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Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय, गणपति बप्पा की कृपा से घर आएगी सुख-समृद्धि

Ganesh Chaturthi 2025 Upay: गणेश चतुर्थी पर कुछ उपायों को करने से जीवन में सुख-शांति व समृद्धि आती है। जानें भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी पर क्या उपाय करना चाहिए। Ganesh chaturthi remedies 2025: भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन बुद्धि, समृद्धि व सौभाग्य के देवता गणपति बप्पा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करते हैं। Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन तक मनाया जाता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। Ganesh Chaturthi भगवान गणेश की कृपा या आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लोग इस दिन कई तरह के उपाय करते हैं। मान्यता है कि इस दिन कुछ उपायों को करने से गणपति बप्पा की कृपा से जीवन में धन-संपदा आती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। जानें गणेश चतुर्थी के दिन क्या करें उपाय। Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय 1. भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय माने गए हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 2. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। 3. भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से मनवांछित फल मिलता है और धन-धान्य बढ़ता है। 4. अगर संभव हो सके हो तो, गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्यों की विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। 5. भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन करने चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। Ganesh Chaturthi इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Bhuvaneshwari Jayanti 2025

Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date: भुवनेश्वरी जयंती: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा

Bhuvaneshwari Jayanti: हिंदू धर्म में, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भुवनेश्वरी जयंती मनाई जाती है। यह दिन देवी भुवनेश्वरी की साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां भुवनेश्वरी का अवतरण हुआ था। दस महाविद्याओं में से एक, मां भुवनेश्वरी, इस ब्रह्मांड की समस्त शक्ति का आधार हैं। उनका स्वरूप अत्यंत कांतिपूर्ण और सौम्य है, और स्वयं भगवान शंकर ने भी उनके पाठ से समस्त आगमों तथा तंत्रों में विज्ञानी हुए हैं। Bhuvaneshwari Jayanti इस विशेष दिन पर मां भुवनेश्वरी की आराधना करने से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। मां भुवनेश्वरी की महिमा और पूजा का महत्व: मां भुवनेश्वरी को ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जो सृष्टि के पालन, पोषण और संहार का कार्य करती हैं। गुरु के सानिध्य में, गुरु के मुख से अभ्यास करके, जो मनुष्य शिवालय, शून्य घर या चौराहे पर इनके मंत्र का जप करता है, वह योगी बन जाता है। Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date जो एकाग्रचित्त होकर इसे सदा पढ़ता या सुनता है, Bhuvaneshwari Jayanti वह दीर्घायु और सुखी होता है, उसकी वाणी ओजस्वी हो जाती है। ऐसा व्यक्ति गुरु के चरणों में श्रद्धावान होकर स्त्रियों का प्रिय होता है। दुर्भाग्य और कष्टों से मुक्ति का उपाय: मंत्रमहार्णव के अनुसार, जो नारी दुर्भाग्य, धन-धान्य की कमी, रोग और कष्टों से पीड़ित है, उसे भोजपत्र पर देवी का मंत्र लिखकर अपने बाएं हाथ में बांधना चाहिए। ऐसा करने से उसे सुख और सौभाग्य दोनों प्राप्त होते हैं। पुरुषों को यही मंत्र अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। अतः, यदि आप भी इन सभी चीज़ों को प्राप्त करना चाहते हैं, तो Bhuvaneshwari Jayanti भुवनेश्वरी जयंती के दिन आपको मां भुवनेश्वरी की साधना अवश्य करनी चाहिए। भुवनेश्वरी देवी के मंत्र और पूजा विधि: भुवनेश्वरी देवी का एकाक्षरी मंत्र ‘ह्रीं’ है। उनका विशेष मंत्र है: ‘ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:’। पूजा विधि: इस मंत्र का कम से कम 1100 बार जाप करना चाहिए। किसी भी मंत्र का जितना जाप किया जाता है, उसके जप का 10 प्रतिशत हवन, 10 प्रतिशत तर्पण, 10 प्रतिशत मार्जन और 10 प्रतिशत ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। हवन सामग्री: मां भुवनेश्वरी का होम पीपल, गूलर, पलाश, बरगद की समिधाएं, पीली सरसों, खीर और घी आदि से किया जाता है। मंत्र जाप के बाद आप इनमें से किसी भी एक चीज़ का होम कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा राशि अनुसार भुवनेश्वरी जयंती Bhuvaneshwari Jayanti के विशेष उपाय: भुवनेश्वरी जयंती के दिन विभिन्न राशि के जातक अपनी समस्याओं के निवारण और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए विशेष उपाय कर सकते हैं: • मेष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करने के बाद पीपल की समिधा से हवन करें। इससे जीवन में आ रही परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। • वृष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके दूध-चावल से बनी खीर का होम करें। इससे व्यापार में वृद्धि के लिए आर्थिक मदद मिलेगी। • मिथुन राशि: ब्राह्मी और घी को देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से अभिमंत्रित करके पूरे एक साल तक पिएं। इससे आपमें सुंदर कविता करने की अद्भुत क्षमता आएगी। • कर्क राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके बरगद की समिधा से हवन करें। इससे हर तरह के वाद-विवाद से छुटकारा मिलेगा। • सिंह राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके गूलर की समिधा से होम करें। Bhuvaneshwari Jayanti इससे विरोधियों से छुटकारा मिलेगा और भय दूर होगा। • कन्या राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके पीली सरसों का होम करें। इससे आप किसी को भी अपने वश में करने की क्षमता हासिल कर लेंगे। • तुला राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके घी, मधु और शक्कर से युक्त खीर से होम करें। इससे आपको नौकरी में तरक्की मिलेगी। • वृश्चिक राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके चंदन के जल से युक्त चावल से होम करें। आप जिस भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, आपको उस क्षेत्र में सफलता अवश्य मिलेगी। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि • धनु राशि: सुख-सौभाग्य पाने के लिए, भोजपत्र पर देवी भुवनेश्वरी का एकाक्षरी मंत्र “ह्रीं” लिखकर स्त्रियों को अपने बाएं हाथ में और पुरुषों को अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। Bhuvaneshwari Jayanti इससे शीघ्र ही सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होगी और जीवन में कोई अड़चन नहीं आएगी। • मकर राशि: जीवन में खुशहाली के लिए, अपने सामने एक लोटा जल लेकर बैठ जाएं और देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का 21 बार जाप करें। जाप करने के बाद उस जल से अपना अभिषेक करें। ऐसा करने से आपके जीवन में खुशहाली बनी रहेगी. • कुंभ राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके देवी को चंदन, अगर, कपूर और केसर की गंध अर्पित करके, पलाश की समिधा से हवन करें। ऐसा करने से आपको श्रेष्ठ वाणी की प्राप्ति होगी और आप सभी को जल्द ही प्रभावित कर पाने में सफल होंगे। • मीन राशि: शुद्ध जल लेकर, उसे देवी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से इक्कीस बार अभिमंत्रित करना चाहिए और अभिमंत्रित करने के बाद उस जल को पीना चाहिए। इस प्रकार मंत्र से अभिमंत्रित जल का पान करने से आपकी बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होगी। निष्कर्ष: भुवनेश्वरी जयंती (Bhuvaneshwari Jayanti) का यह पावन अवसर मां भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत मौका है। ऊपर बताए गए उपायों और मंत्रों का विधि-विधान से पालन करके आप देवी मां को प्रसन्न कर सकते हैं और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti अपनी राशि के अनुसार उपाय करके आप अपनी विशिष्ट इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं।

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Hartalika Teej

Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम

Hartalika Teej: हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का पावन व्रत मनाया जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस दिन, सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले मां पार्वती ने ही हरतालिका तीज का व्रत रखकर भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। हरतालिका तीज Hartalika Teej का व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत रखने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कुंवारी कन्याओं के विवाह में आ रही परेशानियां दूर होती हैं, साथ ही उन्हें मनचाहा वर भी मिलता है। Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम When is Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज 2025 कब है? इस साल हरतालिका तीज का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त 2025 को रखा जाएगा। हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रातःकाल हरितालिका पूजा मुहूर्त – सुबह 05:56 बजे से 08:31 बजे तक अवधि – 02 घंटे 35 मिनट पहला हरतालिका तीज का व्रत ससुराल में क्यों नहीं करना चाहिए? हरतालिका तीज का व्रत काफी नियमों के साथ किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान शुभ परिणाम को विपरीत परिणाम में बदल सकता है। हरतालिका तीज को लेकर लंबे समय से एक परंपरा चली आ रही है कि नवविवाहित कन्या के द्वारा यह व्रत अपने मायके में ही शुरू किया जाता है। तीज का पहला व्रत ससुराल से नहीं रखा जाता है। इस दौरान नवविवाहित कन्याएं अपने मायके आती हैं और भगवान भोलेनाथ की पूरे धूमधाम से पूजा-आराधना करती हैं। एक बार मायके से व्रत की शुरुआत करने के बाद, आप ससुराल में हों या मायके में, कहीं भी यह व्रत कर सकती हैं। हरतालिका तीज व्रत का रहस्य- बारहवें सतयुग की कथा Hartalika Teej Puja Method:हरतालिका तीज पूजा विधि हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर सभी देवी-देवताओं को धूप-दीप दिखाएं और व्रत का संकल्प लें। पूजा के दौरान, महिलाओं को मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनानी चाहिए। माता गौरी ने भी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर ही भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। इसलिए, व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वे गंगा नदी या आसपास के किसी बहते हुए जलाशय से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं। हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा कर सकती हैं। इसके बाद, मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करें। Hartalika Teej हरतालिका तीज व्रत कथा का पाठ करें और सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें और अखंड सौभाग्य की कामना करें। भगवान को भोग भी लगाएं। हरतालिका तीज पूजन सामग्री की सूची:List of Hartalika Teej puja materials मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए पूजा के दौरान इन सामग्री का विशेष ध्यान रखें: फल, फूल, कपूर, घी, दीपक, मिठाई, सुपारी, पान, बताशा, कुमकुम, पूजा-कलश, सूखा नारियल, शमी का पत्ता, धतूरा, शहद, गुलाल, पंचामृत, कलावा, इत्र, चंदन, मंजरी, अक्षत, गंगाजल, दूर्वा, जनेऊ, बेलपत्र, वस्त्र और केले का पत्ता। यह व्रत जीवन भर रखा जाता है, लेकिन अगर किसी कारणवश इसे रख पाना संभव न हो तो इसका उद्यापन अवश्य करना चाहिए। हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए। मिट्टी से बनानी चाहिए भोलेनाथ की प्रतिमा:Bholenath’s statue should be made of clay ज्योतिषाचार्य ने बताया कि तीज करने के दौरान महिलाओं को चाहिए कि वह मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं. उन्होंने बताया कि सबसे पहले माता गौरी ने हरतालिका तीज का व्रत रखा था और उन्होंने मिट्टी की ही प्रतिमा बनाकर भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और भगवान भोलेनाथ को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था. ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वह गंगा नदी या आसपास के किसी जलाशय जिसका पानी बह रहा हो वहां से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ के प्रतिमा बनाएं. हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा करती हैं. ऐसे में हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए.

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Maharishi Dadhichi

Maharishi Dadhichi Jayanti: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा

Maharishi Dadhichi Jayanti Kab hai: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा Maharishi Dadhichi: हर साल भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को महर्षि दधीचि जयंती पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह दिन एक ऐसे महान संत के सर्वोच्च त्याग को याद करने का अवसर है, जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। वर्ष 2025 में, यह पावन पर्व 31 अगस्त को मनाया जाएगा। आइए, इस विशेष अवसर पर महर्षि दधीचि की प्रेरणादायक कहानी को जानें, जिन्होंने अपने निस्वार्थ बलिदान से देवताओं और संसार की रक्षा की। Maharishi Dadhichi Introduction to a great ascetic: महर्षि दधीचि: एक महान तपस्वी का परिचय महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi प्राचीन काल के सबसे पूज्य और महत्वपूर्ण संतों में से एक माने जाते हैं। वे ऋषि अथर्वा और माता शांति (कुछ मान्यताओं के अनुसार चित्ति) के पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी (या कुछ स्थानों पर शांति, जो कर्दम ऋषि की पुत्री थीं) और पुत्र का नाम पिप्पलाद था। महर्षि दधीचि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन घोर तपस्या में समर्पित कर दिया था। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या के कारण उन्हें पूरे देश में अत्यंत सम्मान प्राप्त था। An attempt to break the doubts and penance of Devraj Indra: देवराज इंद्र की शंका और तपस्या भंग करने का प्रयास एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि दधीचि की घोर तपस्या से तीनों लोकों में भय का माहौल बन गया, और यहां तक कि देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा। इंद्र को लगा कि दधीचि उनके इंद्रलोक और सिंहासन को हथियाना चाहते हैं। इस आशंका में, इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा रूपवती को भेजा। हालाँकि, Maharishi Dadhichi महर्षि दधीचि अपनी एकाग्रता में अटल रहे और अप्सरा अपने प्रयास में विफल रही। रूपवती ने स्वर्ग लौटकर इंद्र को दधीचि की एकाग्र शक्ति के बारे में बताया, जिसके बाद इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने महर्षि से क्षमा याचना की। वृत्रासुर का आतंक और देवताओं की दुर्दशा: The terror of Vritrasura and the plight of the gods समय बीतने के साथ, वृत्रासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को देवलोक से बाहर निकाल दिया था। वृत्रासुर इतना बलशाली था कि देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र उसके सामने निष्प्रभावी हो गए और उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रभावित नहीं कर पा रहा था। देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर सहायता के लिए ब्रह्माजी के पास पहुंचे। Brahmaji’s advice and Maharishi’s amazing sacrifice: ब्रह्माजी की सलाह और महर्षि का अद्भुत त्याग ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि वृत्रासुर का वध केवल महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की अस्थियों से बने विशेष वज्र से ही किया जा सकता है, क्योंकि उनकी हड्डियाँ असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। देवताओं के कल्याण के लिए यही एकमात्र उपाय था। देवराज इंद्र, अपने पूर्व के एक अपमानजनक व्यवहार के कारण महर्षि दधीचि के पास जाने में हिचकिचा रहे थे। (एक कथा के अनुसार, इंद्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था और उनके सिर को धड़ से अलग करने की धमकी दी थी जब महर्षि ब्रह्म विद्या अश्विनीकुमारों को देने वाले थे; अश्विनीकुमारों ने महर्षि के धड़ पर अश्व का सिर लगाकर विद्या प्राप्त की थी, जिसके बाद इंद्र ने उनका असली सिर धड़ से अलग कर दिया था, जिसे बाद में अश्विनीकुमारों ने फिर से जोड़ा था।)। लेकिन वृत्रासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण, उन्हें आखिरकार महर्षि दधीचि के पास जाना पड़ा और अपनी समस्या बताई। महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi ने, बिना किसी संकोच के, देवताओं और संसार के कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने का निर्णय लिया। भगवान शिव से प्राप्त वरदान के कारण उनका शरीर और अस्थियां असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। उन्होंने स्वेच्छा से अपने प्राणों का त्याग कर दिया, ताकि उनकी अस्थियों से वृत्रासुर का वध किया जा सके। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Creation of Vajra and killing of Vritrasura:वज्र का निर्माण और वृत्रासुर का वध महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की पवित्र अस्थियों से देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक शक्तिशाली वज्र का निर्माण किया। देवराज इंद्र ने इसी वज्र का प्रयोग कर वृत्रासुर का वध किया और देवताओं को उसकी आतंक से मुक्ति दिलाई। इस महान बलिदान के कारण, देवताओं और पूरे संसार की रक्षा हुई, और इंद्र की जय-जयकार होने लगी। त्याग की विरासत और पिप्पलाद का जन्म:Legacy of renunciation and birth of Pippalad महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi का यह बलिदान अनुपम है और सदियों से त्याग तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक रहा है। उनकी पत्नी गभस्तिनी को जब इस त्याग का पता चला, तो वह सती होने को तैयार हो गईं। देवताओं ने उन्हें रोका, यह बताते हुए कि वह गर्भवती हैं। तब देवताओं ने उनके गर्भ को निकालकर पीपल के वृक्ष को उसके पालन-पोषण का दायित्व सौंपा। इसी कारण दधीचि के पुत्र का नाम पिप्पलाद ऋषि पड़ा। निष्कर्ष महर्षि दधीचि जयंती हमें निस्वार्थता, त्याग और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा की याद दिलाती है। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि जन कल्याण के लिए सर्वोच्च त्याग भी छोटा होता है। इस पावन दिन पर, हम उन महान ऋषि को नमन करते हैं जिन्होंने अपनी अस्थियों का दान कर मानवता की रक्षा की।

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Durva Ashtami

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व – पाएं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद! Kab Hai Durva Ashtami: हर साल भाद्रपद मास में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधा अष्टमी और अनंत चतुर्दशी प्रमुख हैं। इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण पर्व है दूर्वा अष्टमी। यह पर्व दूर्वा घास को समर्पित है, जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। दूर्वा घास को केवल घास नहीं माना जाता, बल्कि इसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है, जिसका प्रयोग लगभग सभी हिंदू अनुष्ठानों में किया जाता है। आइए जानते हैं दूर्वा अष्टमी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके धार्मिक महत्व को विस्तार से। दूर्वा अष्टमी 2025 कब है? (Durva Ashtami 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 30 अगस्त 2025 को देर रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह तिथि 31 अगस्त 2025 को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है, इसलिए दूर्वा अष्टमी का पर्व 31 अगस्त 2025 (रविवार) को मनाया जाएगा। दूर्वा अष्टमी 2025 के शुभ योग (Durva Ashtami 2025 Shubh Yog) दूर्वा अष्टमी के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। • अनुराधा नक्षत्र: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर अनुराधा नक्षत्र का संयोग शाम 05 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। • ज्येष्ठा नक्षत्र: इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग बनेगा। • भद्रावास योग: इस शुभ अवसर पर भद्रावास योग का निर्माण हो रहा है, जो दिन में 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भद्रा स्वर्ग में रहेंगी, और भद्रा के स्वर्ग में रहने के दौरान पृथ्वी वासियों का कल्याण होता है। दूर्वा अष्टमी का धार्मिक महत्व(Religious significance of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी Durva Ashtami का दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति-भाव से पूजा की जाती है। दूर्वा घास को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है और हिंदू धर्म में कई पूजाएं इसके बिना अधूरी मानी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर व्रत रखने और दूर्वा घास की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और रौनक आती है, साथ ही भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि पौराणिक कथा और दूर्वा घास का महत्व: प्राचीन कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सिर से कुछ बाल गिरे थे, जिन्हें दूर्वा घास माना जाता है। यह भी माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूँदें इस पर गिरी थीं, जिससे यह अत्यंत शुद्ध हो गई। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दूर्वा घास का महत्व बताया था। दूर्वा अष्टमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान(Rituals performed on the day of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी का त्योहार विशेष रूप से महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं: • स्नान और वस्त्र धारण: महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र धारण करती हैं। • विशेष पूजा: दूर्वा अष्टमी के दिन विशेष प्रकार की पूजा और अन्य रीति-रिवाज किए जाते हैं। • भोग और सामग्री: पूजा में फल, फूल, चावल, धूपबत्ती, दही और अन्य आवश्यक पूजन सामग्री के साथ भोग चढ़ाया जाता है। • व्रत का संकल्प: इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं और ईश्वर को भोग अर्पित करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। दूर्वा अष्टमी और पर्यावरण संरक्षण (Durva Ashtami and environmental protection) Durva Ashtami: दूर्वा अष्टमी का पर्व हमें पर्यावरण को सहेजने का भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ी हर एक चीज बहुत महत्वपूर्ण है। दूर्वा घास को घर में भी आसानी से लगाया जा सकता है, और इसे उगाने के लिए विशेष मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती। सबसे बड़ी बात यह है कि दूर्वा घास को घर में लगाने से शुद्धता और पवित्रता का आगमन होता है। यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि पेड़-पौधे लगाना कितना आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। पंचांग (31 अगस्त 2025 के लिए) • सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 19 मिनट पर • सूर्यास्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट पर • चंद्रोदय – दोपहर 12 बजकर 08 मिनट से… • चंद्रास्त – रात 10 बजकर 52 मिनट तक • ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 03 बजकर 48 मिनट से 04 बजकर 33 मिनट तक • विजय मुहूर्त – दोपहर 01 बजकर 43 मिनट से 02 बजकर 33 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट से 06 बजकर 17 मिनट तक • निशिता मुहूर्त – रात 11 बजकर 14 मिनट से 12 बजे तक दूर्वा अष्टमी का यह पावन पर्व हमें प्रकृति के प्रति आदर और भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई है और केवल सामान्य सूचना के लिए है। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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Lalita Saptami 2025

Lalita Saptami 2025 Date: ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि !

Lalita Saptami 2025 Date:ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Lalita Saptami 2025: हिंदू धर्म में भाद्रपद मास का विशेष महत्व है, क्योंकि इस माह में जन्माष्टमी, राधा अष्टमी और गणेश उत्सव जैसे कई प्रमुख त्योहार आते हैं। इन्हीं पावन पर्वों में से एक है ललिता सप्तमी, जो श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। ललिता देवी, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की प्रिय सखी थीं। Lalita Saptami 2025 यह व्रत सुख, सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। आइए जानते हैं साल 2025 में ललिता सप्तमी कब है, इसका महत्व क्या है और पूजा की सही विधि क्या है। ललिता सप्तमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Lalita Saptami 2025 Date and Muhurat) हर साल ललिता सप्तमी, Lalita Saptami 2025 राधाष्टमी से ठीक एक दिन पहले भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। • ललिता सप्तमी 2025 की तिथि: इस वर्ष ललिता सप्तमी का पावन पर्व 30 अगस्त 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। • सप्तमी तिथि का आरंभ: 29 अगस्त 2025, शुक्रवार को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। • सप्तमी तिथि का समापन: 30 अगस्त 2025, शनिवार को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। • ललिता/संतान सप्तमी की पूजा दोपहर में करने का विधान है। ललिता सप्तमी का महत्व (Significance of Lalita Saptami) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी का त्योहार श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं – श्री राधा, श्री ललिता, श्री विशाखा, श्री चित्रा, श्री इंदुलेखा, श्री चंपकलता, श्री रंग देवी, श्री सुदेवी और श्री तुंगविद्या। इन सभी सखियों में से नंदलाल श्री राधा जी और ललिता जी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। देवी ललिता को राधा जी के प्रति सबसे समर्पित गोपी माना गया है और राधा व कृष्ण के प्रेम और रासलीला में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। मान्यता है कि ललिता सप्तमी का व्रत और पूजा करने से सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। Lalita Saptami 2025 इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में पड़ जाते हैं। नवविवाहित जोड़ों को स्वस्थ और सुंदर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद भी मिलता है। इसके अलावा, यह व्रत संतान की अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी रखा जाता है। ललिता सप्तमी पूजा विधि (Lalita Saptami Puja Vidhi) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी के दिन विधि-विधान से पूजा करने पर श्री ललिता देवी, राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं। पूजा करते समय इन बातों का ध्यान रखें: 1. स्नान और ध्यान: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें। 2. देवताओं की स्थापना: इसके बाद, देवी ललिता देवी, राधा-कृष्ण या शालिग्राम की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। आप गणेश जी, देवी पार्वती, देवी षष्ठी, कार्तिक और शिव की भी पूजा कर सकते हैं। 3. सामग्री अर्पित करें: घी का दीपक जलाएँ और देवताओं को नारियल, चावल, हल्दी, चंदन, गुलाल, फूल और दूध प्रसाद के रूप में अर्पित करें। 4. भोग लगाएं: मिठाई का भोग लगाएं। इस दिन विशेष रूप से मालपुए का भोग लगाना बेहद शुभ माना गया है। 5. धागा बांधें: पूजा क्षेत्र में एक लाल धागा या मौली रखें। प्रार्थना के बाद, इसे अपने दाहिने हाथ में पहनें। 6. अर्घ्य और प्रार्थना: अंत में, जल का अर्घ्य दें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 7. व्रत का पालन: उपवास सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक होता है, और दिन में केवल एक बार भोजन किया जाता है। 8. विशेष परिस्थितियों में: कामकाजी महिलाओं, पढ़ाई करने वालों और चिकित्सीय समस्याओं वाले लोगों को उपवास नहीं करना चाहिए; उन्हें केवल प्रार्थना करनी चाहिए। 9. व्रत खोलना: अगले दिन सुबह प्रार्थना करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। देवताओं को चढ़ाए गए फल को प्रसाद के रूप में वितरित करें। ललिता सप्तमी व्रत कथा (Lalita Saptami Vrat Katha) ललिता सप्तमी से जुड़ी दो प्रमुख कथाएँ हैं: 1. राधा-कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी की कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं, जिनमें श्री राधा और श्री ललिता जी प्रमुख थीं। माना जाता है कि श्री कृष्ण इन दोनों से विशेष प्रेम करते थे। ललिता सप्तमी का व्रत श्री कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री Lalita Saptami 2025 ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में लीन हो जाते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ललिता सप्तमी की पूजा करने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है। 2. संतान सप्तमी (ललिता सप्तमी) की पौराणिक कथा: पौराणिक ग्रंथों में ऋषि लोमेश के मुख से संतान सप्तमी (जिसे ललिता सप्तमी भी कहा जाता है) की कथा सुनने को मिलती है। एक कथा के अनुसार, अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती (जो एक ब्राह्मण की पत्नी थी) दोनों में बहुत गहरा प्रेम था। Lalita Saptami 2025 एक बार वे सरयू नदी के तट पर स्नान करने गईं, जहाँ उन्होंने देखा कि बहुत सी स्त्रियाँ संतान सप्तमी का व्रत कर रही थीं। उन स्त्रियों से कथा सुनकर, चंद्रमुखी और रूपमती ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत को करने का निश्चय किया, लेकिन घर आकर वे दोनों इस बात को भूल गईं। कुछ समय बाद, दोनों की मृत्यु हो गई और उन्होंने पशु योनि में जन्म लिया। कई जन्मों के बाद, दोनों ने मनुष्य योनि में फिर से जन्म लिया। इस जन्म में चंद्रमुखी का नाम ईश्वरी और रूपमती का नाम भूषणा था। ईश्वरी राजा की पत्नी बनीं और भूषणा ब्राह्मण की पत्नी थीं, और इस जन्म में भी दोनों में बहुत प्रेम था। Lalita Saptami 2025 इस जन्म में भूषणा को पूर्व जन्म की कथा याद थी, इसलिए उसने संतान सप्तमी का व्रत विधि-विधान से किया, जिसके प्रताप से उसे आठ पुत्र प्राप्त हुए। लेकिन ईश्वरी ने इस व्रत का पालन नहीं किया, इसलिए उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण उसे भूषणा

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Mahalakshmi Vrat

Mahalakshmi Vrat 2025 date:लक्ष्मी व्रत 2025 कब है? पूजा विधि, महत्व और शुभ मुहूर्त

Mahalakshmi Vrat 2025: महालक्ष्मी व्रत 2025: आर्थिक संकटों से मुक्ति और सुख-समृद्धि का अचूक उपाय Mahalakshmi Vrat: क्या आप आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं? क्या धन, सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति के रास्ते बंद नजर आ रहे हैं? यदि ऐसा है, तो महालक्ष्मी व्रत आपके लिए एक बहुत ही कारगर और अचूक उपाय साबित हो सकता है। यह 16 दिवसीय व्रत धन और समृद्धि की देवी, माता महालक्ष्मी को समर्पित है, जिनके प्रताप से कंगाल भी धनवान बन जाता है और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा की संपूर्ण विधि। महालक्ष्मी व्रत का महत्व ( Significance of Mahalaxmi Vrat) महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि से आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि तक 16 दिनों तक मनाया जाता है। इन 16 दिनों में माता महालक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। Mahalakshmi Vrat मान्यता है कि जो भक्त इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी की असीम कृपा बनी रहती है, Mahalakshmi Vrat और उनके जीवन से सभी दुख-दर्द और आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं। Mahalakshmi Vrat यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो धन संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं और जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। महालक्ष्मी व्रत 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Mahalaxmi Vrat 2025 Date and Muhurat) इस साल, महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 31 अगस्त 2025 से होगी और इसका समापन 14 सितंबर 2025 को होगा। • भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि: 30 अगस्त 2025 को रात 10 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी। • अष्टमी तिथि का समापन: अगले दिन 1 सितंबर 2025 को सुबह 12 बजकर 57 मिनट पर होगा। • चंद्रोदय का समय: दोपहर 1 बजकर 11 मिनट। कुल मिलाकर यह व्रत 16 दिनों का होता है, जिसमें से संपूर्ण व्रत के दिन 15 होते हैं। महालक्ष्मी पूजा विधि (Mahalaxmi Puja Vidhi) महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधिवत रूप से करने पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा भक्तों पर बरसाती हैं। पूजा करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें: 1. सबसे पहले, भगवान गणेश के साथ मां लक्ष्मी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। 2. मां के सामने गुलाब और कमल के फूल, साड़ी, सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, बिछिया, धूप, दीप और फल अर्पित करें। 3. एक गुलाबी या लाल रंग का धागा लें, उसमें 16 गांठें लगाएं और उसकी भी पूजा करें। यह प्रक्रिया आपको 15 दिनों तक करनी है। 4. इसके बाद, महालक्ष्मी मंत्र का जाप करें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 5. व्रत के अंतिम दिन (आश्विन कृष्ण अष्टमी), मां लक्ष्मी की मूर्ति का विसर्जन कर दें। Mahalakshmi Vrat आप चाहें तो मूर्ति को अपने पूजा घर में भी स्थापित कर सकते हैं। 6. जब व्रत पूरा हो जाए, तो वस्त्र से एक मंडप बनवाएं और उसमें लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें। 7. प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। 8. सोलह प्रकार से पूजा करें। 9. रात्रि के समय तारागणों को पृथ्वी के प्रति अर्घ्य दें और लक्ष्मी जी की प्रार्थना करें। 10. व्रत रखने वाली स्त्रियाँ ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उनसे हवन करवाएं। हवन में खीर की आहुति दें। 11. चंदन, ताल, पत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल और नाना प्रकार के पदार्थ नए सूप में सोलह-सोलह की संख्या में रखें। 12. फिर दूसरे नए सूप से ढक कर निम्न मंत्र को पढ़कर लक्ष्मीजी को समर्पित करें: क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा। व्रतेनाप्नेन सन्तुष्टा भवर्तोद्वापुबल्लभा।। 13. इसके बाद, चार ब्राह्मण और सोलह ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करें। फिर घर में बैठकर स्वयं भोजन करें। नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ अगर 16 दिन व्रत न रख पाएं तो क्या करें? (What if you can’t fast for 16 days?) यह व्रत धन और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए किया जाता है। यदि किसी कारणवश आप पूरे 15 दिन का व्रत नहीं रख पाते हैं, Mahalakshmi Vrat तो आप व्रत के शुरुआत के 3 दिन या फिर आखिर के 3 दिन भी व्रत रख सकते हैं। Mahalakshmi Vrat माना जाता है कि ऐसा करने से भी व्रत पूरा हो जाता है और आपको महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार जो भक्त विधि-विधान से महालक्ष्मी व्रत Mahalakshmi Vrat करते हैं, वे इस लोक में सभी सुखों का भोग करते हैं और बहुत काल तक लक्ष्मी लोक में भी सुख पाते हैं। तो, इस साल महालक्ष्मी व्रत का संकल्प लें और अपने जीवन में धन, सुख और समृद्धि का आह्वान करें!

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Daslakshan Parva

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व : आत्मशुद्धि और धर्म की ओर एक आध्यात्मिक यात्रा

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे आत्मा की शुद्धि और धर्म के दस मूल लक्षणों को आत्मसात करने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व आमतौर पर पर्युषण के तुरंत बाद शुरू होता है और लगातार 10 दिनों तक चलता है। इस दौरान जैन अनुयायी आत्म-नियंत्रण, साधना, और तपस्या के माध्यम से अपने भीतर दिव्यता को जाग्रत करने का प्रयास करते हैं। सुगंध दशै – Sugandh Dashain पर्व सुगंध दशै दिन जिनवर पूजै अति हरषाई,सुगंध देह तीर्थंकर पद की पावै शिव सुखदाई ॥ दिगंबर जैन धर्म में सुगंध दशमी का बहुत महत्‍व है। दसलक्षण पर्व के अंतर्गत भाद्रपद शुक्ल पक्ष में आने वाली दशमी के दिन जैन समाज के सभी लोग सुगंध दशमी पर्व मनाते है। Daslakshan Parva इस व्रत को विधिपूर्वक करने से हमारे अशुभ कर्मों का क्षय होकर हमें पुण्‍यबंध, मोक्ष तथा उत्‍तम शरीर प्राप्ति होगी। सुगंध दशमी के दिन पांच पापों यानी हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का त्‍याग करें। सुगंध दशमी के दिन जैन समाज के भक्त जैन मंदिरों में जाकर चौबीस तीर्थंकरों को धूप अर्पित करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं, हे भगवान! मैं आपके नाम का ध्यान धरकर मोक्ष प्राप्ति की कामना करता हूं। इससे वायुमंडल अत्यधिक सुगंधमय व स्‍वच्‍छ हो जाता है। दशमी के दिन खास तौर पर सभी मंदिरों में विशेष साज सज्जा के साथ आकर्षक मंडल विधान सजाएं जाते हैं तथा धर्म के बारे में समझाते हुए झांकियों का निर्माण किया जाता है। रात्रि को मदिरों में सुगंध दशमी कथा का वाचन भी किया जाता है। Daslakshan Parva सुगंध दशै को सुगंध दशमी, धूप दशमी तथा धूप दशै के नाम से भी जाना जाता है। सुगंध दशमी का अर्घ्यसुगंध दशमी को पर्व भादवा शुक्ल में,सब इन्द्रादिक देव आय मधि लोक में ।जिन अकृत्रिम धाम धूप खेवै तहां,हम भी पूजत आह्वान करिकै यहां ॥ क्षमा वाणी दिवस – Kshama Vani Diwas पर्युषण के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाता है। और उसके अगले दिन सभी व्यक्ति एक दूसरे से क्षमा माँगते हैं, यह दिन क्षमा दिवस के नाम से जाना जाता हैं। इसमें सभी जाने अनजाने होने वाली गलतियों के लिए सभी मनुष्य, जीव-जन्तुओ, पशु-पक्षियों से क्षमा मांगता हैं। क्षमा मांगना एवम करना यह दोनों ही धर्मो में श्रेष्ठ माने जाते हैं। Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व 2025 में लगभग 28 अगस्त से शुरू होकर 6–9 सितंबर तक चलेगा (अंतर हो सकता है परंपरा एवं पंचांग के अनुसार)। कृपया सुनिश्चित जानकारी के लिए अपने स्थानीय जैन मंदिर या पंचांग देखें।” गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि क्षमावाणी सन्देश:करबद्ध हैं नमनमित्र सखा सभी जीवंतहो अगर भूल कोई मुझसेतो क्षमाप्रार्थी हूँ मैं सबसेयह अनमोल भेंट देकर मुझेकृतज्ञ करे इस जीवन मैंउत्तम क्षमा दशलक्षण पर्व के दस धर्म लक्षण :Ten religious characteristics of Daslakshan Parva प्रत्येक दिन एक धर्म लक्षण को समर्पित होता है। Daslakshan Parva ये दस लक्षण आत्मा को निर्मल और पवित्र बनाने में सहायक माने जाते हैं पर्व का महत्व :importance of festival दसलक्षण पर्व का इस तरह होता है समापन Dasalakshan festival ends like this अनंत चतुर्दशी के दिन दसलक्षण पर्व Daslakshan Parva का समापन होता है और इस दिन शाम को मंदिर में सभी भक्त जन एक साथ प्रतिक्रमण करते हुए पूरे साल में किये गए पाप और कटू वचन के लिए क्षमा याचना करते हैं। वह हर किसी से दिल से क्षमा मांगते हैं और एक-दूसरे से हाथ जोड कर व गले मिलकर मिच्छामी दूक्कडम कहते हैं, जिसका अर्थ है सबको क्षमा सबसे क्षमा। Daslakshan Parva यहां तक कि उस समय जो लोग उपस्थित नहीं थे, उनसे भी वह दूसरे दिन क्षमा याचना करते हैं। इस तरह दसलक्षण पर्व की समाप्ति होती है।

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Nuakhai

Nuakhai 2025 Date: नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ

Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ परिचय: नुआखाई (Nuakhai) केवल एक त्योहार नहीं है; यह पश्चिम ओडिशा की आत्मा है, जो कृषि समाज में प्रकृति, कृतज्ञता और एकता का प्रतीक है। ‘नुआ’ का अर्थ है नया और ‘खाई’ का अर्थ है खाना। यह नए चावल का त्योहार है, जहाँ किसान अपनी पहली फसल देवताओं को अर्पित करके आभार व्यक्त करते हैं। यह सिर्फ एक क्षेत्रीय उत्सव नहीं है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है। नुआखाई का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व: कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि नुआखाई Nuakhai वैदिक युग से जुड़ा हुआ है, जहाँ नए अन्न को अर्पित करने की परंपरा थी। प्राचीन समय में, राजा भी राज्य की एकता और समृद्धि के लिए इस पर्व को मनाते थे, Nuakhai जिससे यह एक बड़े सामाजिक पर्व के रूप में विकसित हुआ। Nuakhai पश्चिम ओडिशा के संबलपुर, बोलंगीर और कालाहांडी जैसे क्षेत्रों में यह एक महत्वपूर्ण सामूहिक उत्सव है। यह भोजन से कहीं बढ़कर, सम्मान और प्रेम का पर्व है, जहाँ मनुष्य प्रकृति और अपनी परंपराओं से जुड़ता है। नुआखाई 2025 की शुभ तिथि और मुहूर्त: नुआखाई के लिए शुभ मुहूर्त का निर्धारण ज्योतिषियों द्वारा किया जाता है। साल 2025 में, माँ समलेश्वरी को नए अन्न की पहली पेशकश के लिए नुआखाई का लग्न 28 अगस्त, गुरुवार को तय किया गया है। • तिथि: भाद्रव शुक्ल पक्ष पंचमी • शुभ मुहूर्त: सुबह 10 बजकर 33 मिनट से 10 बजकर 55 मिनट के बीच। • लग्न: तुला लग्न, मीन राशि में। Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव Nuakhai नुआखाई यह मुहूर्त संबलपुर के ब्रह्मपुरा मंदिर परिसर में पंडित मंडली द्वारा निर्धारित किया गया था। निर्धारण के बाद, लग्न पत्र ब्रह्मपुरा मंदिर ट्रस्ट कमेटी के सदस्यों द्वारा मंदिर के पुजारियों को प्रदान किया गया, और फिर माँ समलेश्वरी को अर्पित किया गया। इस लग्न के अनुसार, सबसे पहले माँ समलेश्वरी को नया अन्न अर्पित किया जाएगा, जिसके बाद पूरे पश्चिम ओडिशा में नुआखाई मनाया जाएगा। नुआखाई के मुख्य अनुष्ठान और उत्सव: नुआखाई की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। घर की साफ-सफाई की जाती है, पारंपरिक व्यंजन जैसे पीठा बनाए जाते हैं, और नए कपड़े खरीदे जाते हैं। 1. पूजा और अन्न अर्पण (नवाखाई अनुकूल मुहूर्त): निर्धारित शुभ मुहूर्त पर, नया अन्न (नवान्न) सबसे पहले देवी समलेश्वरी सहित अन्य देवताओं को अर्पित किया जाता है। यह कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पवित्र क्षण होता है, जहाँ यह माना जाता है कि देवता इस शुभ क्षण में प्रसाद स्वीकार करते हैं और वर्ष भर समृद्धि बनी रहती है। 2. परिवार का मिलन: देवताओं को भोग लगाने और प्रार्थना करने के बाद, परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर उस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। यह परिवार के लिए एकजुट होने और बंधन का एक महत्वपूर्ण क्षण होता है। 3. नुआखाई जोहार (भेदघाट): प्रसाद ग्रहण करने के बाद, त्योहार का सामाजिक पहलू शुरू होता है, जिसे ‘नुआखाई जोहार’ या ‘भेदघाट’ कहा जाता है। लोग एक-दूसरे के घरों में जाते हैं, दोस्तों और पड़ोसियों को शुभकामनाएँ देते हैं। बच्चे और युवा बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं, जो सम्मान और स्नेह का प्रतीक है। ओडिशा से बाहर भी नुआखाई: यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज की व्यस्त जीवनशैली में भी, नुआखाई की परंपरा को लोग संजो कर रखे हुए हैं। ओडिशा के बाहर, यहाँ तक कि विदेशों में भी, पश्चिम ओडिशा के लोग इस पर्व को मनाते हैं। भुवनेश्वर, बेंगलुरु, दिल्ली, या दुबई में भी लोग पारंपरिक संबलपुरी पोशाक पहनकर, संबलपुरी गीतों पर नाचकर, और ढोल-निशान बजाकर अपनी मिट्टी की खुशबू महसूस करने की कोशिश करते हैं। भले ही उनके पास धान के खेत न हों, लेकिन एकता, आनंद, और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना ही मुख्य है। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि Nuakhai Kaise Manaya Jata:नुआखाई कैसे मनाया जाता है पश्चिमी ओडिशा की देवी, माँ समलेश्वरी को एक नई फसल या नबन्न का भोग लगाया जाता है। मुख्य पुजारी के आवास पर देवी के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है।देवी समलेश्वरी को नबन्न अर्पित करने के बाद, लोगों के बीच भोजन वितरित किया जाता है और वे इसे एक साथ खाते हैं। सभी रस्में पूरी करने के बाद, लोग स्वादिष्ट भोजन तैयार करते हैं और इस त्योहार को बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं।अनुष्ठान पहले क्षेत्र के देवता या ग्राम देवता के मंदिर में देखे जाते हैं। बाद में, लोग अपने-अपने घरों में पूजा करते हैं और अपने घरेलू देवता और हिंदू परंपरा में धन की देवी लक्ष्मी को अनुष्ठान करते हैं। इस दिन, परिवार के प्रत्येक सदस्य नए कपड़े पहनते हैं और वे एक दूसरे को बधाई देते हैं, स्नेह दिखाते हैं और परिवार के बुजुर्ग सदस्यों से आशीर्वाद लेते हैं। इस रस्म को Nuakhai नुआखाई जुहार के नाम से जाना जाता है।लोग रसकेली जैसे पारंपरिक संबलपुरी नृत्य गाते और करते हैं, नुआखाई त्योहार संबलपुरी संस्कृति का प्रतीक है और यह ओडिशा के लोगों को किसी के जीवन में कृषि के महत्व की याद दिलाता है। नुआखाई भारतीय राज्य ओडिशा में एक क्षेत्रीय सार्वजनिक अवकाश है। निष्कर्ष: नुआखाई सिर्फ नया चावल खाने का दिन नहीं है। Nuakhai यह वास्तव में बंधन का एक पर्व है – मिट्टी के साथ मनुष्य का बंधन, परिवार और समाज का बंधन, और अतीत के साथ वर्तमान का बंधन। यह कृतज्ञता और जीवन के उत्सव का एक विचारोत्तेजक त्योहार है। यह हमें उन मूल्यों को याद दिलाता है कि कैसे हम अपने लोगों और प्रकृति के साथ जुड़े रह सकते हैं, खासकर आधुनिक जीवन की दौड़-भाग में।

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Ganesh Chaturthi August 2025 : गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि

Ganesh Chaturthi: हिंदू धर्म में, भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है, जिनकी पूजा हर शुभ कार्य से पहले की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को उनके जन्मोत्सव के रूप में Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन से 10 दिवसीय गणेश महोत्सव का प्रारंभ होता है, जो अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा के विसर्जन के साथ समाप्त होता है। यह पर्व महाराष्ट्र और गुजरात सहित देश के कई राज्यों में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश की पूजा करने से भक्तों के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही, कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है और आर्थिक संकट भी दूर होते हैं। भगवान गणेश को रिद्धि-सिद्धि के दाता और सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाला माना जाता है। उन्हें विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता भी कहा जाता है, जिससे उनके मंगल प्रवेश से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और मंगल ही मंगल होता है। इस साल, गणेश चतुर्थी 27 अगस्त 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। गणेश स्थापना भी इसी दिन होगी और गणेश विसर्जन 6 सितंबर 2025, शनिवार को होगा। Ganesh Chaturthi 2025: Auspicious time: गणेश चतुर्थी 2025: शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, गणेश चतुर्थी की तिथि और पूजा के लिए शुभ समय इस प्रकार है: • चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: 26 अगस्त 2025 को दोपहर 01 बजकर 54 मिनट पर। • चतुर्थी तिथि का समापन: 27 अगस्त 2025 को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर। • गणेश चतुर्थी का दिन: सनातन धर्म में उदया तिथि का मान होता है, इसलिए Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी 27 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें गणेश पूजा के लिए चौघड़िया अनुसार शुभ मुहूर्त: • अमृत मुहूर्त: सुबह 07:33 से 09:09 के बीच। • शुभ मुहूर्त: सुबह 10:46 से दोपहर 12:22 के बीच। • शाम की पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 06:48 से 07:55 के बीच। • राहु काल: दोपहर 12:22 से 01:59 के बीच। इस समय स्थापना और पूजा करने से बचना चाहिए।   विशेष नोट: गणेश पूजन के लिए वैसे मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11:05:15 से 13:39:46 के बीच है, लेकिन इस बीच राहु काल भी रहेगा, इसलिए चौघड़िया मुहूर्त को प्राथमिकता देना उचित रहेगा। गणेश चतुर्थी 2025 पर बन रहे शुभ योग:Auspicious events are taking place on Ganesh Chaturthi 2025: ज्योतिषियों के अनुसार, Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी 2025 पर कई दुर्लभ शुभ योगों का निर्माण हो रहा है: • शुभ योग: इस योग का संयोग दोपहर तक रहेगा। • शुक्ल योग: यह योग 28 अगस्त को दोपहर 01 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगा। • सर्वार्थ सिद्धि योग: शुक्ल योग के बाद सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी तिथि पर यह योग सुबह 06 बजकर 04 मिनट पर निर्मित होगा। • भद्रावास योग: इस योग का समापन दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर होगा। 27 अगस्त 2025 का पंचांग विवरण: • सूर्योदय: सुबह 06 बजकर 28 मिनट पर। • सूर्यास्त: शाम 06 बजकर 14 मिनट पर। • चंद्रोदय: सुबह 08 बजकर 52 मिनट पर। • चंद्रास्त: शाम 08 बजकर 28 मिनट पर। • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 03 बजकर 58 मिनट से 04 बजकर 43 मिनट तक। • विजय मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 58 मिनट से 02 बजकर 49 मिनट तक। • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 14 मिनट से 06 बजकर 36 मिनट तक। • निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर 28 मिनट से 12 बजकर 13 मिनट तक। Auspicious entry and establishment method of Ganpati ji in the house:गणपति जी का घर में मंगल प्रवेश और स्थापना विधि: गणपति बप्पा को प्रसन्न करने और जीवन में मंगल लाने के लिए उनका घर में विधि-विधान से मंगल प्रवेश करवाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1. स्थान की तैयारी:     श्री गणेश जी के आगमन से पहले घर-द्वार और मंदिर को अच्छी तरह सजाएं।     जिस स्थान पर गणेश जी को स्थापित करना है, उस जगह की साफ-सफाई करें।     उस स्थान पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और हल्दी से चार बिंदियां बनाएं।      एक मुट्ठी अक्षत (चावल) रखें और उस पर एक छोटा बाजोट, चौकी या लकड़ी का पाट रखकर उस पर पीला, लाल या केसरिया वस्त्र बिछाएं।     पूजा और आरती का सारा सामान पहले से ही खरीद कर तैयार रखें। 2. मूर्ति खरीदने के लिए प्रस्थान:      बाजार जाने से पहले नवीन वस्त्र धारण करें, सिर पर टोपी या साफा बांधें और रुमाल भी रखें।      पीतल या तांबे की थाली साथ ले जाएं, या फिर लकड़ी का पाट ले जाएं जिस पर गणेश जी को बैठाकर घर लाना है।      घंटी और मंजीरा भी साथ ले जाएं। 3. गणेश प्रतिमा का चयन:      मूर्ति खरीदते समय ध्यान रखें कि गणेश जी की प्रतिमा बैठी हुई हो।     उनके साथ उनका वाहन चूहा और रिद्धि-सिद्धि भी होनी चाहिए।      प्रतिमा सफेद या सिंदूरी रंग की हो।     सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई हो।      गणेश जी पितांबर या लाल परिधान पहने हुए हों और उनके हाथ में लड्डू का थाल हो। इन बातों का ध्यान रखते हुए ही मूर्ति खरीदना उचित रहता है।     बाजार में गणेश जी की जो भी मूर्ति पसंद आए, उसका मोलभाव न करें। उन्हें आगमन के लिए निमंत्रित करके दक्षिणा दे दें। 4. घर में मंगल प्रवेश      गणेश जी की प्रतिमा को धूमधाम से घर के द्वार पर लाएं।     द्वार पर ही उनकी आरती उतारें।      यदि याद हों तो मंगल गीत गाएं या शुभ मंत्रों का उच्चारण करें।   इसके बाद “गणपति बप्पा मोरया!” के नारे लगाते हुए उन्हें घर के अंदर ले आएं और Ganesh Chaturthi प्रसन्नचित्त होकर पहले से तैयार किए गए स्थान पर विराजित कर दें। गणेश चतुर्थी की पूजा विधि:Worship method of Ganesh Chaturthi मंगल प्रवेश के बाद, विधिवत तरीके से भगवान गणेश की पूजा और आरती करें। भक्तजन अपने घरों पर गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा एवं आरती करते हैं। पूजा में धूप, दीप, फूल, फल, मोदक या लड्डू आदि अर्पित करें। इस तरह से Ganesh Chaturthi गणेश जी का मंगल प्रवेश और स्थापना करने से जीवन के सभी

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Rishi Panchami 2025 Date: कब है ऋषि पंचमी? जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

Rishi Panchami 2025: ऋषि पंचमी व्रत का महत्व हिन्दू धर्म में दोषों से मुक्त होने के लिए किया जाता हैं। यह एक त्यौहार नहीं अपितु एक व्रत हैं, इस व्रत में सप्त-ऋषियों की पूजा-अर्चना की जाती हैं। हिन्दू धर्म में माहवारी के समय, स्त्रियों द्वारा बहुत से नियम नियमों का पालन किया जाता हैं। अगर गलती वश इस समय में कोई चूक हो जाती हैं, तो महिलाओं को दोष मुक्त करने के लिए ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। ऋषि पंचमी 2025: कब है? जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि:Rishi Panchami 2025: When is it? Know the importance, auspicious time and method of worship हिंदू धर्म में, ऋषि पंचमी (Rishi Panchami) का त्योहार एक विशेष महत्व रखता है, खासकर महिलाओं के लिए। यह पर्व भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। हर साल यह पर्व गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन पड़ता है। इस साल, ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह व्रत सप्तऋषियों (वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज) के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए रखा जाता है, जिन्होंने वेदों की शिक्षा दी और सनातन धर्म का मार्गदर्शन किया। Significance of Rishi Panchami: Freedom from sins and happy life: ऋषि पंचमी का महत्व: पापों से मुक्ति और सुखमय जीवन Rishi Panchami ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान यदि किसी महिला से अनजाने या जानबूझकर कोई धार्मिक नियम का उल्लंघन हुआ हो, तो यह व्रत उन दोषों का निवारण करता है और शुद्धता की प्राप्ति होती है। यह व्रत नारी शक्ति के सम्मान और पवित्रता को संजोए रखने का प्रतीक है। इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि ऋषि पंचमी Rishi Panchami का व्रत करने से लोगों को संतान प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है। साथ ही, घर में तुलसी पूजन करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे ऋषियों का आशीर्वाद और पवित्रता प्राप्त होती है। 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें ऋषि पंचमी 2025: शुभ मुहूर्त: Rishi Panchami 2025: Auspicious time हिंदू पंचांग के अनुसार, ऋषि पंचमी की पंचमी तिथि और पूजा का शुभ समय इस प्रकार है: • पंचमी तिथि का आरंभ: 27 अगस्त 2025 को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर। • पंचमी तिथि का समापन: 28 अगस्त 2025 को शाम 5 बजकर 56 मिनट तक। • ऋषि पंचमी का दिन: उदया तिथि के अनुसार, ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025 को ही मनाई जाएगी। • पूजन मुहूर्त: 28 अगस्त 2025 को सुबह 11 बजकर 5 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 39 मिनट तक रहेगा। ऋषि पंचमी पूजन विधि: चरण-दर-चरण:Rishi Panchami Puja Method: Step by Step ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा-अर्चना करने से सभी दोष दूर होते हैं। यहां जानिए पूजन की संपूर्ण विधि: 1. सुबह स्नान और संकल्प: इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 2. मंदिर की सफाई: अपने मंदिर की अच्छी तरह सफाई करें, जिससे ग्रंथों की पवित्रता बनी रहे। 3. देवी-देवताओं को स्नान: सभी देवी-देवताओं को गंगाजल से स्नान करवाएं, जिससे उनका स्थान और भी पवित्र हो जाए। 4. सप्तऋषियों की स्थापना: पूजा स्थल पर मिट्टी का चौकोर मंडल बनाकर, उस पर सप्तऋषियों की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि प्रतिमा न हो, तो सात छोटे पात्रों में जल, चावल, पुष्प और अन्य पूजा सामग्री रखकर उनका प्रतीकात्मक रूप से पूजन कर सकते हैं। उनकी तस्वीर के सामने साफ पानी भरा एक कलश रखें। 5. अभिषेक और पूजन: सप्तऋषियों का गंगाजल, दूध, पंचामृत और शुद्ध जल से अभिषेक करें या छींटे लगाएं। 6. तिलक और धूप-दीप: सप्तऋषियों के माथे पर तिलक लगाएं। फिर धूप और दीपक दिखाएं, ताकि वातावरण पवित्र और शांत बना रहे। 7. पुष्प और सामग्री अर्पित करें: पूजा के दौरान पुष्प, जनेऊ, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। सप्तऋषियों के नाम ध्यान में लेते हुए उन पर पुष्प अर्पित करें। 8. भोग और कथा: पूजा के बाद सप्तऋषियों को मिठाई का भोग लगाएं। 9. व्रत कथा और आरती: अंत में व्रत की कथा सुनें और फिर आरती करें। 10. तुलसी पूजन: इस दिन तुलसी के पौधे के सामने दीप जलाकर उसकी पूजा करें और 108 परिक्रमा करें। ऋषि पंचमी व्रत से प्राप्त होने वाले फल:Results obtained from Rishi Panchami fast ऋषि पंचमी व्रत का पालन करने से जीवन में शुद्धता और सात्विकता की प्राप्ति होती है। जो महिलाएं इस व्रत को करती हैं, उन्हें धार्मिक पवित्रता का लाभ मिलता है और पूर्व जन्मों के दोष भी समाप्त होते हैं। इसके साथ ही, ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

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Hartalika Teej

Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें

Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज का पर्व विशेष महत्व माना जाता है जो माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक उत्तम तिथि है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा किया जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं मां पार्वती को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करती हैं जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। Hartalika Teej 2025: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष महत्व है। साल में कुल 3 तीज पड़ती है, जिसे हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज कहा जाता है। हरियाली तीज श्रावण मास में पड़ती है, तो कजरी और हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास को रखा जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती है। Hartalika Teej 2025 Date इसके साथ ही अविवाहित  महिलाएं अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए इस व्रत को रखने की विधान है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा करने का विधान है। आइए जानते हैं हरतालिका तीज की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, मंत्र और धार्मिक महत्व… Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज हरतालिका तीज मुहूर्त (Hartalika Teej shubh muhurat) भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारम्भ 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 34 मिनट पर हो रहा है। साथ ही इस तिथि का समापन 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, हरतालिका तीज का पर्व मंगलवार, 26 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन गौरी-शंकर की पूजा का मुहूर्त कुछ इस प्रकार रहने वाला है – हरितालिका पूजा मुहूर्त – प्रातः 5 बजकर 56 मिनट से सुबह 8 बजकर 31 मिनट तक गौरी-शंकर पूजा विधि (Shiv-Parvati Puja) हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के पश्चात् साफ-सुथरे विशेषकर हरे या लाल रंग के वस्त्र पहनें। शुभ मुहूर्त में पूजा स्थान पर चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं और स्वयं द्वारा बनाई गई माता पर्वती, भगवान शिव और गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। सबसे पहले गणेश जी का विधिवत पूजन करें और इसके बाद गौरी-शंकर की विधि-विधान से पूजन करें। पूजा में मां गौरी को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करें और हरतालिका तीज व्रत कथा जरूर सुनें। आप पूजा में इन मंत्रों का जप भी कर सकते हैं – हरतालिका तीज पर बन रहे शुभ योग (Hartalika Teej 2025 Shubh Yog) इस साल हरतालिका तीज Hartalika Teej पर काफी शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। इस दिन चंद्रमा मंगल के साथ कन्या राशि में होंगे, जिससे महालक्ष्मी राजयोग बन रहा है। इसके अलावा इस दिन  हस्त नक्षत्र के साथ साध्य, शुभ योग बन रहा है। इसके साथ ही इस दिन सूर्य अपनी स्वराशि सिंह राशि में विराजमान रहेंगे। रतालिका तीज 2025 पर करें इन मंत्रों का जाप (Hartalika Teej 2025 Mantra) देवी पार्वती का मंत्रऊं उमयेए पर्वतयेए जग्दयेए जगत्प्रथिस्थयेए स्हन्तिरुपयेए स्हिवयेए ब्रह्म रुप्नियेए” शिव मंत्रऊं ह्रयेए महेस्ह्अरयेए स्हम्भवे स्हुल् पद्येए पिनक्ध्रस्हे स्हिवये पस्हुपतये महदेवयअ नमह्” हरतालिका तीज व्रत विधि एवं नियम: Hartalika Teej Vrat Vidhi and Niyam हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं। विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम शुद्ध घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात सीधे (दाहिने) हाथ में अक्षत रोली बेलपत्र, मूंग, फूल और पानी लेकर इस मंत्र से संकल्प करें:उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रत महं करिष्ये। इसके बाद कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं। उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका इसके बाद हरतालिका व्रत Hartalika Teej की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं। भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए:ॐ उमायै नम:ॐ पार्वत्यै नम:ॐ जगद्धात्र्यै नम:ॐ जगत्प्रतिष्ठयै नम:ॐ शांतिरूपिण्यै नम:ॐ शिवायै नम: भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए:ॐ हराय नम:ॐ महेश्वराय नम:ॐ शम्भवे नम:ॐ शूलपाणये नम:ॐ पिनाकवृषे नम:ॐ शिवाय नम:ॐ पशुपतये नम:ॐ महादेवाय नम: हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री: Hartalika Vrat Pujan Ki Samgri फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।केले का पत्ता।विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।जनेऊ, नाडा, वस्त्र,।माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।घी, तेल, दीपक,

Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें Read More »