Dhanteras 2024 Date : 29 या 30 अक्टूबर, कब है धनतेरस का पर्व, जानें धनतेरस की सही तारीख, पूजा मुहूर्त और महत्व

Dhanteras 2024 :धनतेरस 2024 की तारीख और शुभ मुहूर्त जानने के लिए यहां जानकारी दी जा रही है। हिंदू धर्म में धनतेरस का विशेष महत्व है, क्योंकि यह त्योहार दीपावली के महोत्सव की शुरुआत करता है। इस दिन भगवान धनवंतरि और देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धनतेरस का पर्व धन-संपदा, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है। इस दिन लोग सोने, चांदी, बर्तन और नए सामानों की खरीदारी भी करते हैं। Dhanteras 2024:धनतेरस 2024 की तारीख Dhanteras 2024 :दीपावली का पर्व 5 दिनों का होता है, जिसकी शुरुआत धनतेरस से होती है और भाई दूज को समापन होता है। धनतेरस का पर्व हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर मनाया जाता है। धनतेरस के दिन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के जनक भगवान धन्वंतरि के साथ माता लक्ष्मी और कुबेर देवता की पूजा अर्चना की जाती है Dhanteras 2024 और इस त्योहार के अगले दिन छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान धन्वंतरि की पूजा उपासना करने से आरोग्य की प्राप्ति होती है और व्यक्ति ऊर्जावान रहता है।Dhanteras 2024 लेकिन साल 2024 में धनतेरस को लेकर बहुत असमंजस की स्थिति बनी हुई है, कुछ लोगों का कहना है कि धनतेरस का पर्व 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा तो कुछ लोग 30 अक्टूबर को यह पर्व मनाएंगे इसलिए आज हम आपको धनतेरस की सही तिथि के बारे में बताने जा रहे हैं। Dhanteras 2024 ka mahetwa:धनतेरस का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस यानी कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस वजह से इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी तिथि के नाम से जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु क अंशावतार माना जाता है। इस शुभ दिन पर भगवान धन्वंतरि के साथ विष्णु प्रिया माता लक्ष्मी, धन के देवता कुबेर और मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। भगवान धन्वंतरि जब समुद्र मंथन से प्रकट हुए थे, उनके हाथ में अमृत कलश होने की वजह से इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है। धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, झाड़ू, धनिया आदि खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि धनतेरस के दिन खरीदारी करने से धन में 13 गुणा वृद्धि होती है। साथ ही इस दिन वाहन और जमीन व प्रॉपर्टी आदि का सौदा भी कर सकते हैं। धनतेरस दो शब्दों से मिलकर बना है, पहला धन और दूसरा तेरस, जिसका अर्थ है कि धन का तेरह गुणा। भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने के कारण इस दिन को वैद्य समाज धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाता है। kab hai Dhanteras 2024 parv:कब है धनतेरस 2024 का पर्व? त्रयोदशी तिथि का आरंभ – 29 अक्टूबर, सुबह 10 बजकर 31 मिनट सेत्रयोदशी तिथि का समापन – 30 अक्टूबर, दोपहर 1 बजकर 15 मिनट तकउदया तिथि के अनुसार, धनतेरस का पर्व दिन मंगलवार 29 अक्टूबर 2024 को मनाया जाएगा। धनतेरस की पूजा हमेशा प्रदोष काल में की जाती है, भगवान धन्वंतरि की पूजा उपासना करने के साथ साथ दीपदान भी किया जाता है। साथ ही घर के मेन गेट, छत, नल के पास एक एक दीपक भी जलाया जाता है। घर के बाहर भी दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जलाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। Dhanteras 2024 mai kharidne ka subh muhurat:धनतेरस खरीदारी का शुभ मुहूर्तपहला खरीदारी का मुहूर्त – धनतेरस के दिन त्रिपुष्कर योग बन रहा है, इस योग में खरीदारी करना बहुत शुभ रहेगा। यह योग सुबह 6 बजकर 31 मिनट से अगले दिन तक 10 बजकर 31 मिनट पर रहेगा। इस योग में की गई खरीदारी करने से चीजों में तीन गुणा वृद्धि होती है। दूसरा खरीदारी का मुहूर्त – धनतेरस के दिन अभिजीत मुहूर्त बन रहा है और इस योग में खरीदारी करने से शुभ फल की प्राप्ति होगी। 29 अक्टूबर के दिन 11 बजकर 42 मिनट से दोपहर 12 बजकर 27 मिनट के बीच खरीदारी करें। Diwali 2024 Date and Time : दीपावली कब है, जानें धनतेरस, दिवाली, भाई दूज की सही तारीख Dhanteras 2024 puja vidhi:धनतेरस पूजा विधि धनतेरस पर भगवान धनवंतरि, मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। घरों को दीपों से सजाया जाता है, और प्रदोष काल (शाम के समय) में पूजा का विशेष महत्व होता है। यहां धनतेरस की पूजा विधि और कुछ विशेष उपाय बताए गए हैं: Dhanteras 2024 per kya kharide:क्या खरीदें धनतेरस पर? धनतेरस के दिन नए सामानों की खरीदारी की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन लोग मुख्य रूप से बर्तन, सोना-चांदी और आभूषण खरीदते हैं, लेकिन इसके अलावा भी कई वस्तुएं शुभ मानी जाती हैं: Dhanteras 2024:धनतेरस से जुड़े कुछ विशेष उपाय

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Saraswati Chalisa:सरस्वती चालीसा

Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा: ज्ञान की देवी की स्तुति Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा ज्ञान, संगीत और कला की देवी माता सरस्वती की स्तुति में गाया जाने वाला एक प्रसिद्ध चालीसा है। Saraswati Chalisa यह चालीसा विद्यार्थियों, लेखकों, कलाकारों और सभी उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो ज्ञान और बुद्धि प्राप्त करना चाहते हैं। Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा का महत्व Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा का पाठ कैसे करें? Saraswati Chalisa:श्री सरस्वती चालीसा के कुछ लाभ Saraswati Chalisa:सरस्वती चालीसा ॥ दोहा ॥जनक जननि पद्मरज,निज मस्तक पर धरि ।बन्दौं मातु सरस्वती,बुद्धि बल दे दातारि ॥ पूर्ण जगत में व्याप्त तव,महिमा अमित अनंतु।दुष्जनों के पाप को,मातु तु ही अब हन्तु ॥ ॥ चालीसा ॥जय श्री सकल बुद्धि बलरासी ।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥ जय जय जय वीणाकर धारी ।करती सदा सुहंस सवारी ॥ रूप चतुर्भुज धारी माता ।सकल विश्व अन्दर विख्याता ॥4 जग में पाप बुद्धि जब होती ।तब ही धर्म की फीकी ज्योति ॥ तब ही मातु का निज अवतारी ।पाप हीन करती महतारी ॥ वाल्मीकिजी थे हत्यारा ।तव प्रसाद जानै संसारा ॥ रामचरित जो रचे बनाई ।आदि कवि की पदवी पाई ॥8 कालिदास जो भये विख्याता ।तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥ तुलसी सूर आदि विद्वाना ।भये और जो ज्ञानी नाना ॥ तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा ।केव कृपा आपकी अम्बा ॥ करहु कृपा सोइ मातु भवानी ।दुखित दीन निज दासहि जानी ॥12 पुत्र करहिं अपराध बहूता ।तेहि न धरई चित माता ॥ राखु लाज जननि अब मेरी ।विनय करउं भांति बहु तेरी ॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा ।कृपा करउ जय जय जगदंबा ॥ मधुकैटभ जो अति बलवाना ।बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना ॥16 समर हजार पाँच में घोरा ।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ॥ मातु सहाय कीन्ह तेहि काला ।बुद्धि विपरीत भई खलहाला ॥ तेहि ते मृत्यु भई खल केरी ।पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ॥ चंड मुण्ड जो थे विख्याता ।क्षण महु संहारे उन माता ॥20 रक्त बीज से समरथ पापी ।सुरमुनि हदय धरा सब काँपी ॥ काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा ।बारबार बिन वउं जगदंबा ॥ जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा ।क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा ॥ भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई ।रामचन्द्र बनवास कराई ॥24 एहिविधि रावण वध तू कीन्हा ।सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा ॥ को समरथ तव यश गुन गाना ।निगम अनादि अनंत बखाना ॥ विष्णु रुद्र जस कहिन मारी ।जिनकी हो तुम रक्षाकारी ॥ रक्त दन्तिका और शताक्षी ।नाम अपार है दानव भक्षी ॥28 दुर्गम काज धरा पर कीन्हा ।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥ दुर्ग आदि हरनी तू माता ।कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥ नृप कोपित को मारन चाहे ।कानन में घेरे मृग नाहे ॥ सागर मध्य पोत के भंजे ।अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥32 भूत प्रेत बाधा या दुःख में ।हो दरिद्र अथवा संकट में ॥ नाम जपे मंगल सब होई ।संशय इसमें करई न कोई ॥ पुत्रहीन जो आतुर भाई ।सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ॥ करै पाठ नित यह चालीसा ।होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा ॥36 धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै ।संकट रहित अवश्य हो जावै ॥ भक्ति मातु की करैं हमेशा ।निकट न आवै ताहि कलेशा ॥ बंदी पाठ करें सत बारा ।बंदी पाश दूर हो सारा ॥ रामसागर बाँधि हेतु भवानी ।कीजै कृपा दास निज जानी ॥40 ॥दोहा॥मातु सूर्य कान्ति तव,अन्धकार मम रूप ।डूबन से रक्षा करहु,परूँ न मैं भव कूप ॥ बलबुद्धि विद्या देहु मोहि,सुनहु सरस्वती मातु ।राम सागर अधम को,आश्रय तू ही देदातु ॥

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Narmada Chalisa, Jai Jai Jai Narmada Bhawani:नर्मदा चालीसा – जय जय नर्मदा भवानी

Narmada Chalisa:नर्मदा चालीसा: पवित्र नर्मदा नदी की स्तुति Narmada Chalisa:नर्मदा माता हिंदू धर्म में एक बहुत ही पवित्र नदी मानी जाती है। इसे ‘रेवा’ के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा चालीसा इसी पवित्र नदी की स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। Narmada Chalisa:नर्मदा चालीसा का महत्व Narmada Chalisa:नर्मदा चालीसा का पाठ कैसे करें? नर्मदा चालीसा के कुछ लाभ Narmada Chalisa, Jai Jai Jai Narmada Bhawani:नर्मदा चालीसा – जय जय नर्मदा भवानी श्री नर्मदा चालीसा:॥ दोहा॥देवि पूजित, नर्मदा,महिमा बड़ी अपार ।चालीसा वर्णन करत,कवि अरु भक्त उदार॥ इनकी सेवा से सदा,मिटते पाप महान ।तट पर कर जप दान नर,पाते हैं नित ज्ञान ॥ ॥ चौपाई ॥जय-जय-जय नर्मदा भवानी,तुम्हरी महिमा सब जग जानी । अमरकण्ठ से निकली माता,सर्व सिद्धि नव निधि की दाता । कन्या रूप सकल गुण खानी,जब प्रकटीं नर्मदा भवानी । सप्तमी सुर्य मकर रविवारा,अश्वनि माघ मास अवतारा ॥4 वाहन मकर आपको साजैं,कमल पुष्प पर आप विराजैं । ब्रह्मा हरि हर तुमको ध्यावैं,तब ही मनवांछित फल पावैं । दर्शन करत पाप कटि जाते,कोटि भक्त गण नित्य नहाते । जो नर तुमको नित ही ध्यावै,वह नर रुद्र लोक को जावैं ॥8 मगरमच्छा तुम में सुख पावैं,अंतिम समय परमपद पावैं । मस्तक मुकुट सदा ही साजैं,पांव पैंजनी नित ही राजैं । कल-कल ध्वनि करती हो माता,पाप ताप हरती हो माता । पूरब से पश्चिम की ओरा,बहतीं माता नाचत मोरा ॥12 शौनक ऋषि तुम्हरौ गुण गावैं,सूत आदि तुम्हरौं यश गावैं । शिव गणेश भी तेरे गुण गवैं,सकल देव गण तुमको ध्यावैं । कोटि तीर्थ नर्मदा किनारे,ये सब कहलाते दु:ख हारे । मनोकमना पूरण करती,सर्व दु:ख माँ नित ही हरतीं ॥16 कनखल में गंगा की महिमा,कुरुक्षेत्र में सरस्वती महिमा । पर नर्मदा ग्राम जंगल में,नित रहती माता मंगल में । एक बार कर के स्नाना,तरत पिढ़ी है नर नारा । मेकल कन्या तुम ही रेवा,तुम्हरी भजन करें नित देवा ॥20 जटा शंकरी नाम तुम्हारा,तुमने कोटि जनों को है तारा । समोद्भवा नर्मदा तुम हो,पाप मोचनी रेवा तुम हो । तुम्हरी महिमा कहि नहीं जाई,करत न बनती मातु बड़ाई । जल प्रताप तुममें अति माता,जो रमणीय तथा सुख दाता ॥24 चाल सर्पिणी सम है तुम्हारी,महिमा अति अपार है तुम्हारी । तुम में पड़ी अस्थि भी भारी,छुवत पाषाण होत वर वारि । यमुना मे जो मनुज नहाता,सात दिनों में वह फल पाता । सरस्वती तीन दीनों में देती,गंगा तुरत बाद हीं देती ॥28 पर रेवा का दर्शन करकेमानव फल पाता मन भर के । तुम्हरी महिमा है अति भारी,जिसको गाते हैं नर-नारी । जो नर तुम में नित्य नहाता,रुद्र लोक मे पूजा जाता । जड़ी बूटियां तट पर राजें,मोहक दृश्य सदा हीं साजें ॥32 वायु सुगंधित चलती तीरा,जो हरती नर तन की पीरा । घाट-घाट की महिमा भारी,कवि भी गा नहिं सकते सारी । नहिं जानूँ मैं तुम्हरी पूजा,और सहारा नहीं मम दूजा । हो प्रसन्न ऊपर मम माता,तुम ही मातु मोक्ष की दाता ॥35 जो मानव यह नित है पढ़ता,उसका मान सदा ही बढ़ता । जो शत बार इसे है गाता,वह विद्या धन दौलत पाता । अगणित बार पढ़ै जो कोई,पूरण मनोकामना होई । सबके उर में बसत नर्मदा,यहां वहां सर्वत्र नर्मदा ॥40 ॥ दोहा ॥भक्ति भाव उर आनि के,जो करता है जाप । माता जी की कृपा से,दूर होत संताप॥॥ इति श्री नर्मदा चालीसा ॥

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Sheetala Chalisa:शीतला चालीसा

Sheetala Chalisa:शीतला माता चालीसा:शीतला माता की स्तुति Sheetala Chalisa:शीतला माता को रोगों की देवी के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि वे रोगों से रक्षा करती हैं Sheetala Chalisa और बुखार, चेचक आदि जैसी बीमारियों से छुटकारा दिलाती हैं। शीतला माता की पूजा विशेष रूप से बसंत पंचमी के दिन की जाती है। शीतला माता चालीसा उनकी स्तुति में गाया जाने वाला एक भक्ति गीत है। Sheetala Chalisa:शीतला माता चालीसा का महत्व Sheetala Chalisa:शीतला माता चालीसा का पाठ कैसे करें? Sheetala Chalisa:शीतला माता चालीसा के कुछ लाभ Sheetala Chalisa:शीतला चालीसा ॥ दोहा॥जय जय माता शीतला ,तुमहिं धरै जो ध्यान ।होय विमल शीतल हृदय,विकसै बुद्धी बल ज्ञान ॥ घट-घट वासी शीतला,शीतल प्रभा तुम्हार ।शीतल छइयां में झुलई,मइयां पलना डार ॥ ॥ चौपाई ॥जय-जय-जय श्री शीतला भवानी ।जय जग जननि सकल गुणधानी ॥ गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित ।पूरण शरदचंद्र समसाजित ॥ विस्फोटक से जलत शरीरा ।शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥ मात शीतला तव शुभनामा ।सबके गाढे आवहिं कामा ॥4॥ शोक हरी शंकरी भवानी ।बाल-प्राणक्षरी सुख दानी ॥ शुचि मार्जनी कलश करराजै ।मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥ चौसठ योगिन संग में गावैं ।वीणा ताल मृदंग बजावै ॥ नृत्य नाथ भैरौं दिखलावैं ।सहज शेष शिव पार ना पावैं ॥8॥ धन्य धन्य धात्री महारानी ।सुरनर मुनि तब सुयश बखानी ॥ ज्वाला रूप महा बलकारी ।दैत्य एक विस्फोटक भारी ॥ घर घर प्रविशत कोई न रक्षत ।रोग रूप धरी बालक भक्षत ॥ हाहाकार मच्यो जगभारी ।सक्यो न जब संकट टारी ॥12॥ तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा ।कर में लिये मार्जनी सूपा ॥ विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्हो ।मूसल प्रमाण बहुविधि कीन्हो ॥ बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा ।मैय्या नहीं भल मैं कछु कीन्हा ॥ अबनहिं मातु काहुगृह जइहौं ।जहँ अपवित्र वही घर रहि हो ॥16॥ अब भगतन शीतल भय जइहौं ।विस्फोटक भय घोर नसइहौं ॥ श्री शीतलहिं भजे कल्याना ।वचन सत्य भाषे भगवाना ॥ पूजन पाठ मातु जब करी है ।भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥ विस्फोटक भय जिहि गृह भाई ।भजै देवि कहँ यही उपाई ॥20॥ कलश शीतलाका सजवावै ।द्विज से विधीवत पाठ करावै ॥ तुम्हीं शीतला, जगकी माता ।तुम्हीं पिता जग की सुखदाता ॥ तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी ।नमो नमामी शीतले देवी ॥ नमो सुखकरनी दु:खहरणी ।नमो- नमो जगतारणि धरणी ॥24॥ नमो नमो त्रलोक्य वंदिनी ।दुखदारिद्रक निकंदिनी ॥ श्री शीतला , शेढ़ला, महला ।रुणलीहृणनी मातृ मंदला ॥ हो तुम दिगम्बर तनुधारी ।शोभित पंचनाम असवारी ॥ रासभ, खर , बैसाख सुनंदन ।गर्दभ दुर्वाकंद निकंदन ॥28॥ सुमिरत संग शीतला माई,जाही सकल सुख दूर पराई ॥ गलका, गलगन्डादि जुहोई ।ताकर मंत्र न औषधि कोई ॥ एक मातु जी का आराधन ।और नहिं कोई है साधन ॥ निश्चय मातु शरण जो आवै ।निर्भय मन इच्छित फल पावै ॥32॥ कोढी, निर्मल काया धारै ।अंधा, दृग निज दृष्टि निहारै ॥ बंध्या नारी पुत्र को पावै ।जन्म दरिद्र धनी होइ जावै ॥ मातु शीतला के गुण गावत ।लखा मूक को छंद बनावत ॥ यामे कोई करै जनि शंका ।जग मे मैया का ही डंका ॥36॥ भगत ‘कमल’ प्रभुदासा ।तट प्रयाग से पूरब पासा ॥ ग्राम तिवारी पूर मम बासा ।ककरा गंगा तट दुर्वासा ॥ अब विलंब मैं तोहि पुकारत ।मातृ कृपा कौ बाट निहारत ॥ पड़ा द्वार सब आस लगाई ।अब सुधि लेत शीतला माई ॥40॥ ॥ दोहा ॥यह चालीसा शीतला,पाठ करे जो कोय ।सपनें दुख व्यापे नही,नित सब मंगल होय ॥ बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल,भाल भल किंतू ।जग जननी का ये चरित,रचित भक्ति रस बिंतू ॥॥ इति श्री शीतला चालीसा ॥

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Shri Lakshmi Chalisa:श्री लक्ष्मी चालीसा

Shri Lakshmi Chalisa:श्री लक्ष्मी चालीसा: धन और समृद्धि की देवी का स्तुति गान Shri Lakshmi Chalisa:श्री लक्ष्मी चालीसा माँ लक्ष्मी, धन की देवी की स्तुति में गाया जाने वाला एक प्रसिद्ध चालीसा है। यह चालीसा भक्तों को धन, समृद्धि, सुख और शांति प्रदान करने के लिए माना जाता है। Shri Lakshmi Chalisa माना जाता है कि नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और धन की देवी की कृपा प्राप्त होती है। Shri Lakshmi Chalisa:श्री लक्ष्मी चालीसा का महत्व Shri Lakshmi Chalisa:श्री लक्ष्मी चालीसा का पाठ कैसे करें? Shri Lakshmi Chalisa:श्री लक्ष्मी चालीसा के कुछ लाभ Shri Lakshmi Chalisa:क्या आप श्री लक्ष्मी चालीसा के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं? जैसे कि इसके कुछ विशेष मंत्र या माँ लक्ष्मी के विभिन्न रूप? Shri Lakshmi Chalisa:श्री लक्ष्मी चालीसा ॥ दोहा॥मातु लक्ष्मी करि कृपा,करो हृदय में वास ।मनोकामना सिद्घ करि,परुवहु मेरी आस ॥ ॥ सोरठा॥यही मोर अरदास,हाथ जोड़ विनती करुं ।सब विधि करौ सुवास,जय जननि जगदंबिका ॥ ॥ चौपाई ॥सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही ।ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥ तुम समान नहिं कोई उपकारी ।सब विधि पुरवहु आस हमारी ॥ जय जय जगत जननि जगदम्बा ।सबकी तुम ही हो अवलम्बा ॥ तुम ही हो सब घट घट वासी ।विनती यही हमारी खासी ॥ जगजननी जय सिन्धु कुमारी ।दीनन की तुम हो हितकारी ॥ विनवौं नित्य तुमहिं महारानी ।कृपा करौ जग जननि भवानी ॥ केहि विधि स्तुति करौं तिहारी ।सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥ कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी ।जगजननी विनती सुन मोरी ॥ ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता ।संकट हरो हमारी माता ॥ क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो ।चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥ 10 चौदह रत्न में तुम सुखरासी ।सेवा कियो प्रभु बनि दासी ॥ जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा ।रुप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥ स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा ।लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥ तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं ।सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥ अपनाया तोहि अन्तर्यामी ।विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥ तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी ।कहं लौ महिमा कहौं बखानी ॥ मन क्रम वचन करै सेवकाई ।मन इच्छित वांछित फल पाई ॥तजि छल कपट और चतुराई ।पूजहिं विविध भांति मनलाई ॥ और हाल मैं कहौं बुझाई ।जो यह पाठ करै मन लाई ॥ ताको कोई कष्ट नोई ।मन इच्छित पावै फल सोई ॥ 20 त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि ।त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी ॥ जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै ।ध्यान लगाकर सुनै सुनावै ॥ ताकौ कोई न रोग सतावै ।पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥ पुत्रहीन अरु संपति हीना ।अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ॥ विप्र बोलाय कै पाठ करावै ।शंका दिल में कभी न लावै ॥ पाठ करावै दिन चालीसा ।ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥ सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै ।कमी नहीं काहू की आवै ॥ बारह मास करै जो पूजा ।तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥ प्रतिदिन पाठ करै मन माही ।उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं ॥ बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई ।लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥ 30 करि विश्वास करै व्रत नेमा ।होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा ॥ जय जय जय लक्ष्मी भवानी ।सब में व्यापित हो गुण खानी ॥ तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं ।तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं ॥ मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै ।संकट काटि भक्ति मोहि दीजै ॥ भूल चूक करि क्षमा हमारी ।दर्शन दजै दशा निहारी ॥ बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी ।तुमहि अछत दुःख सहते भारी ॥ नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में ।सब जानत हो अपने मन में ॥ रुप चतुर्भुज करके धारण ।कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥ केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई ।ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई ॥ ॥ दोहा॥त्राहि त्राहि दुख हारिणी,हरो वेगि सब त्रास ।जयति जयति जय लक्ष्मी,करो शत्रु को नाश ॥ रामदास धरि ध्यान नित,विनय करत कर जोर ।मातु लक्ष्मी दास पर,करहु दया की कोर ॥

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Vinay Chalisa – Baba Neeb Karori:विनय चालीसा – नीब करौरी बाबा

Baba Neeb Karori:नीब करौरी बाबा की विनय चालीसा: एक संक्षिप्त परिचय Baba Neeb Karori:नीब करौरी बाबा एक प्रसिद्ध संत थे, जिनके अनुयायी उन्हें भगवान हनुमान का अवतार मानते हैं। उनकी कृपा पाने के लिए भक्त उनके विभिन्न मंत्रों और चालीसों का जाप करते हैं। Baba Neeb Karori इनमें से एक है विनय चालीसा। Baba Neeb Karori:विनय चालीसा का महत्व Baba Neeb Karori:विनय चालीसा का पाठ कैसे करें? Baba Neeb Karori:विनय चालीसा के कुछ लाभ Vinay Chalisa – Baba Neeb Karori:विनय चालीसा – नीब करौरी बाबा ॥ दोहा ॥मैं हूँ बुद्धि मलीन अति ।श्रद्धा भक्ति विहीन ॥करूँ विनय कछु आपकी ।हो सब ही विधि दीन ॥ ॥ चौपाई ॥जय जय नीब करोली बाबा ।कृपा करहु आवै सद्भावा ॥ कैसे मैं तव स्तुति बखानू ।नाम ग्राम कछु मैं नहीं जानूँ ॥ जापे कृपा द्रिष्टि तुम करहु ।रोग शोक दुःख दारिद हरहु ॥ तुम्हरौ रूप लोग नहीं जानै ।जापै कृपा करहु सोई भानै ॥4॥ करि दे अर्पन सब तन मन धन ।पावै सुख अलौकिक सोई जन ॥ दरस परस प्रभु जो तव करई ।सुख सम्पति तिनके घर भरई ॥ जय जय संत भक्त सुखदायक ।रिद्धि सिद्धि सब सम्पति दायक ॥ तुम ही विष्णु राम श्री कृष्णा ।विचरत पूर्ण कारन हित तृष्णा ॥8॥ जय जय जय जय श्री भगवंता ।तुम हो साक्षात् हनुमंता ॥ कही विभीषण ने जो बानी ।परम सत्य करि अब मैं मानी ॥ बिनु हरि कृपा मिलहि नहीं संता ।सो करि कृपा करहि दुःख अंता ॥ सोई भरोस मेरे उर आयो ।जा दिन प्रभु दर्शन मैं पायो ॥12॥ जो सुमिरै तुमको उर माहि ।ताकि विपति नष्ट ह्वै जाहि ॥ जय जय जय गुरुदेव हमारे ।सबहि भाँति हम भये तिहारे ॥ हम पर कृपा शीघ्र अब करहु ।परम शांति दे दुःख सब हरहु ॥ रोक शोक दुःख सब मिट जावै ।जपै राम रामहि को ध्यावै ॥16॥ जा विधि होई परम कल्याणा ।सोई सोई आप देहु वरदाना ॥ सबहि भाँति हरि ही को पूजे ।राग द्वेष द्वंदन सो जूझे ॥ करै सदा संतन की सेवा ।तुम सब विधि सब लायक देवा ॥ सब कुछ दे हमको निस्तारो ।भवसागर से पार उतारो ॥20॥ मैं प्रभु शरण तिहारी आयो ।सब पुण्यन को फल है पायो ॥ जय जय जय गुरुदेव तुम्हारी ।बार बार जाऊं बलिहारी ॥ सर्वत्र सदा घर घर की जानो ।रूखो सूखो ही नित खानो ॥ भेष वस्त्र है सादा ऐसे ।जाने नहीं कोउ साधू जैसे ॥24॥ ऐसी है प्रभु रहनी तुम्हारी ।वाणी कहो रहस्यमय भारी ॥ नास्तिक हूँ आस्तिक ह्वै जावै ।जब स्वामी चेटक दिखलावै ॥ सब ही धर्मन के अनुयायी ।तुम्हे मनावै शीश झुकाई ॥ नहीं कोउ स्वारथ नहीं कोउ इच्छा ।वितरण कर देउ भक्तन भिक्षा ॥28॥ केही विधि प्रभु मैं तुम्हे मनाऊँ ।जासो कृपा-प्रसाद तव पाऊँ ॥ साधु सुजन के तुम रखवारे ।भक्तन के हो सदा सहारे ॥ दुष्टऊ शरण आनी जब परई ।पूरण इच्छा उनकी करई ॥ यह संतन करि सहज सुभाऊ ।सुनी आश्चर्य करई जनि काउ ॥32॥ ऐसी करहु आप अब दाया ।निर्मल होई जाइ मन और काया ॥ धर्म कर्म में रूचि होई जावे ।जो जन नित तव स्तुति गावै ॥ आवे सद्गुन तापे भारी ।सुख सम्पति सोई पावे सारी ॥ होय तासु सब पूरन कामा ।अंत समय पावै विश्रामा ॥36॥ चारि पदारथ है जग माहि ।तव कृपा प्रसाद कछु दुर्लभ नाही ॥ त्राहि त्राहि मैं शरण तिहारी ।हरहु सकल मम विपदा भारी ॥ धन्य धन्य बड़ भाग्य हमारो ।पावै दरस परस तव न्यारो ॥ कर्महीन अरु बुद्धि विहीना ।तव प्रसाद कछु वर्णन कीन्हा ॥40॥ ॥ दोहा ॥श्रद्धा के यह पुष्प कछु ।चरणन धरी सम्हार ॥कृपासिन्धु गुरुदेव प्रभु ।करी लीजै स्वीकार ॥

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Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा

Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा: शत्रु नाश और सिद्धि का मंत्र Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा एक शक्तिशाली स्तुति है जो हिंदू धर्म में देवी बगलामुखी को समर्पित है। Baglamukhi Chalia देवी बगलामुखी को शत्रु नाश करने वाली देवी माना जाता है Baglamukhi Chalia और उनके भक्तों को विजय और सफलता प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा का महत्व Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा का पाठ कैसे करें ध्यान रखने योग्य बातें Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा ॥ दोहा ॥सिर नवाइ बगलामुखी,लिखूं चालीसा आज ॥ कृपा करहु मोपर सदा,पूरन हो मम काज ॥ ॥ चौपाई ॥जय जय जय श्री बगला माता ।आदिशक्ति सब जग की त्राता ॥ बगला सम तब आनन माता ।एहि ते भयउ नाम विख्याता ॥ शशि ललाट कुण्डल छवि न्यारी ।असतुति करहिं देव नर-नारी ॥ पीतवसन तन पर तव राजै ।हाथहिं मुद्गर गदा विराजै ॥ 4 ॥ तीन नयन गल चम्पक माला ।अमित तेज प्रकटत है भाला ॥ रत्न-जटित सिंहासन सोहै ।शोभा निरखि सकल जन मोहै ॥ आसन पीतवर्ण महारानी ।भक्तन की तुम हो वरदानी ॥ पीताभूषण पीतहिं चन्दन ।सुर नर नाग करत सब वन्दन ॥ 8 ॥ एहि विधि ध्यान हृदय में राखै ।वेद पुराण संत अस भाखै ॥ अब पूजा विधि करौं प्रकाशा ।जाके किये होत दुख-नाशा ॥ प्रथमहिं पीत ध्वजा फहरावै ।पीतवसन देवी पहिरावै ॥ कुंकुम अक्षत मोदक बेसन ।अबिर गुलाल सुपारी चन्दन ॥ 12 ॥ माल्य हरिद्रा अरु फल पाना ।सबहिं चढ़इ धरै उर ध्याना ॥ धूप दीप कर्पूर की बाती ।प्रेम-सहित तब करै आरती ॥ अस्तुति करै हाथ दोउ जोरे ।पुरवहु मातु मनोरथ मोरे ॥ मातु भगति तब सब सुख खानी ।करहुं कृपा मोपर जनजानी ॥ 16 ॥ त्रिविध ताप सब दुख नशावहु ।तिमिर मिटाकर ज्ञान बढ़ावहु ॥ बार-बार मैं बिनवहुं तोहीं ।अविरल भगति ज्ञान दो मोहीं ॥ पूजनांत में हवन करावै ।सा नर मनवांछित फल पावै ॥ सर्षप होम करै जो कोई ।ताके वश सचराचर होई ॥ 20 ॥ तिल तण्डुल संग क्षीर मिरावै ।भक्ति प्रेम से हवन करावै ॥ दुख दरिद्र व्यापै नहिं सोई ।निश्चय सुख-सम्पत्ति सब होई ॥ फूल अशोक हवन जो करई ।ताके गृह सुख-सम्पत्ति भरई ॥ फल सेमर का होम करीजै ।निश्चय वाको रिपु सब छीजै ॥ 24 ॥ गुग्गुल घृत होमै जो कोई ।तेहि के वश में राजा होई ॥ गुग्गुल तिल संग होम करावै ।ताको सकल बंध कट जावै ॥ बीलाक्षर का पाठ जो करहीं ।बीज मंत्र तुम्हरो उच्चरहीं ॥ एक मास निशि जो कर जापा ।तेहि कर मिटत सकल संतापा ॥ 28 ॥ घर की शुद्ध भूमि जहं होई ।साध्का जाप करै तहं सोई ॥ सेइ इच्छित फल निश्चय पावै ।यामै नहिं कदु संशय लावै ॥ अथवा तीर नदी के जाई ।साधक जाप करै मन लाई ॥ दस सहस्र जप करै जो कोई ।सक काज तेहि कर सिधि होई ॥ 32 ॥ जाप करै जो लक्षहिं बारा ।ताकर होय सुयशविस्तारा ॥ जो तव नाम जपै मन लाई ।अल्पकाल महं रिपुहिं नसाई ॥ सप्तरात्रि जो पापहिं नामा ।वाको पूरन हो सब कामा ॥ नव दिन जाप करे जो कोई ।व्याधि रहित ताकर तन होई ॥ 36 ॥ ध्यान करै जो बन्ध्या नारी ।पावै पुत्रादिक फल चारी ॥ प्रातः सायं अरु मध्याना ।धरे ध्यान होवैकल्याना ॥ कहं लगि महिमा कहौं तिहारी ।नाम सदा शुभ मंगलकारी ॥ पाठ करै जो नित्या चालीसा ।तेहि पर कृपा करहिं गौरीशा ॥ 40 ॥ ॥ दोहा ॥सन्तशरण को तनय हूं,कुलपति मिश्र सुनाम ।हरिद्वार मण्डल बसूं ,धाम हरिपुर ग्राम ॥ उन्नीस सौ पिचानबे सन् की,श्रावण शुक्ला मास ।चालीसा रचना कियौ,तव चरणन को दास ॥

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Ahoi Ashtami 2024: महिलाएं क्यों पहनती हैं खास स्याहु माला? जानिए इसका धार्मिक महत्व

Ahoi Ashtami 2024: महिलाएं क्यों पहनती हैं खास स्याहु माला? जानिए इसका धार्मिक महत्व 🌸 Ahoi Ashtami एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जब माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन स्याहु माता की पूजा की जाती है और विशेष स्याहु माला को धारण किया जाता है। आइए जानें, इस माला का महत्व और इसे पहनने का धार्मिक कारण। Ahoi Ashtami का महत्व अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं स्याहु माता की पूजा करती हैं, जो संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद देती हैं। इस व्रत को संतान प्राप्ति के लिए भी किया जाता है, और मान्यता है कि स्याहु माता कभी भी अपनी भक्तों को निराश नहीं करतीं। यह व्रत विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो अपनी संतान की भलाई और उनके जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए पूजा करती हैं। स्याहु माला का धार्मिक महत्व अहोई अष्टमी पर स्याहु माला पहनना एक महत्वपूर्ण परंपरा है। यह माला आमतौर पर चांदी की होती है और इसे लाल या सफेद धागे में पिरोया जाता है, जिसमें स्याहु माता की तस्वीर और चांदी के मोती लगे होते हैं। हर साल माला में दो चांदी के मोती जोड़े जाते हैं, जो संतान की वृद्धि और उनकी सुरक्षा का प्रतीक हैं। इसे पहनने से माना जाता है कि स्याहु माता प्रसन्न होती हैं और संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद देती हैं। How to Worship Syahu Mata on Ahoi Ashtami स्याहु माला कब तक पहनें? इस माला को दिवाली तक पहना जाता है और फिर इसे संभालकर रख दिया जाता है। पूजा के दौरान रखा गया मिट्टी के घड़े का पानी दिवाली के दिन संतान को नहलाने के लिए उपयोग किया जाता है। यह माना जाता है कि यह स्याहु माता का आशीर्वाद होता है, जिससे संतान को लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य का वरदान मिलता है निष्कर्ष: Ahoi Ashtami का व्रत और स्याहु माला का धार्मिक महत्व माताओं के लिए बेहद खास है। इस दिन की पूजा और व्रत से संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 🌸 #AhoiAshtami2024 #SyahuMala #AhoiMata #SantanKiKhushhali #ReligiousTradition

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Ahoi Ashtami 2024: अहोई अष्टमी के दिन इस स्तोत्र का पाठ करने से मिलेगा सभी क्षेत्रों में सफलता

अहोई अष्टमी:धराधरेन्द्र नन्दिनी शशंक मालि संगिनी, सुरेश शक्ति वर्धिनी नितान्तकान्त कामिनी। निशाचरेन्द्र मर्दिनी त्रिशूल शूल धारिणी, मनोव्यथा विदारिणी शिव तनोतु पार्वती । भुजंग तल्प शामिनी महोग्रकान्त भागिनी, प्रकाश पुंज दायिनी विचित्र चित्र कारिणी। प्रचण्ड शत्रुधर्षिणी दया प्रवाह वर्षिणी, सदा सुभग्य दायिनी शिव तनोतु पार्वती। । प्रकृष्ट सृष्टि कारिका प्रचण्ड नृत्य नर्तिका , पिनाक पाणिधारिका गिरिश ऋग मालिका। समस्त भक्त पालिका पीयूष पूर्ण वर्षिका, कुभाग्य रेखमर्जिका शिव तनोतु पार्वती । तपश्चरी कुमारिका जगत्परा प्रहेलिका, विशुद्ध भाव साधिका सुधा सरित्प्रवाहिका। प्रयत्न पक्ष पौसिका सदार्धि भाव तोषिका, शनि ग्रहादि तर्जिका शिव तनोतु पार्वती । शुभंकरी शिवंकरी विभाकरी निशाचरी, नभश्चरी धराचरी समस्त सृष्टि संचरी । तमोहरी मनोहरी मृगांक मालि सुन्दरी, सदोगताप संचरी,शिवं तनोतु पार्वती।। पार्वती पंचक नित्यमधीयते यत कुमारिका, दृष्कृतं निखिलं हत्वा वरं प्रप्नोति सुन्दरम।। अहोई अष्टमी :पार्वती पंचक स्तोत्र: देवी पार्वती की स्तुति पार्वती पंचक स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है जो देवी पार्वती की स्तुति करता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए लाभदायक माना जाता है जो विवाह योग्य हैं या सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। यह स्तोत्र देवी पार्वती से सुंदर वर प्राप्त करने और दाम्पत्य जीवन में सुख-शांति लाने के लिए मांगा जाता है। अहोई अष्टमी:स्तोत्र का महत्व अहोई अष्टमी :स्तोत्र का पाठ पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ संस्कृत में होता है। आप इस स्तोत्र का पाठ किसी अनुभवी ब्राह्मण से करवा सकते हैं या स्वयं भी कर सकते हैं। स्तोत्र का अर्थ समझने के लिए आप हिंदी अनुवाद भी देख सकते हैं। अहोई अष्टमी:यहाँ स्तोत्र का एक अंश दिया गया है: धराधरेन्द्र नन्दिनी शशंक मालि संगिनी, सुरेश शक्ति वर्धिनी नितान्तकान्त कामिनी। निशाचरेन्द्र मर्दिनी त्रिशूल शूल धारिणी, मनोव्यथा विदारिणी शिव तनोतु पार्वती । अर्थ: धरती के स्वामी शंकर की पत्नी, चंद्रमा के साथ विहार करने वाली, देवों की शक्ति को बढ़ाने वाली, अत्यंत मनोहारी और कामना पूर्ण करने वाली, राक्षसों के चंद्रमा का नाश करने वाली, त्रिशूल धारण करने वाली, मन के दुःखों को दूर करने वाली, शिवजी पार्वती को प्रदान करें। अहोई अष्टमी:स्तोत्र का जाप कैसे करें अहोई अष्टमी:स्तोत्र के लाभ पार्वती पंचक स्तोत्र का नियमित जाप करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं, जैसे कि: यदि आप पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ करना चाहते हैं, तो आप किसी अनुभवी ब्राह्मण से संपर्क कर सकते हैं या फिर इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। अस्वीकरण: यह जानकारी केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले किसी विद्वान से सलाह लेना उचित होता है। क्या आप पार्वती पंचक स्तोत्र के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं? यदि आप स्तोत्र का पूरा पाठ, इसका हिंदी अनुवाद, या इसके जाप के तरीके के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, तो कृपया मुझे बताएं। आप यह भी पूछ सकते हैं: मुझे आपकी मदद करने में खुशी होगी।

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Ahoi Ashtami 2024 Bhog: संतान की खुशहाली और समृद्धि के लिए विशेष भोग

Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी 2024: संतान की खुशहाली और समृद्धि के लिए विशेष भोग Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जहाँ माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन विशेष भोग अहोई माता को अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें संतान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी 2024 के लिए विशेष भोग: भोग लगाते समय ध्यान रखने योग्य बातें: अहोई अष्टमी का महत्व: Ahoi Ashtami अहोई अष्टमी का व्रत माताओं के लिए संतान की दीर्घायु, सुख, और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस दिन माता अहोई का व्रत रखने से माना जाता है कि संतान के जीवन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और उनके जीवन में खुशियां आती हैं। व्रत के नियम: SEO के अनुसार उपयोगी टिप्स: निष्कर्ष: अहोई अष्टमी का व्रत और पूजा माता-पिता के लिए संतान की दीर्घायु और समृद्धि की कामना का एक पवित्र अवसर है। इस दिन के भोग और पूजा से संतान की सभी बाधाओं को दूर करने में सहायता मिलती है।

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Ram Chalisa:राम चालीसा

Ram Chalisa:श्री राम चालीसा: भगवान राम की स्तुति का एक पवित्र गीत Ram Chalisa:श्री राम चालीसा भगवान राम के प्रति भक्ति और श्रद्धा का एक प्रतीक है। यह चालीसा भगवान राम के जीवन, उनके कार्यों और उनके गुणों का वर्णन करती है। राम चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है Ram Chalisa और आत्मविश्वास बढ़ता है। Ram Chalisa:श्री राम चालीसा की विशेषताएं Ram Chalisa:श्री राम चालीसा का पाठ कैसे करें? Ram Chalisa श्री राम चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके भगवान राम के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए। Ram Chalisa नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है और आत्मिक शक्ति मिलती है। Ram Chalisa:राम चालीसा ॥ दोहा ॥आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनंवैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं ॥ चौपाई ॥श्री रघुबीर भक्त हितकारी ।सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥ निशि दिन ध्यान धरै जो कोई ।ता सम भक्त और नहिं होई ॥ ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥ जय जय जय रघुनाथ कृपाला ।सदा करो सन्तन प्रतिपाला ॥ दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ॥ तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला ।रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥ तुम अनाथ के नाथ गोसाईं ।दीनन के हो सदा सहाई ॥ ब्रह्मादिक तव पार न पावैं ।सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥ चारिउ वेद भरत हैं साखी ।तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥ गुण गावत शारद मन माहीं ।सुरपति ताको पार न पाहीं ॥ 10 ॥ नाम तुम्हार लेत जो कोई ।ता सम धन्य और नहिं होई ॥राम नाम है अपरम्पारा ।चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥ गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों ।तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ॥ शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।महि को भार शीश पर धारा ॥ फूल समान रहत सो भारा ।पावत कोउ न तुम्हरो पारा ॥ भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।तासों कबहुँ न रण में हारो ॥ नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा ।सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥ लषन तुम्हारे आज्ञाकारी ।सदा करत सन्तन रखवारी ॥ ताते रण जीते नहिं कोई ।युद्ध जुरे यमहूँ किन होई ॥ महा लक्ष्मी धर अवतारा ।सब विधि करत पाप को छारा ॥ 20 ॥ सीता राम पुनीता गायो ।भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥ घट सों प्रकट भई सो आई ।जाको देखत चन्द्र लजाई ॥ सो तुमरे नित पांव पलोटत ।नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥ सिद्धि अठारह मंगल कारी ।सो तुम पर जावै बलिहारी ॥ औरहु जो अनेक प्रभुताई ।सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥ इच्छा ते कोटिन संसारा ।रचत न लागत पल की बारा ॥ जो तुम्हरे चरनन चित लावै ।ताको मुक्ति अवसि हो जावै ॥ सुनहु राम तुम तात हमारे ।तुमहिं भरत कुल- पूज्य प्रचारे ॥ तुमहिं देव कुल देव हमारे ।तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥ जो कुछ हो सो तुमहीं राजा ।जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥ 30 ॥ रामा आत्मा पोषण हारे ।जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥ जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा ।निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥ सत्य सत्य जय सत्य- ब्रत स्वामी ।सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥ सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।सो निश्चय चारों फल पावै ॥ सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ॥ ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा ।नमो नमो जय जापति भूपा ॥ धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।नाम तुम्हार हरत संतापा ॥ सत्य शुद्ध देवन मुख गाया ।बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥ सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।तुमहीं हो हमरे तन मन धन ॥ याको पाठ करे जो कोई ।ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥ 40 ॥ आवागमन मिटै तिहि केरा ।सत्य वचन माने शिव मेरा ॥और आस मन में जो ल्यावै ।तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥ साग पत्र सो भोग लगावै ।सो नर सकल सिद्धता पावै ॥ अन्त समय रघुबर पुर जाई ।जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥ श्री हरि दास कहै अरु गावै ।सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥ ॥ दोहा ॥सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय ।हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ॥ राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय ।जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय ॥

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Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा

Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा: जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा जैन धर्म के पहले तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की स्तुति में लिखा गया एक भक्ति गीत है। यह चालीसा भगवान आदिनाथ के जीवन, उनके कर्मों और उनके उपदेशों का वर्णन करता है। Shri Aadinath Chalisa जैन धर्म में भगवान आदिनाथ को पहले तीर्थंकर होने के कारण बहुत सम्मान दिया जाता है। Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा की विशेषताएं Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ कैसे करें? Shri Aadinath Chalisa श्री आदिनाथ चालीसा का पाठ करते समय मन को एकाग्र करके भगवान आदिनाथ के चरणों में समर्पित हो जाना चाहिए। नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से मन शांत होता है Shri Aadinath Chalisa और आत्मिक शक्ति मिलती है। Shri Aadinath Chalisa:श्री आदिनाथ चालीसा ॥ दोहा॥शीश नवा अरिहंत को,सिद्धन को, करूं प्रणाम ।उपाध्याय आचार्य का,ले सुखकारी नाम ॥ सर्व साधु और सरस्वती,जिन मन्दिर सुखकार ।आदिनाथ भगवान को,मन मन्दिर में धार ॥ ॥ चौपाई ॥जै जै आदिनाथ जिन स्वामी ।तीनकाल तिहूं जग में नामी ॥ वेष दिगम्बर धार रहे हो ।कर्मो को तुम मार रहे हो ॥ हो सर्वज्ञ बात सब जानो ।सारी दुनियां को पहचानो ॥ नगर अयोध्या जो कहलाये ।राजा नाभिराज बतलाये ॥4॥ मरुदेवी माता के उदर से ।चैत वदी नवमी को जन्मे ॥ तुमने जग को ज्ञान सिखाया ।कर्मभूमी का बीज उपाया ॥ कल्पवृक्ष जब लगे बिछरने ।जनता आई दुखड़ा कहने ॥ सब का संशय तभी भगाया ।सूर्य चन्द्र का ज्ञान कराया ॥8॥ खेती करना भी सिखलाया ।न्याय दण्ड आदिक समझाया ॥ तुमने राज किया नीति का ।सबक आपसे जग ने सीखा ॥ पुत्र आपका भरत बताया ।चक्रवर्ती जग में कहलाया ॥ बाहुबली जो पुत्र तुम्हारे ।भरत से पहले मोक्ष सिधारे ॥12॥ सुता आपकी दो बतलाई ।ब्राह्मी और सुन्दरी कहलाई ॥ उनको भी विध्या सिखलाई ।अक्षर और गिनती बतलाई ॥ एक दिन राजसभा के अंदर ।एक अप्सरा नाच रही थी ॥ आयु उसकी बहुत अल्प थी ।इसलिए आगे नहीं नाच रही थी ॥16॥ विलय हो गया उसका सत्वर ।झट आया वैराग्य उमड़कर ॥ बेटो को झट पास बुलाया ।राज पाट सब में बंटवाया ॥ छोड़ सभी झंझट संसारी ।वन जाने की करी तैयारी ॥ राव हजारों साथ सिधाए ।राजपाट तज वन को धाये ॥20॥ लेकिन जब तुमने तप किना ।सबने अपना रस्ता लीना ॥ वेष दिगम्बर तजकर सबने ।छाल आदि के कपड़े पहने ॥ भूख प्यास से जब घबराये ।फल आदिक खा भूख मिटाये ॥ तीन सौ त्रेसठ धर्म फैलाये ।जो अब दुनियां में दिखलाये ॥24॥ छै: महीने तक ध्यान लगाये ।फिर भजन करने को धाये ॥ भोजन विधि जाने नहि कोय ।कैसे प्रभु का भोजन होय ॥ इसी तरह बस चलते चलते ।छः महीने भोजन बिन बीते ॥ नगर हस्तिनापुर में आये ।राजा सोम श्रेयांस बताए ॥28॥ याद तभी पिछला भव आया ।तुमको फौरन ही पड़धाया ॥ रस गन्ने का तुमने पाया ।दुनिया को उपदेश सुनाया ॥ पाठ करे चालीसा दिन ।नित चालीसा ही बार ॥ चांदखेड़ी में आय के ।खेवे धूप अपार ॥32॥ जन्म दरिद्री होय जो ।होय कुबेर समान ॥ नाम वंश जग में चले ।जिनके नहीं संतान ॥ तप कर केवल ज्ञान पाया ।मोक्ष गए सब जग हर्षाया ॥ अतिशय युक्त तुम्हारा मन्दिर ।चांदखेड़ी भंवरे के अंदर ॥36॥ उसका यह अतिशय बतलाया ।कष्ट क्लेश का होय सफाया ॥ मानतुंग पर दया दिखाई ।जंजीरे सब काट गिराई ॥ राजसभा में मान बढ़ाया ।जैन धर्म जग में फैलाया ॥ मुझ पर भी महिमा दिखलाओ ।कष्ट भक्त का दूर भगाओ ॥40॥ ॥ सोरठा ॥पाठ करे चालीसा दिन,नित चालीसा ही बार ।चांदखेड़ी में आय के,खेवे धूप अपार ॥ जन्म दरिद्री होय जो,होय कुबेर समान ।नाम वंश जग में चले,जिनके नहीं संतान ॥

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