SHIV

सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी।

आषाढ़ माह खत्म होते ही सावन माह की शुरुआत आज 14 जुलाई से शुरू हो गई है। सावन का महीना भोलेनाथ की पूजा-अराधना के लिए समर्पित होता है। इस पूरे माह भगवान शिवजी की विशेष आराधना की जाती है, जिससे वे प्रसन्न होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। सावन शिवजी का प्रिय माह होता है।

सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। Read More »

इस शुभ संयोग में शुरू होगा सावन का महीना, जानें कितने होंगे सोमवार व्रत

ऐसी मान्यताएं हैं कि श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस साल श्रावण मास जुलाई से 12 अगस्त तक रहने वाला है हिंदुओं की धार्मिक आस्था का महीना सावन धीरे-धीरे नजदीक आता जा रहा है. यह महीना भगवान शिव (Lord Shiva) का पसंदीदा वक्त माना जाता

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संपूर्ण महामृत्युंजय मंत्र, जानें जप विधि, अर्थ एवं इससे होने वाले लाभ

आज महाशिवरात्रि का दिन भगवान शिव की आराधाना के लिए समर्पित होता है। ऐसे में आज हम आपको उनके सबसे प्रभावशाली महामृत्युंजय मंत्र के बारे में बता रहे हैं। महामृत्युंजय मंत्र के जाप की विधि क्या है? महामृत्युंजय मंत्र का अर्थ क्या है? महामृत्युंजय मंत्र के जाप से होने वाले लाभ क्या हैं? संपूर्ण महामृत्युंजय

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द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम्

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् । भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ १॥ श्रीशैलश‍ृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् । तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥ २॥ अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥ ३॥ कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय । सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ४॥ पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं

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