Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा

Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा: ग्रहों की शांति के लिए Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा एक हिंदू धार्मिक ग्रंथ है जो नवग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु) की स्तुति में लिखा गया है। यह माना जाता है कि नवग्रह हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं Navgrah Chalisa और इनकी कृपा पाने के लिए नवग्रह चालीसा का पाठ किया जाता है। Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा की विशेषताएं: Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा का पाठ कैसे करें? Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके सभी नवग्रहों को प्रणाम करना चाहिए। Navgrah Chalisa नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से ग्रहों की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। Navgrah Chalisa:नवग्रह चालीसा ॥ दोहा ॥श्री गणपति गुरुपद कमल,प्रेम सहित सिरनाय ।नवग्रह चालीसा कहत,शारद होत सहाय ॥ जय जय रवि शशि सोम बुध,जय गुरु भृगु शनि राज।जयति राहु अरु केतु ग्रह,करहुं अनुग्रह आज ॥ ॥ चौपाई ॥॥ श्री सूर्य स्तुति ॥प्रथमहि रवि कहं नावौं माथा,करहुं कृपा जनि जानि अनाथा ।हे आदित्य दिवाकर भानू,मैं मति मन्द महा अज्ञानू ।अब निज जन कहं हरहु कलेषा,दिनकर द्वादश रूप दिनेशा ।नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर,अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर । ॥ श्री चन्द्र स्तुति ॥शशि मयंक रजनीपति स्वामी,चन्द्र कलानिधि नमो नमामि ।राकापति हिमांशु राकेशा,प्रणवत जन तन हरहुं कलेशा ।सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर,शीत रश्मि औषधि निशाकर ।तुम्हीं शोभित सुन्दर भाल महेशा,शरण शरण जन हरहुं कलेशा । ॥ श्री मंगल स्तुति ॥जय जय जय मंगल सुखदाता,लोहित भौमादिक विख्याता ।अंगारक कुज रुज ऋणहारी,करहुं दया यही विनय हमारी ।हे महिसुत छितिसुत सुखराशी,लोहितांग जय जन अघनाशी ।अगम अमंगल अब हर लीजै,सकल मनोरथ पूरण कीजै । ॥ श्री बुध स्तुति ॥जय शशि नन्दन बुध महाराजा,करहु सकल जन कहं शुभ काजा ।दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना,कठिन कष्ट हरि करि कल्याणा ।हे तारासुत रोहिणी नन्दन,चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन ।पूजहिं आस दास कहुं स्वामी,प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी । ॥ श्री बृहस्पति स्तुति ॥जयति जयति जय श्री गुरुदेवा,करूं सदा तुम्हरी प्रभु सेवा ।देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी,इन्द्र पुरोहित विद्यादानी ।वाचस्पति बागीश उदारा,जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा ।विद्या सिन्धु अंगिरा नामा,करहुं सकल विधि पूरण कामा । ॥ श्री शुक्र स्तुति ॥शुक्र देव पद तल जल जाता,दास निरन्तन ध्यान लगाता ।हे उशना भार्गव भृगु नन्दन,दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन ।भृगुकुल भूषण दूषण हारी,हरहुं नेष्ट ग्रह करहुं सुखारी ।तुहि द्विजबर जोशी सिरताजा,नर शरीर के तुमही राजा । ॥ श्री शनि स्तुति ॥जय श्री शनिदेव रवि नन्दन,जय कृष्णो सौरी जगवन्दन ।पिंगल मन्द रौद्र यम नामा,वप्र आदि कोणस्थ ललामा ।वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा,क्षण महं करत रंक क्षण राजा ।ललत स्वर्ण पद करत निहाला,हरहुं विपत्ति छाया के लाला । ॥ श्री राहु स्तुति ॥जय जय राहु गगन प्रविसइया,तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया ।रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा,शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा ।सैहिंकेय तुम निशाचर राजा,अर्धकाय जग राखहु लाजा ।यदि ग्रह समय पाय हिं आवहु,सदा शान्ति और सुख उपजावहु । ॥ श्री केतु स्तुति ॥जय श्री केतु कठिन दुखहारी,करहु सुजन हित मंगलकारी ।ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला,घोर रौद्रतन अघमन काला ।शिखी तारिका ग्रह बलवान,महा प्रताप न तेज ठिकाना ।वाहन मीन महा शुभकारी,दीजै शान्ति दया उर धारी । ॥ नवग्रह शांति फल ॥तीरथराज प्रयाग सुपासा,बसै राम के सुन्दर दासा ।ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी,दुर्वासाश्रम जन दुख हारी ।नवग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु,जन तन कष्ट उतारण सेतू ।जो नित पाठ करै चित लावै,सब सुख भोगि परम पद पावै ॥ ॥ दोहा ॥धन्य नवग्रह देव प्रभु,महिमा अगम अपार ।चित नव मंगल मोद गृह,जगत जनन सुखद्वार ॥ यह चालीसा नवोग्रह,विरचित सुन्दरदास ।पढ़त प्रेम सुत बढ़त सुख,सर्वानन्द हुलास ॥ ॥ इति श्री नवग्रह चालीसा ॥

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Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा

Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा: भगवान विष्णु की भक्ति का एक मार्ग Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा भगवान विष्णु की स्तुति में लिखा गया एक भक्ति गीत है। यह चालीसा भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों और उनके गुणों का वर्णन करता है। भक्तजन इस चालीसा का पाठ करते हुए Vishnu Chalisa भगवान विष्णु से आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा की विशेषताएं: Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा का पाठ कैसे करें? विष्णु चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके भगवान विष्णु के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए। Vishnu Chalisa नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है और आत्मिक शक्ति मिलती है। Vishnu Chalisa:विष्णु चालीसा ॥ दोहा॥विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय । ॥ चौपाई ॥नमो विष्णु भगवान खरारी ।कष्ट नशावन अखिल बिहारी ॥ प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी ।त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥ सुन्दर रूप मनोहर सूरत ।सरल स्वभाव मोहनी मूरत ॥ तन पर पीतांबर अति सोहत ।बैजन्ती माला मन मोहत ॥4॥ शंख चक्र कर गदा बिराजे ।देखत दैत्य असुर दल भाजे ॥ सत्य धर्म मद लोभ न गाजे ।काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥ संतभक्त सज्जन मनरंजन ।दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ॥ सुख उपजाय कष्ट सब भंजन ।दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥8॥ पाप काट भव सिंधु उतारण ।कष्ट नाशकर भक्त उबारण ॥ करत अनेक रूप प्रभु धारण ।केवल आप भक्ति के कारण ॥ धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा ।तब तुम रूप राम का धारा ॥ भार उतार असुर दल मारा ।रावण आदिक को संहारा ॥12॥ आप वराह रूप बनाया ।हरण्याक्ष को मार गिराया ॥ धर मत्स्य तन सिंधु बनाया ।चौदह रतनन को निकलाया ॥ अमिलख असुरन द्वंद मचाया ।रूप मोहनी आप दिखाया ॥ देवन को अमृत पान कराया ।असुरन को छवि से बहलाया ॥16॥ कूर्म रूप धर सिंधु मझाया ।मंद्राचल गिरि तुरत उठाया ॥ शंकर का तुम फन्द छुड़ाया ।भस्मासुर को रूप दिखाया ॥ वेदन को जब असुर डुबाया ।कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया ॥ मोहित बनकर खलहि नचाया ।उसही कर से भस्म कराया ॥20॥ असुर जलंधर अति बलदाई ।शंकर से उन कीन्ह लडाई ॥ हार पार शिव सकल बनाई ।कीन सती से छल खल जाई ॥ सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी ।बतलाई सब विपत कहानी ॥ तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी ।वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥24॥ देखत तीन दनुज शैतानी ।वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ॥ हो स्पर्श धर्म क्षति मानी ।हना असुर उर शिव शैतानी ॥ तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे ।हिरणाकुश आदिक खल मारे ॥ गणिका और अजामिल तारे ।बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥28॥ हरहु सकल संताप हमारे ।कृपा करहु हरि सिरजन हारे ॥ देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे ।दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥ चहत आपका सेवक दर्शन ।करहु दया अपनी मधुसूदन ॥ जानूं नहीं योग्य जप पूजन ।होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥32॥ शीलदया सन्तोष सुलक्षण ।विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ॥ करहुं आपका किस विधि पूजन ।कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥ करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण ।कौन भांति मैं करहु समर्पण ॥ सुर मुनि करत सदा सेवकाई ।हर्षित रहत परम गति पाई ॥36॥ दीन दुखिन पर सदा सहाई ।निज जन जान लेव अपनाई ॥ पाप दोष संताप नशाओ ।भव-बंधन से मुक्त कराओ ॥ सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ ।निज चरनन का दास बनाओ ॥ निगम सदा ये विनय सुनावै ।पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥40॥

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Best Time for Mala Jaap and Correct Rules:माला जपने का सही समय और सटीक नियम

Mala Jaap:माला जपने का सही समय और सटीक नियम | Best Time for Mala Jaap and Correct Rules Mala Jaap:माला जपना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो हमारे मन और आत्मा को शुद्ध करती है। सही समय और सही तरीके से माला जपने से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। आइए जानते हैं माला जपने का सही समय और उसके महत्वपूर्ण नियम। 1. Best Time for Mala Jaap | माला जपने का सही समय 2. माला जपने के सही नियम | Correct Rules for Mala Jaap 3. Additional Tips for Mala Jaap | माला जपने के अतिरिक्त सुझाव माला जपने के इन सरल और प्रभावी नियमों को अपनाकर आप अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और भी अधिक सार्थक बना सकते हैं। सही समय और सही नियमों का पालन करने से जप का असर कई गुना बढ़ जाता है।

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Ganga Chalisa:गंगा चालीसा

Ganga Chalisa:गंगा चालीसा: माँ गंगा की भक्ति और आशीर्वाद का मंत्र Ganga Chalisa:गंगा चालीसा माँ गंगा की स्तुति में लिखा गया एक भक्ति गीत है।Ganga Chalisa यह चालीसा माँ गंगा को जगदंबा, पापनाशिनी और मोक्षदायिनी के रूप में मानते हुए उनकी स्तुति करता है। यह चालीसा हिंदू धर्म में विशेषकर उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय है। Ganga Chalisa:गंगा चालीसा का महत्व: Ganga Chalisa:कब और कैसे पढ़ें: आप Ganga Chalisa गंगा चालीसा को किसी भी शुभ मुहूर्त में पढ़ सकते हैं। विशेषकर Ganga Chalisa गंगा स्नान के दिन या माँ गंगा से जुड़े किसी भी त्योहार पर इसका पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है। सनातन मान्यताओं के अनुसार, गंगा दुनिया की सबसे पवित्रतम नदी है। और गंगा नदी को माँ गंगा के नाम से सम्मानित किया गया है। शास्त्रों में इसे पतितपावनी अर्थात लोगों के पाप को धोने वाली नदी कहकर प्रशंसा की गई है| किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में गंगा जल काGanga Chalisa प्रयोग पूजा की बस्तुओं को पवित्र करने के लिए किया जाता है। Ganga Chalisa माँ गंगा की आरती के साथ भक्तजन गंगा चालीसा को भी अपनी पूजा में शामिल करते हैं। ॥दोहा॥जय जय जय जग पावनी,जयति देवसरि गंग ।जय शिव जटा निवासिनी,अनुपम तुंग तरंग ॥ ॥चौपाई॥जय जय जननी हराना अघखानी ।आनंद करनी गंगा महारानी ॥ जय भगीरथी सुरसरि माता ।कलिमल मूल डालिनी विख्याता ॥ जय जय जहानु सुता अघ हनानी ।भीष्म की माता जगा जननी ॥ धवल कमल दल मम तनु सजे ।लखी शत शरद चंद्र छवि लजाई ॥ ४ ॥ वहां मकर विमल शुची सोहें ।अमिया कलश कर लखी मन मोहें ॥ जदिता रत्ना कंचन आभूषण ।हिय मणि हर, हरानितम दूषण ॥ जग पावनी त्रय ताप नासवनी ।तरल तरंग तुंग मन भावनी ॥ जो गणपति अति पूज्य प्रधान ।इहूं ते प्रथम गंगा अस्नाना ॥ ८ ॥ ब्रह्मा कमंडल वासिनी देवी ।श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि ॥ साथी सहस्त्र सागर सुत तरयो ।गंगा सागर तीरथ धरयो ॥ अगम तरंग उठ्यो मन भवन ।लखी तीरथ हरिद्वार सुहावन ॥ तीरथ राज प्रयाग अक्षैवेता ।धरयो मातु पुनि काशी करवत ॥ १२ ॥ धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीधी ।तरनी अमिता पितु पड़ पिरही ॥ भागीरथी ताप कियो उपारा ।दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा ॥ जब जग जननी चल्यो हहराई ।शम्भु जाता महं रह्यो समाई ॥ वर्षा पर्यंत गंगा महारानी ।रहीं शम्भू के जाता भुलानी ॥ १६ ॥ पुनि भागीरथी शम्भुहीं ध्यायो ।तब इक बूंद जटा से पायो ॥ ताते मातु भें त्रय धारा ।मृत्यु लोक, नाभा, अरु पातारा ॥ गईं पाताल प्रभावती नामा ।मन्दाकिनी गई गगन ललामा ॥ मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी ।कलिमल हरनी अगम जग पावनि ॥ २० ॥ धनि मइया तब महिमा भारी ।धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी ॥ मातु प्रभवति धनि मंदाकिनी ।धनि सुर सरित सकल भयनासिनी ॥ पन करत निर्मल गंगा जल ।पावत मन इच्छित अनंत फल ॥ पुरव जन्म पुण्य जब जागत ।तबहीं ध्यान गंगा महं लागत ॥ २४ ॥ जई पगु सुरसरी हेतु उठावही ।तई जगि अश्वमेघ फल पावहि ॥ महा पतित जिन कहू न तारे ।तिन तारे इक नाम तिहारे ॥ शत योजन हूं से जो ध्यावहिं ।निशचाई विष्णु लोक पद पावहीं ॥ नाम भजत अगणित अघ नाशै ।विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे ॥ २८ ॥ जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना ।धर्मं मूल गंगाजल पाना ॥ तब गुन गुणन करत दुख भाजत ।गृह गृह सम्पति सुमति विराजत ॥ गंगहि नेम सहित नित ध्यावत ।दुर्जनहूं सज्जन पद पावत ॥ उद्दिहिन विद्या बल पावै ।रोगी रोग मुक्त हवे जावै ॥ ३२ ॥ गंगा गंगा जो नर कहहीं ।भूखा नंगा कभुहुह न रहहि ॥ निकसत ही मुख गंगा माई ।श्रवण दाबी यम चलहिं पराई ॥ महं अघिन अधमन कहं तारे ।भए नरका के बंद किवारें ॥ जो नर जपी गंग शत नामा ।सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा ॥ ३६ ॥ सब सुख भोग परम पद पावहीं ।आवागमन रहित ह्वै जावहीं ॥ धनि मइया सुरसरि सुख दैनि ।धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ॥ ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा ।सुन्दरदास गंगा कर दासा ॥ जो यह पढ़े गंगा चालीसा ।मिली भक्ति अविरल वागीसा ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥नित नए सुख सम्पति लहैं, धरें गंगा का ध्यान ।अंत समाई सुर पुर बसल, सदर बैठी विमान ॥ संवत भुत नभ्दिशी, राम जन्म दिन चैत्र ।पूरण चालीसा किया, हरी भक्तन हित नेत्र ॥

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Rama Ekadashi 2024:27 या 28 अक्टूबर, कब है रमा एकादशी? जानें सही डेट और शुभ मुहूर्त

Rama Ekadashi:रमा एकादशी 2024 में 28 अक्टूबर को मनाई जाएगी। यह एकादशी भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित होती है और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है, Rama Ekadashi जो दीपावली से चार दिन पहले होती है। इसे “रम्भा एकादशी” भी कहा जाता है। Rama Ekadashi:शुभ मुहूर्त: Rama Ekadashi:पूजा विधि: Rama Ekadashi 2024:व्रत के नियम: Rama Ekadashi:महत्व: Rama Ekadashi:रमा एकादशी का व्रत व्यक्ति के सभी पापों का नाश करता है और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। इसे रखने से आर्थिक समस्याओं का समाधान होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। Rama Ekadashi व्रत के पुण्य फल को हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञों के बराबर माना गया है। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति देता है, बल्कि जीवन में शांति और समृद्धि लाता है। रमा एकादशी से जुड़ी एक प्रमुख कथा राजा मुचुकुंद और उनकी पुत्री चंद्रभागा से संबंधित है। इस व्रत का पालन करने से राजा के दामाद शोभन को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और व्रत की महिमा का महत्व बताता है कि यह न केवल सांसारिक जीवन में लाभ देता है बल्कि मृत्यु के बाद भी व्यक्ति को पुण्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है कथा- रमा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा के अनुसार प्राचीन काल में मुचकुंद नाम का एक राजा था। Rama Ekadashi उसकी इंद्र के साथ मित्रता थी और साथ ही यम, कुबेर, वरुण और विभीषण भी उसके मित्र थे। यह राजा बड़ा धर्मात्मा, विष्णुभक्त और न्याय के साथ राज करता था। उस राजा की एक कन्या थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उस कन्या का विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था।  एक समय वह शोभन ससुराल आया। उन्हीं दिनों जल्दी ही पुण्यदायिनी एकादशी ‘रमा’ भी आने वाली थी। जब व्रत का दिन समीप आ गया तो चंद्रभागा के मन में अत्यंत सोच उत्पन्न हुआ कि मेरे पति अत्यंत दुर्बल हैं Rama Ekadashi और मेरे पिता की आज्ञा अति कठोर है। दशमी को राजा ने ढोल बजवा कर सारे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। ढोल की घोषणा सुनते ही शोभन को अत्यंत चिंता हुई और अपनी पत्नी से कहा कि हे प्रिये! अब क्या करना चाहिए, मैं किसी प्रकार भी भूख सहन नहीं कर सकूंगा। ऐसा उपाय बताओ कि जिससे मेरे प्राण बच सकें, अन्यथा मेरे प्राण अवश्य चले जाएंगे।  चंद्रभागा कहने लगी कि हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। Rama Ekadashi हाथी, घोड़ा, ऊंट, बिल्ली, गौ आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं कर सकते, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है। यदि आप भोजन करना चाहते हैं तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहीं रहना चाहते हैं तो आपको अवश्य व्रत करना पड़ेगा। ऐसा सुनकर शोभन कहने लगा कि हे प्रिये! मैं अवश्य व्रत करूंगा, Rama Ekadashi जो भाग्य में होगा, वह देखा जाएगा। इस प्रकार से विचार कर शोभन ने व्रत रख लिया और वह भूख व प्यास से अत्यंत पीड़ित होने लगा। जब सूर्य नारायण अस्त हो गए और रात्रि को जागरण का समय आया जो वैष्णवों को अत्यंत हर्ष देने वाला था, परंतु शोभन के लिए अत्यंत दु:खदायी हुआ। प्रात:काल होते शोभन के प्राण निकल गए। तब राजा ने सुगंधित काष्ठ से उसका दाह संस्कार करवाया। परंतु चंद्रभागा ने अपने पिता की आज्ञा से अपने शरीर को दग्ध नहीं किया और शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के बाद अपने पिता के घर में ही रहने लगी।  रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से युक्त तथा शत्रुओं से रहित एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ। वह अत्यंत सुंदर रत्न और वैदूर्यमणि जटित स्वर्ण के खंभों पर निर्मित अनेक प्रकार की स्फटिक मणियों से सुशोभित भवन में बहुमूल्य वस्त्राभूषणों तथा छत्र व चंवर से विभूषित, गंधर्व और अप्सराओं से युक्त सिंहासन पर आरूढ़ ऐसा शोभायमान होता था मानो दूसरा इंद्र विराजमान हो।  एक समय मुचुकुंद नगर में रहने वाले एक सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ घूमता-घूमता उधर जा निकला और उसने शोभन को पहचान कर कि यह तो राजा का जमाई शोभन है, Rama Ekadashi उसके निकट गया। शोभन भी उसे पहचान कर अपने आसन से उठकर उसके पास आया और प्रणामादि करके कुशल प्रश्न किया।  ब्राह्मण ने कहा कि राजा मुचुकुंद और आपकी पत्नी कुशल से हैं। नगर में भी सब प्रकार से कुशल हैं, परंतु हे राजन! हमें आश्चर्य हो रहा है। आप अपना वृत्तांत कहिए कि ऐसा सुंदर नगर जो न कभी देखा, न सुना, आपको कैसे प्राप्त हुआ। तब शोभन बोला कि कार्तिक कृष्ण की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह नगर प्राप्त हुआ, परंतु यह अस्थिर है। यह स्थिर हो जाए ऐसा उपाय कीजिए।  ब्राह्मण कहने लगा कि हे राजन! यह स्थिर क्यों नहीं है और कैसे स्थिर हो सकता है आप बताइए, फिर मैं अवश्यमेव वह उपाय करूंगा। मेरी इस बात को आप मिथ्या न समझिए। शोभन ने कहा कि मैंने इस व्रत को श्रद्धा रहित होकर किया है। अत: यह सब कुछ अस्थिर है। यदि आप मुचुकुंद की कन्या चंद्रभागा को यह सब वृत्तांत कहें तो यह स्थिर हो सकता है। ऐसा सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने नगर लौटकर चंद्रभागा से सब वृत्तांत कह सुनाया।  ब्राह्मण के वचन सुनकर चंद्रभागा बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण से कहने लगी कि हे ब्राह्मण! ये सब बातें आपने प्रत्यक्ष देखी हैं या स्वप्न की बातें कर रहे हैं। ब्राह्मण कहने लगा कि हे पुत्री! मैंने महावन में तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है। साथ ही किसी से विजय न हो ऐसा देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिर नहीं है।  जिस प्रकार वह स्थिर रह सके सो उपाय करना चाहिए। चंद्रभागा कहने लगी हे विप्र! तुम मुझे वहां ले चलो, मुझे पतिदेव के दर्शन की तीव्र लालसा है। मैं अपने किए हुए पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूंगी। आप ऐसा कार्य कीजिए जिससे उनका हमारा संयोग हो क्योंकि वियोगी को मिला देना महान पुण्य है।  ब्राह्मण सोम शर्मा यह बात सुनकर चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर गया।

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करवा चौथ माता की आरती karwa mata ki aarti

करवा चौथ माता की आरती〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।। ओम जय करवा मैया। सब जग की हो माता, तुम हो रुद्राणी।यश तुम्हारा गावत, जग के सब प्राणी।।कार्तिक कृष्ण चतुर्थी, जो नारी व्रत करती।दीर्घायु पति होवे , दुख सारे हरती।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया। जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।होए सुहागिन नारी, सुख संपत्ति पावे। गणपति जी बड़े दयालु, विघ्न सभी नाशे।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया। जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।करवा मैया की आरती, व्रत कर जो गावे। व्रत हो जाता पूरन, सब विधि सुख पावे।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया। जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।

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करवा चौथ कथा karwa chauth vrat katha

करवा चौथ प्रथम कथा〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। चूँकि चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है। सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चतुर्थी का चाँद उदित हो रहा हो।इसके बाद भाई अपनी बहन को बताता है कि चाँद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चाँद को देखती है, उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है। वह पहला टुकड़ा मुँह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुँह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बौखला जाती है। उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं और उन्होंने ऐसा किया है।सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर करवा चौथ का दिन आता है। उसकी सभी भाभियाँ करवा चौथ का व्रत रखती हैं। जब भाभियाँ उससे आशीर्वाद लेने आती हैं तो वह प्रत्येक भाभी से ‘यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो’ ऐसा आग्रह करती है, लेकिन हर बार भाभी उसे अगली भाभी से आग्रह करने का कह चली जाती है। इस प्रकार जब छठे नंबर की भाभी आती है तो करवा उससे भी यही बात दोहराती है। यह भाभी उसे बताती है कि चूँकि सबसे छोटे भाई की वजह से उसका व्रत टूटा था अतः उसकी पत्नी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को दोबारा जीवित कर सकती है, इसलिए जब वह आए तो तुम उसे पकड़ लेना और जब तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न कर दे, उसे नहीं छोड़ना। ऐसा कह के वह चली जाती है। सबसे अंत में छोटी भाभी आती है। करवा उनसे भी सुहागिन बनने का आग्रह करती है, लेकिन वह टालमटोली करने लगती है। इसे देख करवा उन्हें जोर से पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए कहती है। भाभी उससे छुड़ाने के लिए नोचती है, खसोटती है, लेकिन करवा नहीं छोड़ती है। अंत में उसकी तपस्या को देख भाभी पसीज जाती है और अपनी छोटी अँगुली को चीरकर उसमें से अमृत उसके पति के मुँह में डाल देती है। करवा का पति तुरंत श्रीगणेश-श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार प्रभु कृपा से उसकी छोटी भाभी के माध्यम से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है। हे श्री गणेश माँ गौरी जिस प्रकार करवा को चिर सुहागन का वरदान आपसे मिला है, वैसा ही सब सुहागिनों को मिले।

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Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा

Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा: ज्ञान और प्रकाश की देवी का स्तुति गीत Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा वेदों की सबसे महत्वपूर्ण मंत्रों में से एक, गायत्री मंत्र की महिमा का वर्णन करने वाला एक भक्ति गीत है। यह चालीसा देवी गायत्री के विभिन्न रूपों, लीलाओं और गुणों का वर्णन करती है। Gayatri Chalisa इसे पढ़ने या सुनने से मन शांत होता है, बुद्धि तेज होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा का महत्व Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा के कुछ प्रमुख बिंदु Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा का पाठ कैसे करें? Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा का पाठ करते समय मन को शांत रखें और देवी गायत्री की भक्ति में लीन हो जाएं। आप इसे सुबह या शाम के समय कर सकते हैं। यहां एक उदाहरण दिया गया है: Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा ॥ दोहा ॥हीं श्रीं, क्लीं, मेधा, प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड ।शांति, क्रांति, जागृति, प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड ॥जगत जननि, मंगल करनि, गायत्री सुखधाम ।प्रणवों सावित्री, स्वधा, स्वाहा पूरन काम ॥ ॥ चालीसा ॥भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी ।गायत्री नित कलिमल दहनी ॥१॥ अक्षर चौबिस परम पुनीता ।इनमें बसें शास्त्र, श्रुति, गीता ॥ शाश्वत सतोगुणी सतरुपा ।सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥ हंसारुढ़ सितम्बर धारी ।स्वर्णकांति शुचि गगन बिहारी ॥४॥ पुस्तक पुष्प कमंडलु माला ।शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥ ध्यान धरत पुलकित हिय होई ।सुख उपजत, दुःख दुरमति खोई ॥ कामधेनु तुम सुर तरु छाया ।निराकार की अदभुत माया ॥ तुम्हरी शरण गहै जो कोई ।तरै सकल संकट सों सोई ॥८॥ सरस्वती लक्ष्मी तुम काली ।दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥ तुम्हरी महिमा पारन पावें ।जो शारद शत मुख गुण गावें ॥ चार वेद की मातु पुनीता ।तुम ब्रहमाणी गौरी सीता ॥ महामंत्र जितने जग माहीं ।कोऊ गायत्री सम नाहीं ॥१२॥ सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै ।आलस पाप अविघा नासै ॥ सृष्टि बीज जग जननि भवानी ।काल रात्रि वरदा कल्यानी ॥ ब्रहमा विष्णु रुद्र सुर जेते ।तुम सों पावें सुरता तेते ॥ तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे ।जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥१६॥ महिमा अपरम्पार तुम्हारी ।जै जै जै त्रिपदा भय हारी ॥ पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना ।तुम सम अधिक न जग में आना ॥ तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा ।तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेषा ॥ जानत तुमहिं, तुमहिं है जाई ।पारस परसि कुधातु सुहाई ॥२०॥ तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई ।माता तुम सब ठौर समाई ॥ ग्रह नक्षत्र ब्रहमाण्ड घनेरे ।सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥ सकलसृष्टि की प्राण विधाता ।पालक पोषक नाशक त्राता ॥ मातेश्वरी दया व्रत धारी ।तुम सन तरे पतकी भारी ॥२४॥ जापर कृपा तुम्हारी होई ।तापर कृपा करें सब कोई ॥ मंद बुद्घि ते बुधि बल पावें ।रोगी रोग रहित है जावें ॥ दारिद मिटै कटै सब पीरा ।नाशै दुःख हरै भव भीरा ॥ गृह कलेश चित चिंता भारी ।नासै गायत्री भय हारी ॥२८ ॥ संतिति हीन सुसंतति पावें ।सुख संपत्ति युत मोद मनावें ॥ भूत पिशाच सबै भय खावें ।यम के दूत निकट नहिं आवें ॥ जो सधवा सुमिरें चित लाई ।अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥ घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी ।विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥३२॥ जयति जयति जगदम्ब भवानी ।तुम सम और दयालु न दानी ॥ जो सदगुरु सों दीक्षा पावें ।सो साधन को सफल बनावें ॥ सुमिरन करें सुरुचि बड़भागी ।लहैं मनोरथ गृही विरागी ॥ अष्ट सिद्घि नवनिधि की दाता ।सब समर्थ गायत्री माता ॥३६॥ ऋषि, मुनि, यती, तपस्वी, जोगी ।आरत, अर्थी, चिंतित, भोगी ॥ जो जो शरण तुम्हारी आवें ।सो सो मन वांछित फल पावें ॥ बल, बुद्घि, विघा, शील स्वभाऊ ।धन वैभव यश तेज उछाऊ ॥ सकल बढ़ें उपजे सुख नाना ।जो यह पाठ करै धरि ध्याना ॥४०॥ ॥ दोहा ॥यह चालीसा भक्तियुत, पाठ करे जो कोय ।तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय ॥

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Khatu Shyam Chalisa:खाटू श्याम चालीसा

Khatu Shyam Chalisa:खाटू श्याम चालीसा: भक्ति का अद्भुत संगम Khatu Shyam Chalisa:खाटू श्याम चालीसा भगवान श्री श्याम, जो भगवान कृष्ण के अवतार माने जाते हैं, की स्तुति में लिखा गया एक अत्यंत लोकप्रिय भक्ति गीत है। यह चालीसा भगवान श्याम के विभिन्न रूपों, लीलाओं और गुणों का वर्णन करती है। इसे पढ़ने या सुनने से मन शांत होता है और भक्तों में भगवान श्याम के प्रति अगाध श्रद्धा जागृत होती है। Khatu Shyam Chalisa:खाटू श्याम चालीसा का महत्व Khatu Shyam Chalisa:खाटू श्याम चालीसा के कुछ प्रमुख बिंदु Khatu Shyam Chalisa:खाटू श्याम चालीसा का पाठ कैसे करें? खाटू श्याम चालीसा का पाठ करते समय मन को शांत रखें और भगवान श्याम की भक्ति में लीन हो जाएं। आप इसे सुबह या शाम के समय कर सकते हैं। यहां एक उदाहरण दिया गया है: Khatu Shyam Chalisa:खाटू श्याम चालीसा ॥ दोहा॥श्री गुरु चरणन ध्यान धर,सुमीर सच्चिदानंद ।श्याम चालीसा भजत हूँ,रच चौपाई छंद । ॥ चौपाई ॥श्याम-श्याम भजि बारंबारा ।सहज ही हो भवसागर पारा ॥ इन सम देव न दूजा कोई ।दिन दयालु न दाता होई ॥ भीम सुपुत्र अहिलावाती जाया ।कही भीम का पौत्र कहलाया ॥ यह सब कथा कही कल्पांतर ।तनिक न मानो इसमें अंतर ॥बर्बरीक विष्णु अवतारा ।भक्तन हेतु मनुज तन धारा ॥ बासुदेव देवकी प्यारे ।जसुमति मैया नंद दुलारे ॥ मधुसूदन गोपाल मुरारी ।वृजकिशोर गोवर्धन धारी ॥ सियाराम श्री हरि गोबिंदा ।दिनपाल श्री बाल मुकुंदा ॥ दामोदर रण छोड़ बिहारी ।नाथ द्वारिकाधीश खरारी ॥ राधाबल्लभ रुक्मणि कंता ।गोपी बल्लभ कंस हनंता ॥ 10 मनमोहन चित चोर कहाए ।माखन चोरि-चारि कर खाए ॥ मुरलीधर यदुपति घनश्यामा ।कृष्ण पतित पावन अभिरामा ॥ मायापति लक्ष्मीपति ईशा ।पुरुषोत्तम केशव जगदीशा ॥ विश्वपति जय भुवन पसारा ।दीनबंधु भक्तन रखवारा ॥ प्रभु का भेद न कोई पाया ।शेष महेश थके मुनिराया ॥ नारद शारद ऋषि योगिंदरर ।श्याम-श्याम सब रटत निरंतर ॥ कवि कोदी करी कनन गिनंता ।नाम अपार अथाह अनंता ॥ हर सृष्टी हर सुग में भाई ।ये अवतार भक्त सुखदाई ॥ ह्रदय माहि करि देखु विचारा ।श्याम भजे तो हो निस्तारा ॥ कौर पढ़ावत गणिका तारी ।भीलनी की भक्ति बलिहारी ॥ 20 सती अहिल्या गौतम नारी ।भई श्रापवश शिला दुलारी ॥ श्याम चरण रज चित लाई ।पहुंची पति लोक में जाही ॥ अजामिल अरु सदन कसाई ।नाम प्रताप परम गति पाई ॥ जाके श्याम नाम अधारा ।सुख लहहि दुःख दूर हो सारा ॥ श्याम सलोवन है अति सुंदर ।मोर मुकुट सिर तन पीतांबर ॥ गले बैजंती माल सुहाई ।छवि अनूप भक्तन मान भाई ॥ श्याम-श्याम सुमिरहु दिन-राती ।श्याम दुपहरि कर परभाती ॥ श्याम सारथी जिस रथ के ।रोड़े दूर होए उस पथ के ॥ श्याम भक्त न कही पर हारा ।भीर परि तब श्याम पुकारा ॥ रसना श्याम नाम रस पी ले ।जी ले श्याम नाम के ही ले ॥ 30 संसारी सुख भोग मिलेगा ।अंत श्याम सुख योग मिलेगा ॥ श्याम प्रभु हैं तन के काले ।मन के गोरे भोले-भाले ॥ श्याम संत भक्तन हितकारी ।रोग-दोष अध नाशे भारी ॥ प्रेम सहित जब नाम पुकारा ।भक्त लगत श्याम को प्यारा ॥ खाटू में हैं मथुरावासी ।पारब्रह्म पूर्ण अविनाशी ॥ सुधा तान भरि मुरली बजाई ।चहु दिशि जहां सुनी पाई ॥ वृद्ध-बाल जेते नारि नर ।मुग्ध भये सुनि बंशी स्वर ॥ हड़बड़ कर सब पहुंचे जाई ।खाटू में जहां श्याम कन्हाई ॥ जिसने श्याम स्वरूप निहारा ।भव भय से पाया छुटकारा ॥ ॥ दोहा ॥श्याम सलोने संवारे,बर्बरीक तनुधार ।इच्छा पूर्ण भक्त की,करो न लाओ बार॥ इति श्री खाटू श्याम चालीसा ॥

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Shri Krishna Chalisa:श्री कृष्ण चालीसा

Shri Krishna Chalisa:श्री कृष्ण चालीसा: भक्ति का अमृत श्री कृष्ण चालीसा भगवान श्री कृष्ण की स्तुति में लिखा गया एक भक्ति गीत है। यह चालीसा भगवान कृष्ण के विभिन्न रूपों, लीलाओं और गुणों का वर्णन करती है। इसे पढ़ने या सुनने से मन शांत होता है और भक्ति भाव जागृत होता है। Shri Krishna Chalisa:श्री कृष्ण चालीसा का महत्व Shri Krishna Chalisa:श्री कृष्ण चालीसा के कुछ प्रमुख बिंदु Shri Krishna Chalisa:श्री कृष्ण चालीसा का पाठ कैसे करें? Shri Krishna Chalisa:श्री कृष्ण चालीसा का पाठ करते समय मन को शांत रखें और भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन हो जाएं। आप इसे सुबह या शाम के समय कर सकते हैं। यहां एक उदाहरण दिया गया है: Shri Krishna Chalisa:श्री कृष्ण चालीसा ॥ दोहा॥बंशी शोभित कर मधुर,नील जलद तन श्याम ।अरुण अधर जनु बिम्बफल,नयन कमल अभिराम ॥ पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख,पीताम्बर शुभ साज ।जय मनमोहन मदन छवि,कृष्णचन्द्र महाराज ॥ ॥ चौपाई ॥जय यदुनन्दन जय जगवन्दन ।जय वसुदेव देवकी नन्दन ॥ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे ।जय प्रभु भक्तन के दृग तारे ॥ जय नट-नागर नाग नथैया ।कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया ॥ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो ।आओ दीनन कष्ट निवारो ॥ वंशी मधुर अधर धरी तेरी ।होवे पूर्ण मनोरथ मेरो ॥ आओ हरि पुनि माखन चाखो ।आज लाज भारत की राखो ॥ गोल कपोल, चिबुक अरुणारे ।मृदु मुस्कान मोहिनी डारे ॥ रंजित राजिव नयन विशाला ।मोर मुकुट वैजयंती माला ॥ कुण्डल श्रवण पीतपट आछे ।कटि किंकणी काछन काछे ॥ नील जलज सुन्दर तनु सोहे ।छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे ॥10 मस्तक तिलक, अलक घुंघराले ।आओ कृष्ण बांसुरी वाले ॥ करि पय पान, पुतनहि तारयो ।अका बका कागासुर मारयो ॥ मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला ।भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला ॥ सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई ।मसूर धार वारि वर्षाई ॥ लगत-लगत ब्रज चहन बहायो ।गोवर्धन नखधारि बचायो ॥ लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई ।मुख महं चौदह भुवन दिखाई ॥ दुष्ट कंस अति उधम मचायो ।कोटि कमल जब फूल मंगायो ॥ नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें ।चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें ॥ करि गोपिन संग रास विलासा ।सबकी पूरण करी अभिलाषा ॥ केतिक महा असुर संहारयो ।कंसहि केस पकड़ि दै मारयो ॥20 मात-पिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहं राज दिलाई ॥ महि से मृतक छहों सुत लायो ।मातु देवकी शोक मिटायो ॥ भौमासुर मुर दैत्य संहारी ।लाये षट दश सहसकुमारी ॥ दै भिन्हीं तृण चीर सहारा ।जरासिंधु राक्षस कहं मारा ॥ असुर बकासुर आदिक मारयो ।भक्तन के तब कष्ट निवारियो ॥ दीन सुदामा के दुःख टारयो ।तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो ॥ प्रेम के साग विदुर घर मांगे ।दुर्योधन के मेवा त्यागे ॥ लखि प्रेम की महिमा भारी ।ऐसे श्याम दीन हितकारी ॥ भारत के पारथ रथ हांके ।लिए चक्र कर नहिं बल ताके ॥ निज गीता के ज्ञान सुनाये ।भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये ॥30 मीरा थी ऐसी मतवाली ।विष पी गई बजाकर ताली ॥ राना भेजा सांप पिटारी ।शालिग्राम बने बनवारी ॥ निज माया तुम विधिहिं दिखायो ।उर ते संशय सकल मिटायो ॥ तब शत निन्दा करी तत्काला ।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला ॥ जबहिं द्रौपदी टेर लगाई ।दीनानाथ लाज अब जाई ॥ तुरतहिं वसन बने ननन्दलाला ।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला ॥ अस नाथ के नाथ कन्हैया ।डूबत भंवर बचावत नैया ॥ सुन्दरदास आस उर धारी ।दयादृष्टि कीजै बनवारी ॥ नाथ सकल मम कुमति निवारो ।क्षमहु बेगि अपराध हमारो ॥ खोलो पट अब दर्शन दीजै ।बोलो कृष्ण कन्हैया की जै ॥40 ॥ दोहा ॥यह चालीसा कृष्ण का,पाठ करै उर धारि।अष्ट सिद्धि नवनिधि फल,लहै पदारथ चारि॥

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Dream Interpretation: सपने में इस तरह दिखें पैसे तो होता है धन लाभ, जानें इसके शुभ-अशुभ संकेत

Dream Interpretation:सपने हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा होते हैं, और कई बार हमारे अवचेतन मन की इच्छाओं, डर और आशाओं को प्रकट करते हैं। पुरानी मान्यताओं और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सपनों का एक खास महत्त्व होता है, और वे भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का संकेत भी दे सकते हैं। खासकर जब बात पैसे या धन से संबंधित सपनों की हो, तो इनका महत्व और भी बढ़ जाता है। धन से जुड़ी सपने हमें सुख, संपन्नता या आर्थिक स्थिति से संबंधित संकेत देते हैं। आइए जानते हैं कि सपने में पैसे देखना शुभ या अशुभ संकेत क्या दर्शाते हैं। 1. सपने में नकद धन देखना जब किसी व्यक्ति को सपने में नकद पैसे दिखाई देते हैं, तो इसे आमतौर पर शुभ संकेत माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नकद धन का सपना यह संकेत देता है कि निकट भविष्य में व्यक्ति को आर्थिक लाभ हो सकता है। Dream Interpretation यह सपना इस बात का प्रतीक होता है कि आपका परिश्रम और मेहनत रंग लाने वाली है, और आपको धन लाभ प्राप्त हो सकता है। अगर आप किसी व्यापार में हैं या नौकरी में हैं, तो यह सपना इंगित करता है कि आपके प्रयासों का अच्छा परिणाम जल्द ही मिलेगा। 2. सपने में सोने के सिक्के देखना सोने के सिक्कों को सपने में देखना बेहद शुभ माना जाता है। यह सपना इस बात का संकेत देता है कि व्यक्ति को न केवल आर्थिक लाभ मिलेगा, बल्कि उसके जीवन में सुख-समृद्धि और वैभव भी आएगा। सोना संपन्नता और समृद्धि का प्रतीक होता है, और इसे देखना यह दर्शाता है कि आपके जीवन में आर्थिक स्थिरता आने वाली है। Dream Interpretation साथ ही, यह सपना आपके सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में भी उन्नति का संकेत देता है। 3. सपने में पैसे खोना अगर सपने में आपको ऐसा महसूस होता है कि आपने पैसे खो दिए हैं, तो इसे अशुभ संकेत माना जाता है। इसका मतलब है कि आपको निकट भविष्य में आर्थिक नुकसान हो सकता है। Dream Interpretation यह सपना आपको यह चेतावनी देता है कि आपको अपने वित्तीय मामलों में अधिक सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। इस प्रकार के सपने व्यक्ति की चिंताओं और असुरक्षाओं को भी प्रकट करते हैं, और यह इंगित करता है कि आप अपनी आर्थिक स्थिति के प्रति चिंतित हैं। 4. सपने में किसी को पैसे देना जब आप सपने में किसी को पैसे दे रहे होते हैं, तो यह सपना मिश्रित संकेत देता है। एक तरफ, यह इस बात का प्रतीक हो सकता है कि आप किसी की सहायता करने के लिए तत्पर हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है। दूसरी ओर, यह सपना इस बात की भी ओर संकेत कर सकता है कि आप अपने संसाधनों को बिना सोचे-समझे खर्च कर रहे हैं। इसलिए, यह सपना इस बात का संकेत हो सकता है कि आपको अपने खर्चों पर नियंत्रण रखने की जरूरत है। 5. सपने में पैसे चोरी होना सपने में अगर आप देखते हैं कि आपके पैसे चोरी हो गए हैं, तो यह भी एक अशुभ संकेत होता है। यह सपना इस बात का प्रतीक है कि आपके जीवन में किसी प्रकार की धोखाधड़ी या छल का सामना करना पड़ सकता है। Dream Interpretation यह सपना आपको सतर्क करता है कि आपको अपने आसपास के लोगों और परिस्थितियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह सपना आपको यह चेतावनी भी देता है कि आप किसी के छलावे में न फंसें। 6. सपने में कागजी मुद्रा देखना कागजी मुद्रा, यानी नोटों को सपने में देखना भी धन लाभ का संकेत होता है। यह सपना इस बात का प्रतीक है कि आपको आर्थिक रूप से लाभ मिल सकता है। अगर आप कर्ज़ में हैं, तो यह सपना संकेत देता है कि Dream Interpretation आपका कर्ज जल्द ही चुकाया जा सकता है। इसके साथ ही, यह सपना आपको यह भी प्रेरित करता है कि आप अपने वित्तीय लक्ष्यों की ओर ध्यान दें और योजनाबद्ध तरीके से कार्य करें। 7. सपने में पैसे गिनना अगर आप सपने में पैसे गिनते हुए नजर आते हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि आप अपने जीवन में आर्थिक स्थिरता पाने के लिए प्रयत्नशील हैं। यह सपना आपकी वित्तीय स्थिति के प्रति आपकी जागरूकता और चिंताओं को दर्शाता है। Dream Interpretation साथ ही, यह इस बात का प्रतीक हो सकता है कि आप जल्द ही एक महत्वपूर्ण आर्थिक निर्णय लेने वाले हैं। अगर आपने सही निर्णय लिया, तो आपको आर्थिक लाभ हो सकता है। 8. सपने में बहुत सारी दौलत देखना जब कोई व्यक्ति सपने में बहुत सारी दौलत, जैसे कि सोना, चांदी या नोटों का अंबार देखता है, तो इसे बेहद शुभ माना जाता है। यह सपना इस बात का प्रतीक है Dream Interpretation कि आपका भविष्य उज्जवल है और आपको अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति हो सकती है। यह सपना यह भी संकेत देता है कि आपके जीवन में सफलता और समृद्धि का दौर आने वाला है। 9. सपने में गहने देखना गहनों को सपने में देखना भी धन लाभ का संकेत होता है। विशेष रूप से, अगर आप सोने या चांदी के गहने सपने में देखते हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि आपको जल्द ही धन प्राप्त हो सकता है। यह सपना समृद्धि और वैभव का प्रतीक होता है। इसके अलावा, यह आपके पारिवारिक जीवन में भी सुख-समृद्धि का संकेत देता है। 10. सपने में किसी से उधार लेना अगर आप सपने में किसी से उधार ले रहे हैं, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है Dream Interpretation कि आप अपने जीवन में किसी आर्थिक संकट का सामना कर सकते हैं। यह सपना आपको चेतावनी देता है कि आपको अपने वित्तीय मामलों में संयम और सोच-विचार से काम लेना चाहिए। निष्कर्ष: सपनों में पैसे या धन से संबंधित संकेतों का गहरा अर्थ होता है। वे आपके आर्थिक जीवन और मानसिक स्थिति को प्रतिबिंबित करते हैं। हालांकि, हर सपना व्यक्ति विशेष के अनुभव और मानसिक अवस्था पर आधारित होता है, Dream Interpretation इसलिए सपनों का अर्थ भी अलग-अलग हो सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सपनों का विश्लेषण करते समय व्यक्ति को अपने जीवन की परिस्थितियों और मानसिकता को ध्यान में

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Sita Chalisa:सीता चालीसा

Sita Chalisa:सीता चालीसा: आदर्श पत्नी और देवी का गुणगान Sita Chalisa:सीता चालीसा हिंदू धर्म में माता सीता की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। माता सीता को आदर्श पत्नी और देवी का दर्जा प्राप्त है। यह चालीसा भक्तों को माता सीता के करीब लाने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का एक माध्यम है। Sita Chalisa:सीता चालीसा का महत्व Sita Chalisa:सीता चालीसा पढ़ने का तरीका Sita Chalisa:सीता चालीसा ॥ दोहा ॥बन्दौ चरण सरोज निज जनक लली सुख धाम,राम प्रिय किरपा करें सुमिरौं आठों धाम ॥कीरति गाथा जो पढ़ें सुधरैं सगरे काम,मन मन्दिर बासा करें दुःख भंजन सिया राम ॥ ॥ चौपाई ॥राम प्रिया रघुपति रघुराई,बैदेही की कीरत गाई ॥ चरण कमल बन्दों सिर नाई,सिय सुरसरि सब पाप नसाई ॥ जनक दुलारी राघव प्यारी,भरत लखन शत्रुहन वारी ॥ दिव्या धरा सों उपजी सीता,मिथिलेश्वर भयो नेह अतीता ॥4 सिया रूप भायो मनवा अति,रच्यो स्वयंवर जनक महीपति ॥ भारी शिव धनु खींचै जोई,सिय जयमाल साजिहैं सोई ॥ भूपति नरपति रावण संगा,नाहिं करि सके शिव धनु भंगा ॥ जनक निराश भए लखि कारन,जनम्यो नाहिं अवनिमोहि तारन ॥8 यह सुन विश्वामित्र मुस्काए,राम लखन मुनि सीस नवाए ॥ आज्ञा पाई उठे रघुराई,इष्ट देव गुरु हियहिं मनाई ॥ जनक सुता गौरी सिर नावा,राम रूप उनके हिय भावा ॥ मारत पलक राम कर धनु लै,खंड खंड करि पटकिन भू पै ॥12 जय जयकार हुई अति भारी,आनन्दित भए सबैं नर नारी ॥ सिय चली जयमाल सम्हाले,मुदित होय ग्रीवा में डाले ॥ मंगल बाज बजे चहुँ ओरा,परे राम संग सिया के फेरा ॥ लौटी बारात अवधपुर आई,तीनों मातु करैं नोराई ॥16 कैकेई कनक भवन सिय दीन्हा,मातु सुमित्रा गोदहि लीन्हा ॥ कौशल्या सूत भेंट दियो सिय,हरख अपार हुए सीता हिय ॥ सब विधि बांटी बधाई,राजतिलक कई युक्ति सुनाई ॥ मंद मती मंथरा अडाइन,राम न भरत राजपद पाइन ॥20 कैकेई कोप भवन मा गइली,वचन पति सों अपनेई गहिली ॥ चौदह बरस कोप बनवासा,भरत राजपद देहि दिलासा ॥ आज्ञा मानि चले रघुराई,संग जानकी लक्षमन भाई ॥ सिय श्री राम पथ पथ भटकैं,मृग मारीचि देखि मन अटकै ॥24 राम गए माया मृग मारन,रावण साधु बन्यो सिय कारन ॥ भिक्षा कै मिस लै सिय भाग्यो,लंका जाई डरावन लाग्यो ॥ राम वियोग सों सिय अकुलानी,रावण सों कही कर्कश बानी ॥ हनुमान प्रभु लाए अंगूठी,सिय चूड़ामणि दिहिन अनूठी ॥28 अष्ठसिद्धि नवनिधि वर पावा,महावीर सिय शीश नवावा ॥ सेतु बाँधी प्रभु लंका जीती,भक्त विभीषण सों करि प्रीती ॥ चढ़ि विमान सिय रघुपति आए,भरत भ्रात प्रभु चरण सुहाए ॥ अवध नरेश पाई राघव से,सिय महारानी देखि हिय हुलसे ॥32 रजक बोल सुनी सिय बन भेजी,लखनलाल प्रभु बात सहेजी ॥ बाल्मीक मुनि आश्रय दीन्यो,लवकुश जन्म वहाँ पै लीन्हो ॥ विविध भाँती गुण शिक्षा दीन्हीं,दोनुह रामचरित रट लीन्ही ॥ लरिकल कै सुनि सुमधुर बानी,रामसिया सुत दुई पहिचानी ॥36 भूलमानि सिय वापस लाए,राम जानकी सबहि सुहाए ॥ सती प्रमाणिकता केहि कारन,बसुंधरा सिय के हिय धारन ॥ अवनि सुता अवनी मां सोई,राम जानकी यही विधि खोई ॥ पतिव्रता मर्यादित माता,सीता सती नवावों माथा ॥40 ॥ दोहा ॥जनकसुत अवनिधिया राम प्रिया लवमात,चरणकमल जेहि उन बसै सीता सुमिरै प्रात ॥

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