कार यह,विधि हरिहर को कृपासार यह॥ सेवै भानु तुमहिं मन लाई,अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥ बारह नाम उच्चारन करते,सहस जनम के पातक टरते॥ उपाख्यान जो करते तवजन,रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥16 धन सुत जुत परिवार बढ़तु है,प्रबल मोह को फंद कटतु है॥ अर्क शीश को रक्षा करते,रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥ सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥ भानु नासिका वासकरहुनित,भास्कर करत सदा मुखको हित॥20 ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे,रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥ कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥ पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर,त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥ युगल हाथ पर रक्षा कारन,भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥24 बसत नाभि आदित्य मनोहर,कटिमंह, रहत मन मुदभर॥ जंघा गोपति सविता बासा,गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥ विवस्वान पद की रखवारी,बाहर बसते नित तम हारी॥ सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै,रक्षा कवच विचित्र विचारे॥28 अस जोजन अपने मन माहीं,भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥ दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै,जोजन याको मन मंह जापै॥ अंधकार जग का जो हरता,नव प्रकाश से आनन्द भरता॥ ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥32 मंद सदृश सुत जग में जाके,धर्मराज सम अद्भुत बांके॥ धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,किया करत सुरमुनि नर सेवा॥ भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥ परम धन्य सों नर तनधारी,हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥36 अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥ भानु उदय बैसाख गिनावै,ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥ यम भादों आश्विन हिमरेता,कातिक होत दिवाकर नेता॥ अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥40 ॥ दोहा ॥भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य,सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

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