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First Monday in sawan: सावन का पहला सोमवार, कुछ खास लेकर आया

First Monday in sawan: यदि आप भी भगवान शिव की कृपा पाना चाहते हैं तो सावन सोमवार का व्रत जरूर रखें। मान्यता है कि भोलेनाथ की भक्ति से जीवन का हर कष्ट दूर होता है और सुख-समृद्धि मिलती है। Sawan ka pahela Somwar: हिंदू धर्म में सावन माह को बेहद पवित्र और शुभ माना जाता है। यह महीना खासतौर पर भगवान शिव की भक्ति के लिए समर्पित होता है। ऐसी मान्यता है कि सावन में भोलेनाथ की पूजा करने से जातकों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है। खासकर सावन के सोमवार का विशेष महत्व है। इस दिन शिव भक्त व्रत रखते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। इस साल सावन मास में भक्तों को पूरे 30 दिनों तक शिव भक्ति करने का अवसर मिलेगा। ऐसे में आइए जानते हैं इस बार सावन कब से शुरू हो रहा है, पहला सावन सोमवार कब है और श्रावणी सोमवार की सभी तिथियां। कब से शुरू हो रहा है सावन 2025? When is Saavan 2025 starting? First Monday in sawan इस साल 2025 में सावन मास की शुरुआत 11 जुलाई 2025, शुक्रवार से हो रही है। द्रिक पंचांग के अनुसार यह महीना विशेष रूप से शुभ रहेगा क्योंकि इस बार सावन के दौरान किसी भी तिथि का क्षय (लोप) नहीं हो रहा है। इसका मतलब है कि भक्तों को पूरे 30 दिनों तक भगवान शिव की पूजा और उपासना का अवसर मिलेगा। सावन के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाना, रुद्राभिषेक करना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना और सोमवार के दिन व्रत रखना विशेष फलदायी माना जाता है। First Monday in sawan start date 2025: सावन का पहला सोमवार कब है? First Monday in sawan सावन के पहले सोमवार को प्रथम श्रावणी सोमवार कहा जाता है। हिंदू धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है। शिव भक्त इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करते हैं। 2025 में सावन का पहला सोमवार 14 जुलाई 2025 को पड़ेगा। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से की गई पूजा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होती है और भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। सावन सोमवार 2025 की तिथियां:Sawan Monday 2025 dates कब शुरू होगी कांवड़ यात्रा 2025?: When will Kanwar Yatra 2025 start? First Monday in sawan सावन महीने में शिव भक्तों द्वारा की जाने वाली कांवड़ यात्रा का भी खास महत्व है। इस यात्रा में भक्त पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा नदी से जल भरकर पैदल यात्रा करते हैं और उसे अपने नजदीकी या प्रसिद्ध शिव मंदिरों में अर्पित करते हैं। First Monday in sawan इस साल कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी 11 जुलाई 2025 से ही हो रही है। सोलह सोमवार 16 somwar प्रमुखतया कुछ भक्त सावन के सोमवार व्रतों को सावन के बाद तक भी जारी रखते हैं, एसे भक्त सावन के प्रथम सोमवार से प्रारंभ करते हुए लगातार सोलह(१६) और सोमवारों को यह व्रत जारी रखते हैं। इस प्रक्रिया को सोलह सोमवार उपवास के नाम से जाना जाने लगा। सावन सोमवार का महत्व: Importance of Sawan Monday First Monday in sawan सावन सोमवार भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है। सावन के महीने में भक्त हर सोमवार का व्रत रखते हैं और सावन का महीना सबसे शुभ महीना माना जाता है। भगवान शिव को सोमनाथ या सोमेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। सोमवार शब्द चंद्रमा से जुड़ा है और सोम का अर्थ चंद्र होता है। भगवान शिव की कई महिला भक्त सोलह सोमवार की शुरुआत पहले सवाम सोमवार से करती हैं और वे इसे 16 सोमवार पूरे होने तक जारी रखती हैं। First Monday in sawan पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रावण मास के दौरान भगवान शिव अपने ससुराल जाते हैं और देवी पार्वती के साथ वहीं रहते हैं। एक बार भगवान शिव ने प्रजापति दक्ष को वचन दिया कि वे श्रावण मास में उनके यहाँ आयेंगे और पूरे मास वहीं रहेंगे। इसीलिए श्रावण मास के दौरान बड़ी संख्या में भक्त दक्षेश्वर महादेव मंदिर आते हैं और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। First Monday in sawan सावन का महीना उन भक्तों के लिए शुभ माना जाता है जो अविवाहित हैं। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त श्रावण मास के दौरान पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ भगवान शिव की पूजा करते हैं, उन्हें मनचाहा जीवनसाथी मिलता है या मनचाही इच्छा पूरी होती है। भगवान शिव को भोलेनाथ के नाम से जाना जाता है और भोलेनाथ हमेशा भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। सावन सोमवार पूजा अनुष्ठान: Sawan Monday Puja Ritual 1. सावन सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।2. घर में भगवान शिव का स्मरण करके घी का दीया जलाएं।3. मंदिर जाएं और भगवान शिव की पूजा करें। जलाभिषेक करें और पंचामृत से अभिषेक करें और फिर से जलाभिषेक करें।4. बेल पत्र, भांग, धतूरा, लाल या सफेद फूलों की माला, कोई फल और मिठाई चढ़ाएं। 5. महामृत्युंजय मंत्र या पंचाक्षर मंत्र का जाप करें और फिर घी का दीया जलाएं और आरती करें।6. जो लोग सात्विक भाव एवं नियमों से भगवान की पूजा, स्तुति करते हैं उन्हें मनवांछित फल प्राप्त होता है। इन व्रतों में सफेद वस्त्र धारण करके सफेद चंदन का तिलक लगाना ही पूजनीय है तथा सफेद वस्त्र के दान की ही सबसे बड़ी महिमा है।7. अपने इच्छित संकल्प के अनुसार व्रत करके अपना संकल्प उद्यापन करना चाहिए। सावन सोमवार मंत्र: Sawan Monday Mantra ओम नम: शिवाय,’ के अतिरिक्त चन्द्र बीज मंत्र ‘ओम श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रयसे नम:’ और चन्द्र मूल मंत्र ‘ओम चं चन्द्रमसे नम:’ आदि मंत्र सावन सोमवार के दिन उच्चारण करें। मान्यता है कि सावन के सोमवार का व्रत और पूजा करने से जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।

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Kokila Vrat 2025 date : कोकिला व्रत 2025, जाने कोकिला व्रत की कथा और इसकी पूजा विधि

Kokila Vrat 2025 date: व्रत और त्यौहार की श्रेणी में प्रत्येक दिन और समय किसी न किसी तिथि नक्षत्र योग इत्यादि के कारण अपनी महत्ता रखता है. इसी के मध्य में आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन कोकिला व्रत भी मनाया जाता है. अषाढ़ मास में आने वाले अंतिम दिन के समय पूर्णिमा तिथि पर कोकिला व्रत के साथ ही आषाढ़ मास की समाप्ति भी होती है. Kokila Vrat 2025 date: 10 जुलाई 2025 गुरुवार के दिन रखा जाएगा कोकिला व्रत  कोकिला व्रत उन व्रतों कि श्रेणी में स्थान पाता जिसमें प्रकृति प्रेम को मुख्य आधार के रुप में मनाया जाता है. इस व्रत का प्रभाव से जीवन ओर सृष्टि के संबंध और हमारे जीवन की शुभता नेचर के साथ जुड़ कर अधिक बढ़ जाती है. आषाढ़ माह होता ही प्रकृति के भीतर नए बदलावों को दिखाने वाला माह. धर्म ग्रंथों के अनुसार आषाढ़ माह की पूर्णिमा को Kokila Vrat 2025 date कोकिला व्रत करने की परंपरा रही है.  कोकिला व्रत Kokila Vrat 2025 date आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि कोकिला व्रत उन वर्षों में किया जाना चाहिए, जब आषाढ़ अधिक मास होता है। दूसरे शब्दों में, कोकिला व्रत तभी रखा जाना चाहिए, जब आषाढ़ मास दो माह के लिए आता है।  इस मान्यता के अनुसार जब भी आषाढ़ का दोमास होता है, तो कोकिला व्रत सामान्य मास के दौरान करना चाहिए, न कि अधिक मास के दौरान। इस मान्यता का विशेष रूप से उत्तर भारतीय राज्यों में समर्थन किया जाता है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में, विशेष रूप से भारत के दक्षिणी और पश्चिमी भागों में आषाढ़ पूर्णिमा को कोकिला व्रत प्रति वर्ष किया जाता है। Kokila Vrat 2025 date:परंपराओं से जुड़ा कोकिला व्रत कोकिला व्रत Kokila Vrat 2025 date एक लोक जीवन से जुड़ा और सांस्कृतिक महत्व से संबंध रखने वाला व्रत है. इस व्रत को विशेष रुप से ग्रामीण जीवन में जुड़ी लोक कथाओं के साथ पौराणिक महत्व के साथ जुड़ कर आगे बढ़ता है. प्रत्येक जातियां प्रकृति के अमूल्य गुणों को पहचानते हुए उनके साथ अपने जीवन का तालमेल बिठाते हुए कई प्रकार के धार्मिक व आध्यात्मिक कृत्य करते हैं. इसी में जब भारतीय परंपराओं की बात आती है तो यहां भी ऎसे व्रत और पर्व हैं जो पशु पक्षिओं और पेड़ पौधों के साथ मनुष्य प्रेम को दर्शाते हैं. कोकिला व्रत मुख्य रुप से स्त्रियां रखती हैं. इस व्रत का मूल प्रयोजन सौभाग्य में वृद्धि पाने ओर दांपत्य जीवन के सुख को पाने के लिए किया जाता है. विवाहित स्त्रियां और कुवांरियाँ कन्याएं भी इस व्रत को करती हैं. Kokila Vrat 2025 date कोकिला व्रत करने से योग्य पति की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है. विवाह जल्द होने का आशीर्वाद मिलता है. इस व्रत को भी अन्य सभी प्रकार के व्रतों की ही भांति नियमों द्वारा रखा जाता है. कोकिला व्रत पूजा नियम-विधान Kokila Vrat 2025 date कोकिला व्रत में नियम पूर्वक विधि विधान से किया गया पूजन बहुत ही शुभ फल देने वाला होता है. जो भी इस व्रत का पालन नियम अनुसार और श्राद्ध भाव के साथ करते हैं, उन्हें इसका संपूर्ण फल प्राप्त होता है. कोकिला व्रत को पूर्णिमा के दिन किया जाता है पर इसका आरंभ एक दिन पहले से ही आरंभ कर दिया जाता है. हिन्दू धर्म में कोकिला व्रत का विशेष महत्व है यह व्रत दांपत्यु सुख और अविवाहितों के लिए विवाह जल्द होने का वरदान देता है. कोकिला व्रत को विशेष कर कुमारी कन्या सुयोग्य पति की कामना के लिए करती है जैसे तीज का व्रत भी जीवन साथी की लम्बी आयु का वरदान देता है उसी प्रकार कोकिला व्रत एक योग्य जीवन साथी की प्राप्ति का आशीर्वाद देता है. Kokila Vrat 2025 date इस व्रत को विधि विधान से करने पर व्यक्ति को मनोवांछित कामनाओं की प्राप्ति होती है. इस दिन निराहार रहकर व्रत का संकल्प करना चाहिए. प्रात:काल समय पूजा के उपरांत सारा दिन व्रत का पालन करते हुए भगवान के मंत्रों का जाप करना चाहिए. संध्या समय सूर्यास्त के पश्चात एक बार फिर से भगवान की आरती पूजा करनी चाहिए. Kokila Vrat 2025 date व्रत के दिन कथा को पढ़ना और सुनना चाहिए. शाम की पूजा पश्चात फलाहार करना चाहिए. Kokila Vrat Vrat Katha: कोकिला व्रत कथा कोकिला व्रत की कथा का संबंध भगवान शिव और देवी सती से बताया गया है. इस कथा अनुसार माता सती भगवान को पाने के लिए एक लम्बे समय तक कठोर तपस्या को करके उन्हें फिर से जीवन में पाती हैं. कोकिला व्रत Kokila Vrat 2025 date कथा शिव पुराण में भी वर्णित बतायी जाती है. इस कथा के अनुसार देवी सती ने भगवान को अपने जीवन साथी के रुप में पाया. इस व्रत का प्रारम्भ माता पार्वती के पूर्व जन्म के सती रुप से है. देवी सती का जन्म राजा दक्ष की बेटी के रुप में होता है. राजा दक्ष को भगवान शिव से बहुत नफरत करते थे. परंतु देवी सती अपने पिता के अनुमति के बिना भगवान शिव से विवाह करती हैं. दक्ष सती को अपने मन से निकाल देते हैं ओर उसे अपने सभी अधिकारों से वंचित कर देते हैं. राजा दक्ष अपनी पुत्री सती से इतने क्रोधित होते हैं कि उन्हें अपने घर से सदैव के लिए निकाल देते हैं. राजा दक्ष एक बार यज्ञ का आयोजन करते हैं. इस यज्ञ में वह सभी लोगों को आमंत्रित करते हैं ब्रह्मा, विष्णु, व सभी देवी देवताओं को आमंत्रण मिलता है किंतु भगवान शिव को नहीं बुलाया जाता है. ऎसे में जब सती को इस बात का पता चलता है कि उनके पिता दक्ष ने सभी को बुलाया लेकिन अपनी पुत्री को नही. तब सती से यह बात सहन न हो पाई. सती ने शिव से आज्ञा मांगी की वे भी अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहतीं है. शिव ने सती से कहा कि बिना बुलाए जाना उचित नहीं होगा, फिर चाहें वह उनके पिता का घर ही क्यों न हो. सती शिव की बात से सहमत नहीं होती हैं और जिद्द करके अपने पिता के यज्ञ में चली जाती हैं. वह शिव से हठ करके दक्ष के यज्ञ पर जाकर पाती हैं, कि उनके पिता उन्हें

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Raksha Bandhan 2025 Full Information: रक्षाबंधन कब है? जान लें राखी बांधने के शुभ मुहूर्त से लेकर भद्रा काल तक सबकुछ

रक्षाबंधन या राखी Raksha Bandhan 2025 एक हिंदू त्यौहार है जो भाई-बहन के बीच के रिश्ते का जश्न मनाता है। इस साल राखी 09 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी  हालाँकि  कुछ राज्यों में इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है, लेकिन इसे पूरे देश में भाई-बहन के बीच के बंधन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। Raksha Bandhan 2025: रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का प्रतीक है जो हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व हर साल सावन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है, जिसमें बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी आयु और खुशहाली की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहनों को रक्षा का वचन देते हैं और उपहार भेंट करते हैं। अक्सर लोगों को राखी बांधने के शुभ मुहूर्त को लेकर कई सवाल होते हैं। शास्त्रों के अनुसार भद्रा काल में राखी बांधने को अशुभ माना गया है। ऐसे में राखी बांधने का शुभ मुहूर्त जानना बहुत जरूरी होता है। इसलिए साल 2025 में रक्षाबंधन कब मनाया जाएगा, राखी बांधने का शुभ मुहूर्त क्या है, और इस पर्व से जुड़ी अन्य खास सवालों के बारे में विस्तार से जानते हैं। राखी बांधने का शुभ मुहूर्त अब आइए जानते हैं कि राखी बांधने का शुभ मुहूर्त क्या है? रक्षाबंधन के दिन यानी 9 अगस्त 2025 दिन शनिवार को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 47 मिनट से शुरू होकर दोपहर 1 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। भद्रा काल का प्रभाव हिंदू मान्यताओं में भद्रा काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है, और राखी बांधना भी इस दौरान अशुभ होता है। अच्छी बात यह है कि 2025 में रक्षाबंधन पर भद्रा का साया ना के बराबर रहेगा। भद्रा काल 9 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगा, जिसका मतलब है कि बहनें बिना किसी चिंता के पूरे दिन राखी बांध सकती हैं। कई लोगों के मन में भद्रा काल को लेकर कई सवाल रहते हैं, इसलिए आइए भद्रा काल के समय के बारे में जानते हैं। रक्षाबंधन 2025 के दौरान भद्रा काल पूर्णिमा तिथि के साथ शुरू होगा, यानी 08 अगस्त 2025 को दोपहर 02:12 बजे से। यह समय रक्षाबंधन से एक दिन पहले है। भद्रा काल की समाप्ति 08 अगस्त 2025 को मध्य रात्रि 01:52 बजे होगी। इसका मतलब है कि रक्षाबंधन के दिन भद्रा सूर्योदय से पहले खत्म हो जाएगा, और पूरा दिन दोपहर 1 बजकर 24 मिनट तक बहनें बिना चिंता के राखी बांध सकती हैं। शुभ योग और उनका महत्व इस साल रक्षाबंधन पर कई शुभ योग बन रहे हैं, जो इस पर्व को और भी खास बनाते हैं। सौभाग्य योग, शोभन योग, और सर्वार्थ सिद्धि योग इस दिन मौजूद होंगे। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन योगों में किए गए कार्य शुभ फलदायी होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि लाते हैं। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 22 मिनट से 5 बजकर 04 मिनट तक और अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 17 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक रहेगा। रक्षा बंधन का महत्व राखी एक प्राचीन हिंदू त्यौहार है। 2025 में रक्षा बंधन पर उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में सार्वजनिक अवकाश रहेगा। जैसा कि पहले खंड में बताया गया है, राखी का त्यौहार भाई-बहन के बीच के बंधन का जश्न मनाता है। यह त्यौहार देश की कई संस्कृतियों में बहुत प्रसिद्ध है क्योंकि भाई-बहनों के बीच कर्तव्य और प्रेम की अवधारणा सार्वभौमिक है। त्यौहार के दिन सुबह भाई-बहन अपने परिवार के साथ इकट्ठे होते हैं। बहनें सुरक्षा के प्रतीक के रूप में राखी (धागे) बांधती हैं। राखी का उपयोग पड़ोसियों और दोस्तों के बीच अन्य रिश्तों को मनाने के लिए भी किया जाता है। राखी बांधने की विधि रक्षाबंधन के दिन बहनें स्नान कर एक थाली में राखी, रोली, चावल, मिठाई और दीया सजाती हैं। भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर, उनकी आरती उतारती हैं और राखी बांधती हैं। इस दौरान बहनों को ये मंत्र पढ़ना चाहिए। ये मंत्र पढ़ने से भाई-बहन दोनों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है, और सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं। “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”  रक्षाबंधन की पूजा विधि  भारत रक्षा बंधन मनाता है, जो एक शुभ अवसर है, जिसमें ” पूजा विधि ” नामक एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान शामिल है। पूजा विधि शुरू होने से पहले एक दीया (तेल की बत्ती), रोली (सिंदूर पाउडर), चावल, मिठाई और राखी से भरी एक छोटी पूजा थाली तैयार की जाती है। बहनें अपने भाइयों के सामने एक गोलाकार तरीके से दीपक लहराते हुए और उनके माथे पर रोली लगाते हुए आरती करती हैं। उसके बाद, वे भाई की कलाई पर राखी बांधते हुए उसके स्वास्थ्य और सफलता के लिए प्रार्थना करती हैं। बदले में, भाई अपनी बहनों को अपने स्नेह के संकेत के रूप में उपहार देते हैं और उन्हें सभी नुकसानों से बचाने का संकल्प लेते हैं। पूजा विधि एक आध्यात्मिक वातावरण को बढ़ावा देती है जो भाई-बहन के बंधन को गहरा करती है और प्यार और सुरक्षा के लिए समर्पित छुट्टी के रूप में रक्षा बंधन 2025 के महत्व पर जोर देती है।  Raksha Bandhan 2025 Date: रक्षाबंधन कब है? जानें डेट व राखी बांधने का शुभ मुहूर्त रक्षाबंधन के पीछे की कहानी  रक्षा बंधन, जिसे राखी या रकरी के नाम से भी जाना जाता है, भाइयों और बहनों के बीच प्यार और जिम्मेदारी के बंधन का सम्मान करने के लिए दुनिया भर में हिंदुओं द्वारा मनाया जाने वाला एक खुशी का त्योहार है। हालाँकि, इस छुट्टी का महत्व जैविक संबंधों से परे है, क्योंकि यह सभी लिंगों, धर्मों और जातीय पृष्ठभूमि के लोगों को प्लेटोनिक प्रेम के विभिन्न रूपों का जश्न मनाने के लिए एक साथ लाता है।  ‘ रक्षा बंधन ‘ शब्द का संस्कृत में अर्थ है ‘सुरक्षा की गाँठ’। हालाँकि इस त्यौहार से जुड़ी रस्में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उन सभी में एक धागा बांधना शामिल है। बहन या बहन जैसी आकृति अपने भाई की कलाई के चारों ओर एक रंगीन और कभी-कभी विस्तृत धागा बांधती है, जो उसकी सुरक्षा के लिए उसकी प्रार्थना और शुभकामनाओं का प्रतीक है। बदले में, भाई अपनी बहन को एक सार्थक उपहार देता है।  रक्षा बंधन की उत्पत्ति का पता प्राचीन काल से लगाया जा सकता है।

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Yogini Ekadashi 2025:योगिनी एकादशी: जीवन के सारे पाप होंगे नष्ट, बस करें यह काम !

Yogini Ekadashi Vrat Niyam:योगिनी एकादशी पर भक्त उपवास रखकर विष्णु भगवान की आराधना करेंगे। योगिनी एकादशी पर कुछ कामों को करना अशुभ माना जाता है, जो प्रभु की नाराजगी का कारण भी बन सकता है। Yogini Ekadashi:हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. यह दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए विशेष माना गया है. आप योगिनी एकादशी पर एक आसान उपाय अपनाकर जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति पा सकते हैं. Yogini Ekadashi 2025 mein Kab Hai:हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. यह दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए विशेष माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत रखने से कई बीमारियों से राहत मिलती है और जाने-अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिलती है. धर्म शास्त्रों में योगिनी एकादशी को रोगों को दूर करने वाली सबसे शुभ तिथि बताया गया है. आप योगिनी एकादशी पर एक आसान उपाय अपनाकर जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति पा सकते हैं. Yogini Ekadashi 2025 Kab Hai:योगिनी एकादशी 2025 कब है? साल 2025 में योगिनी एकादशी का व्रत 21 जून, दिन शनिवार को रखा जाएगा. आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 21 जून की सुबह 7:18 बजे से शुरू होगी. वहीं, इस तिथि का समापन 22 जून की सुबह 4:27 बजे होगा. ऐसे में उदया तिथि के आधार पर 21 जून को ही योगिनी एकादशी का व्रत रखना सर्वश्रेष्ठ रहेगा. योगिनी एकादशी पर सभी पापों से मुक्ति पाने का उपाय:Remedy to get freedom from all sins on Yogini Ekadashi योगिनी एकादशी के शुभ अवसर पर भगवान विष्णु के साथ ही तुलसी माता की पूजा का भी अत्यंत महत्व माना गया है. योगिनी एकादशी के दिन की सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें. फिर भगवान विष्णु और तुलसी माता की विधिवत पूजा करें. इसके बाद तुलसी को जल अर्पित करें और तुलसी के पास घी का दीपक जलाएं. आप चाहें तो अगरबत्ती भी जला सकते हैं. अब “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें. इसके अलावा, तुलसी माता की सात बार परिक्रमा करें. अगर आप योगिनी एकादशी पर यह उपाय आजमाते हैं, तो भगवान विष्णु प्रसन्न होंगे और आपके जाने-अनजाने में किए गए पापों से आपको मुक्ति प्रदान करेंगे. इस दिन विष्णु भगवान को अर्पित करने वाले भोग में तुलसी के पत्ते जरूर रखें. धार्मिक मान्यता है कि तुलसी के बिना भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते हैं. अगर आप चाहें तो योगिनी एकादशी पर तुलसी की माला का से तुलसी माता के मंत्र जाप कर सकते हैं. वहीं, अगर आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है, तो एकादशी के दिन पौधा लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है. What not to do on Yogini Ekadashi:योगिनी एकादशी पर क्या न करें? डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Raksha Bandhan 2025 Date: रक्षाबंधन कब है? जानें डेट व राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

Raksha Bandhan 2025 Date: रक्षाबंधन भाई बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है. यह सनातन धर्म का बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है. इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाधकर उसकी लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करती है- इस दिन बहनें अुपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र या राखी बांधती हैं और बदले में भाई बहन को उम्रभर रक्षा का वचन देते हैं। रक्षाबंधन के दिन भद्राकाल में राखी बांधने की मनाही होती है लेकिन इस साल भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी। Raksha Bandhan Kab Hai: हिंदू धर्म में हर साल रक्षाबंधन या राखी का त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह व प्यार का प्रतीक है। इस दिन बहनें अुपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र या राखी बांधती हैं और बदले में भाई बहन को उम्रभर रक्षा का वचन देते हैं। रक्षाबंधन के दिन भद्राकाल में राखी बांधने की मनाही होती है लेकिन इस साल भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी। जानें रक्षाबंधन 2025 कब है और राखी बांधने का मुहूर्त- हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है. रक्षाबंधन प्राचीन हिंदू त्योहार है.यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक है. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसकी लंबी उम्र और उज्जवल भविष्य की कामना करती है. Raksha Bandhan 2025 Date इसके अलावा वह भाई से पूरे जीवन उनकी रक्षा करने का वचन मांगती हैं और भाई भी अपनी बहन की पूरा जीवन सुख-दुख में साथ देने का वादा करते हैं. साथ ही इस दिन भाई अपनी बहन को वचन के साथ-साथ कोई वस्तु या फिर पैसा उपहार स्वरूप भेंट करते हैं. किस समय बांधे राखी- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने का सबसे शुभ समय अपराह्न काल होता है, जिसे दोपहर का समय माना गया है। अगर कोई अपराह्न काल के दौरान राखी बांधने में असमर्थ है, तो वे प्रदोष काल के दौरान भी बांध सकते हैं। लेकिन भद्रा समय के दौरान राखी बांधने से बचना चाहिए। Raksha bandhan 2025 date time tithi shubh muhurt and vidhi know in hindi Raksha Bandhan 2025 Date:रक्षाबंधन कब है? वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 8 अगस्त को देर रात 2 बजकर 12 मिनट पर होगी. वहीं तिथि का समापन अगले दिन 9 अगस्त को रात 1 बजकर 24 मिनट होगी. उदया तिथि के अनुसार, रक्षाबंधन का त्योहार 9 अगस्त को मनाया जाएगा. भाई को रक्षा सूत्र बांधने का शुभ मुहूर्त पंचांग के हिसाब से रक्षाबंधन के दिन भाई को Raksha Bandhan 2025 Date रक्षा सूत्र बांधने का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 47 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 24 मिनट तक रहेगा. जिसकी कुल समय अवधि 7 घंटे 37 मिनट की हैं. राखी बांधने का शुभ मुहूर्त- वैदिक पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 08 अगस्त 2025 को दोपहर 02 बजकर 12 मिनट पर प्रारंभ होगी और 09 अगस्त 2025 को दोपहर 01 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगी। राखी बांधने का शुभ मुहूर्त सुबह 05 बजकर 47 मिनट से दोपहर 01 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। राखी बांधने की शुभ अवधि 07 घंटे 37 मिनट की है। राखी बांधने की विधि- सबसे पहले एक थाली लें और उसमें रोली, अक्षत, राखी,मिठाई व दीपक आदि रखें। अब दीपक जलाएं और भाई की आरती उतारें। भाई का तिलक करें और कलाई पर राखी बांधे बांधें। अंत में मिठाई खिलाएं। Raksha Bandhan 2025 Date भाई राखी बंधवाने के बाद बहनों व घर के अन्य बड़े सदस्यों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। Disclaimer:इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा, जानें कथा पाठ का लाभ

Devshayani ekadashi Vrat Katha In Hindi : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी का उपवास किया जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से और कथा सुनने व पढ़ने मात्र से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। आइए जानते हैं देवशयनी एकादशी व्रत कथा के बारे में… आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी व्रत किया जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का काफी महत्व माना जाता है क्योंकि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद कार्तिक मास की एकादशी तिथि तक को भगवान विष्णु योगनिद्रा से निकलते हैं। इस दौरान भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। देवशयनी एकादशी व्रत कथा का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत की कथा सुनने व पढ़ने मात्र से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा:Devshayani Ekadashi Vrat Katha वामन अवतार की कथा:Story of Vaman Avatar वामन पुराण के अनुसार, एक बार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। Devshayani Ekadashi Vrat Katha यह देखकर इंद्र समेत अन्‍य देवी-देवता घबरा गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंच गए। देवताओं को परेशान देखकर भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। राजा बलि ने वामन देवता से कहा कि जो मांगना चाहते हैं मांग लीजिए। इस पर वामन देवता ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। पहले और दूसरे पग में वामन देवता ने धरती और आकाश और पूरा संसार को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची तो राजा बलि से वामन देवता ने पूछा कि तीसरा पग में कहां रखूं तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु राजा बलि को देखकर काफी प्रसन्‍न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने उनसे वरदान में पाताल लोक में बस जाने की बात कही। बलि की बात मानकर उनको पाताल में जाना पड़ा। ऐसा करने से समस्‍त देवता और मां लक्ष्‍मी परेशान हो गए। Devshayani Ekadashi Vrat Katha अपने पति विष्‍णुजी को वापस लाने के लिए मां लक्ष्‍मी गरीब स्‍त्री के भेष में राजा बलि के पास गईं और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी और उपहार के रूप में विष्‍णुजी को पाताल लोक से वापस ले जाने का वरदान ले लिया। माता लक्ष्‍मी के साथ वापस जाते हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया की वह प्रत्‍येक वर्ष आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास की एकादशी तक पाताल में ही निवास करेंगे और इन 4 महीने की अवधि को उनकी योगनिद्रा माना जाएगा। यही वजह है कि दीपावली पर मां लक्ष्‍मी की पूजा भगवान विष्‍णु के बिना ही की जाती है। भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी यह कथा:Lord Krishna told this story to Yudhishthir Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा का वर्णन खुद भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस वृतांत को धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था। कथाओं के अनुसार, सतयुग में मांधाता नाम का एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। एक बार उसके राज्य में तीन साल तक वर्षा नहीं हुई, जिसकी वजह से राज्य में भंयकर अकाल पड़ गया। अकाल की वजह से चारो ओर त्रासदी का माहौल बन गया। राज्य के लोगों के अंदर धार्मिक भावनाएं कम होने लगीं। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपना दर्द बताया, जिससे राजा भी चिंतित थे। राजा मांधाता को लगता था कि आखिर ऐसा कौन-सा पाप हो गया है, जिसकी सजा हमारे राज्य को ईश्वर दे रहा है। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए राजा अपनी सेना के साथ ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे। Devshayani Ekadashi Vrat Katha ऋषिवर ने उनको यहां आने का कारण पूछा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर, मैंने हमेशा से पूरा निष्ठा से धर्म का पालन किया है, फिर मेरे राज्य की ऐसी हालत क्यों है। कृपया करके मुझे इसका समाधान दें। अंगिरा ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है, यहां छोटे से पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। अंगिरा ऋषि ने राजा को आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस व्रत का फल जरूर मिलेगा और इसके प्रभाव से तुम्हारा संकट से भी निकल आएगा। Devshayani Ekadashi Vrat Katha महर्षि अंगिरा के निर्देश का पालन करते हुए राजा अपनी राजधानी वापस आ गए और उन्होंने चारों वर्णों सहित देवशयनी एकादशी का व्रत पूरा किया, जिसके बाद राज्य में मूसलधार वर्षा हुई।

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Devshayani Ekadashi 2025 Date:देवशयनी एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र, पारण का समय

Devshayani Ekadashi:देवशयनी एकादशी 2025 चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है, जो भक्ति, उपवास और आत्म-अनुशासन का पवित्र 4 महीने का काल है। जानिए तिथि, अनुष्ठान और इस शुभ समय के दौरान क्या न करें। देवशयनी एकादशी वह दिन है जब भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस क्षण से, ब्रह्मांड की जिम्मेदारी अगले चार महीनों के लिए अन्य देवताओं को सौंप दी जाती है। यह पवित्र दिन चातुर्मास की शुरुआत का भी प्रतीक है, जो आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण अवधि है, जिसके दौरान विवाह, गृह प्रवेश समारोह और भूमि पूजन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। देवशयनी एकादशी शुभ मुहूर्त (Devshayani Ekadashi Shubh Muhurat) Kab hai Devshayani Ekadash:वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 05 जुलाई को शाम 06 बजकर 58 मिनट पर होगी। वहीं, 06 जुलाई को रात 09 बजकर 14 मिनट पर एकादशी तिथि का समापन होगा। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसके लिए 06 जुलाई को देवशयनी एकादशी मनाई जाएगी।साधक देवशयनी एकादशी का व्रत 06 जुलाई के दिन रखेंगे। वहीं, 07 जुलाई को पारण सुबह 05 बजकर 29 मिनट से लेकर 08 बजकर 16 मिनट के मध्य किया जाएगा। इस दौरान स्नान-ध्यान और पूजा के बाद अन्न और धन का दान कर व्रत खोलें। देवशयनी एकादशी शुभ योग (Devshayani Ekadashi Shubh Muhurat) Devshayani Ekadashi:ज्योतिषियों की मानें तो आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर साध्य योग का संयोग रात 09 बजकर 27 मिनट तक है। इसके बाद शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इन योग में लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करने से सभी प्रकार के शुभ कामों में सफलता मिलेगी। इसके साथ ही त्रिपुष्कर योग और रवि योग का भी संयोग बन रहा है। Devshayani Ekadashi Puja Vidhi:देवशयनी एकादशी की पूजा विधि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें। इसके बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण कर लें। एक तांबे के लोटे में जल, सिंदूर, लाल फूल डालकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। सबसे पहले व्रत का संकल्प लें।  इसके बाद विष्णु जी की पूजा आरंभ करें। सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी में पीले रंग का वस्त्र बिछाकर श्री विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें। सबसे पहले जल से आचमन करें। इसके बाद विष्णु जी को पीला चंदन, फूल, माला, अक्षत आदि लगाने के साथ भोग में तुलसी का दल के साथ रखें। इसके बाद जल अर्पित करें। फिर घी का दीपक और धूप जलाकर एकादशी व्रत कथा, विष्णु चालीसा, विष्णु मंत्र के बाद श्री विष्णु आरती कर लें। अंत में भूल चूक के लिए माफी मांग लें और दिनभर व्रत रखें। दूसरे दिन तय समय पर पूजा पाठ करने के बाद व्रत का पारण कर लें। Devshayani Ekadashi chatur mass ka mahetwa:देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और ब्रह्मांड का संचालन अन्य दिव्य प्राणियों को सौंप देते हैं। Devshayani Ekadashi उनका विश्राम काल, जिसे चातुर्मास के नाम से जाना जाता है, 6 जुलाई से शुरू होकर 1 नवंबर 2025 को देवउठनी एकादशी तक जारी रहेगा। चातुर्मास को तपस्या, उपवास, ध्यान और आत्मसंयम का समय माना जाता है। इस अवधि के दौरान विलासिता, उत्सव और भोग-विलास से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इस दौरान ध्यान आंतरिक चिंतन और आध्यात्मिक विकास की ओर केंद्रित होता है। Chatur mas Ke dauran kya nhi karna chahiye:चातुर्मास के दौरान क्या नहीं करना चाहिए? चातुर्मास के दौरान कुछ कार्य पारंपरिक रूप से प्रतिबंधित होते हैं, क्योंकि यह आत्म-अनुशासन और भक्ति का एक पवित्र चरण है: Chatur mas mein kya karna chahiye:चातुर्मास में क्या करना चाहिए? देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) न केवल भगवान विष्णु के विश्राम का प्रतीक है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत विराम, आत्म-अनुशासन, आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक उत्थान का अवसर भी है। चातुर्मास के सिद्धांतों का पालन करके, व्यक्ति जीवन में शांति, अनुशासन और ईश्वरीय कृपा ला सकता है। यदि आप अपने प्रयासों में सफलता और स्थायी सद्भाव चाहते हैं, तो इस पवित्र चार महीने की अवधि के आध्यात्मिक दिशानिर्देशों का पालन करें। देवशयनी एकादशी संकल्प मंत्र सत्यस्थ: सत्यसंकल्प: सत्यवित् सत्यदस्तथा।धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जित:।।कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च।श्रीपतिर्नृपति: श्रीमान् सर्वस्यपतिरूर्जित:।। देवशयनी एकादशी विष्णु क्षमा मंत्र भक्तस्तुतो भक्तपर: कीर्तिद: कीर्तिवर्धन:।कीर्तिर्दीप्ति: क्षमाकान्तिर्भक्तश्चैव दया परा।।

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Ambubachi Mela 2025 date & time:कामख्या देवी में इस दिन से लगने वाला है तांत्रिक शक्तियों का मेला

Ambubachi Mela:कामाख्या देवी मंदिर में जल्द ही अम्बुबाची मेला लगने वाला है। इस दौरान मां कामाख्या देवी मंदिर के कपाट बंद रहेंगे, क्योंकि माना जाता है कि पृथ्वी माता रजस्वला होती हैं। देशभर से तांत्रिक और श्रद्धालु इस मेले में शामिल होने आते हैं। आइए जानते हैं अम्बुबाची मेला की खास बातें और मेला कब से शुरु हो रहा है। कामाख्या देवी मंदिर में 4 दिवसीय मेले का आयोजन होने जा रहा है। देशभर से हजारों की संख्या में लोग इस मेले में शामिल होते हैं। कामाक्या देवी मंदिर 51 शक्तिपीठ में से एक है। कामाख्या देवी मंदिर में जिस मेले का आयोजन किया जाता है इसका नाम अम्बुबाची मेला है। आइए जानते हैं इस साल कब से लगने जा रहा है अम्बुबाची मेला और इस मेले की क्या खास बातें हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अंबुबाची मेला असम के कामाख्या मंदिर में हर साल आयोजित होने वाला एक वार्षिक हिंदू मेला है। हिंदू महीने “आषाढ़” के सातवें से दसवें दिन तक अम्बुबाची की अवधि के दौरान, मंदिर के दरवाजे सभी के लिए बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी कामाख्या मासिक धर्म के वार्षिक चक्र से गुजरती हैं। अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा।  यह Ambubachi Mela मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म चक्र को दर्शाता है, जो पृथ्वी की उर्वरता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवी को आराम और विश्राम की जरूरत होती है अर्थात यह भी मान्यता है कि इस दौरान देवी अपनी रचनात्मक शक्ति से पृथ्वी को धन्य करती हैं, जिससे भूमि उपजाऊ हो जाती है इसलिए मंदिर के अंदर सभी पूजा-अर्चना बंद कर दी जाती है और मंदिर के आसपास के गांवों में लोग भी कुछ दिनों के लिए नियमित गतिविधियों से दूर रहते हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time : आईये जानते हैं अम्बुबाची मेले के विशेषताएं मंदिर के गर्भ ग्रह को तीन दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है और इस दौरान कोई पूजा-अर्चना नहीं होती है।भक्तों को देवी के मासिक धर्म का प्रतीक लाल रंग का कपड़ा प्रसाद के रूप में दिया जाता है।यह मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म के दौरान पृथ्वी की उर्वरता और नारी शक्ति को समर्पित है। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा। तीन दिनों तक मंदिर में कोई पूजा या दर्शन नहीं किया जाता है। चौथे दिन, जब मां को ‘शुद्धि स्नान’ कराकर विश्राम समाप्त होता है, तब मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोले जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। Ambubachi Mela 2025 date & time इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। इस मेले को अमेटी या तांत्रिक प्रजनन उत्सव के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह भारत के पूर्वी भागों में प्रचलित तांत्रिक शक्ति पंथ से निकटता से जुड़ा हुआ है । यहाँ तक कि कुछ तांत्रिक बाबा भी इन चार दिनों के दौरान ही सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। Ambubachi Mela 2025 date & time मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है। अम्बुबाची मेला की खास बातें:Special features of Ambubachi fair इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है।

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Yogini Ekadashi 2025 Date: कब रखा जाएगा योगिनी एकादशी का व्रत? नोट कर लें डेट, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

Yogini Ekadashi 2025 Date: आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है. मान्यता है कि जो कोई इस दिन व्रत रखकर भगवान की उपासना करता है, उसके हर संकट दूर हो जाते हैं. Yogini Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, साल भर में 24 एकादशी के व्रत रखे जाते हैं. हर महीने दो एकादशी पड़ती है- एक कृष्ण पक्ष में और दूसरा शुक्ल पक्ष में, हर एकादशी व्रत का अपना अलग महत्व है. वैदिक पंचांग के अनुसार, कुछ दिनों में आषाढ़ मास की शुरुआत होने वाली है. इस महीने की पहली एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. इस एकादशी के दिन भी व्रत रखकर भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना की जाती है. कहते हैं कि इस एकादशी के व्रत से अनेक प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है. ऐसे में चलिए जानते हैं कि जून में योगिनी एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा, व्रत-पूजन के लिए शुभ मुहूर्त और महत्व क्या है. सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत ज्यादा महत्व है। यह भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है। हर महीने में एकादशी दो बार मनाई जाती है। एक शुक्ल पक्ष और दूसरी कृष्ण पक्ष में। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘योगिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि इस एकादशी (Yogini Ekadashi 2025) का उपवास करने से पापों से मुक्ति मिलती है। वहीं, इसकी डेट को लेकर लोगों में थोड़ी कन्फ्यूजन बनी हुई है, आइए यहां इसकी डेट जानते हैं। कब मनाई जाएगी योगिनी एकादशी 2025? (Yogini Ekadashi 2025 Kab Hai?) हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 21 जून को सुबह 07 बजकर 18 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसकी समाप्ति 22 जून को सुबह 04 बजकर 27 मिनट पर होगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि के अनुसार, तीज-त्योहार मनाए जाते हैं। इसलिए 21 जून को योगिनी एकादशी का उपवास रखा जाएगा। योगिनी एकादशी 2025 पूजा विधि (Yogini Ekadashi 2025 Puja Vidhi) योगिनी एकादशी का महत्व:Importance of Yogini Ekadashi हिंदू धर्म में योगिनी एकादशी का विशेष महत्व है. शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि जो कोई किन्हीं कारणों से निर्जला एकादशी का व्रत नहीं रख सकते, वे इस एकादशी का व्रत रखकर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं. इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की उपासना करने से विशेष फल प्राप्त होता है. इस दिन भगवान को खीर का भोग लगाना चाहिए. इसके अलावा इस दिन ‘ओम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ इस मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए. मान्यता है कि ऐसा करने से बीमारी से मुक्ति मिलती है. योगिनी एकादशी का धार्मिक महत्व (Yogini Ekadashi 2025 Significance) योगिनी एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में बहुत ज्यादा महत्व है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा जाता है कि जो साधक इस कठिन उपवास का पालन करते हैं, उन्हें आरोग्य और सुख-समृद्धि का वरदान मिलता है। ऐसे में इस पावन दिन उपवास जरूर करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

Yogini Ekadashi 2025 Date: कब रखा जाएगा योगिनी एकादशी का व्रत? नोट कर लें डेट, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि Read More »

Nirjala Ekadashi:निर्जला एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए? रखें इन बातों का ध्यान

Nirjala Ekadashi:निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025) का व्रत ज्येष्ठ महीने में किया जाता है जिसमें 24 घंटे बिना पानी पिए रहना होता है। गर्मी में यह व्रत मुश्किल हो सकता है इसलिए व्रत से एक दिन पहले शरीर को हाइड्रेट रखें और धूप में निकलने से बचें। साथ ही कुछ और बातों को ध्यान में रख आप इस व्रत को अच्छे से कर सकते हैं। हिंदू धर्म में कई तरह के व्रत-उपवास किए जाते हैं। मन की शुद्धि और भगवान का आशीर्वाद पाने के लिए लोग अक्सर व्रत-उपवास करते हैं। सिर्फ धार्मिक ही नहीं साइंस के मुताबिक भी फास्टिंग सेहत के लिए फायदेमंद होती है। हिंदू धर्म में यूं तो कई तरह के व्रत किए जाते हैं, लेकिन एकादशी व्रत का काफी ज्यादा महत्व माना जाता है। खासकर निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi 2025) का व्रत सभी एकादशी में अहम माना जाता है। हर साल ज्येष्ठ महीने में निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025) का व्रत किया जाता है। इस साल 6 जून को यह व्रत किया जाएगा। जैसाकि नाम से ही पता चलता है कि यह व्रत यानी बिना पानी पिए किया जाता है। इस दौरान लोग 24 घंटे बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं। ऐसे में गर्मी के मौसम में बिना कुछ खाए-पिए रहना मुश्किल हो जाता है, जिससे कई बार तबीयत भी खराब हो सकती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसे टिप्स बताएंगे, जिनका फॉलो कर आप बिना तबीयत बिगाड़े निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi fasting tips) का व्रत कर सकते हैं। निर्जला एकादशी Nirjala Ekadashi का व्रत 24 घंटे के लिए रखा जाता है। इसका मतलब है कि इस व्रत को अगले दिन यानी द्वादशी को खोला जाता है। ऐसे में पूरा एक दिन पानी के बिना रहने से शरीर डिहाइड्रेशन का शिकार बन सकता है। इसलिए व्रत के एक दिन पहले आप बॉडी को अच्छी तरह से हाइड्रेट कर लें। इसके लिए ढेर सारा पानी और नारियल पानी पिएं। साथ ही ढेर सारे फलों को डाइट में शामिल करें। धूप में निकलने से बचें:avoid exposure to sunlight अगर आप निर्जला एकादशी का व्रत रख रहे हैं, तो इस दौरान धूप में निकलने से बचें। इस दिन आप वैसे ही पानी नहीं पीते हैं। ऐसे में धूप में निकलने से गर्मी की वजह से आप डिहाइड्रेशन का शिकार हो सकते हैं, जिससे आपकी तबीयत बिगड़ सकती है। इसलिए कोशिश करें कि आप घर या कहीं अंदर ही रहें। एक साथ ढेर सारा पानी न पिएं:Do not drink a lot of water at once पूरे एक दिन बिना पानी पिए रहना काफी मुश्किल होता है। ऐसे में जब लोग व्रत खोलते हैं, तो एक साथ ढेर सारा पानी पी जाते हैं। हालांकि, ऐसा करना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए व्रत खोलते समय थोड़ा पानी पिएं और फिर इसे घूंट-घूंट करके पीते रहें। Nirjala Ekadashi 2025 Vrat Niyam  हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान विष्णु की उपासना के लिए खास माना गया है। हिंदू पंचांग के आधार पर यह व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत में भक्त अन्न व जल ग्रहण नहीं करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से 24 एकादशी का फल मिलता है व भगवान विष्णु की कृपा से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, निर्जला या भीमसेनी एकादशी के दिन कुछ कार्यों को करने की मनाही होती है। जानें- 1. इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में कीड़े मकोड़े के रूप में जन्म लेता है। 2. इस दिन नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि नमक का सेवन करने से एकादशी व गुरु ग्रह का फल खत्म हो जाता है। 3. एकादशी के दिन तुलसी को जल अर्पित नहीं करना चाहिए और न ही छूना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन तुलसी माता उपवास करती हैं। तुलसी को मां लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। 4. इस दिन किसी के प्रति बुरे या अपमानजनक शब्द प्रयोग नहीं करने चाहिए। Nirjala Ekadashi इस दिन क्रोध नहीं करना चाहिए और वाद-विवाद से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। 5. एकादशी के दिन बाल या नाखून काटना अशुभ माना गया है। What to do on the day of Ekadashi:एकादशी के दिन क्या करें- 1. एकादशी के दिन अधिक से अधिक मां लक्ष्मी व भगवान विष्णु की अराधना करनी चाहिए। 2. भगवान विष्णु को तुलसी दल युक्त प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। 3. भगवान विष्णु की आरती करनी चाहिए। 4. इस दिन गरीब व जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए।

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Krishnapingal Chaturthi 2025 Date:कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी कब है ? इस पवित्र अवसर पर करे ये कार्य

Krishnapingal Chaturthi 2025 Date:हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर चंद्र महीने में दो चतुर्थी तिथियां होती हैं। कृष्ण पक्ष के दौरान पूर्णिमा या पूर्णिमा के बाद आने वाली को संकष्टी चतुर्थी के रूप में जाना जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष के दौरान अमावस्या या अमावस्या के दिन आने वाली को विनायक चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। वर्ष में कुल 12 संकष्टी चतुर्थी व्रत होते हैं और कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी 12 संकटहर गणेश चतुर्थी व्रतों में से एक है। हर महीने, अलग-अलग पीठों के साथ-साथ भगवान गणेश के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है, जिसका विवरण नीचे दिया गया है: कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त (Krishnapingal Chaturthi 2025 Date) Krishnapingal Chaturthi:वैदिक पंचांग के अनुसार, 14 जून को दोपहर 03 बजकर 46 मिनट पर आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि शुरू होगी। वहीं,  15 जून को दोपहर 03 बजकर 51 मिनट पर आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का समापन होगा। तिथि गणना से 14 जून को कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी मनाई जाएगी। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर चन्द्रोदय का शुभ समय 10 बजकर 07 मिनट है। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी शुभ योग (Krishnapingal Sankashti Chaturthi 2025 Shubh Yoga) आषाढ़ महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर इंद्र योग का संयोग दोपहर 03 बजकर 13 मिनट से हो रहा है। साथ ही भद्रवास का भी योग है। इन योग में भगवान गणेश की पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होगी। कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी का महत्व:Importance of Krishna Pingla Sankashti Chaturthi Krishnapingal Chaturthi:कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी ज्येष्ठ महीने में आती है, जैसा कि गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अमावस्यांत कैलेंडर के अनुसार होता है। उत्तर भारतीय हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह आषाढ़ महीने में आता है। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश अपने सभी भक्तों के लिए पृथ्वी पर अपनी उपस्थिति प्रदान करते हैं। हर महीने अलग-अलग नाम और पीता से गणेश जी की पूजा की जाती है। साथ ही, प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी को संकष्ट गणपति पूजा की जाती है। प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी के साथ अलग-अलग कथाएं जुड़ी हुई हैं। पारंपरिक कहानियां बताती हैं कि यह वह दिन है जब भगवान गणेश को भगवान शिव ने सर्वोच्च देवता घोषित किया था। Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से भक्तों को जीवन में आने वाली हर समस्या से दूर रहता है और सभी दोषों और पापों से छुटकारा मिलता है। इसके अतिरिक्त, यह वह दिन है जो सभी कठिनाइयों, बाधाओं को दूर करता है और भक्तों को स्वास्थ्य, धन और समृद्धि प्रदान करता है। रुद्राभिषेक पूजा करके स्वास्थ्य, धन, समृद्धि और सुख प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आशीर्वाद लें! कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी के लाभ:Benefits of Krishna Pingla Sankashti Chaturthi Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होने की संभावना है। भगवान गणेश आपके रास्ते में आने वाली सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करेंगे और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने में आपकी मदद करेंगे। कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी पर प्रार्थना करने से सभी चिंताएं दूर हो जाएंगी और आपके जीवन से जटिल परिस्थितियों को सुलझाने में मदद मिलेगी। भगवान गणेश आपको और आपके परिवार को समृद्धि और दीर्घायु प्रदान करते हैं। कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी अनुष्ठान:Krishna Pingala Sankashti Chaturthi Rituals Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व है। भक्त सुबह जल्दी उठते हैं, तैयार हो जाते हैं और दिन को भगवान गणेश की पूजा करते हैं। कई भक्त कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी रखते हैं जिसमें उन्हें फल और दूध की चीजें खाने की अनुमति होती है। भगवान गणेश की मूर्ति को दूर्वा घास और ताजे फूलों से सजाया गया है। एक दीपक जलाया जाता है और भगवान गणेश के वैदिक मंत्रों का जाप किया जाता है। शाम को, संकष्टी पूजा चंद्रमा या चंद्र भगवान को समर्पित की जाती है। साथ ही, इस दिन विशेष नैवेद्य या भोग तैयार किया जाता है, Krishnapingal Chaturthi जिसमें भगवान गणेश का पसंदीदा व्यंजन मोदक (नारियल और गुड़ से बनी मिठाई) शामिल होता है। गणेश आरती की जाती है और बाद में सभी भक्तों के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी के व्यक्तिगत अनुष्ठानों के लिए हमारे विशेषज्ञ ज्योतिषियों से परामर्श करें। आशा है कि इस दिन आपके सभी सपने पूरे होंगे, हैप्पी कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी! शिववास योग:Shivvas Yoga Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी पर शिववास योग का संयोग है। Krishnapingal Chaturthi इस योग का निर्माण दोपहर 03 बजकर 46 मिनट से हो रहा है। इस शुभ अवसर पर देवों के देव महादेव कैलाश पर जगत की देवी मां पार्वती के साथ विराजमान रहेंगे इस समय में भगवान शिव का अभिषेक करने से साधक को सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी।

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Nirjala Ekadashi Vrat Niyam:निर्जला एकादशी का व्रत कर रहे हैं, तो जानिए कब पी सकते हैं पानी

Nirjala Ekadashi Vrat Niyam:निर्जला एकादशी का व्रत 6 जून को है। इस व्रत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का महत्व है। व्रत करने वाले को पूरे दिन जल का त्याग करना होता है जिससे यह व्रत कठिन माना जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने और झूठ चोरी से बचने की सलाह दी जाती है। Nirjala Ekadashi 2025:हर माह में दो एकादशी के व्रत होते हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी व्रत रखा जाएगा। Nirjala Ekadashi Vrat Niyam पंचांग के अनुसार, इस साल निर्जला एकादशी का व्रत 6 जून को है। यह व्रत करना जितना कठिन है, उतना ही फलदायी भी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को समस्त भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। मरने के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह विष्णु लोक में वास करता है।  जैसा कि इस व्रत के नामNirjala Ekadashi Vrat Niyam निर्जला एकादशी से ही स्पष्ट है इस दिन उपवास रखने वाला व्यक्ति पानी नहीं पी सकता है। ज्येष्ठ के महीने में जब गर्मी अपने चरम पर होती है, तब इस व्रत को करना और भी मुश्किल हो जाता है। यदि व्रत के दौरान जल ग्रहण कर लिया जाए, तो व्रत टूट जाता है और उसका फल नहीं मिलता है।  निर्जला एकादशी पर करें तुलसी से ये उपाय (Do These Remedies With Tulsi On Nirjala Ekadashi Vrat Niyam ) कब पी सकते हैं पानी:When can you drink water ? Nirjala Ekadashi Vrat Niyam:निर्जला एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करना चाहिए। उसके बाद ही वह पानी पी सकता है। निर्जला एकादशी के दिन सुबह उठने के बाद पहली बार जल का इस्तेमाल सिर्फ नहाने के लिए किया जा सकता है।  Nirjala Ekadashi Vrat Niyam इसके बाद व्रत का संकल्प लेने के दौरान और आचमन करते समय व्रत करने वाला व्यक्ति पानी का उपयोग कर सकता है। इसके बाद पूरे दिन पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। हालांकि, हाथ-मुंह धोने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन पीने के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।    Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025 1. निर्जला एकादशी व्रत में अन्न व जल पूरी तरह से वर्जित है। इसमें फलाहार भी मान्य नहीं है। 2. इस व्रत में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और शारीरिक इच्छाओं पर कंट्रोल रखना चाहिए। 3. इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए व व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। 4. एकादशी व्रत करने के बाद अगले दिन व्रत पारण के समय ही पानी पीना चाहिए। 5. निर्जला एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को जल नहीं अर्पित करना चाहिए क्योंकि इस दिन तुलसी माता भी व्रत करती हैं। 6. निर्जला एकादशी के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन दान-पु्ण्य भी लाभकारी माना गया है। 7. निर्जला एकादशी के दिन पलंग पर नहीं सोना चाहिए, भूमि पर ही आराम या शयन करना चाहिए। व्रत में दिन में सोने की मनाही होती है। 8. व्रत के दौरान क्रोध और लोभ जैसे नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। 9. इस दिन जीव-जंतु को हानि नहीं पहुंचानी चाहिए। इस दिन न ही बाल कटवाने चाहिए और न ही नाखून काटने चाहिए। 10. निर्जला एकादशी के दिन वाद-विवाद से दूर रहना चाहिए।

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