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Mahashivratri 2025: महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ की पूजा से मोक्ष की होगी प्राप्ति, जानें शुभ मुहूर्त और व्रत विधि

Mahashivratri 2025:महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण और पावन पर्व है, जो हर वर्ष फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन भगवान भोलेनाथ के भक्तों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस दिन भगवान शिव की पूजा और व्रत करने से सांसारिक कष्टों से. Mahashivratri 2025 : फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पावन पर्व प्रतिवर्ष मनाया जाता है. इस दिन का भगवान भोलेनाथ के भक्तों को बेसब्री से इंतजार रहता है. Mahashivratri 2025 इस दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा व्रत आदि करने से समस्त प्रकार के सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है. साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है. भगवान भोलेनाथ का इस दिन जलाभिषेक करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है. आइये विस्तार से जानते हैं शुभ मुहूर्त और व्रत की विधि. महाशिवरात्रि शुभ मुहूर्त : इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व 26 फरवरी बुधवार के दिन मनाया जाएगा. फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की तिथि का शुभारंभ 26 फरवरी को सुबह 11:00 बजे से शुरू होकर 27 फरवरी प्रातः 8:54 तक रहेगा. महाशिवरात्रि पर निश्चित कल में पूजा करने का फल अधिक माना जाता है. निश्चित कल में रात्रि 12:09 से 12:59 तक महादेव का रुद्राभिषेक करने के लिए यह समय सर्वोत्तम माना गया है. यह समय में तंत्र-मंत्र की सिद्धि एवं साधना आज के लिए अत्यंत शुभ होता है. महाशिवरात्रि व्रत विधि : भगवान शिव की पूजा-वंदना करने के लिए प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि (मासिक शिवरात्रि) को व्रत रखा जाता है. लेकिन सबसे बड़ी शिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी होती है. इसे महाशिवरात्रि भी कहा जाता है. वर्ष 2025 में महाशिवरात्रि का व्रत 14 फरवरी को रखा जाएगा. गरुड़ पुराण के अनुसार शिवरात्रि से एक दिन पूर्व त्रयोदशी तिथि में शिव जी की पूजा करनी चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इसके उपरांत चतुर्दशी तिथि को निराहार रहना चाहिए. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को जल चढ़ाने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है. शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराकर “ऊं नमो नम: शिवाय” मंत्र से पूजा करनी चाहिए. इसके बाद रात्रि के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए और अगले दिन प्रात: काल ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए. गरुड़ पुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव को बिल्व पत्र अर्पित करना चाहिए. भगवान शिव को बिल्व पत्र बेहद प्रिय हैं. शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को रुद्राक्ष, बिल्व पत्र, भांग, शिवलिंग और काशी अतिप्रिय हैं. Shiv Chalisa:शिव चालीसा शिव आरती – ॐ जय शिव ओंकारा (Shiv Aarti – Om Jai Shiv Omkara) Mahashivratri 2025:मेष राशि वाले आज करें इस मंत्र का जाप, वैवाहिक जीवन में आएगी खुशहाली, जानें 12 राशियों के लिए शिव मंत्र Mahashivratri 2025:पूजा विधि Mahashivratri 2025 भगवान शिव को प्रिय वस्तुएं Mahashivratri 2025:महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को विशेष रूप से कुछ चीजें अर्पित की जाती हैं, जिनमें मुख्य रूप से बिल्व पत्र, रुद्राक्ष, भांग, और काशी शामिल हैं। महाशिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के उपासकों के लिए बेहद खास होता है। इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करने से भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है और उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। महाशिवरात्रि का व्रत और पूजा न केवल भक्तों के लिए एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह उनकी मानसिक शांति और जीवन की दिशा को सही करने में भी मदद करता है।

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Devnarayan Jayanti:देवनारायण जयंती 2025: चमत्कारी देवता की कथा, पूजा विधि और महत्व

लोक देवता भगवान विष्णु के अवतार श्री देवनारायण Devnarayan Jayanti जी की जयंती गुर्जर एवं सर्व समाज के श्रद्धालुओं द्वारा प्रतिवर्ष पूरे देश में बड़ी धूमधाम से माघ मास के शुक्ल पक्ष में सूर्य सप्तमी को श्री देवनारायण जयंती मनाई जाती है। इस अवसर पर देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय स्तर पर झाँकी, शोभायात्रा, आरती और भंडारे जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस उत्सव में सभी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। देवनारायण जयंती कैसे मनाई जाती है?❀ गुर्जर समाज के देवता देवनारायण भगवान की जयंती पर गुर्जर समाज के लोग एक दिन का उपवास रखते हैं।❀ बाबा के दरबार में महिलाएं चूरमा चढ़ाते हैं।❀ शाम को देवनारायण जी के मंदिर में महाआरती कर प्रसाद वितरण किया जाता है।❀ रात्रि में भजन संध्या का आयोजन किया जाता है, इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी उपस्थित रहते हैं। कौन हैं देव नारायण जी Devnarayan Jayanti ? भगवान श्री देवनारायण Devnarayan Jayanti भगवान विष्णु के अवतार, कलयुग के अवतार हैं, उन्होंने हमेशा अपनी शक्तियों का उपयोग लोगों के कल्याण के लिए किया और हमेशा उनकी मदद की। उनके सुविचारों, आदर्श शासन, समता, अहिंसा, शांति के संदेश प्रचार करते थे। देवनारायण को गुर्जर समाज में भगवान के रूप में मान्यता प्राप्त है। स्थानीय लोगों के अनुसार जब देवनारायण को ज्ञान की प्राप्ति हुई तो उन्होंने अपने जीवनकाल में कई चमत्कार भी दिखाए। इसी बीच जब धार के राजा जयसिंह की पुत्री पीपलदे बहुत बीमार हो गई थी, तब देवनारायण ने अपनी शक्तियों से उसे ठीक किया। जिसके बाद रजामंदी से राजा जयसिंह ने उसकी शादी अपने साथ करा दी। माना जाता है कि देवनारायण ने सूखी नदी से पानी निकाला था। कहा जाता है कि भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद देवनारायण Devnarayan Jayanti को ज्ञान और शक्तियां प्राप्त हुईं, जिनका इस्तेमाल उन्होंने लोक कल्याण के लिए किया। यही कारण है कि उस समय से लेकर आज तक उन्हें विशेष रूप से गुर्जर समुदाय द्वारा भगवान के रूप में पूजा जाता है और उन्हें लोक देवता माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण की तरह देवनारायण भी गायों के रक्षक थे। प्रतिदिन प्रात:काल उठकर देवनारायण जी गौ माता के दर्शन करते थे उसके बाद ही वे आगे का कोई कार्य करते थे। लोक कथाओं के अनुसार देवनारायण ने अपने अनुयायियों से हमेशा गायों की रक्षा करने को कहा था। देवनारायण जयंती 2025: चमत्कारी देवता की कथा, पूजा विधि और महत्व देवनारायण जयंती Devnarayan Jayanti हर वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। भगवान देवनारायण को हिंदू धर्म में एक चमत्कारी और दिव्य अवतार माना जाता है। यह दिन विशेष रूप से राजस्थान और मध्य प्रदेश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। भगवान देवनारायण कौन हैं? भगवान देवनारायण को विष्णु जी का अवतार माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार, वे गुर्जर समुदाय के आराध्य देव हैं और उन्होंने समाज में धर्म और न्याय की स्थापना के लिए कई चमत्कार किए। उनका जन्म 10वीं शताब्दी में हुआ था, और वे अपने अद्भुत पराक्रम और दैवीय शक्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं। देवनारायण जयंती का महत्व इस दिन भगवान देवनारायण की पूजा करने से सुख-समृद्धि और परिवार में शांति बनी रहती है। भक्तों का विश्वास है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में सफलता मिलती है। विशेष रूप से राजस्थान के लोग इस दिन धूमधाम से उत्सव मनाते हैं। देवनारायण जयंती की पूजा विधि देवनारायण जयंती पर विशेष आयोजन राजस्थान में इस दिन भव्य शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं। विभिन्न स्थानों पर भजन-कीर्तन और जागरण का आयोजन होता है। इस पर्व पर लाखों श्रद्धालु भगवान देवनारायण के मंदिरों में दर्शन के लिए आते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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Ratha Saptami 2025 Date: कब और क्यों मनाई जाती है रथ सप्तमी? नोट करें शुभ मुहूर्त एवं पूजा विधि

Ratha Saptami 2025 Date:माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर वसंत पंचमी मनाई जाती है। इस दिन मां शारदे की पूजा की जाती है। इसके दो दिन बाद सूर्य देव को समर्पित रथ सप्तमी (Ratha Saptami 2025 Date) मनाई जाती है। वहीं रथ सप्तमी के अगले दिन भीष्म अष्टमी मनाई जाती है। भीष्म अष्टमी पर पितरों का तर्पण और पिंडदान भी किया जाता है। Ratha Saptami 2025 Date: हर वर्ष माघ माह में रथ सप्तमी मनाई जाती है। यह पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर मनाया जाता है। इस दिन आत्मा के कारक सूर्य देव की पूजा की जाती है। सनातन शास्त्रों में निहित है कि माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर सूर्य देव का अवतरण हुआ है। इस शुभ अवसर पर रथ सप्तमी मनाई जाती है। Ratha Saptami 2025: हिंदू धर्म में Ratha Saptami 2025 रथ सप्तमी के दिन सूर्यदेव की पूजा-उपासना का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि ऐसा करने से साधक को सुख-समृद्धि और खुशहाली का वरदान प्राप्त होता है और जीवन सुखमय रहता है। क्यों खास है रथ सप्तमी? रथ सप्तमी का दिन सूर्यदेव की पूजा-आराधना के लिए खास होता है। मान्यता है कि ऐसा करने से अक्षय फलों की प्राप्ति होती है और सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का वरदान प्राप्त होता है। रथ सप्तमी के दिन सूर्यदेव की पूजा करने से सभी सुखों की प्राप्ति होती है। साथ ही शारीरिक और मानसिक कष्टों से छुटकारा मिलता है। रथ सप्तमी शुभ मुहूर्त (Ratha Saptami Shubh Muhurat) पंचांग के अनुसार, माघ माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि की शुरुआत 04 फरवरी को सुबह 04 बजकर 37 मिनट पर होगी और अगले दिन 05 फरवरी को देर रात 02 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय होने के बाद तिथि की गणना की जाती है। अत: 04 फरवरी को रथ सप्तमी मनाई जाएगी। रथ सप्तमी के दिन स्नान का शुभ मुहूर्त सुबह 05 बजकर 23 मिनट से लेकर 07 बजकर 08 मिनट तक है। रथ सप्तमी शुभ योग (Ratha Saptami Shubh Yoga) ज्योतिषियों की मानें तो रथ सप्तमी तिथि पर शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का भी संयोग है। इन योग में सूर्य देव की पूजा-उपासना करने से साधक को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होगी। साथ ही शारीरिक एवं मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलेगी। रथ सप्तमी 2025 :पूजाविधि Ratha Saptami 2025 puja vidhi रथ सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठें। ब्रह्म मुहूर्त में पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। पीले रंग के वस्त्र धारण करें और सूर्यदेव की पूजा शुरू करें सबसे पहले तांबे के लोटे जलभर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। सूर्यदेव की विधि-विधान से पूजा करें। सूर्य मंत्र और सूर्य चालीसा का पाठ करें। इसके बाद सूर्यदेव की आरती उतारें। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Mauni Amavasya 2025: मौनी अमावस्या पर बनेगा अतिशुभ संयोग, जानें क्या करें क्या नहीं

Mauni Amavasya 2025 Upay: मौनी अमावस्या के दिन स्नान दान का विशेष महत्व है. साथ ही इस दिन लोग पितरों की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान तथा श्राद्ध करते हैं. इसके साथ मौनी अमावस्या पर कुछ ज्योतिष उपायों को कर व्यक्ति अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है. Mauni Amavasya 2025 Shubh Yog: वैदिक पंचांग के अनुसार माघ मास के कृष्णपक्ष की अंतिम तिथि को  मौनी अमावस्या है। इसे माघी या मौनी अमावस्या भी कहते हैं। इस बार माघी अमावस्या 29 जनवरी को है। सनातन धर्म में मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान करने की परंपरा है। इस शुभ अवसर पर भक्त गंगा तट पर स्नान करते हैं, ध्यान करते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मौनी अमावस्या के दिन गंगा में स्नान करने से जाने-अनजाने में किए गये पाप धुल जाते हैं। मां गंगा की कृपा भी भक्तों पर बरसती है। कुंडली में शामिल अशुभ ग्रहों से मुक्ति मिलती है।  इस बार माघी अमावस्या पर Mauni Amavasya 2025 कई शुभ संयोग का निर्माण हो रहा है। आइए जानते हैं कौन से हैं ये शुभ योग और इस दौरान क्या करना चाहिए क्या नहीं।  शिववास योग Mauni Amavasya 2025 मौनी अमावस्या पर दुर्लभ शिववास योग का संयोग बन रहा है। शिववास का संयोग मौनी अमावस्या यानी 29 जनवरी को सायं 06: 05 मिनट तक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव कैलाश पर मां गौरी के साथ विराजमान रहेंगे। सिद्धि योग Sidhi yog माघ अमावस्या या मौनी अमावस्या Mauni Amavasya 2025 पर सिद्धि योग का भी संयोग बन रहा है। सिद्धि योग का संयोग रात 09 बजकर 22 मिनट तक है। ज्योतिष शास्त्र में सिद्धि योग को शुभ मानते हैं। इस योग में भगवान शिव की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होगी।इसके अलावा मौनी अमावस्या Mauni Amavasya 2025 पर श्रवण एवं उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का संयोग बन रहा है। इन योग में भगवान शिव की पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होगी।   शुभ मुहूर्त Subh Murut माघ अमावस्या तिथि आरंभ: 28 जनवरी, सायंकाल 07:35 मिनट से माघ अमावस्या तिथि समाप्त: 29 जनवरी, सायंकाल 06: 05 मिनट पर उदयातिथि के अनुसार  29 जनवरी को माघी या मौनी अमावस्या मानी जाएगी। मौनी अमावस्या के दिन स्नान-ध्यान कर भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं। साथ ही पूजा के बाद दान-पुण्य कर सकते हैं। Ganesh Jayanti 2025: कब मनाई जाएगी गणेश जयंती? जानें सही तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि मौनी अमावस्या के दिन क्या करें ? Mauni Amavasya ke din kya kare मौनी अमावस्या के दिन क्या न करें? Mauni Amavasya ke din kya kare kya nhi इन चीजों का करें दान मौनी अमावस्या Mauni Amavasya 2025 के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने के साथ दान करना भी शुभ माना जाता है. ऐसे में आप जरूरत मंदों को वस्त्र तथा अन्न का दान कर सकते हैं. इसके अलावा पशु-पक्षियों को भोजन और दाना डालना अच्छा माना जाता है. कहते हैं इन कार्यों को करने से व्यक्ति को पितर दोष से मुक्ति मिलती है. बनेंगे बिगड़े काम मौनी अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण तथा पिंडदान करने के साथ दीपक जलाना भी बहुत जरूरी होता है. इस दिन घर की दक्षिण दिशा में दीपक जलाना चाहिए. इसके अलावा अगर घर में पितरों की तस्वीर है तो वहां भी एक दीपक जलाया जा सकता है.

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Basant Panchami 2025: बसंत पंचमी के दिन इस विशेष चालीसा का करें पाठ, मिलेगा सुख-समृद्धि का वरदान

Saraswati Chalisa: बसंत पंचमी के दिन ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा -अर्चना की जाती है. मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ मां सरस्वती की इस खास चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को ज्ञान और धन की प्राप्ति होती है. बसंत पंचमी हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो खासकर देवी सरस्वती की पूजा अर्चना के लिए प्रसिद्ध है। यह पर्व माघ मास की शुक्ल पंचमी तिथि को मनाया जाता है और इस वर्ष 2025 में यह 2 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन को बसंत ऋतु के आगमन के रूप में भी जाना जाता है, जो न केवल प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाता है, बल्कि जीवन में नयापन और समृद्धि का संचार भी करता है।  बसंत पंचमी का पर्व विशेष रूप से ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी सरस्वती की पूजा का पर्व है। इस दिन को विद्यार्थी अपने किताबों और लेखन सामग्री को पूजा करते हैं, ताकि उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो। इसके अलावा, यह दिन व्यापारियों, गृहस्थों और साधकों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसे धन की प्राप्ति और समृद्धि का दिन माना जाता है। बसंत पंचमी के दिन यदि हम विशेष रूप से देवी सरस्वती के चालीसा का पाठ करते हैं, तो इससे न केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है, बल्कि धन और समृद्धि भी मिलती है। खासकर यह चालीसा उन लोगों के लिए बेहद लाभकारी है जो शिक्षा, कला, साहित्य या किसी भी प्रकार के व्यवसाय में सफलता की कामना करते हैं। बसंत पचंमी कब है? Saraswati Panchami Kab hai हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 2 फरवरी को सुबह 9 बजकर 14 मिनट पर होगी. वहीं तिथि का समापन अगले दिन यानी 3 फरवरी को सुबह 6 बजकर 52 मिनट पर होगा. उदया तिथि के अनुसार, बसंत पंचमी का पर्व 2 फरवरी को मनाया जाएगा. बसंत पंचमी पर सरस्वती चालीसा का पाठ करने के लाभ Saraswati Panchami per saraswati chalisa ka path karne ke labh  ज्ञान की प्राप्ति: सरस्वती देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए चालीसा का पाठ करना विद्यार्थियों और ज्ञान की खोज करने वालों के लिए अत्यंत फलदायक होता है। समृद्धि और धन: सरस्वती देवी धन की देवी भी मानी जाती हैं। इस दिन उनका ध्यान करके और चालीसा का पाठ करके आर्थिक समृद्धि और व्यापार में उन्नति की कामना की जा सकती है। मन की शांति: चालीसा का नियमित पाठ मानसिक शांति और संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। यह तनाव को कम करने में भी सहायक है। सकारात्मकता का संचार: यह पाठ जीवन में सकारात्मकता लाता है और बुरी शक्तियों से बचाव करता है। बसंत पंचमी पर यदि आप अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ सरस्वती चालीसा का पाठ करते हैं, तो निश्चित रूप से आपकी शिक्षा, करियर और व्यवसाय में प्रगति होगी। साथ ही, जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का आगमन होगा। ॥ श्री सरस्वती चालीसा ॥ ॥ दोहा ॥ जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥ पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। दुष्जनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥ सरस्वती चालीसा चौपाई जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनासी॥ जय जय जय वीणाकर धारी.करती सदा सुहंस सवारी॥ रूप चतुर्भुजधारी माता.सकल विश्व अंदर विख्याता॥ जग में पाप बुद्धि जब होती.जबहि धर्म की फीकी ज्योती॥ तबहि मातु ले निज अवतारा.पाप हीन करती महि तारा॥ वाल्मीकिजी थे हत्यारा.तव प्रसाद जानै संसारा॥ रामायण जो रचे बनाई.आदि कवी की पदवी पाई॥ कालिदास जो भये विख्याता.तेरी कृपा दृष्टि से माता॥ तुलसी सूर आदि विद्धाना.भये और जो ज्ञानी नाना॥ तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा.केवल कृपा आपकी अम्बा॥ करहु कृपा सोइ मातु भवानी.दुखित दीन निज दासहि जानी॥ पुत्र करै अपराध बहुता.तेहि न धरइ चित्त सुंदर माता॥ राखु लाज जननी अब मेरी.विनय करूं बहु भांति घनेरी॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा.कृपा करउ जय जय जगदंबा॥ मधु कैटभ जो अति बलवाना.बाहुयुद्ध विष्णू ते ठाना॥ समर हजार पांच में घोरा.फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥ मातु सहाय भई तेहि काला.बुद्धि विपरीत करी खलहाला॥ तेहि ते मृत्यु भई खल केरी.पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥ चंड मुण्ड जो थे विख्याता.छण महुं संहारेउ तेहि माता॥ रक्तबीज से समरथ पापी.सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी॥ काटेउ सिर जिम कदली खम्बा.बार बार बिनवउं जगदंबा॥ जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा.छिन में बधे ताहि तू अम्बा॥ भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई.रामचन्द्र बनवास कराई॥ एहि विधि रावन वध तुम कीन्हा.सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा॥ को समरथ तव यश गुन गाना.निगम अनादि अनंत बखाना॥ विष्णु रूद्र अज सकहिं न मारी.जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥ रक्त दन्तिका और शताक्षी.नाम अपार है दानव भक्षी॥ दुर्गम काज धरा पर कीन्हा.दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥ दुर्ग आदि हरनी तू माता.कृपा करहु जब जब सुखदाता॥ नृप कोपित जो मारन चाहै.कानन में घेरे मृग नाहै॥ सागर मध्य पोत के भंगे.अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥ भूत प्रेत बाधा या दुःख में.हो दरिद्र अथवा संकट में॥ नाम जपे मंगल सब होई.संशय इसमें करइ न कोई॥ पुत्रहीन जो आतुर भाई.सबै छांड़ि पूजें एहि माई॥ करै पाठ नित यह चालीसा.होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा॥ धूपादिक नैवेद्य चढावै.संकट रहित अवश्य हो जावै॥ भक्ति मातु की करै हमेशा.निकट न आवै ताहि कलेशा॥ बंदी पाठ करें शत बारा.बंदी पाश दूर हो सारा॥ मोहे जान अज्ञनी भवानी.कीजै कृपा दास निज जानी ॥ ॥ दोहा ॥ माता सूरज कांति तव, अंधकार मम रूप.डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप॥ बल बुद्धि विद्या देहुं मोहि, सुनहु सरस्वति मातु.मुझ अज्ञानी अधम को, आश्रय तू ही दे दातु ॥॥ सरस्वती चालीसा के लाभ Saraswati chalisa ke labh मान्यता है कि सरस्वती चालीसा का पाठ करने से ज्ञान के मार्ग खुलते हैं. इससे मन शांत एवं एकाग्रचित्त रहता है. विद्यार्थियों को इसका पाठ जरूर करना चाहिए. सरस्वती चालीसा के पाठ से कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है.बुध ग्रह बुद्धि , वाणी , संगीत, व्यापार को प्रदर्शित करते हैं. सरस्वती चालीसा का पाठ करने वाले व्यक्ति का तेज बढ़ता है. उसे हर क्षेत्र में यश और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है. Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है. Basant Panchami 2025:बसंत पंचमी पर बन रहे हैं ये शुभ योग, इस दिन जरूर करें ये काम, मिलेगी हर जगह

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Basant Panchami 2025:बसंत पंचमी पर बन रहे हैं ये शुभ योग, इस दिन जरूर करें ये काम, मिलेगी हर जगह कामयाबी!

Basant Panchami Subh Yog: इस दिन महाकुंभ का शाही स्नान भी किया जाएगा। ऐसे में यह और ज्यादा फलदायक बन गया है। महाकुंभ 144 साल में एक बार ही आता है। ऐसे में यह संयोग भी 144 साल बाद ही आएगा। आइए बताते हैं कि इस दिन आपको क्या काम करना है। Basant Panchami 2025 Shubh Yog: बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है. मान्यता है कि इस दिन देवी सरस्वती हाथों में पुस्तक, विणा और माला लेकर श्वेत कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुई थीं. इस साल बसंत पंचमी के दिन कुछ शुभ योग बन रहे हैं, जिसमें कुछ विशेष कार्य करने से आपको शिक्षा से लेकर करियर और कारोबार में बड़ी सफलता हासिल हो सकती है. Basant Panchami 2025 Upay: हिंदू धर्म में बसंत पंचमी का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन ज्ञान और काल की देवी का प्राकट्य हुआ था. इस दिन मां सरस्वती और भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है. यह पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन से बसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है. कहते हैं इस दिन सच्चे मन से मां सरस्वती की आराधना की जाए तो, विद्यार्थियों को शिक्षा के क्षेत्र में शुभ परिणाम मिलते हैं. वहीं इस बार बसंत पंचमी के दिन कुछ दुर्लभ संयोग बन रहे हैं और ऐसे में कुछ खास कार्यों को करने से व्यक्ति को सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि कारोबार में धन लाभ भी होता है. बसंत पंचमी तिथि और शुभ मुहूर्त | Basant Panchami 2025 Date and Shubh Muhurat हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि की शुरुआत 2 फरवरी को सुबह 9 बजकर 14 मिनट पर होगी. वहीं तिथि का समापन 3 फरवरी को सुबह 6 बजकर 52 मिनट पर होगा, जिसके हिसाब से बसंत पंचमी का पर्व 2 फरवरी को मनाया जाएगा. इसके अलावा इस दिन मां सरस्वती और भगवान गणेश की पूजा करने के लिए शुभ मुहूर्त की शुरुआत 2 फरवरी को सुबह 7 बजकर 9 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगी. ऐसे में भक्तों को पूजा करने के लिए 5 घंटे 26 मिनट का समय मिलेगा. बसंत पंचमी शुभ योग |Basant Panchami 2025 Shubh Yog बसंत पंचमी के दिन शनिदेव सुबह 8 बजकर 51 मिनट पर पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में गोचर करेंगे, जहां 2 मार्च तक विराजमान रहेंगे. बसंत पंचमी के दिन शिव योग, सिद्ध योग साध्य योग और रवि योग का अद्भुत संयोग बन रहा है. इस दौरान किए गए कार्यों में शुभ फलों की प्राप्ति होती है. बसंत पंचमी पर क्या करें? Basant Panchami per kya kare बसंत पंचमी पर क्या करें? Basant Panchami per kya kare बसंत पंचमी के दिन काले, लाल या गहरे रंग के कपड़े पहनने से बचें. इस दिन मां सरस्वती आपके कंठ में विराजमान होती है, इसलिए भूलकर भी किसी के लिए बुरा ना बोलें साथ ही किसी का अपमान ना करें. इसके अलावा तामसिक भोजन और शराब आदि का सेवन करने से बचें.

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Mauni Amavasya 2025: मौनी अमावस्या पर शनि की राशि में बन रहा है त्रिवेणी योग, इन राशियों को मिल सकता है धन लाभ

Mauni Amavasya Auspicious Yoga: इस बार मौनी अमावस्या पर बेहद शुभ योग बनने बनने जा रहे हैं। ज्योतिषीय गणना के आधार पर मौनी अमावस्या के दिन इस बार शनि देव की राशि मकर में त्रिवेणी योग बन रहा है। माघी अमावस्या के दिन मकर राशि में सूर्य, चंद्रमा और बुध ग्रह का योग होगा जिससे त्रिग्रह या त्रिवेणी योग का निर्माण होगा। Mauni Amavasya Triveni Yog: हर वर्ष माघ मास की अमावस्या तिथि पर मौनी अमावस्या का व्रत रखा जाता है। इस बार साल की पहली अमावस्या तिथि 29 जनवरी,  बुधवार को पड़ेगी। प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन दूसरा अमृत स्नान होगा। इसे माघी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।  इस बार मौनी अमावस्या Mauni Amavasya पर बेहद शुभ योग बनने बनने जा रहे हैं। ज्योतिषीय गणना के आधार पर मौनी अमावस्या के दिन इस बार शनि देव की राशि मकर में त्रिवेणी योग बन रहा है। माघी अमावस्या के दिन मकर राशि में सूर्य, चंद्रमा और बुध ग्रह का योग होगा जिससे त्रिग्रह या त्रिवेणी योग का निर्माण होगा। इस दौरान देव गुरु बृहस्पति अपनी नवम दृष्टि से तीनों ग्रहों को देखेंगे जो नवपंचम योग का निर्माण करेगा। मौनी अमावस्या पर बनने वाले त्रिवेणी योग कई राशियों के लिए लाभकारी साबित होने वाला है। आइए जानते हैं मौनी अमावस्या पर त्रिवेणी योग से किन-किन राशियों को लाभ होने की संभावना है।  वृषभ राशि Vrishabh Rashi मौनी अमावस्या के दिन वृषभ राशि के जातकों के भाग्य स्थान यानी नवम भाव में त्रिवेणी या त्रिग्रह योग का निर्माण होगा। इसके प्रभाव से वृषभ राशि के जातकों का आध्यात्म की ओर रुझान बढ़ेगा। इस दौरान आप धार्मिक यात्रा भी कर सकते हैं। त्रिवेणी योग के प्रभाव से आपके सुख साधनों में भी वृद्धि होने की संभावना है। पैतृक संपत्ति से भी लाभ मिलने की संभावना है। जो जातक नौकरीपेशा हैं उनके लिए भी यह समय बहुत ही उत्तम रहेगा। कार्यक्षेत्र की बात करें तो वहां किसी प्रोजेक्ट में आपको बड़ी सफलता मिलने की संभावना है। वैवाहिक जीवन की बात करें तो संबंधों में मधुरता बनी रहेगी। इसके साथ ही संतान पक्ष से आपको कोई खुशखबरी मिलने की संभावना है।  कर्क राशि (karka rasi) कर्क राशि के जातकों के विवाह स्थान यानी सप्तम भाव में त्रिवेणी योग बनने जा रहा है। इस योग के शुभ प्रभाव से वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहेगा। कर्क राशि के जातकों का रुझान धार्मिक कार्यों के प्रति भी रहेगा। आपके घर-परिवार में मांगलिक कार्य का भी संयोग बनने की संभावना है। त्रिवेणी योग के अनुसार आप जो भी यात्रा करेंगे उनसे आपको लाभ मिलने की संभावना है।  कन्या राशि kanyaa raashi त्रिवेणी योग का निर्माण कन्या राशि के जातकों के पंचम भाव में होने वाला है। पंचम भाव संतान सुख का माना जाता है। ऐसे में इस राशि के जो लोग संतान के इच्छुक हैं उन्हें संतान सुख भी मिल सकता है। माता पिता को बच्चों की तरफ से खुशी मिलने की संभावना है।इस दौरान  अविवाहितों के विवाह के योग भी बनने की संभावना है। आपको भाग्य का पूरा साथ मिलने से कार्यक्षेत्र में तरक्की मिलने की संभावना है।  मकर राशि (makara rasi) मकर राशि के जातकों की बात करें तो त्रिवेणी योग मकर राशि में ही बनने जा रहा है। ऐसे में यह योग मकर राशि के जातकों के लिए सरवूतं लाभ लेकर आएगा। इस दौरान मकर राशि वालों को वो सब मिलेगा जो आप काफी लंबे समय से चाह रहे थे। इस दौरान मकर राशि के जातकों के जीवन में भौतिक सुख-साधनों की वृद्धि होगी वहीं समाज में आपकी प्रतिष्ठा बनेगी। जीवन में आपको एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। व्यापारियों को भी इस अवधि में बड़ा लाभ मिल सकता है।  डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है। 

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Surya dev: रोगों से मुक्ति-घर आएगी सुख समृद्धि, सूर्य देव की उपासना से होंगे ये 4 लाभ

रविवार के दिन भगवान सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष पूजा की जाती है। साथ ही अर्घ्य देना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि सूर्य देव की उपासना करने से इंसान को आरोग्य जीवन का वरदान प्राप्त होता है। इस दिन सूर्य स्तोत्र का पाठ जरूर करना चाहिए। इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। आइए पढ़ते हैं सूर्य स्तोत्र। Surya Stotra Stotram: सनातन धर्म में रविवार के दिन भगवान सूर्य की पूजा करना का विधान है। धार्मिक मत है कि भगवान सूर्य देव की उपासना करने से इंसान को सुख, समृद्धि की प्राप्ति होती है। सूर्य अशुभ स्थिति में होने से व्यक्ति को कार्यों में सफलता प्राप्त नहीं होती है। इस तरह की समस्या में सच्चे मन से सूर्य देव की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। ऐसा करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं। सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे मकर संक्रांति कहा जाता है. यह साल की सबसे बड़ी संक्रांति होती है. इस बार सूर्य 14 जनवरी से लेकर 12 फरवरी तक मकर राशि में रहने वाला हैं. ज्योतिषविदों का कहना है कि सूर्य के मकर राशि में रहने तक उनकी किरणों से सुख-समृद्धि का वरदान बरसता है. इसलिए इस दौरान कुछ विशेष उपाय बहुत ही लाभकारी और कल्याणकारी हो जाते हैं. आइए आज आपको आज ऐसे ही कुछ उपाय बताते हैं. प्रत्येक सुबह जल में रोली, चन्दन और फूल मिलाएं. ये जल सूर्य देव को अर्पित करें. ताम्बे का एक चौकोर टुकड़ा भगवान सूर्य को अर्पित करें.  और फिर “ॐ भास्कराय नमः” का जाप करें. ताम्बे का चौकोर टुकड़ा अपने पास संभालकर रख लें. समाज में मान-सम्मान और पद-प्रतिष्ठा बढे़गी. सूर्य देव को जल अर्पित करें. जल में लाल पुष्प डालें. जवा पुष्प हो तो उत्तम होगा. सूर्य देव को गुड का भोग लगाएं. लाल चन्दन की माला अर्पित करें. और फिर “ॐ आदित्याय नमः” का जाप करें. पूजा के बाद उस माला को गले में धारण कर लें. रोगों-बीमारी दूर रहेंगी. यदि कुंडली में सूर्य कमजोर हो तो क्या उपाय करें. सूर्यदेव को जल अर्पित करें, लाल रंग के वस्त्र धारण करें, गुड़, चने की दाल का प्रसाद अर्पित करें, ऊं घृणि सूर्याय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें. ताम्बे का छल्ला अनामिका अंगुली में धारण करें.  प्रत्येक रविवार को सुबह-सुबह इसका पाठ करें. हर रोड सूर्योदय के समय भी इसका पाठ कर सकते हैं. पहले नहाएं फिर सूर्य को अर्घ्य दें. सूर्य के सामने ही इस स्तोत्र का पाठ करें. पाठ के बाद सूर्य देव का ध्यान करें. जो लोग आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ करते हों वो मांस, मदिरा से दूर रहें. संभव हो तो सूर्यास्त के बाद नमक का सेवन भी न करें. सूर्य अष्टोत्तर शतनामावली स्तोत्रम् सूर्योsर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्क: सविता रवि: । गभस्तिमानज: कालो मृत्युर्धाता प्रभाकर: ।। पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वयुश्च परायणम । सोमो बृहस्पति: शुक्रो बुधोsड़्गारक एव च ।। इन्द्रो विश्वस्वान दीप्तांशु: शुचि: शौरि: शनैश्चर: । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वरुणो यम: ।। वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पति: । धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाड़्गो वेदवाहन: ।। कृतं तत्र द्वापरश्च कलि: सर्वमलाश्रय: । कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तया क्षण: ।। संवत्सरकरोsश्वत्थ: कालचक्रो विभावसु: । पुरुष: शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्त: सनातन: ।। कालाध्यक्ष: प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुद: । वरुण सागरोsशुश्च जीमूतो जीवनोsरिहा ।। भूताश्रयो भूतपति: सर्वलोकनमस्कृत: । स्रष्टा संवर्तको वह्रि सर्वलोकनमस्कृत: ।। अनन्त कपिलो भानु: कामद: सर्वतो मुख: । जयो विशालो वरद: सर्वधातुनिषेचिता ।। मन: सुपर्णो भूतादि: शीघ्रग: प्राणधारक: । धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोsअदिते: सुत: ।। द्वादशात्मारविन्दाक्ष: पिता माता पितामह: । स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम ।। देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुख: । चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेय करुणान्वित: ।। एतद वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजस: । नामाष्टकशतकं चेदं प्रोक्तमेतत स्वयंभुवा ।।

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Magha Chandra Darshan:माघ चन्द्र दर्शन

Magha Chandra Darshan:चंद्र दर्शन अमावस्या के उपरांत चंद्र देव के पुनः आगमन एवं उनके दर्शन की परंपरा है। हिंदू धर्म में सूर्य दर्शन की ही तरह चंद्र दर्शन का भी अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इस दिन श्रद्धालु चंद्र देव की पूजा एवं विशेष प्रार्थना करते हैं। अमावस्या के तुरंत बाद चंद्रमा का दर्शन करना अत्यंत शुभ माना गया है। Magha Chandra Darshan:चंद्र दर्शन उत्सव अमावस्या के कारण चंद्र देव के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं अतः चंद्र देव के पुनः दर्शन के रूप में चंद्र दर्शन मनाया जाता है। चंद्रमा के दर्शन के लिए सबसे अनुकूल समय सूर्यास्त के ठीक बाद माना गया है। चंद्र दर्शन के लिए सबसे उपयुक्त समय की भविष्यवाणी करना पंचांग निर्माताओं के लिए भी एक कठिन कार्य है। चंद्र दर्शन की गणना देश के अलग अलग स्थानो पर अलग-अलग हो सकती है। चंद्र दर्शन को देश के विभिन्न हिस्सों में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्त भगवान चंद्र की पूजा करते हैं, तथा इस दिन चंद्रमा के दर्शन करना सौभाग्यशाली माना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इससे समृद्धि एवं खुशियां आती हैं। Magha Chandra Darshan Ka samay चंद्र दर्शन का समय कब है? माघ चन्द्र दर्शन 2025 :बृहस्पतिवार, 30 जनवरी 2025, 5:59pm से 6:51pm Magha Chandra Darshan ke dooran Puja vidhi चंद्र दर्शन के दौरान पूजा विधि ❀ चंद्र दर्शन के दिन, भक्त चंद्रमा देव की पूजा करते हैं। चंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए भक्त इस दिन कठोर व्रत रखते हैं। वे पूरे दिन कुछ भी नहीं खाते-पीते हैं। सूर्यास्त के तुरंत बाद चंद्रमा को देखने के बाद व्रत खोला जाता है।❀ ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव की सभी अनुष्ठान पूजा करता है, उसे अनंत सौभाग्य और समृद्धि प्रदान की जाती है।❀ चंद्र दर्शन पर दान देना भी एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। इस दिन लोग ब्राह्मणों को कपड़े, चावल और चीनी सहित अन्य चीजें दान करते हैं। चंद्र दर्शन का महत्व Magha Chandra Darshan पौराणिक कथाओं में, चंद्र देव को सबसे प्रतिष्ठित देवताओं में से एक माना जाता है। वह ‘नवग्रह’ के एक महत्वपूर्ण ग्रह भी है, जो पृथ्वी पर जीवन को प्रभावित करते हैं। चंद्रमा को एक अनुकूल ग्रह एवं ज्ञान, पवित्रता और अच्छे इरादों से जुड़ा देव मन गया है। ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति के ग्रह में चंद्रमा अनुकूल स्थिति में है, वह अधिक सफल और समृद्ध जीवन जीएगा। इसके अलावा चंद्रमा हिंदू धर्म में और भी अधिक प्रभावशाली है क्योंकि चंद्र कैलेंडर की गणनायें चन्द्रमा की गति के आधार पर की जाती हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं में, चंद्र देव या चंद्रमा भगवान को पशु और पौधों के जीवन का पोषणकर्ता भी माना गया है। उनका विवाह 27 नक्षत्रों से हुआ है, जो राजा प्रजापति दक्ष की बेटियाँ हैं और बुद्ध या बुध ग्रह के पिता भी हैं। इसलिए भक्त सफलता और सौभाग्य की प्राप्ति हेतु चंद्र दर्शन के दिन चंद्र देव की पूजा करते हैं।

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Shat Tila Ekadashi:षटतिला एकादशी व्रत कब रखा जाएगा? जानें सही तारीख, मंत्र, पूजाविधि और पारण का समय

Shattila Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, 25 जनवरी 2025 को षटतिला एकादशी व्रत रखा जाएगा। यह दिन विष्णुजी की पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन तिल का उपयोग और तिल का दान पुण्य फलदायी माना गया है। एकादशी के व्रत का सम्वन्ध तीन दिनों की दिनचर्या से है। भक्त उपवास के दिन, से एक दिन पहले दोपहर में भोजन लेने के उपरांत शाम का भोजन नहीं ग्रहण करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अगले दिन पेट में कोई अवशिष्ट भोजन न बचा रहे। भक्त एकादशी के दिन उपवास के नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं। तथा अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास समापन करते हैं। एकादशी व्रत के दौरान सभी प्रकार के अनाज का सेवन वर्जित होता है। जो लोग किसी कारण एकादशी व्रत नहीं रखते हैं, उन्हें एकादशी के दिन भोजन में चावल का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा झूठ एवं परनिंदा से बचना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करता है, उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। जब एकादशी दो दिन की होती है तब दूजी एकादशी एवं वैष्णव एकादशी एक ही दिन अर्थात दूसरे दिन मनाई जाती है। Shattila Ekadashi 2025:हिंदू धर्म में हर महीने में आने वाली एकादशी तिथि को विष्णुजी की पूजा-उपासना का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत रखने से जीवन के सभी दुख-कष्ट दूर होते हैं और साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माघ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को षटतिला एकादशी व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, षटतिला एकादशी व्रत बहुत पवित्र माना गया है। इस दिन विष्णुजी के पूजन और व्रत से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। षटतिला एकादशी व्रत में तिल का उपयोग अत्यंत शुभ माना जाता है। आइए जानते हैं षटतिला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजाविधि और पारण टाइमिंग… कब है षटतिला एकादशी 2025? दृक पंचांग के अनुसार, माघ महीने शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जनवरी 2025 को रात 07:25 बजे होगी और अगले दिन 25 जनवरी 2025 को रात 08:31 बजे समाप्त होगी। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, 25 जनवरी 2025 दिन शनिवार को षटतिला एकादशी मनाया जाएगा। पारण का समय: एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। 25 जनवरी को एकादशी व्रत रखने वाले जातक 26 जनवरी को द्वादशी तिथि में सुबह 7:12 बजे से सुबह 9:21 बजे तक व्रत का पारण कर सकते हैं। षटतिला एकादशी के दिन तिल स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का तर्पण, तिल का भोजन और तिल का दान समेत 6 प्रकार से तिल का उपयोग करना पुण्य फलदायी माना गया है। षटतिला एकादशी 2025: पूजाविधि षटतिला एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें। सफेद तिल का उबटन लगाकर पानी में तिल मिलाकर स्नान करें। स्नानादि से निवृत्त होने के बाद एकादशी व्रत का संकल्प लें और विष्णुजी की पूजा करें। विष्णुजी को फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। एकादशी व्रत का पाठ करें। विष्णुजी के मंत्रों का जाप करें। अंत में विष्णुजी समेत सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। पूजा के दौरान जाने-अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा-प्रार्थना मांगे। इस दिन रात्रि को जागरण करना शुभ माना गया है। षटतिला एकादशी 2025: मंत्र 1.ऊँ नारायणाय नमः 2.ऊँ हूं विष्णवे नमः 3.ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Masik Kalashtami 2025: माघ माह में कब है कालाष्टमी? एक क्लिक में पढ़ें पूजा का सही समय

Kalashtami कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला एक हिंदू त्यौहार है जोकि भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव को समर्पित है। प्रत्येक माह में आने के कारण यह त्यौहार एक वर्ष में कुल 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति में 13 बार मनाया जाता है। काल भैरव को पूजे जाने के कारण इसे काल भैरव अष्टमी अथवा भैरव अष्टमी भी कहा जाता है। कालाष्टमी (Masik Kalashtami 2025) का त्योहार काल भैरव देव को प्रसन्न करने के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस पर्व को हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर कालाष्टमी मनाया जाता है। इस दिन काल भैरव की पूजा करने से घर में उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। आइए जानते हैं माघ माह में कब मनाई जाएगी कालाष्टमी। सनातन धर्म में मासिक कालाष्टमी Masik Kalashtami 2025 के पर्व को अधिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव देव की विधिपूर्वक उपासना करने का विधान है। साथ ही विशेष चीजों का दान करने से अन्न और धन की कमी नहीं होती है। इस दिन सभी सुखों को पाने के लिए व्रत भी किया जाता है। आइए, माघ माह में पड़ने वाली कालाष्टमी (Kalashtami 2025) की डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में जानते हैं। मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष को आने वाली मास में पड़ने वाली कालाष्टमी सबसे अधिक प्रसिद्ध है जिसे कालभैरव जयंती Kalbherav Jayanti के नाम से जाना जाता है। कालाष्टमी के रविवार अथवा मंगलवार के दिन पड़ने पर इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि साप्ताह के ये दिन भी भगवान भैरव को समर्पित माने जाते हैं। मासिक कालाष्टमी शुभ मुहूर्त Masik Kalashtami 2025 Subh Muhurat पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 21 जनवरी को दोपहर में 12 बजकर 39 मिनट से शुरू हो रही है। वहीं, अष्टमी तिथि 22 जनवरी को दोपहर में 03 बजकर 18 मिनट पर खत्म होगी। ऐसे में माघ माह की कालाष्टमी 21 जनवरी (Kalashtami 2025 Date) को मनाई जाएगी। शुभ समय subh samay ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05 बजकर 27 मिनट से 06 बजकर 20 मिनट तकविजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 19 मिनट से 03 बजकर 01 मिनट तकगोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 49 मिनट से 06 बजकर 16 मिनट तकसूर्योदय – सुबह 07 बजकर 14 मिनट परसूर्यास्त – शाम 05 बजकर 51 मिनट परचंद्रोदय- रात 12 बजकर 41 मिनट परचंद्रास्त- सुबह 11 बजकर 20 मिनट पर इस विधि से करें पूजा इन कामों को करने से बचें पूजा के दौरान करें इन मंत्रो का जप

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Magh Masik Krishna Janmashtami 2025: कब है साल की पहली मासिक कृष्ण जन्माष्टमी? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

Krishna Janmashtami 2025 : भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रप्रद मास के कृष्ण पक्ष (KRISHNA JANMASTAMI) की अष्टमी तिथि को हुआ था। हिंदू धर्म में इस दिन को हर साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। बाल गोपाल के भक्त भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव बहुत धूमधाम से मनाते हैं। भगवान कृष्ण की पूजा के लिए हर महीने मासिक कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाती है। हिंदू धर्म में भगवान श्री कृष्ण की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। मासिक जन्माष्टमी हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। मासिक कृष्ण Krishna जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल की साधना या व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। जिन लोगों को संतान प्राप्ति में दिक्कतें आती हैं, अगर वे इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा करें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। Magh Masik Krishna Janmashtami 2025 Date: मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का दिन भगवान कृ्ष्ण को समर्पित है. यह दिन श्री कृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है. मासिक जन्माष्टमी का व्रत हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत और पूजन करने से व्यक्ति के घर में सुख-समृद्धि आती है. इसके आलावा इस दिन जीवन में सकारात्मकता आती है. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी कब है? (Magh Masik Krishna Janmashtami 2025 Date) हिंदू वैदिक पंचांग के अनुसार साल की पहली यानी माघ माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 21 जनवरी को रात 12 बजकर 39 मिनट होगी. वहीं तिथि का समापन अगले दिन 22 जनवरी रात 3 बजकर 18 मिनट पर होगी. जिसके अनुसार मासिक जन्माष्टमी का व्रत 21 जनवरी को रखा जाएगा. मासिक कृष्ण जन्माष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त (Masik Krishna Janmashtami 2025 shubh Muhurat) पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म रात्रि में 12 बजे हुआ था. पंचांग के अनुसार मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त रात्रि 12 बजकर 6 मिनट से लेकर 12 बजकर 59 मिनट तक रहेगा. ऐसे में भक्तों को पूजा करने के लिए कुल 53 मिनट का समय मिलेगा. श्रीकृष्ण पूजा मंत्र ( Masik Krishna Janmashtami puja Mantra) मासिक कृष्ण जन्माष्टी का महत्व (Magh Masik Krishna Janmashtami Significance) धार्मिक मान्याता के अनुसार, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इसके अलावा मान्यता है कि इस दिन कान्हा की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं भी पूरी होती है और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि भी आती है. Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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