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Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai:किस दिन मनाई जाएगी गंगा सप्तमी? जानें शुभ मुहूर्त से लेकर पूजा विधि और स्नान का महत्व

Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai:सनातन शास्त्रों में निहित है कि राजा भगीरथ के पूर्वजों को मोक्ष दिलाने हेतु मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं। गंगा नदी में स्नान-ध्यान करने से साधक पर न केवल मां गंगा की कृपा बरसती है बल्कि सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। साधक श्रद्धा भाव से वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी (Ganga Saptami 2025) तिथि पर मां गंगा की पूजा एवं साधना करते हैं। सनातन धर्म में गंगा सप्तमी का खास महत्व है। यह पर्व हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर बड़ी संख्या में साधक गंगा समेत पवित्र नदियों में स्नान-ध्यान कर परम पुण्यदायिनी मां गंगा की पूजा करते हैं। सनातन शास्त्रों में निहित है कि वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर गंगा स्नान करने से साधक द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही आरोग्य जीवन का वरदान मिलता है। आइए, गंगा सप्तमी (Ganga Saptami 2025 Date) की तिथि, शुभ मुहूर्त एवं महत्व जानते हैं हर नदी सिर्फ जलधारा होती है, लेकिन गंगा सिर्फ नदी नहीं, बल्कि आस्था की अमृतधारा है। कहा जाता है कि जब पापों से थकी धरती ने शुद्धि की गुहार लगाई, तब स्वर्गलोक से मां गंगा ने कदम रखा हमारी धरती पर। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai और यही क्षण आज भी गंगा सप्तमी के रूप में मनाई जाती है। हिंदू धर्म में गंगा सप्तमी का विशेष महत्व है। इस खास अवसर पर लोग पावन और पवित्र गंगा नदी में स्नान कर के अपने सारे पापों से निजात पाते हैं। इसके साथ ही मां गंगा की पूजा अर्चना करते हैं। इस साल यह पावन पर्व शनिवार, 3 मई 2025 को मनाया जाएगा। तो आज की इस खबर में हम आपको गंगा सप्तमी की तिथि और शुभ मुहूर्त के बारे में बताने जा रहे हैं। इसके साथ ही हम यह भी बताएंगे गंगा सप्तमी से जुड़ी कौन सी पौराणिक कथा शामिल है। आइए जानते हैं। गंगा सप्तमी शुभ मुहूर्त (Ganga Saptami Shubh Muhurat) पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 03 मई को सुबह 07 बजकर 51 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन यानी 04 मई को सुबह 04 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में उदया तिथि मान होने के चलते 03 मई को गंगा सप्तमी मनाई जाएगी। इस दिन गंगा स्नान हेतु मुहूर्त सुबह 10 बजकर 58 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 38 मिनट तक है। गंगा सप्तमी शुभ योग (Ganga Saptami Shubh Yoga) वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि यानी 03 मई को दुर्लभ त्रिपुष्कर योग का संयोग बन रहा है। इसके साथ ही रवि योग और शिववास योग का संयोग बन रहा है। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai इन योग में गंगा स्नान कर मां गंगा और देवों के देव महादेव की पूजा करने से साधक को पृथ्वी लोक पर स्वर्ग समान सुखों की प्राप्ति होगी। इसके अलावा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र का भी संयोग है। What is the story related to Ganga Saptami क्या है गंगा सप्तमी से जुड़ी कथा? Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai गंगा सप्तमी को गंगा जयंती भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन स्वर्ग से धरती पर गंगा का दिव्य अवतरण हुआ था। ब्रह्मा द्वारा जन्मी, शिव की जटाओं में समाई और भगीरथ की तपस्या से बहती हुई  गंगा साक्षात मोक्ष का मार्ग बन गईं। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस दिन गंगा स्नान से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और आत्मा को शांति व मुक्ति मिलती है। स्नान करने के बाद दान-पुण्य भी करें Do charity after taking bath गंगा सप्तमी पर स्नान का विशेष महत्व है। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai अगर आप प्रयागराज, हरिद्वार, ऋषिकेश या वाराणसी जैसे पवित्र तीर्थों में हैं, तो गंगा में डुबकी जरूर लगाएं। अगर गंगा तक पहुंचना संभव नहीं हो, तो घर में स्नान करते समय जल में कुछ बूंदें गंगाजल की मिला लें। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai हालांकि, कहा जाता है कि भावनाओं की पवित्रता ही सबसे बड़ा तप है। स्नान के बाद तिल, वस्त्र, अन्न, दक्षिणा आदि का दान करने से पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है।  दीपकों से की जाती है मां गंगा की आरती Aarti of Mother Ganga is done with lamps Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai गंगा सप्तमी पर गंगा घाटों पर एक अलग ही उल्लास देखने को मिलता है। हजारों दीपों से सजी गंगा आरती, मंत्रोच्चारण और शंख ध्वनि से गूंजते घाट। सब मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जो आत्मा तक को झकझोर देता है। Ganga Saptami 2025 Mai Kab Hai भक्तजन इस दिन मां गंगा की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और विशेष मंत्रों का जाप करते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच्चा मोक्ष केवल गंगा में डुबकी से नहीं, बल्कि अपने कर्मों को पवित्र करने से मिलता है।

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Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:आदि शंकराचार्य जयंती 2025: तिथि, महत्व

Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:आदि शंकराचार्य जयंती महान भारतीय दार्शनिक और आध्यात्मिक सुधारक  जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के जन्म की याद में मनाई जाती है , जिन्होंने 8वीं शताब्दी के दौरान अद्वैत वेदांत को पुनर्जीवित किया और हिंदू दर्शन को एकीकृत किया। उनकी शिक्षाएँ भारतीय विचार, आध्यात्मिकता और संस्कृति को प्रभावित करती रहती हैं। 2025 में भारत इस पूज्य संत की 1237वीं जयंती मनाएगा जिन्होंने धर्म और आध्यात्मिक एकता स्थापित करने के लिए पूरे देश का भ्रमण किया था। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:आदि शंकराचार्य जयंती 2025: तिथि और तिथि दिनांक : शुक्रवार, 2 मई 2025 तिथि : पंचमी तिथि , शुक्ल पक्ष , वैशाख मास पंचमी तिथि आरंभ : 1 मई 2025 को सुबह 11:23 बजे से पंचमी तिथि समाप्त : 2 मई 2025 को सुबह 09:14 बजे आदि शंकराचार्य की जीवन गाथा आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) के माता-पिता भगवान शिव के उपासक थे। एक बार भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। तभी शंकराचार्य के पिता ने भगवान से एक ऐसे पुत्र का वरदान मांगा, जो सर्वज्ञानी हो और सतायु हो। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai तब भगवान शिव वे कहा कि तुम्हारा बालक या तो सर्वज्ञ हो सकता है, या फिर सतायु। दोनों नहीं हो सकता। तब शंकराचार्य (adi shankaracharya) के पिता ने सर्वज्ञ संतान का वरदान मांगा। भगवान के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम शंकर रखा गया। जब वह तीन वर्ष के थे, तभी उनके पिता की मौत हो गई थी। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai बालक शंकर ही अपनी बुद्धिमत्ता के कारण आगे जाकर शंकराचार्य कहलाए। बालक शंकर का रूझान संन्यासी बनने की तरफ था। लेकिन इसको लेकर माता राजी नहीं थी। तभी एक दिन नदी में नहाते समय एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया, इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्यजी ने अपने मां से कहा कि, माँ मुझे संन्यास लेने की आज्ञा दे दीजिए, नहीं तो यह मगरमच्छ मुझे खा जाएगा। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत उन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान कर दी। फिर, उन्होंने दुनिया को प्रसिद्ध किया और अपने जीवन पथ पर चले गए। शंकराचार्य ने 16 और 32 वर्ष की आयु के बीच पूरे भारत की यात्रा की। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai उन्होंने यात्रा के दौरान वेदों के संदेशों को लोगों तक पहुंचाया। लोगों को हिंदू धर्म के प्रति जागरूक किया, हमारे ग्रंथों के बारे में लोगों को अवगत कराया। शंकराचार्य जी की शिक्षाएं आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) के कार्य आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) एक अभूतपूर्व कवि थे Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai और उन्होंने अपने हृदय में एक अति प्रेम के साथ परमात्मा को धारण किया। उनकी रचनाओं में 72 ध्यान और भक्तिपूर्ण भजन शामिल हैं। उनमें निर्वाण शाल्कम, सौंदर्य लहरी, मनीषा पंचकम और शिवानंद लहरी शामिल है। उन्होंने प्राथमिक ग्रंथों जैसे भगवद गीता, ब्रह्म सूत्र और 12 महत्वपूर्ण उपनिषदों पर 18 भाष्य भी लिखे हैं। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत दर्शन की मूल बातों पर एक विलक्षण या अविभाजित ब्रह्म के सत्य की व्याख्या करते हुए 23 पुस्तकें भी लिखीं। आत्म बोध, विवेक चूड़ामणि, उपदेश सहस्री और वाक्य वृत्ति उनमें से कुछ हैं। आदि शंकराचार्य के उद्धरण आइए आदि शंकराचार्य (adi shankaracharya) द्वारा दिए गए इन उद्धरणों के साथ उनकी जयंती मनाएं:- धन, सम्बन्ध, मित्र और यौवन पर अभिमान मत करो। पलक झपकते ही ये सब समय के साथ छीन लिया जाता है। इस मायावी संसार को त्याग कर परमात्मा को जानो और प्राप्त करो। किसी को मित्र या शत्रु, भाई या चचेरे भाई की दृष्टि से न देखें। मित्रता या शत्रुता के विचारों में अपनी मानसिक ऊर्जा को नष्ट न करें। Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai सर्वत्र स्वयं को खोजते हुए, सबके प्रति मिलनसार और समान विचार वाले, सबके साथ समान व्यवहार वाले बनें । आसक्तियों और द्वेषों से भरे स्वप्न के समान जगत् जागरण तक सत्य प्रतीत होता है। यह जानते हुए कि मैं शरीर से भिन्न हूँ, Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai मुझे शरीर की उपेक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यह एक ऐसा वाहन है जिसका उपयोग मैं दुनिया के साथ लेन-देन करने के लिए करता हूं। यह वह मंदिर है जिसके भीतर शुद्ध आत्मा है। बंधनों से मुक्त होने के लिए बुद्धिमान व्यक्ति को एक-स्व और अहंकार-स्व के बीच भेदभाव का अभ्यास करना चाहिए। केवल उसी से आप स्वयं को शुद्ध सत्ता, चेतना और आनंद के रूप में पहचानते हुए आनंदमय जीवन जी सकते हैं। आनंद उन्हें ही मिलता है, जो आनंद की तलाश नहीं करते हैं। प्रत्येक वस्तु अपने स्वभाव की ओर बढ़ने लगती है। मैं हमेशा सुख की कामना करता हूं, Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai जो कि मेरा वास्तविक स्वरूप है। मेरा स्वभाव मेरे लिए कभी बोझ नहीं है। खुशी मेरे लिए कभी बोझ नहीं है, जबकि दुख है। मोती की मां में चांदी की उपस्थिति की तरह, दुनिया तब तक वास्तविक लगती है Adi Shankaracharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai जब तक कि आत्मा, अंतर्निहित वास्तविकता का एहसास नहीं हो जाता। शंकराचार्य जयंती का महत्व आदि शंकराचार्य की जयंती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है – यह भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण का उत्सव है । मुख्य महत्व: बौद्धिक जांच और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देता है । अद्वैत (आत्मा और ब्रह्म की एकता) के माध्यम से विविधता में एकता को सुदृढ़ करता है । वैदिक और उपनिषदिक ज्ञान को सरल रूप में पुनर्जीवित करता है । आदि शंकराचार्य की शिक्षाएँ 1. अद्वैत वेदांत “आत्मा और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है।” 2. ब्रह्म सत्यं जगन मिथ्या “ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, संसार एक भ्रम है।” 3. आत्म-साक्षात्कार मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को कर्मकाण्डों से ऊपर उठकर आत्मसाक्षात्कार करना होगा। 4. अलगाव संसार में रहो, लेकिन अनासक्त रहो – भौतिकवाद की अपेक्षा ज्ञान पर ध्यान केन्द्रित करो। भारत भर में उत्सव केरल (कालडी) : मंदिर में जुलूस और वैदिक मंत्रोच्चार सहित भव्य आयोजन। कर्नाटक (श्रृंगेरी शारदा पीठम) : शारदा देवी और आचार्य पादुकाओं की औपचारिक पूजा। उत्तराखंड (ज्योतिर्मठ) : हिमालय में जुलूस, आध्यात्मिक सभाएं और हवन। ओडिशा (पुरी गोवर्धन पीठ) और गुजरात (द्वारका) : मठों और जगन्नाथ मंदिर में अनुष्ठान। आदि शंकराचार्य की आधुनिक प्रासंगिकता आध्यात्मिकता के प्रति उनका तर्क-आधारित

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Vaishakh Purnima 2025 Mai Kab Hai:जानें कब है वैशाख पूर्णिमा? जानें इसका महत्व, व्रत और पूजा विधि |

Vaishakh Purnima 2025: हिन्दू धर्म मे वैशाख पूर्णिमा व्रत का विशेष महत्व है। हिंदी पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को वैशाख पू्णिमा मनाई जाती जाती है। और वैसाख पुर्णिमा को सत्य विनायक पुर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने का विशेष महत्व बतलाया गया है। ऐसी मान्यता है कि वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु का तेइसवां अवतार महात्मा बुद्ध के रूप में हुआ था। इसलिए वैसाख पूर्णिमा के दिन महात्मा बुद्ध की जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। शास्त्रो के अनुसार बैसाख पर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान, दान, पूजा-पाठ आदि करने का विशेष महत्व होता है। ऐसी मान्यता है कि वैसाख पूर्णिमा के दिन भगवान की पूजा आराधना करने से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। Vaishakh Purnima 2025 और उसके उलार भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान धर्मराज की पूजा करने का विधान है। इसलिए इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के बचपन के साथी सुदामा जब द्वारिका उनके पास मिलने पहुंचे। तो भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सत्य विनायक पूर्णिमा व्रत करने का विधान बतलाया था। Vaishakh Purnima 2025 इसलिए वैसाख पूर्णिमा व्रत के प्रभाव से सुदामा की सारी दरिद्रता दूर हो गयी। इसलिए वैशाख पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने के बाद व्रत और पुण्य कर्म करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। आईये जानते है साल 2025 में वैशाख पूर्णिमा कब है ? 11 या 12 मई, जाने शुभ मुहूर्त, पूजा विधि महत्व और इस दिन किये जाने वाले उपाय Vaishakh Purnima 2025 वैशाख पूर्णिमा 2025 तिथि व मुहूर्त हिन्दू पंचांग के अनुसार साल 2025 में वैशाख पूर्णिमा 12 मई को है। Vaishakh Purnima 2025 इस दिन पूर्णिमा उपवास रखा जायेगा। इस वर्ष वैशाख पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण भी लगेगा। तथा  साथ में भगवान बुद्ध जयंती भी वैशाख पूर्णिमा है।  12 मई 2025, सोमवार (वैशाख पूर्णिमा व्रत, वैशाख पूर्णिमा) पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – 11 मई, रात 08:01 बजे से पूर्णिमा तिथि समाप्त – 12 मई, रात 10:25 बजे तक Keep Satya Vinayak fast on Vaishakh Purnima वैशाख पूर्णिमा पर रखें सत्य विनायक व्रत  वैशाख पूर्णिमा पर सत्य विनायक व्रत रखने का भी विधान है। मान्यता है कि इस दिन सत्य विनायक व्रत रखने से व्रती की सारी दरिद्रता दूर हो जाती है। मान्यता है कि अपने पास मदद के लिये आये भगवान श्री कृष्ण ने अपने यार सुदामा (ब्राह्मण सुदामा) को भी इसी व्रत का विधान बताया था जिसके पश्चात उनकी गरीबी दूर हुई। Vaishakh Purnima 2025 वैशाख पूर्णिमा को धर्मराज की पूजा करने का विधान है मान्यता है कि धर्मराज सत्यविनायक व्रत से प्रसन्न होते हैं। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से व्रती को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता ऐसी मान्यता है। Vaishakh Purnima fast and worship method वैशाख पूर्णिमा व्रत व पूजा विधि वैशाख पूर्णिमा के दिन अपने स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर ही स्नान करें।  तत्पश्चात साफ सुथरे वस्त्र धारण करके पूजा स्थल पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं। फिर व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की पूजा करें। एक साफ चौकीपर भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करें।  प्रतिमा पर जलाभिषेक करें और भगवान श्रीहरि पर पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, चंदन, तुलसी, पंचामृत, फल आदि अर्पित करें।  इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने तिल के तेल का दीपक जलाएं और Vaishakh Purnima 2025 ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र का जाप करें। हो सके तो विष्णु सहस्त्रनाम स्त्रोत का पाठ करें और आखिर में भगवान विष्णु की आरती गाएं। तत्पश्चात किसी योग्य ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा दान करना चाहिये। Vaishakh Purnima 2025 ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को भोजन करवाने के पश्चात ही स्वयं अन्न ग्रहण करना चाहिये। सामर्थ्य हो तो स्वर्णदान भी इस दिन करना चाहिये। रात्रि के समय दीप, धूप, पुष्प, अन्न, गुड़ आदि से पूर्ण चंद्रमा की पूजा करनी चाहिये और जल अर्पित करना चाहिये।

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Matangi Jayanti 2025 Mai Kab Hai : कब है मातंगी जयंती 2025 में, जाने डेट टाइम, पूजा शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व उपाय

Matangi Jayanti 2025: हिन्दू धर्म मे माता मातंगी जयंती का विशेष महत्व है। माता मातंगी दशमहाविद्याओ में से नौंवी महाविद्या है। हिंदी पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि के दिन माता मातंगी की जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि आज के दिन ही माता मातंगी का धरती पर प्राकट्य हुआ था। इस लिए आज के दिन माता मातंगी की जयंती पूरे हर्सोल्लास के साथ मनाई जाती है। माता को राजमातांगी, सुमुखी माताजी, उच्छिष्ट माताजी, वश्यमातांगी तथा कर्णमाताजी आदि नामो से जानी जाती है। माता मातंगी वाणी, संगीत और ज्ञान की अधिष्ठात्री मॉनी जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो कोई माता मातंगी का व्रत रखता है और सच्चे मन से पूजा अर्चना करता है तो उसके दांपत्य जीवन को सुखी एवं समृद्ध होने का आशीर्वाद प्रदान करती है। Matangi Jayanti 2025 और गृहस्थ जीवन के सभी सुख प्राप्त होते हैं। मां मातंगी की पूजा करने से व्यक्ति को वाणी, संगीत और कला में सिद्धि प्राप्त होती है। Matangi Jayanti 2025 उनकी कृपा से वशीकरण और आकर्षण शक्ति बढ़ती है। मान्यता है कि यह पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है। आइये जानते है साल 2025 में मातंगी जयंती कब मनाई जाएगी? 29 या 30 अप्रैल, जानिए पूजा शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन किये जाने वाले उपाय 2025 में मातंगी जयंती कब है? When is Matangi Jayanti in 2025? Matangi Jayanti 2025 Date Time Muhurat: साल 2025 में बैसाख मास की शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि प्रारम्भ हो रही है 29 अप्रैल 2025 को शाम 05 बजकर 31 मिनट पर और तृतीया तिथि की समाप्ति होगी 30 अप्रैल 2025 को दोपहर 02 बजकर 12 मिनट पर इसलिए इस तिथि के अनुसार मातंगी जयंती 30 अप्रैल 2025 दिन बुधवार को मनाई जाएगी। Matangi Jayanti Puja Method मातंगी जयंती पूजा विधि Matangi Jayanti Puja Vidhi: मातंगी जयंती के दिन व्रती को सुबह जल्दी उठकर नित्य क्रिया से निवृत्र होकर स्नान आदि करके साफ व शुद्ध वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प ले। इसके बाद पूजस स्थल की अच्छे से साफ सफाई करके पूजा स्थल पर एक लकड़ी की चौकी स्थापित करके गंगाजल से शुद्ध करे। इसके उस चौकी पर माता की मूर्ति या फ़ोटो स्थापित करे। Matangi Jayanti 2025 और माता के समक्ष धूप, दिप जलाए और माता को लाल फूल, अक्षत, आदि अर्पित करे। इसके बाद माता के इस मंत्र ‘ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा’ बोलते हुए जाप करें। Matangi Jayanti 2025 इसके बाद कथा पढे या फिर सुने और पूजा के अंत मे माता की आरती करके माता से मनोकामना पूर्ति की विनती करे। Matangi Jayanti Remedies मातंगी जयंती उपाय Matangi Jayanti Upay: मातंगी जयंती के दिन माता के करुणामयी रूप का ध्यान करते हुए 108 बिल्व पत्र और 108 ही कमल के पुष्प लेकर इन मंत्रों ॐ ही ऐं भगवती मतेंगश्वरी श्रीं स्वाहा। का उच्चारण करते हुए अर्पित करने से दांपत्य जीवन में चल रही हर समस्या से छुटकारा मिलता है। इसके अलावा यदि आप के आर्थिक जीवन मे किसी भी प्रकार की कोई भी समस्या आ रही है Matangi Jayanti 2025 तो माता मातंगी को अनार अर्पित करे और कमलगट्टे की लेकर इन ॐ हीं हीं हीं महा मातंगी प्रचिती दायिनी, लक्ष्मी दायिनी नमो नमः मंत्रो का जाप करने से आर्थिक संकटो से मुक्ति मिलती है। story of matangi jayanti:मातंगी जयंती की कहानी भगवान शिव के रूप में, देवी मातंगी अपने माथे पर एक अर्धचंद्राकार चंद्रमा पहनती हैं, और उनके अग्रभाग चारों दिशाओं की ओर निर्देशित होते हैं। इसलिए उन्हें वाग्देवी के नाम से भी जाना जाता है। Matangi Jayanti 2025 हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी मातंगी भी देवी सरस्वती का एक रूप है। ब्रह्मयाल के अनुसार मतंग नाम के एक मुनि ने कांडबवन में बहुत तपस्या और कठिनाइयाँ कीं, जिसके कारण उनकी आँखों से एक दिव्य और उज्ज्वल प्रकाश आया और उन्होंने एक महिला का रूप धारण किया। तब से, इस महिला को ऋषि मतंग की बेटी के रूप में माना जाता है और इस तरह इसे मातंगी के नाम से जाना जाने लगा। Importance of Matangi Jayanti:मातंगी जयंती का महत्व ऐसा माना जाता है कि देवी मातंगी की पूजा करने से भक्तों को जीवन के सभी सुख प्राप्त होते हैं, Matangi Jayanti 2025 सभी भय और कष्टों से मुक्ति मिलती है और उनकी सभी मनोकामनाएं और इच्छाएं पूरी होती हैं। ललित कला, नृत्य और संगीत में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए भक्त देवी मातंगी की पूजा करते हैं। Rituals of Matangi Jayanti:मातंगी जयंती का अनुष्ठान इस दिन, भक्तों द्वारा देवी की पूजा करने के लिए मूर्ति को वेदी पर रखा जाता है। एक बार यह हो जाने के बाद, उन्होंने एक दीया जलाया और अनुष्ठान शुरू किया। भक्तों द्वारा पवित्र भोजन तैयार किया जाता है और फूल, नारियल और माला के साथ देवता को चढ़ाया जाता है। फिर भक्त आरती करते हैं और मंत्रों का जाप करते हैं, बाद में भक्तों में प्रसाद वितरण किया जाता है।

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Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai:कब मनाई जाएगी परशुराम जयंती, जानिए यहां सही तिथि

Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai:भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था अतः उनकी शस्त्रशक्ति भी अक्षय है। भगवान शिव के दिव्य धनुष की प्रत्यंचा पर केवल परशुराम ही बाण चढ़ा सकते थे, यह उनकी अक्षय शक्ति का ही परिचय है। इन्हें विष्णु का छठा अवतार भी कहा जाता है। भगवान परशुराम को नियोग भूमिहार ब्राह्मण, चितपावन ब्राह्मण, त्यागी, मोहयाल, अनाविल और नंबूदिरी ब्राह्मण समुदाय मूल पुरुष या स्थापक के रूप में पूजते हैं। भगवान परशुराम के गायत्री मंत्र इस प्रकार हैं:ॐ ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि तन्नो राम: प्रचोदयात् ॥ ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि तन्नो परशुराम: प्रचोदयात् ॥ॐ रां रां ॐ रां रां परशुहस्ताय नम: ॥ आमतौर पर अक्षय तृतीया एवं परशुराम जयंती एक ही दिन होती है, Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai परन्तु तृतीया तिथि के प्रारंभ होने के आधार पर परशुराम जयंती, अक्षय तृतीया से एक दिन पूर्व भी हो सकती है। Parshuram Jayanti tithi2025 : हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान विष्णु के छठे अवतार  परशुराम जी की जयंती मनाई जाती है. इस साल यह 29 अप्रैल को मनाई जाएगी. आपको बता दें कि तृतीया तिथि 29 अप्रैल को शुरू होगी और 30 अप्रैल को दोपहर 02 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी. भगवान परशुराम का अवतार प्रदोष काल में हुआ है. इसलिए 29 अप्रैल को परशुराम जयंती मनाई जाएगी. ऐसे में आइए जानते हैं परशुराम जयंती को कौन से शुभ योग बन रहे हैं और पूजा विधि क्या होगी.  Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai:भगवान परशुराम के बारे में परशुराम जी की माता रेणुका तथा पिता का नाम मुनि जमदग्नि है। परशुराम जयंती भगवान परशुराम को रामभद्र, भार्गव, भृगुपति, भृगुवंशी तथा जमदग्न्य नाम से भी जाना जाता है। परशुराम दो शब्दों से मिलकर बना है, परशु अर्थात कुल्हाड़ी तथा राम। इन दो शब्दों को मिलाकर अर्थ निकलता है कुल्हाड़ी के साथ राम। भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के श्रेष्ठ जानकार थे। Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। कल्कि पुराण के अनुसार परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। भीष्म, गुरु द्रोण एवं कर्ण उनके जाने-माने शिष्य थे। भगवान परशुराम शिवजी के उपासक हैं। उन्होनें सबसे कठिन युद्धकला कलारिपायट्टू की शिक्षा शिवजी से ही प्राप्त की थी। हिन्दू धर्म में परशुराम के बारे में यह मान्यता है, कि वे त्रेता युग एवं द्वापर युग से कलयुग के अंत तक अमर हैं। परशुराम जयंती शुभ योग 2025 – Parshuram Jayanti Auspicious Yoga 2025 परशुराम जयंती पर सौभाग्य का योग बन रहा है. यह योग 3:54 मिनट तक है. इस दिन त्रिपुष्कर योग और सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है. अगर आप इन योगों में भगवान परशुराम की पूजा करते हैं, तो फिर देवी लक्ष्मी की आप पर कृपा बरसेगी.  परशुराम जयंती पूजा विधि – Method of worship of Parshuram Jayanti इस दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाएं. इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करके दिन की शुरूआत करें. फिर आप घर की साफ-सफाई करिए. अब आप नहाने वाले पानी में गंगाजल मिक्स करके स्नान करिए. Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai अब आप सूर्य देव को जल का अर्घ्य दीजिए. फिर आप भगवान परशुराम की विधि-विधान से पूजा करिए. वहीं, इस दिन आप प्रदोष काल में भगवान परशुराम का व्रत करते हैं और उपवास भी रखते हैं, तो इस व्रत का फल दोगुना हो जाएगा… Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai परशुराम से जुड़ी मान्यता पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,  सभी अवतारों के विपरीत, परशुराम जी वर्तमान में भी पृथ्वी पर ही निवास करते हैं. यही कारण है कि भगवान राम और श्री कृष्ण की तरह परशुराम की पूजा नहीं की जाती है. Parshuram Jayanti 2025 Mai Kab Hai आपको बता दें कि दक्षिण भारत में, उडुपी के पास पवित्र स्थान पजाका में, एक परशुराम जी का मंदिर भी है. परशुराम जी को लेकर यह भी कहा जाता है कि भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि को शस्त्र विद्या प्रदान करने वाले गुरु होंगे.  मान्यता यह भी है कि परशुराम जी भगवान राम और माता सीता के विवाह में भी शामिल हुए थे.

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Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:वल्लभाचार्य जयंती के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य

Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:वल्लभाचार्य भारत के इतिहास के एक महान संत थे जिन्होंने ईश्वर और उनकी भक्ति का एक अलग मार्ग खोजा था। इस महान संत ने भारत के ब्रज क्षेत्र में पुष्टि संप्रदाय की स्थापना की थी। इसी कारण से महाप्रभु वल्लभाचार्य को भगवान कृष्ण का प्रबल अनुयायी कहा जाता है। इतना ही नहीं वल्लभाचार्य को भक्ति आंदोलन का अहम हिस्सा माना जाता है। When is Mahaprabhu Vallabhacharya Jayanti celebrated:महाप्रभु वल्लभाचार्य जयंती कब मनाई जाती है? वल्लभाचार्य का जन्म हिंदू कैलेंडर के अनुसार वैशाख महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ था। इस कारण इसे वल्लभाचार्य जयंती के रूप में मनाया जाता है। Importance of Mahaprabhu Vallabhacharya Jayanti महाप्रभु वल्लभाचार्य जयंती का महत्व श्री वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई. में वाराणसी में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वल्लभाचार्य श्री कृष्ण के प्रबल अनुयायी थे। भगवान के कई भक्तों की तरह, वह भी एक सर्वोच्च शक्ति में विश्वास करते थे और श्रीनाथ जी की पूजा करते थे, जिन्हें भगवान कृष्ण का एक रूप माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब वल्लभाचार्य उत्तर-पश्चिम भारत की ओर बढ़ रहे थे, तो उन्होंने गोवर्धन पर्वत के पास एक असामान्य घटना देखी, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण से जुड़ी है। Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai उसने देखा कि पहाड़ पर एक विशेष स्थान पर एक गाय प्रतिदिन दूध दे रही है। एक दिन, वल्लभाचार्य ने एक विशिष्ट स्थान की खुदाई करने के बारे में सोचा और खुदाई में उन्हें भगवान कृष्ण की मूर्ति मिली। ऐसा कहा जाता है कि भगवान संत के सामने प्रकट हुए और उनके समर्पण के लिए उन्हें गले लगा लिया। उस दिन से पुष्टि संप्रदाय द्वारा भगवान कृष्ण की ‘बाल’ या युवा छवि की बड़ी भक्ति के साथ पूजा की जाने लगी। Where and how is Mahaprabhu Vallabhacharya Jayanti celebrated:महाप्रभु वल्लभाचार्य जयंती कहाँ और कैसे मनाते हैं? महाप्रभु वल्लभाचार्य की जयंती पूरे देश में विशेषकर गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों में भव्य तरीके से मनाई जाती है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं और अपने घरों और मंदिरों को सजाते हैं। Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai भक्त भगवान कृष्ण की मूर्ति को पवित्र स्नान कराते हैं और मंत्रों का जाप करते हैं। इसके साथ ही कई जगहों पर यज्ञों का भी आयोजन किया जाता है। Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai श्री महाप्रभुजी की बधाई सुनोंरी आज नवल बधायो हे ।श्री लक्ष्मण गृह प्रकट भये हें, श्री वल्लभ मन भायो हे ॥1॥ बाजत आवज ढोलक महुवर, घन ज्यों ढोल बजायो हे ।कोकिल कंठ नवल वनिता मिल, मंगल गायो हे ॥2॥ हरदी तेल सुगंध सुवासित, लालन उबट न्हावायो हे ।नखशिखलों आभूषण भूषित, पीताम्बर पहरायो हे ॥3॥ अशन वसन कंचन मणि माणिक, घरघर याचक पायो हे ।श्री विठ्ठल गिरिधरन कृपानिधि, पलनामांझ झुलायो हे ॥4॥ Vallabhacharya Jayanti 2025 date:वल्लभाचार्य जयंती 2025 तारीख वल्लभाचार्य जयंती की सराहना इस प्रचलित मान्यता के मद्देनजर की जाती है कि इस शुभ दिन पर, भगवान कृष्ण श्रीनाथजी के रूप में श्री वल्लभाचार्य के सामने प्रकट हुए थे। उत्तर भारत के पूर्णिमांत चंद्र कैलेंडर के अनुसार, ऐसा माना जाता है Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai कि उनका जन्म वैशाख महीने में कृष्ण पक्ष एकादशी को हुआ था, जबकि अमंत चंद्र कैलेंडर के अनुसार, उनका जन्म चैत्र महीने में कृष्ण पक्ष एकादशी को हुआ था। Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai हालाँकि, प्रत्येक कैलेंडर के महीनों के नामों में मामूली अंतर के साथ उनकी जयंती उसी दिन पड़ती है। यह दिन वरुथिनी एकादशी के साथ भी आता है। इस साल उनका 546वां जन्मदिन 24 अप्रैल मंगलवार को मनाया जाएगा। एकादशी तिथि शुरू – अप्रैल 23, 2025 को 16:43 बजे एकादशी तिथि समाप्त – अप्रैल 24, 2025 को 14:32 बजे About Mahaprabhu Vallabhacharya:महाप्रभु वल्लभाचार्य के बारे में Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:भगवान कृष्ण के प्रबल भक्त श्री वल्लभाचार्य ने साकार ब्रह्मवाद के दर्शन को प्रतिपादित किया, जिसका अर्थ है ईश्वर के अस्तित्व में आस्तिकता या विश्वास को महसूस करना जिसने ब्रह्मांड का निर्माण किया। इसके अलावा, ‘वल्लभ’ का अर्थ है ‘प्रिय’। श्री वल्लभाचार्य का जन्म भारत में हिंदू-मुस्लिम संघर्षों के अशांत समय में हुआ था। उसके माता-पिता ने भागने की प्रक्रिया के दौरान उसकी माँ के आतंक और शारीरिक तनाव के कारण उसे छोड़ दिया। समय से पहले बच्चे के रूप में, उसने जीवन के कोई लक्षण नहीं दिखाए; उसकी माँ ने उसे एक शमी के पेड़ के नीचे छोड़ दिया, लेकिन बाद में उसे गले लगा लिया जैसे आग ने एक स्वर्गीय आवाज के साथ पेड़ को घेर लिया, और बच्चे को भगवान कृष्ण का अवतार घोषित कर दिया। राजनीतिक रूप से, एक शत्रुतापूर्ण अवधि प्रबल हुई क्योंकि संस्कृति, परंपराओं, आस्था और धार्मिक पूजा स्थलों पर क्रूर हमले हुए। इस अवधि के दौरान भारतीय समाज में उत्तरजीविता एक भयानक मुद्दा बन गया। Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai उस समय धर्म की स्पष्ट समझ रखने वाले व्यक्ति से मार्गदर्शन प्राप्त करना समय की आवश्यकता बन गई। श्री वल्लभाचार्य उन लोगों के लिए एक उद्धारकर्ता के रूप में उभरे जिन्होंने उन्हें बिना किसी डर और झिझक के जीवन जीने का एक व्यावहारिक तरीका दिखाया। उन्होंने पुष्टिमार्ग के व्यावहारिक धर्मशास्त्र के सिद्धांत का पालन करने के लिए उनका मार्गदर्शन किया। इस प्रकार, श्री वल्लभाचार्य को महाप्रभु वल्लभाचार्यजी के रूप में जाना जाने लगा। Vallabhacharya story and importance:वल्लभाचार्य कहानी और महत्व Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai:वल्लभाचार्य जयंती से जुड़ी किंवदंती कहती है कि भारत के उत्तर-पश्चिम भाग की ओर बढ़ते हुए, उन्होंने गोवर्धन पर्वत के पास एक रहस्यमयी घटना देखी। उसने देखा कि पहाड़ के एक विशिष्ट स्थान पर एक गाय दूध बहा रही है। Vallabhacharya Jayanti 2025 Mai Kab Hai जब श्री वल्लभाचार्य ने उस स्थान की खुदाई शुरू की और भगवान कृष्ण की एक मूर्ति की खोज की, तो ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने उन्हें श्रीनाथजी के रूप में प्रकट किया और उन्हें गर्मजोशी से गले लगाया। उस दिन से, श्री वल्लभाचार्य के अनुयायी बड़ी भक्ति के साथ बाला या भगवान कृष्ण की किशोर छवि की पूजा करते हैं। तमिल कैलेंडर के अनुसार वरुथिनी एकादशी वल्लभाचार्य जयंती के साथ मेल खाता है, इसलिए यह दिन महत्वपूर्ण है। यह त्यौहार मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, चेन्नई, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ

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Method of Kanya Pujan in Navratri:कन्या पूजन कैसे करना चाहिए ? जानिए इसका सही तरीका और महत्व

Method of Kanya Pujan in Navratri:नवरात्रि में विधि-विधान से मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इसके साथ ही अष्टमी और नवमी तिथि को बहुत ही खास माना जाता है, क्योंकि इन दिनों कन्या पूजन का भी विधान है। ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि में कन्या की पूजा करने से सुख-समृद्धि आती है। इससे मां दुर्गा शीघ्र प्रसन्न होती हैं। पूजन के लिए आमंत्रित छोटी लड़कियों (कन्याओं) को कंजक / कंजकें भी कहा जाता है, अतः यह पूजा कंजक पूजन के नाम से भी प्रसिद्ध है। कन्या पूजन को कंजक पूजा के नाम से भी जाना जाता है। Method of Kanya Pujan in Navratri इस दौरान नौ छोटी लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ अवतारों के रूप में पूजा जाता है, जिन्हें नवदुर्गा भी कहा जाता है। तो आइए कन्या पूजन विधि और इससे जुड़ी कुछ बातों को जानते हैं Kanya Pujan कन्या पूजन / कंजक पूजा का शुभ मुहूर्त Navratri:नवरात्रि में अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन करना शुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त में कन्या की पूजा करना शुभ रहेगा। Method of Kanya Pujan in Navratri:कन्या पूजन की विधि अष्टमी के दिन कन्या की पूजा करने के लिए सबसे पहले सुबह उठकर स्नान कर लें।स्नान करने के बाद सबसे पहले विधि अनुसार भगवान गणेश और महागौरी की पूजा करें।कन्या पूजा के लिए दो साल से लेकर 10 साल तक की 9 लड़कियों और एक लड़के को घर पर बुलाएं। कन्याओं के पैर धोने के बाद उनके हाथों में रोली, कुमकुम और अक्षत का टीका लगाकर मौली बांधें। अब कन्या और बालक को दीप दिखाकर आरती उतारकर यथासम्भव उन्हें अर्पित करें। Method of Kanya Pujan in Navratri आमतौर पर कन्या पूजन के दिन लड़कियों को पुरी, चना और हलवा खाने के लिए दिया जाता है।भोजन के बाद लड़कियों को यथासंभव उपहार दिए जाते हैं। इसके बाद पैर छूकर उन्हें आशीर्वाद दें और मां की स्तुति करते हुए गलती के लिए माफी मांगें। उसके बाद, उन्हें आतिथ्य सत्कार के साथ विदा करें। Importance of Kanya Puja:कन्या पूजा का महत्व कन्या पूजन कन्याओं का सम्मान और पूजा करने का एक उत्तम तरीका है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कुमारी पूजा के लिए दो से दस साल की कन्या उपयुक्त होती हैं। दो से दस वर्ष तक की कन्याएं मां दुर्गा के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अलावा लंगूर के रूप में एक लड़के को भी इस पूजा में शामिल किया जाता है, जिसे भैरव बाबा व हनुमान जी का प्रतीक माना जाता है। Significance Of Kalash: सुख-समृद्धि का प्रतीक है कलश, जानिए इसके चमत्कारी लाभ Significance Of Kalash: हिंदू संस्कृति में कलश का विशेष महत्व है। कलश के गोल आकार को गर्भ के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जो प्रचुरता और जीवनदायी ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। Method of Kanya Pujan in Navratri इसका उपयोग सनातन धर्म के सभी शुभ कार्य में किया जाता है। कहा जाता है कि कलश के बिना कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। तो चलिए इसके महत्व और इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य के बारे में जानते हैं, जो इस प्रकार हैं symbol of happiness and prosperity:सुख-समृद्धि का प्रतीक कलश प्रचुरता, समृद्धि और आध्यात्मिक पवित्रता का आधार है। यह आमतौर पर पवित्र गंगा नदी के पानी से भरा होता है, जो अपने जीवनदायी और शुद्ध करने वाले गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं। कलश के भीतर मौजूद यह जल उस दिव्य ऊर्जा का प्रतीक है, Method of Kanya Pujan in Navratri जिसके बारे में कहा जाता है कि यह सभी प्रकार के दुखों को दूर करता है। हिंदू परंपराओं में जल, दिव्य ऊर्जा और जीवन और सृजन के चल रहे चक्र के बीच पवित्र संबंध को उजागर करता है। Benefits of installing Kalash:कलश स्थापित करने के लाभ कलश धार्मिक अनुष्ठानों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसे शादियों, पूजा- पाठ आदि में शुभता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया जाता है। इसके साथ ही यह सुरक्षात्मक के रूप में भी कार्य करता है। Method of Kanya Pujan in Navratri मान्यताओं के अनुसार, कलश के प्रभाव से सकारात्मक शक्तियों का घर में वास होता है और जीवन से नकारात्मकता समाप्त होती है। इसके अलावा इसका प्रयोग जीवन में धन, वैभव, सुख- शांति की कमी नहीं होने देता है। Method of Kanya Pujan in Navratri इसलिए ज्योतिष शास्त्र में भी इसे बेहद शुभ माना गया है।

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Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date:कालभैरव की आराधना से पाएं सुख और समृद्धि। जानें तिथि और पूजा विधि

Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date:कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला एक हिंदू त्यौहार है जोकि भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव को समर्पित है। प्रत्येक माह में आने के कारण यह त्यौहार एक वर्ष में कुल 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति में 13 बार मनाया जाता है। Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date काल भैरव को पूजे जाने के कारण इसे काल भैरव अष्टमी अथवा भैरव अष्टमी भी कहा जाता है। मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष को आने वाली मास में पड़ने वाली कालाष्टमी सबसे अधिक प्रसिद्ध है जिसे कालभैरव जयंती के नाम से जाना जाता है। कालाष्टमी के रविवार अथवा मंगलवार के दिन पड़ने पर इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि साप्ताह के ये दिन भी भगवान भैरव को समर्पित माने जाते हैं। Vaishakh Kalashtami Vrat Kab Hai:कालाष्टमी व्रत कब है? रविवार, 20 अप्रैल 2025वैशाख कृष्ण अष्टमी – 20 अप्रैल 7:00 PM – 21 अप्रैल 6:58 PM Vaishakh Kalashtami puja ke bare Mai:कालाष्टमी पूजा के बारे में Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date कालाष्टमी, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। जो हर मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। कालाष्टमी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान शिव के अंश से उत्पन्न हुए भगवान काल भैरव की आराधना और नियमानुसार उनका व्रत करना बहुत लाभदायक माना जाता है। Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date भक्तगण कालाष्टमी को भैरवाष्टमी के नाम से भी जानते हैं। चलिए इस लेख में जानेंगे कि 2025 में कब है कालाष्टमी पूजा? कालाष्टमी पूजा 2025 कब है? कालाष्टमी पर किसकी पूजा होती है? Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date यह दिन भगवान काल भैरव को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। काल भैरव को काल का देवता भी कहा जाता है। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने से काल भय दूर होता है और दीर्घायु का वरदान मिलता है। ऐसा माना जाता है कि कालाष्टमी के दिन की गई पूजा से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। कालाष्टमी महत्व कालाष्टमी के दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date शिव को काल का देवता भी माना जाता है, इसलिए इस दिन कालाष्टमी का नाम पड़ा है। इस दिन काल भैरव की पूजा-अर्चना से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। इस दिन सच्चे मन से पूजा पाठ करने से रोगों से भी छुटकारा मिलता है और परिवार के समस्त जन भी स्वस्थ और सुखी जीवन जीते हैं। भगवान काल भैरव में शिवजी का रौद्र भाव समाया हुआ है, Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date और ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव ने बुरी शक्तियों का नाश करने के लिए यह रौद्र अवतार धारण किया था। भगवान काल भैरव सभी नकारात्मकता और बुरी शक्तियों से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date कालाष्टमी के दिन शिव की पूजा करने से जीवन में शांति, समृद्धि और सुख प्राप्त होता है। Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date कालाष्टमी पर कुत्तों को खाना खिलाने की भी प्रथा है क्योंकि काले कुत्ते को भगवान भैरव का वाहन माना जाता है और इसीलिये इन्हें भोजन देना काफी शुभ माना जाता है। कुत्तों को इस शुभ दिन पर दूध या दही खिलाया जा सकता है। कालाष्टमी की शुभ तिथि पर काशी जैसे हिंदू तीर्थ स्थानों पर ब्राह्मणों को भोजन खिलाना भी बेहद शुभ व अत्यधिक लाभकारी माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन पूजन और व्रत करने वाले जातकों पर तंत्र-मंत्र का असर भी नहीं होता। Vaishakh Kalashtami puja vidhi कैसे करें कालाष्टमी की पूजा? कालाष्टमी की पूजा सामग्री Vaishakh Kalashtami Vrat 2025 date:कालाष्टमी व्रत के लाभ कालाष्टमी के दिन करें ये विशेष उपाय कालाष्टमी के दिन इन बातों का रखें खास ध्यान

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Krishna Janmashtami 2025: साल 2025 में कब-कब रखा जाएगा मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत? यहां देखें पूरी लिस्ट

Krishna Janmashtami 2025:भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रप्रद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। हिंदू धर्म में इस दिन को हर साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बाल गोपाल के भक्त भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव बहुत धूमधाम से मनाते हैं। भगवान कृष्ण की पूजा के लिए हर महीने मासिक कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। Krishna Janmashtami 2025 मासिक जन्माष्टमी हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल की साधना या व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। जिन लोगों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आती हैं, अगर वे इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा करें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। Krishna Janmashtami 2025:मासिक जन्माष्टमी व्रत का महत्व हिंदू धर्म ग्रंथों में भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव पर रखे जाने वाले व्रत की अपार महिमा बताई गई है, जिसे विधि-विधान से करने पर व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं जल्द ही पूरी हो जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि Krishna Janmashtami 2025 जन्माष्टमी का व्रत करने से व्यक्ति के जीवन से जुड़ी सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं और उसे जीवन से जुड़ी सभी खुशियां मिलती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह व्रत व्यक्ति को अकाल मृत्यु और पाप कर्मों से बचाकर मोक्ष प्रदान करता है। हिंदू धर्म में जन्माष्टमी के व्रत का बहुत ही विशेष महत्व माना जाता है। जन्माष्टमी का व्रत एक हजार एकादशियों के व्रत के बराबर है। इस दिन कृष्ण भक्त पूजा-अर्चना के साथ-साथ पूरे दिन व्रत रखते हैं और रात 12 बजे भगवान के जन्म के बाद व्रत समाप्त करते हैं। Masik Krishna Janmashtami 2025 List: हिंदू धर्म में मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का दिन बहुत ही विशेष और पवित्र माना जाता है. ये दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु के द्वापर युग के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित किया गया है. Krishna Janmashtami 2025 मासिक कृष्ण जन्माष्टमी को कृष्ण के श्री जन्मदिन के रूप में मनाने की मान्यता है. हर महीने होती है मासिक जन्माष्टमी हर महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक जन्माष्टमी मनाई जाती है. Masik Krishna Janmashtami 2025 मासिक जन्माष्टमी पर व्रत भी रखा जाता है. हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजन और व्रत करने वालों के घर में सुख-शांति और ससृद्धि का वास सदा बना रहता है. ऐसे में आइएं जानते हैं कि इस साल मासिक जन्माष्टमी का व्रत कब-कब है. Krishna Janmashtami 2025 list:मासिक जन्माष्टमी 2025 लिस्ट Magh Masik Krishna Janmashtami 2025: कब है साल की पहली मासिक कृष्ण जन्माष्टमी? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त Krishna Janmashtami 2025 Puja vidhi:मासिक जन्माष्टमी पूजा विधि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लेना चाहिए. इसके बाद भगवान कृष्ण का ध्यान करके व्रत का संकल्प करना चाहिए. इस दिन लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान करवाना चाहिए. इसके बाद उन्हें पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करवाना चाहिए. फिर उन्हें कपड़े पहनाने चाहिए. उनका श्रृंगार करना चाहिए. फिर भगवान को माखन मिश्री का भोग लगाना चाहिए. उनके भोग में तुलसी भी अववश्य डालनी चाहिए. उनके सामने घी का दिया प्रज्वलित करना चाहिए. श्री कृष्ण के मंत्रों का जाप करना चाहिए. अंत में उनकी आरती करके पूजा संपन्न करनी चाहिए. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर जो भी व्रत और पूजन करता है उसे यश, कीर्ति, धन और वैभव प्राप्त होता है. साथ ही इस दिन व्रत और भगवान श्री कृष्ण के पूजन से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. Krishna Janmashtami bhog ke uppay:भोग के उपाय मासिक जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण का आशीर्वाद पाना है तो गाय को चारा खिलाने का आसान उपाय करें. मासिक जन्माष्टमी पर अगर श्रीकृष्ण को भोग के रूप में लड्डू, माखन, मिश्री अर्पित करें तो व मोर पंख चढ़ाएं तो घर में खुशहाली आएगी.  मासिक जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण को तुलसी दल और खीर का भोग अर्पित करने से घर की समृद्धि बढ़ती है.  श्री कृष्ण की कृपा पाने के लिए मासिक जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल की सेवा करें. अच्छे अच्छे भोग अर्पित करें. Masik Krishna Janmashtami 2025:मासिक जन्माष्टमी पर गुप्त रूप से करें ये उपाय, श्रीकृष्ण देंगे अपार कृपा और समृद्धि !  संतान के लिए उपाय  मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पर अगर श्रीकृष्ण को मोर पंख अर्पित करें को घर में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है. संतान पक्ष की समस्याएं दूर होती है.  मासिक जन्माष्टमी पर संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करना अति शुभ होता है. इस उपाय को करने से संतान रोग दोष से दूर रहती है.

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Vikat Sankashti Chaturthi 2025: कब है 2025 में विकट संकष्टी चतुर्थी, जाने पूजा मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व और इस दिन किये जाने वाले उपाय

Vikat Sankashti Chaturthi kab hai: विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत विघ्न हर्ता भगवान गणेश को समर्पित हैं. यह व्रत हर साल वैशाख माह के कृष्ण पक्षकी चुतथी तिथि को रखा जाता है. मान्यता है कि इस व्रत करने से व्यक्ति के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और सुख-समद्धि आती है. Vikat Sankashti Chaturthi 2025: गणेश संकष्टी चतुर्थी व्रत का हिन्दू धर्म मे विशेष महत्व होता है। हिंदी पंचांग के अनुसार संकष्टी चतुर्थी महीने में दो बार पड़ती है। एक शुक्ल पक्ष में तो दूसरा कृष्ण पक्ष में, हिंदी पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुथी तिथि को विकट संकष्टी चतुथी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत भगवान गणेश जी को समर्पित होता है। Vikat Sankashti Chaturthi 2025 इसलिए आज के दिन यानी गणेश चतुर्थी के दीन भगवान गणेश की पूरे विधि विधान के साथ व्रत और पूजन किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से और व्रत रखने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। और इस दिन भगवान चंद्रदेव की पूजा करने से चंद्रदोष से मुक्ति मिलती है। और हर तरह के तनाव भी दूर होता है। और आज के दिन जल का अर्घ देने से सभी मनोकामना पूरी होती है। विकट संकष्टी चतुर्थी व्रत कब है? 16 या 17 अप्रैल, जाने सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन किया जाने वाले उपाय – विकट संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि Vikat Sankashti Chaturthi 2025 Puja Vidhi विकट संकष्ट चतुर्थी के दिन शुभ मुहूर्त में गणेश जी की मूर्ति को पंचामृत से स्न्नान करा कर सिंदूर, दूर्वा, गंध, अक्षत, अबीर, गुलाल, सुंगधित फूल, जनेऊ, सुपारी, पान, मौसमी फल अर्पित करें. Vikat Sankashti Chaturthi 2025 पूजा के समय गणेश जी की मूर्ति न होने पर एक साबुत सुपारी को ही गणेश जी मानकर पूजन किया जा सकता है. फिर दूर्वा अर्पित करके मोदक का प्रसाद लगाएं एवं दीप-धूप से उनकी आरती कर लें. Vikat Sankashti Chaturthi 2025:विकट संकष्टी चतुर्थी उपाय Vikat Sankshti Vrat Upay Vikat Sankashti Chaturthi 2025:संकष्टी चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित होती है। इस इस भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसलिए भगवान गणेश जी को प्रसन्न करके किसी भी कार्य में सफलता पाना चाहते हो तो विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश जी को पूजा के दौरान गुड़ और तिल से बने लड्डू का भोग लगाना चाहिए। संकष्टी चतुर्थी के दिन भूलकर कर भी चंद्रमा का दर्शन नही करना चाहिए और नाही चंद्रमा को दूध का अर्घ देना चाहिए। शास्त्रो के अनुसार संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत को भुलकर भी लहसुन, प्याज, मूली आदि नही खाना चाहिए। इसके अलावा मास, मछली को हाथ भी नही लगाना चाहिए। यदि अपनी संतान की प्रगति करना चाहते है तो गणेश चतुर्थी के दिन सफेद या पिले रंग का कपड़ा पहनकर भगवान गणेश जी की पूजा करने से संतान की उन्नति होती है। और उसकी सभी परेशानिया दूर होती है। यदि विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश जी को 5 हल्दी की गांठ चढ़ाने से और इस मंत्र (श्री गणाधिपतये नम:) का जाप करने से सभी मनोकामना पूरी होती है। ऐसी मान्यता है कि विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश जी को लाल वस्त और लाल चंदन अर्पित करने से मानसिक तनाव दूर होता है। और मन को शांति मिलती है। Rinharta Ganesh Stotra:ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र: कर्ज से मुक्ति पाने का चमत्कारी उपाय विकट संकष्टी चतुर्थी 2025 शुभ मुहूर्त Vikat Sankashti Chaturthi 2025 Date Time पंचांग के अनुसार, वैशाख माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 16 अप्रैल को दोपहर 1 बजकर 16 मिनट पर होगी. वहीं तिथि का समापन 17 अप्रैल को दोपहर 3 बजकर 23 मिनट पर होगा. इस दिन चंद्रोदय के समय पूजा का विधान है. ऐसे में 16 अप्रैल को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी मनाई जाएगी. भगवान गणेश के मंत्र| Vikat Sankashti Chaturthi Puja Mantra ॐ गं गणपतये नमः वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ. निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा विकट सकंष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व| Vikat Sankashti Chaturthi Mahatva धार्मिक मान्यता के अनुसार, विकट सकंष्टी चतुर्थी के दिन व्रत करने और विधिपूर्वक भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं. साथ ही घर-परिवार में चल रही सभी समस्याओं का समाधान निकल जाता है और जातक के सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है. Vikat Sankashti Chaturthi 2025 date:  हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जाता है. यह दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है. Vikat Sankashti Chaturthi 2025 इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने वालों पर भगवान गणेश की गणेश की विशेष कृपा बरसती है. इस व्रत में चतुर्थी तिथि में चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य का महत्व होता है. मान्यता है कि ऐसा करने से मानसिक शांति,कार्यों में सफलता, प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है. Shri Ganesh Shendur Laal Chadhayo Aarti:श्री गणेश – शेंदुर लाल चढ़ायो आरती

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Kamada Ekadashi 2025 Importance : कामदा एकादशी पर श्री हरि को अर्पित करें ये खास चीजें, धन-धान्य से भरा रहेगा जीवन

Kamada Ekadashi 2025 Importance:कामदा एकादशी (Kamada Ekadashi 2025) का व्रत बहुत शुभ माना जाता है। यह हर साल चैत्र माह की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन साधक भगवान विष्णु और धन की देवी मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन श्री हरि की पूजा करने से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है और कष्टों का नाश होता है। Kamada Ekadashi 2025 Importance: हिंदू धर्म में कामदा एकादशी एक महत्वपूर्ण और पुण्यकारी व्रत है. यह चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है. यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसे करने से व्यक्ति के सभी पाप और कष्ट दूर होते हैं. मान्यता है कि कामदा एकादशी का व्रत करने से ब्रह्महत्या और अनजाने में किए गए सभी पापों से मुक्ति मिलती है. Kamada Ekadashi 2025 Importance कामदा एकादशी व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. Kamada Ekadashi 2025 Importance यह व्रत मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी लाभकारी है. कामदा एकादशी की कथा सुनने से वाजपेय यज्ञ का पुण्य मिलता है. पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 07 अप्रैल को रात 08 बजे शुरू होगी और 08 अप्रैल को रात 09 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी. उदया तिथि के अनुसार, 08 अप्रैल को कामदा एकादशी मनाई जाएगी. Kamada Ekadashi 2025 Importance कामदा एकादशी का पारण 09 अप्रैल को किया जाएगा. व्रती लोग 09 अप्रैल को सुबह 06 बजकर 02 मिनट से लेकर सुबह 08 बजकर 34 मिनट के मध्य पारण कर सकते हैं. इस दौरान साधक गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान करें। इसके बाद विधिवत लक्ष्मी नारायण की पूजा करें। Kamada Ekadashi 2025 Importance पूजा समाप्त होने के बाद अन्न दान कर व्रत खोलें। Kamada Ekadashi vrat puja vidhi कामदा एकादशी व्रत पूजा विधि आज कामदा एकादशी पर पढ़ें यह व्रत कथा, पापों से मिलती है मुक्ति Kamada Ekadashi vrat paran कामदा एकादशी व्रत पारण एकादशी का व्रत रखने के साथ शुभ मुहूर्त में पारण करना बेहद जरूरी है. कामदा एकादशी व्रत पारण अगले दिन 06 बजकर 02 मिनट से 08 बजकर 34 मिनट के बीच किया जाएगा. Kamada Ekadashi 2025 Importance कामदा एकादशी का व्रत करने से सांसारिक जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है. एकादशी का व्रत रखने से पापों का नाश होता है और साधक के पूर्वजों को भी मुक्ति मिलती है. Kamada Ekadashi 2025 Kab Hai : अप्रैल माह का पहला एकादशी व्रत कब है? जानें डेट, पूजन व व्रत पारण का समय Kamada Ekadashi per kya kare कामदा एकादशी पर क्या करें Kamada Ekadashi 2025 Importance:कामदा एकादशी महत्व Kamada Ekadashi 2025 Importance:पद्म पुराण के अनुसार, कामदा एकादशी का व्रत करने से ब्रह्महत्या और अनजाने में किए हुए सभी पापों से छुटकारा मिलता है. कामदा एकादशी पिशाचत्व आदि दोषों का भी नाश करने वाली मानी गई है. Kamada Ekadashi 2025 Importance ऐसा कहते हैं कि कामदा एकादशी का व्रत करने और इसकी कथा सुनने से वाजपेय यज्ञ का पुण्य मिलता है. Kamada Ekadashi Date 2025 Hindi : कामदा एकादशी के दिन क्या करें क्या नहीं? जानें जरूरी नियम श्री हरि को चढ़ाएं ये खास चीजें (Vishnu ji Ko Chadhaye Ye Chijen) मेष राशि: मेष राशि के लोगों को कामदा एकादशी पर विष्णु भगवान को लाल फूल अर्पित करने चाहिए। वृषभ राशि: वृषभ राशि के जातक को इस दिन पर श्री हरि को पंचामृत चढ़ाना चाहिए। मिथुन राशि: मिथुन राशि के लोगों को इस तिथि पर विष्णु जी को तुलसी पत्र अर्पित करने चाहिए। कर्क राशि: कर्क राशि के जातकों को कामदा एकादशी पर नारायण को धनिया की पंजीरी का भोग लगाना चाहिए। सिंह राशि: सिंह राशि वालों को इस तिथि पर श्री हरि को लाल रंग के वस्त्र चढ़ाने चाहिए। कन्या राशि: कन्या राशि के लोगों को इस मौके पर भगवान विष्णु को मोर का पंख चढ़ाना चाहिए। तुला राशि: तुला राशि के लोगों को कामदा एकादशी पर श्री हरि को दही-चीनी अर्पित करनी चाहिए। वृश्चिक राशि: वृश्चिक राशि के जातकों को इस अवसर पर नारायण को लाल चंदन चढ़ाना चाहिए। धनु राशि: धनु राशि के लोगों को इस दिन भगवान विष्णु को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करने चाहिए। मकर राशि: मकर राशि के लोगों को इस तिथि पर नारायण को शमी के फूल चढ़ाने चाहिए। कुंभ राशि: कुंभ राशि के जातकों को कामदा एकादशी पर भगवान विष्णु को शमी के पत्ते चढ़ाने चाहिए। मीन राशि: मीन राशि वालों को इस तिथि पर भगवान विष्णु को गोपी चंदन का तिलक लगाना चाहिए। कामदा एकादशी का महत्व

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Puthandu 2025 Date : कब और कैसे मनाया जाता है पुथांडु का पर्व? जानें इसकी मान्यता

Puthandu 2025:तमिल नव वर्ष की शुरुआत को पुथांडु कहा जाता है। तमिलनाडु के साथ-साथ आस पास के क्षेत्रों में भी इस पर्व को बड़े ही उत्साह और पारम्परिक तरीके से मनाया जाता है। यह पर्व तमिल लोगों में बहुत ही महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं तमिल नव वर्ष यानी पुथांडु कब और कैसे मनाया जाता है। पुथांडू, जिसे पुथुवरुदम के नाम से भी जाना जाता है, तमिल नव वर्ष का प्रतीक है और यह तमिल कैलेंडर का पहला दिन या चिथिराई महीने का पहला दिन है जिसे तमिलनाडु के लोगों द्वारा पुथांडू के रूप में मनाया जाता है। तमिल नव वर्ष के रूप में मनाया जाने वाला यह दिन बहुत महत्व रखता है। पुथांडू ग्रेगोरियन कैलेंडर में हर साल लगभग एक ही दिन पड़ता है। इस वर्ष, पुथांडू 14 अप्रैल को मनाया जाएगा पुथंडु,Puthandu जिसे तमिल नव वर्ष या वरुशा पिरप्पु के नाम से भी जाना जाता है, दुनिया भर में तमिल समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक खुशी और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है। यह तमिल कैलेंडर की शुरुआत का प्रतीक है और पारंपरिक अनुष्ठानों, प्रार्थनाओं और उत्सवों के साथ मनाया जाता है जो नवीकरण, समृद्धि और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। Puthandu 2025 इस लेख में, हम पुथंडु के रीति-रिवाजों, रीति-रिवाजों, महत्व और आध्यात्मिक सार के बारे में विस्तार से बताएंगे, जिसमें इस शुभ अवसर से जुड़ी प्रार्थना और त्योहार मनाने की प्रक्रिया भी शामिल है। Puthandu 2025:क्या है मान्यता तमिल लोगों द्वारा पुथांडु का त्योहार बहुत ही महत्वपूर्ण और शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष दिन से भगवान ब्रह्म ने सृष्टि का निर्माण शुरू किया था। Puthandu 2025 साथ ही इस तिथि पर भगवान इंद्र स्वयं धरती पर लोगों के कल्याण के लिए उतरे थे। Puthandu 2025 माना जाता है कि इस दिन पर पूजा करने से व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति होती है। साथ ही उनका पूरा वर्ष अच्छा बीतता है। कैसे मनाया जाता है यह पर्व पुथांडु को तमिल लोग बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। इस दिन को पुथुरूषम एवं वरुषा पिरप्पु के नाम से भी जाना जाता है। इस खास मौके पर लोग अपने घर की अच्छे से साफ-सफाई करते हैं। साथ ही घर को रंगोली से घर को सजाया जाता है, जिसमें चावल के आटे का भी उपयोग किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार ऐसा करने से जो सौभाग्य आता है। इसके बाद लोग पारंपरिक वस्त्र धारण करके अपने आराध्य देव की पूजा-अर्चना करते हैं। Puthandu 2025 साथ ही मंदिर जाकर भी भगवान का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। इस दिन पर चावल की खीर का भोग लगाने का विशेष महत्व माना गया है। इसी खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस दिन शाकाहारी भोजन ही किया जाता है। पुथांडू का इतिहास पुथांडू की उत्पत्ति चोल राजवंश के शासनकाल से लगाया जा सकता है, जिसने 9वीं से 13वीं शताब्दी तक तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों पर शासन किया था। इस दौरान, तमिल कैलेंडर बनाया गया और चिथिराई के पहले दिन को तमिल नव वर्ष के रूप में नामित किया गया। पुथांडू का महत्व तमिल सौर कैलेंडर का पहला महीना, चिथिराई, पुथांडू उत्सव के साथ शुरू होता है। इस दिन को तमिलनाडु और श्रीलंका में सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया जाता है। अन्य राज्य भी इसी दिन नया साल मनाते हैं। Puthandu 2025 इस दिन पश्चिम बंगाल पोहेला बोइशाख मनाता है, केरल विशु मनाता है, पंजाब बैसाखी मनाता है और असम इस दिन बिहू मनाता है। पुथंडु,Puthandu पर पूजा और त्यौहार मनाने की प्रक्रिया  कोलम और सजावट –  Puthandu 2025 पुथंडु की शुरुआत घरों और मंदिरों के सामने कोलम (रंगोली डिज़ाइन) बनाने की पारंपरिक कला से होती है। ये जटिल और रंगीन पैटर्न चावल के आटे या रंगीन पाउडर का उपयोग करके तैयार किए जाते हैं, जो समृद्धि, स्वागत और शुभता का प्रतीक हैं। घरों को आम के पत्तों, फूलों और पारंपरिक रूपांकनों से सजाया जाता है। मंदिरों की यात्रा –  पुथंडु पर, परिवार प्रार्थना करने और नए साल के लिए आशीर्वाद मांगने के लिए मंदिरों में जाते हैं। भगवान विष्णु, भगवान शिव और देवी लक्ष्मी जैसे देवताओं को समर्पित मंदिरों में विशेष पूजा (अनुष्ठान), अभिषेकम (देवताओं का पवित्र स्नान), और आराधना (प्रसाद) किए जाते हैं। नीम के फूल का रसम – पुथंडु का एक अनोखा पहलू नीम के फूल के रसम की तैयारी है, जो नीम के फूल, इमली, गुड़ और मसालों से बना एक विशेष व्यंजन है। नीम अपने औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है, और शरीर को शुद्ध करने और बीमारियों को दूर करने के लिए पुथंडु के दौरान रसम का सेवन किया जाता है। दावत और पारिवारिक जमावड़ा –  पुथांडू आम पचड़ी, वड़ा, पायसम और चावल की किस्मों जैसे पारंपरिक तमिल व्यंजनों पर दावत का समय है। परिवार भोजन साझा करने, उपहारों का आदान-प्रदान करने और नए साल के अवसरों का स्वागत करते हुए पिछले वर्ष के आशीर्वाद के लिए आभार व्यक्त करने के लिए एक साथ आते हैं। सांस्कृतिक प्रदर्शन –  तमिल संस्कृति, कला और साहित्यिक परंपराओं को प्रदर्शित करने के लिए Puthandu 2025 पुथंडु के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत समारोह, नृत्य प्रदर्शन और कहानी सत्र आयोजित किए जाते हैं। कोलट्टम और भरतनाट्यम जैसे लोक नृत्य उत्सव के माहौल को बढ़ाते हैं।

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