MANTRA

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् (Annapoorna Stotram)

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरीनिर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥ नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरीमुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥ योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरीचन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥ कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करीकौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥ दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरीलीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥ उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरीवेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥ आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरीकाश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥ देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरीवामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥ चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरीचन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥ क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरीसाक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरीभिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥ माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥– श्री शङ्कराचार्य कृतं

अन्नपूर्णा स्तोत्रम् (Annapoorna Stotram) Read More »

पाशुपतास्त्र स्तोत्र

ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय सर्वरोगविद्रावणाय ग्रहनिग्रहकारिणे दुष्टनागक्षय कारिणे। ॐ कृष्णपिंग्डलाय फट। हूंकारास्त्राय फट। वज्र हस्ताय फट। शक्तये फट। दण्डाय फट। यमाय फट। खडगाय फट। नैऋताय फट। वरुणाय फट। वज्राय फट। पाशाय फट। ध्वजाय फट। अंकुशाय फट। गदायै फट। कुबेराय फट। त्रिशूलाय फट। मुदगराय फट। चक्राय फट। पद्माय फट। नागास्त्राय फट। ईशानाय फट। खेटकास्त्राय फट। मुण्डाय फट। मुण्डास्त्राय फट। काड्कालास्त्राय फट। पिच्छिकास्त्राय फट। क्षुरिकास्त्राय फट। ब्रह्मास्त्राय फट। शक्त्यस्त्राय फट। गणास्त्राय फट। सिद्धास्त्राय फट। पिलिपिच्छास्त्राय फट। गंधर्वास्त्राय फट। पूर्वास्त्रायै फट। दक्षिणास्त्राय फट। वामास्त्राय फट। पश्चिमास्त्राय फट। मंत्रास्त्राय फट। शाकिन्यास्त्राय फट। योगिन्यस्त्राय फट। दण्डास्त्राय फट। महादण्डास्त्राय फट। नमोअस्त्राय फट। शिवास्त्राय फट। ईशानास्त्राय फट। पुरुषास्त्राय फट। अघोरास्त्राय फट। सद्योजातास्त्राय फट। हृदयास्त्राय फट। महास्त्राय फट। गरुडास्त्राय फट। राक्षसास्त्राय फट। दानवास्त्राय फट। क्षौ नरसिन्हास्त्राय फट। त्वष्ट्रास्त्राय फट। सर्वास्त्राय फट। नः फट। वः फट। पः फट। फः फट। मः फट। श्रीः फट। पेः फट। भूः फट। भुवः फट। स्वः फट। महः फट। जनः फट। तपः फट। सत्यं फट। सर्वलोक फट। सर्वपाताल फट। सर्वतत्व फट। सर्वप्राण फट। सर्वनाड़ी फट। सर्वकारण फट। सर्वदेव फट। ह्रीं फट। श्रीं फट। डूं फट। स्त्रुं फट। स्वां फट। लां फट। वैराग्याय फट। मायास्त्राय फट। कामास्त्राय फट। क्षेत्रपालास्त्राय फट। हुंकरास्त्राय फट। भास्करास्त्राय फट। चंद्रास्त्राय फट। विघ्नेश्वरास्त्राय फट। गौः गां फट। स्त्रों स्त्रौं फट। हौं हों फट। भ्रामय भ्रामय फट। संतापय संतापय फट। छादय छादय फट। उन्मूलय उन्मूलय फट। त्रासय त्रासय फट। संजीवय संजीवय फट। विद्रावय विद्रावय फट। सर्वदुरितं नाशय नाशय फट।

पाशुपतास्त्र स्तोत्र Read More »

गजेन्द्र मोक्ष

श्रीमद्भागवतान्तर्गतगजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन ******************************** श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहाएवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥ बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥१॥ गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा – ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥१॥ जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥ जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं ॥३॥ यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितंक्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम । अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षतेस आत्म मूलोsवत् मां परात्परः ॥४॥ अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशोलोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु । तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरंयस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥ समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥ न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम । यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतोदुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥ भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है – वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें ॥६॥ दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलमविमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः । चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वनेभूतात्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥ आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ॥७॥ न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वान नाम रूपे गुणदोष एव वा । तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यःस्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥८॥ जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥८॥ तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेsनन्तशक्तये ।अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥ उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है ॥९॥नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥ स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥१०॥ सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥ विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥ नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥ सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥१२॥ क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥१३॥सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥१४॥ सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥१४॥ नमो नमस्तेsखिल कारणायनिष्कारणायाद्भुत कारणाय । सर्वागमान्मायमहार्णवायनमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥ सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥ गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपायतत्क्षोभविस्फूर्जित मानसाय । नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥ जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१।६॥ मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणायमुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय । स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥ मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥

गजेन्द्र मोक्ष Read More »

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ ॐ अथ सकलसौभाग्यदायक श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् । शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १॥ यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २॥ व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ३॥ व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ४॥ अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ ५॥ यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ६॥ ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे । श्रीवैशम्पायन उवाच — श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७॥ युधिष्ठिर उवाच — किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९॥ भीष्म उवाच — जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १०॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११॥ अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२॥ ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ १४॥ परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे श‍ृणु पापभयापहम् ॥ १८॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९॥ ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ॥ छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ २०॥ अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते ॥ २१॥ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥ अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं ॥ २२ ॥ पूर्वन्यासः । श्रीवेदव्यास उवाच — ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य । श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता । अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम् । देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः । उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः । शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम् । शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम् । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम् । त्रिसामा सामगः सामेति कवचम् । आनन्दं परब्रह्मेति योनिः । ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः ॥ श्रीविश्वरूप इति ध्यानम् । श्रीमहाविष्णुप्रीत्यर्थे सहस्रनामस्तोत्रपाठे विनियोगः ॥ अथ न्यासः । ॐ शिरसि वेदव्यासऋषये नमः । मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः । हृदि श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः । गुह्ये अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजाय नमः । पादयोर्देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तये नमः । सर्वाङ्गे शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकाय नमः । करसम्पूटे मम श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः ॥ इति ऋषयादिन्यासः ॥ अथ करन्यासः । ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः । अमृतांशूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः । ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः । सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इत्यनामिकाभ्यां नमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । इति करन्यासः । अथ षडङ्गन्यासः । ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इति हृदयाय नमः । अमृतांशूद्भवो भानुरिति शिरसे स्वाहा । ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति शिखायै वषट् । सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इति कवचाय हुम् । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति नेत्रत्रयाय वौषट् । रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इत्यस्त्राय फट् । इति षडङ्गन्यासः ॥ श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे विष्णोर्दिव्यसहस्रनामजपमहं करिष्ये इति सङ्कल्पः । अथ ध्यानम् । क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः । शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः ॥ १॥ भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः । अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि ॥ २॥ ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ ३॥ मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् । पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ ४॥ नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते । अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ५॥ सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् । सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं स्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ॥ ६॥ छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् । चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ ७॥ स्तोत्रम् । हरिः ॐ । विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः । भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ १॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ २॥ योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः । नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ ३॥ सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः । सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ ४॥ स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ ५॥ अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ ६॥ अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ ७॥ ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ ८॥ ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥ ९॥ सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः । अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ १०॥ अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः । वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥ ११॥ वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ १२॥ रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः । अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ १३॥ सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥ १४॥ लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ १५॥ भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ १६॥ उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः । अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ १७॥ वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः । अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ १८॥ महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः । अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ १९॥ महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ २०॥ मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ २१॥ अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ २२॥ गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः । निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ २३॥ अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः । सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ २४॥ आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ २५॥ सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः । सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ २६॥ असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः । सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥ २७॥ वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥ सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः । नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ २९॥ ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः । ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ ३०॥ अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ ३१॥ भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः । कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ ३२॥ युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥ इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ ३४॥ अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ ३५॥ स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः

श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् Read More »

मङ्गलाचरणम्

श्री गणेशाय नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ स जयति सिन्धुरवदनो देवो यत्पादपङ्कजस्मरणम् । वासरमणिरिव तमसां राशिं नाशयति विऽघ्नानाम् ॥ १॥ सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लंबोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ॥ २॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजानानः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥ ३॥ विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ४॥ शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वाविघ्नोपशान्तये ॥ ५॥ व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ६॥ व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ७॥ अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः । अभाललोचनः शंभुर्भगवान् बादरायणः ॥ ८॥ इति मङ्गलाचरणं सम्पूर्णम् ॥

मङ्गलाचरणम् Read More »

नारायणस्तोत्रम्

श्री गणेशाय नमः । नारायण नारायण जय गोविन्द हरे ॥ नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥ ध्रु ॥ करुणापारावार वरुणालयगम्भीर ॥ नारायण ॥ १॥ घननीरदसङ्काश कृतकलिकल्मषनाश ॥ नारायण ॥ २॥ यमुनातीरविहार धृतकौस्तुभमणिहार ॥ नारायण ॥ ३॥ पीताम्बरपरिधान सुरकल्याणनिधान ॥ नारायण ॥ ४॥ मञ्जुलगुञ्जाभूष मायामानुषवेष ॥ नारायण ॥ ५॥ राधाधरमधुरसिक रजनीकरकुलतिलक ॥ नारायण ॥ ६॥ मुरलीगानविनोद वेदस्तुतभूपाद ॥ नारायण ॥ ७॥ बर्हिनिबर्हापीड नटनाटकफणिक्रीड ॥ नारायण ॥ ८॥ वारिजभूषाभरण राजिवरुक्मिणीरमण ॥ नारायण ॥ ९॥ जलरुहदलनिभनेत्र जगदारम्भकसूत्र ॥ नारायण ॥ १०॥ पातकरजनीसंहार करुणालय मामुद्धर ॥ नारायण ॥ ११॥ अघबकक्षयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे ॥ नारायण ॥ १२॥ हाटकनिभपीताम्बर अभयं कुरु मे मावर ॥ नारायण ॥ १३॥ दशरथराजकुमार दानवमदसंहार ॥ नारायण ॥ १४॥ गोवर्धनगिरिरमण गोपीमानसहरण ॥ नारायण ॥ १५॥ शरयूतीरविहार सज्जनऋषिमन्दार ॥ नारायण ॥ १६॥ विश्वामित्रमखत्र विविधपरासुचरित्र ॥ नारायण ॥ १७॥ ध्वजवज्राङ्कुशपाद धरणीसुतसहमोद ॥ नारायण ॥ १८॥ जनकसुताप्रतिपाल जय जय संस्मृतिलील ॥ नारायण ॥ १९॥ दशरथवाग्धृतिभार दण्डकवनसञ्चार ॥ नारायण ॥ २०॥ मुष्टिकचाणूरसंहार मुनिमानसविहार ॥ नारायण ॥ २१॥ वालिविनिग्रहशौर्य वरसुग्रीवहितार्य ॥ नारायण ॥ २२॥ वालीनिग्रह मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर ॥ नारायण ॥ २३॥ जलनिधिबन्धनधीर रावणकण्ठविदार ॥ नारायण ॥ २४॥ ताटीमददलनाढ्य नटगुणविविधधनाढ्य ॥ नारायण ॥ २५॥ गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन ॥ नारायण ॥ २६॥ सम्भ्रमसीताहार साकेतपुरविहार ॥ नारायण ॥ २७॥ अचलोद्धृतिचञ्चत्कर भक्तानुग्रहतत्पर ॥ नारायण ॥ २८॥ नैगमगानविनोद रक्षःसुतप्रह्लाद ॥ नारायण ॥ २९॥ रक्षित सुप्रह्लाद भारतीयतिवरशङ्कर नामामृतमखिलान्तर ॥ नारायण ॥ ३०॥ । इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं नारायणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

नारायणस्तोत्रम् Read More »

नवग्रहमन्त्रः

श्रीगणेशाय नमः । अथ सूर्यस्य मन्त्रः – विश्वनाथसारोद्धारे ॐ ह्सौः श्रीं आं ग्रहाधिराजाय आदित्याय स्वाहा ॥ अथ चन्द्रस्य मन्त्रः – कालीपटले ॐ श्रीं क्रीं ह्रां चं चन्द्राय नमः ॥ अथ भौमस्य मन्त्रः – शारदाटीकायाम् ऐं ह्सौः श्रीं द्रां कं ग्रहाधिपतये भौमाय स्वाहा ॥ अथ बुधस्य मन्त्रः – स्वतन्त्रे ॐ ह्रां क्रीं टं ग्रहनाथाय बुधाय स्वाहा ॥ अथ जीवस्य मन्त्रः – त्रिपुरातिलके ॐ ह्रीं श्रीं ख्रीं ऐं ग्लौं ग्रहाधिपतये बृहस्पतये ब्रींठः ऐंठः श्रींठः स्वाहा ॥ अथ शुक्रस्य मन्त्रः – आगमशिरोमणौ ॐ ऐं जं गं ग्रहेश्वराय शुक्राय नमः ॥ अथ शनैश्चरस्य मन्त्रः – आगमलहर्याम् ॐ ह्रीं श्रीं ग्रहचक्रवर्तिने शनैश्चराय क्लीं ऐंसः स्वाहा ॥ अथ राहोर्मन्त्रः – आगमलहर्याम् ॐ क्रीं क्रीं हूँ हूँ टं टङ्कधारिणे राहवे रं ह्रीं श्रीं भैं स्वाहा ॥ अथ केतु मन्त्रः – मन्त्रमुक्तावल्याम् ॐ ह्रीं क्रूं क्रूररूपिणे केतवे ऐं सौः स्वाहा॥ ॥ इति नवग्रहमन्त्रः सम्पूर्णम् ॥

नवग्रहमन्त्रः Read More »

नवग्रह ध्यान मन्त्राः साधुसङ्कुलि तन्त्रान्तर्गतम्

ग्रहपुरश्चरण प्रयोगः ॐ रक्तपद्मासनं देवं चतुर्बाहुसमन्वितम् । क्षत्रियं रक्तवर्णञ्च गोत्रं काश्यपसम्भवम् ॥ सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं सर्वसिद्धिदम् । द्विभुजं रक्तपद्मैश्च संयुक्तं परमाद्भुतम् ॥ कलिङ्गदेशजं देवं मौलिमाणिक्यभूषणम् । त्रिनेत्रं तेजसा पूर्णमुदयाचलसंस्थितम् ॥ द्वादशाङ्गुल-विस्तीर्णं प्रवरं घृतकौशिकम् । शिवाधिदैवं पुर्वास्यं ब्रह्मप्रत्यधिदैवतम् ॥ क्लीं ऐं श्रीं ह्रीं सूर्याय नमः । ॐ शुक्लं शुक्लाम्बरधरं श्वेताब्जस्थं चतुर्भुजम् । हारकेयूरनूपुरैर्मण्डितं तमसापहम् ॥ सुखदृश्यं सुधायुक्त-मात्रेयं वैश्यजातिजम् । कलङ्काङ्कितसर्वाङ्गं केशपाशातिसुन्दरम् ॥ मुकुटेर्मणिमाणिक्यैः शोभनीयं तु लोचनम् । योषित्प्रियं महानन्दं यमुनाजलसम्भवम् ॥ उमाधिदैवतं देवमापप्रत्यधिदैवतम् ॥ ह्रीं ह्रीं हुं सोमाय स्वाहा । ॐ मेशाधिरूढं द्विभुजं शक्तिचापधरं मुदा । रक्तवर्णं महातेजं तेजस्वीनां समाकुलम् ॥ रक्तवस्त्रपरिधानम् नानालङ्कारसंयुतम् । रक्ताङ्गं धरणीपुत्रं रक्तमाल्यानुलेपनम् ॥ हस्ते वाराहदशनं पृष्ठे तूणसमन्वितम् । कटाक्षाद् भीतिजनकं महामोहप्रदं महत् ॥ महाचापधरं देवं महोग्रमुग्रविग्रहम् । स्कन्दादिदैवं सूर्यास्यं क्षितिप्रत्यधिदैवतम् ॥ ह्रीं ॐ ऐं कुजाय स्वाहा । ॐ सुतप्तस्वर्णाभतनुं रोमराजिविराजितम् । द्विभुजं स्वर्णदण्डेव शरच्चन्द्रनिभाननम् ॥ चरणे रत्नमञ्जीरं कुमारं शुभलक्षणम् । स्वर्णयज्ञोपवीतञ्च पीतवस्त्रयुगावृतम् ॥ अत्रिगोत्रसमुत्पन्नं वैश्यजातिं महाबलम् । मागधं महिमापूर्णं द्विनेत्रं द्विभुजं शुभम् ॥ नारायणाधिदैवञ्च विष्णुप्रत्यधिदैवतम् । चिन्तयेत् सोमतनयं सर्वाभिष्टफलप्रदं ॥ ॐ क्लीं ॐ बुधाय स्वाहा । ॐ कनकरुचिरगौरं चारुमूर्तिं प्रसन्नं द्विभुजमपि सरजौ संदधानं सुरेज्यं । वसनयुगदधानं पीतवस्त्रं सुभद्रं सुरवरनरपुज्यमङ्गिरोगोत्रयुक्तम् ॥ द्विजवरकुलजातं सिन्धुदेशप्रसिद्धं त्रिजगति गणश्रेष्ठश्चाधिदैवं तदीयम् । सकलगिरिनिहन्ता इन्द्रः प्रत्याधिदैवं ग्रहगणगुरुनाथं तं भजेऽभीष्टसिद्धौ ॥ रं यं ह्रीं ऐं गुरवे नमः । ॐ शुक्लाम्बरं शुक्लरुचिं सुदीप्तं तुषारकुन्देन्दुद्युतिं चतुर्भुजम् । इन्द्राधिदैवं शचीप्रत्याधिदैवं वेदार्थविज्ञं च कविं कवीनाम् ॥ भृगुगोत्रयुक्तं द्विजजातिमात्रं दितीन्द्रपूज्यं खलु शुद्धिशान्तं । सर्वार्थसिद्धिप्रदमेव काव्यं भजेऽप्यहं भोजकतोद्भवं भृगुम् ॥ हुं हुं श्रीं श्रीं नं रं शुक्राय स्वाहा । ॐ सौरिं गृध्रगतातिकृष्णवपुषं कालाग्निवत् सङ्कुलं संयुक्तं भुजपल्लवैरुपलसत्स्तम्भैश्चतुर्भिः समैः । भीमं चोग्रमहाबलातिवपुषं बाधागणैः संयुतं गोत्रं काश्यपजं सुराष्ट्रविभवं कालाग्निदैवं शनिम् ॥ वस्त्रैः कृष्णमयैर्युतं तनुवरं तं सूर्यसूनुं भजे ॥ ह्रीं क्लीम् शनैश्चराय नमः । ॐ महिषस्थं कृष्णं वदनमयविभुं कर्णनासाक्षिमात्रम् कारालास्यं भीमं गदविभवयुतं श्यामवर्णं महोग्रं । पैठीनं गोत्रयुक्तं रविशशीदमनं चाधिदैवं यमोऽपि सर्पप्रत्यधिदैवतं मलयगीर्भावं तं तमसं नमामि ॥ वं ऐं वं वं क्लीं वं तमसे स्वाहा । ॐ महोग्रं धूमाभं करचरणयुतं छिन्नशीर्षं सुदीप्तम् हस्ते वाणं कृपाणं त्रिशिखशशिधृतं वेदहस्तं प्रसन्नं । ब्रह्मा तस्याधिदैवं सकलगदयुतं सर्पप्रत्यधिदैवं ध्यायेत् केतुं विशालं सकलसुरनरे शान्तिदं पुष्टिदञ्च ॥ श्रीं श्रीं आं वं रं लं केतवे स्वाहा ।

नवग्रह ध्यान मन्त्राः साधुसङ्कुलि तन्त्रान्तर्गतम् Read More »

श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रम्

पार्वत्युवाच- कैलासशिखरे रम्ये गौरी पृच्छति शङ्करम् । ब्रह्माण्डाखिलनाथस्त्वं सृष्टिसंहारकारकः ॥ १॥ त्वमेव पूज्यसे लोकैर्ब्रह्मविष्णुसुरादिभिः । नित्यं पठसि देवेश कस्य स्तोत्रं महेश्वर ॥ २॥ आश्चर्यमिदमाख्यानं जायते मयि शङ्कर । तत्प्राणेश महाप्राज्ञ संशयं छिन्धि मे प्रभो ॥ ३॥ श्रीमहादेव उवाच- धन्यासि कृतपुण्यासि पार्वति प्राणवल्लभे । रहस्यातिरहस्यं च यत्पृच्छसि वरानने ॥ ४॥ स्त्रीस्वभावान्महादेवि पुनस्त्वं परिपृच्छसि । गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ५॥ दत्ते च सिद्धिहानिः स्यात्तस्माद्यत्नेन गोपयेत् । इदं रहस्यं परमं पुरुषार्थप्रदायकम् ॥ ६॥ धनरत्नौघमाणिक्यं तुरङ्गं च गजादिकम् । ददाति स्मरणादेव महामोक्षप्रदायकम् ॥ ७॥ तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि श‍ृणुष्वावहिता प्रिये । योऽसौ निरञ्जनो देवः चित्स्वरूपी जनार्दनः ॥ ८॥ संसारसागरोत्तारकारणाय नृणाम् सदा । श्रीरङ्गादिकरूपेण त्रैलोक्यं व्याप्य तिष्ठति ॥ ९॥ ततो लोका महामूढा विष्णुभक्तिविवर्जिताः । निश्चयं नाधिगच्छन्ति पुनर्नारायणो हरिः ॥ १०॥ निरञ्जनो निराकारो भक्तानां प्रीतिकामदः । वृन्दावनविहाराय गोपालं रूपमुद्वहन् ॥ ११॥ मुरलीवादनाधारी राधायै प्रीतिमावहन् । अंशांशेभ्यः समुन्मील्य पूर्णरूपकलायुतः ॥ १२॥ श्रीकृष्णचन्द्रो भगवान् नन्दगोपवरोद्यतः । धरणीरूपिणीमातृयशोदानन्ददायकः ॥ १३॥ द्वाभ्यां प्रयाचितो नाथो देवक्यां वसुदेवतः । ब्रह्मणाऽभ्यर्थितो देवो देवैरपि सुरेश्वरि ॥ १४॥ जातोऽवन्यां मुकुन्दोऽपि मुरलोवेदरेचिका । तया सार्द्धं वचः कृत्वा ततो जातो महीतले ॥ १५॥ संसारसारसर्वस्वं श्यामलं महदुज्ज्वलम् । एतज्ज्योतिरहं वेद्यं चिन्तयामि सनातनम् ॥ १६॥ गौरतेजो विना यस्तु श्यामतेजस्समर्चयेत् । जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत् पातकी शिवे ॥ १७॥ स ब्रह्महा सुरापी च स्वर्णस्तेयी च पञ्चमः । एतैर्दोषैर्विलिप्येत तेजोभेदान्महीश्वरि ॥ १८॥ तस्माज्ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम् । तस्मादिदं महादेवि गोपालेनैव भाषितम् ॥ १९॥ दुर्वाससो मुनेर्मोहे कार्तिक्यां रासमण्डले । ततः पृष्टवती राधा सन्देहभेदमात्मनः ॥ २०॥ निरञ्जनात्समुत्पन्नं मयाऽधीतं जगन्मयि । श्रीकृष्णेन ततः प्रोक्तं राधायै नारदाय च ॥ २१॥ ततो नारदतस्सर्वे विरला वैष्णवा जनाः । कलौ जानन्ति देवेशि गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ २२॥ शठाय कृपणायाथ दाम्भिकाय सुरेश्वरि । ब्रह्महत्यामवाप्नोति तस्माद्यत्नेन गोपयेत् ॥ २३॥ पाठ करने की विधि ॐ अस्य श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीगोपालो देवता । कामो बीजम् । माया शक्तिः । चन्द्रः कीलकम् श्रीकृष्णचन्द्र भक्तिरूपफलप्राप्तये श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रजपे विनियोगः । या इसतरह करें पाठ ॐ ऐं क्लीं बीजम् । श्रीं ह्रीं शक्तिः । श्रीवृन्दावननिवासः कीलकम् । श्रीराधाप्रियपरब्रह्मेति मन्त्रः । धर्मादिचतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ अथ करादिन्यासः ॐ क्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ ॐ क्लूं मध्यमाभ्यां नमः ॥ ॐ क्लैं अनामिकाभ्यां नमः ॥ ॐ क्लौं कनिष्टिकाभ्यां नमः ॥ ॐ क्लः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ अथ हृदयादिन्यासः ॐ क्लां हृदयाय नमः । ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा ॥ ॐ क्लूं शिखायै वषट् ॥ ॐ क्लैं कवचाय हुं ॥ ॐ क्लौं नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ ॐ क्लः अस्त्राय फट् ॥ अथ ध्यानम् कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रेवरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम् ॥ सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिम् गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूड़ामणिः ॥ १॥ फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् ॥ गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसङ्घावृतं गोविन्दं कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे ॥ २॥ सहस्रनाम स्तोत्र आरम्भ- ॐ क्लीं देवः कामदेवः कामबीजशिरोमणिः । श्रीगोपालो महीपालो सर्ववेदान्तपारगः ॥ १॥ var सर्ववेदाङ्गपारगः कृष्णः कमलपत्राक्षः पुण्डरीकः सनातनः । var धरणीपालकोधन्यः गोपतिर्भूपतिः शास्ता प्रहर्ता विश्वतोमुखः ॥ २॥ आदिकर्ता महाकर्ता महाकालः प्रतापवान् । जगज्जीवो जगद्धाता जगद्भर्ता जगद्वसुः ॥ ३॥ मत्स्यो भीमः कुहूभर्ता हर्ता वाराहमूर्तिमान् । नारायणो हृषीकेशो गोविन्दो गरुडध्वजः ॥ ४॥ गोकुलेन्द्रो महीचन्द्रः शर्वरीप्रियकारकः । कमलामुखलोलाक्षः पुण्डरीकः शुभावहः ॥ ५॥ दुर्वासाः कपिलो भौमः सिन्धुसागरसङ्गमः । गोविन्दो गोपतिर्गोपः कालिन्दीप्रेमपूरकः ॥ ६॥ गोपस्वामी गोकुलेन्द्रो गोवर्धनवरप्रदः । नन्दादिगोकुलत्राता दाता दारिद्र्यभञ्जनः ॥ ७॥ सर्वमङ्गलदाता च सर्वकामप्रदायकः । आदिकर्ता महीभर्ता सर्वसागरसिन्धुजः ॥ ८॥ गजगामी गजोद्धारी कामी कामकलानिधिः । कलङ्करहितश्चन्द्रो बिम्बास्यो बिम्बसत्तमः ॥ ९॥ मालाकारः कृपाकारः कोकिलस्वरभूषणः । रामो नीलाम्बरो देवो हली दुर्दममर्दनः ॥ १०॥ सहस्राक्षपुरीभेत्ता महामारीविनाशनः । शिवः शिवतमो भेत्ता बलारातिप्रपूजकः ॥ ११॥ कुमारीवरदायी च वरेण्यो मीनकेतनः । नरो नारायणो धीरो राधापतिरुदारधीः ॥ १२॥ श्रीपतिः श्रीनिधिः श्रीमान् मापतिः प्रतिराजहा । वृन्दापतिः कुलग्रामी धामी ब्रह्म सनातनः ॥ १३॥ रेवतीरमणो रामः प्रियश्चञ्चललोचनः । रामायणशरीरोऽयं रामो रामः श्रियःपतिः ॥ १४॥ शर्वरः शर्वरी शर्वः सर्वत्र शुभदायकः । राधाराधयिताराधी राधाचित्तप्रमोदकः ॥ १५॥ राधारतिसुखोपेतः राधामोहनतत्परः । राधावशीकरो राधाहृदयाम्भोजषट्पदः ॥ १६॥ राधालिङ्गनसम्मोहः राधानर्तनकौतुकः । राधासञ्जातसम्प्रीतो राधाकाम्यफलप्रदः ॥ १७॥ वृन्दापतिः कोशनिधिः कोकशोकविनाशनः । चन्द्रापतिः चन्द्रपतिः चण्डकोदण्डभञ्जनः ॥ १८॥ रामो दाशरथी रामः भृगुवंशसमुद्भवः । आत्मारामो जितक्रोधो मोहो मोहान्धभञ्जनः ॥ १९॥ वृषभानुभवो भावः काश्यपिः करुणानिधिः । कोलाहलो हली हाली हेली हलधरप्रियः ॥ २०॥ राधामुखाब्जमार्ताण्डः भास्करो रविजा विधुः । विधिर्विधाता वरुणो वारुणो वारुणीप्रियः ॥ २१॥ रोहिणीहृदयानन्दो वसुदेवात्मजो बली । नीलाम्बरो रौहिणेयो जरासन्धवधोऽमलः ॥ २२॥ नागो नवाम्भो विरुदो वीरहा वरदो बली । गोपथो विजयी विद्वान् शिपिविष्टः सनातनः ॥ २३॥ परशुरामवचोग्राही वरग्राही श‍ृगालहा । दमघोषोपदेष्टा च रथग्राही सुदर्शनः ॥ २४॥ वीरपत्नीयशस्त्राता जराव्याधिविघातकः । द्वारकावासतत्त्वज्ञः हुताशनवरप्रदः ॥ २५॥ यमुनावेगसंहारी नीलाम्बरधरः प्रभुः । विभुः शरासनो धन्वी गणेशो गणनायकः ॥ २६॥ लक्ष्मणो लक्षणो लक्ष्यो रक्षोवंशविनाशनः । वामनो वामनीभूतोऽवामनो वामनारुहः ॥ २७॥ यशोदानन्दनः कर्त्ता यमलार्जुनमुक्तिदः । उलूखली महामानी दामबद्धाह्वयी शमी ॥ २८॥ भक्तानुकारी भगवान् केशवो बलधारकः । केशिहा मधुहा मोही वृषासुरविघातकः ॥ २९॥ अघासुरविनाशी च पूतनामोक्षदायकः । कुब्जाविनोदी भगवान् कंसमृत्युर्महामखी ॥ ३०। अश्वमेधो वाजपेयो गोमेधो नरमेधवान् । कन्दर्पकोटिलावण्यश्चन्द्रकोटिसुशीतलः ॥ ३१॥ रविकोटिप्रतीकाशो वायुकोटिमहाबलः । ब्रह्मा ब्रह्माण्डकर्ता च कमलावाञ्छितप्रदः ॥ ३२॥ कमला कमलाक्षश्च कमलामुखलोलुपः । कमलाव्रतधारी च कमलाभः पुरन्दरः ॥ ३३॥ सौभाग्याधिकचित्तोऽयं महामायी मदोत्कटः । तारकारिः सुरत्राता मारीचक्षोभकारकः ॥ ३४॥ विश्वामित्रप्रियो दान्तो रामो राजीवलोचनः । लङ्काधिपकुलध्वंसी विभीषणवरप्रदः ॥ ३५॥ सीतानन्दकरो रामो वीरो वारिधिबन्धनः । खरदूषणसंहारी साकेतपुरवासवान् ॥ ३६॥ चन्द्रावलीपतिः कूलः केशिकंसवधोऽमलः । माधवो मधुहा माध्वी माध्वीको माधवो विधुः ॥ ३७॥ मुञ्जाटवीगाहमानः धेनुकारिर्धरात्मजः । वंशीवटविहारी च गोवर्धनवनाश्रयः ॥ ३८॥ तथा तालवनोद्देशी भाण्डीरवनशङ्खहा । तृणावर्तकृपाकारी वृषभानुसुतापतिः ॥ ३९॥ राधाप्राणसमो राधावदनाब्जमधुव्रतः । गोपीरञ्जनदैवज्ञः लीलाकमलपूजितः ॥ ४०॥ क्रीडाकमलसन्दोहः गोपिकाप्रीतिरञ्जनः । रञ्जको रञ्जनो रङ्गो रङ्गी रङ्गमहीरुहः ॥ ४१॥ कामः कामारिभक्तोऽयं पुराणपुरुषः कविः । नारदो देवलो भीमो बालो बालमुखाम्बुजः ॥ ४२॥ अम्बुजो ब्रह्मसाक्षी च योगी दत्तवरो मुनिः । ऋषभः पर्वतो ग्रामो नदीपवनवल्लभः ॥ ४३॥ पद्मनाभः सुरज्येष्ठी ब्रह्मा रुद्रोऽहिभूषितः । गणानां त्राणकर्ता च गणेशो ग्रहिलो ग्रही ॥ ४४॥ गणाश्रयो गणाध्यक्षः क्रोडीकृतजगत्त्रयः । यादवेन्द्रो द्वारकेन्द्रो मथुरावल्लभो धुरी ॥ ४५॥ भ्रमरः कुन्तली कुन्तीसुतरक्षो महामखी । यमुनावरदाता च काश्यपस्य वरप्रदः ॥ ४६॥ शङ्खचूडवधोद्दामो गोपीरक्षणतत्परः । पाञ्चजन्यकरो रामी त्रिरामी वनजो जयः ॥ ४७॥ फाल्गुनः फाल्गुनसखो विराधवधकारकः । रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामाप्रियङ्करः ॥ ४८॥ कल्पवृक्षो महावृक्षः दानवृक्षो महाफलः । अङ्कुशो भूसुरो भावो भ्रामको भामको हरिः ॥ ४९॥ सरलः शाश्वतो वीरो यदुवंशी शिवात्मकः । प्रद्युम्नो बलकर्ता च प्रहर्ता दैत्यहा प्रभुः ॥ ५०॥ महाधनी महावीरो वनमालाविभूषणः । तुलसीदामशोभाढ्यो जालन्धरविनाशनः ॥ ५१॥ शूरः सूर्यो मृतण्डश्च भास्करो विश्वपूजितः । रविस्तमोहा वह्निश्च बाडवो वडवानलः ॥ ५२॥ दैत्यदर्पविनाशी च गरुडो गरुडाग्रजः । गोपीनाथो महानाथो वृन्दानाथोऽविरोधकः ॥ ५३॥ प्रपञ्ची पञ्चरूपश्च लतागुल्मश्च गोपतिः । गङ्गा च यमुनारूपो गोदा वेत्रवती तथा ॥ ५४॥ कावेरी नर्मदा ताप्ती गण्डकी सरयूस्तथा । राजसस्तामसस्सत्त्वी सर्वाङ्गी सर्वलोचनः ॥ ५५॥ सुधामयोऽमृतमयो योगिनीवल्लभः शिवः । बुद्धो बुद्धिमतां श्रेष्ठो विष्णुर्जिष्णुः शचीपतिः ॥ ५६॥ वंशी वंशधरो लोकः विलोको मोहनाशनः । रवरावो रवो रावो

श्रीगोपालसहस्रनामस्तोत्रम् Read More »

गर्भरक्षणस्तोत्रम्

एह्यहि भगवन् ब्रह्मन् प्रजाकर्तः प्रजापते । प्रगृह्णीष्व बलिं सैमं सापत्यं रक्ष गर्भिणीम् ॥ १॥ अश्विनौ देवदेवेशौ प्रगृह्णीधन् बलिं त्विमम् । सापत्यं गर्भिणीं सैमं स रक्षतां पूजयानया ॥ २॥ रुद्रेशा एकादश प्रोक्ताः प्रगृह्णन्तु बलिं त्विमम् । यक्षागमप्रीतये वृत्तं नित्यं रक्षन्तु गर्भिणीम् ॥ ३॥ आदित्या द्वादश प्रोक्ताः प्रगृह्णीध्वं बलिं त्विमाम् । अस्माकं तेजसां वृद्ध्यै नित्यं रक्षतु गर्भिणीम् ॥ ४॥ विनायक गणाध्यक्ष शिवपुत्र महाबल । प्रगृह्णीष्व बलिं सैमं सापत्यं रक्ष गर्भिणीम् ॥ ५ ॥ स्कन्द षण्मुख देवेश पुत्रप्रीतिविवर्धन । प्रगृह्णीष्व बलिं सैमं सापत्यं रक्ष गर्भिणीम् ॥ ६॥ प्रभासः प्रभवश्यामः प्रत्यासौ मारुतोऽनलः । ध्रुवाधर धराशैव वसवेष्टौ प्रकीर्तितः । प्रगृह्णीष्व बलिं सैमं नित्यं रक्षतु गर्भिणीम् ॥ ७॥ पितृदेवि पितृश्रेष्ठे बहुपुत्रि महाबले । बुधश्रेष्ठे निशावासे निवृत्ते शौनकप्रिये । प्रगृह्णीष्व बलिं सैमं सापत्यं रक्ष गर्भिणीम् ॥ ८॥ रक्ष रक्ष महादेव भक्तानुग्रहकारक । पक्षिवाहन गोविन्द सापत्यं रक्ष गर्भिणीम् ॥ ९॥

गर्भरक्षणस्तोत्रम् Read More »

गरुडकवचम्

अथ गरुडकवचम् । हरिः ॐ । अस्य श्रीगरुडकवचस्तोत्रमन्त्रस्य नारद भगवान् ऋषिः वैनतेयो देवता अनुष्टुप्छन्दः श्रीवैनतेयप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ शिरो मे गरुडः पातु ललाटे विनितासुतः । नेत्रे तु सर्पहा पातु कर्णौ पातु सुराहतः ॥ १॥ नासिकां पातु सर्पारिः वदनं विष्णुवाहनः । सूर्येतालू च कण्ठे च भुजौ पातु महाबलः ॥ २॥ हस्तौ खगेश्वरः पातु कराग्रे तरुणाकृतिः ॥ ३॥ स्तनौ मे विहगः पातु हृदयं पातु सर्पहा । नाभिं पातु महातेजाः कटिं मे पातु वायुनः ॥ ४॥ ऊरू मे पातु उरगिरिः गुल्फौ विष्णुरथः सदा । पादौ मे तक्षकः सिद्धः पातु पादाङ्गुलींस्तथा ॥ ५॥ रोमकूपानि मे वीरो त्वचं पातु भयापहा । इत्येवं कवचं दिव्यं पापघ्नं सर्वकामदम् ॥ ६॥ यः पठेत्प्रातरुत्थाय विषदोषं न पश्यति । त्रिसन्ध्यं पठते नित्यं बन्धनात् मुच्यते नरः । द्वादशाहं पठेद्यस्तु मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥ ७॥ ॥ इति श्रीनारदगरुडसंवादे गरुडकवचं सम्पूर्णम् ॥

गरुडकवचम् Read More »

श्रीकृष्णसहस्रनामस्तोत्र

श्रीमद्रुक्मिमहीपालवंशरक्षामणिः स्थिरः । राजा हरिहरः क्षोणीं रक्षत्यम्बुधिमेखलाम् ।१॥ स राजा सर्वतन्त्रज्ञः समभ्यर्च्य वरप्रदम् । देवं श्रियः पतिं स्तुत्या समस्तौद्वेदवेदितम् ॥ २॥ तस्य हृष्टाशयः स्तुत्या विष्णुर्गोपांगनावृतः । स पिंछश्यामलं रूपं पिंछोत्तंसमदर्शयत् ॥ ३॥ स पुनः स्वात्मविन्यस्तचित्तं हरिहरं नृपम् । अभिषिच्य कृपावर्षैरभाषत कृतांजलिम् ॥ ४॥ श्रीभगवानुवाच । मामवेहि महाभाग कृष्णं कृत्यविदां वर । पुरःस्थितोऽस्मि त्वद्भक्त्या पूर्णास्सन्तु मनोरथाः ॥ ५॥ संरक्षणाय शिष्टानां दुष्टानां शिक्षणाय च । समृद्ध्यै वेदधर्माणां ममांशत्वमिहोदितः ॥ ६॥ राजन्नामसहस्रेण रामो नाम्नां स्तुतस्त्वया । सोऽहं सर्वविदो तस्मात्प्रसन्नोऽस्मि विशेषतः ॥ ७॥ मामपि त्वं महाभाग मदीयचरितात्मना । सम्प्रीणय सहस्रेण नाम्नां सर्वार्थदायिनाम् ॥ ८॥ पराशरेण मुनिना व्यासेनाम्नायर्दशिना । स्वात्मभाजा शुकेनापि सूक्तेऽप्येतद्विभावितम् ॥ ९॥ तं हि त्वमनुसन्धेहि सहस्रशिरसं प्रभुम् । दत्तान्येषु मया न्यस्तं सहस्रं रक्षयिष्यति ॥ १०॥ इदं विश्वहितार्थाय रसनारंगगोचरम् । प्रकाशय त्वं मेदिन्यां परमागमसम्मतम् ॥ ११॥ इदं शठाय मूर्खाय नास्तिकाय विकीर्णिने । असूयिनेऽहितायापि न प्रकाश्यं कदाचन ॥ १२॥ विवेकिने विशुद्धाय वेदमार्गानुसारिणे । आस्तिकायात्मनिष्ठाय स्वात्मन्यनुसृतोदयम् ॥ १३॥ कृष्णनामसहस्रं वै कृतधीरेतदीरयेत् । विनियोगः ॐ अस्य श्रीकृष्णसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य पराशरऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णः परमात्मा देवता, श्रीकृष्णेति बीजम्, श्रीवल्लभेति शक्तिः, शार्ङ्गीति कीलकं, श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥ न्यासः पराशराय ऋषये नमः इति शिरसि, अनुष्टुप् छन्दसे नमः इति मुखे, गोपालकृष्णदेवतायै नमः, इति हृदये, श्रीकृष्णाय बीजाय नमः इति गुह्ये, श्रीवल्लभाय शक्त्यै नमः इति पादयोः, शार्ङ्गधराय कीलकाय नमः इति सर्वांगे ॥ करन्यासः श्रीकृष्ण इत्यारभ्य शूरवंशैकधीरित्यन्तानि अंगुष्ठाभ्यां नमः । शौरिरित्यारभ्य स्वभासोद्भासितव्रज इत्यन्तानि तर्जनीभ्यां नमः । कृतात्मविद्याविन्यासेत्यारभ्य प्रस्थानशकटारूढ इति मध्यमाभ्यां नमः, वृंदावनकृतालय इत्यारभ्य मधुराजनवीक्षित इत्यानामिकाभ्यां नमः, रजकप्रतिघातक इत्यारभ्य द्वारकापुरकल्पन इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः द्वारकानिलय इत्यारभ्य पराशर इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः, एवं हृदयादिन्यासः ॥ ध्यानम् । केषांचित्प्रेमपुंसां विगलितमनसां बाललीलाविलासं केषां गोपाललीलाङ्कितरसिकतनुर्वेणुवाद्येन देवम् । केषां वामासमाजे जनितमनसिजो दैत्यदर्पापहैवं ज्ञात्वा भिन्नाभिलाषं स जयति जगतामीश्वरस्तादृशोऽभूत् ॥ १॥ क्षीराब्धौ कृतसंस्तवस्सुरगणैर्ब्रह्मादिभिः पण्डितैः प्रोद्भूतो वसुदेवसद्मनि मुदा चिक्रीड यो गोकुले । कंसध्वंसकृते जगाम मधुरां सारामसद्वारकां गोपालोऽखिलगोपिकाजनसखः पायादपायात् स नः ॥ २॥ फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं श्रीवत्साङ्कमुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् । गोपीनां नयनोत्पलार्चिततनुं गोगोपसंघावृतं गोविन्दं कलवेणुवादनरतं दिव्यांगभूषं भजे ॥ ३॥ ॐ कृष्णः श्रीवल्लभः शार्ङ्गी विष्वक्सेनः स्वसिद्धिदः । क्षीरोदधामा व्यूहेशः शेषशायी जगन्मयः ॥ १॥ भक्तिगम्यः त्रईमूर्तिर्भारार्तवसुधास्तुतः । देवदेवो दयासिन्धुर्देवदेवशिखामणिः ॥ २॥ सुखभावस्सुखाधारो मुकुन्दो मुदिताशयः । अविक्रियः क्रियामूर्तिरध्यात्मस्वस्वरूपवान् ॥ ३॥ शिष्टाभिलक्ष्यो भूतात्मा धर्मत्राणार्थचेष्टितः । अन्तर्यामी कलारूपः कालावयवसाक्षिकः ॥ ४॥ वसुधायासहरणो नारदप्रेरणोन्मुखः । प्रभूष्णुर्नारदोद्गीतो लोकरक्षापरायणः ॥ ५॥ रौहिणेयकृतानन्दो योगज्ञाननियोजकः । महागुहान्तर्निक्षिप्तः पुराणवपुरात्मवान् ॥ ६॥ शूरवंशैकधीश्शौरिः कंसशंकाविषादकृत् । वसुदेवोल्लसच्छक्तिर्देवक्यष्टमगर्भगः ॥ ७॥ वसुदेवसुतः श्रीमान्देवकीनन्दनो हरिः । आश्चर्यबालः श्रीवत्सलक्ष्मवक्षाश्चतुर्भुजः ॥ ८॥ स्वभावोत्कृष्टसद्भावः कृष्णाष्टम्यन्तसम्भवः । प्राजापत्यर्क्षसम्भूतो निशीथसमयोदितः ॥ ९॥ शंखचक्रगदापद्मपाणिः पद्मनिभेक्षणः । किरीटी कौस्तुभोरस्कः स्फुरन्मकरकुण्डलः ॥ १०॥ पीतवासा घनश्यामः कुंचितांचितकुन्तलः । सुव्यक्तव्यक्ताभरणः सूतिकागृहभूषणः ॥ ११॥ कारागारान्धकारघ्नः पितृप्राग्जन्मसूचकः । वसुदेवस्तुतः स्तोत्रं तापत्रयनिवारणः ॥ १२॥ निरवद्यः क्रियामूर्तिर्न्यायवाक्यनियोजकः । अदृष्टचेष्टः कूटस्थो धृतलौकिकविग्रहः ॥ १३॥ महर्षिमानसोल्लासो महीमंगलदायकः । सन्तोषितसुरव्रातः साधुचित्तप्रसादकः ॥ १४॥ जनकोपायनिर्देष्टा देवकीनयनोत्सवः । पितृपाणिपरिष्कारो मोहितागाररक्षकः ॥ १५॥ स्वशक्त्युद्धाटिताशेषकपाटः पितृवाहकः । शेषोरगफणाच्छत्रश्शेषोक्ताख्यासहस्रकः ॥ १६॥ यमुनापूरविध्वंसी स्वभासोद्भासितव्रजः । कृतात्मविद्याविन्यासो योगमायाग्रसम्भवः ॥ १७॥ दुर्गानिवेदितोद्भावो यशोदातल्पशायकः । नन्दगोपोत्सवस्फूर्तिर्व्रजानन्दकरोदयः ॥ १८॥ सुजातजातकर्म श्रीर्गोपीभद्रोक्तिनिर्वृतः । अलीकनिद्रोपगमः पूतनास्तनपीडनः ॥ १९॥ स्तन्यात्तपूतनाप्राणः पूतनाक्रोशकारकः । विन्यस्तरक्षागोधूलिर्यशोदाकरलालितः ॥ २०॥ नन्दाघ्रातशिरोमध्यः पूतनासुगतिप्रदः । बालः पर्यंकनिद्रालुर्मुखार्पितपदांगुलिः ॥ २१॥ अंजनस्निग्धनयनः पर्यायांकुरितस्मितः । लीलाक्षस्तरलालोकश्शकटासुरभंजनः ॥ २२॥ द्विजोदितस्वस्त्ययनो मंत्रपूतजलाप्लुतः । यशोदोत्संगपर्यंको यशोदामुखवीक्षकः ॥ २३॥ यशोदास्तन्यमुदितस्तृणावर्तादिदुस्सहः । तृणावर्तासुरध्वंसी मातृविस्मयकारकः ॥ २४॥ प्रशस्तनामकरणो जानुचंक्रमणोत्सुकः । व्यालम्बिचूलिकारत्नो घोषगोपप्रहर्षणः ॥ २५॥ स्वमुखप्रतिबिम्बार्थी ग्रीवाव्याघ्रनखोज्ज्वलः । पंकानुलेपरुचिरो मांसलोरूकटीतटः ॥ २६॥ घृष्टजानुकरद्वंद्वः प्रतिबिम्बानुकारकृत् । अव्यक्तवर्णवाग्वृत्तिः स्मितलक्ष्यरदोद्ग्मः ॥ २७॥ धात्रीकरसमालम्बी प्रस्खलच्चित्रचंक्रमः । अनुरूपवयस्याढ्यश्चारुकौमारचापलः ॥ २८॥ वत्सपुच्छसमाकृष्टो वत्सपुच्छविकर्षणः । विस्मारितान्यव्यापारो गोपगोपीमुदावहः ॥ २९॥ अकालवत्सनिर्मोक्ता व्रजव्याक्रोशसुस्मितः । नवनीतमहाचोरो दारकाहारदायकः ॥ ३०॥ पीठोलूखलसोपानः क्षीरभाण्डविभेदनः । शिक्यभाण्डसमाकर्षी ध्वान्तागारप्रवेशकृत् ॥ ३१॥ भूषारत्नप्रकाशाढ्यो गोप्युपालम्भभर्त्सितः । परागधूसराकारो मृद्भक्षणकृतेक्षणः ॥ ३२॥ बालोक्तमृत्कथारम्भो मित्रान्तर्गूढविग्रहः । कृतसन्त्रासलोलाक्षो जननीप्रत्ययावहः ॥३३। मातृदृश्यात्तवदनो वक्त्रलक्ष्यचराचरः । यशोदालालितस्वात्मा स्वयं स्वाच्छन्द्यमोहनः ॥ ३४॥ सवित्रीस्नेहसंश्लिष्टः सवित्रीस्तनलोलुपः । नवनीतार्थनाप्रह्वो नवनीतमहाशनः ॥ ३५॥ मृषाकोपप्रकम्पोष्ठो गोष्ठांगणविलोकनः । दधिमन्थघटीभेत्ता किकिंणीक्वणसूचितः ॥ ३६॥ हैयंगवीनरसिको मृषाश्रुश्चौर्यशंकितः । जननीश्रमविज्ञाता दामबन्धनियंत्रितः ॥ ३७॥ दामाकल्पश्चलापांगो गाढोलूखलबन्धनः । आकृष्टोलूखलोऽनन्तः कुबेरसुतशापवित् ॥। ३८॥ नारदोक्तिपरामर्शी यमलार्जुनभंजनः । धनदात्मजसंघुष्टो नन्दमोचितबन्धनः ॥ ३९॥ बालकोद्गीतनिरतो बाहुक्षेपोदितप्रियः । आत्मज्ञो मित्रवशगो गोपीगीतगुणोदयः ॥ ४०॥ प्रस्थानशकटारूढो वृन्दावनकृतालयः । गोवत्सपालनैकाग्रो नानाक्रीडापरिच्छदः ॥ ४१॥ क्षेपणीक्षेपणप्रीतो वेणुवाद्यविशारदः । वृषवत्सानुकरणो वृषध्वनिविडम्बनः ॥ ४२॥ नियुद्धलीलासंहृष्टः कूजानुकृतकोकिलः । उपात्तहंसगमनस्सर्वजन्तुरुतानुकृत् ॥ ४३॥ भृंगानुकारी दध्यन्नचोरो वत्सपुरस्सरः । बली बकासुरग्राही बकतालुप्रदाहकः ॥ ४४॥ भीतगोपार्भकाहूतो बकचंचुविदारणः । बकासुरारिर्गोपालो बालो बालाद्भुतावहः ॥ ४५॥ बलभद्रसमाश्लिष्टः कृतक्रीडानिलायनः । क्रीडासेतुनिधानज्ञः प्लवंगोत्प्लवनोऽद्भुतः ॥ ४६॥ कन्दुकक्रीडनो लुप्तनन्दादिभववेदनः । सुमनोऽलंकृतशिराः स्वादुस्निग्धान्नशिक्यभृत् ॥ ४७॥ गुंजाप्रालम्बनच्छन्नः पिंछैरलकवेषकृत् । वन्याशनप्रियः श‍ृंगरवाकारितवत्सकः ॥ ४८॥ मनोज्ञपल्लवोत्तंसपुष्पस्वेच्छात्तषट्पदः । मंजुशिंजितमंजीरचरणः करकंकणः ॥ ४९॥ अन्योन्यशासनः कीडापटुः परमकैतवः । प्रतिध्वानप्रमुदितः शाखाचतुरचंक्रमः ॥ ५०॥ अघदानवसंहर्ता व्रजविघ्नविनाशनः । व्रजसंजीवनः श्रेयोनिधिर्दानवमुक्तिदः ॥ ५१॥ कालिन्दीपुलिनासीनस्सहभुक्तव्रजार्भकः । कक्षाजठरविन्यस्तवेणुर्वल्लवचेष्टितः ॥ ५२॥ भुजसन्ध्यन्तरन्यस्तश‍ृंगवेत्रः शुचिस्मितः । वामपाणिस्थदध्यन्नकबलः कलभाषणः ॥ ५३॥ अंगुल्यन्तरविन्यस्तफलः परमपावनः । अदृश्यतर्णकान्वेषी वल्लवार्भकभीतिहा ॥ ५४॥ अदृष्टवत्सपव्रातो ब्रह्मविज्ञातवैभवः । गोवत्सवत्सपान्वेषी विराट्-पुरुषविग्रहः ॥ ५५॥ स्वसंकल्पानुरूपार्थो वत्सवत्सपरूपधृक् । यथावत्सक्रियारूपो यथास्थाननिवेशनः ॥ ५६॥ यथाव्रजार्भकाकारो गोगोपीस्तन्यपस्सुखी । चिराद्वलोहितो दान्तो ब्रह्मविज्ञातवैभवः ॥ ५७॥ विचित्रशक्तिर्व्यालीनसृष्टगोवत्सवत्सपः । ब्रह्मत्रपाकरो धातृस्तुतस्सर्वार्थसाधकः ॥ ५८॥ ब्रह्म ब्रह्ममयोऽव्यक्तस्तेजोरूपस्सुखात्मकः । निरुक्तं व्याकृतिर्व्यक्तो निरालम्बनभावनः ॥ ५९॥ प्रभविष्णुरतन्त्रीको देवपक्षार्थरूपधृक् । अकामस्सर्ववेदादिरणीयस्थूलरूपवान् ॥ ६०॥ व्यापी व्याप्यः कृपाकर्ता विचित्राचारसम्मतः । छन्दोमयः प्रधानात्मा मूर्तामूर्तिद्वयाकृतिः ॥ ६१॥ अनेकमूर्तिरक्रोधः परः प्रकृतिरक्रमः । सकलावरणोपेतस्सर्वदेवो महेश्वरः ॥ ६२॥ महाप्रभावनः पूर्ववत्सवत्सपदर्शकः । कृष्णयादवगोपालो गोपालोकनहर्षितः ॥ ६३॥ स्मितेक्षाहर्षितब्रह्मा भक्तवत्सलवाक्प्रियः । ब्रह्मानन्दाश्रुधौतांघ्रिर्लीलावैचित्र्यकोविदः ॥ ६४॥ बलभद्रैकहृदयो नामाकारितगोकुलः । गोपालबालको भव्यो रज्जुयज्ञोपवीतवान् ॥ ६५॥ वृक्षच्छायाहताशान्तिर्गोपोत्संगोपबर्हणः । गोपसंवाहितपदो गोपव्यजनवीजितः ॥६६। गोपगानसुखोन्निद्रः श्रीदामार्जितसौहृदः । सुनन्दसुहृदेकात्मा सुबलप्राणरंजनः ॥ ६७॥ तालीवनकृतक्रीडो बलपातितधेनुकः । गोपीसौभाग्यसम्भाव्यो गोधूलिच्छुरितालकः ॥ ६८॥ गोपीविरहसन्तप्तो गोपिकाकृतमज्जनः । प्रलम्बबाहुरुत्फुल्लपुण्डरीकावतंसकः ॥ ६९॥ विलासललितस्मेरगर्भलीलावलोकनः । स्रग्भूषणानुलेपाढ्यो जनन्युपहृतान्नभुक् ॥ ७०॥ वरशय्याशयो राधाप्रेमसल्लापनिर्वृतः । यमुनातटसंचारी विषार्तव्रजहर्षदः ॥ ७१॥ कालियक्रोधजनकः वृद्धाहिकुलवेष्टितः । कालियाहिफणारंगनटः कालियमर्दनः ॥ ७२॥ नागपत्नीस्तुतिप्रीतो नानावेषसमृद्धिकृत् । अविष्वक्तदृगात्मेशः खदृगात्मस्तुतिप्रियः ॥ ७३॥ सर्वेश्वरस्सर्वगुणः प्रसिद्धस्सर्वसात्वतः । अकुंठधामा चन्द्रार्कदृष्टिराकाशनिर्मलः ॥ ७४॥ अनिर्देश्यगतिर्नागवनितापतिभैक्षदः । स्वांघ्रिमुद्रांकनागेन्द्रमूर्धा कालियसंस्तुतः ॥ ७५॥ अभयो विश्वतश्चक्षुः स्तुतोत्तमगुणः प्रभुः । अहमात्मा मरुत्प्राणः परमात्मा द्युशीर्षवान् ॥ ७६॥ नागोपायनहृष्टात्मा ह्रदोत्सारितकालियः । बलभद्रसुखालापो गोपालिंगननिर्वृतः ॥ ७७॥ दावाग्निभीतगोपालगोप्ता दावाग्निनाशनः । नयनाच्छादनक्रीडालम्पटो नृपचेष्टितः ॥ ७८॥ काकपक्षधरस्सौम्यो बलवाहककेलिमान् । बलघातितदुर्धर्षप्रलम्बो बलवत्सलः ॥ ७९॥ मुञ्जाटव्यग्निशमनः प्रावृट्कालविनोदवान् । शिलान्यस्तान्नभृद्दैत्यसंहर्ता शाद्वलासनः ॥ ८०॥ सदाप्तगोपिकोद्गीतः कर्णिकारावतंसकः । नटवेषधरः पद्ममालांको गोपिकावृतः ॥ ८१॥ गोपीमनोहरापांगो वेणुवादनतत्परः । विन्यस्तवदनाम्भोजश्चारुशब्दकृताननः ॥ ८२॥ बिम्बाधरार्पितोदारवेणुर्विश्वविमोहनः । व्रजसंवर्णितश्राव्यवेणुनादः श्रुतिप्रियः ॥ ८३॥ गोगोपगोपीजन्मेप्सुर्ब्रह्मेन्द्राद्यभिवन्दितः । गीतस्नुतिसरित्पूरो नादनर्तितबर्हिणः ॥ ८४॥ रागपल्लवितस्थाणुर्गीतानमितपादपः । विस्मारिततृणग्रासमृगो मृगविलोभितः ॥ ८५॥ व्याघ्रादिहिंस्रसहजवैरहर्ता सुगायनः । गाढोदीरितगोवृन्दप्रेमोत्कर्णिततर्णकः ॥ ८६॥ निष्पन्दयानब्रह्मादिवीक्षितो विश्ववन्दितः । शाखोत्कर्णशकुन्तौघश्छत्रायितबलाहकः ॥ ८७॥ प्रसन्नः परमानन्दश्चित्रायितचराचरः । गोपिकामदनो गोपीकुचकुंकुममुद्रितः ॥ ८८॥ गोपिकन्याजलक्रीडाहृष्टो गोप्यंशुकापृहत् । स्कन्धारोपितगोपस्रग्वासाः कुन्दनिभस्मितः ॥ ८९॥ गोपीनेत्रोत्पलशशी गोपिकायाचितांशुकः । गोपीनमस्क्रियादेष्टा गोप्येककरवन्दितः ॥ ९०॥ गोप्यंजलिविशेषार्थी गोपक्रीडाविलोभितः । शान्तवासस्फुरद्गोपीकृतांजलिरघापहः ॥ ९१॥ गोपीकेलिविलासार्थी गोपीसम्पूर्णकामदः । गोपस्त्रीईवस्त्रदो गोपीचित्तचोरः कुतूहली ॥ ९२॥ वृन्दावनप्रियो गोपबन्धुर्यज्वान्नयाचिता । यज्ञेशो यज्ञभावज्ञो यज्ञपत्न्यभिवाञ्छितः ॥ ९३॥ मुनिपत्नीवितीर्णान्नतृप्तो मुनिवधूप्रियः । द्विजपत्न्यभिभावज्ञो द्विजपत्नीवरप्रदः ॥ ९४॥ प्रतिरुद्धसतीमोक्षप्रदो द्विजविमोहिता । मुनिज्ञानप्रदो यज्वस्तुतो वासवयागवित् ॥ ९५॥ पितृप्रोक्तक्रियारूपशक्रयागनिवारणः । शक्राऽमर्षकरश्शक्रवृष्टिप्रशमनोन्मुखः ॥ ९६॥ गोवर्धनधरो गोपगोवृन्दत्राणतत्परः । गोवर्धनगिरिछत्रचंडदंडभुजार्गलः ॥ ९७॥ सप्ताहविधृताद्रीन्द्रो मेघवाहनगर्वहा । भुजाग्रोपरिविन्यस्तक्ष्माधरक्ष्माभृदच्युतः ॥ ९८॥ स्वस्थानस्थापितगिरिर्गोपीदध्यक्षतार्चितः । सुमनस्सुमनोवृष्टिहृष्टो वासववन्दितः ॥ ९९॥ कामधेनुपयःपूराभिषिक्तस्सुरभिस्तुतः । धरांघ्रिरोषधीरोमा धर्मगोप्ता मनोमयः ॥ १००॥ ज्ञानयज्ञप्रियश्शास्त्रनेत्रस्सर्वार्थसारथिः । ऐरावतकरानीतवियद्गंगाप्लुतो विभुः ॥ १०१॥

श्रीकृष्णसहस्रनामस्तोत्र Read More »