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Heramb Sankashti Chaturthi 2025 Date: कब है भादो माह की हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी, इस तरह करें गणेश जी को प्रसन्न

Heramb Sankashti Chaturthi: गणेश चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन गणेश जी की विशेष पूजा की जाती है। पंचांग के अनुसार हर महीने दो चतुर्थी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। हर महीने पड़ने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। भाद्रपद माह में आने वाली संकष्टी चतुर्थी को हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मुख्य रूप से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन में आने वाले सभी विघ्न दूर हो जाते हैं और साधक पर गणेश जी की कृपा बनी रहती है। संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत रखा जाता है और चंद्रोदय के बाद ही इस व्रत का पारण किया जाता है। Heramb Sankashti Chaturthi 2025 Subh Muhurat: संकष्टी चतुर्थी मुहूर्त भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 12 अगस्त को सुबह 8 बजकर 40 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि का समापन 13 अगस्त को सुबह 6 बजकर 35 मिनट पर होगा। ऐसे में भाद्रपद माह की हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार 12 अगस्त को मनाई जाएगी। इस दिन चन्द्रोदय का समय रात 8 बजकर 59 मिनट पर रहेगा। संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि Heramb Sankashti Chaturthi Puja Vidhi संकष्टी चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। Heramb Sankashti Chaturthi पूजा स्थल को साफ करने के बाद गंगाजल का छिड़काव करें। एक चौकी पर हरा या लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा के दौरान गणेश जी को चंदन, कुमकुम, हल्दी, अक्षत और फूल आदि अर्पित करें। धूप-दीप जलाएं और गणेश जी को मोदक या फिर लड्डूओं का भोग लगाएं। संकष्टी चतुर्थी की कथा पढ़ें और गणेश जी की आरती करें। शाम को चंद्र दर्शन के बाद, चंद्रमा को अर्घ्य दें और अपना व्रत खोलें। संकष्टी चतुर्थी व्रत की महिमा: Heramb Sankashti Chaturthi Vrat Mahima नारद पुराण के अनुसार संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रती को पूरे दिन का उपवास रखना चाहिए। शाम के समय संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा को सुननी चाहिए। संकष्टी चतुर्थी के दिन घर में पूजा करने से नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं । इतना ही नहीं संकष्टी चतुर्थी का पूजा से घर में शांति बनी रहती है। घर की सारी परेशानियां दूर होती हैं। गणेश जी भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। इस दिन चंद्रमा को देखना भी शुभ माना जाता है। सूर्योदय से शुरू होने वाला संकष्टी व्रत चंद्र दर्शन के बाद ही समाप्त होता है, साल भर में 12-3 संकष्टी व्रत रखे जाते हैं। हर संकष्टी व्रत की एक अलग कहानी होती है। दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में संकष्टी चतुर्थी को गणेश संकटहरा या संकटहरा चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। ध्यान दें – संकष्टी चतुर्थी व्रत का दिन, उस दिन के चन्द्रोदय के आधार पर निर्धारित होता है। जिस दिन चतुर्थी तिथि के दौरान चन्द्र उदय होता है, संकष्टी चतुर्थी का व्रत उसी दिन रखा जाता है। इसीलिए प्रायः ऐसा देखा गया है कि, कभी-कभी संकष्टी चतुर्थी व्रत, चतुर्थी तिथि से एक दिन पूर्व अर्थात तृतीया तिथि के दिन ही होता है। कहा जाता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत नियमानुसार ही संपन्न करना चाहिए, तभी इसका पूरा लाभ मिलता है। Heramb Sankashti Chaturthi इसके अलावा गणपति बप्पा की पूजा करने से यश, धन, वैभव और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। Ganesh Ji ke Mantra: गणेश जी के मंत्र 1. वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ 2. एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं। विघ्नशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥ 3. ॐ ग्लौम गौरी पुत्र,वक्रतुंड,गणपति गुरु गणेश ग्लौम गणपति,ऋदि्ध पति। मेरे दूर करो क्लेश।। 4. एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं। विघ्नशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥

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विलक्कु पूजा: घर में सुख-समृद्धि लाने का पावन अनुष्ठान Vilakku Pooja: A Sacred Ritual to Bring Prosperity Home

दक्षिण भारत में विलक्कु पूजा (Vilakku Pooja) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र अनुष्ठान है, जो घर में सुख-शांति और समृद्धि लाने के लिए किया जाता है। ‘विलक्कु’ का अर्थ है ‘दीपक’ और यह पूजा मुख्यतः दीपकों, विशेष रूप से पारंपरिक पीतल या मिट्टी के दीपकों को प्रज्वलित करके देवी-देवताओं का आह्वान करने पर केंद्रित होती है। इस पूजा को करने से न केवल सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, बल्कि यह परिवार के सदस्यों के बीच सामंजस्य और खुशहाली भी बढ़ाती है। यदि आप अपनी Karmasu वेबसाइट के लिए इस विषय पर एक ब्लॉग पोस्ट की तलाश में हैं, तो यह विस्तृत गाइड आपको बताएगी कि विलक्कु पूजा कैसे करें, क्या करें और क्या नहीं, और कौन से मंत्रों का जाप करें। विलक्कु पूजा का महत्व (Significance of Vilakku Pooja) विलक्कु पूजा प्रकाश के महत्व को दर्शाती है, जो अंधकार को दूर कर ज्ञान, समृद्धि और खुशी लाता है। यह पूजा मुख्य रूप से देवी लक्ष्मी (Goddess Lakshmi), देवी पार्वती (Goddess Parvati), और देवी सरस्वती (Goddess Saraswati) का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए की जाती है। माना जाता है कि दीपकों की लौ में इन देवियों का वास होता है, जो भक्तों की प्रार्थनाओं को स्वीकार करती हैं और उन्हें मनोवांछित फल प्रदान करती हैं। विलक्कु पूजा कब और कैसे करें? (When and How to Perform Vilakku Pooja?) विलक्कु पूजा किसी भी शुभ दिन, विशेष रूप से शुक्रवार (Friday) को की जा सकती है, क्योंकि यह दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित है। इसे दिवाली (Diwali), नवरात्रि (Navratri), करक चतुर्थी (Karak Chaturthi) जैसे त्योहारों पर भी विशेष रूप से किया जाता है। पूजा विधि: विलक्कु पूजा में क्या करें और क्या नहीं (Do’s and Don’ts in Vilakku Pooja) क्या करें (Do’s): क्या नहीं करें (Don’ts): विलक्कु पूजा के लिए मंत्र (Mantras for Vilakku Pooja) विलक्कु पूजा के दौरान कई मंत्रों का जाप किया जा सकता है, जो देवी-देवताओं का आह्वान करते हैं और पूजा को अधिक शक्तिशाली बनाते हैं। विलक्कु पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक अनुभव है जो मन और आत्मा को शांति प्रदान करता है। अपनी Karmasu वेबसाइट के माध्यम से इस प्राचीन परंपरा के बारे में जानकारी साझा करके, आप कई लोगों को इस पवित्र कार्य को करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। क्या आप विलक्कु पूजा से जुड़े किसी विशेष पहलू, जैसे विभिन्न प्रकार के दीपकों या संबंधित त्योहारों पर और जानकारी चाहेंगे? Sources

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Tulsidas Jayanti 2025: क्या करें और क्या नहीं, और कौन सा मंत्र पढ़ें?

तुलसीदास जयंती, गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्मदिवस के रूप में मनाई जाती है, जो भारतीय साहित्य और भक्ति परंपरा के एक महान संत कवि थे। उन्होंने रामचरितमानस जैसे कालजयी ग्रंथ की रचना की, जिसने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है। 2025 में, तुलसीदास जयंती 31 जुलाई को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर, आइए जानते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, और किन मंत्रों का जाप करना चाहिए। तुलसीदास जयंती पर क्या करें (What to do on Tulsidas Jayanti): तुलसीदास जयंती पर क्या न करें (What not to do on Tulsidas Jayanti): कौन सा मंत्र पढ़ें (Which Mantra to Chant): तुलसीदास जयंती पर भगवान राम, हनुमान जी और स्वयं तुलसीदास जी से संबंधित मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी होता है। तुलसीदास जयंती हमें गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन और शिक्षाओं को याद करने का अवसर प्रदान करती है। इस दिन उनके दिखाए मार्ग पर चलकर और भक्तिमय वातावरण में लीन होकर हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं।

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Krishna Janmashtami 2025 Date:इस साल जन्माष्टमी 15 या 16 अगस्त? जानिए पंचांग के अनुसार सटीक तिथि

Krishna Janmashtami 2025: जन्माष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा निशिता काल में की जाती है। यह मध्यरात्रि का समय होता है। इस दौरान भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। जानें इस साल कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व कब मनाया… Krishna Janmashtami 2025 Kab Hai: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। उस समय चंद्रमा वृषभ राशि में था। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्ंम हुआ था। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। जानें जन्माष्टमी कब है, महत्व व पूजन मुहूर्त। Krishna Janmashtami 2025 Date (कृष्ण जन्माष्टमी कब है 2025 में): कृष्ण जन्माष्टमी सनातन धर्म का एक प्रमुख त्योहार है जो भगवान कृष्ण के जन्म की खुशी के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसलिए हर साल इस दिन को कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस साल जन्माष्टमी की तारीख को लेकर थोड़ा कन्फ्यूजन बना हुआ है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जन्माष्टमी की तारीख 15 अगस्त की रात में लग रही है और अगले दिन 12 बजे से पहले ही समाप्त हो जा रही है। Krishna Janmashtami 2025 Date ऐसे में क्या जन्माष्टमी 15 अगस्त को मनाई जाएगी या फिर उदया तिथि के अनुसार ये पर्व 16 अगस्त को ही मनाया जाएगा। चलिए इस बारे में विस्तार से जानते हैं यहां। श्री कृष्ण जन्माष्टमी कब है 2025 में (Krishna Janmashtami 2025 Date) जन्माष्टमी का व्रत कब से कब तक रहेगा (Janmashtami Vrat Time 2025) जन्माष्टमी का व्रत कई लोग सूर्योदय से लेकर रात 12 बजे तक रखते हैं। वहीं कई लोग इस व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद करते हैं। कुछ कृष्ण-भक्त रोहिणी नक्षत्र या अष्टमी तिथि समाप्ति होने के बाद व्रत का पारण कर लेते हैं। Krishna Janmashtami इस व्रत में फलाहारी भोजन के अलावा कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता।

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Sawan Purnima 2025: कब है सावन पूर्णिमा? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और क्या करें क्या नहीं

Purnima 2025: हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का काफी महत्व होता है. ऐसे में 8 अगस्त 2025 को श्रावण मास की पूर्णिमा है. इस दिन क्या करना शुभ होता है और क्या करना अशुभ होता है? जानिए इसके बारे में. Sawan Purnima 2025: प्रत्येक महीने की शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि पूर्णिमा की तिथि होती है. चंद्रमा की कलाओं के उतरने चढ़ने से ही महीने के दो पक्ष निर्धारित होते हैं. अमावस्या के दौरान चंद्रमा पूरी तरह गायब हो जाता है Sawan Purnima 2025 तो वही पूर्णिमा के दिन चांद एकदम दुधिया चांदनी का हो जाता है.  जिन दिनों में चंद्रमा का आकार घटता है तो वह कृष्ण पक्ष कहलाता है. वही जिन दिनों में चंद्रमा का आकार बढ़ता है वो शुक्ल पक्ष कहलाता है. पूर्णिमा को पूर्णमासी या पूनम की रात के नामों से भी जाना जाता है. धार्मिक रूप से ये समय अत्यंत शुभ और लाभदायक होता है. ऐसे में सावन मास की पूर्णिमा कई मायनों में खास है. आइए जानते हैं इस महीने के बारे में.  When is Sawan Purnima 2025:सावन पूर्णिमा 2025 कब है? इस साल सावन पूर्णिमा का व्रत शनिवार 9 अगस्त 2025 को है. पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 8 अगस्त, दोपहर 2 बजकर 12 मिनट से शुरू होकर 9 अगस्त, दोपहर 1 बजकर 24 मिनट पर खत्म होगा.  What should be done on Savan Purnima:सावन पूर्णिमा में क्या करना चाहिए? शिव भगवान की पूजा करें- सावन पूर्णिमा में शिव भगवान की पूजा आराधना करनी चाहिए. इसके साथ ही बेलपत्र, दूध, दही, शहद और गंगाजल से रुद्राभिषेक करना चाहिए. ऐसा करने से शिव भगवान की कृपा प्राप्त होती है.  रक्षा सूत्र बांधे- सावन मास की पूर्णिमा में ही रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है. इस दिन बहनें भाइयों को राखी बांधती है और उनकी लंबी उम्र की कामना करती है.  जरूरतमंदों को दान करें- श्रावण मास की पूर्णिमा में ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को अन्न, कपड़े और धन का दान करना चाहिए. ऐसा करना शुभ होता है.  यज्ञोपवीत संस्कार करें- श्रावण मास की पूर्णिमा में वैदिक परंपरा से यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए. धार्मिक कर्मकांड करने के लिए ये दिन शुभ होता है.  व्रत रखें- श्रावण मास की पूर्णिमा में व्रत रखने का अपना विशेष महत्व होता है. इस दिन व्रत रखने से शिवजी की कृपा प्राप्त होती है.  What not to do on Savan Purnima:सावन पूर्णिमा पर क्या न करें मांस-मदिरा का सेवन न करें- श्रावण मास की पूर्णिमा में तामसिक भोजन को ग्रहण नहीं करना चाहिए. इस महीने मांस-मदिरा का सेवन करना वर्जित होता है.  झगड़ा या कटु वचन न बोलें- इस दिन किसी के प्रति भी गलत वाणी का प्रयोग नहीं करना चाहिए. Sawan Purnima 2025 इसके साथ ही झूठ बोलने से भी बचना चाहिए. बाल कटवाना या नाखून काटना वर्जित- श्रावण मास की पूर्णिमा में बाल कटवाना या नाखून काटना अशुभ होता है. इस दिन इन कामों को करने से आयु कम होती है.  काले और गंदे वस्त्र नहीं पहने- श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन काले और गंदे रंग के वस्त्रों को धारण करने से बचें.  Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN  किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Raksha Bandhan 2025: रक्षाबंधन पर बहनों को भूलकर भी न दें ये उपहार, बन सकते हैं दुर्भाग्य का कारण

Raksha Bandhan 2025 : किसी को भी गिफ्ट देना अपने प्यार का इजहार करने का शानदार तरीका है। जल्द ही रक्षाबंधन का त्योहार भी आ रहा है। भाई-बहन एक दूसरे को गिफ्ट देकर अपने स्नेह और प्यार से इस त्योहार को मनाएंगे।  मगर, कुछ ऐसी चीजें हैं, जिन्हें गिफ्ट करने पर दुर्भाग्य लाने वाला या रिश्ते में समस्याएं पैदा करने वाला माना जाता है। खासकर अपने समाज में जहां धार्मिक मान्यताएं और अंधविश्वास महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आइए जानते हैं कि आपको किन चीजों को गिफ्ट करने से बचना चाहिए। Raksha Bandhan gift: सालभर कई सारे पर्व आते हैं, इनमें से कुछ विशेष होते हैं. इन्हीं में से एक है श्रावण मास की पूर्णिमा को आने वाला रक्षाबंधन का पर्व. यह भाई और बहन के प्रेम का प्रतीक है. जब बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र यानी कि रा​खी बांधती है और भाई भी इसके साथ अपनी बहन की रक्षा के लिए संकल्प लेता है. साथ ही अपनी बहन को कुछ उपहार भी देता है. इस दिन आप अपनी बहन को उपहार में क्या ना दें? आपको बता दें कि रक्षाबंधन सहित कई त्योहारों को भ्रदा काल में मनाने की मनाही होती है. Raksha Bandhan 2025 यदि भ्रदा काल है तो इस समय के पहले या बाद में शुभ कार्य किए जाते हैं क्योंकि भद्रा के दौरान राखी बांधन से अशुभता की संभावना रहती है. लेकिन क्या आप जानते हैं उपहार देते समय भी कई बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए और बहनों को भूल कर भी कई चीजें उपहार में नहीं देना चाहिए. Raksha Bandhan 2025: रक्षाबंधन पर बहनों को भूलकर भी न दें ये उपहार 1. चमड़े संबंधित चीजें: leather related items लेदर बैग सहित कई सारी स्टाइलिश वस्तुएं बाजार में उपलब्ध हैं. जिन्हें उपहार के लिए कई बार खरीद लेते हैं, लेकिन आपको बता दें कि चमड़े की चीजें शनि देव से सबंधित हैं, Raksha Bandhan 2025 इसलिए इन चीजों को अपनी बहन को कभी ना दें, नहीं तो उसे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. 2. काले रंग की चीजें: Black coloured things बहनों के लिए जब भी आप उपहार लें, ध्यान रहे वह काले रंग का ना हो क्योंकि काला रंग किसी के भी जीवन में नकारात्मकता लेकर आता है. ऐसे में आप रक्षाबंधन पर कभी भी बहन को काले कपड़े या काले रंग की चीजें उपहार में ना दें. 3. जूते-चप्पल: Footwear ऐसा माना जाता है कि जूते-चप्पल का संबंध शनि देव से होता है. Raksha Bandhan 2025 ऐसे में आप कभी भी अपनी बहन को जूते-चप्पल जैसी चीजें उपहार में ना दें. इससे उसके जीवन में कई तरह की परेशानियां आ सकती हैं. 4. घड़ी: Watch आजकल मार्केट में कई प्रकार की घड़ी मौजूद हैं, इनमें स्मार्टवॉच भी शामिल हो गई है, लेकिन घड़ी को बेहद अशुभ माना जाता है क्योंकि घड़ी से व्यक्ति का अच्छा और बुरा समय जुड़ा होता है. आपको बहनों को घड़ी भूलकर भी नहीं देना चाहिए. 5. नुकीली चीजें: sharp objects हिंदू धर्म में नुकीली चीजों को उपहार के रूप में देना शुभता के आधार पर नहीं देखा जाता. ऐसा माना जाता है कि जब आप किसी को नुकीली चीजें देते हैं तो इससे आपके रिश्ते पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. 6. कांच का सामान :Glassware कांच के बर्तन उपहार में देना अक्सर अशुभ माना जाता है। कांच की नाजुकता को रिश्ते के साथ भी जोड़ा जाता है। माना जाता है कि जिस तरह से ये फ्रेजाइल यानी भंगुर होता है, उसी तरह से इसे गिफ्ट करने से आपका रिश्ता भी टूट सकता है। 7. परफ्यूम:Perfume रिश्तों का महकते रहना जरूरी है। मगर, ये जरूरी नहीं है कि आपका दिया गया परफ्यूम सामने वाले व्यक्ति को भी पसंद आए। दरअसल, परफ्यूम का सेलेक्शन बेहद निजी मामला होता है। कुछ लोगों का मानना है कि कुछ सुगंधों में नकारात्मक ऊर्जा हो सकती है, जो व्यक्ति के स्वास्थ्य या उसके औरा यानी आभामंडल को भी प्रभावित कर सकती है। लिहाजा, परफ्यूम को गिफ्ट में नहीं देना चाहिए। 

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Satyanarayan Vrat 2025 Date: सत्यनारायण व्रत 2025 में कब-कब रखा जाएगा ?

Satyanarayan Vrat 2025 List : साल 2025 में कब-कब रखा जाएगा सत्यनारायण व्रत? जानें इस व्रत का महत्व और पूजा विधि  सत्यनारायण व्रत एक पवित्र और शक्तिशाली धार्मिक अनुष्ठान है जो भगवान विष्णु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि व्यक्ति को आध्यात्मिक ऊर्जा से भी भर देता है। Satyanarayan Vrat सत्यनारायण व्रत का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का एक साधन है जो जीवन में सुख-समृद्धि और शांति लाने का एक शक्तिशाली माध्यम है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।  Satyanarayan Vrat: सत्यनारायण पूजा किसी भी शुभ कार्य के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है और इसे विशेष अवसरों पर किया जाता है जैसे कि पूर्णिमा, संकष्टी चतुर्थी, एकादशी, या विशेष मांगलिक अवसरों पर। Satyanarayan Vrat पूजा का शुभ मुहूर्त प्रायः प्रदोष काल या चंद्रमा की वृद्धि वाले समय में होता है और इसे पंचांग के अनुसार शुभ तिथि और समय का चयन करके किया जाता है। आइये जानते हैं 2025 आने वाले सभी सत्यनारायण व्रतों के बारे में जानेंगे साथ ही इस Satyanarayan Vrat व्रत का महत्व और पूजा विधि के बारे में भी आपको बताएंगे।  Sal 2025 mein Satyanarayan Vrat puja date: साल 2025 में श्री सत्यनारायण पूजा की डेट 13 जनवरी 2025, सोमवार (पौष, शुक्ल पूर्णिमा) 12 फरवरी 2025, बुधवार (माघ, शुक्ल पूर्णिमा) 13 मार्च 2025, बृहस्पतिवार (फाल्गुन, शुक्ल पूर्णिमा) 12 अप्रैल 2025, शनिवार (चैत्र, शुक्ल पूर्णिमा) 12 मई 2025, सोमवार (वैशाख, शुक्ल पूर्णिमा) 10 जून 2025, मंगलवार (ज्येष्ठ, शुक्ल पूर्णिमा) 10 जुलाई 2025, बृहस्पतिवार (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा) 09 अगस्त 2025, शनिवार (श्रावण, शुक्ल पूर्णिमा) 07 सितम्बर 2025, रविवार (भाद्रपद, शुक्ल पूर्णिमा) 06 अक्टूबर 2025, सोमवार (आश्विन, शुक्ल पूर्णिमा) 05 नवम्बर 2025, बुधवार (कार्तिक, शुक्ल पूर्णिमा) 04 दिसम्बर 2025, बृहस्पतिवार (मार्गशीर्ष, शुक्ल पूर्णिमा) घर पर ऐसे करे भगवान सत्यनारायण की पूजा  Satyanarayan Vrat mahetwa: सत्यनारायण व्रत का महत्व आध्यात्मिक महत्व 1. भगवान विष्णु की कृपा: सत्यनारायण व्रत भगवान विष्णु की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक साधन है। 2. आध्यात्मिक शुद्धि: इस व्रत के दौरान उपवास और पूजा करने से आत्मा की शुद्धि होती है। 3. मानसिक शांति: सत्यनारायण व्रत के दौरान पूजा और आरती करने से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। धार्मिक महत्व 1. पापों का नाश: सत्यनारायण व्रत के दौरान पूजा और उपवास करने से पापों का नाश होता है। 2. सुख-समृद्धि: इस व्रत के दौरान भगवान विष्णु की कृपा से सुख-समृद्धि और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। 3. परिवार की सुख-समृद्धि: सत्यनारायण व्रत के दौरान पूजा और उपवास करने से परिवार की सुख-समृद्धि और सुरक्षा की प्राप्ति होती है। सामाजिक महत्व 1. परिवार के साथ एकता: सत्यनारायण व्रत के दौरान परिवार के साथ एकता और सामंजस्य की भावना को बढ़ावा मिलता है। 2. सामाजिक सेवा: इस व्रत के दौरान गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करने से सामाजिक सेवा की भावना को बढ़ावा मिलता है। 3. धार्मिक एकता: सत्यनारायण व्रत के दौरान धार्मिक एकता और सामंजस्य की भावना को बढ़ावा मिलता है।

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Varalakshmi Puja Vrat 2025: वरलक्ष्मी पूजा कब है? जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

Varalakshmi Puja Vrat: वरलक्ष्मी व्रतम 2025 वरलक्ष्मी व्रतम एक त्योहार है जो तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में व्यापक रूप से लोकप्रिय है। यह श्रावण (जुलाई-अगस्त) शुक्ल पक्ष में शुक्रवार को मनाया जाता है । इस वर्ष वरलक्ष्मी व्रत 08  अगस्त 2025 को मनाया जाएगा । देवी लक्ष्मी को श्रद्धांजलि स्वरूप, कई विवाहित महिलाएँ इस दिन व्रत रखती हैं और अपने परिवार और पति के लिए आशीर्वाद मांगती हैं। ‘वर’ का अर्थ है वरदान, जो लक्ष्मी अपने उपासकों को प्रदान करती हैं। Varalakshmi Vrat Date in 2025: वरलक्ष्मी व्रत तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार, Varalakshmi Puja वरलक्ष्मी व्रत श्रावण (सावन) माह की पूर्णिमा से पहले वाले शुक्रवार को मनाया जाता है। 2025 में यह 8 अगस्त को मनाया जाएगा। वरलक्ष्मी व्रत 2025 के लिए शुभ समय (मुहूर्त):Auspicious time (Muhurat) for Varalakshmi Vrat 2025 सिंह लग्न (सुबह): 06:29 पूर्वाह्न – 08:46 पूर्वाह्न वृश्चिक लग्न (दोपहर): 01:22 अपराह्न – 03:41 अपराह्न कुंभ लग्न (शाम): 07:27 PM – 08:54 PM वृषभ लग्न (मध्यरात्रि): 11:55 अपराह्न (8 अगस्त) – 01:50 पूर्वाह्न (9 अगस्त) मान्यता के अनुसार, Varalakshmi Puja लक्ष्मी पूजा करने का सबसे अच्छा समय स्थिर लग्न के दौरान होता है, जो इस स्थिर ज्योतिषीय अवधि के दौरान पूजा करने पर दीर्घकालिक समृद्धि सुनिश्चित करता है। Where is Varalakshmi Vrat celebrated: वरलक्ष्मी व्रत कहाँ मनाया जाता है? यह व्रत दक्षिणी राज्यों महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में विवाहित महिलाओं द्वारा प्रमुखता से मनाया जाता है। वरलक्ष्मी व्रत के लिए पूजा सामग्री:material for Varalakshmi Puja vrat वरलक्ष्मी व्रत पूजा के लिए आवश्यक वस्तुओं को पहले ही एकत्र कर लेना चाहिए। इस सूची में दैनिक पूजा की वस्तुओं को शामिल नहीं किया गया है, लेकिन यह केवल उन वस्तुओं को सूचीबद्ध करता है जो विशेष रूप से वरलक्ष्मी व्रत पूजा के लिए आवश्यक हैं। माता वरलक्ष्मी की मूर्तिफूलों की मालाकुमकुमहल्दीचंदन पाउडरविभूतिग्लासकंघीफूलपान के पत्ते पंचामृत दहीकेला दूधपानी अगरबत्ती कर्पूरीछोटी पूजा घंटीतेल का दीपक वरलक्ष्मी पूजन की विधि: Method of worshiping Varalakshmi सूर्योदय से पहले उठकर नित्य कर्म समाप्त करके स्नान करें।पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़कें, उसे शुद्ध करें, मां वरलक्ष्मी का ध्यान करें और व्रत संकल्प लें।एक लकड़ी की चौकी पर साफ लाल रंग का कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी और गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।चित्र के पास थोड़े से चावल रखें और उस पर जल से भरा एक कलश रखें, कलश के चारों ओर चंदन लगाना चाहिए। माता Varalakshmi Puja लक्ष्मी और गणेश को पुष्प, दूर्वा, नारियल, चंदन, हल्दी, कुमकुम, माला चढ़ाएं और मां Varalakshmi Puja वरलक्ष्मी को सोलह श्रृंगार अर्पित करें।इसके बाद धूप, घी का दीपक जलाएं और मंत्र पढ़ें और भगवान को भोग लगाएं।पूजा के बाद वरलक्ष्मी व्रत कथा पढ़ें और आरती के अंत में प्रसाद सभी में बितरित करें।इस व्रत को करने से माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। How is Varalakshmi Vrat celebrated: वरलक्ष्मी व्रत कैसे मनाया जाता है? गुरुवार को विवाहित महिलाएँ सूर्योदय से सूर्यास्त तक व्रत रखती हैं और पूजा की तैयारियाँ करती हैं। शुक्रवार को, भक्त सूर्योदय से ठीक पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं। घर की सफाई की जाती है और रंगोली व कलश से सजाया जाता है। कलश को चंदन के लेप से लेपित किया जाता है और उसमें विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न वस्तुएँ भरी जाती हैं। कलश को भरने के लिए कच्चे चावल, सिक्के, हल्दी और पत्तियों का उपयोग किया जाता है, और फिर एक ‘स्वास्तिक’ चिन्ह बनाया जाता है। अंत में, कलश को आम के पत्तों से सजाया जाता है और उस पर हल्दी लगा नारियल रखा जाता है। पूजा की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा, श्लोकों का पाठ, आरती और भगवान को मिठाई का भोग लगाकर की जाती है। महिलाएँ अपने हाथों पर पीले धागे बाँधती हैं और उपहारों का आदान-प्रदान करती हैं। उबली हुई फलियाँ, पोंगल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं। भक्त शनिवार को अनुष्ठान पूरा करते हैं और स्नान के बाद कलश को हटा देते हैं। ऐसा माना जाता है कि Varalakshmi Puja वरलक्ष्मी व्रत करने से शांति, समृद्धि और आर्थिक लाभ मिलता है। वरलक्ष्मी व्रत का महत्व:Importance of Varalakshmi Vrat वरलक्ष्मी व्रत, जिसे वरलक्ष्मी पूजा के नाम से भी जाना जाता है, एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें पुरुष और महिलाएँ देवी वरलक्ष्मी की पूजा करते हैं। उन्हें धन, समृद्धि, साहस, बुद्धि और उर्वरता की दिव्य दाता के रूप में पूजा जाता है। Varalakshmi Puja इस व्रत के दौरान, भक्त अपने और अपने परिवार के लिए उनसे भरपूर आशीर्वाद की कामना करते हैं।  वरलक्ष्मी पूजा में भाग लेना देवी लक्ष्मी के सभी आठ विविध रूपों का सम्मान करने के समान माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस अनुष्ठान से कई शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं, जिनमें शामिल हैं:  इस दिन विवाहित महिलाएँ पारंपरिक रूप से उपवास रखती हैं और पूजा करने के बाद अपना उपवास तोड़ती हैं। Varalakshmi Puja वरलक्ष्मी व्रत, देवी वरलक्ष्मी के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करने और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने का एक तरीका है, जिसका उद्देश्य अंततः जीवन में विभिन्न प्रकार की समृद्धि और कल्याण प्राप्त करना है।

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Hayagriva Jayanti 2025 Date: हयग्रीव जयंती कब है? जानिए पूजा का तरीका और महत्व

Hayagriva Jayanti: भगवान हयग्रीव की जयंती जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। भगवान हयग्रीव को ज्ञान और बुद्धि का देवता माना जाता है हयग्रीव जयंती पारंपरिक हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान हयग्रीव ने सभी वेदों को ब्रह्मा को पुनर्स्थापित कर दिया था। हयग्रीव घोड़े के सिर और इंसान के शरीर के साथ भगवान विष्णु का एक अनूठा अवतार है। इस दिन को ब्राह्मण समुदाय द्वारा उपकर्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। Hayagriva-jayanti kab hai 2025 mein: जिस दिन भगवान विष्णु का हयग्रीव के रूप में अवतार पृथ्वी पर प्रकट हुआ, उस दिन को हैग्रीव जयंती के रूप में जाना जाता है। इस दिन घोड़े के सिर और मनुष्य के शरीर के रूप में भगवान विष्णु के अद्वितीय अवतार की पूजा की जाती है। राक्षसों से चुराए गए वेदों को पुनः प्राप्त करना इस अवतार का उद्देश्य था। ब्राह्मण समुदाय द्वारा उपकर्म दिवस और अवनि अविट्टम ​​के रूप में भी मनाया जाता है यह दिन 2025 में 8 अगस्त को पड़ता है। Hayagriva Jayanti 2025 Date:हयग्रीव जयंती 2025 तिथि ब्राह्मण समुदाय द्वारा उपकर्म दिवस और अवनि अविट्टम के रूप में भी मनाया जाता है, वर्ष 2025 में, हयग्रीव जयंती शुक्रवार, अगस्त 8, 2025 को पड़ती है। हयग्रीव जयंती मुहूर्त – 16:04 से 18:35 तक पूर्णिमा तिथि शुरू – अगस्त 08, 2025 को 14:12 बजे, 2025 पूर्णिमा तिथि समाप्त – अगस्त 08, 2025 को 14:12 बजे, 2025 हयग्रीव जयंती के अनुष्ठान: Rituals of Hayagriva Jayanti इस दिन को मनाने के लिए ऐसा कोई मैनुअल नहीं है, हालांकि, इस दिन पुराने यज्ञपवीत को जनेऊ के नाम से भी जाना जाता है। Hayagriva Jayanti भक्त इस दिन भगवान ब्रह्मा की पूजा भी करते हैं। छात्र भक्त ज्ञान और ज्ञान के आशीर्वाद के लिए भगवान हयग्रीव की पूजा करते हैं।असम की धरती पर हाजो शहर में भगवान हयग्रीव का मंदिर है, वहां भव्य समारोह होता है। Hayagriva Jayanti Puja Vidhi in Hindi: हयग्रीव जयंती की पूजा विधि Hayagriva Jayanti: श्री हयग्रीव जी का पूजन करते समय पूर्व दिशा व उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठ जाएं ।सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश जी का पूजन करें । श्री गणेश जी को स्नान कराकर उन्हें वस्त्र अर्पित करें । गंध, पुष्प , धूप ,दीप, अक्षत से पूजन करें ।उसके बाद अब भगवान हयग्रीव जी का पूजन करें । पहले श्री हयग्रीव जी को पंचामृत व् जल से स्नान कराएं, उन्हें वस्त्र अर्पित करें । वस्त्रों के बादआभूषण पहनाएं । अब पुष्पमाला पहनाएं । अब तिलक करें।ॐ नमो भगवते आत्मविशोधनाय नमः मंत्र का उच्चारण करते हुए श्री हयग्रीव जी को तिलक लगाएं।इसके पश्चात अपने हाथ में चावल व फूल लें व इस मंत्र का उच्चारण करते हुए श्री हयग्रीव जी का ध्यान करें। The story behind celebrating Hayagriva Jayanti:हयग्रीव जयंती मनाने के पीछे की कहानी भगवान हयग्रीव के प्रकट होने के साथ दो किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं। पहली कथा में, हयग्रीव कश्यप प्रजापति के पुत्र थे। नदी आशीर्वाद लेने के लिए घोर तपस्या और तपस्या करती है और उसके दृढ़ संकल्प का भुगतान किया जाता है। देवी दुर्गा ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि भगवान का कोई भी व्यक्ति हयग्रीव को हराने में सक्षम नहीं होगा और केवल एक और हयग्रीव ही हयग्रीव को हरा सकता है। आखिरकार, उसकी शक्ति उसके सिर पर आ गई और हयग्रीव ने उनका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। तुरंत कहर फैल गया और पूरी दुनिया में दहशत फैल गई। देवता हयग्रीव को पराजित नहीं कर सके और भगवान विष्णु समझ गए कि उन्हें हस्तक्षेप करना होगा। तो भगवान विष्णु ने जो किया वह धनुष पर अपना सिर टिका दिया, जैसे ही तार टूट गए, भगवान विष्णु का सिर चारों ओर दहशत पैदा कर रहा था। हालाँकि, देवी दुर्गा ने जो कुछ खेला था, उसके पीछे का कारण समझ गई, इसलिए, उन्होंने ब्रह्मा से भगवान विष्णु के शरीर में एक घोड़े का सिर संलग्न करने के लिए कहा। ब्रह्मा ने जैसा कहा गया वैसा ही किया और दूसरा हयग्रीव प्रकट हुआ। यह हयग्रीव युद्ध में गया और राक्षसी हयग्रीव को पराजित किया। Another story of Hayagriva Jayanti:हयग्रीव जयंती की अन्य कथा मधु और कैटभ दो राक्षस थे और उन्होंने वेदों को चुरा लिया जब ब्रह्मा सो रहे थे और गहरे पानी के नीचे रखे गए थे। भगवान हयग्रीव वेदों को राक्षसों से पुनर्प्राप्त करने के लिए एक भगवान और एक घोड़े के रूप में उभरे। इसलिए यह अवतार ज्ञान और ज्ञान से जुड़ा है। Importance of Hayagriva Jayanti: हयग्रीव जयंती का महत्व हयग्रीव भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक है। जब राक्षसों ने वेदो और ब्रम्हा जी को बंधक बना लिया था तब भगवान् हयग्रीव ने अपने इस अवतार में वेदों और ब्रह्मा को पुनर्स्थापित किया था। भगवान् हयाग्रीव का सर घोड़े या हैया के समान है इसलिए, उन्हें हयाग्रीव के नाम से जाना जाता है। कई क्षेत्रों में, भगवान हयग्रीव संरक्षक देवता माना जाता हैं जिन्होंने बुराई को दूर करने के लिए अवतार धारण किया था। इस अवतार में घोड़े का सिर उच्च शिक्षा और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। भगवान हयग्रीव का आशीर्वाद हमें अधिक से अधिक ऊंचाइयां प्राप्त करने में मदद करता है। यह अवतार अद्वितीय है और इसका उल्लेख महाभारत के शांति पर्व और पुराणों में ही मिलता है।

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Budh Pradosh Vrat Katha: बुध प्रदोष व्रत कथा, जानें इस व्रत का क्या है लाभ

Budh Pradosh Vrat Katha In Hindi: हर माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष तिथि का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है। भगवान शिव की कृपा पाने के लिए इस दिन प्रदोष व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए। बुध प्रदोष व्रत की कथा सुनने और कहने से हर पाप दूर होता है और जीवन में सब मंगल ही मंगल होता है। बुध प्रदोष व्रत कथा: प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष तिथि का व्रत किया जाता है। अगर यह तिथि बुधवार के दिन पड़ती है, तब इसे बुध प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। जिस तरह एकादशी तिथि भगवान विष्णु को प्रिय है, उसी तरह प्रदोष तिथि का व्रत भगवान शिव को प्रिय है। इस दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करके (Pradosh Vrat Katha) बुध प्रदोष व्रत की कथा सुनने व कहने से धन, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। बुध प्रदोष व्रत कथा ( Budh Pradosh Vrat Katha ) बुध प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल की जाती है और पूजा के बाद ही भोजन किया जाता है। इस दिन हरे कपड़े पहनना और हरी चीजों का सेवन करना शुभ माना जाता है। सुबह उठकर नित्य क्रम से निवृत होकर विधि विधान के साथ भगवान शिव की पूजा करें। पौराणिक कथा के अनुसार, एक पुरुष की नई नई शादी हुई थी। गौने के बाद दूसरी बार पत्नी को लाने के लिए ससुराल पहुंचा और सास से कहा कि वह Pradosh Vrat Katha बुधवार के दिन पत्नी को लेकर जाएगा। लेकिन सभी लोगों ने कहा कि बुधवार के दिन मायके से ससुराल लेकर जाना सही नहीं है लेकिन वह नहीं माना। बीच सड़क पर हो गई लड़ाई विवश होकर लड़की को भारी मन से विदा कर दिया। पति-पत्नी दोनों बैलगाड़ी में चल दिए। नगर से बाहर निकलते ही पत्नी को प्यास लगी और पति से पानी के लिए कहा। जब पति पानी लेकर आया तो देखा कि किसी पराए पुरुष के लोटे से पत्नी पानी पी रही है और हंस हंसकर बात कर रही है। Pradosh Vrat Katha वह पराया पुरुष बिल्कुल उसकी पति जैसी शक्ल सूरत का था। यह देखकर पति को गुस्सा आया और लड़ाई करना शुरू कर दी। लड़ाई होते देख, वहां भीड़ इकट्ठा हो गई। भगवान शिव से की प्रार्थना Pradosh Vrat Katha इतने में एक सिपाही आया और महिला से पूछा कि सच सच बताओ कि तेरा पति इनमें से कौन सा है। लेकिन महिला दोनों पुरुषों की एक जैसी शक्ल होने की वजह से अपनी पति को पहचान ही नहीं पाई। महादेव ने उस पुरुष की प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसी क्षण वह अन्य पुरुष अचानक से गायब हो गया। भगवान शिव के आशीर्वाद से वह पुरुष अपनी पत्नी के साथ सकुशल अपने घर पहुंच गया। इसके बाद से दोनों पति-पत्नी नियमपूर्वक बुधवार प्रदोष व्रत करने लगे। बोलो भगवान शिव की जय। माता पार्वती की जय। भगवान गणेश की जय, भगवान कार्तिकेय की जय।

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Budha Pradosh Vrat 2025: सावन महीने में कब है बुध प्रदोष व्रत? नोट करें शुभ मुहूर्त

Budha Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत के दिन देवों के देव महादेव की पूजा एवं भक्ति करने से साधक की हर एक मनोकामना पूरी होती है। साथ ही जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। इस दिन पूजा करने के बाद दान करने का भी विधान है। माह की त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल मे होना, (Budha Pradosh Vrat) प्रदोष व्रत होने का सही कारण है। प्रदोष का दिन जब साप्ताहिक दिवस सोमवार को होता है उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को होने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष तथा शनिवार के दिन प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। वैसे तो त्रयोदशी तिथि ही भगवान शिव की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। परंतु प्रदोष के समय शिवजी की पूजा करना और भी लाभदायक है। ध्यान देने योग्य तथ्य: प्रदोष व्रत एक ही देश के दो अलग-अलग शहरों के लिए अलग हो सकते हैं। चूँकि प्रदोष व्रत सूर्यास्त के समय, त्रयोदशी के प्रबल होने पर निर्भर करता है। तथा दो शहरों का सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो सकता है, इस प्रकार उन दोनो शहरों के प्रदोष व्रत का समय भी अलग-अलग हो सकता है। नातन धर्म में त्रयोदशी तिथि का खास महत्व है। यह दिन महादेव को प्रिय है। कहते हैं कि त्रयोदशी तिथि पर भगवान शिव की पूजा करने वाले साधक को जीवन में किसी चीज की कमी नहीं होती है। साथ ही पृथ्वी लोक पर स्वर्ग समान सुखों की प्राप्ति होती है। साधक श्रद्धा भाव से त्रयोदशी तिथि पर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करते हैं। आइए, बुध प्रदोष व्रत की सही डेट एवं शुभ मुहूर्त जानते हैं- बुध प्रदोष व्रत (Budha Pradosh Vrat 2025 Kab Hai) प्रदोष व्रत का फल दिन अनुसार मिलता है। बुधवार के दिन पड़ने के चलते यह बुध प्रदोष व्रत कहलाता है। Budha Pradosh Vrat बुध प्रदोष व्रत करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही करियर और कारोबार में मनमुताबिक सफलता मिलती है। बुध प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 06 अगस्त को दोपहर 02 बजकर 08 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, 07 अगस्त को त्रयोदशी तिथि दोपहर 02 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी। प्रदोष व्रत के दिन पूजा का समय शाम 07 बजकर 08 मिनट से लेकर 09 बजकर 16 मिनट तक है। बुध प्रदोष व्रत शुभ योग (Pradosh Vrat Shubh Yog) ज्योतिषियों की मानें तो सावन माह के बुध प्रदोष व्रत पर शिववास योग का संयोग है। इस शुभ अवसर पर देवों के देव महादेव कैलाश पर विराजमान रहेंगे। इसके बाद नंदी की सवारी करेंगे। इस दौरान भगवान शिव की पूजा करने से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। KARMASU.IN इस लेख में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। 

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Jhulan Yatra 2025 Date: झूलन उत्सव: भक्ति, प्रेम और रास की झलक

Jhulan Yatra: झूलन यात्रा भगवान श्री कृष्ण के अनुयायियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है जो श्रावण के महीने में मनाया जाता है। यह त्योहार जुलाई-अगस्त की अवधि में आता है। यह वैष्णवों का सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय धार्मिक अवसर है। Jhulan Yatra सजे-धजे झूलों, गीत और नृत्य के शानदार प्रदर्शन के लिए जाना जाने वाला, झूलन भारत में बारिश के मौसम में उत्साह के साथ मिलकर राधा कृष्ण के प्यार का जश्न मनाने वाला एक आनंदमय त्योहार है। झूलन उत्सव श्रावण Jhulan Yatra (अगस्त) माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। यह उत्सव श्रीकृष्ण की अपने मित्रों, नन्हे ग्वाल-बालों के साथ वृक्षों के नीचे झूला झूलने की बाल लीलाओं के स्मरण में मनाया जाता है। झूलन यात्रा 2025, 5 अगस्त से 9 अगस्त तक मनाई जाएगी। यह त्योहार भगवान कृष्ण और भगवान जगन्नाथ को समर्पित है Jhulan Yatra और श्रावण (अगस्त) महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इस दौरान, भगवान की मूर्तियों को झूले में झुलाया जाता है, और मंदिरों और घरों में विशेष पूजा और उत्सव होते हैं। प्रतिदिन  श्री राधा कृष्णचंद्र के विग्रहों को विविध आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है और Jhulan Yatra फूलों से सजे झूले पर धीरे-धीरे झुलाया जाता है। मुख्य मंदिर प्रांगण को फूलों और झालरों से सुंदर ढंग से सजाया जाता है। श्री कृष्णचंद्र और श्रीमती राधा रानी के विग्रहों को भव्य रूप से सुसज्जित किया जाता है और उन्हें विभिन्न प्रकार के सुंदर फूलों से सजे झूले में विराजमान किया जाता है। भक्तों द्वारा मधुर कीर्तन के साथ विग्रहों की विशेष आरती की जाती है। Jhulan Yatra आरती के बाद, भक्तों को झूले को झुलाने और अपने स्वामी की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत सेवा करने का अवसर मिलता है। झूलन यात्रा का इतिहास:History of Jhulan Yatra झूलन यात्रा की जड़ें वैष्णव धर्म में, विशेषकर भगवान कृष्ण की लीलाओं में गहराई से निहित हैं। वृंदावन में राधा और गोपियों के साथ भगवान कृष्ण की शरारतपूर्ण बातचीत ने इस उत्सव को प्रेरित किया।  हिंदू श्रद्धालु सदियों से इस त्यौहार को मनाते आ रहे हैं और इसका उल्लेख विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों और काव्य रचनाओं में भी मिलता है।  भागवत पुराण, हरिवंश और हरि भक्ति विलास जैसे ग्रंथ, वृंदावन में कृष्ण की दिव्य लीलाओं का वर्णन करते हैं। इन ग्रंथों में वर्णन किया गया है कि किस प्रकार राधा और कृष्ण अपने साथियों के साथ सावन के दौरान झूला झूलने का आनन्द लेते थे। यह त्यौहार कृष्ण के प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान और वर्षा ऋतु की सुंदरता का प्रतीक है, जिसने पीढ़ियों से कवियों और संगीतकारों को प्रेरित किया है। संत-कवि जयदेव द्वारा रचित गीत गोविंद में भी राधा के प्रति कृष्ण के प्रेम का सार प्रस्तुत किया गया है, जिसमें प्रायः उनकी दिव्य लीला की तुलना प्रकृति की लय से की गई है, जिसमें मानसूनी हवा का झूमना भी शामिल है। झूलन यात्रा वृंदावन, मथुरा और पुरी जैसे स्थानों में एक महत्वपूर्ण त्योहार बन गया, जहां कृष्ण की पूरी तरह से पूजा की जाती है।  मंदिरों में सदियों से भव्य सजावट, भक्ति गीत या भजन, राधा कृष्ण की आरती के साथ इसे मनाया जाता रहा है। झूलन यात्रा समारोह:Jhulan Yatra Festival यह भारत के कई भागों में मनाया जाता है, विशेषकर मथुरा, वृंदावन, मायापुर, पुरी और विश्व भर के इस्कॉन मंदिरों में। दुनिया भर से हजारों कृष्ण भक्त इस उत्सव में भाग लेने के लिए उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृंदावन तथा पश्चिम बंगाल के मायापुर में एकत्रित होते हैं। श्री रूप-सनातन गौड़ीय मठ, बांके बिहारी मंदिर, वृन्दावन में राधा-रमण मंदिर, मथुरा में द्वारकाधीश मंदिर और मायापुर में इस्कॉन मंदिर जैसे मंदिर भव्य आयोजनों की मेजबानी करते हैं। इस दौरान, राधा और कृष्ण की मूर्तियों को वेदी से बाहर निकाला जाता है और सुंदर ढंग से सजाए गए झूलों पर रखा जाता है, जो कभी-कभी सोने या चांदी से भी बने होते हैं। ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर झूलन पूर्णिमा मनाई जाती है, Jhulan Yatra जहां भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को धीरे से झुलाया जाता है और भक्तजन गाते, नाचते और संगीत वाद्ययंत्र बजाते हैं। यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता है, जो पूर्णिमा की रात तक चलता है। दुनिया भर के इस्कॉन मंदिर भी पाँच दिनों तक झूलन यात्रा मनाते हैं, जिसमें मायापुर इस भव्य उत्सव का केंद्र होता है। राधा और कृष्ण की मूर्तियों को फूलों से सजाया जाता है और मंदिर प्रांगण में एक अलंकृत झूले पर रखा जाता है। भक्तगण खुशी-खुशी बारी-बारी से फूलों की रस्सी से देवताओं को झुलाते हैं, भजन गाते हैं और ‘हरे कृष्ण महामंत्र’ का जाप करते हैं। एक विशेष आरती की जाती है, और भक्तगण पूजा के एक भाग के रूप में ‘भोग’ नामक प्रसाद लाते हैं। इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद ने श्रद्धालुओं को झूलन यात्रा को भक्ति और आनंद के साथ मनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने प्रतिदिन देवताओं के वस्त्र बदलने, प्रसाद (पवित्र भोजन) चढ़ाने, संकीर्तन में भजन गाने और राधा-कृष्ण को धीरे से झुलाने पर जोर दिया। पुष्टिमार्ग वैष्णव परंपरा में, हिंडोला, एक ऐसा ही झूला उत्सव है, जो मानसून के मौसम में पंद्रह दिनों तक मनाया जाता है। प्रत्येक दिन झूलों को अलग-अलग सामग्रियों से सजाया जाता है, जिससे एक अद्वितीय और देखने में अद्भुत दृश्य बनता है। झूलन यात्रा उत्सव न केवल भक्ति का समय है, बल्कि भगवान कृष्ण के साथ प्रेम, आनंद और आध्यात्मिक संबंध का उत्सव भी है।

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