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Yogini Ekadashi 2025:योगिनी एकादशी: जीवन के सारे पाप होंगे नष्ट, बस करें यह काम !

Yogini Ekadashi Vrat Niyam:योगिनी एकादशी पर भक्त उपवास रखकर विष्णु भगवान की आराधना करेंगे। योगिनी एकादशी पर कुछ कामों को करना अशुभ माना जाता है, जो प्रभु की नाराजगी का कारण भी बन सकता है। Yogini Ekadashi:हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. यह दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए विशेष माना गया है. आप योगिनी एकादशी पर एक आसान उपाय अपनाकर जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति पा सकते हैं. Yogini Ekadashi 2025 mein Kab Hai:हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. यह दिन भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए विशेष माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, योगिनी एकादशी व्रत रखने से कई बीमारियों से राहत मिलती है और जाने-अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिलती है. धर्म शास्त्रों में योगिनी एकादशी को रोगों को दूर करने वाली सबसे शुभ तिथि बताया गया है. आप योगिनी एकादशी पर एक आसान उपाय अपनाकर जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति पा सकते हैं. Yogini Ekadashi 2025 Kab Hai:योगिनी एकादशी 2025 कब है? साल 2025 में योगिनी एकादशी का व्रत 21 जून, दिन शनिवार को रखा जाएगा. आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 21 जून की सुबह 7:18 बजे से शुरू होगी. वहीं, इस तिथि का समापन 22 जून की सुबह 4:27 बजे होगा. ऐसे में उदया तिथि के आधार पर 21 जून को ही योगिनी एकादशी का व्रत रखना सर्वश्रेष्ठ रहेगा. योगिनी एकादशी पर सभी पापों से मुक्ति पाने का उपाय:Remedy to get freedom from all sins on Yogini Ekadashi योगिनी एकादशी के शुभ अवसर पर भगवान विष्णु के साथ ही तुलसी माता की पूजा का भी अत्यंत महत्व माना गया है. योगिनी एकादशी के दिन की सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें. फिर भगवान विष्णु और तुलसी माता की विधिवत पूजा करें. इसके बाद तुलसी को जल अर्पित करें और तुलसी के पास घी का दीपक जलाएं. आप चाहें तो अगरबत्ती भी जला सकते हैं. अब “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें. इसके अलावा, तुलसी माता की सात बार परिक्रमा करें. अगर आप योगिनी एकादशी पर यह उपाय आजमाते हैं, तो भगवान विष्णु प्रसन्न होंगे और आपके जाने-अनजाने में किए गए पापों से आपको मुक्ति प्रदान करेंगे. इस दिन विष्णु भगवान को अर्पित करने वाले भोग में तुलसी के पत्ते जरूर रखें. धार्मिक मान्यता है कि तुलसी के बिना भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते हैं. अगर आप चाहें तो योगिनी एकादशी पर तुलसी की माला का से तुलसी माता के मंत्र जाप कर सकते हैं. वहीं, अगर आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है, तो एकादशी के दिन पौधा लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है. What not to do on Yogini Ekadashi:योगिनी एकादशी पर क्या न करें? डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Raksha Bandhan 2025 Date: रक्षाबंधन कब है? जानें डेट व राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

Raksha Bandhan 2025 Date: रक्षाबंधन भाई बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है. यह सनातन धर्म का बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है. इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाधकर उसकी लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करती है- इस दिन बहनें अुपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र या राखी बांधती हैं और बदले में भाई बहन को उम्रभर रक्षा का वचन देते हैं। रक्षाबंधन के दिन भद्राकाल में राखी बांधने की मनाही होती है लेकिन इस साल भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी। Raksha Bandhan Kab Hai: हिंदू धर्म में हर साल रक्षाबंधन या राखी का त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट स्नेह व प्यार का प्रतीक है। इस दिन बहनें अुपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र या राखी बांधती हैं और बदले में भाई बहन को उम्रभर रक्षा का वचन देते हैं। रक्षाबंधन के दिन भद्राकाल में राखी बांधने की मनाही होती है लेकिन इस साल भद्रा सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी। जानें रक्षाबंधन 2025 कब है और राखी बांधने का मुहूर्त- हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है. रक्षाबंधन प्राचीन हिंदू त्योहार है.यह पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक है. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसकी लंबी उम्र और उज्जवल भविष्य की कामना करती है. Raksha Bandhan 2025 Date इसके अलावा वह भाई से पूरे जीवन उनकी रक्षा करने का वचन मांगती हैं और भाई भी अपनी बहन की पूरा जीवन सुख-दुख में साथ देने का वादा करते हैं. साथ ही इस दिन भाई अपनी बहन को वचन के साथ-साथ कोई वस्तु या फिर पैसा उपहार स्वरूप भेंट करते हैं. किस समय बांधे राखी- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने का सबसे शुभ समय अपराह्न काल होता है, जिसे दोपहर का समय माना गया है। अगर कोई अपराह्न काल के दौरान राखी बांधने में असमर्थ है, तो वे प्रदोष काल के दौरान भी बांध सकते हैं। लेकिन भद्रा समय के दौरान राखी बांधने से बचना चाहिए। Raksha bandhan 2025 date time tithi shubh muhurt and vidhi know in hindi Raksha Bandhan 2025 Date:रक्षाबंधन कब है? वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 8 अगस्त को देर रात 2 बजकर 12 मिनट पर होगी. वहीं तिथि का समापन अगले दिन 9 अगस्त को रात 1 बजकर 24 मिनट होगी. उदया तिथि के अनुसार, रक्षाबंधन का त्योहार 9 अगस्त को मनाया जाएगा. भाई को रक्षा सूत्र बांधने का शुभ मुहूर्त पंचांग के हिसाब से रक्षाबंधन के दिन भाई को Raksha Bandhan 2025 Date रक्षा सूत्र बांधने का शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 47 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 24 मिनट तक रहेगा. जिसकी कुल समय अवधि 7 घंटे 37 मिनट की हैं. राखी बांधने का शुभ मुहूर्त- वैदिक पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 08 अगस्त 2025 को दोपहर 02 बजकर 12 मिनट पर प्रारंभ होगी और 09 अगस्त 2025 को दोपहर 01 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगी। राखी बांधने का शुभ मुहूर्त सुबह 05 बजकर 47 मिनट से दोपहर 01 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। राखी बांधने की शुभ अवधि 07 घंटे 37 मिनट की है। राखी बांधने की विधि- सबसे पहले एक थाली लें और उसमें रोली, अक्षत, राखी,मिठाई व दीपक आदि रखें। अब दीपक जलाएं और भाई की आरती उतारें। भाई का तिलक करें और कलाई पर राखी बांधे बांधें। अंत में मिठाई खिलाएं। Raksha Bandhan 2025 Date भाई राखी बंधवाने के बाद बहनों व घर के अन्य बड़े सदस्यों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं। Disclaimer:इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा, जानें कथा पाठ का लाभ

Devshayani ekadashi Vrat Katha In Hindi : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी का उपवास किया जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से और कथा सुनने व पढ़ने मात्र से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। आइए जानते हैं देवशयनी एकादशी व्रत कथा के बारे में… आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी व्रत किया जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का काफी महत्व माना जाता है क्योंकि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद कार्तिक मास की एकादशी तिथि तक को भगवान विष्णु योगनिद्रा से निकलते हैं। इस दौरान भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। देवशयनी एकादशी व्रत कथा का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत की कथा सुनने व पढ़ने मात्र से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा:Devshayani Ekadashi Vrat Katha वामन अवतार की कथा:Story of Vaman Avatar वामन पुराण के अनुसार, एक बार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। Devshayani Ekadashi Vrat Katha यह देखकर इंद्र समेत अन्‍य देवी-देवता घबरा गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंच गए। देवताओं को परेशान देखकर भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। राजा बलि ने वामन देवता से कहा कि जो मांगना चाहते हैं मांग लीजिए। इस पर वामन देवता ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। पहले और दूसरे पग में वामन देवता ने धरती और आकाश और पूरा संसार को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची तो राजा बलि से वामन देवता ने पूछा कि तीसरा पग में कहां रखूं तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु राजा बलि को देखकर काफी प्रसन्‍न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने उनसे वरदान में पाताल लोक में बस जाने की बात कही। बलि की बात मानकर उनको पाताल में जाना पड़ा। ऐसा करने से समस्‍त देवता और मां लक्ष्‍मी परेशान हो गए। Devshayani Ekadashi Vrat Katha अपने पति विष्‍णुजी को वापस लाने के लिए मां लक्ष्‍मी गरीब स्‍त्री के भेष में राजा बलि के पास गईं और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी और उपहार के रूप में विष्‍णुजी को पाताल लोक से वापस ले जाने का वरदान ले लिया। माता लक्ष्‍मी के साथ वापस जाते हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया की वह प्रत्‍येक वर्ष आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास की एकादशी तक पाताल में ही निवास करेंगे और इन 4 महीने की अवधि को उनकी योगनिद्रा माना जाएगा। यही वजह है कि दीपावली पर मां लक्ष्‍मी की पूजा भगवान विष्‍णु के बिना ही की जाती है। भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी यह कथा:Lord Krishna told this story to Yudhishthir Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा का वर्णन खुद भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस वृतांत को धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था। कथाओं के अनुसार, सतयुग में मांधाता नाम का एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। एक बार उसके राज्य में तीन साल तक वर्षा नहीं हुई, जिसकी वजह से राज्य में भंयकर अकाल पड़ गया। अकाल की वजह से चारो ओर त्रासदी का माहौल बन गया। राज्य के लोगों के अंदर धार्मिक भावनाएं कम होने लगीं। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपना दर्द बताया, जिससे राजा भी चिंतित थे। राजा मांधाता को लगता था कि आखिर ऐसा कौन-सा पाप हो गया है, जिसकी सजा हमारे राज्य को ईश्वर दे रहा है। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए राजा अपनी सेना के साथ ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे। Devshayani Ekadashi Vrat Katha ऋषिवर ने उनको यहां आने का कारण पूछा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर, मैंने हमेशा से पूरा निष्ठा से धर्म का पालन किया है, फिर मेरे राज्य की ऐसी हालत क्यों है। कृपया करके मुझे इसका समाधान दें। अंगिरा ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है, यहां छोटे से पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। अंगिरा ऋषि ने राजा को आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस व्रत का फल जरूर मिलेगा और इसके प्रभाव से तुम्हारा संकट से भी निकल आएगा। Devshayani Ekadashi Vrat Katha महर्षि अंगिरा के निर्देश का पालन करते हुए राजा अपनी राजधानी वापस आ गए और उन्होंने चारों वर्णों सहित देवशयनी एकादशी का व्रत पूरा किया, जिसके बाद राज्य में मूसलधार वर्षा हुई।

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Devshayani Ekadashi 2025 Date:देवशयनी एकादशी, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र, पारण का समय

Devshayani Ekadashi:देवशयनी एकादशी 2025 चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है, जो भक्ति, उपवास और आत्म-अनुशासन का पवित्र 4 महीने का काल है। जानिए तिथि, अनुष्ठान और इस शुभ समय के दौरान क्या न करें। देवशयनी एकादशी वह दिन है जब भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस क्षण से, ब्रह्मांड की जिम्मेदारी अगले चार महीनों के लिए अन्य देवताओं को सौंप दी जाती है। यह पवित्र दिन चातुर्मास की शुरुआत का भी प्रतीक है, जो आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण अवधि है, जिसके दौरान विवाह, गृह प्रवेश समारोह और भूमि पूजन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। देवशयनी एकादशी शुभ मुहूर्त (Devshayani Ekadashi Shubh Muhurat) Kab hai Devshayani Ekadash:वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 05 जुलाई को शाम 06 बजकर 58 मिनट पर होगी। वहीं, 06 जुलाई को रात 09 बजकर 14 मिनट पर एकादशी तिथि का समापन होगा। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसके लिए 06 जुलाई को देवशयनी एकादशी मनाई जाएगी।साधक देवशयनी एकादशी का व्रत 06 जुलाई के दिन रखेंगे। वहीं, 07 जुलाई को पारण सुबह 05 बजकर 29 मिनट से लेकर 08 बजकर 16 मिनट के मध्य किया जाएगा। इस दौरान स्नान-ध्यान और पूजा के बाद अन्न और धन का दान कर व्रत खोलें। देवशयनी एकादशी शुभ योग (Devshayani Ekadashi Shubh Muhurat) Devshayani Ekadashi:ज्योतिषियों की मानें तो आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर साध्य योग का संयोग रात 09 बजकर 27 मिनट तक है। इसके बाद शुभ योग का निर्माण हो रहा है। इन योग में लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करने से सभी प्रकार के शुभ कामों में सफलता मिलेगी। इसके साथ ही त्रिपुष्कर योग और रवि योग का भी संयोग बन रहा है। Devshayani Ekadashi Puja Vidhi:देवशयनी एकादशी की पूजा विधि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें। इसके बाद साफ-सुथरे वस्त्र धारण कर लें। एक तांबे के लोटे में जल, सिंदूर, लाल फूल डालकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। सबसे पहले व्रत का संकल्प लें।  इसके बाद विष्णु जी की पूजा आरंभ करें। सबसे पहले एक लकड़ी की चौकी में पीले रंग का वस्त्र बिछाकर श्री विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखें। सबसे पहले जल से आचमन करें। इसके बाद विष्णु जी को पीला चंदन, फूल, माला, अक्षत आदि लगाने के साथ भोग में तुलसी का दल के साथ रखें। इसके बाद जल अर्पित करें। फिर घी का दीपक और धूप जलाकर एकादशी व्रत कथा, विष्णु चालीसा, विष्णु मंत्र के बाद श्री विष्णु आरती कर लें। अंत में भूल चूक के लिए माफी मांग लें और दिनभर व्रत रखें। दूसरे दिन तय समय पर पूजा पाठ करने के बाद व्रत का पारण कर लें। Devshayani Ekadashi chatur mass ka mahetwa:देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और ब्रह्मांड का संचालन अन्य दिव्य प्राणियों को सौंप देते हैं। Devshayani Ekadashi उनका विश्राम काल, जिसे चातुर्मास के नाम से जाना जाता है, 6 जुलाई से शुरू होकर 1 नवंबर 2025 को देवउठनी एकादशी तक जारी रहेगा। चातुर्मास को तपस्या, उपवास, ध्यान और आत्मसंयम का समय माना जाता है। इस अवधि के दौरान विलासिता, उत्सव और भोग-विलास से दूर रहने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इस दौरान ध्यान आंतरिक चिंतन और आध्यात्मिक विकास की ओर केंद्रित होता है। Chatur mas Ke dauran kya nhi karna chahiye:चातुर्मास के दौरान क्या नहीं करना चाहिए? चातुर्मास के दौरान कुछ कार्य पारंपरिक रूप से प्रतिबंधित होते हैं, क्योंकि यह आत्म-अनुशासन और भक्ति का एक पवित्र चरण है: Chatur mas mein kya karna chahiye:चातुर्मास में क्या करना चाहिए? देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) न केवल भगवान विष्णु के विश्राम का प्रतीक है, बल्कि यह एक व्यक्तिगत विराम, आत्म-अनुशासन, आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक उत्थान का अवसर भी है। चातुर्मास के सिद्धांतों का पालन करके, व्यक्ति जीवन में शांति, अनुशासन और ईश्वरीय कृपा ला सकता है। यदि आप अपने प्रयासों में सफलता और स्थायी सद्भाव चाहते हैं, तो इस पवित्र चार महीने की अवधि के आध्यात्मिक दिशानिर्देशों का पालन करें। देवशयनी एकादशी संकल्प मंत्र सत्यस्थ: सत्यसंकल्प: सत्यवित् सत्यदस्तथा।धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जित:।।कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च।श्रीपतिर्नृपति: श्रीमान् सर्वस्यपतिरूर्जित:।। देवशयनी एकादशी विष्णु क्षमा मंत्र भक्तस्तुतो भक्तपर: कीर्तिद: कीर्तिवर्धन:।कीर्तिर्दीप्ति: क्षमाकान्तिर्भक्तश्चैव दया परा।।

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Ambubachi Mela 2025 date & time:कामख्या देवी में इस दिन से लगने वाला है तांत्रिक शक्तियों का मेला

Ambubachi Mela:कामाख्या देवी मंदिर में जल्द ही अम्बुबाची मेला लगने वाला है। इस दौरान मां कामाख्या देवी मंदिर के कपाट बंद रहेंगे, क्योंकि माना जाता है कि पृथ्वी माता रजस्वला होती हैं। देशभर से तांत्रिक और श्रद्धालु इस मेले में शामिल होने आते हैं। आइए जानते हैं अम्बुबाची मेला की खास बातें और मेला कब से शुरु हो रहा है। कामाख्या देवी मंदिर में 4 दिवसीय मेले का आयोजन होने जा रहा है। देशभर से हजारों की संख्या में लोग इस मेले में शामिल होते हैं। कामाक्या देवी मंदिर 51 शक्तिपीठ में से एक है। कामाख्या देवी मंदिर में जिस मेले का आयोजन किया जाता है इसका नाम अम्बुबाची मेला है। आइए जानते हैं इस साल कब से लगने जा रहा है अम्बुबाची मेला और इस मेले की क्या खास बातें हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अंबुबाची मेला असम के कामाख्या मंदिर में हर साल आयोजित होने वाला एक वार्षिक हिंदू मेला है। हिंदू महीने “आषाढ़” के सातवें से दसवें दिन तक अम्बुबाची की अवधि के दौरान, मंदिर के दरवाजे सभी के लिए बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी कामाख्या मासिक धर्म के वार्षिक चक्र से गुजरती हैं। अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा।  यह Ambubachi Mela मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म चक्र को दर्शाता है, जो पृथ्वी की उर्वरता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवी को आराम और विश्राम की जरूरत होती है अर्थात यह भी मान्यता है कि इस दौरान देवी अपनी रचनात्मक शक्ति से पृथ्वी को धन्य करती हैं, जिससे भूमि उपजाऊ हो जाती है इसलिए मंदिर के अंदर सभी पूजा-अर्चना बंद कर दी जाती है और मंदिर के आसपास के गांवों में लोग भी कुछ दिनों के लिए नियमित गतिविधियों से दूर रहते हैं। Ambubachi Mela 2025 date & time : आईये जानते हैं अम्बुबाची मेले के विशेषताएं मंदिर के गर्भ ग्रह को तीन दिनों के लिए बंद कर दिया जाता है और इस दौरान कोई पूजा-अर्चना नहीं होती है।भक्तों को देवी के मासिक धर्म का प्रतीक लाल रंग का कपड़ा प्रसाद के रूप में दिया जाता है।यह मेला देवी कामाख्या के मासिक धर्म के दौरान पृथ्वी की उर्वरता और नारी शक्ति को समर्पित है। Ambubachi Mela 2025 date & time Ambubachi Mela अम्बुबाची मेला 22 जून से आरंभ होने जा रहा है और 26 जून तक यह मेला चलेगा। तीन दिनों तक मंदिर में कोई पूजा या दर्शन नहीं किया जाता है। चौथे दिन, जब मां को ‘शुद्धि स्नान’ कराकर विश्राम समाप्त होता है, तब मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोले जाते हैं और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। Ambubachi Mela 2025 date & time इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। इस मेले को अमेटी या तांत्रिक प्रजनन उत्सव के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह भारत के पूर्वी भागों में प्रचलित तांत्रिक शक्ति पंथ से निकटता से जुड़ा हुआ है । यहाँ तक कि कुछ तांत्रिक बाबा भी इन चार दिनों के दौरान ही सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। Ambubachi Mela 2025 date & time मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है। अम्बुबाची मेला की खास बातें:Special features of Ambubachi fair इस दौरान यहां देश और विदेश से आए तांत्रिक गुप्त साधना करते हैं। जानकारी के लिए बता दें कि जब देवी सती का शरीर को सूदर्शन चक्र से भगवान विष्णु ने भागों में बांटा था, तब उनका योनि भाग यहीं गिरा था, इसलिए यह स्थान प्रजनन शक्ति और उर्वरता का प्रतीक है। इस मेले की खास बात यह भी है कि इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में देवी के पास रखे गए सफेद कपड़ा रखा जाता है रजस्वला होने के बाद जब यह कपड़ा लाल हो जाते हैं, जो भक्तों को प्रसाद के रूप में यह वस्त्र दिया जाता है। मान्यता है अनुसार, यह वस्त्र भक्तों को सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत प्रदान करता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इस वस्त्र के प्रभाव से संतानहीन महिलाओं को संतान की प्राप्ति भी होती है। हालांकि, यह वस्त्र हर किसी को नहीं मिल पाता है बल्कि कुछ ही लोगों को यह वस्त्र मिलता है।

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Yogini Ekadashi 2025 Date: कब रखा जाएगा योगिनी एकादशी का व्रत? नोट कर लें डेट, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

Yogini Ekadashi 2025 Date: आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है. मान्यता है कि जो कोई इस दिन व्रत रखकर भगवान की उपासना करता है, उसके हर संकट दूर हो जाते हैं. Yogini Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, साल भर में 24 एकादशी के व्रत रखे जाते हैं. हर महीने दो एकादशी पड़ती है- एक कृष्ण पक्ष में और दूसरा शुक्ल पक्ष में, हर एकादशी व्रत का अपना अलग महत्व है. वैदिक पंचांग के अनुसार, कुछ दिनों में आषाढ़ मास की शुरुआत होने वाली है. इस महीने की पहली एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं. इस एकादशी के दिन भी व्रत रखकर भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना की जाती है. कहते हैं कि इस एकादशी के व्रत से अनेक प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है. ऐसे में चलिए जानते हैं कि जून में योगिनी एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा, व्रत-पूजन के लिए शुभ मुहूर्त और महत्व क्या है. सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत ज्यादा महत्व है। यह भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित है। हर महीने में एकादशी दो बार मनाई जाती है। एक शुक्ल पक्ष और दूसरी कृष्ण पक्ष में। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘योगिनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि इस एकादशी (Yogini Ekadashi 2025) का उपवास करने से पापों से मुक्ति मिलती है। वहीं, इसकी डेट को लेकर लोगों में थोड़ी कन्फ्यूजन बनी हुई है, आइए यहां इसकी डेट जानते हैं। कब मनाई जाएगी योगिनी एकादशी 2025? (Yogini Ekadashi 2025 Kab Hai?) हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 21 जून को सुबह 07 बजकर 18 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसकी समाप्ति 22 जून को सुबह 04 बजकर 27 मिनट पर होगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि के अनुसार, तीज-त्योहार मनाए जाते हैं। इसलिए 21 जून को योगिनी एकादशी का उपवास रखा जाएगा। योगिनी एकादशी 2025 पूजा विधि (Yogini Ekadashi 2025 Puja Vidhi) योगिनी एकादशी का महत्व:Importance of Yogini Ekadashi हिंदू धर्म में योगिनी एकादशी का विशेष महत्व है. शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि जो कोई किन्हीं कारणों से निर्जला एकादशी का व्रत नहीं रख सकते, वे इस एकादशी का व्रत रखकर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं. इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की उपासना करने से विशेष फल प्राप्त होता है. इस दिन भगवान को खीर का भोग लगाना चाहिए. इसके अलावा इस दिन ‘ओम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ इस मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए. मान्यता है कि ऐसा करने से बीमारी से मुक्ति मिलती है. योगिनी एकादशी का धार्मिक महत्व (Yogini Ekadashi 2025 Significance) योगिनी एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में बहुत ज्यादा महत्व है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा जाता है कि जो साधक इस कठिन उपवास का पालन करते हैं, उन्हें आरोग्य और सुख-समृद्धि का वरदान मिलता है। ऐसे में इस पावन दिन उपवास जरूर करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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Nirjala Ekadashi:निर्जला एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए? रखें इन बातों का ध्यान

Nirjala Ekadashi:निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025) का व्रत ज्येष्ठ महीने में किया जाता है जिसमें 24 घंटे बिना पानी पिए रहना होता है। गर्मी में यह व्रत मुश्किल हो सकता है इसलिए व्रत से एक दिन पहले शरीर को हाइड्रेट रखें और धूप में निकलने से बचें। साथ ही कुछ और बातों को ध्यान में रख आप इस व्रत को अच्छे से कर सकते हैं। हिंदू धर्म में कई तरह के व्रत-उपवास किए जाते हैं। मन की शुद्धि और भगवान का आशीर्वाद पाने के लिए लोग अक्सर व्रत-उपवास करते हैं। सिर्फ धार्मिक ही नहीं साइंस के मुताबिक भी फास्टिंग सेहत के लिए फायदेमंद होती है। हिंदू धर्म में यूं तो कई तरह के व्रत किए जाते हैं, लेकिन एकादशी व्रत का काफी ज्यादा महत्व माना जाता है। खासकर निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi 2025) का व्रत सभी एकादशी में अहम माना जाता है। हर साल ज्येष्ठ महीने में निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025) का व्रत किया जाता है। इस साल 6 जून को यह व्रत किया जाएगा। जैसाकि नाम से ही पता चलता है कि यह व्रत यानी बिना पानी पिए किया जाता है। इस दौरान लोग 24 घंटे बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं। ऐसे में गर्मी के मौसम में बिना कुछ खाए-पिए रहना मुश्किल हो जाता है, जिससे कई बार तबीयत भी खराब हो सकती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल में हम आपको कुछ ऐसे टिप्स बताएंगे, जिनका फॉलो कर आप बिना तबीयत बिगाड़े निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi fasting tips) का व्रत कर सकते हैं। निर्जला एकादशी Nirjala Ekadashi का व्रत 24 घंटे के लिए रखा जाता है। इसका मतलब है कि इस व्रत को अगले दिन यानी द्वादशी को खोला जाता है। ऐसे में पूरा एक दिन पानी के बिना रहने से शरीर डिहाइड्रेशन का शिकार बन सकता है। इसलिए व्रत के एक दिन पहले आप बॉडी को अच्छी तरह से हाइड्रेट कर लें। इसके लिए ढेर सारा पानी और नारियल पानी पिएं। साथ ही ढेर सारे फलों को डाइट में शामिल करें। धूप में निकलने से बचें:avoid exposure to sunlight अगर आप निर्जला एकादशी का व्रत रख रहे हैं, तो इस दौरान धूप में निकलने से बचें। इस दिन आप वैसे ही पानी नहीं पीते हैं। ऐसे में धूप में निकलने से गर्मी की वजह से आप डिहाइड्रेशन का शिकार हो सकते हैं, जिससे आपकी तबीयत बिगड़ सकती है। इसलिए कोशिश करें कि आप घर या कहीं अंदर ही रहें। एक साथ ढेर सारा पानी न पिएं:Do not drink a lot of water at once पूरे एक दिन बिना पानी पिए रहना काफी मुश्किल होता है। ऐसे में जब लोग व्रत खोलते हैं, तो एक साथ ढेर सारा पानी पी जाते हैं। हालांकि, ऐसा करना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए व्रत खोलते समय थोड़ा पानी पिएं और फिर इसे घूंट-घूंट करके पीते रहें। Nirjala Ekadashi 2025 Vrat Niyam  हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान विष्णु की उपासना के लिए खास माना गया है। हिंदू पंचांग के आधार पर यह व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। इस व्रत में भक्त अन्न व जल ग्रहण नहीं करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से 24 एकादशी का फल मिलता है व भगवान विष्णु की कृपा से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, निर्जला या भीमसेनी एकादशी के दिन कुछ कार्यों को करने की मनाही होती है। जानें- 1. इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में कीड़े मकोड़े के रूप में जन्म लेता है। 2. इस दिन नमक का सेवन नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि नमक का सेवन करने से एकादशी व गुरु ग्रह का फल खत्म हो जाता है। 3. एकादशी के दिन तुलसी को जल अर्पित नहीं करना चाहिए और न ही छूना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन तुलसी माता उपवास करती हैं। तुलसी को मां लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। 4. इस दिन किसी के प्रति बुरे या अपमानजनक शब्द प्रयोग नहीं करने चाहिए। Nirjala Ekadashi इस दिन क्रोध नहीं करना चाहिए और वाद-विवाद से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। 5. एकादशी के दिन बाल या नाखून काटना अशुभ माना गया है। What to do on the day of Ekadashi:एकादशी के दिन क्या करें- 1. एकादशी के दिन अधिक से अधिक मां लक्ष्मी व भगवान विष्णु की अराधना करनी चाहिए। 2. भगवान विष्णु को तुलसी दल युक्त प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। 3. भगवान विष्णु की आरती करनी चाहिए। 4. इस दिन गरीब व जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए।

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Krishnapingal Chaturthi 2025 Date:कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी कब है ? इस पवित्र अवसर पर करे ये कार्य

Krishnapingal Chaturthi 2025 Date:हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर चंद्र महीने में दो चतुर्थी तिथियां होती हैं। कृष्ण पक्ष के दौरान पूर्णिमा या पूर्णिमा के बाद आने वाली को संकष्टी चतुर्थी के रूप में जाना जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष के दौरान अमावस्या या अमावस्या के दिन आने वाली को विनायक चतुर्थी के रूप में जाना जाता है। वर्ष में कुल 12 संकष्टी चतुर्थी व्रत होते हैं और कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी 12 संकटहर गणेश चतुर्थी व्रतों में से एक है। हर महीने, अलग-अलग पीठों के साथ-साथ भगवान गणेश के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है, जिसका विवरण नीचे दिया गया है: कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी शुभ मुहूर्त (Krishnapingal Chaturthi 2025 Date) Krishnapingal Chaturthi:वैदिक पंचांग के अनुसार, 14 जून को दोपहर 03 बजकर 46 मिनट पर आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि शुरू होगी। वहीं,  15 जून को दोपहर 03 बजकर 51 मिनट पर आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि का समापन होगा। तिथि गणना से 14 जून को कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी मनाई जाएगी। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर चन्द्रोदय का शुभ समय 10 बजकर 07 मिनट है। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी शुभ योग (Krishnapingal Sankashti Chaturthi 2025 Shubh Yoga) आषाढ़ महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर इंद्र योग का संयोग दोपहर 03 बजकर 13 मिनट से हो रहा है। साथ ही भद्रवास का भी योग है। इन योग में भगवान गणेश की पूजा करने से हर मनोकामना पूरी होगी। कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी का महत्व:Importance of Krishna Pingla Sankashti Chaturthi Krishnapingal Chaturthi:कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी ज्येष्ठ महीने में आती है, जैसा कि गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में अमावस्यांत कैलेंडर के अनुसार होता है। उत्तर भारतीय हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह आषाढ़ महीने में आता है। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश अपने सभी भक्तों के लिए पृथ्वी पर अपनी उपस्थिति प्रदान करते हैं। हर महीने अलग-अलग नाम और पीता से गणेश जी की पूजा की जाती है। साथ ही, प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी को संकष्ट गणपति पूजा की जाती है। प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी के साथ अलग-अलग कथाएं जुड़ी हुई हैं। पारंपरिक कहानियां बताती हैं कि यह वह दिन है जब भगवान गणेश को भगवान शिव ने सर्वोच्च देवता घोषित किया था। Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से भक्तों को जीवन में आने वाली हर समस्या से दूर रहता है और सभी दोषों और पापों से छुटकारा मिलता है। इसके अतिरिक्त, यह वह दिन है जो सभी कठिनाइयों, बाधाओं को दूर करता है और भक्तों को स्वास्थ्य, धन और समृद्धि प्रदान करता है। रुद्राभिषेक पूजा करके स्वास्थ्य, धन, समृद्धि और सुख प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आशीर्वाद लें! कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी के लाभ:Benefits of Krishna Pingla Sankashti Chaturthi Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होने की संभावना है। भगवान गणेश आपके रास्ते में आने वाली सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करेंगे और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने में आपकी मदद करेंगे। कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी पर प्रार्थना करने से सभी चिंताएं दूर हो जाएंगी और आपके जीवन से जटिल परिस्थितियों को सुलझाने में मदद मिलेगी। भगवान गणेश आपको और आपके परिवार को समृद्धि और दीर्घायु प्रदान करते हैं। कृष्ण पिंगला संकष्टी चतुर्थी अनुष्ठान:Krishna Pingala Sankashti Chaturthi Rituals Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व है। भक्त सुबह जल्दी उठते हैं, तैयार हो जाते हैं और दिन को भगवान गणेश की पूजा करते हैं। कई भक्त कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी रखते हैं जिसमें उन्हें फल और दूध की चीजें खाने की अनुमति होती है। भगवान गणेश की मूर्ति को दूर्वा घास और ताजे फूलों से सजाया गया है। एक दीपक जलाया जाता है और भगवान गणेश के वैदिक मंत्रों का जाप किया जाता है। शाम को, संकष्टी पूजा चंद्रमा या चंद्र भगवान को समर्पित की जाती है। साथ ही, इस दिन विशेष नैवेद्य या भोग तैयार किया जाता है, Krishnapingal Chaturthi जिसमें भगवान गणेश का पसंदीदा व्यंजन मोदक (नारियल और गुड़ से बनी मिठाई) शामिल होता है। गणेश आरती की जाती है और बाद में सभी भक्तों के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी के व्यक्तिगत अनुष्ठानों के लिए हमारे विशेषज्ञ ज्योतिषियों से परामर्श करें। आशा है कि इस दिन आपके सभी सपने पूरे होंगे, हैप्पी कृष्णपिंगला संकष्टी चतुर्थी! शिववास योग:Shivvas Yoga Krishnapingal Chaturthi:कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी पर शिववास योग का संयोग है। Krishnapingal Chaturthi इस योग का निर्माण दोपहर 03 बजकर 46 मिनट से हो रहा है। इस शुभ अवसर पर देवों के देव महादेव कैलाश पर जगत की देवी मां पार्वती के साथ विराजमान रहेंगे इस समय में भगवान शिव का अभिषेक करने से साधक को सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी।

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Nirjala Ekadashi Vrat Niyam:निर्जला एकादशी का व्रत कर रहे हैं, तो जानिए कब पी सकते हैं पानी

Nirjala Ekadashi Vrat Niyam:निर्जला एकादशी का व्रत 6 जून को है। इस व्रत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा का महत्व है। व्रत करने वाले को पूरे दिन जल का त्याग करना होता है जिससे यह व्रत कठिन माना जाता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने और झूठ चोरी से बचने की सलाह दी जाती है। Nirjala Ekadashi 2025:हर माह में दो एकादशी के व्रत होते हैं। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी व्रत रखा जाएगा। Nirjala Ekadashi Vrat Niyam पंचांग के अनुसार, इस साल निर्जला एकादशी का व्रत 6 जून को है। यह व्रत करना जितना कठिन है, उतना ही फलदायी भी है। मान्यता है कि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को समस्त भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। मरने के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह विष्णु लोक में वास करता है।  जैसा कि इस व्रत के नामNirjala Ekadashi Vrat Niyam निर्जला एकादशी से ही स्पष्ट है इस दिन उपवास रखने वाला व्यक्ति पानी नहीं पी सकता है। ज्येष्ठ के महीने में जब गर्मी अपने चरम पर होती है, तब इस व्रत को करना और भी मुश्किल हो जाता है। यदि व्रत के दौरान जल ग्रहण कर लिया जाए, तो व्रत टूट जाता है और उसका फल नहीं मिलता है।  निर्जला एकादशी पर करें तुलसी से ये उपाय (Do These Remedies With Tulsi On Nirjala Ekadashi Vrat Niyam ) कब पी सकते हैं पानी:When can you drink water ? Nirjala Ekadashi Vrat Niyam:निर्जला एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करना चाहिए। उसके बाद ही वह पानी पी सकता है। निर्जला एकादशी के दिन सुबह उठने के बाद पहली बार जल का इस्तेमाल सिर्फ नहाने के लिए किया जा सकता है।  Nirjala Ekadashi Vrat Niyam इसके बाद व्रत का संकल्प लेने के दौरान और आचमन करते समय व्रत करने वाला व्यक्ति पानी का उपयोग कर सकता है। इसके बाद पूरे दिन पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। हालांकि, हाथ-मुंह धोने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन पीने के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।    Nirjala Ekadashi Vrat Niyam 2025 1. निर्जला एकादशी व्रत में अन्न व जल पूरी तरह से वर्जित है। इसमें फलाहार भी मान्य नहीं है। 2. इस व्रत में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और शारीरिक इच्छाओं पर कंट्रोल रखना चाहिए। 3. इस दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए व व्रत कथा का पाठ करना चाहिए। 4. एकादशी व्रत करने के बाद अगले दिन व्रत पारण के समय ही पानी पीना चाहिए। 5. निर्जला एकादशी के दिन तुलसी के पौधे को जल नहीं अर्पित करना चाहिए क्योंकि इस दिन तुलसी माता भी व्रत करती हैं। 6. निर्जला एकादशी के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन दान-पु्ण्य भी लाभकारी माना गया है। 7. निर्जला एकादशी के दिन पलंग पर नहीं सोना चाहिए, भूमि पर ही आराम या शयन करना चाहिए। व्रत में दिन में सोने की मनाही होती है। 8. व्रत के दौरान क्रोध और लोभ जैसे नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए। 9. इस दिन जीव-जंतु को हानि नहीं पहुंचानी चाहिए। इस दिन न ही बाल कटवाने चाहिए और न ही नाखून काटने चाहिए। 10. निर्जला एकादशी के दिन वाद-विवाद से दूर रहना चाहिए।

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Gayatri Jayanti 2025 Date: गायत्री जयंती कब है?रहेगा भद्रा का साया, सही डेट, मुहूर्त और पूजा की विधि, यहां जानें

Gayatri Jayanti 2025 Kab Hai: ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि को माता गायत्री प्रकट हुई थी. ऐसे में इस तिथि पर गायत्री जयंती का पर्व मनाने का विधान है. इस दिन क्या योग बन रहे हैं, भद्रा का साया होगा या नहीं, शुभ मुहूर्ते क्या रहने वाला है, आइए जानें. Gayatri Jayanti 2025: भारतीय संस्कृति की जननी कही जाने वाली मां गायत्री का जन्मोत्सव ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है. इसे गायत्री जयंती भी कहते हैं. हिंदू धर्म में मां गायत्री को वेदमाता(Vedmata) कहा जाता है क्योंकि सभी वेदों (Veda) की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है. आइए जानते हैं गायत्री जयंती 2025 में कब है ? नोट करें डेट, पूजा मुहूर्त और महत्व. गायत्री जयंती 2025 डेट (Gayatri Jayanti 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 06 जून की देर रात 02 बजकर 15 मिनट पर शुरू हो रही है और तिथि का समापन 07 जून को सुबह 04 बजकर 47 मिनट पर हो रहा है. इस तरह उदयाति​थि में गायत्री जयंती  06 जून को मनाई जाएगी. Mata Gayatri Aarti:माता गायत्री आरती गायत्री जयंती 2024 मुहूर्त (Gayatri Jayanti 2024 Muhurat) गायत्री जयंती पर ब्रह्म मुहूर्त सुबह के 04 बजकर 02 बजे से लेकर 04 बजकर 42 बजे तक होगा. गायत्री जयंती पर शुभ समय यानी अभिजीत मुहूर्त की शुरुआत सुबह के 11 बजकर 52 मिनट पर होगी.  गायत्री जयंती पर अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 48 मिनट तक बना रहेगा. Gayatri Chalisa:गायत्री चालीसा क्यों मनाई जाती है गायत्री जयंती ? (Why we celebrate Gayatri Jayanti) गायत्री संहिता में लिखा है ‘भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका॥’यानी गायत्री माता सरस्वती, लक्ष्मी एवं काली का प्रतिनिधित्व करती हैं. मां गायत्री से आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन एवं ब्रह्मवर्चस के सात प्रतिफल अथर्ववेद में बताए गए हैं. इनकी पूजा करने पर व्यक्ति को सभी प्रकार के सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. लंबी आयु का वरदान मिलता है. गायत्री जयंती महत्व (Gayatri Jayanti Significance) शास्त्रों के अनुसार इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर मां गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है, यही कारण है माता गायत्री को सभी शक्तियों का आधार माना गया है.  Gayatri Jayanti मान्यता है कि गायत्री जयंती के दिन ज्ञान की देवी गायत्री से की पूजा करने से वेदों का अध्यन करने के समान पुण्य मिलता है, परिवार में एकता बढ़ती है सुख का वास होता है, ज्ञान में वृद्धि होती है. गायत्री मंत्र (Gayatri Mantra) ॐ भूर् भुवः स्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ गायत्री जयंती 2025 पर शुभ संयोग:Auspicious coincidence on Gayatri Jayanti 2025 ध्यान दें ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर Gayatri Jayanti गायत्री जयंती और निर्जला एकादशी व्रत का अद्भुत और सुंदर संयोग हो रहा है. इस दिन जो भी साधक मां गायत्री की पूजा के साथ साथ अगर निर्जला एकादशी के व्रत का संकल्प करता है तो उसे सभी 24 एकादशी का पुण्य प्राप्त होता है.  गायत्री जयंती 2025 पर भद्रा:Bhadra on Gayatri Jayanti 2025 गायत्री जयंती 2025 पर भद्रा का साया होगा. यह भद्रा पाताल लोक की है जिसका शुरुआत दोपहर के 03 बजकर 31 मिनट पर हो जाएगी और 7 जून को सुबह के 04 बजकर 47 मिनट तक यह बनी रहेगी. भद्रा का वास पाताल है. भद्रा का साया जब तक होगा किसी भी तरह के शुभ कार्य को नहीं किया जाएगा.  वेदमाता गायत्री:Vedamata Gayatri माता गायत्री वेदमाता हैं, मान्यता है कि चारों वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद व सामवेद की उत्पत्ति गायत्री माता से ही हुई है. ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेव भी  माता गायत्री की आराधना कर उनकी कृपा पाते हैं. पौराणिक मान्यता है कि पंचमुखी माता गायत्री की कुल 10 भुजाएं हैं. गायत्री मंत्र का जाप करने से मन शांत होता है और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है. गायत्री मंत्र के जाप से साधक सकारात्मकता, बुद्धि के साथ ही ज्ञान की प्राप्ति कर पाता है. ये है गायत्री मंत्र- ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्.

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Vilakku Pooja 2025 Date:विलक्कु पूजा विधि, महत्त्व और लाभ

Vilakku Pooja 2025:विलक्कु पूजा, भाग्य और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक है। एक समय में बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से महालक्ष्मी की पूजा दीप जलाकर किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है और दुनिया में शांति आती है। थिरु विलक्कु पूजा Vilakku Pooja , ज्यादातर शुक्रवार को या तो सुबह या शाम को दीपक जलाकर की जाती है। यह मुख्य रूप से तमिल महीनों, चिथिरई और वैगासी के दौरान की जाती है, और यह पवित्र दीप पूजा अमावस और पूर्णिमा के दिनों में भी की जा सकती है। Vilakku Pooja विलक्कु पूजा: परिचय विलक्कु पूजा Vilakku Pooja में एक पारंपरिक दीपक (कुथु विलक्कु) को सजाकर, उसमें घी या तिल का तेल भरकर, दीपक जलाया जाता है। यह पूजा घर में या मंदिर में एकल या सामूहिक रूप से की जा सकती है। विशेष अवसरों पर, 108 या 1008 दीपकों के साथ सामूहिक पूजा का आयोजन भी होता है। विलक्कु पूजा कौन करता है? Who performs Vilakku puja? दक्षिण भारत – तमिलनाडु में, अधिकांश गृहिणियां इस तिरुविलक्कू पूजा को 108 जाप के साथ घर पर नियमित रूप से करतीं हैं। दीपक की मंद-मंद चमक मंदिर तथा मंदिर के कमरे को रोशन करती है, जिससे वातावरण शुद्ध और निर्मल रहता है। विलक्कु पूजा क्यों की जाती है?:Why is Vilakku puja performed? दक्षिण भारतीय हिंदुओं के घरों में थिरु-विलक्कू प्रतिदिन जलाया जाता है, क्योंकि थिरु-विलक्कू को माँ महालक्ष्मी का रूप माना जाता है, जो भाग्य और धन की देवी हैं। दिव्य मां लक्ष्मी देवी की कृपा पाने के लिए महिला भक्तों द्वारा थिरुविलक्कू पूजा की जाती है। यह पूजा परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए की जाती है Vilakku Pooja और यह प्रत्येक सदस्य के लिए अच्छाई लाती है। Vilakku Pooja ऐसा माना जाता है कि जो लोग ईमानदारी से मंदिरों में दीया जलाकर थिरु विलक्कू पूजा करते हैं, मां महालक्ष्मी भी उस शुभ कार्यक्रम में उपस्थित होंगी, और वह दीप पूजा में भाग लेने वालों को आशीर्वाद देती हैं। पूजा की विधि:Vilakku puja Vidhi 1. पूर्व तैयारी 2. दीपक की स्थापना 3. पूजा की प्रक्रिया विलक्कु पूजा 2025 की तिथियाँ:Vilakku Puja 2025 Dates विलक्कु पूजा Vilakku Pooja मुख्यतः शुक्रवार को की जाती है, और 2025 में इसकी प्रमुख तिथियाँ निम्नलिखित हैं:​ 108 पोत्री (स्तुति) विलक्कु पूजा के दौरान 108 पोत्री का पाठ किया जाता है, जिसमें देवी की विभिन्न रूपों में स्तुति की जाती है। यह पाठ श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाना चाहिए। विलक्कु पूजा एक सरल और प्रभावशाली पूजा विधि है जो देवी लक्ष्मी और शक्ति की आराधना के माध्यम से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाती है। इस पूजा को नियमित रूप से करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

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Batuk Bhairav Jayanti 2025 Date:जानियें कब और कैसे करें बटुक भैरव जयंती की पूजा ?

Batuk Bhairav Jayanti 2025 Date:बटुक भैरव भगवान शंकर का बाल रूप और सबसे भयानक, विकराल और प्रचंड रूप है. कहते हैं कि बटुक भैरव की पूजा करने से विरोधियों और शत्रुओं का कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं होता. Batuk Bhairav Jayanti 2025 : हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी को बटुक भैरव जयंती मनाई जाती है. इस साल  5 जून 2025, गुरूवार को बटुक भैरव जयंती मनाई जाएगी. इस दिन भोलेनाथ (Lord Shiva) ने भैरव के रूप में अवतार लिया था. शास्त्रों में इस बात का वर्णन है कि वेदों में जिस परम पुरुष का नाम रूद्र है तंत्र शास्त्र में उसी का भैरव के नाम से वर्णन किया गया है. आपको बता दें कि शिव पुराण (Shiv Puran) में भैरव को भगवान शिव का पूर्ण रूप बताया गया है. विद्वानी भगवान शंकर और भैरवनाथ में कोई अंतर नहीं मानते. बटुक भैरव भगवान शंकर का बाल रूप और सबसे भयानक, विकराल और प्रचंड रूप है. कहते हैं कि बटुक भैरव की पूजा करने से विरोधियों और शत्रुओं का कोई भी षड्यंत्र सफल नहीं होता. How is the form of Lord Shri Batuk Bhairav:कैसा है भगवान श्री बटुक भैरव का स्वरूप ? Batuk Bhairav Jayanti:कुछ साधक भगवान के बटुक भैरव रूप को शुद्ध आत्मा का प्रतिनिधित्व करने वाला उसका प्रतीकात्मक रूप मानते हैं। बटुक भैरव भगवन शिव का बाल रूप है जो अतिकोमल है और जिसका रंग गोरा है। इसलिये इन्हे गोरा भैरव के नाम से भी जाना जाता हैं। बालक रुपी भगवान बटुक भैरव की देह की कान्ति स्फटिक की तरह चमकदार है। केश घुंघराले और चमकता हुआ मुख। कमर और पैरों में किंकिणी, नूपुर आदि नव मणियों के अलंकार सज्ज्ति हैं। उनके तीन नेत्र है। भव्य और उज्जवल मुख है। सदा प्रसन्न-चित्त दिखते है। उन्होने हाथों में शूल और दण्ड धारण किए हुए हैं। How to worship Batuk Bhairav:कैसे करें बटुक भैरव की पूजा? बटुक भैरव जयंती (Batuk Bhairav Jayanti) के दिन भगवान बटुक भैरव की पूजा किये जाने का विधान है। इस साधक को भगवान बटुक भैरव के मन्दिर जाकर उनकी पूजा करनी चाहिये। पूजा की विधि इस प्रकार है – प्रात:काल नित्यक्रिया से निवृत्त होकर गंगा नदी में स्नान करें यदि गंगा स्नान सम्भव ना होतो स्नान के जल में गंगा जल डालकर स्नान करें। फिर स्वच्छ सफ़ेद वस्त्र धारण करें। स्नान के बाद व्रत का संकल्प करें। भगवान बटुक भैरव के मंदिर जाकर पूजा करें। Batuk Bhairav Jayanti यदि ऐसा सम्भव ना हो तो शिवालय जाकर भी पूजा कर सकते है। भगवान बटुक भैरव देव को सफ़ेद फूल और केला अर्पित करे। लड्डू और पंचामृत चढ़ाएं। यह सब चढ़ाते हुये इस मंत्र का जाप करते रहें। मंत्र – “ॐ बटुक भैरवाय नमः”। फिर बटुक भैरव स्तोत्र (श्री बटुक भैरव अष्टोत्तर शत-नामावली ) का पाठ करें। आरती करें। गरीबों को प्रसाद बाँटें। इसके बाद बाहर आकर कुत्ते को दूध अवश्य पिलायें। साथ ही पुआ या हलवा भी खिलायें। Significance of Batuk Bhairav Jayanti:बटुक भैरव जयंती का महत्व बटुक भैरव जयंती (Batuk Bhairav Jayanti) के दिन उत्तर भारत में बहुत से बटुक भैरव मंदिरों विशेष पूजा और अनुष्ठानों किये जाते है। तंत्रवाद में विश्वास करने वाले तांत्रिकों द्वारा भगवान शिव के रूप बटुक भैरव और काल भैरव की पूजा की जाती है। इस दिन Batuk Bhairav Jayanti भगवान बटुक भैरव की विधि अनुसार पूजा करने से The story of the origin of Batuk Bhairav:बटुक भैरव की उत्पत्ति की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार अति प्राचीन काल में आपद नाम का एक राक्षस था। Batuk Bhairav Jayanti उसने कठिन तपस्या के द्वारा यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी देवी-देवता नही मार सकेगा। उसकी मृत्यु सिर्फ पाँच वर्ष की आयु वाला कोई बालक ही कर सकेगा। यह वर पाने के बाद आपद निरंकुश हो गया और तीनों लोकों में उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया। देवी – देवता और मनुष्य सभी उसके अत्याचार से परेशान हो गये थे। आपद के द्वारा प्रताडित देवी – देवताओं ने जाकर भगवान शिव से प्रार्थना करी कि वो उनकी आपद से रक्षा करें। तब भगवान शिव जी ने पांच वर्ष के बालक रूप में बटुक भैरव को प्रकट किया। Batuk Bhairav Jayanti इस प्रकार से बटुक भैरव की उत्पत्ति हुई। इसके बाद भगवान बटुक भैरव ने आपद नामक राक्षस का वध करा। उसके बाद से ऐसा कहा जाता है कि इस कलियुग में यदि आपके उपर कोई मुसीबत आये तो बटुक भैरव का ध्यान करें। बटुक भैरव की पूजा करने से मिलता है लाभ:Benefits of worshiping Batuk Bhairav इस बार बटुक भैरव जयंती मनाई जा रही है. Batuk Bhairav Jayanti जयंती पड़ने से इसका महत्व और भी ज्यादा बढ़ गया है. कहा जाता है कि रविवार को भगवान बटुक भैरव की सच्चे मन से साधना और आराधना करने वाले साधक को बुद्धि, बल, विद्या और मान सम्मान की प्राप्ति होती है. Batuk Bhairav Jayanti ज्योतिषियों के मुताबिक राहु केतु के संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए भी बटुक की साधना बहुत ही ज्यादा फलदाई है. बटुक भैरव जयंती के दिन करें उपाय:Remedies to be taken on the day of Batuk Bhairav ​​Jayanti

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