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why celebrated mahesh navami:महेश नवमी क्यों मनाई जाती है, पढ़ें कथा

महेश नवमी क्या है? (What is  Mahesh Navami) why celebrated mahesh navami:महेश नवमी (Mahesh Navami), ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व, महेश्वरी समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है। यह भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा का दिन है और समुदाय की उत्पत्ति को चिन्हित करता है। इस दिन विशेष प्रार्थनाएं और अनुष्ठान होते हैं, और महेश्वरी समुदाय के सदस्य “बाबा की झांकी” भी करते हैं। महेश नवमी माहेश्वरी समाज का प्रमुख पर्व है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। माहेश्वरी समाज की उत्पति भगवान शिव के वरदान से इसी दिन हुई। महेश नवमी के दिन देवाधिदेव शिव व जगतजननी मां पार्वती की आराधना की जाती है। यहां पढ़ें महेश नवमी की कथा- कथा : एक खडगलसेन राजा थे। प्रजा राजा से प्रसन्न थी। राजा व प्रजा धर्म के कार्यों में संलग्न थे, पर राजा को कोई संतान नहीं होने के कारण राजा दु:खी रहते थे। राजा ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कामेष्टि यज्ञ करवाया। why celebrated mahesh navami ऋषियों-मुनियों ने राजा को वीर व पराक्रमी पुत्र होने का आशीर्वाद दिया, लेकिन साथ में यह भी कहा 20 वर्ष तक उसे उत्तर दिशा में जाने से रोकना। नौवें माह प्रभु कृपा से पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा ने धूमधाम से नामकरण संस्कार करवाया और उस पुत्र का नाम सुजान कंवर रखा। वह वीर, तेजस्वी व समस्त विद्याओं में शीघ्र ही निपुण हो गया। why celebrated mahesh navami एक दिन एक जैन मुनि उस गांव में आए। उनके धर्मोपदेश से कुंवर सुजान बहुत प्रभावित हुए। why celebrated mahesh navami उन्होंने जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली और प्रवास के माध्यम से जैन धर्म का प्रचार-प्रसार करने लगे। धीरे-धीरे लोगों की जैन धर्म में आस्था बढ़ने लगी। स्थान-स्थान पर जैन मंदिरों का निर्माण होने लगा। एक दिन राजकुमार शिकार खेलने वन में गए और अचानक ही राजकुमार उत्तर दिशा की ओर जाने लगे। why celebrated mahesh navami सैनिकों के मना करने पर भी वे नहीं माने। उत्तर दिशा में सूर्य कुंड के पास ऋषि यज्ञ कर रहे थे। वेद ध्वनि से वातावरण गुंजित हो रहा था। यह देख राजकुमार क्रोधित हुए और बोले- ‘मुझे अंधरे में रखकर उत्तर दिशा में नहीं आने दिया’ और उन्होंने सभी सैनिकों को भेजकर यज्ञ में विघ्न उत्पन्न किया। इस कारण ऋषियों ने क्रोधित होकर उनको श्राप दिया और वे सब पत्थरवत हो गए। राजा ने यह सुनते ही प्राण त्याग दिए। उनकी रानियां सती हो गईं। why celebrated mahesh navami राजकुमार सुजान की पत्नी चन्द्रावती सभी सैनिकों की पत्नियों को लेकर ऋषियों के पास गईं और क्षमा-याचना करने लगीं। ऋषियों ने कहा कि हमारा श्राप विफल नहीं हो सकता, पर भगवान भोलेनाथ व मां पार्वती की आराधना करो। why celebrated mahesh navami सभी ने सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना की और भगवान महेश व मां पार्वती ने अखंड सौभाग्यवती व पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया। चन्द्रावती ने सारा वृत्तांत बताया और सबने मिलकर 72 सैनिकों को जीवित करने की प्रार्थना की। महेश भगवान पत्नियों की पूजा से प्रसन्न हुए और सबको जीवनदान दिया। why celebrated mahesh navami भगवान शंकर की आज्ञा से ही इस समाज के पूर्वजों ने क्षत्रिय कर्म छोड़कर वैश्य धर्म को अपनाया। why celebrated mahesh navami समस्त माहेश्वरी समाज इस दिन श्रद्धा व भक्ति से भगवान शिव व मां पार्वती की पूजा-अर्चना करते हैं। इसलिए आज भी ‘माहेश्वरी समाज’ के नाम से इसे जाना जाता है।  महेश नवमी के फायदे (Mahesh Navami Benefits) 1.महेश नवमी (Mahesh Navami) हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है।  2.इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने से सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। 3.महेश नवमी के दिन शिवलिंग पर जल, दूध, भांग और बेलपत्र चढ़ाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और बीमारियों से मुक्ति मिलती है।  3.इस दिन 21 बेलपत्र पर ‘ॐ’ लिखकर चढ़ाने से इच्छित फल प्राप्त होता है।  4.महेश नवमी का व्रत करने से शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।  5.इस दिन दान-पुण्य करने से भी पुण्य फल मिलता है। महेश नवमी व्रत (Mahesh Navami Vrat) को मनाने के प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं | प्रातः स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। निकटतम शिव मंदिर जाकर भगवान शिव को दूध, फूल, बेल पत्र अर्पित करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें। व्रत के दौरान एक समय भोजन करें। भोजन में फलाहार या सात्विक आहार लें। प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा आदि का सेवन न करें। दिन भर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करें। शिव चालीसा, शिव पुराण आदि का पाठ करें। महेश नवमी की कथा सुनें। महेश नवमी की व्रत कथा सुनने से आपको भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होगी। सायंकाल शिव मंदिर जाकर महाआरती में शामिल हों। शिव जी की वंदना का गायन करें। रात्रि में जागरण करें। भगवान शिव के गुणों का स्मरण करते हुए भजन-कीर्तन करें। अगले दिन प्रातः स्नान के बाद व्रत का पारण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें। महेश नवमी (Mahesh Navami) के दिन भगवान शिव (Lord Shiva) और माता पार्वती (Goddess Parvati) की विधिवत पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह व्रत विशेष रूप से माहेश्वरी समाज के लिए महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव का आविर्भाव हुआ था, इसलिए इसे महाशिवजयंती भी कहा जाता है।

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Mahesh Navami 2025 Date:जानिए इस वर्ष कब हैं महेश नवमी, नोट करलें पूजन विधि

Mahesh Navami 2025 Date:देवों के देव महादेव की महिमा निराली है। भगवान शिव के भक्तों को पृथ्वी लोक पर सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। साथ ही साधक के घर में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है। साधक श्रद्धा भाव से महेश नवमी (Mahesh Navami 2025 Date) के दिन देवों के देव महादेव और जगत की देवी मां पार्वती की पूजा करते हैं। हर साल ज्येष्ठ माह में महेश नवमी मनाई जाती है। यह पर्व ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन देवों के देव महादेव और मां पार्वती की पूजा की जाती है। साथ ही भगवान शिव के निमित्त व्रत भी रखा जाता है। इस शुभ अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। धार्मिक मत है कि महेश नवमी Mahesh Navami पर भगवान शिव की पूजा करने से साधक के सुख, सौभाग्य और वंश में वृद्धि होती है। साथ ही साधक पर शिव-शक्ति की कृपा बरसती है। उनकी कृपा से घर में सुख, समृद्धि और खुशहाली आती है। आइए, महेश नवमी की सही डेट (Mahesh Navami 2025), शुभ मुहूर्त एवं योग जानते हैं- महेश नवमी शुभ मुहूर्त (Mahesh Navami 2025 Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, 03 जून को रात 09 बजकर 56 मिनट पर ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि शुरू होगी और अगले दिन 04 जून को देर रात 11 बजकर 54 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदया तिथि मान है। इसके लिए 04 जून को महेश नवमी मनाई जाएगी। वहीं, 05 जून को गंगा दशहरा मनाया जाएगा। महेश नवमी शुभ योग (Mahesh Navami 2025 Shubh Yoga) ज्योतिषियों की मानें तो ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर शुभ और शुक्ल योग का निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही दोपहर 02 बजकर 27 मिनट तक शिववास योग बन रहा है। इस समय तक देवों के देव महादेव कैलाश पर जगत की देवी मां गौरी के साथ रहेंगे। इस योग में भगवान शिव की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होगी। महेश नवमी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व:Religious and cultural importance of Mahesh Navami माहेश्वरी समुदाय में महेश नवमी का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माहेश्वरी समुदाय की रचना की थी, इसलिए इस दिन को इस समुदाय का स्थापना दिवस भी माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन वैवाहिक सुख, पारिवारिक समृद्धि, धार्मिक उन्नति और मोक्ष प्राप्ति के लिए बहुत उपयुक्त है। महिलाएं विशेष रूप से इस दिन शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा करके अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम और स्थायित्व की कामना करती हैं। वहीं पुरुष वर्ग व्रत और पूजा करके अपने कुलदेवता की पूजा करता है। व्रत रखने की विधि Mahesh Navami Vrat Vidhi जो भक्त इस दिन व्रत रखना चाहते हैं, उन्हें निम्न विधि का पालन करना चाहिए: व्रत के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और पवित्र व्रत का संकल्प लें। पूरे दिन केवल फलाहार करें या निर्जल व्रत (अपनी क्षमता के अनुसार) रखें। पूरे दिन सात्विकता बनाए रखें और संयम से व्यवहार करें। दिन में काम से काम 108 बार भगवान शिव के “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें। शाम की पूजा के बाद आरती करें और प्रसाद बांटें। अगले दिन व्रत तोड़ें और किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं। पूजा विधि: भगवान महेश और माता पार्वती की पूजा:Worship Method: Worship of Lord Mahesh and Mother Parvati महेश नवमी पर निम्न तरीके से पूजा करें: पूजा स्थल को साफ करें और वहां गंगाजल छिड़कें और एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, चीनी) से अभिषेक करें। बेलपत्र, धतूरा, सफेद फूल, चंदन, अक्षत, भस्म चढ़ाएं। माता पार्वती को लाल चुनरी, सिंदूर, चूड़ियां जैसी सुहाग की वस्तुएं चढ़ाएं। शिव पंचाक्षरी मंत्र “ओम नम: शिवाय” और देवी मंत्र “ओम ह्रीं नम: पर्वतायै” का जाप करें। अंत में आरती और शिव चालीसा का पाठ करें। व्रत रखने वालों के लिए विशेष निर्देश:Special instructions for those observing fast व्रत करने वाले को पूरे दिन पवित्रता, सात्विकता और धार्मिक आचरण बनाए रखना चाहिए। किसी से कटु वचन न बोलें और क्रोध से बचें। व्रत रखने के दौरान पूरे दिन शिव-पार्वती मंत्रों का जाप और ध्यान करें। केवल फल, दूध, शर्बत, मेवे आदि का सेवन करें, अनाज और नमक से परहेज करें। पूरे दिन कथा, पाठ, ध्यान, जप आदि धार्मिक क्रियाकलापों में संलग्न रहें। रात में शिव स्तोत्र या शिवपुराण का पाठ करके सोना शुभ होता है।

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Dhumavati Jayanti 2025 Date:धूमावती जयंती कब है? सातवीं महाविद्या की पूजा से दरिद्रता होगी दूर,ये 7 मंत्र गरीबी को करेंगे दूर

Dhumavati Jayanti 2025 Date: ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी तिथि को मां धूमावती की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए हर साल ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी को धूमावती जयंती मनाते हैं. मां धूमावती की पूजा और व्रत करने से दुख और दरिद्रता का नाश होता है, धन-वैभव में बढ़ोत्तरी होती है. तिरुपति के ज्योतिषाचार्य डॉ. कृष्ण कुमार भार्गव से जानते हैं कि धूमावती जयंती कब है? धूमावती जयंती का मुहूर्त क्या है? Dhumavati Jayanti 2025 Date: देवी धूमावती 10 महाविद्याओं में से 7वीं महाविद्या हैं. हिंदू कैलेंडर के अनुसार, मां धूमावती की उत्पत्ति ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था, इस वजह से हर साल इस तिथि को धूमावती जयंती मनाई जाती है. इस बार धूमावती जयंती पर रवि योग और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र है. उस दिन रवि योग निशिता मुहूर्त में बनेगा. इस दिन जो व्यक्ति व्रत रखकर मां धूमावती की पूजा करता है, तो उनकी कृपा से दरिद्रता मिटती है, धन और वैभव की प्राप्ति होती है. धूमावती जयंती 2025 तारीख Dhumavati Jayanti 2025 Date Dhumavati Jayanti देवी धूमावती की पूजा करने वाले व्यक्ति को केतु से संबंधित समस्याओं से मुक्ति मिलती है. इस देवी के आशीर्वाद से सभी प्रकार के संकट और बाधाएं दूर होती हैं. जो अति दरिद्र है, उसे मां धूमावती की पूजा जरूर करनी चाहिए. दृक पंचांग के आधार पर देख जाए तो धूमावती जयंती के लिए आवश्यक ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी ति​थि 2 जून सोमवार को रात 8 बजकर 34 मिनट से प्रारंभ होगी. इस अष्टमी ति​थि का समापन 3 जून दिन मंगलवार को रात 9 बजकर 56 मिनट पर होगा. ऐसे में उदयाति​थि के आधार पर धूमावती जयंती 3 जून मंगलवार को मनाई जाएगी. धूमावती जयंती 2025 मुहूर्त Dhumavati Jayant 2025 Muhurat 3 जून को Dhumavati Jayanti धूमावती जयंती के अवसर पर ब्रह्म मुहूर्त 04:02 ए एम से 04:43 ए एम तक है. उस दिन का शुभ समय यानि अभिजीत मुहूर्त 11:52 ए एम से दोपहर 12:47 पी एम तक है. लाभ-उन्नति मुहूर्त 10:35 ए एम से 12:19 पी एम और अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त 12:19 पी एम से 02:03 पी एम तक है. उस दिन का निशिता मुहूर्त रात 11:59 पी एम से देर रात 12:40 ए एम तक है. रवि योग में धूमावती जयंती 2025 Ravi yog Me Dhumavati Jayant धूमावती जयंती Dhumavati Jayanti पर रवि योग बन रहा है. रवि योग देर रात 12 बजकर 58 मिनट पर बनेगा और वह अगले दिन 04 जून को सुबह 05 बजकर 23 मिनट तक रहेगा. इसके अलावा हर्षण योग प्रात:काल से सुबह 08 बजकर 09 मिनट तक रहेगा. फिर वज्र योग बनेगा. उस दिन पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र देर रात 12:58 ए एम तक है, फिर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र है. कौन हैं देवी धूमावती? Koun hai Devi Dhumavati पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी धूमावती का संबंध 10 महाविद्याओं से है. वे सातवीं महाविद्या हैं. धन, वैभव, सुख, समृद्धि के साथ दरिद्रता को दूर करने के लिए देवी धूमावती की पूजा करते हैं. तंत्र साधना में मारण और उच्चाटन के लिए Dhumavati Jayanti देवी धूमावती की पूजा करते हैं. इनकी कृपा से केतु से संबंधित दोष और संकट मिटते हैं. जिस पर देवी धूमावती की कृपा होती है, उसे केतु परेशान नहीं करता है. शत्रुओं पर विजय के लिए भी इनकी पूजा करते हैं. रोग, दोष और कष्ट मिटते हैं. कैसे हुई देवी धूमावती की उत्पत्ति Kaise Huyi Devi Dhumavati Ki Utpati कथा के अनुसार, माता पार्वती और भगवान शिव कैलाश पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे. उसी समय माता पार्वती को भूख लग गई. उन्होंने शिव जी से भोजन के लिए कहा. तो भोलेनाथ ने उनको कुछ समय प्रतीक्षा करने के लिए बोला. देखते ही देखते माता पार्वती की भूख इतनी बढ़ गई कि उन्होंने शिव जी को ही निगल गईं. शिव जी के अंदर विष का प्रभाव है, उसका असर माता पार्वती पर होने लगा, जिससे उनका शरीर धूएं के समान विकृत हो गया. माता पार्वती का यह स्वरूप देवी धूमावती के रूप में प्रसिद्ध हुआ. एक कथा यह भी है कि जब देवी सती ने अपने पिता के यज्ञ में अपने शरीर को जला दिया तो उसके धुएं से देवी धूमावती की उत्पत्ति हुई. देवी धूमावती कुमारी हैं. युद्ध में उनको कोई हरा नहीं सका, इसलिए उन्होंने विवाह नहीं किया. उनके विवाह की शर्त थी कि जो युद्ध में उनको परास्त करेगा, उससे ही विवाह करेंगी. धूमावती स्वरूप वर्णन Dhumavati Swaroop Bardan देवी धूमावती Dhumavati Jayanti को एक वृद्ध और कुरूप विधवा स्त्री के रूप में दर्शाया जाता है। अन्य महाविद्याओं के समान वह कोई आभूषण धारण नहीं करती हैं। वह पुराने और मलिन वस्त्र धारण करती हैं। इनके केश पूर्णतः अव्यवस्थित रहते हैं। Dhumavati Jayanti इन्हें दो भुजाओं के साथ चित्रित किया गया है। देवी अपने कम्पित हाथों में, एक सूप रखती हैं और उनका अन्य हाथ वरदान मुद्रा अथवा ज्ञान प्रदायनी मुद्रा में होता है। वह एक बिना अश्व के रथ पर सवारी करती हैं, जिसके शीर्ष पर ध्वज और प्रतीक के रूप में कौआ विराजमान रहता है। धूमावती मूल मंत्र Dhumavati mool mantra ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा॥ माता धूमावती के अन्य मंत्र 1. मां धूमावती सप्ताक्षर मंत्र धूं धूमावती स्वाहा॥ 2. मां धूमावती अष्टक्षर मंत्र धूं धूं धूमावती स्वाहा॥ 3. मां धूमावती दशाक्षर मंत्र धूं धूं धूं धूमावती स्वाहा॥ 4. मां धूमावती चतुर्दशाक्षर मंत्र धूं धूं धुर धुर धूमावती क्रों फट् स्वाहा॥ 5. मां धूमावती पंचदशाक्षर मंत्र ॐ धूं धूमावती देवदत्त धावति स्वाहा॥ 6. धूमावती गायत्री मंत्र ॐ धूमावत्यै विद्महे संहारिण्यै धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात्॥

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Jyeshtha Masik Durga Ashtami Vrat 2025 Date:कब है ज्येष्ठ मासिक दुर्गा अष्टमी, नोट करले डेट टाइम, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व उपाय

Jyeshtha Masik Durga Ashtami Vrat:हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दुर्गा अष्टमी व्रत रखा जाता है। इस दिन देवी दुर्गा के भक्त उनकी पूजा करते हैं और पूरे दिन व्रत रखते हैं। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है, कहा जाता है कि मां दुर्गा के सभी रूपों की विधि-विधान से पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। मासिक दुर्गाष्टमी को मास दुर्गाष्टमी या मासिक दुर्गाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं इस मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत के महत्व और मान्यताओं के बारे में: इसके अलावा यदि जो लोग मासिक दुर्गाष्टमी के दिन माता दुर्गा की पूजा करते है उनके द्वारा किये गए सभी पाप धुल जाते हैं और मन शुद्ध होता है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा करने से सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। Jyeshtha Masik Durga Ashtami मान्यता है कि मासिक दुर्गाष्टमी के दिन माता दुर्गा की सच्चे मन से पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। और ग्रहदोष से भी मुक्ति मिलती है। आईये जानते है साल 2025 में ज्येष्ठ मासिक दुर्गा अष्टमी कब मनाई जाएगी 02 या 03 जून, जानिए पूजा की सही तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और इस दिन किये जाने वाले उपाय ज्येष्ठ मासिक दुर्गा अष्टमी कब है 2025 Jyeshtha Durga Ashtami 2025 Date Muhurat Jyeshtha Masik Durga Ashtami हिंदी पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ होगी 02 जून 2025 को रात 08 बजकर 34 मिनट पर और ज्येष्ठ मास की दुर्गा अष्टमी तिथि समाप्त होगी 03 जून 2025 को रात 09 बजकर 56 मिनट पर इसलिए साल 2025 में ज्येष्ठ मासिक दुर्गा अष्टमी 03 जून दिन मंगलवार को मनाई जाएगी। दुर्गा अष्टमी पूजा विधि Durga Ashtami Puja Vidhi Jyeshtha Masik Durga Ashtami दुर्गा अष्टमी माता दुर्गा को समर्पित होती है। इसलिए ज्येष्ठ मासिक दुर्गाष्टमी के दिन व्रती सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करे। और व्रत का संकल्प लें इसके बाद पूजा के स्थान को स्वच्छ करें और माता दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद माता दुर्गा के समक्ष धूप, दीप प्रज्वलित करें और माता दुर्गा को फल, फूल, मिठाई आदि अर्पित करें। और माता दुर्गा का ध्यान करें और माता दुर्गा के मंत्रों का जाप करें. इसके Jyeshtha Masik Durga Ashtami अलावा दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। इसके बाद कलश का जल पूरे घर में छिड़कें और प्रसाद ग्रहण करने से पहले माता दुर्गा को अर्पित करें। और फिर पूजा समाप्त होने के बाद किसी गरीबों व्यक्ति या किसी और जरूरतमंद लोगों को दान करे। दुर्गा अष्टमी उपाय Durga Asthami Upay यदि आप जीवन की परेशानियों से छुटकारा पाना चाहते है तो मासिक दुर्गाष्टमी के दिन माता दुर्गा को हलवा और उबले हुए चने का भोग लगाएं। और साथ ही 6 सफेद कौड़ियां लेकर उन्हें लाल कपड़े में बांधकर माता दुर्गा के मंदिर में ले जाकर चढ़ाये। Jyeshtha Masik Durga Ashtami यदि आप कौड़ियां ना ले पायें तो 6 कपूर और 36 लौंग लेकर माता दुर्गा को चढ़ाएं। आप की सभी मनोकामना पूरी होगी। यदि आप धन की समस्या से परेशान हैं धन रुकता नही है, तो इसके लिए अष्टमी तिथि के दिन पान के पत्ते पर चंदन से ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे लिखकर माता दुर्गा के चरणों में अर्पित करें। और अगले दिन इस पान के पत्तों को अपनी तिजोरी में रख लें। Jyeshtha Masik Durga Ashtami ऐसा करने से आपको अपनी आर्थिक स्थिति में लाभ मिलेगा। दुर्गा अष्टमी के दिन माता दुर्गा के समक्ष देसी घी का दीपक जलाने के बाद इस मंत्र या देवी सर्व भूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।। का 11 बार जप करने से बच्चे के कैरियर में उन्नति होगी दुर्गा अष्टमी पर ना करे ये काम Jyeshtha Masik Durga Ashtami Per Na kare Ye kaam माता दुर्गा की पूजा में तुलसी, आंवला, दूर्वा, मदार, आक के फूल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बल्कि पूजा के दौरान माता दुर्गा की एक ही तस्वीर रखनी चाहिए। दुर्गा पूजा के दौरान तामसिक चीजो का सेवन नही करना चाहिए। Shri Durga 108 Name:श्री दुर्गा के 108 नाम Shri Durga 32 Name:माँ दुर्गा के 32 नाम सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra) दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa)

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Jamai Sasthi 2025 Date : बंगाल के जमाई षष्ठी के बारे में ये बातें आपको हैरान कर देगी

Jamai Sasthi:भारत एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश है। यहां कई अद्भुत त्यौहार मनाए जाते हैं। जितने राज्य हैं, उतनी हीं भाषाएं है, उतनी ही जाति है, उतने ही धर्म है और सभी के उतने ही रिवाज और रस्में हैं। कई तो ऐसे भी त्यौहार है जिनका नाम कई लोगों ने कभी सुना भी नहीं होगा। इन्हीं रोचक त्यौहारों में से एक है बगांल में मनाया जाने वाला त्यौहार ‘जामाई षष्ठी’। कोलकाता में ‘जामाई षष्ठी’  नामक एक खूबसूरत त्यौहार मनाया जाता है। जामाई को कई जगह दामाद, मेहमान इत्यादि भी कहा जाता है। जामाई षष्ठी एक ऐसा त्यौहार है जो जामाई को अपने ससुराल पक्ष से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। यह त्यौहार ससुरालवालों के साथ दमाद के सुंदर बंधन को भी प्रदर्शित करता है। जामाई षष्ठी Jamai Sasthi का पारंपरिक त्यौहार महिलाओं की सामाजिक-धार्मिक तथा कर्तव्य के हिस्से के रूप में पैदा हुआ था। दामाद को ‘जामाई’  और ‘षष्ठी’ ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष के छठे दिन को कहते हैं। जिसका अर्थ छठा दिन है।  इस प्रकार यह त्यौहार परंपरागत हिंदू कैलेंडर के ज्येष्ठ महीने में शुक्ल पक्ष के छठे दिन मनाया जाता है। साल 2025 में जमाई षष्ठी कब है? (Jamai Sasthi 2025) प्रत्येक वर्ष जमाई षष्ठी का त्योहार ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार Jamai Sasthi जमाई षष्ठी का त्योहार मई तथा जून के महीने में मनाया जाता है। साल 2025 में जमाई षष्ठी 01 जून, दिन- रविवार को मनाया जाएगा। जमाई षष्ठी का शाब्दिक अर्थ क्या है? What is the literal meaning of Jamai Sasthi ? जमाई शब्द का अर्थ है दामाद, जबकी षष्ठी का अर्थ चंद्र मास का छठा दिन से है अर्थात् ज्येष्ठ माह के षष्ठी के दिन मनाए जाने वाले पर्व को जमाई षष्ठी कहा जाता है। जमाई षष्ठी के दिन किए जाने वाले कार्यक्रम:Jamai Sasthi ke din kiye jaane vale karyakram जमाई षष्ठी की तैयारी: Preparation for Jamai Sasthi सास अपने दामाद की स्वागत के लिए इस बड़े दिन की तैयारी पहले से ही शुरू कर देती है। सास अपनी बेटी और दामाद के लिए उपहार, साड़ियाँ और कभी-कभी सोने के गहने भी खरीदती हैं। उसके बाद एक भव्य दावत की योजना बनाई जाती है, जिसमें बंगाली व्यंजनों का सबसे अच्छा स्वाद होता है और इसमें दामाद के पसंदीदा व्यंजनों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। अनुष्ठान और परंपराएँ: Rituals and Traditions बंगालियों के घरों में जमाई षष्ठी का त्योहार बहुत ही उत्साह और हर्षोंल्लास के साथ मनाया जाता है। जमाई षष्ठी उत्सव की शुरुआत देवी षष्ठी की पूजा से होती है, जिसमें सास अपने परिवार की खुशहाली के लिए माता देवी षष्ठी से आशीर्वाद माँगती है। उसके बाद सास अपने जमाई का स्वागत आरती और तिलक लगाकर करती है, जो प्यार और सम्मान का प्रतीक है। सुरक्षा और सौभाग्य के प्रतीक के रूप में सास अपने दामाद के कलाई पर एक पवित्र पीला धागा बाँधती है। जमाई षष्ठी के दिन दामाद का स्वागत: Welcoming the son-in-law on the day of Jamai Sasthi जमाई षष्ठी Jamai Sasthi की शुरुआत में सबसे पहले सास अपने दामाद को गृह प्रवेश करवाती है तथा इस दौरान सास अपने दामाद को तिलक लगाती है और अपने दामाद की कलाई में पीला धागा बांधती है तथा उसके बाद अपने दामाद को कपूर से आरती कर खुशहाल रहने का आशीर्वाद देती है। अंत में दामाद अपने सास का पैर छूकर आशीर्वाद लेता है। जमाई षष्ठी का सबसे प्रतीक्षित हिस्सा निस्संदेह भव्य दावत है तथा इस दिन सास अपने दामाद के लिए खास व्यंजन तैयार करती है जिनमें से शुक्तो, बेगुन भाजा, मिष्टी दोई, लूची, आलूर डोम, विभिन्न तरह का मिठाइयाँ तथा अन्य कई तरह के बंगाली व्यंजन शामिल होता है। जमाई षष्ठी की थाली: Jamai Sashhi Thali जमाई षष्ठी Jamai Sasthi के दिन सास अपने दामाद को एक राजा जैसा सम्मान प्रदान करने के लिए स्वादिष्ट व्यंजनों से भरा एक थाल तैयार करती है। खासकर दोपहर के भोजन में सास अपने दामाद को भात, दाल, पाँच प्रकार की तली हुई सब्जी(भाजी), कोशा मांगशो, इलिश भापा तथा अन्य कई स्वादिष्ट व्यंजन परोसे जाते है। जमाई षष्ठी का महत्व: Importance of Jamai Sasthi जमाई षष्ठी Jamai Sasthi केवल एक त्यौहार नहीं है, बल्कि सास और दामाद के बीच प्यार और खूबसूरत बंधन की अभिव्यक्ति है। मान्यता है कि जमाई षष्ठी का त्योहार मनाने से दोनों परिवारों के बीच मतभेद कम होता है और इस दौरान सास तथा दामाद के बीच के रिश्ते ओर भी मज़बूत होते है। शुभो जमाई षष्ठी! जमाई षष्ठी से जुड़ी कहानी: Story related to Jamai Sasthi 1.पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने अपने घर पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती को भोज के लिए आमंत्रित किया था। लेकिन आपस में मन मुटाव होने के कारण माता लक्ष्मी ने देवी पार्वती की स्वागत नहीं की, इससे भगवान शिव नाराज हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु को यह श्राप दिया कि तुम्हें अपना घर छोड़ रास्ते में एक भिखारी की तरह भटकना पड़ेगा। तभी भगवान विष्णु ने एक जमाई(दामाद) का रूप धारण किया और ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की Jamai Sasthi षष्ठी तिथि को माता लक्ष्मी से आशीर्वाद प्राप्त किया। सास से क्षमा माँगने की इस कृतज्ञ से भगवान शिव द्वारा दिए गए श्राप से भगवान विष्णु मुक्त हो जाते है और इस तरह भगवान विष्णु अपने घर वापस लौटने में सक्षम हो जाते है। 2.अन्य पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन समय में एक महिला अपने घर का सारा खाना खा लेती थी, और लगातार अपना दोष एक बिल्ली पर लगाती कि उसके घर का खाना बिल्ली खाई है। बिल्ली की सवारी करने वाली माँ षष्ठी उस महिला पर काफी क्रोधित हुई। महिला गर्भवती थी तथा जब महिला के बच्चे धरती पर जन्म लिए तो उनमें से एक बच्चा ग़ायब हो गया, इस दौरान महिला देवी षष्ठी को खुश करने के लिए उनकी पूजा आराधना की। तो देवी षष्ठी महिला को उनका बच्चा वापस कर दी। लेकिन इस घटना की वजह से महिला के ससुराल वाले नाखुश थे, और महिला को अपने माता-पिता से मिलने के लिए मना कर दिए। लेकिन कुछ सालों बाद षष्ठी पूजा के दिन महिला की माता-पिता अपने दामाद तथा बेटी

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Shani Jayanti 2025 Date : कब है शनि जयंती,साढ़े साती से मुक्ति के लिए करें ये खास उपाय

Shani Jayanti 2025 Date: शनि जयंती पर भगवान शनि की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ व्रत रखने का विधान है। आइए जानते हैं शनि जयंती की सही तिथि, मुहूर्त सहित अन्य जानकारी Shani Jayanti 2025 Date: हिंदू कैलेंडर के अनुसार, ज्येष्ठ माह क अमावस्या तिथि को Shani Jayanti शनि जंयती का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव और छाया पुत्र शनिदेव का जन्म हुआ था। न्याय के देवता , कर्मफल दाता शनि की इस दिन विधिवत पूजा करने के साथ व्रत रखने का विधान है। मान्यता है कि शनि जातकों को उनके कर्मों के हिसाब से फल देते हैं। इसलिए व्यक्ति को हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए। न्याय के देवता शनि की दृष्टि व्यक्ति के जीवन में कम से कम एक बार अवश्य पड़ती है। इसके साथ ही जातकों को शनि साढ़े साती और ढैय्या का सामना करना पड़ता है। बता दें कि उत्तर भारत में शनि जयंती ज्येष्ठ अमावस्या को मनाते हैं और वहीं दक्षिण भारत में वैशाख अमावस्या के दिन मनाते हैं। आइए जानते हैं ज्येष्ठ माह में पड़ने वाली शनि जयंती की सही तिथि, मुहूर्त से लेकर उपाय तक… कब है शनि जयंती 2025? (Shani Jayanti 2025 Date) हिंदू कैलेंडर के अनुसार Shani Jayanti शनि जयंती हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाई जाती है. इस वर्ष शनि जयंती 27 मई 2025 को मनाई जाएगी. प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, सूर्य देव के पुत्र भगवान शनि का जन्म इसी दिन हुआ था. इसलिए, हर साल ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती मनाई जाती है. इस शुभ दिन पर मंदिरों में भगवान शनि की विशेष पूजा की जाती है. शनि जयंती पर शुभ मुहूर्त shani jayantee par shubh muhurt वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 26 मई को दोपहर 12:11 बजे शुरू होगी और 27 मई को सुबह 8:31 बजे समाप्त होगी. सिर्फ 7 मिनट रहेगा ये खास योग ज्येष्ठ अमावस्या यानि की Shani Jayanti शनि जयंती पर कई शुभ योग बन रहे हैं. सुकर्मा योग सुबह से रात 10:54 बजे तक रहेगा उसके बाद से धृति योग बनेगा तो वहीं सुबह 5:25 बजे से 5:32 बजे तक एक दुर्लभ सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा.ये योग सिर्फ 7 मिनट ही रहेगा.इस खास योग में पूजा से आप शनि को प्रसन्न कर सकते हैं इसके अलावा, शिववास योग भी सुबह 8:31 बजे तक रहेगा. मान्यता है कि इस शिववास योग के दौरान, भगवान शिव देवी पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर निवास करते है. पंचांग विवरण शनि जयंती पर करें ये खास उपाय (Shani Jayanti 2025 Upay) शनि जयंती के दिन Shani Jayanti शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न उपाय करना लाभकारी हो सकता है। इस दिन इन उपायों को करके कुंडली से साढ़े साती और ढैय्या के दुष्प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं। शनि जयंती के दिन शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करें। शनि जयंती पर पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ हो सकता है। शनि जयंती के दिन काले कपड़े, छाता, लोहे की चीजें, अन्न आदि का दान करें। इससे साढ़े साती के दुष्प्रभाव कम हो सकते हैं।   शनि जयंती के दिन शनि स्तोत्र , शनि मंत्र, शनि चालीसा का पाठ करें। इससे शनि की महादशा के दुष्प्रभाव काफी हद तक कम हो सकते हैं। काले कुत्ते को सरसों के तेल लगी हुई रोटी खिलाएं। ऐसा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं और शनि दोष से भी मुक्ति मिल सकती है। इस दिन कैसे प्राप्त करें शनि कृपा? How to get Shani’s blessings on this day ? इस दिन आप कर्मफलदाता शनि को प्रसन्न करने के लिए व्रत, पूजा पाठ के साथ-साथ दान अवश्य करें. वहीं जिन जातकों की कुंडली में शनि दोष या उन पर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही है वो शनि के उपाय जरूर करें. ऐसे जातक इस दिन दान करें, शमी और पीपल के पेड़ की पूजा करें, छाया दान करने, तिल और तेल से शनि देव का अभिषेक करें.वहीं अपाहिजों और बुजुर्गों की सेवा अवश्य करें. माना जाता है कि Shani Jayanti शनिदेव की पूजा करने से व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार जीवन में सफलता मिलती है और सभी प्रकार के दुख और बाधाएं दूर होती हैं. मान्यता है कि भगवान शिव की पूजा और भक्ति करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं.

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Masik Shivratri 2025 List:साल 2025 में कब-कब है मासिक शिवरात्रि,जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मंत्र

Masik Shivratri 2025 List: हिंदू धर्म में मासिक शिवरात्रि और महाशिवरात्रि दोनों का ही विशेष महत्व होता है। पंचांग के अनुसार, मासिक शिवरात्रि का व्रत हर माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रखा जाता है, जबकि मासिक शिवरात्रि का पर्व साल में एक बार में मनाया जाता है। मासिक शिवरात्रि के दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा की जाती है। इस दिन मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भक्त व्रत रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि का व्रत करने से भक्तों की सभी परेशानियां दूर होती हैं। ऐसे में अगर नए साल में आप भी Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि का व्रत रखने वाले हैं तो साल 2025 में मासिक शिवरात्रि (Masik Shivratri 2025 List) की सही डेट एवं पूरी लिस्ट नोट कर लें। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है. मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि व्रत करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं. शास्त्रों के अनुसार, देवी लक्ष्मी, सरस्वती, इंद्राणी, गायत्री, सावित्रि और माता पार्वती ने शिवरात्रि का व्रत किया था और शिव कृपा से अनंत फल प्राप्त किए थे. धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव का देवी पार्वती से विवाह चतुर्दशी की रात्रि में हुआ था. इसलिए मासिक शिवरात्रि पर रात्रि में पूजा करना बेहद शुभ माना जाता है. Masik Shivratri Puja Vidhi मासिक शिवरात्रि पूजा विधि शिव मंत्र Shiv Mantra बेहद खास होती है मासिक शिवरात्रि Monthly Shivratri is very special भविष्य पुराण के अनुसार, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मासिक शिवरात्रि पड़ने के कारण ये तिथि बेहद खास होती है. इस तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं. इस दिन भगवान शिव की पूजा के साथ- साथ शिव परिवार के सभी सदस्यों की उपासना की जाती है. सुख-शांति की कामना से शिव का पूजन किया जाता है और उनके निमित्त व्रत रखा जाता है. इस दिन शिवलिंग पर पुष्प चढ़ाने तथा शिव मंत्रों के जप का विशेष महत्व है. इस दिन पूरे विधि-विधान से शिवजी का पूजन और व्रत किया जाता है. Masik Shivratri मासिक शिवरात्रि व्रत के प्रभाव से व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ और मोह आदि के बंधन से मुक्त हो जाता है. मासिक शिवरात्रि व्रत के लाभ Masik Shivratri Vrat labh ऐसी मान्यता है कि शिव मंत्रों का जाप शिवालय या घर के पूर्व भाग में बैठकर करने से अधिक फल प्राप्त होता है. मासिक शिवरात्रि की पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिए. मासिक शिवरात्रि का व्रत जो भी भक्त पूरे श्रद्धाभाव से करता है, उसके माता-पिता के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. साथ ही स्वयं के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और उस व्यक्ति जीवन को जीवन के सारे सुख प्राप्त होते हैं. इस व्रत की महिमा से व्यक्ति दीर्घायु, ऐश्वर्य, आरोग्य और संतान आदि प्राप्त करता है. ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने वाले व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. 2025 की मासिक शिवरात्रि की पूरी लिस्ट (Masik Shivratri 2025 List) 27 जनवरी 2025, सोमवार मासिक शिवरात्रि (माघ)26 फरवरी 2025, बुधवार महा शिवरात्रि (फाल्गुन)27 मार्च 2025, बृहस्पतिवार मासिक शिवरात्रि (चैत्र)26 अप्रैल 2025, शनिवार मासिक शिवरात्रि (वैशाख)25 मई 2025, रविवार मासिक शिवरात्रि (ज्येष्ठ)23 जून 2025, सोमवार मासिक शिवरात्रि (आषाढ़)23 जुलाई 2025, बुधवार श्रावण शिवरात्रि (श्रावण)21 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार मासिक शिवरात्रि (भाद्रपद)19 सितंबर 2025, शुक्रवार मासिक शिवरात्रि (आश्विन)19 अक्तूबर 2025, रविवार मासिक शिवरात्रि (कार्तिक)18 नवंबर 2025, मंगलवार मासिक शिवरात्रि (मार्गशीर्ष)18 दिसंबर 2025, बृहस्पतिवार मासिक शिवरात्रि (पौष)

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 Somvati Amavasya 2025 Date:वट सावित्री पर बना सोमवती अमावस्या का दुर्लभ संयोग, जानिए तिथि और शुभ मुहूर्त

Somvati Amavasya:हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व होता है। इस दिन सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन के लिए रखती हैं। आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत की तिथि, शुभ योग और शुभ मुहूर्त… Somvati Amavasya 2025 me Kab hai:धार्मिक दृष्टि से ज्येष्ठ माह (Jyeshtha Month 2025) का विशेष महत्व माना गया है। इस माह में बड़ा मंगल और निर्जला एकादशी जैसे पर्व आते हैं। इसी तरह ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि भी बहुत ही खास है। इस तिथि को आध्यात्मिक शुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए काफी शुभ माना गया है। इसी के साथ अमावस्या तिथि पितरों की कृपा प्राप्ति के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है।  Vat Savitri Vrat 2025 Date: हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन रखा जाता है। ये व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन के लिए रखती हैं। Somvati Amavasya इस दिन वट (बरगद) के पेड़ की पूजा की जाती है और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने का खास महत्व होता है। लेकिन 2025 में वट सावित्री व्रत की तिथि को लेकर थोड़ा संशय बना हुआ है, क्योंकि इस साल अमावस्या दो दिन पर पड़ रही है। ऐसे में आइए जानते हैं इस साल कब रखा जाएगा वट सावित्री का व्रत। साथ ही, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त और शुभ योग। वट सावित्री व्रत की तिथि:date of vat savitri fast पंचांग के अनुसार, 2025 में ज्येष्ठ अमावस्या 26 मई को दोपहर 12:12 बजे से शुरू होकर 27 मई की सुबह खत्म हो रही है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस दिन दोपहर के समय Somvati Amavasya अमावस्या हो, उसी दिन व्रत करना शुभ माना जाता है। इसलिए, इस साल वट सावित्री का व्रत 26 मई 2025 दिन सोमवार को रखा जाएगा। Somvati Amavasya:कब है ज्येष्ठ अमावस्या ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि 26 मई को दोपहर 12 बजकर 11 मिनट से शुरू हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन 27 मई को सुबह 8 बजकर 31 मिनट पर होने जा रहा है। ऐसे में ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि सोमवार, 26 मई को मनाई जाएगी। सोमवार के दिन पड़ने के कारण इसे सोमवती अमावस्या भी कहा जाएगा, जो मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए खास मानी गई है।  इस कार्यों से मिलते हैं शुभ परिणाम These actions yield auspicious results अमावस्या के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करने के बाद गरीबों और जरूरतमंद लोगों को दान-पुण्य करना बेहद शुभ माना जाता है। अगर आपके लिए ऐसा करना संभव नहीं है, तो आप घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं। Somvati Amavasya इसके साथ ही पितरों के आशीर्वाद के लिए अमावस्या पर पिंड दान और श्राद्ध कर्म भी जरूर करना चाहिए। प्रसन्न होंगे पितृ Father will be happy सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ का पूजन करें और भी जरूर करें। पूजन के दौरान पीपल के पेड़ की सात बार परिक्रमा करनी चाहिए और पेड़ के नीचे सरसों के तेल में काले तिल डालकर दीपक जलाना चाहिए। इसी के साथ आपको सोमवती अमावस्या पर पितृ चालीसा (Somvati Amavasya 2025) का पाठ भी कर सकते हैं, जिससे पितरों का कृपा आपके ऊपर बनी रहे। करें इन चीजों का दान:Donate these things सोमवती अमावस्या (Somvati Amavasya Daan) के दिन दान का भी विशेष महत्व है। ऐसे में आप पितरों की कृपा प्राप्ति के लिए गरीबों व जरूरतमंद लोगों में अन्न, धन और वस्त्रों का दान कर सकते हैं। इसी के साथ इस दिन पर सफेद रंग की चीजें जैसे चावल, दही, मिश्री, खीर और सफेद कपड़ों का दान किया जा सकता है। इससे आपको महादेव की कृपा प्राप्ति हो सकती है। 

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Vat Savitri 2025 in UP:पहली बार रख रही हैं वट सावित्री व्रत ? तो यहां जानें पूजा विधि से लेकर संपूर्ण सामग्री

Vat Savitri 2025 in UP:इस साल 26 मई 2025 को वट सावित्री व्रत रखा जाएगा। आप पहली बार वट सावित्री व्रत रखने वाली हैं तो आपको वट सावित्री व्रत के पूजन सामग्री, पूजा मुहूर्त, कथा, पूजन की विधि आदि के बारे में सही से जानना चाहिए. इसके बारे में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय पुरी के ज्योतिषाचार्य डॉ. गणेश मिश्र से जानते हैं विस्तार से. Vat Savitri Vrat 2025: वट सावित्री हिंदू धर्म का प्रमुख त्योहार है, जिसे हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन मुख्य रूप से बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। Vat Savitri 2025 in UP इसके अलावा सुहागिनें पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और तरक्की के लिए निर्जला उपावस भी रखती है। मान्यता है कि इसी दिन देवी सावित्री ने अपनी कठोर तपस्या से पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले लिए थे। इसलिए इस तिथि पर उनकी पूजा और त्याग का स्मरण किया जाता है। यदि वट सावित्री के दिन सच्चे भाव से वट वृक्ष की उपासना की जाए, तो वैवाहिक जीवन सुखमय और रिश्तों में प्रेम बढ़ता है। भारत में हर साल इस व्रत को बड़े प्रेम और उल्लास के साथ मनाया जाता है। Vat Savitri 2025 in UP हालांकि इसकी खास रौनक उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में देखने को मिलती है। यहां सभी महिलाएं एकजुट होकर वट वृक्ष की पूजा करते हुए कथा सुनती हैं। Vat Savitri 2025 in UP इसे बड़मावस, बरगदाही और वट अमावस्या भी कहते हैं। इस साल 26 मई 2025 को वट सावित्री व्रत रखा जाएगा। ऐसे में आइए इस दिन की पूजा विधि और सामग्री के बारे में विस्तार से जानते हैं। Vat Savitri 2025 in UP Vrat ki Puja Samagri List वट सावित्री व्रत की पूजा सामग्री लिस्ट 1. रक्षा सूत्र, कच्चा सूत,2. बरगद का फल, बांस का बना पंखा,3. कुमकुम, सिंदूर, फल, फूल, रोली, चंदन4. अक्षत्, दीपक, गंध, इत्र, धूप5. सुहाग सामग्री, सवा मीटर कपड़ा, बताशा, पान, सुपारी6. सत्यवान, देवी सावित्री की मूर्ति7. वट सावित्री व्रत कथा और पूजा विधि की पुस्तक8. पानी से भरा कलश, नारियल, मिठाई, मखाना आदि9. घर पर बने पकवान, भींगा चना, मूंगफली, पूड़ी, गुड़,10. एक वट वृक्ष वट सावित्री व्रत की पूजा विधि Vat Savitri Vrat Ki Puja Vidhi वट सावित्री के दिन महिलाएं सुबह स्नान करें। फिर साफ लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनें। इस दौरान पूरा सोलह श्रृंगार अवश्य करें। अब वट वृक्ष के पास सावित्री और सत्यवान की तस्वीर को स्थापित कर दें। इसके बाद वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें। कुछ ताजा फूल चढ़ाएं। अक्षत, भीगा चना व गुड़ अर्पित करें। अब आप वट के वृक्ष पर सूत लपेटते हुए सात बार परिक्रमा करें। परिक्रमा पूरी करने के बाद वृक्ष का प्रणाम करें।  अब हाथ में चने लेकर वट सावित्री की कथा पढ़ें।  अंत में फल और वस्त्रों का दान करें और पूजा में हुई भूल की क्षमा मांगे। वट सावित्री व्रत कथा Vat Savitri Vrat Katha स्कंद पुराण में वट सावित्री व्रत की कथा के बारे में वर्णन मिलता है, Vat Savitri 2025 in UP जिसमें देवी सावित्री के पतिव्रता धर्म के बारे में बताया गया है. देवी सावित्री का विवाह सत्यवान से हुआ था, लेकिन वे अल्पायु थे. एक बार नारद जी ने इसके बारे में देवी सावित्री को बता दिया और उनकी मृत्यु का दिन भी बता दिया. सावित्री अपने पति के जीवन की रक्षा के लिए व्रत करने लगती हैं. वे अपने पति, सास और सुसर के साथ जंगल में रहती थीं. जिस दिन सत्यवान के प्राण निकलने वाले थे, उस दिन वे जंगल में लकड़ी काटने गए थे, तो उनके साथ सावित्री भी गईं. उस दिन सत्यवान के सिर में तेज दर्द होने लगा और वे वहीं पर बरगद के पेड़ के नीचे लेट गए. Vat Savitri 2025 in UP देव सावित्री ने पति के सिर को गोद में रख लिया. कुछ समय में यमराज वहां आए और सत्यवान के प्राण हरकर ले जाने लगे. उनके पीछे-पीछे सावित्री भी चल दीं. यमराज ने उनको समझाया कि सत्यवान अल्पायु थे, इस वजह से उनका समय आ गया था. Vat Savitri 2025 in UP तुम वापस घर चली जाओ. पृथ्वी पर लौट जाओ. लेकिन सावित्री नहीं मानीं. उनके पतिव्रता धर्म से खुश होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए, जिससे सत्यवान फिर से जीवित हो उठे. ज्येष्ठ अमावस्य तिथि को यह घटनाक्रम हुआ था और अपने पतिव्रता धर्म के लिए देवी सावित्री प्रसिद्ध हो गईं. उसके बाद से ज्येष्ठ अमावस्य को ज्येष्ठ देवी सावित्री की पूजा की जाने लगी. वट वृक्ष में त्रिदेव का वास होता है और सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही जीवनदान मिला था. इस वज​​ह से इस व्रत में वट वृक्ष, सत्यवान और देवी सावित्री की पूजा करते हैं.

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Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट सावित्री व्रत इन चीजों के बिना रह जाएगा अधूरा, अभी देख लें पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट

Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट सावित्री का व्रत सुहागिन महिलाओं के द्वारा रखा जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को रखने का विधान है। इस दिन महिलाएं व्रत रखकर सुखी दांपत्य जीवन और पारिवारिक सुख की कामना करती हैं। इस दिन वट वृक्ष की पूजा की जाती है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करके आपकी सभी कामनाएं पूरी हो सकती हैं। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे वट सावित्री व्रत की पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के बारे में।  वट सावित्री व्रत पूजा सामग्री Vat Savitri Vrat Pooja Material Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट सावित्री व्रत की पूजा विधि वट सावित्री के दिन सुबह जल्दी उठकर व्रतियों को स्नान-ध्यान करना चाहिए। इसके बाद वट वृक्ष के पास पहुंचकर सबसे पहले सत्यवान, सावित्री की तस्वीर या प्रतिमा वट वृक्ष की जड़ पर स्थापित करनी चाहिए। इसके बाद धूप, दीप जलाना चाहिए और उसके बाद फूल, अक्षत आदि आर्पित करना चाहिए। इस के उपरांत कच्चे सूत को लेकर कवट वृक्ष की 7 बार परिक्रमा करनी चाहिए। इसके बाद अपने हाथ में भीगा हुआ चना आपको लेना चाहिए और वट सावित्री व्रत की कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपको वस्त्र और भीगा हुआ चना अपनी सास को भेंट करना चाहिए, और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। इसके बाद वट वृक्ष का फल खाकर व्रत आपको तोड़ना चाहिए। Vat Savitri Vrat Puja Vidhi व्रत तोड़ने के बाद सामर्थ्य अनुसार आपको दान भी करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि वट सावित्री व्रत के बाद दान करने से जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं।  इस व्रत में क्यों होती है बरगद की पूजा Why is banyan tree worshiped during this fast?  Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:वट वृक्ष (बरगद) एक देव वृक्ष माना जाता है. ब्रह्मा, विष्णु, महेश और ,सावित्री भी वट वृक्ष में रहते हैं. प्रलय के अंत में श्री कृष्ण भी इसी वृक्ष के पत्ते पर प्रकट हुए थे. तुलसीदास ने वट वृक्ष को तीर्थराज का छत्र कहा है. ये वृक्ष न केवल अत्यंत पवित्र है बल्कि काफी ज्यादा दीर्घायु वाला भी है. लंबी आयु, शक्ति, धार्मिक महत्व को ध्यान में रखकर इस वृक्ष की पूजा होती है. पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इस वृक्ष को ज्यादा महत्व दिया गया है.  क्या करें विशेष? What to do special ? Vat Savitri Vrat Puja Vidhi:एक बरगद का पौधा जरूर लगवाएं. बरगद का पौधा लगाने से पारिवारिक और आर्थिक समस्या नहीं होगी. निर्धन सौभाग्यवती महिला को सुहाग की सामग्री का दान करें. बरगद की जड़ को पीले कपड़े में लपेटकर अपने पास रखें. वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा का महत्व Importance of worshiping banyan tree in Vat Savitri fast पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमराज ने माता सावित्री के पति के पाण वट वृक्ष के नीचे ही लौटाये थे। Vat Savitri Vrat Puja Vidhi इसके साथ ही यमराज ने सावित्री को 100 पुत्रों की प्राप्ति का वरदान भी दिया था। माना जाता है कि तब से ही वट सावित्री व्रत रखने की परंपरा शुरू हई और साथ ही वट वृक्षी की भी पूजा की जाने लगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी व्यक्ति वट सावित्री का व्रत रखता है और इस दिन वट वृक्ष की परिक्रमा करता है उसे यमराज की कृपा के साथ ही त्रिदेवों का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। Vat Savitri Vrat Puja Vidhi इस व्रत के प्रभाव से दांपत्य जीवन तो सुखी रहता ही है, साथ ही योग्य संतान की प्राप्ति भी होती है। इसलिए आज भी महिलाओं के द्वारा इस दिन व्रत रखा जाता है। Vat Savitri Vrat Katha Hindi: इस कथा के बिना अधूरा है वट सावित्री व्रत,वट वृक्ष का क्या है महत्व जान लीजिए ? Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट

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Vat Savitri Vrat Katha Hindi: इस कथा के बिना अधूरा है वट सावित्री व्रत,वट वृक्ष का क्या है महत्व जान लीजिए ?

Vat Savitri Vrat Katha in Hindi: वट सावित्री व्रत कथा में बरगद के पेड़ का विशेषतौर पर उल्लेख मिलता है। सुहागिनें वट सावित्री व्रत कथा वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ के नीचे सुनती हैं। इसके अलावा वट वृक्ष की पूजा भी की जाती है। आइए, जानते हैं वट सावित्री व्रत कथा में बरगद का महत्व क्या है। वट सावित्री पर सुहागिनें अपने पति की लम्बी आयु के लिए व्रत रखती हैं। वट सावित्री पर वट सावित्री के वृक्ष के साथ सत्यवान और सावित्री की पूजा भी की जाती है। साथ ही ही विधि-विधान के साथ पूजा करके वट सावित्री व्रत वट वृक्ष के नीचे कथा सुनी और सुनाई जाती है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि Vat Savitri Vrat Katha Hindi वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ का बहुत महत्व होता है। आइए, जानते हैं वट सावित्री व्रत कथा में वट वृक्ष का क्या महत्व होता है। Vat savitri vrat katha in hindi Vat Savitri Vrat Katha Hindi पुराणों में वर्णित सावित्री की कथा इस प्रकार है- राजा अश्वपति की अकेली संतान का नाम था सावित्री। सावित्री ने राजा द्युमत्सेन के बेटे सत्यवान को से विवाह किया। विवाह से पहले उन्हें नारद जी ने बताया कि सत्यवान के आयु कम है, तो भी सावित्री अपने फैसले से डिगी नहीं। वह सत्यवान के प्रेम में सभी राजसी वैभव त्याग कर  उनके परिवार की सेवा करते हुए वन में रहने लगीं। Vat Savitri Vrat Katha Hindi जिस दिन सत्यवान के महाप्रयाण का दिन था, उस दिन वह लकड़ियां काटने जंगल गए।  वहां मू्च्छिछत होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। तीन दिन से उपवास में रह रही सावित्री उस घड़ी को जानती थीं, अत: बिना परेशान हुए  यमराज से सत्यवान के प्राण वापस देने की प्रार्थना करती रही, लेकिन यमराज नहीं माने। तब सावित्री उनके पीछे-पीछे ही जाने लगीं। Vat Savitri Vrat Katha Hindi कई बार मना करने पर भी वह नहीं मानीं, तो सावित्री के साहस और त्याग से यमराज प्रसन्न हुए और कोई तीन वरदान मांगने को कहा। Vat Savitri Vrat Katha Hindi सावित्री ने सत्यवान के दृष्टिहीन  माता-पिता के नेत्रों की ज्योति मांगी, उनका छिना हुआ राज्य मांगा और अपने लिए 100 पुत्रों का वरदान मांगा। तथास्तु कहने के बाद यमराज समझ गए कि सावित्री के पति को साथ ले जाना अब संभव नहीं। इसलिए उन्होंने सावित्री को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़कर वहां से अंतर्धान हो गए। Vat Savitri Vrat Katha Hindi उस समय सावित्री अपने पति को लेकर वट वृक्ष के नीचे ही बैठी थीं।इसीलिए इस दिन महिलाएं अपने परिवार और जीवनसाथी की दीर्घायु की कामना करते हुए वट वृक्ष को भोग अर्पण करती हैं, उस पर धागा लपेट कर पूजा करती हैं।   Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट वट वृक्ष की पूजा करने से यमराज और त्रिदेवों की मिलती है कृपा (By worshiping banyan tree one gets blessings of Yamraj and Trinity.) वट सावित्री व्रत कथा बरगद के पेड़ के नीचे की जाती है। इसका कारण यह है मान्यतानुसार वट सावित्री के दिन बरगद के पेड़ पर यमराज निवास करते हैं। इससे विवाहित स्त्रियां अपने पति की लम्बी आयु के लिए यमराज से प्रार्थना करती है। साथ ही बरगद के पेड़ पर त्रिदेव भी निवास करते हैं। ऐसे में माना जाता है कि जिस व्यक्ति के सिर पर त्रिदेव का हाथ होता है, उसका मृत्यु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। बरगद पेड़ की छाल में भगवान विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और इसकी शाखाओं में भगवान शिव वास करते हैं। ​यमराज ने वटवृक्ष के नीचे लौटाए थे सत्यवान के प्राण (Yamraj had returned Satyavan’s life under the banyan tree) जब सावित्री के पति सत्यवान के प्राण यमराज ने हर लिए थे, तो सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण लौटाने के लिए प्रार्थना की थी। पौराणिक मान्यता है कि तब यमराज ने वट वृक्ष के नीचे ही सत्यवान के प्राण लौटाकर सत्यवती को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। यमराज ने बरगद की जड़ों में सत्यवान के प्राण को जकड़कर रखा हुआ था। यमराज के प्राण लौटाए जाने के बाद से सुहाग की दीर्घायु के लिए वट वृक्ष के नीचे प्रार्थना की जाती है। ​वट वृक्ष में कलावा बांधने से टल जाती है अकाल मृत्यु (​Untimely death is averted by tying Kalawa to the banyan tree) वट सावित्री व्रत कथा के बाद वट वृक्ष में 7 बार कलावा लपेटकर बांधा जाता है। वट वृक्ष की 7 परिक्रमा करने को पति-पत्नी के सात जन्मों के सम्बधों से जोड़कर देखा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि बरगद के पेड़ में कलावा बांधने से अकाल मृत्यु भी टल जाती है। ​वट वृक्ष की पूजा करने से शनि की पीड़ा से मिलती है मुक्ति (By worshiping banyan tree one gets relief from the pain of Saturn) वट सावित्री के दिन शनि जयंती भी है। Vat Savitri Vrat Katha Hindi ऐसे में वट सावित्री का महत्व और भी बढ़ जाता है। वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार शनि की साढ़े साती की वजह से ही सत्यवान के प्राण शनिदेव के भाई यमराज ले गए थे, इसलिए वट सावित्री के दिन वट वृक्ष की पूजा करने से शनिदेव की वक्री दृष्टि से भी मुक्ति मिलती है। शनिदेव की कृपा पाने के लिए भी वट सावित्री पर बरगद की पूजा की जाती है। ​बरगद का पेड़ औषधीय गुणों से भरपूर होता है(Banyan tree is full of medicinal properties) Vat Savitri Vrat Katha Hindi बरगद के पेड़ का धार्मिक महत्व ही नहीं बल्कि बरगद का पेड़ औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसके पत्तों से निकलने वाले दूध को चोट, मोच या सूजन पर दिन में दो से तीन बार लगाकर मालिश करने से चोट पूरी तरह से ठीक हो जाती है। आयुर्वेद में भी बरगद के पेड़ के औषधीय गुण बताए गए हैं।

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Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट

Vat Savitri Vrat 2025 Date:ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अमावस्या पर वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat 2025) किया जाता है। इस पर्व के आने का सुहागिन महिलाएं बेसब्री से इंतजार करती हैं। Vat Savitri Vrat 2025 Date:यह त्योहार वट यानी बरगद के पेड़ से जुड़ा है। इस दिन सुहागिन महिलाओं को भूलकर भी काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए। साथ ही व्रत के नियम का पालन करना चाहिए। Vat Savitri 2025 date : हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है. ऐसी मान्यता है कि यह व्रत करने से पति की आयु लंबी होती है और जीवन में सुख-समृद्धि (sukh samridhi) बनी रहती है. इस साल वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि यानी 26 मई दिन सोमवार को रखा जाएगा. ऐसे में आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत (vat savitri vrat kab hai ) का मुहूर्त और पूजा (vat savitri puja vidhi) विधि.  Vat Savitri vrat 2025 : वट सावित्री का व्रत कैसे रखें जानिए यहां पर विधि और मुहूर्त कब है वट सावित्री – when is Vat Savitri Vat Savitri Vrat 2025 Date:इस साल आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत का मुहूर्त और पूजा विधि.  ज्येष्ठ माह के अमावस्या तिथि यानी 26 मई 2025 को दोपहर 12 बजकर 11 मिनट पर शुरु होगी, जो मई 27 को रात 8 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. उदयातिथि के अनुसार, वट सावित्री का व्रत 26 मई दिन सोमवार को रखा जाएगा. पंचांग (panchag) सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 27 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 07 बजकर 11 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 03 मिनट से 04 बजकर 44 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 36 मिनट से 03 बजकर 31 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 07 बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 36 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर से 58 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त- 11 बजकर 52 मिनट से लेकर 12 बजकर 48 मिनट तक वट सावित्री व्रत कैसे रखें – How to keep Vat Savitri fast इस दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और फिर सूर्य को अर्घ्य दीजिए. इसके बाद व्रती महिलाएं श्रृंगार करके वट वृक्ष के नीचे साफ-सफाई करके और पूजा की शुरूआत करें. अब आप धूप, अगरबत्ती जलाएं और वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें और Vat Savitri Vrat 2025 Date वट सावित्री व्रत का पाठ करिए. इसके बाद भोग लगाइए, अंत में गरीब लोगों में अन्न और धन का दान करिए, इससे शुभ फल की प्राप्ति होती है. वट सावित्री व्रत के दौरान किसी से वाद-विवाद न करिए और किसी के बारे में गलत न सोचिए और न ही अपमान करिए.  वट सावित्री व्रत के लिए (Vat Savitri Vrat samagri List) आप देसी घी, भीगा हुआ काला चना, मौसमी फल, अक्षत, धूपबत्ती, वट वृक्ष की डाल, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, सिंदूर, हल्दी और मिठाई शामिल करिए.   वट सावित्री व्रत सामग्री लिस्ट (Vat Savitri Vrat Samagri List) Vat Savitri Vrat 2025 Date:देसी घी, भीगा हुआ काला चना, मौसमी फल, अक्षत, धूपबत्ती, वट वृक्ष की डाल, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, पान, सिंदूर, हल्दी और मिठाई आदि। वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Vat Savitri Vrat Puja Vidhi) Vat Savitri Vrat 2025 Date:इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। Vat Savitri Vrat 2025 Date इसके बाद शृंगार करें। अब वट वृक्ष के पेड़ की सफाई कर पूजा की शुरुआत करें। धूप, अगरबत्ती आदि जलाएं। वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा लगाएं। Vat Savitri Vrat 2025 Date व्रत कथा का पाठ करें। आरती कर भोग लगाएं। आखिरी में मंदिर या गरीब लोगों में अन्न और धन समेत आदि चीजों का दान करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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