Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा

Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा: शक्ति और आशीर्वाद का मंत्र Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा हिंदू धर्म में माता पार्वती की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। माता पार्वती को शक्ति और सौंदर्य की देवी माना जाता है। यह चालीसा भक्तों को माता पार्वती के करीब लाने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का एक माध्यम है। Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा का महत्व Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा पढ़ने का तरीका Parvati Chalisa:पार्वती चालीसा ॥ दोहा ॥जय गिरी तनये दक्षजेशम्भू प्रिये गुणखानि ।गणपति जननी पार्वतीअम्बे! शक्ति! भवानि ॥ ॥ चौपाई ॥ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे ।पंच बदन नित तुमको ध्यावे ॥ षड्मुख कहि न सकत यश तेरो ।सहसबदन श्रम करत घनेरो ॥ तेऊ पार न पावत माता ।स्थित रक्षा लय हिय सजाता ॥ अधर प्रवाल सदृश अरुणारे ।अति कमनीय नयन कजरारे ॥ ललित ललाट विलेपित केशर ।कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर ॥ कनक बसन कंचुकि सजाए ।कटी मेखला दिव्य लहराए ॥ कंठ मदार हार की शोभा ।जाहि देखि सहजहि मन लोभा ॥ बालारुण अनंत छबि धारी ।आभूषण की शोभा प्यारी ॥ नाना रत्न जड़ित सिंहासन ।तापर राजति हरि चतुरानन ॥ इन्द्रादिक परिवार पूजित ।जग मृग नाग यक्ष रव कूजित ॥ 10 गिर कैलास निवासिनी जय जय ।कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय ॥ त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी ।अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी ॥ हैं महेश प्राणेश तुम्हारे ।त्रिभुवन के जो नित रखवारे ॥ उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब ।सुकृत पुरातन उदित भए तब ॥ बूढ़ा बैल सवारी जिनकी ।महिमा का गावे कोउ तिनकी ॥ सदा श्मशान बिहारी शंकर ।आभूषण हैं भुजंग भयंकर ॥ कण्ठ हलाहल को छबि छायी ।नीलकण्ठ की पदवी पायी ॥ देव मगन के हित अस किन्हो ।विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो ॥ ताकी तुम पत्नी छवि धारिणी ।दुरित विदारिणी मंगल कारिणी ॥ देखि परम सौंदर्य तिहारो ।त्रिभुवन चकित बनावन हारो ॥ 20 भय भीता सो माता गंगा ।लज्जा मय है सलिल तरंगा ॥ सौत समान शम्भू पहआयी ।विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी ॥ तेहि कों कमल बदन मुरझायो ।लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो ॥ नित्यानंद करी बरदायिनी ।अभय भक्त कर नित अनपायिनी ॥ अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी ।माहेश्वरी हिमालय नन्दिनी ॥ काशी पुरी सदा मन भायी ।सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी ॥ भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री ।कृपा प्रमोद सनेह विधात्री ॥ रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे ।वाचा सिद्ध करि अवलम्बे ॥ गौरी उमा शंकरी काली ।अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली ॥ सब जन की ईश्वरी भगवती ।पतिप्राणा परमेश्वरी सती ॥ 30 तुमने कठिन तपस्या कीनी ।नारद सों जब शिक्षा लीनी ॥ अन्न न नीर न वायु अहारा ।अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा ॥ पत्र घास को खाद्य न भायउ ।उमा नाम तब तुमने पायउ ॥ तप बिलोकी ऋषि सात पधारे ।लगे डिगावन डिगी न हारे ॥ तब तब जय जय जय उच्चारेउ ।सप्तऋषि निज गेह सिद्धारेउ ॥ सुर विधि विष्णु पास तब आए ।वर देने के वचन सुनाए ॥ मांगे उमा वर पति तुम तिनसों ।चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों ॥ एवमस्तु कही ते दोऊ गए ।सुफल मनोरथ तुमने लए ॥ करि विवाह शिव सों भामा ।पुनः कहाई हर की बामा ॥ जो पढ़िहै जन यह चालीसा ।धन जन सुख देइहै तेहि ईसा ॥ 40 ॥ दोहा ॥कूटि चंद्रिका सुभग शिर,जयति जयति सुख खा‍निपार्वती निज भक्त हित,रहहु सदा वरदानि ।॥ इति श्री पार्वती चालीसा ॥

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Rohini Vrat 2025:रोहिणी व्रत,तिथियाँ पूजा विधि और महत्व

Rohini Vrat:रोहिणी व्रत 2025 में: तिथियाँ, पूजा विधि और महत्व Rohini Vrat:रोहिणी व्रत तिथियाँ 2025Rohini Vrat:रोहिणी व्रत मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और माता रोहिणी को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो ज्येष्ठाओं के अनुसार समृद्धि, सुख और स्वास्थ्य के लिए किया जाता है। यह व्रत चंद्रमा की रोहिणी नक्षत्र में पड़ने वाली तिथियों पर किया जाता है। आइए जानते हैं 2025 में रोहिणी व्रत की तिथियाँ Rohini Vrat:रोहिणी व्रत का महत्वरोहिणी व्रत का महत्व खासकर महिलाओं के लिए अधिक होता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से पति की आयु लंबी होती है, दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और घर में समृद्धि आती है। इस व्रत का पालन मुख्य रूप से जैन धर्म की महिलाओं द्वारा किया जाता है, लेकिन हिंदू धर्म में भी इसका काफी महत्व है। कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो रोहिणी नक्षत्र का विशेष महत्व था। इसलिए इसे भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से भी जोड़ा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपने पुत्रों की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति के लिए किया जाता है। Rohini Vrat:रोहिणी व्रत पूजा विधि Rohini Vrat:रोहिणी व्रत की कथाप्राचीन कथा के अनुसार, एक समय की बात है जब एक राजा अपनी प्रजा को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए अनेक धार्मिक कृत्य करता था। एक दिन राजा को ज्ञात हुआ कि उसकी प्रजा में एक महिला को निरंतर कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। राजा ने उस महिला को बुलाकर उसका दुःख पूछा। महिला ने बताया कि उसने कई व्रत किए, पर उसका जीवन अभी भी कठिनाइयों से भरा है। तब राजा ने अपने गुरु से सलाह ली, जिन्होंने रोहिणी व्रत का पालन करने की सलाह दी। महिला ने श्रद्धापूर्वक रोहिणी व्रत किया, और कुछ समय बाद उसका जीवन सुख-समृद्धि से भर गया। उसी समय से रोहिणी व्रत को स्त्रियाँ परिवार के कल्याण, समृद्धि और सुख की प्राप्ति के लिए करती हैं। Rohini Vrat:रोहिणी व्रत के लाभ निष्कर्षरोहिणी व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह व्रत न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्रदान करता है, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक जीवन को भी संतुलित और समृद्ध बनाता है। व्रत का पालन श्रद्धा और नियमों के साथ करना आवश्यक है ताकि इसका पूरा लाभ प्राप्त हो सके। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें

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Rohini Vrat 2024: कब और क्यों मनाया जाता है रोहिणी व्रत? नियमों का ध्यान रखने से सफल होगी पूजा

Rohini Vrat 2024:रोहिणी व्रत पूजा विधि अक्टूबर 2024 Rohini Vrat 2024:रोहिणी व्रत का महत्वRohini Vrat 2024:रोहिणी व्रत का महत्व जैन धर्म में विशेष रूप से माना जाता है। इस व्रत को मुख्यतः स्त्रियाँ अपने पति और परिवार की दीर्घायु, सुख-समृद्धि, और कल्याण के लिए करती हैं। इस व्रत की महत्ता इसलिए भी अधिक है Rohini Vrat OCTOBER 2024 क्योंकि इसे करने से व्रती को पुण्य की प्राप्ति होती है और समस्त कष्टों का निवारण होता है। यह व्रत भगवान वासुपूज्य की आराधना के साथ किया जाता है, जो 12वें तीर्थंकर हैं। भगवान वासुपूज्य की कृपा से व्रत करने वालों को मोक्ष मार्ग पर बढ़ने का आशीर्वाद मिलता है। अक्टूबर 2024 में रोहिणी व्रत की तिथिअक्टूबर 2024 में रोहिणी व्रत की तिथि 21 अक्टूबर है। रोहिणी नक्षत्र की अवधि के दौरान यह व्रत किया जाता है, जो कि ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा से संबंधित एक प्रमुख नक्षत्र है। Rohini Vrat 2024:रोहिणी व्रत पूजा विधि 1. व्रत की तैयारीव्रत की शुरुआत से पहले घर को साफ-सुथरा करना चाहिए। पूजा स्थान को अच्छे से स्वच्छ कर लें और वहां भगवान वासुपूज्य की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और भगवान वासुपूज्य की प्रतिमा को विराजमान करें। इसके बाद पूजा सामग्री को व्यवस्थित करें, जिसमें धूप, दीप, अक्षत (चावल), कुमकुम, पुष्प, फल, और मिठाई आदि शामिल होते हैं। 2. स्नान और शुद्धिकरणव्रती को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। शारीरिक और मानसिक शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके बाद भगवान वासुपूज्य को ध्यान में रखते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। 3. भगवान वासुपूज्य की पूजाभगवान वासुपूज्य की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं और धूप लगाएं। इसके बाद भगवान का अभिषेक करें, जो कि पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, और शक्कर) से किया जाता है। अभिषेक के बाद भगवान को स्वच्छ जल से स्नान कराएं और उन्हें वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद पुष्प, फल, और मिठाई अर्पित करें। भगवान के चरणों में अक्षत और कुमकुम चढ़ाएं। 4. व्रत कथा का श्रवण या पाठपूजा के दौरान या उसके बाद रोहिणी व्रत की कथा का पाठ किया जाता है। यह कथा भगवान वासुपूज्य के जीवन, उनकी साधना और मोक्ष प्राप्ति की कहानी को बयां करती है। इस कथा को सुनने या पढ़ने से मन में श्रद्धा और विश्वास बढ़ता है और व्रती को व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। 5. ध्यान और प्रार्थनाकथा के बाद व्रती को भगवान वासुपूज्य का ध्यान करते हुए उनसे अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करनी चाहिए। प्रार्थना में श्रद्धा भाव से “ॐ वासुपूज्य नमः” मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का 108 बार जाप करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। 6. व्रत का पालनइस दिन निराहार या फलाहार रहना चाहिए। व्रती दिन भर उपवास करते हैं और केवल जल ग्रहण कर सकते हैं या फलाहार कर सकते हैं। यदि किसी कारणवश निराहार रहना संभव न हो तो, सात्विक आहार का सेवन कर सकते हैं। इस व्रत का पालन पूरी श्रद्धा और समर्पण भाव से किया जाना चाहिए। Rohini Vrat 2024:रोहिणी व्रत में क्या करें और क्या न करें Rohini Vrat 2024:क्या करें: Rohini Vrat 2024:क्या न करें: Rohini Vrat 2024:रोहिणी व्रत का पुण्य फल रोहिणी व्रत का पालन करने से व्रती को अनेक प्रकार के पुण्य फल प्राप्त होते हैं। इससे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। भगवान वासुपूज्य की कृपा से मनुष्य के सभी कष्ट दूर होते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर होने का अवसर मिलता है। व्रत का पालन करने से घर-परिवार में खुशहाली और प्रेम का वातावरण बनता है। विशेष रूप से विवाहित स्त्रियाँ इस व्रत को करती हैं ताकि उनके पति की दीर्घायु हो और उनका वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहे। निष्कर्ष Rohini Vrat 2024:रोहिणी व्रत जैन धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण और शुभ माना जाता है। यह व्रत भगवान वासुपूज्य की आराधना के साथ किया जाता है और इसे करने से व्रती के जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। अक्टूबर 2024 में 21 तारीख को यह व्रत मनाया जाएगा, और इसे पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से करने से व्यक्ति को निश्चित ही पुण्य की प्राप्ति होती है।

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पहली बार करवा चौथ का व्रत रख रही हैं? जानिए इसके महत्व, परंपराएं और पूरी विधि

पहली बार करवा चौथ का व्रत रख रही हैं? जानिए इसके महत्व, परंपराएं और पूरी विधि करवा चौथ, भारतीय संस्कृति का एक खास और महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए मनाती हैं। यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। अगर आप पहली बार करवा चौथ का व्रत रख रही हैं, तो आपके लिए यह एक बेहद खास और यादगार अनुभव होने वाला है। इस ब्लॉग में हम आपको करवा चौथ व्रत के महत्व, परंपराओं, पूजा विधि और कुछ उपयोगी टिप्स के बारे में जानकारी देंगे। करवा चौथ का महत्व करवा चौथ पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूत करने वाला पर्व है। इसमें महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखकर अपने पति की लंबी आयु और जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं। यह सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि प्रेम, आस्था और समर्पण का प्रतीक है। खासकर उन महिलाओं के लिए जो पहली बार यह व्रत रख रही हैं, यह अवसर एक अनूठा अनुभव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन की नई शुरुआत को और भी खास बनाता है। पहली बार करवा चौथ व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए जरूरी बातें अगर आप इस साल पहली बार का व्रत रख रही हैं, तो कुछ जरूरी परंपराएं और बातें जानना आपके लिए फायदेमंद रहेगा। पहली बार करवा चौथ रखने वाली महिलाओं के लिए कुछ खास टिप्स करवा चौथ से जुड़े कुछ रोचक तथ्य निष्कर्ष पहली बार का व्रत रखना आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण और यादगार पल होगा। इस व्रत में पति-पत्नी के रिश्ते का प्यार, समर्पण और विश्वास झलकता है। इस दिन की हर परंपरा का अपना एक खास महत्व है, जिसे अपनाकर आप इस त्योहार को और भी खास बना सकती हैं। करवा चौथ के इस पावन पर्व पर आपके रिश्ते में और भी मिठास और मजबूती आए, यही शुभकामनाएं हैं। क्या आप भी पहली बार का व्रत रख रही हैं? अपनी तैयारियों और अनुभवों को हमारे साथ कमेंट में शेयर करें! Frequently Asked Questions (FAQs) Q1. क्या पहली बार का व्रत रखना कठिन होता है?पहली बार व्रत रखना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर अगर आपने पहले कभी निर्जला व्रत नहीं रखा है। लेकिन सरगी के दौरान पौष्टिक भोजन और दिन में आराम करने से इसे आसान बनाया जा सकता है। Q2. क्या सरगी लेना अनिवार्य है?सरगी लेना शुभ माना जाता है और यह आपकी सास द्वारा दिया जाता है। इसे लेना अनिवार्य तो नहीं, लेकिन यह आपके व्रत की शुरुआत को सकारात्मक बनाता है। Q3. क्या पहली बार व्रत रखने पर विशेष नियम होते हैं?पहली बार व्रत रखने पर कोई विशेष नियम नहीं होते, लेकिन व्रत का पालन पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ करना चाहिए। Keywords for SEO: करवा चौथ का महत्व, करवा चौथ पूजा विधि, पहली बार करवा चौथ व्रत, सरगी, सोलह श्रृंगार, करवा चौथ व्रत कथा, चंद्रमा की पूजा, करवा चौथ टिप्स

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Shani Dev Chalisha:शनि देव चालीसा

Shani Dev Chalisha:श्री शनि देव चालीसा: शनि ग्रह के देवता की स्तुति Shani Dev Chalisha:श्री शनि देव चालीसा हिंदू धर्म में शनि ग्रह के देवता की स्तुति में गाया जाने वाला एक लोकप्रिय भक्ति गीत है। शनि देव को न्याय के देवता भी माना जाता है और वे ग्रहों के राजा भी हैं। Shani Dev Chalisha यह चालीसा शनि देव की शक्ति, उनके गुणों और उनके भक्तों पर कृपा करने की क्षमता का वर्णन करती है। Shani Dev Chalisha:शनि चालीसा का महत्व Shani Dev Chalisha:शनि चालीसा का पाठ कैसे करें? नोट: यदि आप शनि चालीसा का अर्थ जानना चाहते हैं तो आप किसी धार्मिक गुरु या विद्वान से संपर्क कर सकते हैं। Shani Dev Chalisha:शनि देव चालीसा ॥ दोहा ॥श्री शनिश्चर देवजी,सुनहु श्रवण मम् टेर।कोटि विघ्ननाशक प्रभो,करो न मम् हित बेर॥ ॥ सोरठा ॥तव स्तुति हे नाथ,जोरि जुगल कर करत हौं।करिये मोहि सनाथ,विघ्नहरन हे रवि सुव्रन। ॥ चौपाई ॥शनिदेव मैं सुमिरौं तोही। विद्या बुद्धि ज्ञान दो मोही॥तुम्हरो नाम अनेक बखानौं। क्षुद्रबुद्धि मैं जो कुछ जानौं॥ अन्तक, कोण, रौद्रय मनाऊँ। कृष्ण बभ्रु शनि सबहिं सुनाऊँ॥पिंगल मन्दसौरि सुख दाता। हित अनहित सब जग के ज्ञाता॥ नित जपै जो नाम तुम्हारा। करहु व्याधि दुःख से निस्तारा॥राशि विषमवस असुरन सुरनर। पन्नग शेष सहित विद्याधर॥ राजा रंक रहहिं जो नीको। पशु पक्षी वनचर सबही को॥कानन किला शिविर सेनाकर। नाश करत सब ग्राम्य नगर भर॥ डालत विघ्न सबहि के सुख में। व्याकुल होहिं पड़े सब दुःख में॥नाथ विनय तुमसे यह मेरी। करिये मोपर दया घनेरी॥ मम हित विषम राशि महँवासा। करिय न नाथ यही मम आसा॥जो गुड़ उड़द दे बार शनीचर। तिल जव लोह अन्न धन बस्तर॥ दान दिये से होंय सुखारी। सोइ शनि सुन यह विनय हमारी॥नाथ दया तुम मोपर कीजै। कोटिक विघ्न क्षणिक महँ छीजै॥ वंदत नाथ जुगल कर जोरी। सुनहु दया कर विनती मोरी॥कबहुँक तीरथ राज प्रयागा। सरयू तोर सहित अनुरागा॥ कबहुँ सरस्वती शुद्ध नार महँ। या कहुँ गिरी खोह कंदर महँ॥ध्यान धरत हैं जो जोगी जनि। ताहि ध्यान महँ सूक्ष्म होहि शनि॥ है अगम्य क्या करूँ बड़ाई। करत प्रणाम चरण शिर नाई॥जो विदेश से बार शनीचर। मुड़कर आवेगा निज घर पर॥ रहैं सुखी शनि देव दुहाई। रक्षा रवि सुत रखैं बनाई॥जो विदेश जावैं शनिवारा। गृह आवैं नहिं सहै दुखारा॥ संकट देय शनीचर ताही। जेते दुखी होई मन माही॥सोई रवि नन्दन कर जोरी। वन्दन करत मूढ़ मति थोरी॥ ब्रह्मा जगत बनावन हारा। विष्णु सबहिं नित देत अहारा॥हैं त्रिशूलधारी त्रिपुरारी।विभू देव मूरति एक वारी॥ इकहोइ धारण करत शनि नित।वंदत सोई शनि को दमनचित॥जो नर पाठ करै मन चित से।सो नर छूटै व्यथा अमित से॥ हौं सुपुत्र धन सन्तति बाढ़े।कलि काल कर जोड़े ठाढ़े॥पशु कुटुम्ब बांधन आदि से।भरो भवन रहिहैं नित सबसे॥ नाना भाँति भोग सुख सारा।अन्त समय तजकर संसारा॥पावै मुक्ति अमर पद भाई।जो नित शनि सम ध्यान लगाई॥ पढ़ै प्रात जो नाम शनि दस।रहैं शनिश्चर नित उसके बस॥पीड़ा शनि की कबहुँ न होई।नित उठ ध्यान धरै जो कोई॥ जो यह पाठ करैं चालीसा।होय सुख साखी जगदीशा॥चालिस दिन नित पढ़ै सबेरे।पातक नाशै शनी घनेरे॥ रवि नन्दन की अस प्रभुताई।जगत मोहतम नाशै भाई॥याको पाठ करै जो कोई।सुख सम्पति की कमी न होई॥ निशिदिन ध्यान धरै मनमाहीं।आधिव्याधि ढिंग आवै नाहीं॥ ॥ दोहा ॥पाठ शनिश्चर देव को,कीहौं ‘विमल’ तैयार।करत पाठ चालीस दिन,हो भवसागर पार॥ जो स्तुति दशरथ जी कियो,सम्मुख शनि निहार।सरस सुभाषा में वही,ललिता लिखें सुधार॥

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Bhagavad Geeta Chalisa:भगवद गीता चालीसा

Bhagavad Geeta:भगवद गीता चालीसा: एक भ्रामक अवधारणा Bhagavad Geeta:भगवद गीता चालीसा जैसी कोई विशिष्ट चालीसा हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों या परंपराओं में उल्लिखित नहीं है। क्यों? क्या हो सकता है? आप क्या कर सकते हैं? निष्कर्ष: Bhagavad Geeta:जब तक आपके पास भगवद गीता चालीसा का कोई विशिष्ट स्रोत या प्रमाण नहीं है, Bhagavad Geeta तब तक यह मान लेना उचित होगा कि यह एक आधुनिक रचना है या कोई भ्रम है। ॥ चौपाई ॥ प्रथमहिं गुरुको शीश नवाऊँ।हरिचरणों में ध्यान लगाऊँ॥गीत सुनाऊँ अद्भुत यार।धारण से हो बेड़ा पार॥ अर्जुन कहै सुनो भगवाना।अपने रूप बताये नाना॥उनका मैं कछु भेद न जाना।किरपा कर फिर कहो सुजाना॥ जो कोई तुमको नित ध्यावे।भक्तिभाव से चित्त लगावे॥रात दिवस तुमरे गुण गावे।तुमसे दूजा मन नहीं भावे॥ तुमरा नाम जपे दिन रात।और करे नहीं दूजी बात॥दूजा निराकार को ध्यावे।अक्षर अलख अनादि बतावे॥ दोनों ध्यान लगाने वाला।उनमें कुण उत्तम नन्दलाला॥अर्जुन से बोले भगवान्।सुन प्यारे कछु देकर ध्यान॥ मेरा नाम जपै जपवावे।नेत्रों में प्रेमाश्रु छावे॥मुझ बिनु और कछु नहीं चावे।रात दिवस मेरा गुण गावे॥ सुनकर मेरा नामोच्चार।उठै रोम तन बारम्बार॥जिनका क्षण टूटै नहिं तार।उनकी श्रद्घा अटल अपार॥ मुझ में जुड़कर ध्यान लगावे।ध्यान समय विह्वल हो जावे॥कंठ रुके बोला नहिं जावे।मन बुधि मेरे माँही समावे॥ लज्जा भय रु बिसारे मान।अपना रहे ना तन का ज्ञान॥ऐसे जो मन ध्यान लगावे।सो योगिन में श्रेष्ठ कहावे॥ जो कोई ध्यावे निर्गुण रूप।पूर्ण ब्रह्म अरु अचल अनूप॥निराकार सब वेद बतावे।मन बुद्धी जहँ थाह न पावे॥ जिसका कबहुँ न होवे नाश।ब्यापक सबमें ज्यों आकाश॥अटल अनादि आनन्दघन।जाने बिरला जोगीजन॥ ऐसा करे निरन्तर ध्यान।सबको समझे एक समान॥मन इन्द्रिय अपने वश राखे।विषयन के सुख कबहुँ न चाखे॥ सब जीवों के हित में रत।ऐसा उनका सच्चा मत॥वह भी मेरे ही को पाते।निश्चय परमा गति को जाते॥ फल दोनों का एक समान।किन्तु कठिन है निर्गुण ध्यान॥जबतक है मन में अभिमान।तबतक होना मुश्किल ज्ञान॥ जिनका है निर्गुण में प्रेम।उनका दुर्घट साधन नेम॥मन टिकने को नहीं अधार।इससे साधन कठिन अपार॥ सगुन ब्रह्म का सुगम उपाय।सो मैं तुझको दिया बताय॥यज्ञ दानादि कर्म अपारा।मेरे अर्पण कर कर सारा॥ अटल लगावे मेरा ध्यान।समझे मुझको प्राण समान॥सब दुनिया से तोड़े प्रीत।मुझको समझे अपना मीत॥ प्रेम मग्न हो अति अपार।समझे यह संसार असार॥जिसका मन नित मुझमें यार।उनसे करता मैं अति प्यार॥ केवट बनकर नाव चलाऊँ।भव सागर के पार लगाऊँ॥यह है सबसे उत्तम ज्ञान।इससे तू कर मेरा ध्यान॥ फिर होवेगा मोहिं सामान।यह कहना मम सच्चा जान॥जो चाले इसके अनुसार।वह भी हो भवसागर पार॥

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Shri Brahma Chalisa:(श्री ब्रह्मा चालीसा)

Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा: सृष्टि के रचयिता की स्तुति Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा हिंदू धर्म में भगवान ब्रह्मा की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। Brahma Chalisa ब्रह्मा जी को सृष्टि के रचयिता माना जाता है और वे हिंदू त्रिमूर्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यह चालीसा भगवान ब्रह्मा के गुणों, कृपा और शक्ति का वर्णन करती है। Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा का महत्व Brahma Chalisa:श्री ब्रह्मा चालीसा का पाठ कैसे करें? नोट: यदि आप श्री ब्रह्मा चालीसा का अर्थ जानना चाहते हैं Brahma Chalisa तो आप किसी धार्मिक गुरु या विद्वान से संपर्क कर सकते हैं। ॥ दोहा ॥जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू,चतुरानन सुखमूल।करहु कृपा निज दास पै,रहहु सदा अनुकूल॥ तुम सृजक ब्रह्माण्ड के,अज विधि घाता नाम।विश्वविधाता कीजिये,जन पै कृपा ललाम॥ ॥ चौपाई ॥जय जय कमलासान जगमूला।रहहु सदा जनपै अनुकूला॥रुप चतुर्भुज परम सुहावन।तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥ रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा।मस्तक जटाजुट गंभीरा॥ताके ऊपर मुकुट बिराजै।दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥ श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर।है यज्ञोपवीत अति मनहर॥कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं।गल मोतिन की माला राजहिं॥ चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये।दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा।अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥ अर्द्धांगिनि तव है सावित्री।अपर नाम हिये गायत्री॥सरस्वती तब सुता मनोहर।वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥ कमलासन पर रहे बिराजे।तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा।नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥ तेहि पर तुम आसीन कृपाला।सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥एक बार की कथा प्रचारी।तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥ कमलासन लखि कीन्ह बिचारा।और न कोउ अहै संसारा॥तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा।अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥ कोटिक वर्ष गये यहि भांती।भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥पै तुम ताकर अन्त न पाये।ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये॥ पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा।महापघ यह अति प्राचीन॥याको जन्म भयो को कारन।तबहीं मोहि करयो यह धारन॥ अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं।सब कुछ अहै निहित मो माहीं॥यह निश्चय करि गरब बढ़ायो।निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये॥ गगन गिरा तब भई गंभीरा।ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा॥सकल सृष्टि कर स्वामी जोई।ब्रह्म अनादि अलख है सोई॥ निज इच्छा इन सब निरमाये।ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये॥सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा।सब जग इनकी करिहै सेवा॥ महापघ जो तुम्हरो आसन।ता पै अहै विष्णु को शासन॥विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई।तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई॥ भ्ौटहु जाई विष्णु हितमानी।यह कहि बन्द भई नभवानी॥ताहि श्रवण कहि अचरज माना।पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना॥ कमल नाल धरि नीचे आवा।तहां विष्णु के दर्शन पावा॥शयन करत देखे सुरभूपा।श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा॥ सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर।क्रीटमुकट राजत मस्तक पर॥गल बैजन्ती माल बिराजै।कोटि सूर्य की शोभा लाजै॥ शंख चक्र अरु गदा मनोहर।शेष नाग शय्या अति मनहर॥दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू।हर्षित भे श्रीपति सुख धामू॥ बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन।तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन॥ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना।ब्रह्मारुप हम दोउ समाना॥ तीजे श्री शिवशंकर आहीं।ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही॥तुम सों होई सृष्टि विस्तारा।हम पालन करिहैं संसारा॥ शिव संहार करहिं सब केरा।हम तीनहुं कहँ काज धनेरा॥अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु।निराकार तिनकहँ तुम जानहु॥ हम साकार रुप त्रयदेवा।करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा॥यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये।परब्रह्म के यश अति गाये॥ सो सब विदित वेद के नामा।मुक्ति रुप सो परम ललामा॥यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा।पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा॥ नाम पितामह सुन्दर पायेउ।जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ॥लीन्ह अनेक बार अवतारा।सुन्दर सुयश जगत विस्तारा॥ देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं।मनवांछित तुम सन सब पावहिं॥जो कोउ ध्यान धरै नर नारी।ताकी आस पुजावहु सारी॥ पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई।तहँ तुम बसहु सदा सुरराई॥कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन।ता कर दूर होई सब दूषण॥

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Diwali 2024 Date and Time : दीपावली कब है, जानें धनतेरस, दिवाली, भाई दूज की सही तारीख

Diwali 2024:दिवाली 2024 का पांच दिवसीय पर्व 29 अक्टूबर से शुरू होगा और 3 नवंबर तक चलेगा। इस साल की सही तिथियों और पूजा के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं Diwali 2024:पूजा विधि में घर को साफ-सुथरा रखना, दीपक जलाना, और माता लक्ष्मी व गणेश की पूजा करना प्रमुख होता है। दीपावली का आध्यात्मिक महत्व अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दौरान नए वस्त्र पहनने और उपहार देने की परंपरा भी है। Diwali 2024:दिवाली 2024 पूजा विधि Diwali 2024:दिवाली का त्योहार हिन्दू धर्म में बहुत महत्व रखता है और इसे धन, समृद्धि, और सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है। दिवाली की पूजा विधि इस प्रकार है Diwali 2024:दीपावली 2024:महत्व Diwali 2024:दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, भारत का सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से मनाया जाने वाला त्योहार है। 2024 में, यह पर्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल आध्यात्मिकता और आस्था का प्रतीक है, बल्कि लोगों को एकता और भाईचारे का संदेश भी देता है। दिवाली पर, लोग अपने घरों को दीयों और रंगोली से सजाते हैं, लक्ष्मी-गणेश की पूजा करते हैं, और मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं। Diwali 2024:दीपावली का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है; यह जीवन में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संदेश भी देता है। 2024 में, जब दुनिया कई चुनौतियों से गुजर रही है, दिवाली हमें सकारात्मकता और आशा की दिशा में प्रेरित करती है। इस दिन को नए सिरे से शुरुआत का प्रतीक माना जाता है, जहाँ पुराने दुखों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। दीपावली न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। यह त्योहार व्यापार में उन्नति और समृद्धि का प्रतीक है, खासकर भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। इस प्रकार, दीपावली 2024 हमें आध्यात्मिकता, सामाजिकता और आर्थिक प्रगति का संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। दिवाली 2024: क्या करें, क्या न करें दिवाली, जिसे हम दीपावली के नाम से भी जानते हैं, भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह न केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, बल्कि परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर खुशी मनाने का भी अवसर है। Diwali 2024:क्या करें Diwali 2024:क्या न करें इस दिवाली, खुशियों और सकारात्मकता को फैलाने का प्रयास करें और अपने आस-पास के लोगों के साथ मिलकर इस त्योहार का आनंद लें। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Karwa Chauth 2024: करवाचौथ व्रत के इन 6 विशेष नियमों के बिना अधूरा रह जाता है व्रत, अखंड सौभाग्य के लिए हर सुहागिन को करना चाहिए इनका पालन

Karwa Chauth:करवा चौथ 2024: करवाचौथ व्रत के 6 विशेष नियमों के बिना अधूरा है व्रत, अखंड सौभाग्य के लिए पालन जरूरी Karwa Chauth:करवा चौथ का व्रत हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। Karwa Chauth यह व्रत पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। करवाचौथ के दिन सुहागिन महिलाएं निर्जल व्रत करती हैं, और रात को चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत तोड़ा जाता है। Karwa Chauth इस पर्व की खास बात यह है कि इसके साथ कुछ विशिष्ट नियम जुड़े होते हैं, जिनके बिना व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं करवाचौथ व्रत के उन 6 प्रमुख नियमों के बारे में, जिनका पालन हर सुहागिन के लिए आवश्यक है। 1. निर्जल व्रत (बिना पानी के व्रत रखना) करवा चौथ का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि व्रती महिला को पूरे दिन बिना पानी और अन्न के रहना होता है। व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की लंबी उम्र की कामना करना होता है, Karwa Chauth और यह तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक कि इसे निर्जल और निराहार रखा जाए। इस दिन सूर्योदय से पहले सरगी खाकर व्रत की शुरुआत की जाती है, और चंद्रमा के दर्शन के बाद पति के हाथों से पानी पीकर ही इसे समाप्त किया जाता है। 2. सरगी का सेवन सरगी करवाचौथ के दिन सुबह सूर्योदय से पहले किया जाने वाला भोजन है, जो विशेष रूप से व्रती महिला की सास द्वारा दिया जाता है। सरगी में हल्के और पौष्टिक आहार होते हैं, जैसे फल, मिठाइयाँ, सूखे मेवे, और कभी-कभी पराठा या हलवा भी। सरगी का सेवन करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह पूरे दिन के व्रत के दौरान शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।Karwa Chauth सरगी का सेवन शुभ माना जाता है और इसे आदर और प्रेम के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। 3. सजधज कर व्रत करना करवा चौथ पर व्रत रखने वाली महिला को अपने सुहाग की निशानी के रूप में सजधज कर तैयार होना होता है। यह दिन खासतौर पर सुहागिनों के लिए होता है, इसलिए व्रत के दौरान महिलाएं अपने पारंपरिक परिधान, जैसे साड़ी या लहंगा, पहनती हैं। इसके अलावा, सोलह श्रृंगार जैसे सिंदूर, बिंदी, कंगन, मंगलसूत्र, चूड़ियाँ आदि का महत्व होता है। यह माना जाता है कि सजधज कर व्रत करने से देवी पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और व्रत को पूर्णता मिलती है। 4. पूजा और करवा का विशेष महत्व करवा चौथ के दिन पूजा का विशेष महत्व होता है। शाम के समय महिलाएं एकत्र होकर करवा चौथ की कथा सुनती हैं और करवा की पूजा करती हैं। करवा एक विशेष मिट्टी का बर्तन होता है जिसे पूजा के दौरान प्रयोग किया जाता है। इस बर्तन में जल भरकर भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश की पूजा की जाती है। करवा का यह जल चंद्र दर्शन के बाद अर्पण किया जाता है, जो कि व्रत को पूरा करने का एक आवश्यक हिस्सा है। 5. चंद्र दर्शन के बिना व्रत अधूरा करवा चौथ का व्रत तब तक पूरा नहीं माना जाता जब तक कि चंद्रमा के दर्शन न हो जाएं। चंद्र दर्शन के बाद महिलाएं अपने पति के हाथ से पानी पीकर और मिठाई खाकर व्रत तोड़ती हैं। यह मान्यता है कि चंद्रमा के दर्शन से सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है, और इससे पति की दीर्घायु की कामना पूरी होती है। कई बार आसमान में बादल होने के कारण चंद्रमा दिखाई नहीं देता, ऐसे में महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से व्रत तोड़ने के लिए चंद्रमा की दिशा में जल अर्पण करती हैं। 6. पति के हाथ से व्रत खोलना करवा चौथ के दिन एक और महत्वपूर्ण परंपरा यह है कि व्रती महिला अपने पति के हाथ से पानी पीकर और मिठाई खाकर ही व्रत समाप्त करती है। यह पति-पत्नी के बीच प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस परंपरा का पालन करना जरूरी होता है, क्योंकि यह मान्यता है कि इससे पति-पत्नी का रिश्ता और अधिक मजबूत होता है, और उनके बीच के संबंध में विश्वास और प्यार बढ़ता है। Karwa Chauth:करवा चौथ का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व Karwa Chauth:करवा चौथ का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी है। इस दिन महिलाएं एक साथ मिलकर पूजा करती हैं Karwa Chauth और अपने अनुभव साझा करती हैं, जिससे सामाजिक संबंध और भी प्रगाढ़ होते हैं। इसके अलावा, यह व्रत महिला के धैर्य, समर्पण और आत्मसंयम का प्रतीक है। करवा चौथ पर महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए तपस्या करती हैं, जो एक उच्चतम आध्यात्मिकता का प्रतीक है। निष्कर्ष करवा चौथ का व्रत भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और इसके साथ जुड़े ये 6 विशेष नियम इसे पूर्णता प्रदान करते हैं। अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इन नियमों का पालन करना हर सुहागिन के लिए जरूरी है।Karwa Chauth यह पर्व न केवल पति-पत्नी के बीच के प्रेम और समर्पण का प्रतीक है, बल्कि यह जीवन के हर रिश्ते को समर्पण और आदर के साथ निभाने की सीख भी देता है। करवा चौथ का यह व्रत भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही परंपराओं का जीवंत उदाहरण है, और इसके साथ जुड़ी आस्थाएं और विश्वास इसे और भी खास बनाते हैं।

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शरद पूर्णिमा: महत्व, धार्मिक मान्यताएँ, मंत्र और वैदिक प्रमाण – SHARAD PURNIMA 2024

शरद पूर्णिमा: महत्व, धार्मिक मान्यताएँ, मंत्र और वैदिक प्रमाण शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जिसे आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन को चंद्रमा की विशेष महिमा के लिए जाना जाता है, और धार्मिक रूप से यह त्यौहार लक्ष्मी पूजन, भगवान कृष्ण के रास और अमृत वर्षा के लिए विशेष महत्व रखता है। शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व शरद पूर्णिमा की खीर और चंद्रमा की किरणें इस दिन रात को खीर बनाकर उसे चंद्रमा की रोशनी में रखा जाता है। मान्यता है कि चंद्रमा की किरणों से इस खीर में अमृत तत्व समाहित हो जाता है, जिसे खाने से स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है। आयुर्वेद में भी इस खीर को स्वास्थ्यवर्धक माना गया है, विशेष रूप से यह पाचन तंत्र को सुधारने और शरीर को शीतलता प्रदान करने में सहायक होती है। शरद पूर्णिमा का वैदिक प्रमाण वेदों और पुराणों में शरद पूर्णिमा का उल्लेख मिलता है। शरद पूर्णिमा ऋग्वेद में चंद्रमा को औषधियों का स्वामी कहा गया है, जो जीवन के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए आवश्यक है। अथर्ववेद में चंद्रमा की महिमा का वर्णन है, जो इस दिन विशेष प्रभावकारी होती है। इसका अर्थ है, “चंद्रमा मन से उत्पन्न हुआ है।” यह शांति, सौम्यता और मानसिक संतुलन का प्रतीक है, जो शरद पूर्णिमा की रात विशेष रूप से प्रभावी होता है। शरद पूर्णिमा पर विशेष अनुष्ठान और पूजन विधि शरद पूर्णिमा की आधुनिक मान्यता आज के समय में शरद पूर्णिमा केवल धार्मिक उत्सव ही नहीं, बल्कि यह स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ने का एक पर्व भी है। इस दिन को आध्यात्मिक शांति और मन की स्थिरता पाने के लिए उत्तम माना जाता है। इसके साथ ही चंद्रमा की किरणों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों को भी आधुनिक विज्ञान ने स्वीकार किया है। निष्कर्ष शरद पूर्णिमा का पर्व धर्म, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। वैदिक प्रमाण और मंत्रों के साथ इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस पर्व पर भगवान चंद्रमा और माता लक्ष्मी की आराधना से व्यक्ति को सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।

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Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा 

Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा: बाल गोपाल की भक्ति Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण के बाल रूप, गोपाल, की स्तुति करने वाला एक लोकप्रिय भजन है। यह चालीसा विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना करने वाले भक्तों द्वारा गाया जाता है। Gopal Chalisa माना जाता है कि गोपाल चालीसा का नियमित पाठ करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा का महत्व Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा का पाठ कैसे करें Gopal Chalisa:गोपाल चालीसा ॥ दोहा ॥श्री राधापद कमल रज,सिर धरि यमुना कूल।वरणो चालीसा सरस,सकल सुमंगल मूल॥ ॥ चौपाई ॥जय जय पूरण ब्रह्म बिहारी।दुष्ट दलन लीला अवतारी॥जो कोई तुम्हरी लीला गावै।बिन श्रम सकल पदारथ पावै॥ श्री वसुदेव देवकी माता।प्रकट भये संग हलधर भ्राता॥मथुरा सों प्रभु गोकुल आये।नन्द भवन में बजत बधाये॥ जो विष देन पूतना आई।सो मुक्ति दै धाम पठाई॥तृणावर्त राक्षस संहार्यौ।पग बढ़ाय सकटासुर मार्यौ॥ खेल खेल में माटी खाई।मुख में सब जग दियो दिखाई॥गोपिन घर घर माखन खायो।जसुमति बाल केलि सुख पायो॥ ऊखल सों निज अंग बँधाई।यमलार्जुन जड़ योनि छुड़ाई॥बका असुर की चोंच विदारी।विकट अघासुर दियो सँहारी॥ ब्रह्मा बालक वत्स चुराये।मोहन को मोहन हित आये॥बाल वत्स सब बने मुरारी।ब्रह्मा विनय करी तब भारी॥ काली नाग नाथि भगवाना।दावानल को कीन्हों पाना॥सखन संग खेलत सुख पायो।श्रीदामा निज कन्ध चढ़ायो॥ चीर हरन करि सीख सिखाई।नख पर गिरवर लियो उठाई॥दरश यज्ञ पत्निन को दीन्हों।राधा प्रेम सुधा सुख लीन्हों॥ नन्दहिं वरुण लोक सों लाये।ग्वालन को निज लोक दिखाये॥शरद चन्द्र लखि वेणु बजाई।अति सुख दीन्हों रास रचाई॥ अजगर सों पितु चरण छुड़ायो।शंखचूड़ को मूड़ गिरायो॥हने अरिष्टा सुर अरु केशी।व्योमासुर मार्यो छल वेषी॥ व्याकुल ब्रज तजि मथुरा आये।मारि कंस यदुवंश बसाये॥मात पिता की बन्दि छुड़ाई।सान्दीपनि गृह विद्या पाई॥ पुनि पठयौ ब्रज ऊधौ ज्ञानी।प्रेम देखि सुधि सकल भुलानी॥कीन्हीं कुबरी सुन्दर नारी।हरि लाये रुक्मिणि सुकुमारी॥ भौमासुर हनि भक्त छुड़ाये।सुरन जीति सुरतरु महि लाये॥दन्तवक्र शिशुपाल संहारे।खग मृग नृग अरु बधिक उधारे॥ दीन सुदामा धनपति कीन्हों।पारथ रथ सारथि यश लीन्हों॥गीता ज्ञान सिखावन हारे।अर्जुन मोह मिटावन हारे॥ केला भक्त बिदुर घर पायो।युद्ध महाभारत रचवायो॥द्रुपद सुता को चीर बढ़ायो।गर्भ परीक्षित जरत बचायो॥ कच्छ मच्छ वाराह अहीशा।बावन कल्की बुद्धि मुनीशा॥ह्वै नृसिंह प्रह्लाद उबार्यो।राम रुप धरि रावण मार्यो॥ जय मधु कैटभ दैत्य हनैया।अम्बरीय प्रिय चक्र धरैया॥ब्याध अजामिल दीन्हें तारी।शबरी अरु गणिका सी नारी॥ गरुड़ासन गज फन्द निकन्दन।देहु दरश ध्रुव नयनानन्दन॥देहु शुद्ध सन्तन कर सङ्गा।बाढ़ै प्रेम भक्ति रस रङ्गा॥ देहु दिव्य वृन्दावन बासा।छूटै मृग तृष्णा जग आशा॥तुम्हरो ध्यान धरत शिव नारद।शुक सनकादिक ब्रह्म विशारद॥ जय जय राधारमण कृपाला।हरण सकल संकट भ्रम जाला॥बिनसैं बिघन रोग दुःख भारी।जो सुमरैं जगपति गिरधारी॥ जो सत बार पढ़ै चालीसा।देहि सकल बाँछित फल शीशा॥ ॥ छन्द ॥गोपाल चालीसा पढ़ै नित,नेम सों चित्त लावई।सो दिव्य तन धरि अन्त महँ,गोलोक धाम सिधावई॥ संसार सुख सम्पत्ति सकल,जो भक्तजन सन महँ चहैं।‘जयरामदेव’ सदैव सो,गुरुदेव दाया सों लहैं॥ ॥ दोहा ॥प्रणत पाल अशरण शरण,करुणा-सिन्धु ब्रजेश।चालीसा के संग मोहि,अपनावहु प्राणेश॥

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Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा

Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा: गोवर्धन पर्वत की महिमा Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा हिंदू धर्म में गोवर्धन पर्वत की महिमा का वर्णन करने वाला एक भक्ति गीत है। गोवर्धन पर्वत को भगवान कृष्ण से गहरा संबंध है। Giriraj Chalisa जब इंद्र देव ने ब्रजवासियों पर प्रचंड वर्षा की थी, तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को बचाया था। Giriraj Chalisa इस घटना के बाद से गोवर्धन पर्वत को पूजनीय माना जाता है। Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा का महत्व Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा का पाठ कैसे करें Giriraj Chalisa:गिरिराज चालीसा ॥ दोहा ॥बन्दहुँ वीणा वादिनी,धरि गणपति को ध्यान।महाशक्ति राधा सहित,कृष्ण करौ कल्याण॥ सुमिरन करि सब देवगण,गुरु पितु बारम्बार।बरनौ श्रीगिरिराज यश,निज मति के अनुसार॥ ॥ चौपाई ॥जय हो जय बंदित गिरिराजा।ब्रज मण्डल के श्री महाराजा॥विष्णु रूप तुम हो अवतारी।सुन्दरता पै जग बलिहारी॥ स्वर्ण शिखर अति शोभा पामें।सुर मुनि गण दरशन कूं आमें॥शांत कन्दरा स्वर्ग समाना।जहाँ तपस्वी धरते ध्याना॥ द्रोणगिरि के तुम युवराजा।भक्तन के साधौ हौ काजा॥मुनि पुलस्त्य जी के मन भाये।जोर विनय कर तुम कूँ लाये॥ मुनिवर संघ जब ब्रज में आये।लखि ब्रजभूमि यहाँ ठहराये॥विष्णु धाम गौलोक सुहावन।यमुना गोवर्धन वृन्दावन॥ देख देव मन में ललचाये।बास करन बहु रूप बनाये॥कोउ बानर कोउ मृग के रूपा।कोउ वृक्ष कोउ लता स्वरूपा॥ आनन्द लें गोलोक धाम के।परम उपासक रूप नाम के॥द्वापर अंत भये अवतारी।कृष्णचन्द्र आनन्द मुरारी॥ महिमा तुम्हरी कृष्ण बखानी।पूजा करिबे की मन ठानी॥ब्रजवासी सब के लिये बुलाई।गोवर्द्धन पूजा करवाई॥ पूजन कूँ व्यञ्जन बनवाये।ब्रजवासी घर घर ते लाये॥ग्वाल बाल मिलि पूजा कीनी।सहस भुजा तुमने कर लीनी॥ स्वयं प्रकट हो कृष्ण पूजा में।माँग माँग के भोजन पामें॥लखि नर नारि मन हरषामें।जै जै जै गिरिवर गुण गामें॥ देवराज मन में रिसियाए।नष्ट करन ब्रज मेघ बुलाए॥छाँया कर ब्रज लियौ बचाई।एकउ बूँद न नीचे आई॥ सात दिवस भई बरसा भारी।थके मेघ भारी जल धारी॥कृष्णचन्द्र ने नख पै धारे।नमो नमो ब्रज के रखवारे॥ करि अभिमान थके सुरसाई।क्षमा माँग पुनि अस्तुति गाई॥त्राहि माम् मैं शरण तिहारी।क्षमा करो प्रभु चूक हमारी॥ बार बार बिनती अति कीनी।सात कोस परिकम्मा दीनी॥संग सुरभि ऐरावत लाये।हाथ जोड़ कर भेंट गहाये॥ अभय दान पा इन्द्र सिहाये।करि प्रणाम निज लोक सिधाये॥जो यह कथा सुनैं चित लावें।अन्त समय सुरपति पद पावें॥ गोवर्द्धन है नाम तिहारौ।करते भक्तन कौ निस्तारौ॥जो नर तुम्हरे दर्शन पावें।तिनके दुःख दूर ह्वै जावें॥ कुण्डन में जो करें आचमन।धन्य धन्य वह मानव जीवन॥मानसी गंगा में जो न्हावें।सीधे स्वर्ग लोक कूँ जावें॥ दूध चढ़ा जो भोग लगावें।आधि व्याधि तेहि पास न आवें॥जल फल तुलसी पत्र चढ़ावें।मन वांछित फल निश्चय पावें॥ जो नर देत दूध की धारा।भरौ रहे ताकौ भण्डारा॥करें जागरण जो नर कोई।दुख दरिद्र भय ताहि न होई॥ ‘श्याम’ शिलामय निज जन त्राता।भक्ति मुक्ति सरबस के दाता॥पुत्र हीन जो तुम कूँ ध्यावें।ताकूँ पुत्र प्राप्ति ह्वै जावें॥ दंडौती परिकम्मा करहीं।ते सहजहि भवसागर तरहीं॥कलि में तुम सम देव न दूजा।सुर नर मुनि सब करते पूजा॥ ॥ दोहा ॥जो यह चालीसा पढ़ै,सुनै शुद्ध चित्त लाय।सत्य सत्य यह सत्य है,गिरिवर करै सहाय॥ क्षमा करहुँ अपराध मम,त्राहि माम् गिरिराज।श्याम बिहारी शरण में,गोवर्द्धन महाराज॥

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