SHIV

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी (Somnath Jyotirlinga Hindi Story)

 शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव का प्रथम ज्योतिर्लिंग है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। पुराणो में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना से सम्बंधित कथा इस प्रकार है- जब प्रजापति दक्ष ने अपनी सभी सत्ताइस पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ कर दिया, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्नी के रूप में दक्ष कन्याओं को प्राप्त कर चन्द्रमा बहुत शोभित हुए और दक्षकन्याएँ भी अपने स्वामी के रूप में चन्द्रमा को प्राप्त कर शोभायमान हो उठी। चन्द्रमा की उन सत्ताइस पत्नियों में रोहिणी उन्हें सबसे ज्यादा प्रिय थी, जिसको वे विशेष आदर तथा प्रेम करते थे। उनका इतना प्रेम अन्य पत्नियों से नहीं था। चन्द्रमा की अपनी तरफ उदासीनता और उपेक्षा का देखकर रोहिणी के अलावा बाकी दक्ष पुत्रियां बहुत दुखी हुई।  वे सभी अपने पिता दक्ष की शरण में गयीं और उनसे अपने कष्टों का वर्णन किया। अपनी पुत्रियों की व्यथा और चन्द्रमा के दुर्व्यवहार को सुनकर दक्ष भी बड़े दुःखी हुए। उन्होंने चन्द्रमा से भेंट की और शान्तिपूर्वक कहा- ‘कलानिधे! तुमने निर्मल व पवित्र कुल में जन्म लिया है, फिर भी तुम अपनी पत्नियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हो। तुम्हारे आश्रय में रहने वाली जितनी भी स्त्रियाँ हैं, उनके प्रति तुम्हारे मन में प्रेम कम और अधिक, ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों है? तुम किसी को अधिक प्यार करते हो और किसी को कम प्यार देते हो, ऐसा क्यों करते हो? अब तक जो व्यवहार किया है, वह ठीक नहीं है, फिर अब आगे ऐसा दुर्व्यवहार तुम्हें नहीं करना चाहिए। जो व्यक्ति आत्मीयजनों के साथ विषमतापूर्ण व्यवहार करता है, उसे नर्क में जाना पड़ता है।’ इस प्रकार प्रजापति दक्ष ने अपने दामाद चन्द्रमा को प्रेमपूर्वक समझाया और ऐसा सोच लिया कि चन्द्रमा में सुधार हो जाएगा। उसके बाद प्रजापति दक्ष वापस चले गये। इतना समझाने पर भी चन्द्रमा ने अपने ससुर प्रजापति दक्ष की बात नहीं मानी। रोहिणी के प्रति अतिशय आसक्ति के कारण उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की तथा अपनी अन्य पत्नियों का कुछ भी ख्याल नहीं रखा और उन सभी से उदासीन रहे। दुबारा समाचार प्राप्त कर प्रजापति दक्ष बड़े दुःखी हुए। वे पुनः चन्द्रमा के पास आकर उन्हें उत्तम नीति के द्वारा समझने लगे। दक्ष ने चन्द्रमा से न्यायोचित बर्ताव करने की प्रार्थना की। बार-बार आग्रह करने पर भी चन्द्रमा ने अवहेलनापूर्वक जब दक्ष की बात नहीं मानी, तब उन्होंने शाप दे दिया। दक्ष ने कहा कि मेरे आग्रह करने पर भी तुमने मेरी अवज्ञा की है, इसलिए तुम्हें क्षयरोग हो जाय। दक्ष द्वारा शाप देने के साथ ही क्षण भर में चन्द्रमा क्षय रोग से ग्रसित हो गये। उनके क्षीण होते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी देवगण तथा ऋषिगण भी चिंतित हो गये। परेशान चन्द्रमा ने अपनी अस्वस्थता तथा उसके कारणों की सूचना इन्द्र आदि देवताओं तथा ऋषियों को दी। उसके बाद उनकी सहायता के लिए इन्द्र आदि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा कि जो घटना हो गई है, उसे तो भुगतना ही है, क्योंकि दक्ष के निश्चय को पलटा नहीं जा सकता। उसके बाद ब्रह्माजी ने उन देवताओं को एक उत्तम उपाय बताया। ब्रह्माजी ने कहा कि चन्द्रमा देवताओं के साथ कल्याणकारक शुभ प्रभास क्षेत्र में चले जायें। वहाँ पर विधिपूर्वक शुभ मृत्युंजय-मंत्र का अनुष्ठान करते हुए श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आराधना करें। अपने सामने शिवलिंग की स्थापना करके प्रतिदिन कठिन तपस्या करें। इनकी आराधना और तपस्या से जब भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हो जाएँगे, तो वे इन्हें क्षय रोग से मुक्त कर देगें। पितामह ब्रह्माजी की आज्ञा को स्वीकार कर देवताओं और ऋषियों के संरक्षण में चन्द्रमा देवमण्डल सहित प्रभास क्षेत्र में पहुँच गये। वहाँ चन्द्रदेव ने मृत्युंजय भगवान की अर्चना-वन्दना और अनुष्ठान प्रारम्भ किया। वे मृत्युंजय-मंत्र का जप तथा भगवान शिव की उपासना में तल्लीन हो गये। ब्रह्मा की ही आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने छः महीने तक निरन्तर तपस्या की और वृषभ ध्वज का पूजन किया। दस करोड़ मृत्यंजय-मंत्र का जप तथा ध्यान करते हुए चन्द्रमा स्थिरचित्त से वहाँ निरन्तर खड़े रहे। उनकी उत्कट तपस्या से भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने चन्द्रमा से कहा- ‘चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जिसके लिए यह कठोर तप कर रहे हो, उस अपनी अभिलाषा को बताओ। मै तुम्हारी इच्छा के अनुसार तुम्हें उत्तम वर प्रदान करूँगा।’ चन्द्रमा ने प्रार्थना करते हुए विनयपूर्वक कहा- ‘देवेश्वर! आप मेरे सब अपराधों को क्षमा करें और मेरे शरीर के इस क्षयरोग को दूर कर दें।’भगवान शिव ने कहा– ‘चन्द्रदेव! तुम्हारी कला प्रतिदिन एक पक्ष में क्षीण हुआ करेगी, जबकि दूसरे पक्ष में प्रतिदिन वह निरन्तर बढ़ती रहेगी। इस प्रकार तुम स्वस्थ और लोक-सम्मान के योग्य हो जाओगे। भगवान शिव का कृपा-प्रसाद प्राप्त कर चन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भक्तिभावपूर्वक शंकर की स्तुति की। ऐसी स्थिति में निराकार शिव उनकी दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हुए और संसार में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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बिजली महादेव- कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली

 भारत में भगवन शिव के अनेक अद्भुत मंदिर है उन्हीं में से एक है हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्तिथ बिजली महादेव। कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली महादेव से जुड़ा हुआ है। कुल्लू शहर में ब्यास और पार्वती नदी के संगम के पास एक ऊंचे पर्वत के ऊपर बिजली महादेव का प्राचीन मंदिर है।पूरी कुल्लू घाटी में ऐसी मान्यता है कि यह घाटी एक विशालकाय सांप का रूप है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था। जिस स्थान पर मंदिर है वहां शिवलिंग पर हर बारह साल में भयंकर आकाशीय बिजली गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है। यहां के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित कर मक्खन के साथ इसे जोड़ देते हैं। कुछ ही माह बाद शिवलिंग एक ठोस रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस शिवलिंग पर हर बारह साल में बिजली क्यों गिरती है और इस जगह का नाम कुल्लू कैसे पड़ा इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो इस प्रकार है।कुल्लू घाटी के लोग बताते हैं कि बहुत पहले यहां कुलान्त नामक दैत्य रहता था। दैत्य कुल्लू के पास की नागणधार से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्घरधार से होता हुआ लाहौल स्पीति से मथाण गांव आ गया। दैत्य रूपी अजगर कुण्डली मार कर ब्यास नदी के प्रवाह को रोक कर इस जगह को पानी में डुबोना चाहता था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि यहां रहने वाले सभी जीवजंतु पानी में डूब कर मर जाएंगे। भगवान शिव कुलान्त के इस विचार से से चिंतित हो गए।बड़े जतन के बाद भगवान शिव ने उस राक्षस रूपी अजगर को अपने विश्वास में लिया। शिव ने उसके कान में कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है। इतना सुनते ही जैसे ही कुलान्त पीछे मुड़ा तभी शिव ने कुलान्त के सिर पर त्रिशूल वार कर दिया। त्रिशूल के प्रहार से कुलान्त मारा गया। कुलान्त के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में बदल गया। उसका शरीर धरती के जितने हिस्से में फैला हुआ था वह पूरा की पूरा क्षेत्र पर्वत में बदल गया। कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है। कुलान्त से ही कुलूत और इसके बाद कुल्लू नाम के पीछे यही किवदंती कही जाती है।कुलान्त दैत्य के मारने के बाद शिव ने इंद्र से कहा कि वे बारह साल में एक बार इस जगह पर बिजली गिराया करें। हर बारहवें साल में यहां आकाशीय बिजली गिरती है। इस बिजली से शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। शिवलिंग के टुकड़े इकट्ठा करके शिवजी का पुजारी मक्खन से जोड़कर स्थापित कर लेता है। कुछ समय बाद पिंडी अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है।आकाशीय बिजली बिजली शिवलिंग पर गिरने के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव नहीं चाहते चाहते थे कि जब बिजली गिरे तो जन धन को इससे नुकसान पहुंचे। भोलेनाथ लोगों को बचाने के लिए इस बिजली को अपने ऊपर गिरवाते हैं। इसी वजह से भगवान शिव को यहां बिजली महादेव कहा जाता है। भादों के महीने में यहां मेला-सा लगा रहता है। कुल्लू शहर से बिजली महादेव की पहाड़ी लगभग सात किलोमीटर है। शिवरात्रि पर भी यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है।यह जगह समुद्र स्तर 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। शीत काल में यहां भारी बर्फबारी होती है। कुल्लू में भी महादेव प्रिय देवता हैं। कहीं वे सयाली महादेव हैं तो कहीं ब्राणी महादेव। कहीं वे जुवाणी महादेव हैं तो कहीं बिजली महादेव। बिजली महादेव का अपना ही महात्म्य व इतिहास है। ऐसा लगता है कि बिजली महादेव के इर्द-गिर्द समूचा कुल्लू का इतिहास घूमता है। हर मौसम में दूर-दूर से लोग बिजली महादेव के दर्शन करने आते हैं।

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कथाभगवान गणेश एकदंत की | Ganesh Ek Dant Katha

भगवान गणेश देवी पार्वती और भगवान शिव के पुत्र हैं। एक बार की बात है, जब भगवान शिव और देवी पार्वती अपने शयन कक्ष (सोने का कमरा) में विश्राम कर रहे थे। उस समय देवी पार्वती ने गणेश जी को आदेश दिया कि वह उनके कक्ष (कमरे) के बाहर पहरा दें और किसी को भी अंदर न आने दें। मां की आज्ञा गणेश जी के लिए आदेश थी। उन्होंने वैसा ही किया और कक्ष के बाहर पहरा देने लगे। उसी समय अचानक परशुराम वहां पहुंच गए। परशुराम भगवान शिव से मिलने के लिए बहुत उत्साहित थे। दरअसल, उस समय पृथ्वी पर राजा कार्त्तवीर्य का अत्याचार बहुत बढ़ गया था और परशुराम ने इसी कारण उसे मार दिया था। यह खबर भगवान शिव को देने के लिए ही वह कैलाश (भगवान शिव का निवास स्थान) पहुंचे थे। भगवान शिव के कक्ष की ओर परशुराम को तेजी से बढ़ता देख गणेश जी उनके रास्ते में आ गए और उन्हें रुकने को कहा, लेकिन परशुराम भगवान शिव से मिलने के लिए बहुत उत्सुक थे, इसलिए उन्होंने कहा कि मुझे भगवान शिव से मिलना ही है। परशुराम की इस बात को सुनकर गणेश जी बोले- ‘मैं आपको अंदर जाने नहीं दे सकता। मां ने किसी को भी अंदर न आने का आदेश दिया है।’ गणेश जी की यह बात सुनकर परशुराम गुस्से से लाल हो गए। उन्होंने कहा- ‘तुम मुझे भगवान शिव से मिलने से नहीं रोक सकते। तुम नहीं जानते, मैं कौन हूं।’ इस पर गणेश जी ने कहा- ‘आप कोई भी हों, उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, मेरे लिए मां का आदेश सबसे जरूरी है। मैं आपको किसी भी सूरत में अंदर नहीं जाने दे सकता।’ गणेश जी की इन बातों से परशुराम का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वह बोले- ‘अगर तुम मुझे अंदर नहीं जाने दोगे, तो मैं तुम्हे हटाकर जबरन अंदर जाऊंगा।’ इतना कहकर परशुराम आगे बढ़ते हैं, लेकिन गणेश जी परशुराम को अंदर जाने से रोकने के लिए धक्का दे देते हैं और परशुराम दूर जाकर गिरते हैं। खुद का अपमान होता देख परशुराम जी, गणेश जी को सबक सिखाने के लिए कई अस्त्र-शस्त्र का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उनका गणेश जी पर कोई असर नहीं होता। अंत में परशुराम जी, शिवजी द्वारा दिया गया परशु गणेश जी को मरने के लिए प्रयोग करते हैं। वह परशु भगवान शिव का था, इसलिए गणेश जी उसे पहचान जाते हैं और उसका सम्मान करते हुए उसका वार अपने एक दांत पर ले लेते हैं। परशु की चोट के कारण गणेश जी का दांत टूट कर जमीन पर गिर जाता है और गणेश जी दर्द से कराहने लगते हैं। गणेश जी की दर्द भरी आवाज सुनकर माता पार्वती और पिता भगवान शिव अपने कक्ष से बाहर आ जाते हैं और गणेश जी की यह हालत देख परशुराम पर क्रोधित हो जाते हैं। भगवान शिव और पार्वती को गुस्से में देख परशुराम को अपनी भूल का एहसास होता है और वह अपने किए पर क्षमा मांगते हैं। परशुराम की क्षमा पर माता पार्वती कहती हैं कि एक ऋषि होते हुए भी आपका क्रोध पर नियंत्रण नहीं है। क्षमा मांगने से क्या अब मेरे पुत्र गणेश का दांत वापस आ जाएगा। परशुराम कहते हैं कि जो भी हुआ वह मेरी बड़ी भूल थी, लेकिन इस घटना के कारण अब गणेश का आधा दांत व्यर्थ नहीं जाएगा। इस घटना के कारण ही अब से पूरी दुनिया में गणेश को एक दंत (एक दांत) के नाम से जाना जाएगा।

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भगवान शिव कैसे बने नीलकंठ | Shiv Ne Vish Kyu Piya

भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है, उन्हीं में से एक नाम है नीलकंठ। भगवान शिव के हर नाम के पीछे एक कहानी छुपी है और उसी तरह नीलकंठ नाम से भी एक कहानी जुड़ी है। एक बार की बात है, देवता और राक्षस समुद्र से अमृत निकालने के लिए समुद्र मंथन कर रहे थे, लेकिन अमृत के साथ-साथ समुद्र से विष यानी जहर भी निकला। यह जहर इतना खतरनाक था कि उसकी एक बूंद पूरी दुनिया को खत्म कर सकती थी। अब देवता और राक्षस दोनों ही डर गए कि अब क्या किया जाए। फिर वो भगवान शिव के पास गए। उन्होंने भगवान शिव को सारी बात बताई। भगवान शिव ने फैसला किया कि वो उस विष को पी जाएंगे। भगवान शिव ने विष का घड़ा उठाया और सारा विष पी लिया, लेकिन भगवान शिव ने उस जहर को अपने कंठ में रख लिया, उसे गले से नीचे नहीं उतारा। जहर के कारण भगवान शिव का गला नीला पड़ गया और यही कारण है कि उनका नाम नीलकंठ पड़ा।

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भगवान शिव को तीसरी आंख कैसे मिली

भगवान शिव जी की हर प्रतिमा में उनके मस्तक पर एक आंख दिखाई देती है। इसे भोलेनाथ की तीसरी आंख कहते हैं। भगवान शिव के मस्तक पर तीसरी आंख है, इसलिए उन्हें त्रिलोचन भी कहा जाता है। वैसे क्या आप जानते हैं कि शिव जी को यह तीसरी आंख कैसे मिली? इस घटना के पीछे एक कहानी है, जिसमें शिव जी की तीसरी आंख का रहस्य और महत्व दोनों पता चलता है। एक समय की बात है, भगवान शिव कैलाश पर्वत पर तपस्या कर रहे थे, तभी देवी पार्वती वहां आईं। देवी पार्वती को मजाक सूझा और उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपने पति शिव की आंखों को ढक लिया। देवी पार्वती को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उनके इस मजाक का क्या परिणाम होगा। जैसे ही पार्वती जी ने भगवान शिव की आंखों को ढका, वैसे ही पूरी सृष्टि में अंधेरा छा गया। सभी लोग अंधेरे से घबरा उठे। शिव जी से लोगों की यह हालत छुप नहीं सकी और उन्होंने अपने मस्तक पर एक आंख उत्पन्न कर ली। भगवान शिव की तीसरी आंख खुलते ही सारे लोकों में उजाला हो गया। तब से शिव जी की तीसरी आंख को प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक माना जाने लगा। भगवान शिव इस घटना के बाद पार्वती जी को बताते हैं कि उनकी दो आंखे पूरी सृष्टि की पालनहार हैं और तीसरी आंख प्रलय का कारण। शास्त्रों में भी कहा गया है कि जब भी भगवान शिव अपनी तीसरी आंख खोलेंगे, तब संसार को विनाश का सामना करना होगा।

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शिव-पार्वती विवाह कथा-पुराणों व तुलसीदास के अनुसार

शिव-पार्वती विवाह कथा-पुराणों के अनुसार~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~माता सती को ही पार्वती, दुर्गा, काली, गौरी, उमा, जगदम्बा, गिरीजा, अम्बे, शेरांवाली, शैलपुत्री, पहाड़ावाली, चामुंडा, तुलजा, अम्बिका आदि नामों से जाना जाता है। इनकी कहानी बहुत ही रहस्यमय है। यह किसी एक जन्म की कहानी नहीं कई जन्मों और कई रूपों की कहानी है।देवी भागवत पुराण में माता के 18 रूपों का वर्णन मिलता है। हालांकि नौ दुर्गा और दस महाविद्याओं (कुल 19) के वर्णन को पढ़कर लगता है कि उनमें से कुछ माता की बहने थीं और कुछ का संबंध माता के अगले जन्म से है। जैसे पार्वती, कात्यायिनी अगले जन्म की कहानी है तो तारा माता की बहन थी।माता सती का पहला जन्म~~~~~~~~~~~~~~~~~~सती माता : पुराणों के अनुसार भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक प्रजापति दक्ष कश्मीर घाटी के हिमालय क्षेत्र में रहते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियां थी- प्रसूति और वीरणी। प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएं जन्मी और वीरणी से साठ कन्याएं। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां और हजारों पुत्र थे।राजा दक्ष की पुत्री ‘सती’ की माता का नाम था प्रसूति। यह प्रसूति स्वायंभुव मनु की तीसरी पुत्री थी। सती ने अपने पिती की इच्छा के विरूद्ध कैलाश निवासी शंकर से विवाह किया था।सती ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध रुद्र से विवाह किया था। रुद्र को ही शिव कहा जाता है और उन्हें ही शंकर। पार्वती-शंकर के दो पुत्र और एक पुत्री हैं। पुत्र- गणेश, कार्तिकेवय और पुत्री वनलता। जिन एकादश रुद्रों की बात कही जाती है वे सभी ऋषि कश्यप के पुत्र थे उन्हें शिव का अवतार माना जाता था। ऋषि कश्यप भगवान शिव के साढूं थे।मां सती ने एक दिन कैलाशवासी शिव के दर्शन किए और वह उनके प्रेम में पड़ गई। लेकिन सती ने प्रजापति दक्ष की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह कर लिया। दक्ष इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि सती ने अपनी मर्जी से एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया था जिसकी वेशभूषा और शक्ल दक्ष को कतई पसंद नहीं थी और जो अनार्य था।दक्ष ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया लेकिन उन्होंने अपने दामाद और पुत्री को यज्ञ में निमंत्रण नहीं भेजा। फिर भी सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई। लेकिन दक्ष ने पुत्री के आने पर उपेक्षा का भाव प्रकट किया और शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। सती के लिए अपने पति के विषय में अपमानजनक बातें सुनना हृदय विदारक और घोर अपमानजनक था। यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और इस अपमान की कुंठावश उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए।सती को दर्द इस बात का भी था कि वह अपने पति के मना करने के बावजूद इस यज्ञ में चली आई थी और अपने दस शक्तिशाली (दस महाविद्या) रूप बताकर-डराकर पति शिव को इस बात के लिए विवश कर दिया था कि उन्हें सती को वहां जाने की आज्ञा देना पड़ी। पति के प्रति खुद के द्वारा किए गया ऐसा व्यवहार और पिता द्वारा पति का किया गया अपमान सती बर्दाश्त नहीं कर पाई और यज्ञ कुंड में कूद गई। बस यहीं से सती के शक्ति बनने की कहानी शुरू होती है।दुखी हो गए शिव जब : यह खबर सुनते ही शिव ने वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ने तांडव नृत्य किया। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा सती के शरीर के टुकड़े करने शुरू कर दिए।शक्तिपीठ : इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आ गए। देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का जिक्र है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। वर्तमान में भी 51 शक्तिपीठ ही पाए जाते हैं, लेकिन कुछ शक्तिपीठों का पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में होने के कारण उनका अस्तित्व खतरें में है। पार्वती कथा :शिव-पार्वती विवाह~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~दक्ष के बाद सती ने हिमालय के राजा हिमवान और रानी मैनावती के यहां जन्म लिया। मैनावती और हिमवान को कोई कन्या नहीं थी तो उन्होंने आदिशक्ति की प्रार्थना की। आदिशक्ति माता सती ने उन्हें उनके यहां कन्या के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। दोनों ने उस कन्या का नाम रखा पार्वती। पार्वती अर्थात पर्वतों की रानी। इसी को गिरिजा, शैलपुत्री और पहाड़ों वाली रानी कहा जाता है।माना जाता है कि जब सती के आत्मदाह के उपरांत विश्व शक्तिहीन हो गया। उस भयावह स्थिति से त्रस्त महात्माओं ने आदिशक्तिदेवी की आराधना की। तारक नामक दैत्य सबको परास्त कर त्रैलोक्य पर एकाधिकार जमा चुका था। ब्रह्मा ने उसे शक्ति भी दी थी और यह भी कहा था कि शिव के औरस पुत्र के हाथों मारा जाएगा।शिव को शक्तिहीन और पत्नीहीन देखकर तारक आदि दैत्य प्रसन्न थे। देवतागण देवी की शरण में गए। देवी ने हिमालय (हिमवान) की एकांत साधना से प्रसन्न होकर देवताओं से कहा- ‘हिमवान के घर में मेरी शक्ति गौरी के रूप में जन्म लेगी। शिव उससे विवाह करके पुत्र को जन्म देंगे, जो तारक वध करेगा।’भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने देवर्षि के कहने मां पार्वती वन में तपस्या करने चली गईं। भगवान शंकर ने पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेजा।सप्तऋषियों ने पार्वती के पास जाकर उन्हें हर तरह से यह समझाने का प्रयास किया कि शिव औघड़, अमंगल वेषभूषाधारी और जटाधारी है। तुम तो महान राजा की पुत्री हो तुम्हारे लिए वह योग्य वर नहीं है। उनके साथ विवाह करके तुम्हें कभी सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो। अनेक यत्न करने के बाद भी पार्वती अपने विचारों में दृढ़ रही।उनकी दृढ़ता को देखकर सप्तऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती को सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद दिया और वे पुन: शिवजी के पास वापस आ गए। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति दृढ़ प्रेम का वृत्तान्त सुनकर भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न हुए और समझ गए कि पार्वती को अभी में अपने सती रूप का स्मरण है।सप्तऋषियों ने शिवजी और पार्वती के विवाह का

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इस कथा के बिना अधूरा है सोमवार का व्रत, भगवान शिव पूरी करेंगे सभी इच्छाएं

एक बार किसी एक नगर में एक साहूकार था। उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन कोई संतान न होने के कारण वह बहुत दुखी था। संतान प्राप्ति के लिए वह हर सोमवार को व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करता था। उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न होकर भगवान शिव से साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। पार्वती जी के आग्रह पर भगवान शिव ने कहा कि ‘हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है’ लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति देखकर उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा व्यक्त की। माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन उन्होंने बताया कि यह बालक 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था, इसलिए उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ समय के बाद साहूकार की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया। साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन देते हुए कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ। तुम लोग रास्ते में यज्ञ कराते जाना और ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा देते हुए जाना। दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी नगरी निकल पड़े। इस दौरान रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था, लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए सोचा क्यों न उसने साहूकार के पुत्र को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा। लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह करा दिया गया।साहूकार का पुत्र ईमानदार था। उसे यह बात सही नहीं लगी इसलिए उसने अवसर पाकर राजकुमारी के दुपट्टे पर लिखा कि ‘तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं।’ जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई। राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया फिर बारात वापस चली गई। दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया। जिस दिन लड़का 12 साल का हुआ उस दिन भी यज्ञ का आयोजन था लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर आराम कर लो। शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए। मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप करना शुरू किया। संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे। पार्वती माता ने भोलेनाथ से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा, आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें।जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था, अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। माता पार्वती के पुन: आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया। शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया। शिक्षा पूरी करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर वापस चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया। उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया।इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए। उसी रात भगवान शिव ने साहूकार के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है। इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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भगवान शिव को प्रसन्न करने के सबसे सरल व आसान उपाय

सनातन धर्म के आदिपंच देवों में से एक शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्रोत हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन हमेशा लय और प्रलय दोनों उनके अधीन रहते हैं। पंडित एसडी शर्मा के अनुसार शिव का अर्थ है कल्याणकारी, शिव यानि बाबा भोलेनाथ, शिवशंकर, शिवशम्भू, शिवजी, नीलकंठ और रूद्र आदि नाम से भगवान शंकर हिंदुओं के शीर्ष देवता हैं, वे देवों के देव महादेव कहे गए हैं। मान्यता है कि यदि शिव को सच्चे मन से याद कर लिया जाए तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं। धर्म कथाओं के अनुसार भगवान शंकर का माता पार्वती के साथ विवाह हुआ था। वहीं हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव का प्रमुख पर्व महाशिवरात्रि हिंदी वर्ष के अंत में आती है, ऐसे में इस दिन पूरे वर्ष में हुई जानें अनजाने गलतियों के लिए भगवान शंकर से क्षमा याचना की जाती है और आने वाले वर्ष में उन्नति व सदगुणों के विकास के लिए प्रार्थना की जाती है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय : ‘ॐ नमः शिवाय:’ पंचतत्वमक मंत्र है इसे शिव पंचक्षरी मंत्र कहते हैं। इस पंचक्षरी मंत्र के जाप से ही मनुष्य संपूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है। भगवान शिव का निरंतर चिंतन करते हुए इस मंत्र का जाप करें।: व्रती दिनभर शिव मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय:’ का जाप करें तथा पूरा दिन निराहार रहें। रोगी, अशक्त और वृद्ध दिन में फलाहार लेकर रात्रि पूजा कर सकते हैं।: शिवपुराण में रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा का विधान है। माना जाता है कि इस दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए। रात को जागरण कर शिवपुराण का पाठ सुनना हर व्रती का धर्म माना गया है।: श्री महाशिवरात्रि व्रत करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। स्नान, वस्त्र, धूप, पुष्प और फलों के अर्पण करें। इसलिए इस दिन उपवास करना अति उत्तम कर्म है।: वहीं सभी प्रकार के पापों का नाश करने और समस्त सुखों की कामना के लिए महाशिवरात्रि व्रत करना श्रेष्ठ माना जाता है।: महाशिवरात्रि की रात को भगवान शिव की चार प्रहर की पूजा बड़े भाव से करने का विधान है। भगवान शिव को दूध, दही, शहद, सफेद पुष्प, सफेद कमल पुष्पों के साथ ही भांग, धतूरा और बिल्व पत्र अति प्रिय हैं। इन मंत्रों का जाप करें-‘ओम नम: शिवाय ‘, ‘ओम सद्योजाताय नम:’, ‘ओम वामदेवाय नम:’, ‘ओम अघोराय नम:’, ‘ओम ईशानाय नम:’, ‘ओम तत्पुरुषाय नम:’। अर्घ्य देने के लिए करें ‘गौरीवल्लभ देवेश, सर्पाय शशिशेखर, वर्षपापविशुद्धयर्थमर्ध्यो मे गृह्यताम तत:’ मंत्र का जाप। रात को शिव चालीसा का पाठ करें। इसके अतिरिक्त पूजा की प्रत्येक वस्तु को भगवान को अर्पित करते समय उससे सम्बन्धित मंत्र का भी उच्चारण करें। प्रत्येक प्रहर की पूजा का सामान अलग से होना चाहिए। भोलेनाथ प्रसन्न को प्रसन्न करने के लिए इन बातों का ध्यान रखते हुए ये चढ़ाएं- :- केसर, चीनी, इत्र, दूध, दही, घी, चंदन, शहद, भांग,सफेद पुष्प, धतूरा और बिल्व पत्र।:- ॐ नम: शिवाय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।:- बिल्व पत्र के तीनों पत्ते पूरे होने चाहिएं, खंडित पत्र कभी न चढ़ाएं।:- चावल सफेद रंग के साबुत होने चाहिएं, टूटे हुए चावलों ना चढ़ायें।:- फूल ताजे ही चढ़ाएं, बासी एवं मुरझाए हुए न हों।:- शिवलिंग पर लाल रंग, केतकी एवं केवड़े के पुष्प अर्पित नहीं किए जाते।:- भगवान शिव पर कुमकुम और रोली का अर्पण भी निषेध है।

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भोलेनाथ का आशीर्वाद तो सावन के हर सोमवार करें ये उपाय

हिंदू धर्म में सावन का महीना भगवान भोलेनाथ को बहुत प्रिय माना जाता है। सावन के महीने में किए जाने वाले पूजा-पाठ और व्रत का भी बड़ा महत्व है। वहीं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि सावन के हर सोमवार को इन उपायों को करने से भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।हिंदू कैलेंडर के अनुसार पांचवा महीना सावन भगवान शिव को बड़ा प्रिय माना गया है। सावन के पूरे महीने में भोलेनाथ के मंदिरों में भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। शिवभक्त महादेव को प्रसन्न करने के लिए पूजा-पाठ, व्रत, अनुष्ठान आदि करते हैं। इस साल श्रावण मास की शुरुआत 14 जुलाई 2022 से हो रही है और सावन का पहला सोमवार 18 जुलाई को है। ऐसे में ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सावन के हर सोमवार को इन उपायों को करके भी भोलेनाथ की विशेष कृपा प्राप्त की जा सकती है… ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सावन के सोमवार का व्रत रखने के अलावा शिवलिंग पर जलाभिषेक को बहुत महत्व दिया गया है। साथ ही प्रत्येक सोमवार को गाय को पालक खिलाने और गरीबों को भोजन तथा वस्त्रों का दान बहुत शुभ माना जाता है। सावन सोमवार के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर गंगाजल, चीनी, चावल और कच्चे दूध के मिश्रण वाला जल भगवान भोलेनाथ को अर्पित करें। मान्यता है कि सावन के हर सोमवार इस तरह से भोलेनाथ का अभिषेक करने से व्यापार, नौकरी और वैवाहिक जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। भोलेनाथ की पूजा में बेलपत्र बहुत शुभ माना जाता है ऐसे में सावन के सोमवार के दिन बेलपत्र पर चंदन से ओम नमः शिवाय लिखें और फिर इस महादेव को अर्पित कर दें। ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक आक का फूल भोलेनाथ हो बेहद प्रिय होता है। ऐसे में मनोकामना की पूर्ति के लिए आक के फूल की माला बनाकर भोलेनाथ को अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित फल देते हैं। (डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई सूचनाएं सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। इनकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह ले लें।)

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सावन सोमवार के दिन भोलेनाथ को इस कथा से करें प्रसन्‍न

भगवान शिव को प्रसन्‍न करने के लिए किसी भी तरह के खास विशेष पूजन की आवश्‍यकता नहीं होती। क्‍योंकि कहा जाता है कि वह तो भोले हैं और भक्‍त की मन से की गई क्षणिक मात्र की भक्ति से ही वह प्रसन्‍न हो जाते हैं। अगर आप भी शिव की भक्ति और कृपा पाने के लिए सावन के सोमवार का व्रत करते हैं तो इस कथा से भोलेनाथ को प्रसन्‍न कर सकते हैं। एक साहूकार था जो शिव का अनन्‍य भक्‍त था। उसके पास धन-धान्‍य किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन उसके पुत्र नहीं था और वह इसी कामना को लेकर रोज शिवजी के मंदिर जाकर दीपक जलाता था। उसके इस भक्ति भाव को देखकर एक दिन माता पार्वती ने शिव जी से कहा कि प्रभु यह साहूकार आपका अनन्‍य भक्‍त है। इसी को किसी बात का कष्‍ट है तो आपको उसे अवश्‍य दूर करना चाहिए। शिव जी बोले कि हे पार्वती इस साहूकार के पास पुत्र नहीं है। यह इसी से दु:खी रहता है। माता पार्वती कहती हैं कि हे प्रभु कृपा करके इसे पुत्र का वरदान दीजिए। तब भोलेनाथ ने कहा कि हे पार्वती साहूकार के भाग्‍य में पुत्र का योग नहीं है। ऐसे में अगर इसे पुत्र प्राप्ति का वरदान मिल भी गया तो वह केवल 12 वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेगा। यह सुनने के बाद भी माता पार्वती ने कहा कि हे प्रभु आपको इस साहूकार को पुत्र का वर देना ही होगा अन्‍यथा भक्‍त क्‍यों आपकी सेवा-पूजा करेंगे? माता के बार-बार कहने से भोलेनाथ ने साहूकार को पुत्र का वरदान दिया। लेकिन यह भी कहा कि वह केवल 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा। साहूकार यह सारी बातें सुन रहा था, इसलिए उसे न तो खुशी हुई और न ही दु:ख। वह पहले की ही तरह भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करता रहा। उधर सेठानी गर्भवती हुई और नवें महीने उसे सुंदर से बालक की प्राप्ति हुई। परिवार में खूब हर्षोल्‍लास मनाया गया लेकिन साहूकार पहले ही की तरह रहा। और उसने बालक की 12 वर्ष की आयु का जिक्र किसी से भी नहीं किया। जब बालक 11 वर्ष की आयु हो गई तो एक दिन साहुकार की सेठानी से बालक के विवाह के लिए कहा। तो साहूकार ने कहा कि वह अभी बालक को पढ़ने के लिए काशीजी भेजेगा। इसके बाद उसने बालक के मामा जी को बुलाया और कहा कि इसे काशी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्‍ते में जिस भी स्‍थान पर रुकना वहां यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए आगे बढ़ना। उन्‍होंने भी इसी तरह करते हुए जा रहे थे कि रास्‍ते में एक राजकुमारी का विवाह था। जिससे उसका विवाह होना था वह एक आंख से काना था। तो उसके पिता ने जब अति सुंदर साहूकार के बेटे को देखा तो उनके मन में आया कि क्‍यों न इसे ही घोड़ी पर बिठाकर शादी के सारे कार्य संपन्‍न करा लिये जाएं। तो उन्‍होंने मामा से बात की और कहा कि इसके बदले में वह ढेर सारा धन देंगे तो वह भी राजी हो गए।इसके बाद साहूकार का बेटा विवाह की बेदी पर बैठा और जब विवाह कार्य संपन्‍न हो गए तो जाने से पहले उसने राजकुमारी की चुंदरी के पल्‍ले पर लिखा कि तेरा विवाह तो मेरे साथ हुआ लेकिन जिस राजकुमार के साथ भेजेंगे वह तो एक आंख का काना है। इसके बाद वह अपने मामा के साथ काशी के लिए चला गया। उधर जब राजकुमार ने अपनी चुनरी पर यह लिखा हुआ पाया तो उसने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया। तो राजा ने भी अपनी पुत्री को बारात के साथ विदा नहीं किया। बारात वापस लौट गई। उधर मामा और भांजे काशी जी पहुंच गये थे। एक दिन जब मामा ने यज्ञ रचा रखा था और भांजा बहुत देर तक बाहर नहीं आया तो मामा ने अंदर जाकर देखा तो भांजे के प्राण निकल चुके थे। वह बहुत परेशान हुए लेकिन सोचा कि अभी रोना-पीटना मचाया तो ब्राह्मण चले जाएंगे और यज्ञ का कार्य अधूरा रह जाएगा। जब यज्ञ संपन्‍न हुआ तो मामा ने रोना-पीटना शुरू किया। उसी समय शिव-पार्वती उधर से जा रहे थे तो माता पार्वती ने शिव से कहा कि हे प्रभु कौन रो रहा है इतना तभी उन्‍हें पता चलता है कि यह तो भोलेनाथ के आर्शीवाद से जन्‍मा साहूकार का पुत्र है। तो वह कहती हैं कि हे स्‍वामी इसे जीवित कर दें अन्‍यथा इसके माता-पिता के रोते-रोते प्राण निकल जाएंगे। तब भोलेनाथ ने कहा कि हे पार्वती इसकी आयु इतनी ही थी सो वह भोग चुका। लेकिन मां के बार-बार आग्रह करने पर भोलेनाथ ने उसे जीवित कर दिया। लड़का ओम नम: शिवाय करते हुए जी उठा और मामा-भांजे दोनों ने ईश्‍वर को धन्‍यवाद दिया और अपनी नगरी की ओर लौटे। रास्‍ते में वही नगर पड़ा और राजकुमारी ने उन्‍हें पहचान लिया तब राजा ने राजकुमारी को साहूकार के बेटे के साथ बहुत सारे धन-धान्‍य के साथ विदा किया। उधर साहूकार और उसकी पत्‍नी छत पर बैठे थे। उन्‍होंने यह प्रण कर रखा था कि यदि उनका पुत्र सकुशल न लौटा तो वह छत से कूदकर अपने प्राण त्‍याग देंगे। तभी लड़के के मामा ने आकर साहूकार के बेटे और बहू के आने का समाचार सुनाया लेकिन वे नहीं मानें तो मामा ने शपथ पूर्वक कहा त‍ब तो दोनों को विश्‍वास हो गया और दोनों ने अपने बेटे-बहू का स्‍वागत किया। उसी रात साहूकार को स्‍वप्‍न ने शिव जी ने दर्शन दिया और कहा कि तुम्‍हारे पूजन से मैं प्रसन्‍न हुआ। इसी प्रकार जो भी व्‍यक्ति इस कथा को पढ़ेगा या सुनेगा उसके समस्‍त दु:ख दूर हो जाएंगे और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होगी।

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इन पवित्र पर्वों और त्योहारों से भरा है शिव शंभू को समर्पित सावन माह 

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव को सावन का महीना बेहद प्रिय है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है जिसमें भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। वर्ष 2022 में सावन का महीना 14 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है। इस वर्ष सावन का पहला सोमवार 18 जुलाई के दिन पड़ने वाला है। जो भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करता है और उनकी तपस्या में लीन रहता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा उसे जीवन में हमेशा सफलता हाथ लगती है। इसके साथ यह भी कहा जाता है कि अविवाहित कन्याओं के लिए भी सावन में व्रत करना फलदाई होता है। माना जाता है कि सावन में भगवान शिव की पूजा करने के दौरान पौराणिक कथाओं का पाठ अवश्य करना चाहिए। जो भक्त भगवान शिव की पौराणिक कथा का पाठ करता है उसे व्रत का पूरा फल मिलता है।  सावन माह प्रारंभ, समापन और‌ सभी सोमवारी व्रतों की तिथियां सावन माह प्रारंभ- 14 जुलाई 2022 सावन माह समान- 12 अगस्त 2022 सावन का पहला सोमवारी व्रत- 18 जुलाई 2022 सावन का दूसरा सोमवारी व्रत- 25 जुलाई 2022  सावन का तीसरा सोमवारी व्रत- 01 अगस्त 2022  सावन का चौथा सोमवारी व्रत- 08 अगस्त 2022 सावन माह में सभी मंगला गौरी​ व्रतों की तिथि  प्रथम मंगला गौरी व्रत- 19 जुलाई 2022 द्वितीय मंगला गौरी व्रत- 26 जुलाई 2022  तृतीय मंगला गौरी व्रत- 2 अगस्त 2022  चतुर्थ मंगला गौरी व्रत- 9 अगस्त 2022 आपको बता दें सावन के महीने में पड़ने वाले सभी मंगलवार को मंगला गौरी व्रत रखा जाता है। सावन माह में पड़ने वाले प्रमुख व्रत, पर्व और त्योहर 2022 पुत्रदा एकादशी व्रत- 08 अगस्त 2022, दिन- सोमवार सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। संतान प्राप्ति की अभिलाषा से भक्त यह व्रत रखते हैं। इसके साथ संतान के अच्छे स्वास्थ्य और भविष्य के लिए भी यह व्रत रखना लाभदायक माना गया है। सावन शिवरात्रि- 26 जुलाई 2022, दिन- मंगलवार सावन माह में सावन शिवरात्रि का व्रत रखने से समस्त पाप खत्म हो जाते हैं। महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती हैं। सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ने वाली सावन शिवरात्रि के दिन रुद्राभिषेक करने से जीवन में खुशहाली आती है। हरियाली अमावस्या- 28 जुलाई 2022, दिन- गुरुवार  श्रावण मास की अमावस्या तिथि को हरियाली अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। यह तिथि पर्यावरण के महत्व को दर्शाती है। इस दिन कृषि उपकरणों की पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पौधा लगाना फलदाई होता है। हरियाली तीज व्रत- 31 जुलाई 2022, दिन- रविवार  सनातन धर्म में हरियाली तीज का पर्व बेहद प्रमुख माना गया है। यह पर्व सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाता है। शादीशुदा स्त्रियों और कुंवारी लड़कियों के लिए हरियाली तीज का व्रत रखना लाभदायक माना गया है।  नाग पंचमी व्रत- 02 अगस्त 2022, दिन- मंगलवार  सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता के साथ भगवान भोलेनाथ की भी पूजा की जाती है।  रक्षाबंधन- 11 अगस्त, दिन- गुरुवार भाई बहन के प्यार का प्रतीक है रक्षाबंधन का त्योहार, जो इस वर्ष 11 अगस्त को पड़ रहा है। यह त्योहार हर वर्ष श्रावण माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाता है। 

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सिर्फ मांस-मदिरा ही नहीं बल्कि सावन माह में नहीं खानी चाहिए ये चीजें, जानें क्या क्या है शामिल

भगवान भोलेनाथ की भक्ति का महीना सावन शुरू हो चुका है। गुरुवार 14 जुलाई 2022 से सावन का पावन महीना शुरू होगा जोकि 12 अगस्त 2022 तक रहेगा। सावन का महीना धार्मिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि यह माह भगवान शिवजी की भक्ति-आराधना के लिए समर्पित होता है। सावन के पूरे महीने भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं सावन में पड़ने वाले सोमवार के दिन व्रत रखने का विधान है। सावन माह में जिस तरह पूजा-पाठ और व्रत के के दौरान कई नियमों का पालन करना पड़ता है। ठीक उसी तरह सावन माह में खान-पान को लेकर भी सावधानी बरतनी चाहिए। इस माह मांस-मदिरा के सेनव का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए।  आयुर्वेद में सावन के माह में खान-पान को लेकर विशेष निर्देश दिए गए हैं। इसका कारण यह है कि इस माह मानसून और हरियाली होती है। इसलिए इस माह लोगों के बीमार होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। जानते हैं इस महीने मांस मदिरा के त्याग के साथ ही किन चीजों को नहीं खाना चाहिए और किन चीजों का सेवन अच्छा माना गया है। सावन महीने में भूलकर न खाएं ये चीजें दही सावन माह में दही खाने की सलाह नहीं दी जाती। इसका कारण यह होता है कि दही की तासीर ठंडी होती है जोकि इस माह बीमारी की संभावना को बढ़ा सकती है। सावन महीने में दही का सेवन करने से सर्दी जुकाम और गले से संबंधित बीमारियां हो सकती है। दूध दही की तरह ही सावन के महीने में दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। इस महीने दूध पीने से पेट संबंधी बीमारियां और अत्यधिक गैस की संभावना बढ़ जाती है। सावन में दूध नहीं पीने का धार्मिक कारण यह भी है कि भगवान शिवजी को सावन में दूध से अभिषेक किया जाता है। इस कारण भी इस महीने कच्चा दूध नहीं पीना चाहिए। बैंगन सावन महीने में बैंगन या बैंगन से बनी प्रकार का व्यंजन नहीं खाना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार बैंगन को अशुद्ध सब्जी के रूप में माना गया है। इसलिए सावन के पवित्र माह में बैंगन नहीं खाना चाहिए। इसका दूसरा कारण यह भी है कि इस माह खूब वर्षा होती है जिस कारण बैंगन में कीड़े ज्यादा लगते हैं। इसलिए भी सावन में बैंगन खाने के लिए मना किया जाता है। मांसाहार भोजन सावन के महीने में मांसाहार भोजन का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए और सात्विक चीजें खानी चाहिए। लेकिन खासकर इस माह मछली नहीं खानी चाहिए। क्योंकि बारिश में नदी-तालाब का पानी प्रदूषित हो जाता है और इससे इसमें रहने वाले जल-जीव भी दूषित हो जाते हैं, जिसे खाने से बीमारियां हो सकती है। पत्तेदार साग-सब्जियां सावन माह में पत्तेदार हरी सब्जियां जैसे पालक, साग, गोभी, मूली जैसी सब्जियों को भी नहीं खाना चाहिए। क्योंकि मॉनसून होने के कारण इनमें कीड़े लगते हैं। प्याज-लहसुन और तली-भुनी चीजें  सावन माह में प्याज-लहसुन का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए। साथ ही ज्यादा तले-भुने भोजन से भी परहेज करना चाहिए। सावन में खाएं ये चीजें जल्दी पचने वाली सब्जियां सावन के महीने में ऐसी हरी सब्जियों का सेवन करें जो जल्दी डाइजेस्ट होती हो। जैसे इस माह लौकी और तुरई जैसी सब्जियों को सबसे अच्छा माना जाता है।

सिर्फ मांस-मदिरा ही नहीं बल्कि सावन माह में नहीं खानी चाहिए ये चीजें, जानें क्या क्या है शामिल Read More »