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Pausha Amavasya:पौष अमावस्या 2024: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्त्व

Pausha Amavasya:दृक पंचांंग के अनुसार, 30 दिसंबर 2024, सोमवार को कृष्ण पक्ष की पौष अमावस्या मनाई जाएगी। इस दिन शुभ मुहूर्त में स्नान-दान के कार्य महत्वपूर्ण माने जाते हैं। Paush Amavasya :सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान और दान-पुण्य के कार्य बेहद शुभ माने जाते हैं। जब किसी भी माह में अमावस्या तिथि सोमवार को मनाई जाती है, तो इसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। पौष माह में आने वाली कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की अमावस्या तिथि को पौष अमावस्या कहते हैं। दृक पंचांग के अनुसार,30 दिसंबर 2024 दिन सोमवार को कृष्ण पक्ष की पौष अमावस्या मनाई जाएगी। यह साल 2024 की आखिरी अमावस्या है। इस दिन देवी-देवताओं का पूजा-अर्चना के साथ घर के मृत पूर्वजों की आत्माशांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के कार्य शुभ माने जाते हैं। आइए जानते हैं दिसंबर में पौष अमावस्या की सही डेट, शुभ मुहूर्त और इस दिन क्या करें-क्या नहीं? When is Paush Amavasya in December:दिसंबर में कब है पौष अमावस्या? दृक पंचांग के अनुसार, Pausha Amavasya पौष माह कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का आरंभ 30 दिसंबर को सुबह 04 बजकर 01 मिनट पर होगा और अगले दिन 31 दिसंबर 2024 को सुबह 03 बजकर 56 मिनट पर समाप्त होगा। इसलिए उदयातिथि के अनुसार, 30 दिसंबर 2024 दिन सोमवार को पौष अमावस्या मनाई जाएगी। इसलिए इसे सोमवती अमावस्या भी कहा जाएगा। सोमवती अमावस्या के दिन शिवजी की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। When is amavasya:अमावस्या कब है? पौष अमावस्या तिथि पितृ / दर्श / स्नान / दान अमावस्या : सोमवार, 30 दिसंबर 2024 पौष कृष्ण अमावस्या : 30 दिसंबर 2024 4:01 AM – 31 दिसंबर 2024 3:56 AM Paush Amavasya 2024 auspicious time:पौष अमावस्या 2024 शुभ मुहूर्त : ब्रह्म मुहूर्त- 05:16 ए एम से 06:11 ए एम अभिजित मुहूर्त- 11:54 ए एम से 12:35 पी एम विजय मुहूर्त- 01:57 पी एम से 02:38 पी एम What to do on the day of Paush Amavasya:पौष अमावस्या के दिन क्या करें ? Pausha Amavasya:पौष अमावस्या के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदीं में स्नान करें। ऐसा संभव न हो तो घर मं गंगाजल डालकर स्नान करें। तांबे के लौटे में जल भरकर और काला तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें। अमावस्या Pausha Amavasya के दिन मौन रहकर व्रत-उपवास करें। सोमवती अमावस्या के दिन दूध,शहद, दही, काला तिल, सफेद कपड़े और चीनी इत्यादि का दान कर सकते हैं। इस दिन गरीबों और जरुरतमंदों को भोजन खिलाएं। What not to do on the day of Paush Amavasya:पौष अमावस्या के दिन क्या न करें? पौष अमावस्या Pausha Amavasya के दिन क्रोध पर नियंत्रण रखें। किसी से व्यर्थ में वाद-विवाद न करें। पौष अमावस्या Pausha Amavasya के दिन मौन रहें और अपशब्दों का इस्तेमाल करने से बचें। इस दिन मांस-मदिरा समेत तामसिक भोजन का सेवन करने से बचना चाहिए। मान्यता है कि Pausha Amavasya अमावस्या के दिन तुलसी पर जल नहीं अर्पित करना चाहिए और न ही तुलसी को स्पर्श करें। अमावस्या के दिन फल और वस्त्रों का दान करना शुभ माना जाता है, लेकिन इस दिन अन्न का दान न करने की सलाह दी जाती है। इस दिन पाप कर्म जैसे चोरी करना, झूठ बोलना समेत अन्य गलत कार्यों से बचना चाहिए। Darsh Amavasya:दर्श अमावस्या दर्श अमावस्या के दिन चंद्रमा पूर्ण रूप से रात को दिखाई नही देता है। अतः तिथिवार अमावस्या Pausha Amavasya तथा दर्श अमावस्या अलग-अलग दिन होसकती है। अमावस्या के दिन, ग्रहों की अतिरिक्त ऊर्जा विकिरण द्वारा मनुष्यों तक पहुँचती है। मानव पर अमावस्या का सबसे आम प्रभाव मानसिक बीमारी, क्रोध अथवा चिड़चिड़ापन आना है। Somvati Amavasya:सोमवती अमावस्या सोमवार के दिन आने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सोमवती अमावस्या का एक विशेष महत्त्व है।  Bhaum Amavasya:भौम अमावस्या साप्ताहिक दिन मंगलवार को आने वाली अमावस्या को भौम अमावस्या कहते हैं, इसे भौमवती अमावस्या भी कहा जाता है। मंगलवार के दिन होने के कारण भौम अमावस्या पर हनुमानजी की पूजा का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। शुभवारी अमावस्या सोमवती अमावस्या तथा शनि अमावस्या की तरह ही, गुरुवार के दिन होने वाली अमावस्या को शुभवारी अमावस्या कहते हैं।. शनि अमावस्या:Shani Amavasya जैसे सप्ताह के पहले दिन सोमवार को आने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं, इसी प्रकार शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते हैं। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Akhuratha Sankashti Chaturthi:अखुरथ संकष्टी चतुर्थी 2024: महत्व, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Akhuratha Sankashti Chaturth:गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। Akhuratha Sankashti Chaturth:संकष्टी चतुर्थी व्रत की महिमा नारद पुराण के अनुसार संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रती को पूरे दिन का उपवास रखना चाहिए। शाम के समय संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा को सुननी चाहिए। संकष्टी चतुर्थी के दिन घर में पूजा करने से नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं । Akhuratha Sankashti Chaturth इतना ही नहीं संकष्टी चतुर्थी का पूजा से घर में शांति बनी रहती है। घर की सारी परेशानियां दूर होती हैं। गणेश जी भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। इस दिन चंद्रमा को देखना भी शुभ माना जाता है। सूर्योदय से शुरू होने वाला संकष्टी व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही समाप्त होता है, साल भर में 12-3 संकष्टी व्रत रखे जाते हैं। हर संकष्टी व्रत की एक अलग कहानी होती है। दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में संकष्टी चतुर्थी को गणेश संकटहरा या संकटहरा चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। संकष्टी चतुर्थी व्रत का दिन, उस दिन के चन्द्रोदय के आधार पर निर्धारित होता है। जिस दिन चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र उदय होता है, संकष्टी चतुर्थी का व्रत उसी दिन रखा जाता है। इसीलिए प्रायः ऐसा देखा गया है कि, कभी-कभी संकष्टी चतुर्थी व्रत, चतुर्थी तिथि से एक दिन पूर्व अर्थात तृतीया तिथि के दिन ही होता है। कहा जाता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत नियमानुसार ही संपन्न करना चाहिए, तभी इसका पूरा लाभ मिलता है। इसके अलावा गणपति बप्पा की पूजा करने से यश, धन, वैभव और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। अखुरथ संकष्टी चतुर्थी 2024 शुभ मुहूर्त (Akhuratha Sankashti Chaturthi 2024 Shubh Muhurat) Akhuratha Sankashti Chaturth पंचांग के अनुसार, इस बार पौष महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 18 दिसंबर को सुबह 10 बजकर 43 मिनट से होगी। वहीं, इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 19 दिसंबर को सुबह 10 बजकर 02 मिनट पर होगा। ऐसे में खुरथ संकष्टी चतुर्थी 18 दिसंबर (Kab Hai Akhuratha Sankashti Chaturthi 2024) को मनाई जाएगी। ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05 बजकर 19 मिनट से 06 बजकर 04 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 01 मिनट से 02 बजकर 42 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 25 मिनट से 05 बजकर 52 मिनट तक अमृत काल- सुबह 06 बजकर 30 मिनट से 08 बजकर 07 मिनट तक गणोश मंत्र (Ganesh Mantra) 1. ऊँ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ ।निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा ॥2.ॐ श्रीं गं सौम्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा॥ Sankashti Chaturthi puja method:संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि ❀ गणेश संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रात: काल स्नान आदि करके व्रत लें।❀ स्नान के बाद गणेश जी की पूज आराधना करें, गणेश जी के मन्त्र का उच्चारण करें।❀ पूजा की तैयारी करें और गणेश जी को उनकी पसंदीदा चीजें जैसे मोदक, लड्डू और दूर्वा घास चढ़ाएं।❀ गणेश मंत्रों का जाप करें और श्री गणेश चालीसा का पाठ करें और आरती करें।❀ शाम को चंद्रोदय के बाद पूजा की जाती है, अगर बादल के चलते चन्द्रमा नहीं दिखाई देता है तो, पंचांग के हिसाब से चंद्रोदय के समय में पूजा कर लें। ❀ शाम के पूजा के लिए गणेश जी Akhuratha Sankashti Chaturth की मूर्ति के बाजू में दुर्गा जी की भी फोटो या मूर्ति रखें, इस दिन दुर्गा जी की पूजा बहुत जरुरी मानी जाती है।❀ मूर्ति/फोटो पर धुप, दीप, अगरबत्ती लगाएँ, फुल से सजाएँ एवं प्रसाद में केला, नारियल रखें।❀ गणेश जी के प्रिय मोदक बनाकर रखें, इस दिन तिल या गुड़ के मोदक बनाये जाते है।❀ गणेश जी के मन्त्र का जाप करते हुए कुछ मिनट का ध्यान करें, कथा सुने, आरती करें, प्रार्थना करें।❀ इसके बाद चन्द्रमा की पूजा करें, उन्हें जल अर्पण कर फुल, चन्दन, चावल चढ़ाएं।❀ पूजा समाप्ति के बाद प्रसाद सबको वितरित किया जाता है।❀ गरीबों को दान भी किया जाता है। Akhuratha Sankashti Chaturth:सभी संकष्टी चतुर्थी के नाम आश्विन मास – विघ्नराज संकष्टी चतुर्थीकार्तिक मास – करवा चौथ, वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थीमार्गशीर्ष मास – गणाधिप संकष्टी चतुर्थीपौष मास – अखुरथ संकष्टी चतुर्थीमाघ मास – सकट चौथ, लम्बोदर संकष्टी चतुर्थीफाल्गुन मास – द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थीचैत्र मास – भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थीवैशाख मास – विकट संकष्टी चतुर्थीज्येष्ठ मास – एकदन्त संकष्टी चतुर्थीआषाढ़ मास – कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थीश्रावण मास – गजानन संकष्टी चतुर्थीअधिक मास – विभुवन संकष्टी चतुर्थीभाद्रपद मास – बहुला चतुर्थी, हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी अखुरथ संकष्टी चतुर्थी 2024 का महत्व Akhuratha Sankashti Chaturth:अखुरथ संकष्टी चतुर्थी के दिन विघ्नहर्ता श्री गणेश भगवान की पूजा के साथ चन्द्रदर्शन का भी विशेष महत्व है। इस दिन चद्रोदय के समय चंद्र को अर्घ जरूर देना चाइये। धार्मिक मान्यता है की इस दिन गणेश जी की पूजा करने से जातक के जीवन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। और गणेश भगवान सुख शांति और आरोग्यता का वरदान  देतें है।

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International Gita Mahotsav:अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव

Gita Mahotsav:अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव हिंदुओं के पवित्र ग्रन्थ श्रीमद्भगवद गीता के प्रादुर्भाव का उत्साहित उत्सव स्वरुप है। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव हरियाणा सरकार द्वारा कुरूक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर पर मनाया जाता है। कुरुक्षेत्र वह भूमि है जहाँ भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य ज्ञान अर्थात ‘भगवद गीता’ सुनाई थी। यह पवित्र ग्रंथ गीता जीवन की किसी भी समस्या का सभी समाधान प्रदान करता है। गीता महोत्सव कब मनाया जाता है?(When is Geeta Mahotsav celebrated) गीता महोत्सव का समापन हिंदू कैलेंडर के अनुसार मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन अर्थात गीता जयंती के साथ होता है। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव Gita Mahotsav की सभी तिथियाँ एवं कार्यक्रम हरियाणा सरकार निर्धारित करती है। इस वर्ष, गीता महोत्सव 28 नवंबर से 15 दिसंबर मनाया जा रहा है। हरियाणा सरकार द्वारा गीता जयंती को वर्ष 2016 में अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के रूप में घोषित किया गया था। गीता महोत्सव कहाँ मनाया जाता है? (Where is Geeta Mahotsav celebrated) गीता महोत्सव Gita Mahotsav मुख्य रूप से हरियाणा के कुरूक्षेत्र में आयोजित किया जाता है, परन्तु महोत्सव का महत्वपूर्ण स्थल एवं सभी कार्यक्रमों का केंद्र विन्दु ब्रह्म सरोवर ही होता है। माना जाता है कि यह वही स्थान है जहाँ भगवान कृष्ण ने कुरूक्षेत्र युद्ध के दौरान अर्जुन को भगवद गीता सुनाई थी। यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रसिद्ध ऋषि मनु ने यहीं मनुस्मृति लिखी थी। ऋग्वेद और सामवेद की रचना भी यहीं हुई थी। गीता महोत्सव समारोह की प्रमुख गतिविधियाँ(Major activities of Geeta Mahotsav Celebrations)गीता महोत्सव Gita Mahotsav, कुरुक्षेत्र का एक लोकप्रिय उत्सव है जिसके अंतर्गत मेला, यज्ञ, गीता पाठ, भजन, आरती, नृत्य और नाटक जैसी विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। यह कार्यक्रम पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है, जिसमें मानव जाति पर इस पवित्र ग्रन्थ के प्रभाव को विद्वानों, दार्शनिकों, पुजारियों एवं ऋषियों द्वारा चर्चाओं, सेमिनार एवं संगोष्ठियों द्वारा मंथन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मंचीय नाटक और गीता जप प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं, जिसमें गीता के सार से युक्त पत्रक, पुस्तिकाएं और किताबें वितरित की जाती हैं।

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Annapurna Jayanti:अन्नपूर्णा जयंती 2024: पूजन विधि, शुभ मुहूर्त और महत्त्व

Annapurna Jayanti:धार्मिक मत है कि अन्नपूर्णा जयंती (Annapurna Jayanti 2024 Date) पर साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। किचन को गंदा नहीं रखना चाहिए। साथ ही अन्न का सम्मान करें। अन्न की बर्बादी करने से मां अन्नपूर्णा अप्रसन्न हो जाती हैं। इससे गृह में अन्न एवं धन की कमी होने लगती है। इस शुभ अवसर पर अन्न का दान करना उत्तम होता है। मागर्शीष शुक्ल पूर्णिमा के दिन माँ पार्वती के अन्नपूर्णा स्वरूप के अवतरण दिन को अन्नपूर्णा जयंती के रूप में मनाया जाता है। माता अन्नपूर्णा को अन्नपूर्णेश्वरी एवं अन्नदा नामो से भी जाना जाता है। इस दिन माँ अन्नपूर्णा की आराधना करनी चाहिए, माँ की कृपा से किसी भी घर में कभी भी अन्न की कोई कमी नही होती है। अन्नपूर्णा जयंती Annapurna Jayanti को अन्न दान की विशेष महिमा है। यदि इस दिन कोई भक्त अन्न दान करता है, तो उसे अगले जन्म में भी धन-धान्य की कभी कोई कमी नहीं होती है। अन्नपूर्णा जंयती पूजन में माँ अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करना चाहिए। जब पृथ्वी पर खाने के लिए कुछ नहीं बचा, तब माँ पार्वती ने अन्नपूर्णा रूप धारण कर सभी को इस संकट से उबारा। अन्नपूर्णा जयन्ती को मनुष्य के जीवन में अन्न के महत्व को समझाने हेतु मनाया जाता है। इस दिन रसोई की सफाई एवं अन्न के सदुपयोग को प्रचारित करना चाहिए। क्योंकि अन्न के सदुपयोग से व्यक्ति के जीवन में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। अन्नपूर्णा जयंती तिथि और शुभ मुहूर्त (Annapurna Jayanti 2024 Date And Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा तिथि 14 दिसंबर को संध्याकाल 04 बजकर 58 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, पूर्णिमा तिथि का समापन 15 दिसंबर दोपहर 02 बजकर 31 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार 15 दिसंबर को मार्गशीर्ष पूर्णिमा मनाई जाएगी। इसके साथ ही अन्नपूर्णा जयंती भी 15 दिसंबर को मनाई जाएगी। Annapurna Jayanti Subh Yog:शुभ योग Annapurna Jayanti:ज्योतिषियों की मानें तो अन्नपूर्णा जयंती पर शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इस योग का संयोग दिन भर है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दुर्लभ शिववास योग का भी निर्माण हो रहा है। इस योग में भगवान शिव संग मां पार्वती की पूजा करने से साधक को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। साथ ही अन्न एवं धन में वृद्धि होती है। अन्नपूर्णा जयंती पूजा विधि (Annapurna Jayanti 2024 Puja Vidhi) मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि पर ब्रह्म मुहूर्त में उठें। इसके बाद शिव-शक्ति को प्रणाम कर दिन की शुरुआत करें। इसके बाद घर की साफ-सफाई करें। दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें। अब आचमन कर लाल या श्वेत रंग का वस्त्र धारण करें। इसके बाद सर्वप्रथम सूर्य देव को जल का अर्घ्य दें। इसके बाद भगवान शिव का अभिषेक करें। पूजा गृह में पंचोपचार कर विधि-विधान से भगवान शिव एवं मां अन्नपूर्णा की पूजा करें। भगवान शिव एवं मां पार्वती को गृह में बने भोजन भोग में अर्पित करें। इस समय पार्वती चालीसा का पाठ करें। पूजा के अंत में शिव पार्वती जी की आरती करें। इस दिन किचन में चूल्हे की पूजा अवश्य करें। इसके साथ ही चूल्हे पर कुमकुम, चावल और फूल चढ़ाएं और धूप जलाकर मां अन्नपूर्णा से अन्न एवं धन में वृद्धि की कामना करें। अन्नपूर्ण जयंती का महत्व:Importance of Annapurna Jayanti ऐसी धार्मिक मान्यता है कि मां अन्नपूर्णा की पूजा करने वालों और व्रत रखने वालों को मां का आशीर्वाद प्राप्त होता है. उनके घर में अन्न और धन की कमी नहीं होती. घर-परिवार में भी सुख-शांति बनी रहती है. पारिवारिक क्लेश भी दूर होता है. इस चीज का विशेष ध्यान रखें कि व्रत का पारण करने के बाद जरूरतमंद और गरीब लोगों कि अन्न, वस्त्र या धन की सहायता करें. Annapurna Jayanti इससे मां की कृपा आपके ऊपर बरसेगी. मां अन्नपूर्णा को भी इस दिन धनी की पंजीरी का भोग लगाएं, इससे वे प्रसन्न हो जाएंगी/ इस दिन पीले रंग के कपड़े पर ही मां की मूर्ति को स्थापति या विराजित करें, तभी आपको व्रत का फल मिल पाएगा. पौराणिक कथा एक समय पृथ्वी लोक पर जल और अन्न सभी कुछ समाप्त हो गया। सभी प्राणी अन्न और जल के न मिलने पर मरने लगे। इसके बाद पृथ्वीं पर लोग ब्रह्मा जी और विष्णु की आराधना करने लगे। ऋषियों ने ब्रह्म लोक और बैकुंठ लोक जाकर इस समस्या हल निकालने के लिए ब्रह्मा जी और विष्णु जी से कहा। जिसके बाद ब्रह्मा जी और विष्णु जी सभी ऋषियों के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंचे। सभी ने भगवान शिव से प्रार्थना की हे प्रभू पृथ्वी लोक बड़े ही संकट से गुजर रहा है। इसलिए अपना ध्यान तोड़िए और जाग्रत अवस्था में आइए। तब शिव आंखे खोलकर सभी के आने का कारण पूछा। तब सभी ने बताया की पृथ्वी लोक पर अन्न और जल की कमीं हो गई है। तब भगवान शिव ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि आप लोग धीरज रखिए। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती ने पृथ्वी लोक का भ्रमण किया। जिसके बाद माता पार्वती ने अन्नपूर्णा रूप धारण किया और भगवान शिव ने एक भिक्षु का रूप धारण किया। इसके बाद भगवान शिव ने भिक्षा लेकर सभी पृथ्वी वासियों में भोजन वितरित किया। जिसके बाद पृथ्वी पर अन्न और जल की कमी पूरी हो गई और सभी ने माता अन्नपूर्णी की जय जयकार की।

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Maghsheersh Purnima:मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2024: पुण्य और भक्ति का विशेष पर्व

Maghsheersh Purnima:पूर्णिमा प्रत्येक माह की शुक्ला पक्ष मे आने वाला मासिक उत्सव है, अतः पूर्णिमा वर्ष मे 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति मे 13 बार भी हो सकती है। पूने, पूरणमासी, पूनम ऐसे ही पूर्णिमा को विभिन्न लोक भाषाओं मे अन्य-अन्य नाम से जाना जाता है। भारत मे, प्रत्येक माह की पूर्णिमा को कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता हैं। इन्हीं मासिक तिथियों मे, कुछ लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण पूर्णिमा तिथि श्री हनुमान जन्मोत्सव, बुद्ध पूर्णिमा, गुरू पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, कोजागरी लक्ष्मी पूजा, टेसू पूनै, वाल्मीकि जयंती, रक्षाबन्धन, श्री भैरव जयंती, देव दिवाली एवं अन्नपूर्णा जंयती, दत्त जयन्ती हैं। भारत का सबसे प्रसिद्ध रंगों भरा वाला त्यौहार होली भी फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन ही होता है। पूर्णिमा के दिन हिंदू व्रत, गंगा स्नान तथा सत्यनारायण जी के कथा का पाठ करते हैं। खगोलीय घटनाओं के अनुसार, पूर्णिमा के दिन समुद्र मे और दिनो से अधिक ज्वार की घटना होती है। हिन्दु पञ्चांग एवं खगोलीय स्थिति के अनुसार, चंद्रमा 28 दिनों में पृथ्वी का एक चक्कर पूर्ण करता है। 15 दिनों के उपरांत चंद्रमा पृथ्वी की एक छोर से दूसरी की छोर पर होता है। जब चंद्रमा भारतवर्ष की ओर होता है, तब उसे पूर्ण अवस्था मे देखा जाता है। जब चंद्रमा पूर्ण स्वरूप से भारतवर्ष मे दिखाई देता, उस दिन को ही पूर्णिमा का दिन कहा जाता है। और यह घटना(पूर्णिमा) प्रत्येक स्थान अथवा देश के लिए चंद्रमा की स्थिति के अनुसार अलग-अलग समय पर हो सकती है। पूर्णिमा व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए चंद्रमा के उदय समय की विशेष महत्ता है। पूर्णिमा कब है? | Purnima Kab Hai? मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2024 कब है?  रविवार, 15 दिसम्बर 2024 व्रत / श्राद्ध/ स्नान / दान – 15 दिसम्बर 2024, रविवार भाद्रपद पूर्णिमा तिथि : 14 दिसम्बर 2024 04:58 PM – 15 दिसम्बर 2024 02:31 PM चन्द्रोदय – 05:14 PM मार्गशीर्ष पूर्णिमा: Maghsheersh Purnima धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व का विशेष दिन मार्गशीर्ष पूर्णिमा हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है, जो विशेष रूप से धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और साधना के लिए शुभ मानी जाती है। यह दिन खासकर भगवान विष्णु, शिव, सूर्य और अन्य देवी-देवताओं की उपासना के लिए महत्वपूर्ण होता है। Maghsheersh Purnima:मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2024 तिथि Maghsheersh Purnima:मार्गशीर्ष पूर्णिमा का महत्व Maghsheersh Purnima:मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर किए जाने वाले 4 प्रमुख उपाय 1. गंगा स्नान और व्रत मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। स्नान के बाद भगवान विष्णु या शिव की पूजा करें। 2. भगवान विष्णु का पूजन 3. दान-पुण्य करें इस दिन गरीबों को वस्त्र, अन्न और अन्य जरूरी सामान का दान करें। इसके साथ ही पूजा में तिल, घी और मीठे पदार्थों का भी दान करें। 4. दीपदान करें मार्गशीर्ष पूर्णिमा Maghsheersh Purnima के दिन घरों में दीप जलाने से न केवल घर में सुख-शांति आती है, बल्कि यह वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व मार्गशीर्ष Maghsheersh Purnima माह को विशेष रूप से भगवान विष्णु का माह माना जाता है, और पूर्णिमा का दिन उनके दर्शन और पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय होता है। इस दिन की पूजा से जीवन में सुख, समृद्धि और आंतरिक शांति की प्राप्ति होती है।

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Tripur Bhairavi Jayanti:त्रिपुर भैरवी जयंती 2024: शक्ति और तंत्र की देवी की पूजा का पावन अवसर

Tripur Bhairavi Jayanti:सनातन धर्म में त्रिपुर भैरवी जयंती को बहुत ही शुभ माना जाता है। यह मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन दस महाविद्याओं में से पांचवें उग्र रूप माता भैरवी की पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता भैरवी भगवान भैरव की पत्नी हैं, जो भगवान शिव का एक उग्र स्वरूप हैं। कहा जाता है कि माता भैरवी की पूजा करने से गुप्त शत्रुओं का नाश होता है। साथ ही सभी मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं। Tripur Bhairavi Jayanti Puja Vidhi:त्रिपुर भैरवी जयंती पूजा विधि ❀ सुबह उठकर पवित्र स्नान करें।❀ मंदिर की सफाई करें।❀ मां की मूर्ति को लकड़ी के चौकी पर स्थापित करें। माँ के आगे कलश स्थापना करें।❀ माँ को श्रृंगार की वस्तुएं भी अर्पित करें, कुमकुम का तिलक लगाएं, लाल फूलों की माला चढ़ाएं, फल, मिठाई आदि अर्पित करें।❀ माँ के समक्ष तिल के तेल का दीपक लगाएं, त्रिपुरभैरवी के मंत्रों का जाप करें।❀ पूजा का समापन कपूर की आरती से करें। Tripur Bhairavi Jayanti ka Mahatv:त्रिपुर भैरवी जयंती का महत्व तंत्र विद्या में निपुणता प्राप्त करने के लिए मां आदिशक्ति के स्वरूप त्रिपुर भैरवी की पूजा की जाती है। इसके अलावा माता भैरवी को तेरह अलग-अलग रूपों में पूजा जाता है, जैसे-त्रिपुर भैरवी, चैतन्य भैरवी, सिद्ध भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कालेश्वरी भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, रुद्र भैरवी, भद्र भैरवी, शतकुटी भैरवी और नित्या भैरवी। माना जाता है कि मां का यह रूप दिखने में जितना विचित्र और कठोर है, वह उतना ही दयालु भी है। ऐसे में अगर आप लगातार किसी न किसी समस्या से जूझ रहे हैं तो आपको माता दुर्गा के इस रौद्र रूप की पूजा जरूर करनी चाहिए। Tripur Bhairavi Jayanti :त्रिपुर भैरवी जयंती: साधना और शक्ति का पावन पर्व त्रिपुर भैरवी जयंती Tripur Bhairavi Jayanti मां त्रिपुर भैरवी की साधना और उपासना का विशेष पर्व है। यह दिन देवी त्रिपुर भैरवी, जो दस महाविद्याओं में से एक हैं, को समर्पित है। देवी त्रिपुर भैरवी को शक्ति, तंत्र और आध्यात्मिक ऊर्जा की देवी माना जाता है। उनकी उपासना से भय, नकारात्मक ऊर्जा और कष्टों का नाश होता है। त्रिपुर भैरवी जयंती 2024 तिथि त्रिपुर भैरवी जयंती तिथि: रविवार, 15 दिसंबर 2024 त्रिपुर भैरवी का महत्व त्रिपुर भैरवी जयंती पर पूजा विधि Tripur Bhairavi Jayanti:त्रिपुर भैरवी मंत्र और स्तुति त्रिपुर भैरवी जयंती के लाभ विशेष संदेश त्रिपुर भैरवी जयंती Tripur Bhairavi Jayanti केवल पूजा का पर्व नहीं है, यह आत्मा को जागृत करने और जीवन में नई ऊर्जा लाने का अवसर है। मां त्रिपुर भैरवी की आराधना से साधक को न केवल भौतिक, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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Dhanu Sankranti:धनु संक्रांति 2024: सूर्य उपासना और धर्म-कर्म का पावन पर्व

Dhanu Sankranti:हिंदू पंचांग के अनुसार, संक्रांति (Sankranti) का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना। भारत के कुछ हिस्सों में, प्रत्येक संक्रांति को एक महीने की शुरुआत के रूप में चिह्नित किया जाता है। Dhanu Sankranti दूसरी ओर, कुछ अन्य हिस्सों में, एक संक्रांति को प्रत्येक महीने के अंत के रूप में और अगले दिन को एक नए महीने की शुरुआत के रूप में चिह्नित किया जाता है। संक्रांति, दान के लिए अनुकूल है, लेकिन इस दिन शुभ कार्यों से बचा जाता है। मकर संक्रांति एक समृद्ध चरण या संक्रमण के पवित्र चरण की शुरुआत का प्रतीक है। संक्रांति के बाद सभी पवित्र अनुष्ठान और शुभ समारोह किए जा सकते हैं। Dhanu Sankranti Kab hai:संक्रांति कब है? धनु संक्रांति Dhanu Sankranti : रविवार, 15 दिसम्बर 2024 धनु संक्रांति मुहूर्त पुण्य काल – 12:16 PM से 05:26 PMमहा पुण्य काल – 03:43 PM से 05:26 PMसंक्रान्ति का क्षण – 10:19 PM Dhanu Sankranti:मासिक संक्रांति क्या है? तो एक वर्ष में, 12 संक्रांति होती है और यह भगवान सूर्य (सूर्य देवता) को समर्पित है। सभी 12 संक्रांति में ‘मकर संक्रांति’ सबसे मान्य है और यह पूरे भारत में मनाई जाती है। सबसे महत्वपूर्ण संक्रांतियों के नाम ◉ तुला संक्रांति [पहाड़ी कार्तिक माह]◉ वृश्चिक संक्रांति [पहाड़ी मार्गशीर्ष माह]◉ धनु संक्रांति [पहाड़ी पौष ]◉ मकर संक्रांति – पौष संक्रांति [माघ ]◉ कुम्भ संक्रांति [पहाड़ी फाल्गुन]◉ मीन संक्रांति – फूलदेई [पहाड़ी चैत्र माह]◉ मेष संक्रांति – [सोलर नववर्ष] / पना संक्रांति / विषुक्कणी / पोइला बोइशाख [पहाड़ी वैशाख माह]◉ वृषभ संक्रांति [पहाड़ी ज्येष्ठ माह]◉ मिथुन संक्रांति [पहाड़ी आषाढ़ माह]◉ कर्क संक्रांति – हरेला [पहाड़ी श्रावण माह]◉ सिंह संक्रांति – घी संक्रांति [पहाड़ी भाद्रपद माह]◉ कन्या संक्रांति [पहाड़ी अश्विन माह] धनु संक्रांति: सूर्य उपासना और धर्म-कर्म का शुभ पर्व धनु संक्रांति हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो सूर्य के धनु राशि में प्रवेश करने पर मनाया जाता है। यह पर्व धार्मिक अनुष्ठानों, दान-पुण्य और सूर्य देव की उपासना के लिए विशेष माना जाता है। धनु संक्रांति को शुभ कार्यों और आध्यात्मिक उन्नति का दिन माना जाता है। धनु संक्रांति का महत्व धनु संक्रांति पर किए जाने वाले 4 खास उपाय 1. सूर्य को अर्घ्य दें सूर्य देव को जल अर्पित करें और गायत्री मंत्र या आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें। इससे स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। 2. गंगा स्नान और दान करें इस दिन गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद तिल, गुड़, अनाज, और वस्त्र का दान करें। 3. धार्मिक अनुष्ठान करें 4. जरूरतमंदों की मदद करें गरीबों को भोजन, वस्त्र, और धन दान करें। यह पुण्य कर्म आपको जीवन में शांति और सफलता प्रदान करता है। धनु संक्रांति पर ध्यान रखने योग्य बातें धनु Dhanu Sankranti संक्रांति का संदेश धनु संक्रांति धर्म, अध्यात्म, और दान का पर्व है। यह हमें जीवन में सही दिशा में आगे बढ़ने, सकारात्मकता बनाए रखने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की प्रेरणा देता है।

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Vivah Panchami:विवाह पंचमी के दिन करें ये 4 उपाय और पाएं सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद

Vivah Panchami:धार्मिक मान्यता है कि विवाह पंचमी के दिन प्रभु राम और माता सीता की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में चल रही तमाम तरह की समस्याएं भी दूर होती हैं. अगर भक्त विवाह पंचमी के दिन भगवान राम और माता सीता की पूजा आराधना करें तो सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. साथ ही घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है. विवाह पंचमी के दिन किए गए विशेष उपाय से वैवाहिक जीवन में खुशियां आती हैं. साथ ही संतान सुख की प्राप्ति होती है. विवाह पंचमी Vivah Panchami के दिन करें ये 4 उपाय और पाएं सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद विवाह पंचमी भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह की पुण्यतिथि है, जो मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। यह दिन वैवाहिक जीवन में खुशहाली और मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन किए गए कुछ विशेष उपाय आपको जीवन में सुख, समृद्धि और वैवाहिक सौभाग्य प्रदान कर सकते हैं। 1. Vivah Panchami श्रीराम और माता सीता की पूजा करें 2. Vivah Panchami देवी सीता का आशीर्वाद प्राप्त करें 3. तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराएं 4. निर्धन कन्याओं की शादी में सहयोग करें (Vivah Panchami) Vivah Panchami विवाह पंचमी का महत्व विवाह पंचमी का दिन उन लोगों के लिए बेहद खास होता है जो वैवाहिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं या अपने जीवन में सुख और समृद्धि चाहते हैं। Vivah Panchami इस दिन किए गए ये उपाय न केवल वर्तमान जीवन की बाधाओं को दूर करते हैं, बल्कि भविष्य के लिए भी शुभ फल प्रदान करते हैं। आप सभी को विवाह पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं! विवाह पंचमी Vivah Panchami पर दुर्लभ संयोग  विवाह पंचमी पर शिववास योग का बन रहा है. शिववास योग दिन भर है. इसके साथ ही विवाह पंचमी पर ध्रुव योग का भी निर्माण हो रहा है. इस खास योग में भगवान श्रीराम और माता जानकी की पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है. ऐसी स्थिति में इस दिन कुछ खास उपाय करने से जीवन में आ रही तमाम तरह की परेशानियों से मुक्ति मिलती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार विवाह पंचमी के दिन केले के पेड़ की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से विवाह में आ रही समस्या से मुक्ति भी मिलती है. साथ ही दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है. विवाह पंचमी के दिन रामचरितमानस में दिए गए प्रभु राम और माता सीता के प्रसंग का पाठ करना चाहिए. ऐसा करने से वैवाहिक जीवन में चल रही तमाम तरह की समस्याओं से मुक्ति मिलेगी. विवाह पंचमी के दिन शुभ योग में सुहाग का सामान भगवान राम और माता सीता को अर्पित करने से पति-पत्नी में चल रही खटपट दूर होगी. विवाह पंचमी के दिन माता सीता और प्रभु राम की विधि पूर्वक पूजा आराधना करनी चाहिए और पंचामृत का भोग लगाना चाहिए. ऐसा करने से दांपत्य जीवन में मधुरता बढ़ती है.

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Datta Jayanti:दत्त जयन्ती भगवान दत्तात्रेय की उपासना का महापर्व

Datta Jayanti:भारत के राज्य महाराष्ट्र मे हिंदू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष महीने की पूर्णिमा को दत्त जयंती, देव दत्तात्रेय के अवतरण / जन्म दिवस के रूप मे बड़ी ही धूम-धाम से मनायी जाती है। भगवान दत्तात्रेय एक समधर्मी देवता है और उन्हें त्रिमूर्ति अथार्त ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का अवतार माना जाता है। दत्तात्रेय शीघ्र कृपा करने वाले, भक्त वत्सल, भक्त के स्मरण करते ही उन पर प्रशन्न हो जाते हैं। इसीलिए इन्हें स्मृतिगामी तथा स्मृतिमात्रानुगन्ता भी कहा जाता है। दक्षिण भारत में प्रसिद्ध दत्त संप्रदाय, भगवान दत्तजी को ही अपना प्रमुख आराध्य मानता है। दत्तात्रेय ऋषि अत्रि और उनकी पत्नी अनसूया के पुत्र थे। देवी अनसूया को पतिव्रता स्त्रियों मे सबसे श्रेष्ठ माना गया है। वनवास के समय माता सीता ने भी देवी अनसूया का आशीर्वाद ग्रहण किया तथा पतिव्रता धर्म के बारे मे शिक्षा प्राप्त की थी। दत्तात्रेय जन्म कथा विस्तार से जानिए! दत्त जयन्ती कब है? | Datta Jayanti Kab Hai? दत्त जयन्ती 2024 – शनिवार, 14 दिसम्बर 2024 [सत्यनारायण व्रत]  पूर्णिमा तिथि : 14 दिसम्बर 2024 4:58pm – 15 दिसम्बर 2024 2:31pm दत्त जयंती Datta Jayanti पूजा विधि ❀ दत्त जयंती के दिन भक्त जल्दी उठते हैं, पवित्र जल में स्नान करते हैं और दिन भर उपवास रखते हैं।❀ भगवान दत्तात्रेय के तीन सिर और छह भुजाएं हैं। दत्तात्रेय जयंती पर उनके बाल स्वरूप की पूजा की जाती है।❀ पूजा समारोह के दौरान विशिष्ट फूल, अगरबत्ती, दीपक और मिठाइयाँ अर्पित की जाती हैं।❀ पूजा के दौरान देवता की मूर्ति या तस्वीर पर चंदन सिन्दूर और हल्दी लगानी चाहिए। ❀ यह भी महत्वपूर्ण है कि पूजा शुरू होने के बाद, भक्तों को भगवान दत्त की मूर्ति के चारों ओर सात चक्कर लगाने चाहिए और पूजा में सभी को प्रसाद और आरती वितरित करनी चाहिए।❀ भगवान दत्तात्रेय के मंदिर इस दिन उत्सव का केंद्र होते हैं। मंदिरों को सजाया जाता है। कुछ स्थानों पर अवधूत गीता और जीवनमुक्त गीता भी पढ़ी जाती है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसमें स्वयं भगवान की वाणी है। Datta Jayanti दत्त जयंती महत्व भगवान दत्तात्रेय को समर्पित कई मंदिर हैं, खासकर दक्षिणी भारत में। वह महाराष्ट्र राज्य के एक प्रमुख देवता भी हैं। वास्तव में, प्रसिद्ध दत्त संप्रदाय का उदय दत्तात्रेय के पंथ से हुआ है। दत्त जयंती कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों में भगवान दत्तात्रेय मंदिरों में बहुत खुशी और धूमधाम से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति दत्तात्रेय जयंती के दिन पूरी श्रद्धा के साथ भगवान दत्तात्रेय की पूजा करता है और व्रत रखता है, तो उसकी सभी इच्छाएं और इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। भक्तों को अपनी आत्मा और मन को शुद्ध और प्रबुद्ध करने के लिए ओम श्री गुरुदेव दत्त और श्री गुरु दत्तात्रेय नमः जैसे मंत्रों का जाप करना चाहिए। दत्त जयंती हिंदू धर्म में भगवान दत्तात्रेय के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व मार्गशीर्ष पूर्णिमा को आता है और भगवान दत्तात्रेय की आराधना, भक्ति और ज्ञान प्राप्ति का अवसर प्रदान करता है। दत्तात्रेय भगवान को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त अवतार माना जाता है। दत्त जयंती Datta Jayanti 2024 तिथि एवं मुहूर्त भगवान दत्तात्रेय Datta Jayanti का परिचय भगवान दत्तात्रेय, अत्रि ऋषि और अनसूया माता के पुत्र हैं। उनकी जीवन गाथा हमें संयम, भक्ति और त्याग का संदेश देती है। वे 24 गुरुओं के ज्ञान को आत्मसात कर हर व्यक्ति के लिए आदर्श मार्गदर्शन प्रस्तुत करते हैं। दत्तात्रेय मंत्र Datta Jayanti “ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः।”यह मंत्र भगवान दत्तात्रेय के आशीर्वाद और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। इस पावन पर्व पर भगवान दत्तात्रेय की पूजा-अर्चना से आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आए। दत्त जयंती की शुभकामनाएँ!

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Karthika Deepam:कार्तिक दीपम तिथि एवं प्रकाश पर्व की आध्यात्मिक महिमा

Karthika Deepam:कार्तिक दीपम या कार्तिगई दीपम या दीपम उत्सव दक्षिण भारत में मुख्य रूप से तमिल और तेलुगु समुदाय के बीच अत्यधिक उत्साह के साथ मनाए जाने वाला एक हिंदू त्यौहार है। कार्तिक दीपम तमिल के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों जैसे केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार तमिलों के बीच वैसे ही प्रसिद्ध है जैसे उत्तर भारत मे दीवाली है। कार्तिक दीपम तिथि: शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024 Karthika Deepam यह त्यौहार कार्तिक के महीने में मनाया जाता है, इसीलिए इसे कार्तिगई दीपम कहा जाता है। यह त्यौहार उस दिन आता है जब चंद्रमा और पूर्णिमा का संयोग कार्तिगई से मेल खाता है। यह संयोग छह ग्रहों के रूप में दिखाई देता है। छह नक्षत्रों की कहानीछह नक्षत्रों के बारे में कई कहानियाँ और कविताएँ लिखी गई हैं। Karthika Deepam हिंदू मान्यताओं के अनुसार, छह आकाशीय देवी हैं, जिन्होंने छह शिशुओं को पाला और एक साथ छह चेहरों के भगवान के रूप में प्रकट हुए। उन्हें भगवान शिव के प्रथम पुत्र कार्तिकेय के रूप में जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने मुरुगन को अपनी तीसरी आंख से बनाया था। इन छह नक्षत्रों के नाम हैं, तत्पुरूष, अघोरम्, सद्योजातम, वामदेव, ईशान और अधोमुखम। भगवान मुरुगन को इन छह नामों से जाना जाता है। इसलिए, इन छः नक्षत्रों की पूजा करना उतनी ही प्रभावी है जितनी कि भगवान मुरुगन की पूजा करना। एक पंक्ति में दीप जलाकर उनकी पूजा की जाती है। इस पूजा के दिन, भक्त घर के आंगन में एक दीपक जलाते हैं, इसी दिन को ही कार्तिगई दीपम और भगवान मुरुगन जयंती के रूप में भी जाना जाता है। Karthika Deepam:कार्तिगई दीपम क्यों मनाते हैं? भारत मे त्यौहार अधिक मनाए जाते हैं, खास बात यह है कि इन सबके पीछे कोई न कोई कारण, कहानी और उसके तथ्य हैं। Karthika Deepam कार्तिगई दीपम मनाने के पीछे भी कारण है। हम आपको बता रहे हैं कि दक्षिण भारत में कार्तिगई दीपम क्यों मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के सामने एक अंतहीन ज्योति के रूप में प्रकट हुए थे। भगवान शिव के ऐसा करने का कारण दो भगवानों में से सर्वश्रेष्ठ को चुनना था। Karthika Deepam भगवान ब्रह्मा और विष्णु दोनों में इस बात को लेकर मतभेद थे कि उनमें से सर्वश्रेष्ठ कौन है। भगवान शिव ने इस ज्योति का अंत पता लगाने को कहा, परंतु दोनों ही इस कार्य में नाकाम रहे। लेकिन भगवान ब्रह्मा ने कहा कि उन्होंने भगवान शिव का सिर देखा है। जो कि सत्य नहीं था और भगवान शिव इस बात को समझ गए। इस झूठ के कारण भगवान शिव ने कहा कि भगवान ब्रह्मा का कोई मंदिर पृथ्वी पर नहीं बनेगा। इस प्रकार भगवान विष्णु भगवान को श्रेष्ठ घोषित कर दिया गया। Karthika Deepam इस दिन लोग भगवान शिव की पूजा करते हैं। और बाद में यह दिन कार्तिकेय महादीपम के रूप में मनाया जाने लगा। कार्तिक दीपम (Karthigai Deepam) एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है, जिसे तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसे कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जो भगवान शिव और भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की आराधना का प्रतीक है। इस दिन घरों और मंदिरों में दीप जलाकर उत्सव मनाया जाता है। कार्तिक दीपम का महत्व पर्व की मुख्य विशेषताएं पूजा विधि धार्मिक संदेश यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में ज्ञान और भक्ति का दीप जलाते हुए अज्ञान और अंधकार को दूर करना चाहिए।

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Shukra Pradosh Vrat:शुक्र प्रदोष व्रत कब है दिसंबर महीने का पहला प्रदोष व्रत? नोट करें शुभ मुहूर्त एवं योग

Shukra Pradosh Vrat:माह की त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल मे होना, प्रदोष व्रत होने का सही कारण है। प्रदोष काल सूर्यास्त से 45 मिनट पहिले प्रारम्भ होकर सूर्यास्त के बाद 45 मिनट होता है।प्रदोष का दिन जब साप्ताहिक दिवस सोमवार को होता है उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को होने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष तथा शनिवार के दिन प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat Shubh Muhurat) वैसे तो त्रयोदशी तिथि ही भगवान शिव की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। परंतु प्रदोष के समय शिवजी की पूजा करना और भी लाभदायक है। ध्यान देने योग्य तथ्य: प्रदोष व्रत एक ही देश के दो अलग-अलग शहरों के लिए अलग हो सकते हैं। चूँकि प्रदोष व्रत सूर्यास्त के समय, त्रयोदशी के प्रबल होने पर निर्भर करता है। तथा दो शहरों का सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो सकता है, इस प्रकार उन दोनो शहरों के प्रदोष व्रत का समय भी अलग-अलग हो सकता है। इसीलिए कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि, प्रदोष व्रत त्रयोदशी से एक दिन पूर्व अर्थात द्वादशी तिथि के दिन ही हो जाता है। सूर्यास्त होने का समय सभी शहरों के लिए अलग-अलग होता है अतः प्रदोष व्रत करने से पूर्व अपने शहर का सूर्यास्त समय अवश्य जाँच लें, चाहे वो शहर एक ही देश मे क्यों ना हों। Shukra Pradosh Vrat प्रदोष व्रत चन्द्र मास की शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की दोनों त्रयोदशी के दिन किया जाता है। Shukra Pradosh Vrat:शुक्र प्रदोष व्रत वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 12 दिसंबर को देर रात 10 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, 13 दिसंबर को शाम 07 बजकर 40 मिनट पर त्रयोदशी तिथि समाप्त होगी। इस प्रकार 13 दिसंबर को मार्गशीर्ष मास का अंतिम प्रदोष व्रत मनाया जायेगा। इस दिन प्रदोष काल संध्याकाल 05 बजकर 26 मिनट से लेकर शाम 07 बजकर 40 मिनट तक है। शुक्रवार के दिन पड़ने के चलते यह शुक्र प्रदोष व्रत कहलाएगा। साधक अपनी सुविधा के अनुसार समय पर शिव शक्ति की पूजा उपासना कर सकते हैं। माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव संग मां पार्वती की पूजा की जाती है। इसके साथ ही मनचाहा वर पाने के लिए भगवान शिव संग मां पार्वती के निमित्त प्रदोष व्रत (December Pradosh Vrat 2024) रखा जाता है। Shukra Pradosh Vrat इस व्रत को करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। अतः साधक भक्ति भाव से शिव-शक्ति की पूजा-उपासना करते हैं। आइए, शुभ मुहूर्त एवं शुभ योग जानते हैं- Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की पूजा कब करनी चाहिए? Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की पूजा अपने शहर के सूर्यास्त होने के समय के अनुसार प्रदोष काल मे करनी चाहिए। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष में क्या न करें? भगवान शिव की प्रदोष काल में पूजा किए बिना भोजन ग्रहण न करें. व्रत के समय में अन्न, नमक, मिर्च आदि का सेवन नहीं करें। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत मे पूजा की थाली में क्या-क्या रखें? Shukra Pradosh Vrat:पूजा की थाली में अबीर, गुलाल, चंदन, काले तिल, फूल, धतूरा, बिल्वपत्र, शमी पत्र, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, अगरबत्ती एवं फल के साथ पूजा करें। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की विधि ❀ प्रदोष व्रत करने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए।❀ नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें।❀ इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है।❀ पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाते है।❀ पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है।❀ अब इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनाई जाती है। ❀ प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है।❀ इस प्रकार पूजन की तैयारियां करके उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए।❀ पूजन में भगवान शिव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए। Shukra Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत की महिमा Shukra Pradosh Vrat प्रदोष व्रत को रखने से दो गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी। व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यों को अधिक करेगा। उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी। इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म-जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत का महत्व ❀ मान्यता और श्रध्दा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत करते हैं। कहा जाता है Shukra Pradosh Vrat कि इस व्रत से कई दोषों की मुक्ति तथा संकटों का निवारण होता है. यह व्रत साप्ताहिक महत्त्व भी रखता है।❀ रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है।❀ सोमवार के दिन त्रयोदशी पड़ने पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है और इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।❀ मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो तो उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।❀ बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपासक की सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। ❀ गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़े तो इस दिन के व्रत के फल से शत्रुओं का विनाश होता है।❀ शुक्रवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है।❀ संतान प्राप्ति की कामना हो तो शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए।❀ अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किए जाते हैं तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है। प्रदोष व्रत का उद्यापन ❀ इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद

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Gita Jayanti 2024:गीता जयंती जीवन को सरल बनाती हैं गीता में लिखी ये पांच बातें, आप भी करें इनका पालन

Gita Jayanti 2024: पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। इस साल 11 दिसंबर 2024 को गीता जयंती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान प्रदान किया था। यह वह समय था, जब अर्जुन के कदम महाभारत युद्ध के लिए डगमगाने लगे थे। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के उपदेशों को सुनकर ही अर्जुन अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हुए थे। हिंदू धर्म में गीता को पवित्र ग्रंथ माना गया है, जिसका पाठ करने पर मनुष्य की तमाम समस्याओं का निवारण होता है। कहते हैं कि गीता में आत्मा, परमात्मा, भक्ति, कर्म और जीवन से जुड़े सभी विषयों का उल्लेख है। इन उपदेशों का अध्ययन करने से मनुष्य का जीवन सरल और सुखी बनता है। ऐसे में आइए इन उपदेशों के बारे में जानते हैं। गीता जयंती को हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाया जाता है क्योंकि हिंदू पौराणिक मान्यता के Gita Jayanti 2024 अनुसार गीता स्वयं एक बहुत ही पवित्र ग्रंथ है जिसे स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनाया था। गीता जयंती हर साल शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ भगवद गीता का जन्म हुआ था। इस दिन को मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है। Gita Jayanti 2024:अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2024 Gita Jayanti 2024:अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2024 कार्यक्रम : 28 November – 15 December 2024 प्रतिदिन केवल ऑनलाइन: कला, शिल्प, व्यंजन, संस्कृति, इतिहास, धरोहर और आध्यात्मिकता के अनोखे संगम के अवसर पर धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में आयोजन किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड, हरियाणा पर्यटन, Gita Jayanti 2024 जिला प्रशासन, उत्तरीय सांस्कृतिक केंद्र पटियाला और सूचना और जनसंपर्क विभाग हरियाणा द्वारा आयोजित किया जाता है। गीता महोत्सव में लाखों लोग शिल्प मेला, यज्ञ, गीता पाठ, भजन, आरती, नृत्य, नाटक आदि में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के बारे में और जानकारी के लिए उसकी ऑफिसियल वेबसाइट पर विजिट करें internationalgitamahotsav.in। Gita Jayanti 2024:इस्कॉन में गीता जयंती समारोह Gita Jayanti 2024:गीता जयंती हर साल दिसंबर के महीने में मनाया जाता है। इस्कॉन में इस महीने के दौरान, भक्त भगवद गीता को निवासियों और आसपास के क्षेत्रों में वितरित करके भगवान की सेवा करते हैं। इस दिन, भक्त भगवान और उनके प्रिय भक्त के बीच इस पवित्र वार्तालाप को याद करते हुए सभी 700 श्लोकों को एक साथ पढ़ने के लिए इकट्ठा होते हैं। इस्कॉन हर साल गीता दान यज्ञ महोत्सव का आयोजन करता है, जो 30 दिनों का उत्सव है, जिसके दौरान 1 लाख गीता वितरित करने का लक्ष्य रखते हैं। इस्कॉन का मानना ​​है कि भगवद् गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो कोई भी मेरा संदेश दुनिया में फैलाता है, वह मुझे सबसे प्रिय व्यक्ति है। इसलिए, भगवान कृष्ण की दया पाने के लिए, भक्त निःस्वार्थ रूप से भगवद गीता वितरण करते हैं। Gita Jayanti 2024:श्रीमद् भगवद् गीता श्रीमद्भागवत गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं, गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है। भगवत गीता के सभी 18 अध्याय के नाम.. अध्याय १: अर्जुनविषादयोगः – कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षणअध्याय २: साङ्ख्ययोगः – गीता का सारअध्याय ३: कर्मयोगः – कर्मयोगअध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः – दिव्य ज्ञानअध्याय ५: कर्मसंन्यासयोगः – कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्मअध्याय ६: आत्मसंयमयोगः – ध्यानयोगअध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोगः – भगवद्ज्ञानअध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोगः – भगवत्प्राप्तिअध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोगः – परम गुह्य ज्ञानअध्याय १०: विभूतियोगः – श्री भगवान् का ऐश्वर्यअध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोगः – विराट रूपअध्याय १२: भक्तियोगः – भक्तियोगअध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः – प्रकृति, पुरुष तथा चेतनाअध्याय १४: गुणत्रयविभागयोगः – प्रकृति के तीन गुणअध्याय १५: पुरुषोत्तमयोगः – पुरुषोत्तम योगअध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोगः – दैवी तथा आसुरी स्वभावअध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोगः – श्रद्धा के विभागअध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोगः – उपसंहार-संन्यास की सिद्धि भगवत गीता का प्रथम श्लोक:धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे् समवेता युयुत्सवः ।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥१॥

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