SHIV

सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी।

आषाढ़ माह खत्म होते ही सावन माह की शुरुआत आज 14 जुलाई से शुरू हो गई है। सावन का महीना भोलेनाथ की पूजा-अराधना के लिए समर्पित होता है। इस पूरे माह भगवान शिवजी की विशेष आराधना की जाती है, जिससे वे प्रसन्न होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। सावन शिवजी का प्रिय माह होता है। यही कारण है कि शिवभक्तों को भी इस माह का बेसब्री से इंतजार रहता है। वैसे तो भोले भंडारी एक लोटे शुद्ध जल से जलाभिषेक करने मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन यदि आप सावन में भगवान शिव की विशेष कृपा चाहते हैं तो उनके प्रिय फल-फूल के साथ ही यह 5 तरह के अनाज अर्पित करें। शिवजी को इन 5 तरह के अनाज चढ़ाने से आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी होगी और कष्टों से मुक्ति मिलेगी। जानते हैं कौन से हैं ये पांच अनाज.. सावन में शिवजी को अर्पित करें ये 5 अनाज अक्षत सावन माह में शिवलिंग पर सफेद चावल या अक्षत चढ़ाने से धन लाभ होता है। सावन सोमवारी के दिन एक मुट्ठी अक्षत शिवजी को चढ़ाएं और इसके बाद यह अक्षत किसी गरीब को दान दे दें। ऐसा करने से रुपये-पैसों से जुड़ी समस्या दूर होती है। लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि चावल का कोई भी दाना टूटा हुआ न हो। काला तिल भांग, धतूरा और बेलपत्र की तरह ही शिवलिंग पर काला तिल भी चढ़ाया जाता है। क्योंकि काला तिल भगवान शिव को अतिप्रिय है। सावन में शिवजी को काले तिल अर्पित करने से मानसिक और शारीरिक संबंधी परेशानियां दूर होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। अरहर दाल सावन माह में शिवलिंग पर पीली अरहर की दाल अर्पित करना बेहद शुभ होता है। ऐसा करने से व्यक्ति को सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गेहूं विवाह में किसी कारण देरी हो रही है या बाधाएं उत्पन्न हो रही है तो सावन माह में शिवलिंग पर गेहूं अर्पित करना चाहिए। साथ ही गेहूं चढ़ाने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है और व्यक्ति के बौद्धिक स्तर का भी विकास होता है। मूंग हरे मूंग की दाल सावन माह में शिवलिंग पर अर्पित करें। इससे भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस पूरे माह शिवजी की आराधना की जाएगी। सावन में भोलेनाथ अपने भक्तों से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। सावन में शिवजी को कई तरह के अभिषेक किए जाते हैं और फल-फूल चढ़ाए जाते हैं। लेकिन सावन में 5 तरह के अनाज शिवजी को अर्पित करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। Read More »

इस शुभ संयोग में शुरू होगा सावन का महीना, जानें कितने होंगे सोमवार व्रत

ऐसी मान्यताएं हैं कि श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. इस साल श्रावण मास जुलाई से 12 अगस्त तक रहने वाला है हिंदुओं की धार्मिक आस्था का महीना सावन धीरे-धीरे नजदीक आता जा रहा है. यह महीना भगवान शिव (Lord Shiva) का पसंदीदा वक्त माना जाता है और इस दौरान बड़ी संख्या में लोग व्रत रखकर शिव की आराधना करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि सावन में भगवान अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं. सावन में सोमवार का व्रत रखकर पूरी विधि के साथ पूजा-अर्चना करने से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं. महादेव के भक्त इस वक्त यह जानना चाहते हैं कि साल 2022 में सावन का महीना कब शुरू होगा. इसके अलावा इस महीने में कितने सोमवार आएंगे और किस तरह पूजा करने से भक्तों को पूरा लाभ मिलेगा. कब से शुरू होगा सावन का महीना? श्री रामदेव मिश्रा शास्त्री जी का कहना है कि 13 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के साथ आषाढ़ का महीना खत्म हो जाएगा. 14 जुलाई से सावन का पवित्र महीना शुरू हो जाएगा. उनके मुताबिक इस बार सावन में 4 सोमवार होंगे. सावन का महीना 12 अगस्त को खत्म हो जाएगा. सावन में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-शांति आती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. सावन के पावन महीने में भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व माना गया है. इसके अलावा सावन में काल सर्पदोष शांति के लिए विशेष पूजा कराई जा सकती है. महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से भी लोगों को परेशानियों से मुक्ति मिल जाएगी. इस सावन में कितने सोमवार? सावन का महीना 14 जुलाई यानी गुरुवार से शुरू होगा. इस पवित्र महीने का पहला सोमवार 18 जुलाई को होगा. दूसरा सोमवार 25 जुलाई, तीसरा सोमवार 1 अगस्त और चौथा सोमवार 8 अगस्त को होगा. आचार्य सर्वेश पांडे के मुताबिक इस साल सावन में केवल चार सोमवार ही होंगे क्योंकि सावन का महीना 12 अगस्त को खत्म हो जाएगा.

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संपूर्ण महामृत्युंजय मंत्र, जानें जप विधि, अर्थ एवं इससे होने वाले लाभ

आज महाशिवरात्रि का दिन भगवान शिव की आराधाना के लिए समर्पित होता है। ऐसे में आज हम आपको उनके सबसे प्रभावशाली महामृत्युंजय मंत्र के बारे में बता रहे हैं। महामृत्युंजय मंत्र के जाप की विधि क्या है? महामृत्युंजय मंत्र का अर्थ क्या है? महामृत्युंजय मंत्र के जाप से होने वाले लाभ क्या हैं? संपूर्ण महामृत्युंजय मंत्र ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृ त्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ। लघु मृत्युंजय मंत्र ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ। महामृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ इस पूरे संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले भगवान शिव की हम पूजा करते हैं। इस पूरे विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शंकर हमें मृत्‍यु के बंधनों से मुक्ति प्रदान करें, जिससे कि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। महामृत्‍युंजय मंत्र जप की विधि महामृत्‍युंजय मंत्र का जाप आपको सवा लाख बार करना चाहिए। वहीं, भोलेनाथ के लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप 11 लाख बार किया जाता है। सावन माह में इस मंत्र का जाप अत्यंत ही कल्याणकारी माना जाता है। वैसे आप यदि अन्य माह में इस मंत्र का जाप करना चाहते हैं तो सोमवार ​के दिन से इसका प्रारंभ कराना चाहिए। इस मंत्र के जाप में रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। इस बात का ध्यान रखें कि दोपहर 12 बजे के बाद महामृत्‍युंजय मंत्र का जाप न करें। मंत्र का जाप पूर्ण होने के बाद हवन करन उत्तम माना जाता है। क्यों करते हैं महामृत्युंजय मंत्र का जाप महामृत्युंजय मंत्र का जाप विशेष परिस्थितियों में ही किया जाता है। अकाल मृत्यु, महारोग, धन-हानि, गृह क्लेश, ग्रहबाधा, ग्रहपीड़ा, सजा का भय, प्रॉपर्टी विवाद, समस्त पापों से मुक्ति आदि जैसे स्थितियों में भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाता है। इसके चमत्कारिक लाभ देखने को मिलते हैं। इन सभी समस्याओं से मुक्ति के लिए महामृत्युंजय मंत्र या लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाता है।

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द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम्

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् । भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ १॥ श्रीशैलश‍ृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम् । तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥ २॥ अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम् । अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥ ३॥ कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय । सदैवमान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ४॥ पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥ ५॥ याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः । सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ६॥ महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः । सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे ॥ ७॥ सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे । यद्धर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे ॥ ८॥ सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः । श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥ ९॥ यं डाकिनिशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च । सदैव भीमादिपदप्रसिद्दं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि ॥ १०॥ सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् । वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥ ११॥ इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम् । वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणम् प्रपद्ये ॥ १२॥ ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण । स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥ ॥ इति श्रीमद्शङ्कराचार्यविरचितं द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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