SHIV

महाशिवरात्रि की पूजा में भगवान शिव को ये चीजें करें अर्पित, जीवन में नहीं आएंगी मुश्किलें

महाशिवरात्रि पूजा विधि: महाशिवरात्रि भगवान शिव का सबसे पवित्र त्यौहार है, जो हर साल फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन भक्तगण भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत रखते हैं। महाशिवरात्रि का पर्व इस साल 2024 में 8 मार्च दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा. इस दिन लोग व्रत रखकर भगवान शिव की विधान से पूजा-अर्चना करते हैं और घर परिवार में सुख-समृद्धि बनाए रखने के लिए प्रार्थना करते हैं. इस दिन महाशिवरात्रि की पूजा में भगवान शिव को बेलपत्र, भांग, मदार पुष्प, धतूरा, अक्षत्, चंदन आदि अर्पित किए जाते हैं ताकि भोलेनाथ को जल्दी प्रसन्न किया जा सके और महादेव प्रसन्न होकर हमारी मनोकामनाओं को पूरा करें. महाशिवरात्रि के अवसर पर आप भगवान भोलेनाथ को उनके प्रिय भोग लगाकर भी उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं. उनको भोग अर्पित करने से सुख, संतान की प्राप्ति होती है और दुख दूर होते हैं. महाशिवरात्रि के मौके पर भगवान शिव को भांग जरूर अर्पित करें. भगवान शिव को भांग इसलिए चढ़ाई जाती है कि जब शिव ने विष का पान किया था. तब उनके उपचार के लिए कई तरह की जड़ी बूटियों का इस्तेमाल किया गया था जिसमें भांग भी शामिल थी. इस वजह से हर साल शिवरात्रि के मौके पर भांग के पत्ते या भांग को पीसकर दूध या जल में घोलकर भोलनाथ का अभिषेक किया जाता है. इससे लोगों को रोग दोष के छुटकारा मिलता है. पूजन सामग्री: पूजन विधि: व्रत विधि: महाशिवरात्रि पूजा के लाभ: महत्वपूर्ण बातें: यह भी ध्यान रखें: दूर होंगे कष्ट जीवन में कष्टों के निवारण के लिए शिवलिंग पर आक का फूल भी अर्पित किया जाता है. आक का फूल और पत्ता दोनों ही भगवान भोलेनाथ को बेहद प्रिय है. मान्यता है कि जो भक्त भगवान शिव को आक के पुष्प और पत्ते अर्पित करते हैं. भगवान शिव उसके दैहिक, दैविक और भौतिक सभी तरह के कष्ट हर लेते हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है. भोलेनाथ जरूर चढ़ाएं भस्म भगवान शिव की पूजा में भस्म का उपयोग करना बहुत शुभ माना जाता है. महाशिवरात्रि के दिन विशेष तौर पर इसे शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवजी का प्रमुख वस्त्र भस्म को भी माना जाता है, क्योंकि उनका पूरा शरीर भस्म से ढका रहता है. इसलिए महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव पर भस्म जरूर चढ़ाएं.

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शिवलिंग की पूजा के जान लीजिए नियम MAHASHIVRATRI

शिवपुराण एक प्रमुख हिंदू धार्मिक ग्रंथ है जो भगवान शिव के बारे में विस्तृत ज्ञान प्रदान करता है। यह पुराण भगवान शिव की विभिन्न अवतार, उनके लीलाएं, तप, विवाह, और उनके भक्तों के अनुभवों को समेटता है। इसमें भगवान शिव की महिमा का वर्णन भी किया गया है। शिवपुराण में भगवान शिव को महादेव, महाकाल, रुद्र, नीलकंठ, भैरव, इत्यादि के नामों से संदर्भित किया गया है। यहां कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं और महिमा की कुछ उदाहरण दिए जा सकते हैं: ये थे कुछ मुख्य तथ्य जो शिवपुराण में भगवान शिव की महिमा को वर्णित करते हैं। यह पुराण उनकी अनंत शक्ति, अनुग्रह, और समर्पण की कथाएं भी समेटता है। ऐसे करें मूर्ति का निर्माण? आधुनिक काल में मूर्ति बनाने के तरीकों में बहुत से बदलाव आ चुके हैं. लोग साचों का इस्तेमाल कर मूर्तियों का निर्माण करते हैं. आमतौर पर लोग बाजार से खरीदकर मूर्ति लाते हैं और उसे ही अपने घर के मंदिर में स्थापित कर पूजा करते हैं. लेकिन शिवपुराण के अनुसार यह बताया गया है कि मिट्टी की बनाई हुई प्रतिमा से सभी लोगों की मनोकामना पूरी होती है. शिवपुराण के अनुसार मूर्ति को बनाने के लिए किसी नदी, तालाब, कुआं या जल के भीतर की मिट्टी लाकर उसमें सुगंधित द्रव्य मिलाकर शुद्ध करें. उसके बाद मिट्टी में दूध मिलाकर हाथों से सुंदर मूर्ति का निर्माण करें और पद्मासन द्वारा मूर्ति का आदर सहित पूजन करें. मूर्ति और शिवलिंग का पूजन शिवपुराण के अनुसार गणेश जी, भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान सूर्य, भगवान विष्णु और शिवलिंग की हमेशा पूजा करनी चाहिए. मन्नत पूरी करने के लिए सोलह उपचारों से पूजा करना फलदायक होता है. किसी व्यक्ति के द्वारा स्थापित शिवलिंग पर नैवेद्य से शिवलिंग का पूजन करना चाहिए. देवताओं के द्वारा स्थापित शिवलिंग पर नैवेद्य अर्पित करना चाहिए और यदि शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ है, तब उसका पूजन पांच सेर नैवेद्य से करें. इस प्रकार पूजन करने से मनचाहा फल मिलता है. साथ ही यह भी कहा गया है कि इस तरह सहस्र यानि हजार बार पूजा करने से व्यक्ति को सतलोक की प्राप्ति होती है. शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग का महत्व भगवान शिव को मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है. योनि और लिंग दोनों ही शिव समाहित है. इसलिए भगवान शिव जगत का जन्म निरूपण हैं. यही कारण है कि व्यक्ति को जन्म की निवृत्ति के लिए पूजन के अलग नियमों का पालन करना होता है. साथ ही सारा जगत बिंदु- नाद स्वरुप है. बिंदु शक्ति और नाद स्वयं शिव है. इसलिए पूरा जगत ही शिव और शक्ति का ही स्वरूप है और इस ही जगत का कारण बताया जाता है. बिंदु देव है और नाद भगवान शिव हैं, इनका मिला जुला रूप ही शिवलिंग कहलाता है. देवी उमा जगत की माता है और भगवान शिव जगत के पिता है जो उनकी सेवा करता है उस पर उनकी कृपा बढ़ती रहती है. शिवलिंग अभिषेक और प्रकार जीवन और मृत्यु के बंधन से मुक्त होने के लिए श्रद्धापूर्वक शिवलिंग का पूजन करना चाहिए. गाय के दूध, दही और घी को शहद और शक्कर के साथ मिलाकर पंचामृत तैयार करें और उन्हें अलग-अलग भी रखें. पंचामृत को शिवलिंग पर अर्पित करें. दूध और अनाज मिलाकर नैवेद्य तैयार कर प्रणव मंत्र का जाप करते हुए उसे भगवान शिव को अर्पित करें. प्रणव को ध्वनि लिंग स्वयंभू लिंग और नाद स्वरूप होने के कारण नाद लिंग और बिंदु स्वरूप होने के कारण बिंदु लिंग के रूप में जाना जाता है. अचल रूप में शिवलिंग को मकर स्वरूप माना जाता है. पूजा की दीक्षा देने वाले गुरु आचार्य विग्रह आकार का प्रतीक होने से आकार लिंग के भी छह भेद हैं.

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Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत में रात को ही क्यों की जाती है भोलेनाथ की पूजा? जानिए वजह

( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस व्रत को रखने से भक्तों को भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति, रोगों से मुक्ति, और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ( Masik Shivratri ) मासिक शिवरात्रि व्रत की मान्यताओं के अनुसार, चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं। इसलिए इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है। इसके अलावा, पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव का विवाह चतुर्दशी तिथि को हुआ था। इसलिए इस दिन का विशेष महत्व है। मासिक शिवरात्रि व्रत रखने वाले भक्तों को इस दिन निम्नलिखित बातों का पालन करना चाहिए: Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत रखने से भक्तों को निम्नलिखित लाभ मिलते हैं: मासिक शिवरात्रि व्रत हर महीने किया जा सकता है। यह व्रत सभी वर्ग के लोगों के लिए उपयुक्त है। मासिक शिवरात्रि का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मासिक शिवरात्रि का व्रत असंभव को भी संभव कर सकता है और इस व्रत को रखने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. इस व्रत में रात्रि के समय में पूजा करने के बाद रात को जागरण करते हुए भोलेनाथ की अराधना करनी चाहिए. यदि कुंवारे लोग मासिक शिवरात्रि का व्रत व पूजन करते हैं तो जल्द ही उन्हें अच्छा जीवनसाथी मिलता है. रात को क्यों होती है भोलेनाथ की पूजा पौराणिक कथाओं के अनुसार चतुर्दशी तिथि की रात्रि में भगवान शिव का विवाह हुआ था, इसलिए भोलेनाथ को रात्रि प्रिय है. यही वजह है कि मासिक शिवरात्रि के दिन अगर रात्रि के समय भगवान शिव का पूजन किया जाए तो वह प्रसन्न होते हैं. इसके अलावा शिव को संहार का देवता भी कहा गया है और रात्रि संहार काल की प्रतिनिधि है. इसलिए मासिक शिवरात्रि की रात को विधि-विधान के साथ भगवान शिव का पूजन करने से जीवन में आ रहे कष्टों से मुक्ति मिलती है. मासिक शिवरात्रि का व्रत करने पर जातक रात्रि के चार प्रहर में भगवान शिव का पूजन करता है. बता दें ​कि प्रत्येक प्रहर 3 घंटे का होता है. एक प्रहर में भोलेनाथ का दूध से अभिषेक किया जाता है, फिर दही और फिर शहद से ​अभिषेक होता है.

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भगवान शिव के इन 108 नाम का जाप मिलेगा मनवांछित फल

प्रत्येक माह में शिव रात्रि की तिथि होती है। लेकिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को भगवान शिव का वरदान प्राप्त है और यह तिथि भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए समर्पित मानी गई है। भगवान शिव को भोले भंडारी कहा जाता है। अगर कोई उन्हें सच्चे मन से एक लोटा जल चढ़ा दें तो ही वो प्रसन्न होकर उसे सब कुछ दे डालते हैं। आइए आज जानें भोलेनाथ के 108 नामों के बारे में जिनका यदि सच्चे मन से सोमवार को जाप करते हुए भगवान शिव को जल चढ़ाया जाए या शिव के इन नामों का साधारण जाप किया जाए तो कठिन से कठिन काम भी संवर जाता है। 

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 इस बार भोलेनाथ की उपासना के लिए मिलेंगे सावन के 8 सोमवार, जानिए क्यों बन रहा ये अद्भुत संयोग

हिंदू धर्म में भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के लिए सावन के महीने को सबसे उत्तम माना जाता है। इस पूरे माह में शिव जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस बार सावन माह को बेहद खास माना जा रहा है, क्योंकि इस साल सावन एक नहीं बल्कि दो माह का होने वाला है। ऐसा माना जा रहा है कि ये अद्भुद योग करीब 19 साल बाद बन रहा है। दरअसल हिंदी विक्रम संवत 2080 में इस साल एक अधिकमास पड़ रहा है। ऐसे में इस साल 12 महीने की बजाय कुल 13 महीने होंगे। वहीं सावन का महीना 30 नहीं बल्कि करीब 59 दिन का होने वाला है। यानी इस बार भोलेनाथ के भक्तों को उनकी उपासना करने के लिए 4 के बजाय 8 सोमवार मिलेंगे। सावन में भगवान शिव की उपासना से पूरी होती है मनोकामना हिन्दू धर्म में सावन के बड़ा महत्व माना जाता है. हिन्दू पंचांग के अनुसार इस बार एक नहीं दो महीने सावन के होंगे. सावन माह की शुरुआत 4 जुलाई से होगी और 31 अगस्त तक सावन मास रहेगा. इस बार सावन मास में 4 की बजाय 8 सोमवार आयेंगे. श्रद्धालु जो भगवान शिव की अराधना में सावन माह के सोमवार के व्रत रखते, उन्हें 8 सोमवार व्रत रखने होंगे.  देवों के देव महादेव भगवान शिव का पावन महीना सावन 2023 शुरू होने में केवल 2 महीने शेष हैं। इस बार सावन महीना बेहद ही खास होने वाला है। सावन 2023 में 4 सोमवार की जगह 8 सोमवार पड़ेगे। ऐसे में सावन माह का महत्व और भी बढ़ गया है। सावन को श्रावण मास भी कहा जाता है। श्रावण मास 2023 भगवान शिव की स्तुती का विशेष काल होता है। धार्मिक ग्रंथों में सावन के महीने का महत्व बताया गया है। सावन में जो भी भक्त भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करता है, उसकी हर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। वहीं, सावन सोमवार के व्रत रखने से भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन आनंदमय हो जाता है। महाभारत में श्रीकृष्ण और अर्जुन के ये संवाद हैं जीवन का असली सूत्र, जरूर जानें साल 2023 में कब-कब है सावन सोमवारी व्रत सावन का पहला सोमवार: 10 जुलाईसावन का दूसरा सोमवार: 17 जुलाईसावन का तीसरा सोमवार: 24 जुलाईसावन का चौथा सोमवार: 31 जुलाईसावन का पांचवा सोमवार: 07 अगस्तसावन का छठा सोमवार:14 अगस्तसावन का सातवां सोमवार: 21 अगस्तसावन का आठवां सोमवार: 28 अगस्त सावन सोमवार का महत्व ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सावन माह भगवान शिव की उपासना के लिए विशेष काल माना गया है। सावन का पूरा महीना भोलेनाथ को समर्पित होता है। इस पूरे माह भक्त भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना कर व्रत रखते हैं। सावन महीन में बड़ी तादाद में शिव भक्त शिवालयों में पहुंचते हैं और शिवलिंग पर जल के साथ-साथ बेलपत्र, धतूरा, शमी आदि अर्पित कर महादेव को रिझाते हैं। सावन में ही कांवड़ यात्रा प्रारंभ होती है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त गंगा समेत पवित्र नदियों से जलकर लेकर आते हैं। इससे भगवान शिव प्रसन्न होकर भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। वहीं, सावन सोमवार का व्रत रखने से जीवन में सुख—समृद्धि के साथ सफलता आशीर्वाद मिलता है। अविवाहित कन्याओं के लिए भी सावन का महीना बेहद लाभदायक होता है। सावन सोमवारी का व्रत रखने से कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है।

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ये हैं भगवान शिव के 108 नाम, जिनको पढ़ने या सुनने मात्र से होती है शिव कृपा

यौगिक परंपरा में, शिव को एक गुरु के रूप में पूजा जाता है, एक देवता के रूप में नहीं। जिसे हम शिव कहते हैं वह बहुआयामी है। वे सभी गुण जो आप कभी भी किसी में बता सकते हैं, शिव में बताए गए हैं। जब हम शिव कहते हैं, तो हम यह नहीं कह रहे हैं कि वे इस तरह के व्यक्ति हैं या उस तरह के व्यक्ति हैं। महा शिवरात्रि पर भगवान शिव के 108 नाम के जाप का महत्व

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सोमवार को करें शिव मंत्र का जाप, पूरी होगी मनोकामना

सोमवार का दिन भोलेनाथ का होता है. इस दिन महादेव के मंत्रों का जाप करने से महादेव जल्द प्रसन्न होते हैं. सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए सर्वोत्तम दिन होता है. सभी देवी देवताओं में सबसे सरल स्वभाव के देवता भोलेनाथ को माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन पूजा अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. यहां हम आपको भगवान शिव के कुछ ऐसे मंत्र बता रहें हैं, जिनका जाप सोमवार को करने से भगवान शिव अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. सावन में क्यों होता है भगवान शिव का जलाभिषेक जानें वजह भगवान शिव के कुछ मंत्र शिव नमस्कार मंत्रनम: श‍िव जी को प्रसन्‍न करना है तो इस मंत्र का जाप पूजन से पहले करें.शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिमहिर्बम्हणोधपतिर्बम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। पंचाक्षरी मंत्रइस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से सभी संकटों तथा कष्टों से मुक्ति मिलती है ॐ नम: शिवाय। श‍िव नामावली मंत्रसोमवार को पूजा करते समय नामावली मंत्रों का जाप करना अधिक फलदायी माना जाता है.।। श्री शिवाय नम:।।।। श्री शंकराय नम:।।।। श्री महेश्वराय नम:।।।। श्री सांबसदाशिवाय नम:।।।। श्री रुद्राय नम:।।।। ओम पार्वतीपतये नम:।।।। ओम नमो नीलकण्ठाय नम:।। महामृत्युंजय मंत्रइस मंत्र का जाप नियमित रूप से करने से रोग, दोष तथा सभी सकंट समाप्त हो जाते हैं.ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ शिव गायत्री मंत्रगायत्री मंत्र का जाप करने से पितृ दोष, कालसर्प दोष, राहु केतु तथा शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है.।। ओम तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात ।। लघु महामृत्युंजय मंत्रजिन लोगों के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना कठिन होता, उन्हें लघु महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए इससे असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं.ॐ हौं जूं सः

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शिवजी को क्यों प्रिय है सावन का महीना, जानिए 5 रहस्य

भगवान शिव को सावन का महीना अत्यंत ही प्रिय है। जो भी भक्त इस माह में उनकी विधिवतरूप से पूजा करता है उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। आओ जानते हैं कि आखिर शिवजी को क्यों प्रिय है सावना का महीना। जानें कब और कैसे प्रकट हुए थे भगवान भोलेनाथ, पढ़ें यह पौराणिक कथा 1. राजा दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह करने के बाद माता सती का दूसरा जन्म माता पार्वती के रूप में हुआ था। माता पार्वती ने शिवजी को प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था जिसके चलते सावन के माह में शिवजी ने माता से विवाह किया था। इसलिए उन्हें यह माह प्रिय है। इस संबंध में ब्रह्मा के पुत्र सनत कुमारों ने शिवजी से प्रश्न किया था कि आपको सावन का माह क्यों प्रिय है तो शिवजी ने उपरोक्त बात बताई थी। 2. देव और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। मंथन करने से सबसे पहले विष निकला था। विष को शिवजी ने अपने गले में धारण कर लिया था। इसके कारण वे नीलकंठ कहलाने लगे। विष के काणण उनके शरीर का तापमान बढ़ने लगा तो देवताओं ने उन पर शीतल जल डालकर उस ताप को शांत किया। तभी से शिवजी को जल अतिप्रिय लगने लगता है। 3. कई जगहों पर बारिश में शिवलिंग पानी में डूबे रहते हैं। शिवलिंग के उपर एक कलश लटका रहता है जिससे बूंद-बूंद जल टपकता रहता है उसे जलाधारी कहती हैं। जहां भी प्राकृति शिवलिंग है वहां जल की धारा भी है। 4. शिवजी के मस्तक पर चंद्रमा और गंगा मैया विराजमान है जिनका संबंध में जल से ही है।  कैलाश पर्वत के चारों और बर्फ जमी रहती है और उसके पास है मान सरोवार। शिवजी को जल अति प्रिय है जबकि विष्णुजी तो जल में ही निवास करते हैं।  5. यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव सावन के महीने में धरती पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्ध्य देकर, जलाभिषेक कर किया गया था। अत: माना जाता है, कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। इसीलिए यह माह उन्हें प्रिय है। यही उपरोक्त सभी कारण है कि बारिश का मौसम और उसमें भी श्रावण का माह उन्हें अति प्रिय है जबकि सभी ओर हरियाली और शीतलता व्याप्त हो जाती है।

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शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं भगवान शिव

लक्ष्मी-गणेश, राधा-कृष्ण, राम-सीता, विष्णु, ब्रह्मा आदि अनेकों भगवान भारी-भारी गहनों और वस्त्रों से लदे होते हैं. इन भगवानों की मूर्तियां मंदिरों में देखें या फिर इनके चित्रों पर गौर करें. हर जगह यह सभी सोने-चांदी से जड़े आभूषणों में दिखाई देते हैं. लेकिन कभी आपने सोचा है कि आखिर भगवान शिव क्यों बिना आभूषणों के रहते हैं. उनके गले में माला के नाम पर सांप, सिर पर मुकुट की जगह जटाएं, शरीर पर मलमल के कपड़ों के बजाय बाघ की खाल और शरीर पर चंदन के लेप के बजाय भस्म क्यों है?  कहते हैं भगवान शिव भोले हैं, क्योंकि वे अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले हैं। वे अपने भक्तों के समक्ष स्वयं प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं एवं मन मुताबिक वरदान देते हैं। हिंदू धर्म में शिवजी की बड़ी महिमा हैं। शिवजी का न आदि है ना ही अंत। शास्त्रों में शिवजी के स्वरूप के संबंध कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। इनका स्वरूप सभी देवी-देवताओं से बिल्कुल भिन्न है। जहां सभी देवी-देवता दिव्य आभूषण और वस्त्रादि धारण करते हैं वहीं शिवजी ऐसा कुछ भी धारण नहीं करते, वे शरीर पर भस्म रमाते हैं, उनके आभूषण भी विचित्र है। शिवजी शरीर पर भस्म क्यों रमाते हैं? इस संबंध में धार्मिक मान्यता यह है कि शिव को मृत्यु का स्वामी माना गया है और शिवजी शव के जलने के बाद बची भस्म को अपने शरीर पर धारण करते हैं। इस प्रकार शिवजी भस्म लगाकर हमें यह संदेश देते हैं कि यह हमारा यह शरीर नश्वर है और एक दिन इसी भस्म की तरह मिट्टी में विलिन हो जाएगा। अत: हमें इस नश्वर शरीर पर गर्व नहीं करना चाहिए। कोई व्यक्ति कितना भी सुंदर क्यों न हो, मृत्यु के बाद उसका शरीर इसी तरह भस्म बन जाएगा। अत: हमें किसी भी प्रकार का घमंड नहीं करना चाहिए। जब भगवान शिव और माता सति को यज्ञ के लिए निमंत्रण ना मिलने पर सति ने क्रोध में आकर खुद को अग्नि के हवाले कर दिया था. उस वक्त भगवान शिव माता सति का शव लेकर धरती से लेकर आकाश तक हर जगह घूमे. विष्णु जी भगवान शिव की ये दशा देख ना पाए और माता सति के शव को छूकर उन्होंने उसे भस्म में बदल दिया. अपने हाथों में सति की जगह भस्म देखकर शिव जी और परेशान हो गए और बाद में भस्म को देखकर माता सति को याद कर वो राख उन्होंने अपने शरीर पर लगा ली इस संबंध में एक अन्य तर्क भी है कि शिवजी कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, जहां का वातावरण अत्यंत ही ठंडा है और भस्म शरीर का आवरण का काम करती हैं। यह वस्त्रों की तरह ही उपयोगी होती है। भस्म बारिक लेकिन कठोर होती है जो हमारे शरीर की त्वचा के उन रोम छिद्रों को भर देती है जिससे सर्दी या गर्मी महसूस नहीं होती हैं। शिवजी का रहन-सहन सन्यासियों सा है। सन्यास का यही अर्थ है कि संसार से अलग प्रकृति के सानिध्य में रहना। संसारी चीजों को छोड़कर प्राकृतिक साधनों का उपयोग करना। ये भस्म उन्हीं प्राकृतिक साधनों में शामिल है।

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भगवान राम और भगवान शिव में प्रलयंकारीयुद्ध का क्या हुआ परिणाम ?

रामयण के उत्तरार्ध में एक वक़्त ऐसा भी आता है जब विष्णु अवतार राम और स्वयं महादेव के बीच न चाहते हुए भी भयंकर युद्ध होता है। आखिर क्यों होता है यह युद्ध? और क्या निकलता है इसका परिणाम? जानने के लिए पढ़ते है यह पौराणिक कथा – बात उन दिनों कि है जब श्रीराम का अश्वमेघ यज्ञ चल रहा था। श्रीराम के अनुज शत्रुघ्न के नेतृत्व में असंख्य वीरों की सेना सारे प्रदेश को विजित करती जा रही थी जहाँ भी यज्ञ का अश्व जा रहा था। इस क्रम में कई राजाओं के द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ा गया लेकिन अयोध्या की सेना के आगे उन्हें झुकना पड़ा. शत्रुघ्न के आलावा सेना में हनुमान, सुग्रीव और भारत पुत्र पुष्कल सहित कई महारथी उपस्थित थे जिन्हें जीतना देवताओं के लिए भी संभव नहीं था। कई जगह भ्रमण करने के बाद यज्ञ का घोडा देवपुर पहुंचा जहाँ राजा वीरमणि का राज्य था। राजा वीरमणि अति धर्मनिष्ठ तथा श्रीराम एवं महादेव के अनन्य भक्त थे। उनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभंगद वीरों में श्रेष्ठ थे। राजा वीरमणि के भाई वीरसिंह भी एक महारथी थे। राजा वीरमणि ने भगवान रूद्र की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था और महादेव ने उन्हें उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान दिया था। महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का सहस नहीं करता था। जब अश्व उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया और अयोध्या के साधारण सैनिकों से कहा यज्ञ का घोडा उनके पास है इसलिए वे जाकर शत्रुघ्न से कहें की विधिवत युद्ध कर वो अपना अश्व छुड़ा लें। जब रुक्मांगद ने ये सूचना अपने पिता को दी तो वो बड़े चिंतित हुए और अपने पुत्र से कहा की अनजाने में तुमने श्रीराम के यज्ञ का घोडा पकड़ लिया है। श्रीराम हमारे मित्र हैं और उनसे शत्रुता करने का कोई औचित्य नहीं है इसलिए तुम यज्ञ का घोडा वापस लौटा आओ। इसपर रुक्मांगद ने कहा कि हे पिताश्री, मैंने तो उन्हें युद्ध की चुनौती भी दे दी है अतः अब उन्हें बिना युद्ध के अश्व लौटना हमारा और उनका दोनों का अपमान होगा।  अब तो जो हो गया है उसे बदला नहीं जा सकता इसलिए आप मुझे युद्ध कि आज्ञा दें। पुत्र की बात सुनकर वीरमणि ने उसे सेना सुसज्जित करने की आज्ञा दे दी। राजा वीरमणि अपने भाई वीरसिंह और अपने दोनों पुत्र रुक्मांगद और शुभांगद के साथ विशाल सेना ले कर युद्ध क्षेत्र में आ गए। इधर जब शत्रुघ्न को सूचना मिली की उनके यज्ञ का घोडा बंदी बना लिया गया है तो वो बहुत क्रोधित हुए एवं अपनी पूरी सेना के साथ युद्ध के लिए युध्क्षेत्र में आ गए। उन्होंने पूछा की उनकी सेना से कौन अश्व को छुड़ाएगा तो भारत पुत्र पुष्कल ने कहा कि तातश्री, आप चिंता न करें. आपके आशीर्वाद और श्रीराम के प्रताप से मैं आज ही इन सभी योधाओं को मार कर अश्व को मुक्त करता हूँ।  वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे कि पवनसुत हनुमान ने कहा कि राजा वीरमणि के राज्य पर आक्रमण करना स्वयं परमपिता ब्रम्हा के लिए भी कठिन है क्योंकि ये नगरी महाकाल द्वारा रक्षित है। अतः उचित यही होगा कि पहले हमें बातचीत द्वारा राजा वीरमणि को समझाना चाहिए और अगर हम न समझा पाए तो हमें श्रीराम को सूचित करना चाहिए।  राजा वीरमणि श्रीराम का बहुत आदर करते हैं इसलिये वे उनकी बात नहीं टाल पाएंगे। हनुमान की बात सुन कर शत्रुघन बोले की हमारे रहते अगर श्रीराम को युध्भूमि में आना पड़े, ये हमारे लिए अत्यंत लज्जा की बात है। अब जो भी हो हमें युद्ध तो करना ही पड़ेगा। ये कहकर वे सेना सहित युद्धभूमि में पहुच गए। भयानक युद्ध छिड़ गया। भरत पुत्र पुष्कल सीधा जाकर राजा वीरमणि से भिड गया। दोनों अतुलनीय वीर थे। वे दोनों तरह तरह के शास्त्रार्थों का प्रयोग करते हुए युद्ध करने लगे। हनुमान राजा वीरमणि के भाई महापराक्रमी वीरसिंह से युद्ध करने लगे।  रुक्मांगद और शुभांगद ने शत्रुघ्न पर धावा बोल दिया। पुष्कल और वीरमणि में बड़ा घमासान युद्ध हुआ। अंत में पुष्कल ने वीरमणि पर आठ नाराच बाणों से वार किया। इस वार को राजा वीरमणि सह नहीं पाए और मुर्छित होकर अपने रथ पर गिर पड़े।  वीरसिंह ने हनुमान पर कई अस्त्रों का प्रयोग किया पर उन्हें कोई हानि न पहुंचा सके। हनुमान ने एक विकट पेड़ से वीरसिंह पर वार किया इससे वीरसिंह रक्तवमन करते हुए मूर्छित हो गए। उधर श्रीशत्रुघ्न और राजा वीरमणि के पुत्रों में असाधारण युद्ध चल रहा था। अंत में कोई चारा न देख कर शत्रुघ्न ने दोनों भाइयों को नागपाश में बाँध लिया। अपनी विजय देख कर शत्रुघ्न की सेना के सभी वीर सिंहनाद करने लगे। उधर राजा वीरमणि की मूर्छा दूर हुई तो उन्होंने देखा की उनकी सेना हार के कगार पर है। ये देख कर उन्होंने भगवान रूद्र का स्मरण किया। महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जान कर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित सारे गणों को युध्क्षेत्र में भेज दिया। महाकाल के सारे अनुचर उनकी जयजयकार करते हुए अयोध्या की सेना पर टूट पड़े। शत्रुघ्न, हनुमान और बांकी योधाओं को लगा की जैसे प्रलय आ गया हो। जब उन्होंने भयानक मुख वाले रुद्रावतार वीरभद्र, नंदी, भृंगी सहित महादेव की सेना देखी तो सारे सैनिक भय से कांप उठे। शत्रुघ्न ने हनुमान से कहा की जिस वीरभद्र ने बात ही बात में दक्ष प्रजापति की मस्तक काट डाला था और जो तेज और समता में स्वयं महाकाल के सामान है उसे युद्ध में कैसे हराया जा सकता है। ये सुनकर पुष्कल ने कहा की हे तातश्री, आप दुखी मत हों। अब तो जो भी हो हमें युद्ध तो करना हीं पड़ेगा।  ये कहता हुए पुष्कल वीरभद्र से, हनुमान नंदी से और शत्रुघ्न भृंगी से जा भिड़े। पुष्कल ने अपने सारे दिव्यास्त्रों का प्रयोग वीरभद्र पर कर दिया लेकिन वीरभद्र ने बात ही बात में उसे काट दिया। उन्होंने पुष्कल से कहा की हे बालक, अभी तुम्हारी आयु मृत्यु को प्राप्त होने की नहीं हुई है इसलिए युध्क्षेत्र से हट जाओ। उसी समय पुष्कल ने वीरभद्र पर शक्ति से प्रहार किया

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ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा (Omkareshwar Jyotirlinga Story in Hindi)

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। यह शिवजी का चौथा प्रमुख ज्योतिर्लिंग कहलाता है। ओंकारेश्वर में ज्योतिर्लिंग के दो रुपों ओंकारेश्वर और ममलेश्वर की पूजा की जाती है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ज्योतिर्लिंग को शिव महापुराण में ‘परमेश्वर लिंग’ कहा गया है। यह परमेश्वर लिंग इस तीर्थ में कैसे प्रकट हुआ अथवा इसकी स्थापना कैसे हुई, इस सम्बन्ध में शिव पुराण की कथा इस प्रकार है। शिव पुराण में वर्णित कथा- एक बार मुनिश्रेष्ठ नारद ऋषि घूमते हुए गिरिराज विन्ध्य पर पहुँच गये। विन्ध्य ने बड़े आदर-सम्मान के साथ उनकी विधिवत पूजा की। ‘मैं सर्वगुण सम्पन्न हूँ, मेरे पास हर प्रकार की सम्पदा है, किसी वस्तु की कमी नहीं है’- इस प्रकार के भाव को मन में लिये विन्ध्याचल नारद जी के समक्ष खड़ा हो गया। अहंकारनाशक श्री नारद जी विन्ध्याचल की अभिमान से भरी बातें सुनकर लम्बी साँस खींचते हुए चुपचाप खड़े रहे। उसके बाद विन्ध्यपर्वत ने पूछा- ‘आपको मेरे पास कौन-सी कमी दिखाई दी? आपने किस कमी को देखकर लम्बी साँस खींची?’ नारद जी ने विन्ध्याचल को बताया कि तुम्हारे पास सब कुछ है, किन्तु मेरू पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उस पर्वत के शिखरों का विभाग देवताओं के लोकों तक पहुँचा हुआ है। मुझे लगता है कि तुम्हारे शिखर के भाग वहाँ तक कभी नहीं पहुँच पाएंगे। इस प्रकार कहकर नारद जी वहां से चले गए। उनकी बात सुनकर विन्ध्याचल को बहुत पछतावा हुआ। वह दु:खी होकर मन ही मन शोक करने लगा। उसने निश्चय किया कि अब वह विश्वनाथ भगवान सदाशिव की आराधना और तपस्या करेगा। इस प्रकार विचार करने के बाद वह भगवान शंकर जी की सेवा में चला गया। जहाँ पर साक्षात ओंकार विद्यमान हैं। उस स्थान पर पहुँचकर उसने प्रसन्नता और प्रेमपूर्वक शिव की पार्थिव मूर्ति (मिट्टी की शिवलिंग) बनाई और छ: महीने तक लगातार उसके पूजन में तन्मय रहा। वह शम्भू की आराधना-पूजा के बाद निरन्तर उनके ध्यान में तल्लीन हो गया और अपने स्थान से इधर-उधर नहीं हुआ। उसकी कठोर तपस्या को देखकर भगवान शिव उस पर प्रसन्न हो गये। उन्होंने विन्ध्याचल को अपना दिव्य स्वरूप प्रकट कर दिखाया, जिसका दर्शन बड़े – बड़े योगियों के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ होता है। सदाशिव भगवान प्रसन्नतापूर्वक विन्ध्याचल से बोले- ‘विन्ध्य! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। मैं अपने भक्तों को उनका अभीष्ट वर प्रदान करता हूँ। इसलिए तुम वर माँगो।’ विन्ध्य ने कहा- ‘देवेश्वर महेश! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो भक्तवत्सल! हमारे कार्य की सिद्धि करने वाली वह अभीष्ट बुद्धि हमें प्रदान करें!’ विन्ध्यपर्वत की याचना को पूरा करते हुए भगवान शिव ने उससे कहा कि- ‘पर्वतराज! मैं तुम्हें वह उत्तम वर (बुद्धि) प्रदान करता हूँ। तुम जिस प्रकार का काम करना चाहो, वैसा कर सकते हो। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।’ भगवान शिव ने जब विन्ध्य को उत्तम वर दे दिया, उसी समय देवगण तथा शुद्ध बुद्धि और निर्मल चित्त वाले कुछ ऋषिगण भी वहाँ आ गये। उन्होंने भी भगवान शंकर जी की विधिवत पूजा की और उनकी स्तुति करने के बाद उनसे कहा- ‘प्रभो! आप हमेशा के लिए यहाँ स्थिर होकर निवास करें।’ देवताओं की बात से महेश्वर भगवान शिव को बड़ी प्रसन्नता हुई। लोकों को सुख पहुँचाने वाले परमेशवर शिव ने उन ऋषियों तथा देवताओं की बात को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया। वहाँ स्थित एक ही ओंकारलिंग दो स्वरूपों में विभक्त हो गया। प्रणव के अन्तर्गत जो सदाशिव विद्यमान हुए, उन्हें ‘ओंकार’ नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार पार्थिव मूर्ति में जो ज्योति प्रतिष्ठित हुई थी, वह ‘परमेश्वर लिंग’ के नाम से विख्यात हुई। परमेश्वर लिंग को ही ‘अमलेश्वर’ भी कहा जाता है। इस प्रकार भक्तजनों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाले ‘ओंकारेश्वर’ और ‘परमेश्वर’ नाम से शिव के ये ज्योतिर्लिंग जगत में प्रसिद्ध हुए।

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मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की कहानी (Mallikarjuna Jyotirlinga Story in Hindi)

 पुराणो में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग से सम्बंधित कथा इस प्रकार है-एक बार शिव-पार्वती के दोनों पुत्र कार्तिकेय और गणेश विवाह के लिए आपस में कलह करने लगे। कार्तिकेय का कहना था कि वे बड़े हैं, इसलिए उनका विवाह पहले होना चाहिए, किन्तु श्री गणेश अपना विवाह पहले करना चाहते थे। इस झगड़े का फैसला कराने के लिए दोनों अपने माता-पिता के पास पहुँचे। उनके माता-पिता ने कहा कि तुम दोनों में जो कोई इस पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले यहाँ आ जाएगा, उसी का विवाह पहले होगा। शर्त सुनते ही कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए दौड़ पड़े। इधर स्थूलकाय श्री गणेश जी और उनका वाहन भी चूहा, भला इतनी शीघ्रता से वे परिक्रमा कैसे कर सकते थे। गणेश जी के सामने भारी समस्या उपस्थित थी। श्रीगणेश जी शरीर से ज़रूर स्थूल हैं, किन्तु वे बुद्धि के सागर हैं। उन्होंने कुछ सोच-विचार किया और अपनी माता पार्वती तथा पिता देवाधिदेव महेश्वर से एक आसन पर बैठने का आग्रह किया। उन दोनों के आसन पर बैठ जाने के बाद श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की, फिर विधिवत् पूजन किया। इस प्रकार श्रीगणेश माता-पिता की परिक्रमा करके पृथ्वी की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले फल की प्राप्ति के अधिकारी बन गये। उनकी चतुर बुद्धि को देख कर शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने श्रीगणेश का विवाह भी करा दिया। जिस समय स्वामी कार्तिकेय सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आये, उस समय श्रीगणेश जी का विवाह विश्वरूप प्रजापति की पुत्रियों सिद्धि और रिद्धि के साथ हो चुका था। इतना ही नहीं श्री गणेशजी को उनकी ‘सिद्धि’ नामक पत्नी से ‘शुभ’ तथा रिद्धि नामक पत्नी से ‘लाभ’, ये दो पुत्ररत्न भी मिल गये थे। भ्रमणशील और जगत का कल्याण करने वाले देवर्षि नारद ने स्वामी कार्तिकेय से यह सारा वृतान्त कह सुनाया। श्रीगणेश का विवाह और उन्हें पुत्र लाभ का समाचार सुनकर स्वामी कार्तिकेय जल उठे। इस प्रकरण से नाराज़ कार्तिक ने शिष्टाचार का पालन करते हुए अपने माता-पिता के चरण छुए और वहाँ से चल दिये। माता-पिता से अलग होकर कार्तिक क्रौंच पर्वत पर रहने लगे। शिव और पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को समझा-बुझाकर बुलाने हेतु देवर्षि नारद को क्रौंचपर्वत पर भेजा। देवर्षि नारद ने बहुत प्रकार से स्वामी को मनाने का प्रयास किया, किन्तु वे वापस नहीं आये। उसके बाद कोमल हृदय माता पार्वती पुत्र स्नेह में व्याकुल हो उठीं। वे भगवान शिव जी को लेकर क्रौंच पर्वत पर पहुँच गईं। इधर स्वामी कार्तिकेय को क्रौंच पर्वत अपने माता-पिता के आगमन की सूचना मिल गई और वे वहाँ से तीन योजन अर्थात छत्तीस किलोमीटर दूर चले गये। कार्तिकेय के चले जाने पर भगवान शिव उस क्रौंच पर्वत पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गये तभी से वे ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए। ‘मल्लिका’ माता पार्वती का नाम है, जबकि ‘अर्जुन’ भगवान शंकर को कहा जाता है। इस प्रकार सम्मिलित रूप से ‘मल्लिकार्जुन’ नाम उक्त ज्योतिर्लिंग का जगत में प्रसिद्ध हुआ। एक अन्य कथा –एक अन्य कथा के अनुसार कौंच पर्वत के समीप में ही चन्द्रगुप्त नामक किसी राजा की राजधानी थी। उनकी राजकन्या किसी संकट में उलझ गई थी। उस विपत्ति से बचने के लिए वह अपने पिता के राजमहल से भागकर पर्वतराज की शरण में पहुँच गई। वह कन्या ग्वालों के साथ कन्दमूल खाती और दूध पीती थी। इस प्रकार उसका जीवन-निर्वाह उस पर्वत पर होने लगा। उस कन्या के पास एक श्यामा (काली) गौ थी, जिसकी सेवा वह स्वयं करती थी। उस गौ के साथ विचित्र घटना घटित होने लगी। कोई व्यक्ति छिपकर प्रतिदिन उस श्यामा का दूध निकाल लेता था। एक दिन उस कन्या ने किसी चोर को श्यामा का दूध दुहते हुए देख लिया, तब वह क्रोध में आगबबूला हो उसको मारने के लिए दौड़ पड़ी। जब वह गौ के समीप पहुँची, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि वहाँ उसे एक शिवलिंग के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दिया। आगे चलकर उस राजकुमारी ने उस शिवलिंग के ऊपर एक सुन्दर सा मन्दिर बनवा दिया। वही प्राचीन शिवलिंग आज ‘मल्लिकार्जुन’ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है। इस मन्दिर का भलीभाँति सर्वेक्षण करने के बाद पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ऐसा अनुमान किया है कि इसका निर्माणकार्य लगभग दो हज़ार वर्ष प्राचीन है। इस ऐतिहासिक मन्दिर के दर्शनार्थ बड़े-बड़े राजा-महाराजा समय-समय पर आते रहे हैं।

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