MANTRA

गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि (Gananaykay Gandevatay Ganadhyakshay Dheemahi)

अर्थ: यह संस्कृत मंत्र भगवान गणेश को समर्पित है, जिन्हें बाधाओं को दूर करने वाले हिंदू देवता के रूप में जाना जाता है। यहाँ शब्दों का विवरण दिया गया है: समग्र अर्थ: मंत्र का अर्थ है, “हम भगवान गणेश, गणों के नेता, देवता और प्रमुख का ध्यान करते हैं।” यह उनके आशीर्वाद और मार्गदर्शन की प्रार्थना है। गण: हिंदू पौराणिक कथाओं में, गण दिव्य प्राणियों का एक समूह है जो भगवान गणेश की सेवा करते हैं। उन्हें अक्सर हाथी जैसी विशेषताओं के साथ दर्शाया जाता है। महत्व: इस मंत्र का जाप आमतौर पर किसी भी नए उद्यम या उपक्रम को शुरू करने से पहले किया जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इससे भगवान गणेश का आशीर्वाद मिलता है और किसी भी संभावित बाधा को दूर किया जाता है। गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि (Gananaykay Gandevatay Ganadhyakshay Dheemahi) गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि ।गुणशरीराय गुणमण्डिताय गुणेशानाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥ गानचतुराय गानप्राणाय गानान्तरात्मने,गानोत्सुकाय गानमत्ताय गानोत्सुकमनसे ।गुरुपूजिताय गुरुदेवताय गुरुकुलस्थायिने,गुरुविक्रमाय गुह्यप्रवराय गुरवे गुणगुरवे ।गुरुदैत्यगलच्छेत्रे गुरुधर्मसदाराध्याय,गुरुपुत्रपरित्रात्रे गुरुपाखण्डखण्डकाय ।गीतसाराय गीततत्त्वाय गीतगोत्राय धीमहि,गूढगुल्फाय गन्धमत्ताय गोजयप्रदाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि,एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥ ग्रन्थगीताय ग्रन्थगेयाय ग्रन्थान्तरात्मने,गीतलीनाय गीताश्रयाय गीतवाद्यपटवे ।गेयचरिताय गायकवराय गन्धर्वप्रियकृते,गायकाधीनविग्रहाय गङ्गाजलप्रणयवते ।गौरीस्तनन्धयाय गौरीहृदयनन्दनाय,गौरभानुसुताय गौरीगणेश्वराय ।गौरीप्रणयाय गौरीप्रवणाय गौरभावाय धीमहि,गोसहस्राय गोवर्धनाय गोपगोपाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि,एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥

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दीपावली पूजा मंत्र (Deepawali Puja Mantras)

Deepawali Puja Mantras 1. गोवत्स द्वादशी मंत्र Deepawali Puja Mantras :अर्घ्य मंत्रक्षीरोदार्नवसंभूते सुरासुरनमस्कृते।सर्वदेवमये मातर्गृहाण्घ्यं नमो नमः॥ निवेदन मंत्रगोवत्स द्वादशी निवेदन मंत्र सुरभि त्वं जगन्मातरदेवी विष्णुपदे स्थिता।सर्वदेवमये ग्रसं मया दत्तमिदं ग्रसा॥ प्रार्थना मंत्रसर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते।मातरमाभिलाषितं सफलं कुरु नंदिनी॥ Deepawali Puja Mantra मन्त्र अर्थ – हे समस्त देवताओं द्वारा अलङ्कृत माता! नन्दिनी! मेरा मनोरथ पुर्ण करो। 2. यमदीप मंत्रमृत्युना पाषादण्डभ्यं कालेन श्यामया सहः।त्रयोदश्यां दीपदानत्सुर्यजः प्रियतम मम॥ मंत्र अर्थ – त्रयोदशी के दिन मैं यह दीपक सूर्य पुत्र यानि यमदेव को अर्पित करता हूं। वे मुझे मृत्युपाश से मुक्त करें और मेरा कल्याण करें। 3. अभ्यंग स्नान मंत्रसीतालोष्टासमायुक्ता सकान्तकदलन्विता।हर पापमपामार्ग भ्रम्यमानः पुनः पुनः॥ मंत्र का अर्थ – हे कांटेदार भूसी के फूल वाला पौधा, जो जुती हुई भूमि की मिट्टी, कांटों और पत्तियों से युक्त है; मेरे पापों को नष्ट कर दो. 4. नरक चतुर्दशी दीपदान मंत्रदत्तो दीपश्चतुर्दश्याम नरकाप्रीतये मया।चतुर्वर्तिसामायुक्तः सर्वपापनुत्तये॥ मंत्र अर्थ – इस चतुर्दशी के दिन, नर्क देवता की प्रसन्नता के लिए और सभी पापों के नाश के लिए मैं यह चार मुख वाला, चार बातियों वाला दीपक अर्पित करता हूं। 5. लक्ष्मी मंत्रॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः॥ मंत्र अर्थ – मैं धन और समृद्धि की देवी देवी लक्ष्मी को नमस्कार करता हूं। 6. बाली नमस्कार मंत्रबलिराजा नमस्तुभ्यं दैत्यदानववंदिता।इन्द्रशत्रोअमरते विष्णुसन्निध्यदो भव॥बलिमुद्दिश्य दीयन्ते दानानि कुरुनन्दना।यानि तन्यक्षान्याहुर्मयैवं सम्प्रदर्शितम्॥ मन्त्र का अर्थ – दैत्य तथा दानवों से पूजित हे बलिराज, आपको नमस्कार है। हे इन्द्रशत्रो, हे अमराराते, विष्णु के सानिध्य को देने वाला हो।हे कुरुनन्दन, बलि को उद्देश्य कर जो दान दिये जाते हैं वे अक्षय को प्राप्त होते हैं। मैंने इस प्रकार प्रदर्शित किया है। 7. गोवर्धन मंत्रगोवर्धन धराधर गोकुलत्राणकारक:।बहुबाहुकृतच्छया गावं कोटिप्रदो भव॥ मंत्र का अर्थ – हे गोवर्धन, जो पृथ्वी का समर्थन करता है! आप गोकुल के रक्षक हैं. भगवान श्री कृष्ण ने आपको अपनी भुजाओं पर उठा लिया था। मुझे करोड़ों गौएँ प्रदान करें। 8. गौ मंत्रलक्ष्मीर्य लोकापालं धेनुरूपेण संस्थिता।घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु॥ Deepawali Puja Mantras:मंत्र का अर्थ – हे गाय, जो स्वयं गाय के रूप में लक्ष्मी है और जो यज्ञ के लिए घी प्रदान करती है, मेरे पापों को नष्ट कर दे। 9. यम द्वितीया मंत्रएह्येहि मार्तण्डजा पाशहस्ता यमान्तकलोकधर्मरेषा।भ्रातृद्वितीयकृतदेवपूजं गृहाणा चार्घ्यं भगवन्नमोस्तु ते॥ Deepawali Puja Mantras मन्त्र का अर्थ – हे मार्तण्डज – सूर्य से उत्पन्न हुए, हे पाशहस्त – हाथ में पाश धारण करने वाले, हे यम, हे अन्तक, हे लोकधर, हे अमरेश, भातृद्वितीया में की हुई देवपूजा और अर्घ्य को ग्रहण करो। हे भगवन् आपको नमस्कार है। 10. मार्गपाली मंत्रमार्गपाली नमस्तेस्तु सर्वलोकसुखप्रदे।विधेयैः पुत्रदारद्यैः पुनरेहि व्रतस्य मे॥ मंत्र का अर्थ – हे मार्ग पर चलने वाले उत्सव, सभी जीवित प्राणियों को खुशी प्रदान करते हुए, मैं आपको प्रणाम करता हूं। मेरे संकल्पित धार्मिक अनुष्ठान (व्रत) के लिए दोबारा आना। Deepawali Puja Mantras

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श्री दीनबंधु अष्टकम (Shri Dinabandhu Ashtakam)

Shri Dinabandhu Ashtakam Shri Dinabandhu Ashtakam:श्री दीनबंधु अष्टकम भगवान विष्णु के प्रसिद्ध अष्टकमों में से एक है। ॥ श्री दीनबन्ध्वष्टकम् ॥यस्मादिदं जगदुदेति चतुर्मुखाद्यंयस्मिन्नवस्थितमशेषमशेषमूले।यत्रोपयाति विलयं च समस्तमन्तेदृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥1॥ चक्रं सहस्रकरचारु करारविन्देगुर्वी गदा दरवरश्च विभाति यस्य।पक्षीन्द्रपृष्ठपरिरोपितपादपद्मो।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥2॥ येनोद्धृता वसुमती सलिले निमग्ना नग्नाच पाण्डववधूः स्थगिता दुकूलैः।संमोचितो जलचरस्य मुखाद्गजेन्द्रो।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥3॥ यस्यार्द्रदृष्टिवशतस्तु सुराः समृद्धिंकोपेक्षणेन दनुजा विलयं व्रजन्ति।भीताश्चरन्ति च यतोऽर्कयमानिलाद्या।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥4॥ गायन्ति सामकुशला यमजं मखेषुध्यायन्ति धीरमतयो यतयो विविक्ते।पश्यन्ति योगिपुरुषाः पुरुषं शरीरे।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥5॥ आकाररूपगुणयोगविवर्जितोऽपि मददभक्तानुकम्पननिमित्तगृहीतमूर्तिः।यः सर्वगोऽपि कृतशेषशरीरशय्यो।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥6॥ यस्याङ्घ्रिपङ्कजमनिद्रमुनीन्द्रवृन्दैराराध्यते भवदवानलदाहशान्त्यै।सर्वापराधमविचिन्त्य ममाखिलात्मा।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥7॥ यन्नामकीर्तनपरः श्वपचोऽपि नूनंहित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति।दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन।दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः॥8॥ दीनबन्ध्वष्टकं पुण्यंब्रह्मानन्देन भाषितम्।यः पठेत् प्रयतो नित्यंतस्य विष्णुः प्रसीदति॥9॥ ॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीदीनबन्ध्वष्टकं सम्पूर्णम् ॥

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राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र (Radha Kriya Kataksh Stotram)

मुनीन्द्र–वृन्द–वन्दिते त्रिलोक–शोक–हारिणिप्रसन्न-वक्त्र-पण्कजे निकुञ्ज-भू-विलासिनिव्रजेन्द्र–भानु–नन्दिनि व्रजेन्द्र–सूनु–संगतेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१॥ अशोक–वृक्ष–वल्लरी वितान–मण्डप–स्थितेप्रवालबाल–पल्लव प्रभारुणांघ्रि–कोमले ।वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालयेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥२॥ अनङ्ग-रण्ग मङ्गल-प्रसङ्ग-भङ्गुर-भ्रुवांसविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्त–बाणपातनैः ।निरन्तरं वशीकृतप्रतीतनन्दनन्दनेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥३॥ तडित्–सुवर्ण–चम्पक –प्रदीप्त–गौर–विग्रहेमुख–प्रभा–परास्त–कोटि–शारदेन्दुमण्डले ।विचित्र-चित्र सञ्चरच्चकोर-शाव-लोचनेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥४॥ राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र मदोन्मदाति–यौवने प्रमोद–मान–मण्डितेप्रियानुराग–रञ्जिते कला–विलास – पण्डिते ।अनन्यधन्य–कुञ्जराज्य–कामकेलि–कोविदेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥५॥ अशेष–हावभाव–धीरहीरहार–भूषितेप्रभूतशातकुम्भ–कुम्भकुम्भि–कुम्भसुस्तनि ।प्रशस्तमन्द–हास्यचूर्ण पूर्णसौख्य –सागरेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥६॥ मृणाल-वाल-वल्लरी तरङ्ग-रङ्ग-दोर्लतेलताग्र–लास्य–लोल–नील–लोचनावलोकने ।ललल्लुलन्मिलन्मनोज्ञ–मुग्ध–मोहिनाश्रितेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥७॥ सुवर्णमलिकाञ्चित –त्रिरेख–कम्बु–कण्ठगेत्रिसूत्र–मङ्गली-गुण–त्रिरत्न-दीप्ति–दीधिते ।सलोल–नीलकुन्तल–प्रसून–गुच्छ–गुम्फितेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥८॥ नितम्ब–बिम्ब–लम्बमान–पुष्पमेखलागुणेप्रशस्तरत्न-किङ्किणी-कलाप-मध्य मञ्जुले ।करीन्द्र–शुण्डदण्डिका–वरोहसौभगोरुकेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥९॥ अनेक–मन्त्रनाद–मञ्जु नूपुरारव–स्खलत्समाज–राजहंस–वंश–निक्वणाति–गौरवे ।विलोलहेम–वल्लरी–विडम्बिचारु–चङ्क्रमेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥१०॥ अनन्त–कोटि–विष्णुलोक–नम्र–पद्मजार्चितेहिमाद्रिजा–पुलोमजा–विरिञ्चजा-वरप्रदे ।अपार–सिद्धि–ऋद्धि–दिग्ध–सत्पदाङ्गुली-नखेकदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष–भाजनम् ॥११॥ मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरित्रिवेद–भारतीश्वरि प्रमाण–शासनेश्वरि ।रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद–काननेश्वरिव्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोस्तुते ॥१२॥ इती ममद्भुतं-स्तवं निशम्य भानुनन्दिनीकरोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्ष-भाजनम् ।भवेत्तदैव सञ्चित त्रिरूप–कर्म नाशनंलभेत्तदा व्रजेन्द्र–सूनु–मण्डल–प्रवेशनम् ॥१३॥ राकायां च सिताष्टम्यां दशम्यां च विशुद्धधीः ।एकादश्यां त्रयोदश्यां यः पठेत्साधकः सुधीः ॥१४॥ यं यं कामयते कामं तं तमाप्नोति साधकः ।राधाकृपाकटाक्षेण भक्तिःस्यात् प्रेमलक्षणा ॥१५॥ ऊरुदघ्ने नाभिदघ्ने हृद्दघ्ने कण्ठदघ्नके ।राधाकुण्डजले स्थिता यः पठेत् साधकः शतम् ॥१६॥ तस्य सर्वार्थ सिद्धिः स्याद् वाक्सामर्थ्यं तथा लभेत् ।ऐश्वर्यं च लभेत् साक्षाद्दृशा पश्यति राधिकाम् ॥१७॥ तेन स तत्क्षणादेव तुष्टा दत्ते महावरम् ।येन पश्यति नेत्राभ्यां तत् प्रियं श्यामसुन्दरम् ॥१८॥ नित्यलीला–प्रवेशं च ददाति श्री-व्रजाधिपः ।अतः परतरं प्रार्थ्यं वैष्णवस्य न विद्यते ॥१९॥॥ इति श्रीमदूर्ध्वाम्नाये श्रीराधिकायाः कृपाकटाक्षस्तोत्रं सम्पूर्णम ॥

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Shiv mantra:सावन महीने में रोजाना करें इन मंत्रों का जाप, सभी कष्टों से मिलेगी मुक्ति ?

सावन महीने में मंत्र जाप: कष्टों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना और मंत्र जाप के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने में किए गए मंत्र जाप का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। सावन का महीना देवों के देव महादेव को अति प्रिय है। इस महीने में प्रत्येक दिन महादेव और माता पार्वती की पूजा-उपासना की जाती है। साथ ही सावन सोमवार पर भगवान शिव के निमित्त व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा करने से साधक के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। साथ ही व्यक्ति विशेष को उनकी मनोकामना के अनुरूप फल की प्राप्ति होती है। अतः साधक यथा शक्ति तथा भक्ति भाव से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं। शास्त्रों में निहित है कि सृष्टि के रचयिता भगवान शिव महज जलाभिषेक से प्रसन्न हो जाते हैं। इसके लिए सावन के महीने में प्रतिदिन भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक करें। साथ ही रोजाना पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करें। इन मंत्रों के जाप से साधक को सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। आइए, मंत्र जाप करते हैं- Shiv mantra भगवान शिव के मंत्र शिव मूल मंत्र ॐ नमः शिवाय॥ रूद्र मंत्र ॐ नमो भगवते रूद्राय । Shiv mantra रूद्र गायत्री मंत्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ Shiv mantra महामृत्युंजय मंत्र ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ शिव प्रार्थना मंत्र करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं श्रावण वाणंजं वा मानसंवापराधं । विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥ शिव नमस्कार मंत्र शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिमहिर्बम्हणोधपतिर्बम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। Sawan 2024: दुर्लभ संयोग से भरा हुआ है जाने क्या है महत्वपूर्ण बाते ? श‍िव नामावली मंत्र श्री शिवाय नम: श्री शंकराय नम: श्री महेश्वराय नम: श्री सांबसदाशिवाय नम: श्री रुद्राय नम: ॐ पार्वतीपतये नम: ॐ नमो नीलकण्ठाय नम: शिव आवाहन मंत्र ॐ मृत्युंजय परेशान जगदाभयनाशन । तव ध्यानेन देवेश मृत्युप्राप्नोति जीवती ।। वन्दे ईशान देवाय नमस्तस्मै पिनाकिने । नमस्तस्मै भगवते कैलासाचल वासिने । आदिमध्यांत रूपाय मृत्युनाशं करोतु मे ।। त्र्यंबकाय नमस्तुभ्यं पंचस्याय नमोनमः । नमोब्रह्मेन्द्र रूपाय मृत्युनाशं करोतु मे ।। नमो दोर्दण्डचापाय मम मृत्युम् विनाशय ।। देवं मृत्युविनाशनं भयहरं साम्राज्य मुक्ति प्रदम् । नमोर्धेन्दु स्वरूपाय नमो दिग्वसनाय च । नमो भक्तार्ति हन्त्रे च मम मृत्युं विनाशय ।। अज्ञानान्धकनाशनं शुभकरं विध्यासु सौख्य प्रदम् । नाना भूतगणान्वितं दिवि पदैः देवैः सदा सेवितम् ।। सर्व सर्वपति महेश्वर हरं मृत्युंजय भावये ।। शिव स्तुति मंत्र ॐ नमो हिरण्यबाहवे हिरण्यवर्णाय हिरण्यरूपाय हिरण्यपतए अंबिका पतए उमा पतए पशूपतए नमो नमः ईशान सर्वविद्यानाम् ईश्वर सर्व भूतानाम् ब्रह्मादीपते ब्रह्मनोदिपते ब्रह्मा शिवो अस्तु सदा शिवोहम तत्पुरुषाय विद्महे वागविशुद्धाय धिमहे तन्नो शिव प्रचोदयात् महादेवाय विद्महे रुद्रमूर्तये धिमहे तन्नों शिव प्रचोदयात् नमस्ते अस्तु भगवान विश्वेश्वराय महादेवाय त्र्यंबकाय त्रिपुरान्तकाय त्रिकाग्नी कालाय कालाग्नी रुद्राय नीलकंठाय मृत्युंजयाय सर्वेश्वराय सदशिवाय श्रीमान महादेवाय नमः ॐ ॐ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।। Shiv mantra मंत्र जाप करते समय कुछ ध्यान रखने योग्य बातें: यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी मंत्र का जाप करने से पहले उसका अर्थ और उच्चारण विधि जान लेना आवश्यक है। आप किसी विद्वान ब्राह्मण या गुरु से भी मंत्र के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। डिसक्लेमर: ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।’

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जीवन में परेशानियों से मुक्ति के लिए मंत्रों का जाप: MANTRA FOR HAPPY LIFE

जीवन में परेशानियों से मुक्ति के लिए मंत्रों का जाप : विस्तृत जानकारी जीवन में परेशानियां तो आती ही रहती हैं। इन परेशानियों से निपटने और मन को शांत रखने में मंत्रों का जाप सहायक हो सकता है। कुछ मंत्र जो जीवन में परेशानियों से मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकते हैं: 1. ॐ गायत्री मंत्र: यह मंत्र सबसे शक्तिशाली मंत्रों में से एक माना जाता है। इसका जाप करने से बुद्धि, विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है। साथ ही, नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है और मन शांत होता है। उदाहरण: 2. ॐ शांति मंत्र: यह मंत्र शांति और समृद्धि प्रदान करने वाला माना जाता है। इसका जाप करने से मन शांत होता है, तनाव कम होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। उदाहरण: 3. महा मृत्युंजय मंत्र: यह मंत्र भगवान शिव को समर्पित है और इसे अत्यंत शक्तिशाली मंत्र माना जाता है। इसका जाप करने से मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं। उदाहरण: 4. हनुमान मंत्र: यह मंत्र भगवान हनुमान को समर्पित है और इसे शक्ति और साहस प्रदान करने वाला मंत्र माना जाता है। इसका जाप करने से बाधाओं से मुक्ति मिलती है और मनोबल बढ़ता है। उदाहरण:

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शुक्रवार के दिन करें इन मंत्रों का जाप, नहीं होगी धन की कमी

हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन की देवी कहा जाता है। इन्हीं की कृपा से व्यक्ति को जीवन में धन-धान्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि जिन लोगों के ऊपर मां लक्ष्मी की कृपा नहीं रहती है, उनके घर में दरिद्रता का वास होता है। ऐसे घर में हमेशा पैसों की तंगी बनी रहती है। यही वजह है कि लोग नियमित रूप से विधि पूर्वक पूजा पाठ करके मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के प्रयत्न करते हैं। पूजा पाठ ही नहीं बल्कि धर्म ग्रंथों में मंत्रों की शक्ति का बहुत महत्व माना गया है। मान्यता मंत्र के जप से देवी-देवताओं की कृपा बहुत आसानी से पाई जा सकती है। ज्योतिष के अनुसार, यदि आप अपनी राशि के अनुसार मंत्र जाप करते हैं, तो ये और भी ज्यादा शुभ फलदायी रहता है। इसके अलावा मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना चाहिए। इससे आपकी रुपयों पैसों से संबंधित सभी समस्याएं दूर होंगी। तो चलिए जानते हैं मां लक्ष्मी के चमत्कारी मंत्रों के बारे में… शुक्रवार मंत्र के फायदे शुक्रवार के दिन उपर्युक्त मंत्र के साथ अगर मां लक्ष्मी की पूजा की जाए तो मां की कृपा सदैव बनी रहती है। मां लक्ष्मी बहुत जल्दी अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। ऐसे में इन मंत्रों के जाप से जीवन के हर क्षेत्र में आपको सफलता मिलती है। इसके साथ ही मंत्र जाप के प्रभाव से जीवन में खुशहाली, धन और संपत्ति का आगमन होता है। अगर आप मां लक्ष्मी की कृपा जीवन भर चाहते हैं तो हर रोज पूजा अर्चना के बाद इस मंत्र का जप जरूर करें। इससे आपके जीवन में धन की कभी कमी नहीं होती है। मां लक्ष्मी का बीज मंत्र मां लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए उनके बीज मंत्र का जाप कमल गट्टे की माला से करना चाहिए. ऊँ श्रींह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मी नम:।। मां लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। यदि आप कर्ज या धन संबधी समस्याओं से परेशान हैं तो मां लक्ष्मी के इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इस बार भोलेनाथ की उपासना के लिए मिलेंगे सावन के 8 सोमवार, जानिए क्यों बन रहा ये अद्भुत संयोग ऊँ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:। । मनोकामना पूर्ति मंत्र मां लक्ष्मी के इस मंत्र का जाप करने और उन्हें कमल या गुलाबी रंग के फूल अर्पित करने से सभी प्रकार की मनोकामाओं की पूर्ति होती है।  श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा। श्री लक्ष्मी महामंत्र मां लक्ष्मी का ये मंत्र धन, ऐशवर्य, सौभाग्य और यश प्रदान करने वाला होता है। इस मंत्र का शुक्रवार के दिन 108 बार तिल के तेल की दिया जला कर जाप करना चाहिए।  ऊँ श्रीं ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा।।

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एक ऐसा कवच-जिसके पढने से मिलता है एक हज़ार गाय दान करने का फल

आज मैं आपको एक ऐसे कवच के बारे में बताने जा रहा हूँ जिसका महत्ता का वर्णन स्वयं भगवान् श्री नारायण ने किया है। इसका नाम है श्री गायत्री कवच। श्री गायत्री कवच एक महान कवच है जो स्वयं नारद ऋषि को भगवान श्री नारायण ने बताया और जिसकी रचना महर्षि वेद व्यास जी ने की। श्री गायत्री कवच का उल्लेख श्रीमद देवी भागवत में 12 वे अध्याय में किया गया है। भगवान श्रीमान नारायण, महर्षि नारद को कवच की महिमा और श्री गायत्री देवी की पूजा के माध्यम से प्राप्त भक्ति के बारे में बताते हैं। गायत्री कवच द्वारा अर्जित की गयी शुद्धता सभी प्रकार के पूजा के पापों को नष्ट कर देती है, सभी इच्छाओं को पूरा करती है और मुक्ति प्रदान करती है। भगवान श्रीमान नारायण ने कहा कि देवी गायत्री के दैवीय कवच, सभी अवरोधों और बुराइयों को समाप्त कर सकते हैं। यह पूजा के लिए 64 रूपों के ज्ञान (कला रूपों) और मुक्ति को देने में सक्षम है। इसके अलावा, जो कोई गायत्री कवच की महिमा को पढ़ता या सुनता है, वह एक हज़ार गौ दान के पुण्य को प्राप्त करता है। श्रीगायत्रीकवचम्- श्रीगणेशाय नमः याज्ञवल्क्य उवाच- स्वामिन् सर्वजगन्नाथ संशयोऽस्ति महान्मम । चतुःषष्ठिकलानं च पातकानां च तद्वद। मुच्यते केन पुण्येन ब्रह्मरूपं कथं भवेत् । देहं च देवतारूपं मन्त्ररूपं विशेषतः । क्रमतः श्रोतुमिच्छामि कवचं विधिपूर्वकम् । ब्रह्मोवाच- गायत्र्याः कवचस्यास्य ब्रह्मा विष्णुः शिवो ऋषिः । ऋग्यजुःसामाथर्वाणि छन्दांसि परिकीर्तिताः । परब्रह्मस्वरूपा सा गायत्री देवता स्मृता । रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेन विना कृतम् । सर्वं सर्वत्र संरक्षेत्सर्वाङ्गं भुवनेश्वरी । बीजं भर्गश्च युक्तिश्च धियः कीलकमेव च । पुरुषार्थविनियोगो यो नश्च परिकीर्त्तितः । ऋषिं मूर्ध्नि न्यसेत्पूर्वं मुखे छन्द उदीरितम् । देवतां हृदि विन्यस्य गुह्ये बीजं नियोजयेत् । शक्तिं विन्यस्य पदयोर्नाभौ तु कीलकं न्यसेत् । द्वात्रिंशत्तु महाविद्याः साङ्ख्यायनसगोत्रजाः । द्वादशलक्षसंयुक्ता विनियोगाः पृथक्पृथक् । एवं न्यासविधिं कृत्वा कराङ्गं विधिपूर्वकम् । व्याहृतित्रयमुच्चार्य ह्यनुलोमविलोमतः । चतुरक्षरसंयुक्तं कराङ्गन्यासमाचरेत् । आवाहनादिभेदं च दश मुद्राः प्रदर्शयेत् । सा पातु वरदा देवी अङ्गप्रत्यङ्गसङ्गमे । ध्यानं मुद्रां नमस्कारं गुरुमन्त्रं तथैव च । संयोगमात्मसिद्धिं च षड्विधं किं विचारयेत् । विनियोग- अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, ऋग्यजुःसामाधर्वाणि छन्दांसि, परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री देवता, भूर्बीजं, भुवः शक्तिः, स्वाहा कीलकं, श्रीगायत्रीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुरिति हृदयाय नमः । ॐ भूर्भुवः स्वः वरेण्यमिति शिरसे स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः भर्गो देवस्येति शिखायै वषट् । ॐ भूर्भुवः स्वः धीमहीति कवचाय हुम् । ॐ भूर्भुवः स्वः धियो यो नः इति नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ भूर्भुवः स्वः प्रचोदयादिति अस्त्राय फट् । वर्णास्त्रां कुण्डिकाहस्तां शुद्धनिर्मलज्योतिषीम्म् । सर्वतत्त्वमयीं वन्दे गायत्रीं वेदमातरम् । अथ ध्यानम्- मुक्ता विद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै- र्युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम् । गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशां शूलं कपालं गुणं शङ्खं चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे । कवच- ॐ गायत्री पूर्वतः पातु सावित्री पातु दक्षिणे । ब्रह्मविद्या च मे पश्चादुत्तरे मां सरस्वती । पावकी मे दिशं रक्षेत्पावकोज्ज्वलशालिनी । यातुधानीं दिशं रक्षेद्यातुधानगणार्दिनी । पावमानीं दिशं रक्षेत्पवमानविलासिनी । दिशं रौद्रीमवतु मे रुद्राणी रुद्ररूपिणी । ऊर्ध्वं ब्रह्माणी मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा । एवं दश दिशो रक्षेत् सर्वतो भुवनेश्वरी । ब्रह्मास्त्रस्मरणादेव वाचां सिद्धिः प्रजायते । ब्रह्मदण्डश्च मे पातु सर्वशस्त्रास्त्रभक्षक्रः । ब्रह्मशीर्षस्तथा पातु शत्रूणां वधकारकः । सप्त व्याहृतयः पान्तु सर्वदा बिन्दुसंयुताः । वेदमाता च मां पातु सरहस्या सदैवता । देवीसूक्तं सदा पातु सहस्राक्षरदेवता । चतुःषष्टिकला विद्या दिव्याद्या पातु देवता । बीजशक्तिश्च मे पातु पातु विक्रमदेवता । तत्पदं पातु मे पादौ जङ्घे मे सवितुःपदम् । वरेण्यं कटिदेशं तु नाभिं भर्गस्तथैव च । देवस्य मे तु हृदयं धीमहीति गलं तथा । धियो मे पातु जिह्वायां यःपदं पातु लोचने । ललाटे नः पदं पातु मूर्धानं मे प्रचोदयात् । तद्वर्णः पातु मूर्धानं सकारः पातु भालकम् । चक्षुषी मे विकारस्तु श्रोत्रं रक्षेत्तु कारकः । नासापुटेर्वकारो मे रेकारस्तु कपोलयोः । णिकारस्त्वधरोष्ठे च यकारस्तूर्ध्व ओष्ठके । आत्यमध्ये भकारस्तु गोकारस्तु कपोलयोः । देकारः कण्ठदेशे च वकारः स्कन्धदेशयोः । स्यकारो दक्षिणं हस्तं धीकारो वामहस्तकम् । मकारो हृदयं रक्षेद्धिकारो जठरं तथा । धिकारो नाभिदेशं तु योकारस्तु कटिद्वयम् । गुह्यं रक्षतु योकार ऊरू मे नः पदाक्षरम् । प्रकारो जानुनी रक्षेच्चोकारो जङ्घदेशयोः । दकारो गुल्भदेशं तु यात्कारः पादयुग्मकम् । तकारो व्यंजनं चैव सर्वांगे में सदा Ƨ वतु। फलश्रुति- इदं तु कवच दिव्यं बाधाशतविनाशकम् । चतुःषष्टिकला विद्या दायकं मोक्ष कारकं । मुच्यते सर्वपापेभ्यः परं ब्रह्माधिगच्छति । पठनात श्रवणात वा Ƨ पि गो सहस्र फलं लभेत । इति श्री गायत्री कवचम्‌ संपूर्णम्‌

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महिषासुरमर्दिनि स्तोत्रम् – अयि गिरिनन्दिनि (Mahishasura Mardini Stotram – Aigiri Nandini)

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुतेगिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥ सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरतेत्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरतेदनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥ अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरतेशिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥ अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपतेरिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥ अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृतेचतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥ अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरेत्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥ अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशतेसमरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥ धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटकेकनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुकेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥ सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरतेकृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥ जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुतेझणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥ अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुतेश्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥ सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरतेविरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललितेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥ अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपतेत्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥ कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललतेसकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥ करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमतेमिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितलेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥ कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचेप्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचेजितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥ विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुतेकृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥ पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवेअयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥ कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥ तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयतेकिमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥ अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमेअयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुतेजय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

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दुर्गा सप्तशती सिद्ध सम्पुट मंत्र (Durga Saptashati Siddha Samput Mantra)

सामूहिक कल्याण के लिये मंत्र –देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्यानिश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूत्‍‌र्या ।तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यांभक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ विश्‍व के अशुभ तथा भय का विनाश करने के लिये मंत्र –यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तोब्रह्मा हरश्‍च न हि वक्तुमलं बलं च ।सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनायनाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु ॥ ❀ विश्‍व की रक्षा के लिये मंत्र –या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीःपापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः ।श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जातां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्‍वम् ॥ ❀ विश्‍व के अभ्युदय के लिये मंत्र –विश्‍वेश्‍वरि त्वं परिपासि विश्‍वंविश्‍वात्मिका धारयसीति विश्‍वम् ।विश्‍वेशवन्द्या भवती भवन्तिविश्‍वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥ ❀ विश्‍वव्यापी विपत्तियों के नाश के लिये मंत्र –देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।प्रसीद विश्‍वेश्‍वरि पाहि विश्‍वं त्वमीश्‍वरी देवि चराचरस्य ॥ ❀ विश्‍व के पाप-ताप-निवारण के लिये मंत्र –देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यंयथासुरवधादधुनैव सद्यः ।पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशुउत्पातपाकजनितांश्‍च महोपसर्गान् ॥ ❀ विपत्ति-नाश के लिये मंत्र –शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ विपत्तिनाश और शुभ की प्राप्ति के लिये मंत्र –करोतु सा नः शुभहेतुरीश्‍वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः । ❀ भय-नाश के लिये मंत्र –सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् ।पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ।त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ पाप-नाश के लिये मंत्र [10]हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव ॥ ❀ रोग-नाश के लिये मंत्र –रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ ❀ महामारी-नाश के लिये मंत्र –जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ ❀ आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिये मंत्र –देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ❀ सुलक्षणा पत्‍‌नी की प्राप्ति के लिये –पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥ ❀ बाधा-शान्ति के लिये मंत्र –सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्‍वरि ।एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ❀ सर्वविध अभ्युदय के लिये मंत्र –ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषांतेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः ।धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारायेषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ ❀ दारिद्र्यदुःखादिनाश के लिये मंत्र –दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोःस्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्यासर्वोपकारकरणाय सदाऽऽ‌र्द्रचित्ता ॥ ❀ रक्षा पाने के लिये मंत्र –शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके ।घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च ॥ ❀ समस्त विद्याओं की और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिये मंत्र –विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाःस्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्काते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥ ❀ सब प्रकार के कल्याण के लिये मंत्र [20]सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ शक्ति-प्राप्ति के लिये मंत्र –सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये मंत्र –प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्‍वार्तिहारिणि ।त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥ ❀ विविध उपद्रवों से बचने के लिये मंत्र –रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्‍च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र ।दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्‍वम् ❀ बाधामुक्त होकर धन-पुत्रादि की प्राप्ति के लिये मंत्र –सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः ।मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥ ❀ भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति के लिये मंत्र –विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् ।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ❀ पापनाश तथा भक्ति की प्राप्ति के लिये मंत्र –नतेभ्यः सर्वदा भक्त्‍‌या चण्डिके दुरितापहे ।रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ❀ स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिये मंत्र –सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी ।त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥ ❀ स्वर्ग और मुक्ति के लिये मंत्र –सर्वस्य बुद्धिरुपेण जनस्य हृदि संस्थिते ।स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ❀ मोक्ष की प्राप्ति के लिये मंत्र –त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्याविश्‍वस्य बीजं परमासि माया ।सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥ ❀ स्वप्न में सिद्धि-असिद्धि जानने के लिये मंत्र –दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके ।मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय ॥ दुर्गा सप्तशती के 30 सिद्ध सम्पुट मंत्र।

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संकट मोचन हनुमानाष्टक (Sankatmochan Hanuman Ashtak)

श्री हनुमंत लाल की पूजा आराधना में हनुमान चालीसा, बजरंग बाण और संकटमोचन अष्टक का पाठ बहुत ही प्रमुख माने जाते हैं। संकट मोचन हनुमान अष्टक का नियमित पाठ करने से भक्तों पर आये गंभीर संकट का भी निवारण हो जाता है। ॥ हनुमानाष्टक ॥बाल समय रवि भक्षी लियो तब,तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।ताहि सों त्रास भयो जग को,यह संकट काहु सों जात न टारो ।देवन आनि करी बिनती तब,छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।को नहीं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥ १ ॥ बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि,जात महाप्रभु पंथ निहारो ।चौंकि महामुनि साप दियो तब,चाहिए कौन बिचार बिचारो ।कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,सो तुम दास के सोक निवारो ॥ २ ॥ अंगद के संग लेन गए सिय,खोज कपीस यह बैन उचारो ।जीवत ना बचिहौ हम सो जु,बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।हेरी थके तट सिन्धु सबे तब,लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ॥ ३ ॥ रावण त्रास दई सिय को सब,राक्षसी सों कही सोक निवारो ।ताहि समय हनुमान महाप्रभु,जाए महा रजनीचर मरो ।चाहत सीय असोक सों आगि सु,दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ॥ ४ ॥ बान लाग्यो उर लछिमन के तब,प्राण तजे सूत रावन मारो ।लै गृह बैद्य सुषेन समेत,तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ।आनि सजीवन हाथ दिए तब,लछिमन के तुम प्रान उबारो ॥ ५ ॥ रावन जुध अजान कियो तब,नाग कि फाँस सबै सिर डारो ।श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,मोह भयो यह संकट भारो Iआनि खगेस तबै हनुमान जु,बंधन काटि सुत्रास निवारो ॥ ६ ॥ बंधू समेत जबै अहिरावन,लै रघुनाथ पताल सिधारो ।देबिन्हीं पूजि भलि विधि सों बलि,देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।जाये सहाए भयो तब ही,अहिरावन सैन्य समेत संहारो ॥ ७ ॥ काज किये बड़ देवन के तुम,बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।कौन सो संकट मोर गरीब को,जो तुमसे नहिं जात है टारो ।बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,जो कछु संकट होए हमारो ॥ ८ ॥ ॥ दोहा ॥लाल देह लाली लसे,अरु धरि लाल लंगूर ।वज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर ॥

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दत्तात्रेय स्तोत्रम् (Dattatreya Strotam)

॥ श्री दत्तात्रेय स्तोत्रम् ॥जटाधरं पाण्डुराङ्गं शूलहस्तं कृपानिधिम् ।सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ॥ विनियोग –अस्य श्रीदत्तात्रेयस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् नारदऋषिः ।अनुष्टुप् छन्दः । श्रीदत्तपरमात्मा देवता ।श्रीदत्तप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ स्तोत्रम् –जगदुत्पत्तिकर्त्रे च स्थितिसंहार हेतवे ।भवपाशविमुक्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १॥ जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च ।दिगम्बरदयामूर्ते दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ २॥ कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च ।वेदशास्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ३॥ र्हस्वदीर्घकृशस्थूल-नामगोत्र-विवर्जित ।पञ्चभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ४॥ यज्ञभोक्ते च यज्ञाय यज्ञरूपधराय च ।यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ५॥ आदौ ब्रह्मा मध्य विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः ।मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ६॥ भोगालयाय भोगाय योगयोग्याय धारिणे ।जितेन्द्रियजितज्ञाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ७॥ दिगम्बराय दिव्याय दिव्यरूपध्राय च ।सदोदितपरब्रह्म दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ८॥ जम्बुद्वीपमहाक्षेत्रमातापुरनिवासिने ।जयमानसतां देव दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ९॥ भिक्षाटनं गृहे ग्रामे पात्रं हेममयं करे ।नानास्वादमयी भिक्षा दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १०॥ ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले ।प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ ११॥ अवधूतसदानन्दपरब्रह्मस्वरूपिणे ।विदेहदेहरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १२॥ सत्यंरूपसदाचारसत्यधर्मपरायण ।सत्याश्रयपरोक्षाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १३॥ शूलहस्तगदापाणे वनमालासुकन्धर ।यज्ञसूत्रधरब्रह्मन् दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १४॥ क्षराक्षरस्वरूपाय परात्परतराय च ।दत्तमुक्तिपरस्तोत्र दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १५॥ दत्त विद्याढ्यलक्ष्मीश दत्त स्वात्मस्वरूपिणे ।गुणनिर्गुणरूपाय दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १६॥ शत्रुनाशकरं स्तोत्रं ज्ञानविज्ञानदायकम् ।सर्वपापं शमं याति दत्तात्रेय नमोऽस्तुते ॥ १७॥ इदं स्तोत्रं महद्दिव्यं दत्तप्रत्यक्षकारकम् ।दत्तात्रेयप्रसादाच्च नारदेन प्रकीर्तितम् ॥ १८॥॥ इति श्रीनारदपुराणे नारदविरचितं दत्तात्रेयस्तोत्रं सुसम्पूर्णम् ॥

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