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Vrat Tyohar List

September 2025 Vrat Tyohar List: ये है सितंबर के व्रत की लिस्ट, जानिए कब से शुरू हो रहे हैं शारदीय नवरात्र ?

September 2025 Vrat Tyohar List: सितंबर के महीने में त्योहारों की भरमार है, इसी महीने में शारदीय नवरात्र भी है तो वहीं ये महीना इस बार चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण दोनों का गवाह बनेगा। यहां हम लाए हैं सितंबर माह के व्रत-त्योहारों की लिस्ट, जिसे देखकर आप अपने पूरी महीने की प्लानिंग कर सकते हैं। कालाष्टमी प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला एक हिंदू त्यौहार है जोकि भगवान शिव के ही एक रौद्र रूप भगवान भैरव को समर्पित है। प्रत्येक माह में आने के कारण यह त्यौहार एक वर्ष में कुल 12 बार, तथा अधिक मास की स्थिति में 13 बार मनाया जाता है। काल भैरव को पूजे जाने के कारण इसे काल भैरव अष्टमी अथवा भैरव अष्टमी भी कहा जाता है। September 2025 Vrat Tyohar List: सितंबर माह के व्रत-त्योहारों की लिस्ट 3 सितंबर: परिवर्तिनी एकादशी, डोल ग्यारस, जलझूलनी एकादशी 4 सितंबर: वामन जयंती, भुवनेश्वरी जयंती, कल्की द्वादशी 5 सितंबर: शुक्र प्रदोष व्रत, ओणम 6 सितंबर: गणेश विसर्जन, अनन्त चतुर्दशी 7 सितंबर: भाद्रपद पूर्णिमा व्रत, साल का दूसरा चंद्र ग्रहण, 8 सितंबर से 21 सितंबर तक: पितृपक्ष का प्रारंभ, आश्विन माह का प्रारंभ जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत, कालाष्टमी व्रत (September 2025 Vrat Tyohar List) 10 सितंबर:संकष्टी चतुर्थी 14 सितंबर: महालक्ष्मी व्रत समापन, जीवित्पुत्रिका या जितिया व्रत, कालाष्टमी व्रत 17 सितंबर: इंदिरा एकादशी, विश्वकर्मा पूजा, एकादशी श्राद्ध, कन्या संक्रांति 19 सितंबर: शुक्र प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, त्रयोदशी श्राद्ध 21 सितंबर : सर्वपितृ अमावस्या, आश्विन अमावस्या 22 सितंबर: शारदीय नवरात्रि प्रारंभ, कलश स्थापना, महाराजा अग्रसेन जयंती 23 सितंबर: चन्द्र दर्शन 25 सितंबर: विनायक चतुर्थी 26 सितंबर : उपांग ललिता व्रत 27 सितंबर: स्कंद षष्ठी 30 सितंबर: दुर्गा अष्टमी, महा अष्टमी, संधि पूजा, मासिक दुर्गाष्टमी पितृपक्ष (September 2025 Vrat Tyohar List) Vrat Tyohar List पितृपक्ष हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पाठ है, इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है। यह काल श्राद्ध, तर्पण और पितरों को अर्पण करने के लिए समर्पित होता है। माना जाता है कि इस समय पितृ लोक के द्वार खुल जाते हैं Vrat Tyohar List और हमारे पूर्वज धरती पर अपने वंशजों के श्राद्ध को ग्रहण करने आते हैं। पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस काल का विशेष महत्व है। इस बार श्राद्ध के दिन 8 सितंबर से 21 सितंबर तक रहेंगे। पितृपक्ष में किए जाने वाले प्रमुख कार्य तिल, कुश और जल से तर्पण करना। पिंडदान और श्राद्ध विधि के अनुसार ब्राह्मण भोजन कराना। गाय, कुत्ते, कौवे और जरूरतमंदों को भोजन कराना। गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम, और पवित्र नदी में स्नान। शारदीय नवरात्र (September 2025 Vrat Tyohar List) हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है। साल में चार नवरात्रि आते हैं – चैत्र, आषाढ़, आश्विन (शारदीय) और माघ। इनमें से शारदीय नवरात्रि को सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से मनाया जाता है। यह उत्सव आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर नौ दिनों तक चलता है और विजयादशमी के दिन इसका समापन होता है। शारदीय नवरात्रि को दुर्गा पूजा और दशहरा पर्व से भी जोड़ा जाता है। इस बार आदिशक्ति के पावन दिन 22 सितंबर से 2 अक्टूबर तक रहेंगे।

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Pitru Paksha

Pitru Paksha 2025 Date: पितृ पक्ष जानें क्या करें और क्या न करें, ताकि पितर रहें प्रसन्न और घर में आए सुख-समृद्धि !

Pitru Paksha 2025: सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। इसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है और यह अवधि हमारे पूर्वजों को समर्पित होती है। साल में ये 15 दिन पितरों के लिए होते हैं। मान्यता है कि इन दिनों हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने परिवार को आशीर्वाद देते हैं। अयोध्या के ज्योतिष पंडित कल्कि राम बताते हैं कि Pitru Paksha पितृपक्ष में पितरों के निमित्त श्राद्ध करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे खुश होकर अपने वंशज को आशीर्वाद भी देते हैं। अगर पितृपक्ष के दौरान कुछ बातों का ध्यान न रखा जाए, तो पूर्वज नाराज़ हो सकते हैं, जिससे घर में कई तरह की परेशानियां आ सकती हैं। ये परेशानियां शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से नज़र आ सकती हैं। आइए जानते हैं Pitru Paksha पितृ पक्ष 2025 कब से शुरू हो रहा है, क्या करना चाहिए और किन गलतियों से बचना चाहिए। पितृ पक्ष 2025 कब से शुरू हो रहा है?(When does Pitru Paksha 2025 start) Pitru Paksha: हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि को हो रही है। 7 सितंबर को रात 1:41 बजे पूर्णिमा तिथि का आरंभ होगा और इसका समापन 21 सितंबर को अमावस्या तिथि के दिन होगा। यह भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तिथि तक चलता है। पितृ पक्ष में क्या करना चाहिए? (Pitru Paksha mein kya karna chahiye) पितृपक्ष Pitru Paksha में पितरों की कृपा प्राप्त करने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ विशेष कार्य करने चाहिए: 1. श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान: पितृपक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। अयोध्या के ज्योतिष पंडित कल्कि राम के अनुसार, इससे पितरों को मोक्ष मिलता है और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। 2. दान-पुण्य: इस दौरान दान-पुण्य का विशेष विधान है। दान-पुण्य और तर्पण करने से परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है और सभी तरह के कष्ट दूर होते हैं।     ब्राह्मणों को भोजन: श्राद्ध के दिन किसी ब्राह्मण को घर पर बुलाकर भोजन कराना चाहिए। भोजन के बाद उन्हें अपनी समर्थ अनुसार दक्षिणा दें और उनकी पूजा-अर्चना करें। ऐसा करना बेहद शुभ माना जाता है।     गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद: गरीब और जरूरतमंद लोगों को अपनी समर्थ अनुसार दान देना चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए।     पक्षियों को दाना-पानी: पितृपक्ष के दौरान पक्षियों को कुछ दान देना भी बहुत शुभ माना जाता है। 3. दैनिक अनुष्ठान: प्रतिदिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना चाहिए। दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके जल में काला तिल डालकर तर्पण करना चाहिए। 4. सात्विक जीवन: पितृपक्ष के 15 दिनों तक घर में सात्विक भोजन ही करना चाहिए। इस दौरान घर में साफ-सफाई रखें और मन को पवित्र रखें। 5. पितृ दोष से मुक्ति: मान्यता है कि इस दौरान पितरों से जुड़े अनुष्ठान करने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है। पितृ पक्ष में भूलकर भी न करें ये काम! (Pitru Paksha mein kya na karein) पितृपक्ष में कुछ ऐसे काम हैं जो बिल्कुल भी नहीं किए जाने चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से पूर्वज नाराज़ हो सकते हैं और घर पर बुरा असर पड़ सकता है: 1. तामसिक भोजन और मदिरा सेवन: लहसुन, प्याज और मांसाहार से पूरी तरह बचना चाहिए। पितृपक्ष के दौरान इन चीजों का सेवन और मदिरापान वर्जित माना जाता है। 2. मांगलिक कार्य: पितृपक्ष के दौरान जनेऊ, शादी-विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश इत्यादि जैसे कोई भी मांगलिक कार्य बिल्कुल भी नहीं करने चाहिए। इसका बुरा प्रभाव झेलना पड़ सकता है. 3. नया निर्माण या खरीदारी: अगर आपने कहीं ज़मीन ली हो और नए घर का निर्माण करना चाह रहे हैं, तो पितृपक्ष में बिल्कुल भी शुरुआत न करें। नया घर, प्रॉपर्टी या नया वाहन भी बिल्कुल भी न खरीदें, इससे पितर नाराज़ हो सकते हैं। 4. पशु-पक्षियों को भूखा न लौटाएं: अगर पितृपक्ष के दौरान आपके घर की चौखट पर गाय, काला कुत्ता या काला कौवा आ जाए तो उन्हें भूखे बिल्कुल भी न लौटाएं। ऐसा करने से पितर नाराज़ हो सकते हैं। 5. केश और नख कर्तन: पितृपक्ष में दाढ़ी, मूंछ, बाल और नाखून नहीं काटना चाहिए। यह अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से पितर नाराज़ हो जाते हैं। 6. जमीन में उगने वाली सब्जियां: पितृपक्ष में जमीन में उगने वाली सब्जियां जैसे आलू, बैंगन, खीरा, मूली, अरबी, साग ये सब नहीं खाना चाहिए। निष्कर्ष इन नियमों और सावधानियों का पालन करके आप पितृपक्ष के दौरान अपने पूर्वजों को प्रसन्न कर सकते हैं। इससे आपको पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होगा और घर में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली बनी रहेगी। इन दिनों श्रद्धा और विश्वास के साथ पितरों का स्मरण करना अत्यंत ज़रूरी है अनंत चतुर्दशी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और गणेश विसर्जन का सम्पूर्ण ज्ञान

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Pitru Paksha 2025

Pitru Paksha 2025: पितृ पक्ष कब से शुरू होगा पितृपक्ष? जानें सही तिथि, महत्व और श्राद्ध के नियम

Pitru Paksha 2025: हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। यह वह समय है जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनका सम्मान करते हैं, और उनकी आत्मा की शांति के लिए विभिन्न अनुष्ठान करते हैं। पितृ पक्ष Pitru Paksha के दौरान पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का विधान है। यह माना जाता है कि ऐसा करने से पितरों को शांति मिलती है और उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम पितृ पक्ष 2025 की सही तिथियों, इसके महत्व और पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए किए जाने वाले महत्वपूर्ण उपायों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। पितृ पक्ष 2025 कब है? (Pitru Paksha 2025 Date) हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष Pitru Paksha की शुरुआत मानी जाती है और इसका समापन आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर होता है। इस साल पितृ पक्ष Pitru Paksha की शुरुआत कब होगी, इसे लेकर थोड़ी भ्रम की स्थिति हो सकती है, लेकिन पंचांग के अनुसार सही तिथियां इस प्रकार हैं: पितृ पक्ष 2025 की शुरुआत: वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि 07 सितंबर को देर रात 01 बजकर 41 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 07 सितंबर को ही रात 11 बजकर 38 मिनट पर होगा। ऐसे में रविवार, 07 सितंबर 2025 के दिन से ही पितृ पक्ष की शुरुआत होने जा रही है। पितृ पक्ष 2025 का समापन: पितृ पक्ष का समापन सर्व पितृ अमावस्या यानी 21 सितंबर 2025 को होगा। इस प्रकार, पितृ पक्ष Pitru Paksha के ये 15 दिन पूर्वजों को समर्पित होते हैं, जो भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलते हैं। पितृ पक्ष का महत्व (Significance of Pitru Paksha) पितृ पक्ष Pitru Paksha हिंदू धर्म में बेहद शुभ और महत्वपूर्ण अवधि मानी जाती है। इसका महत्व कई कारणों से है: पूर्वजों को शांति और मोक्ष: यह माना जाता है कि पितृ पक्ष Pitru Paksha में पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और परिवार को आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है। पितृ दोष से मुक्ति: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में पितरों से जुड़े अनुष्ठान करने से कुंडली से पितृ दोष समाप्त होता है। सुख-समृद्धि और खुशहाली: पितरों के प्रसन्न होने पर जीवन में खुशहाली और धन-दौलत आती है। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सभी तरह के कष्ट दूर होते हैं। देव तुल्य पूर्वज: हिंदू धर्म में पितरों को देव तुल्य माना गया है; उन्हें प्रसन्न रखना बहुत जरूरी होता है। यदि पितर नाराज हो जाएं, तो व्यक्ति का जीवन मुश्किलों से भर जाता है। पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए करें ये उपाय (Upay for Pitru Paksha) पितृ पक्ष के दौरान पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष उपाय और अनुष्ठान किए जाते हैं: 1. रोजाना जल अर्पित करें (तर्पण): जिनके माता-पिता जीवित हैं, उनके लिए तर्पण का नियम लागू नहीं होता है। वे रोज सुबह पितरों और इष्टदेवों का ध्यान करते हुए सूर्यदेव को जल अर्पित करें। जिनके माता-पिता जीवित नहीं हैं या दोनों में से एक नहीं है, वे हर रोज पितृ पक्ष Pitru Paksha में दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके तर्पण करें। तर्पण हमेशा जल में दूध और तिल मिलाकर करना चाहिए। स्नान करने के बाद, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काला तिल मिलाकर तर्पण करना शुभ माना जाता है। 2. गौ माता की सेवा: पितृ पक्ष में रोजाना गाय को चारा या भोजन बनाते समय पहली रोटी गाय को खिलाएं। ऐसा करने से देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृ पक्ष में पूरी भावना के साथ गाय को चारा खिलाने से श्राद्धकर्म का पूरा फल मिलता है और पितर भी तृप्त होते हैं। 3. इस दिशा में जलाएं दीपक: पितृ पक्ष Pitru Paksha में हर रोज सुबह-शाम पितरों के नाम से एक दीप दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जलाना चाहिए। मान्यता है कि पितृ पक्ष में दक्षिण दिशा से ही पितर पृथ्वी लोक पर अपने रिश्तेदारों के यहां आते हैं। जिस दिन पितरों का श्राद्ध कर्म कर रहे हों, उस दिन दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों का आह्वान करते हैं। 4. ब्राह्मणों को भोजन कराएं: श्राद्ध के दिन किसी ब्राह्मण को घर पर बुलाकर भोजन कराना शुभ माना जाता है। भोजन में खीर, पूड़ी और उनकी पसंद की अन्य चीजें शामिल करनी चाहिए। 5. जरूरतमंदों को दान दें: श्राद्ध के बाद जरूरतमंदों को अपनी क्षमतानुसार दान देना चाहिए। 6. सात्विक भोजन और पवित्रता: पितृ पक्ष के 15 दिनों तक घर में सात्विक भोजन ही बनाना चाहिए। लहसुन, प्याज और मांसाहार का सेवन पूरी तरह से वर्जित माना गया है। इस दौरान घर और मन दोनों को साफ और पवित्र रखना चाहिए। पितृ पक्ष में श्राद्ध की महत्वपूर्ण तिथियां (Important Shradh Dates in Pitru Paksha 2025) पितृ पक्ष की सभी तिथियों का अपना महत्व है, क्योंकि हर तिथि पर किसी न किसी के पितर की मृत्यु हुई होती है और वे उनके लिए श्राद्ध और तर्पण करते हैं। कुछ तिथियां विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं: पूर्णिमा श्राद्ध (7 सितंबर): इस दिन उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुई हो। प्रतिपदा श्राद्ध (8 सितंबर): इस दिन उन पितरों का तर्पण, पिंडदान, दान, श्राद्ध आदि होता है, जिनका किसी भी माह की प्रतिपदा तिथि को निधन हुआ होता है। द्वितीय श्राद्ध (9 सितंबर): जिन पितरों की मृत्यु किसी भी महीने के दूसरे दिन (द्वितीया) हुई हो उनका श्राद्ध पितृपक्ष की द्वितीया तिथि पर किया जाता है। तृतीया श्राद्ध (10 सितंबर): जिनकी मृत्यु तृतीया तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध तृतीया को किया जाता है। चतुर्थी श्राद्ध (10 सितंबर): अगर किसी के पिताजी की मृत्यु चतुर्थी को हुई हो तो उनका श्राद्ध भी उसी तिथि को किया जाता है। पंचमी या महाभरणी श्राद्ध (11 सितंबर): इस दिन अविवाहित पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु पंचमी तिथि पर हुई हो। भरणी नक्षत्र होने पर श्राद्ध का महत्व और भी

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Anant Chaturdashi

Anant Chaturdashi 2025 Date: अनंत चतुर्दशी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और गणेश विसर्जन का सम्पूर्ण ज्ञान

Anant Chaturdashi: हिंदू धर्म में अनंत चतुर्दशी का पर्व एक विशेष महत्व रखता है. यह भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है. यह दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा के लिए समर्पित है और इसी दिन गणेश उत्सव का भी समापन होता है, यानी गणेश जी का विसर्जन किया जाता है. इसे ‘अनंत चौदस’ के नाम से भी जाना जाता है. अनंत चतुर्दशी का महत्व (Anant Chaturdashi Significance) धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, Anant Chaturdashi अनंत चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं. यह माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और अनंत भगवान की पूजा करने से सारे दुख-दर्द खत्म हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. ज्योतिष के अनुसार, इस दिन मोक्ष की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है. इस पावन दिन पर ‘अनंत सूत्र’ नामक एक विशेष धागा धारण किया जाता है. इस धागे में चौदह गांठें होती हैं, जो भगवान विष्णु के चौदह लोकों (भूलोक, भुवलोक, स्वलोक, महलोक, जनलोक, तपोलोक, ब्रह्मलोक, अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल, महातल, और पताल लोक) का प्रतीक मानी जाती हैं. यह भी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. धन-धान्य, सुख-संपदा और संतान आदि की कामना के लिए भी यह व्रत किया जाता है. अनंत चतुर्दशी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Anant Chaturdashi 2025: Date and Auspicious Time) इस साल, Anant Chaturdashi अनंत चतुर्दशी का पर्व 6 सितंबर, शनिवार को मनाया जाएगा. • चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ: 6 सितंबर 2025 को सुबह 03 बजकर 12 मिनट पर. • चतुर्दशी तिथि समाप्त: 7 सितंबर 2025 को अर्धरात्रि (सुबह) 01 बजकर 41 मिनट पर. • अनंत चतुर्दशी पूजा मुहूर्त: 6 सितंबर को सुबह 06 बजकर 02 मिनट से लेकर 7 सितंबर की अर्धरात्रि 01 बजकर 41 मिनट तक रहेगा. • अवधि: 19 घंटे 39 मिनट. गणेश विसर्जन 2025 का शुभ मुहूर्त (Ganesh Visarjan 2025 Muhurat) Anant Chaturdashi:अनंत चतुर्दशी के दिन ही गणेश उत्सव का समापन होता है और भगवान गणेश को ‘गणपति बप्पा मोरया’ कहते हुए पूरे शौर्य के साथ विदा किया जाता है. इस दिन गणेश विसर्जन के लिए 5 शुभ चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध हैं: • प्रातः मुहूर्त (शुभ): सुबह 7 बजकर 36 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 10 मिनट तक. • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): दोपहर 12 बजकर 19 मिनट से लेकर शाम 05 बजकर 02 मिनट तक. • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): शाम 06 बजकर 37 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 02 मिनट तक. • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): रात 09 बजकर 28 मिनट से लेकर 7 सितंबर को अर्धरात्रि 01 बजकर 45 मिनट तक. • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 7 सितंबर को सुबह 04 बजकर 36 मिनट से लेकर सुबह 06 बजकर 02 मिनट तक. अनंत चतुर्दशी 2025 पूजा विधि (Anant Chaturdashi 2025 Puja Vidhi) अनंत चतुर्दशी की पूजा विधि अत्यंत सरल और भक्तिपूर्ण है: 1. सुबह स्नान और संकल्प: पूजा की शुरुआत सुबह स्नान करके साफ-सुथरे कपड़े पहनकर होती है. इसके बाद घर के मंदिर को साफ करें और पूजा स्थल पर धातु या मिट्टी का कलश स्थापित करें. सभी देवी-देवताओं का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें. 2. भगवान विष्णु की स्थापना और पूजन: घर के साफ स्थान पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर रखकर पूजा की जाती है. कुछ स्त्रोतों के अनुसार, विष्णुजी के शेषनाग स्वरूप की प्रतिमा स्थापित की जाती है. 3. अनंत सूत्र अर्पित करें: पूजा में रोली, चावल, फूल, फल, मिठाई और तांबे के पात्र का इस्तेमाल होता है. भगवान विष्णु को 14 गांठों वाला रक्षासूत्र (अनंत सूत्र) अर्पित करें. इन 14 गांठों में 14 देवताओं का स्थान माना जाता है. 4. षोडषोपचार पूजन और हवन: अनंत सूत्र का षोडषोपचार पूजन करें. इसके बाद तिल, घी, मेवा और खीर से हवन करें. 5. कथा श्रवण और आरती: पूजा के बाद अनंत चतुर्दशी की कथा सुनी जाती है. अंत में आरती करके प्रसाद बांटा जाता है. 6. अनंत सूत्र धारण: पूजा के बाद अनंत सूत्र को हाथ में बांधा जाता है. महिलाएं इसे बाएं हाथ में पहनती हैं, वहीं पुरुषों को दाएं हाथ के बाजू में अनंत सूत्र बांधना चाहिए. रक्षासूत्र पहनते समय ‘ऊँ अनंताय नमः’ मंत्र का जाप कर सकते हैं. 7. दान-पुण्य: हवन के बाद दान-पुण्य के काम करें. इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना भी शुभ माना जाता है. केले के पेड़ का पूजन भी किया जाता है. इस प्रकार, Anant Chaturdashi अनंत चतुर्दशी का पर्व हमें भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप और उनकी कृपा को स्मरण करने का अवसर देता है, साथ ही यह गणेश उत्सव के भव्य समापन का भी प्रतीक है. गणेश उत्सव 2025: बप्पा के घर रहते और विसर्जन के दौरान भूलकर भी न करें ये काम, वरना लगेगा पाप ! वामन जयंती 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि – पाएं भगवान विष्णु का आशीर्वाद !

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Ganesh Visarjan

Ganesh Visarjan: गणेश उत्सव 2025: बप्पा के घर रहते और विसर्जन के दौरान भूलकर भी न करें ये काम, वरना लगेगा पाप !

Ganesh Visarjan:गणेश चतुर्थी का त्योहार भारत के सबसे प्रसिद्ध और प्रतीक्षित त्योहारों में से एक है। यह उत्सव पूरे वातावरण को आस्था और सकारात्मकता से भर देता है। 27 अगस्त 2025 से गणेश उत्सव की शुरुआत हो चुकी है, और घर-घर में बप्पा की स्थापना की जा रही है। भक्त 10 दिनों तक बप्पा की मूर्ति घर पर लाते हैं और श्रद्धापूर्वक स्थापना करते हैं, Ganesh Visarjan जिसका समापन अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन के साथ होता है। 2025 में, गणेश विसर्जन 6 सितंबर (शनिवार) को अनंत चतुर्दशी के साथ मनाया जाएगा। बप्पा के आगमन से लेकर उनकी विदाई तक, इस दौरान कुछ कामों को करने से बचना चाहिए, ताकि सुख-शांति बनी रहे और कोई पाप न लगे। आइए जानते हैं गणेश उत्सव और Ganesh Visarjan विसर्जन के दौरान हमें किन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए। गणेश उत्सव 2025 के दौरान इन बातों का रखें ध्यान Ganesh Visarjan जब तक गणपति आपके घर पर रहें, तब तक वातावरण को पवित्र और शुद्ध रखना बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसा न करने से आपके घर की सुख-शांति पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। 1. क्रोध और लड़ाई-झगड़े से बचें गणपति स्थापना के दिन से लेकर बप्पा के घर पर रहने तक, वातावरण को शांतिपूर्ण और शुद्ध रखें। इस दौरान क्रोध, लड़ाई-झगड़ा न करें। ऐसा कोई काम न करें, जिससे घर पर कलह-क्लेश जैसी स्थिति उत्पन्न हो। 2. सात्विकता का पालन करें गणेशोत्सव Ganesh Visarjan के दौरान घर पर सात्विकता का पालन करें। लहसुन-प्याज या मांसाहार भोजन से पूरी तरह दूर रहें। साथ ही, घर पर शराब या किसी तरह के नशीले वस्तुओं का सेवन भी न करें। 3. घर और पूजा स्थल को साफ-सुथरा रखें गणपति के घर पर होने से घर को भी पूरी तरह से साफ-सुथरा रखें। खासकर पूजास्थल के पास किसी तरह की गंदगी नहीं होनी चाहिए। इस स्थान पर ताजे फूल-माला रखें और वातावरण को सुगंधित रखें। 4. बाल-दाढ़ी या नाखून न काटें ऐसी भी मान्यता है कि गणपति उत्सव के समय बाल-दाढ़ी या नाखून नहीं काटने चाहिए। 5. जूते-चप्पल पहनकर घर में प्रवेश न करें साथ ही, घर पर जूते-चप्पल पहनकर भी नहीं आना चाहिए। इससे बप्पा का अपमान होता है। Ganesh Visarjan: गणेश उत्सव 2025: बप्पा के घर रहते और विसर्जन के दौरान भूलकर भी न करें ये काम गणेश विसर्जन Ganesh Visarjan सृष्टि और प्रलय के चक्र का प्रतीक है। जिस प्रकार मूर्ति जल में विलीन हो जाती है, उसी प्रकार यह इस शाश्वत सत्य का प्रतीक है कि संसार में सब कुछ अस्थायी है और अंततः प्रकृति में विलीन हो जाएगा। गणेश जी को विदाई देना, अलविदा नहीं, बल्कि अगले वर्ष उनके पुनः आगमन का वादा है। “गणपति बप्पा मोरया, पुधच्या वर्षी लवकर या” का जाप इसी गहरी आस्था को दर्शाता है। इस अनुष्ठान की पवित्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए, गणेश विसर्जन के दौरान कुछ चीज़ें कभी नहीं करनी चाहिए। 1. गंदे या प्रदूषित जल में मूर्तियों का विसर्जन न करें सबसे बड़ी गलतियों में से एक है प्रदूषित नदियों, नालों या तालाबों में मूर्तियों का विसर्जन। Ganesh Visarjan इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, बल्कि भगवान गणेश का भी अनादर होता है। मूर्तियों का विसर्जन हमेशा स्वच्छ जल या अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराए गए कृत्रिम कुंडों में करें। 2. पीओपी (POP) की मूर्तियों का प्रयोग न करें प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की मूर्तियाँ आसानी से नहीं घुलतीं और हानिकारक रसायन छोड़ती हैं जो जल को प्रदूषित करते हैं। शास्त्रों में पर्यावरण-अनुकूल मिट्टी की मूर्तियों के उपयोग की सलाह दी गई है। पीओपी की मूर्तियों का उपयोग करना और उन्हें जल में विसर्जित करना प्रकृति के प्रति अनादर और पाप माना जाता है। 3. विदाई पूजा (उत्तर पूजा) न छोड़ें विसर्जन से पहले, भक्तों को उत्तर पूजा करनी चाहिए, जिसमें फूल, मिठाई, पान के पत्ते चढ़ाना और मंत्रोच्चार करना शामिल है। इस अनुष्ठान को छोड़ना भगवान गणेश को उचित विदाई देने की उपेक्षा माना जाता है। 4. प्लास्टिक वस्तुओं को जल में न फेंके कई बार, लोग मूर्ति के साथ सजावटी सामग्री जैसे थर्मोकोल, प्लास्टिक के फूल या सिंथेटिक कपड़े विसर्जित कर देते हैं। यह प्रथा हानिकारक है और इसे पाप माना जाता है। केवल प्राकृतिक प्रसाद जैसे फूल, हल्दी, नारियल और पान के पत्ते ही विसर्जित करने चाहिए। 5. विसर्जन लापरवाही से न करें गणेश विसर्जन Ganesh Visarjan एक पवित्र अनुष्ठान है और इसे जल्दबाजी, लापरवाही या श्रद्धा के बिना नहीं किया जाना चाहिए। विसर्जन के दौरान अनावश्यक नारे लगाना, शराब पीना या अराजकता फैलाना त्योहार की पवित्रता के विरुद्ध है। 6. आध्यात्मिक अर्थ को न भूलें कई लोगों के लिए, विसर्जन Ganesh Visarjan केवल नृत्य और संगीत का उत्सव बन गया है। हालाँकि आनंद एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन आध्यात्मिक सार को भूल जाना—कि विसर्जन वैराग्य और समर्पण का प्रतीक है—इसका महत्व कम कर देता है। हमेशा याद रखें कि विदाई जीवन और प्रकृति के चक्र का प्रतिनिधित्व करती है। वामन जयंती 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि – पाएं भगवान विष्णु का आशीर्वाद ! भुवनेश्वरी जयंती 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि –जानें देवी भुवनेश्वरी की महिमा

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Vamana Jayanti 2025

Vamana Jayanti 2025 Date: वामन जयंती 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि – पाएं भगवान विष्णु का आशीर्वाद !

Vamana Jayanti 2025 Date: भगवान विष्णु के पांचवें अवतार वामन देव को समर्पित वामन जयंती 2025 का पावन पर्व गुरुवार, 4 सितंबर 2025 को मनाया जाएगा। इसे वामन द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह उत्सव भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पड़ता है। भक्तों का मानना है कि इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और आध्यात्मिक योग्यता (पुण्य) में वृद्धि होती है। Vamana Jayanti 2025 Date subh Muhurat: वामन जयंती 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त वामन जयंती Vamana Jayanti 2025 के अवसर पर पूजा-पाठ और व्रत के लिए निम्नलिखित तिथियां और समय अत्यंत शुभ माने जाते हैं: • वामन जयंती तिथि: गुरुवार, 4 सितंबर 2025 • द्वादशी तिथि प्रारंभ: 4 सितंबर, सुबह 4:21 बजे (IST) (एक अन्य स्रोत में 4:20 बजे IST भी दिया गया है) • द्वादशी तिथि समाप्त: 5 सितंबर, सुबह 4:08 बजे (IST) (एक अन्य स्रोत में 4:10 बजे IST भी दिया गया है) यह शुभ दिन श्रवण नक्षत्र में मनाया जाता है, जो 4 सितंबर की रात 11:44 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 11:38 बजे तक रहेगा। क्यों लिया भगवान विष्णु ने वामन अवतार? (वामन अवतार की कथा) हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु ने Vamana Jayanti 2025 वामन अवतार दानव राजा बलि की बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने और देवताओं का इंद्रलोक पर नियंत्रण बहाल करने के लिए लिया था। राजा बलि एक अत्यंत पराक्रमी और दानी राजा थे, जिनके बढ़ते प्रभाव से इंद्रलोक के देवता चिंतित थे। तब भगवान विष्णु ने एक बौने ब्राह्मण (वामन) का रूप धारण किया और राजा बलि के पास भिक्षा मांगने पहुंचे। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि का दान माँगा। राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य के मना करने के बावजूद, वामन देव की छोटी सी मांग को सहर्ष स्वीकार कर लिया। अपने दिव्य शक्तियों से, Vamana Jayanti 2025 Date वामन देव ने पहले पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया, और दूसरे पग में पूरे स्वर्ग लोक को। तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर वामन देव के चरणों में रख दिया। यह कथा न्याय, धार्मिकता और धर्म के संरक्षण का प्रतीक है, जो भगवान विष्णु की ब्रह्मांडीय लीला और दिव्य ज्ञान को उजागर करती है। Vamana Jayanti Pujan Vidi: वामन जयंती 2025: पूजन विधि वामन जयंती Vamana Jayanti पर भगवान वामन की पूजा-अर्चना करना और व्रत रखना विशेष फलदायी माना जाता है। • सुबह की पूजा: इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान वामन की पूजा-आराधना करें। • प्रतिमा स्थापना: यदि संभव हो, तो वामन भगवान की स्वर्ण प्रतिमा बनवाकर पंचोपचार पूजा करें। Vamana Jayanti 2025 पूजा की शुरुआत पूर्व दिशा की ओर हरे कपड़े पर वामन देव की मूर्ति या तस्वीर लगाकर की जाती है। • व्रत: भक्त फल-आधारित या सात्विक उपवास रखते हैं। • दान: पूजा के बाद चावल, दही और चांदी जैसी वस्तुओं का दान करना बहुत लाभकारी होता है। • पशु सेवा: अनाज और दही से जानवरों को भोजन कराना भी एक सामान्य अभ्यास है। • मंत्र जाप: विष्णु सहस्रनाम का पाठ और मंत्र जप करना भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए शुभ माना जाता है। • शाम की पूजा और कथा: शाम को, व्रती भगवान की पूजा करते हैं, व्रत कथा सुनते हैं और पूरे परिवार में प्रसाद बांटते हैं। ये सभी अनुष्ठान भगवान विष्णु को प्रसन्न करते हैं और समृद्धि, आध्यात्मिक विकास और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा लाते हैं। राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा…. Vamana Jayanti 2025: वामन जयंती 2025: राशिनुसार करें ये विशेष उपाय अपनी राशि के अनुसार विशेष उपाय करने से भगवान वामन का आशीर्वाद प्राप्त होता है: • मेष: ‘तप रूपाय विद्महे..’ मंत्र का जाप करें। • वृषभ: मिश्री का भोग लगाएं। • मिथुन: घी का दीपक जलाएं। • कर्क: चावल-दही और चांदी का दान करें। • सिंह: चंदन से पूजा करें। • कन्या: तुलसी पत्र और रक्त चंदन का प्रयोग करें। • तुला: खीर चढ़ाएं। • वृश्चिक: ‘तप रूपाय विद्महे..’ मंत्र का जाप करें। • धनु: फलाहार (फल आधारित आहार) का सेवन करें। • मकर: कांसे के दीपक से पूजा करें। • कुंभ: घी का दीपक जलाएं। • मीन: दान-धर्म का कार्य करें। निष्कर्ष: इस वामन जयंती पर, अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ Vamana Jayanti 2025 भगवान वामन की पूजा करें और उनके आशीर्वाद प्राप्त करें। यह दिन आपके जीवन में सुख-समृद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति लाएगा। डिस्क्लेमर: इस लेख की सामग्री विशुद्ध रूप से मान्यताओं पर आधारित है और इसे सामान्य मार्गदर्शन के रूप में लिया जाना चाहिए। व्यक्तिगत अनुभव भिन्न हो सकते हैं। KARMASU.IN प्रस्तुत किसी भी दावे या जानकारी की सटीकता या वैधता की पुष्टि नहीं करता है। यहाँ चर्चा की गई किसी भी जानकारी या विश्वास पर विचार करने या उसे लागू करने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेने की दृढ़ता से सलाह दी जाती है।

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Bhuvaneshvari Jayanti

Bhuvaneshvari Jayanti 2025 Date:भुवनेश्वरी जयंती 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि –जानें देवी भुवनेश्वरी की महिमा

Bhuvaneshvari Jayanti 2025: हिंदू धर्म में, शक्ति स्वरूपा देवी के दस रूप हैं, जिन्हें दश महाविद्या कहा जाता है। इन दस महाविद्याओं में देवी भुवनेश्वरी चौथी महाविद्या हैं। वह अपने भक्तों को अभय सहित अनेक प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं। गृहस्थ लोग संतान प्राप्ति की कामना से देवी भुवनेश्वरी की पूजा करते हैं। Bhuvaneshvari Jayanti माँ भुवनेश्वरी को शक्ति प्रदान करने वाली माँ माना जाता है, जो प्राणियों को पोषण और शक्ति दोनों प्रदान करती हैं। हर साल यह जयंती बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। भुवनेश्वरी जयंती 2025 कब है? (Bhuvaneshvari Jayanti 2025 Date & Time) हिंदू कैलेंडर के अनुसार, Bhuvaneshvari Jayanti भुवनेश्वरी जयंती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी के दिन मनाई जाती है। वर्ष 2025 में, भुवनेश्वरी जयंती गुरुवार, 4 सितंबर 2025 को है। • द्वादशी तिथि प्रारंभ: 04 सितंबर 2025, प्रातः 04:21 बजे से • द्वादशी तिथि समाप्त: 05 सितंबर 2025, प्रातः 04:08 बजे देवी भुवनेश्वरी कौन हैं? (Who is Devi Bhuvaneshvari?) देवी भुवनेश्वरी भुवनेश्वर रुद्र की शक्ति के रूप में वर्णित की जाती हैं। देवी पुराण में वर्णित है कि मूल प्रकृति ही देवी भुवनेश्वरी के रूप में विद्यमान हैं। उन्हें वामा, ज्येष्ठा और रौद्री आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है। देवी स्वयं शताक्षी और शाकंभरी देवी के रूप में विद्यमान हैं। देवी भुवनेश्वरी संपूर्ण सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी हैं और वे स्वयं संपूर्ण सृष्टि के रूप में विद्यमान हैं। Bhuvaneshvari Jayanti उन्हें आदि शक्ति के रूप में भी विख्यात किया गया है। माँ भुवनेश्वरी देवी महादेव शिव की लीला-विलास का सहभागी मानी जाती हैं। उन्हें दस सबसे महत्वपूर्ण विद्याओं में से एक माना जाता है। वह तीनों लोकों को धारण करने वाली मानी जाती हैं। भक्तों के बीच वह अपनी अंकुश पाश और अभय मुद्रा धारण करने के लिए भी काफी मान्य हैं। देवी भुवनेश्वरी का स्वरूप (Appearance of Devi Bhuvaneshvari) यूं तो इनके नाम से उन्हें सख्त व क्रूर माना जाता है, लेकिन उनका स्वरूप पूर्णतया कांति व सौम्य है। उनके मस्तक पर चंद्रमा स्वरूप शोभा देखते ही बनती है। देवी भुवनेश्वरी अपने तेज और तीन नेत्रों से युक्त होने के कारण शक्तिशाली भी मानी जाती हैं। Bhuvaneshvari Jayanti उनके वैभव और शक्ति की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है। माता भुवनेश्वरी पूरी सृष्टि की आराम और ऐश्वर्य की स्वामिनी मानी जाती हैं। उनका वर्ण श्याम तथा गौर माना जाता है, और उनके नख में पूरा ब्रह्मांड समाता है। माता भुवनेश्वरी के मुख का तेज सूर्य के समान लाल है, जो सकारात्मकता का संचार करता है। उनकी एक मुख और चार हाथ हैं, जो उनके यश और तेज की व्याख्या करते हैं। राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा…. देवी भुवनेश्वरी जयंती कथा (Devi Bhuvaneshvari Jayanti Katha) देवी भागवत में वर्णित कथा के अनुसार, एक समय दुर्गम नामक राक्षस ने अपने अत्याचारों से सभी देवी-देवताओं को त्रस्त कर दिया था। दुर्गम राक्षस के अधर्म से व्यथित होकर देवताओं और ब्राह्मणों ने हिमालय पर्वत पर देवी भुवनेश्वरी की आराधना की। Bhuvaneshvari Jayanti देवताओं और ब्राह्मणों की आराधना से प्रसन्न होकर देवी स्वयं बाण, कमल पुष्प, शाक, मूल आदि लेकर वहां प्रकट हुईं। देवी माँ ने अपने नेत्रों से जल की सहस्त्र धाराएँ प्रकट कीं, जिससे पृथ्वी के सभी प्राणी तृप्त हो गए। देवी माँ के नेत्रों से बहते आंसुओं के कारण सभी नदियां और समुद्र अपार जल से भर गए। सभी पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां और औषधियां सिंचित हो गईं। Bhuvaneshvari Jayanti देवी भुवनेश्वरी ने दुर्गमासुर से युद्ध किया और उसे परास्त कर दिया। इस तरह देवताओं पर आए भीषण संकट का समाधान हो गया। दुर्गमासुर का वध करने के कारण देवी भुवनेश्वरी, देवी दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हुईं। दश महाविद्याएँ (Ten Mahavidya Devi) देवी के दस रूप हैं, जिन्हें दश महाविद्या कहा जाता है। ये दस देवियां दिव्य स्त्री (आदि शक्ति) के महान ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती हैं। Bhuvaneshvari Jayanti ये हिंदू धर्म में तांत्रिक पूजा का केंद्र हैं, जो भक्तों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन और शक्ति प्रदान करती हैं। 1. काली 2. तारा 3. त्रिपुर सुंदरी (षोडशी) 4. भुवनेश्वरी 5. भैरवी 6. छिन्नमस्ता 7. धूमावती 8. बगलामुखी 9. मातंगी 10. कमला मां भुवनेश्वरी देवी की पूजा विधि (How to Perform Devi Bhuvaneshvari Puja) माँ भुवनेश्वरी की साधना के लिए कुछ विशेष समय बहुत ही शुभ माने जाते हैं: • रात्रि • ग्रहण • होली • दीपावली • महाशिवरात्रि • कृष्ण पक्ष की अष्टमी • चतुर्दशी आवश्यक सामग्री (Puja Samagri): • लाल रंग के पुष्प • नैवेद्य • चंदन • कुंकुम • रुद्राक्ष की माला • लाल रंग (वस्त्र आदि के लिए) पूजा करने का तरीका: मां भुवनेश्वरी देवी जी की चौकी लाल वस्त्र से सुसज्जित होनी चाहिए। देवी मां की मूर्ति या चित्र स्थापित करके पंचोपचार और षोडशोपचार द्वारा पूजा करनी चाहिए। मां भुवनेश्वरी देवी के मंत्र (Mantras of Devi Bhuvaneshvari) मंत्रों का एक खास महत्व होता है और पूजा को सफल बनाने के लिए इन मंत्रों का जाप करना बहुत आवश्यक है। इन विशेष मंत्रों का जाप करने से मां भुवनेश्वरी देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो आपका जीवन सफल बनाने हेतु बहुत ही सहायक होते हैं। इनके मूल मंत्र हैं: • “ऊं ऐं ह्रीं श्रीं नम:” • “हृं ऊं क्रीं” (त्रयक्षरी मंत्र) • “ऐं हृं श्रीं ऐं हृं” इन सभी मंत्रों का जाप करने से मां के भक्तों को असीम सुखों एवं सिद्धियों की प्राप्ति होती है। पूजा के लाभ (Benefits of Worship) देवी भुवनेश्वरी भक्तों को संतान सुख, धन, विद्या और सौभाग्य आदि प्रदान करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करने से भक्तों को असीम आराम और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। यह देव चेतनात्मक अनुभूति का आनंद करा सकती है यदि इनकी पूजा पूरे सद्भाव और नियमों से की जाए तो। गायत्री उपासना में भी भुवनेश्वरी जी का भाव है और इसी कारण इनकी उपासना करने का एक विशेष महत्व है।

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Radha Ashtami

Radha Ashtami Vrat Niyam: राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा….

Radha Ashtami Vrat Niyam: हिंदू धर्म में राधा अष्टमी का पर्व अत्यंत पावन और श्रद्धा से भरा हुआ दिन माना जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त और प्रेम स्वरूपा श्री राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। Radha Ashtami खासकर ब्रजभूमि, मथुरा और वृंदावन जैसे तीर्थस्थलों पर इस दिन विशेष उत्सव और झांकियों का आयोजन होता है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं, कीर्तन-भजन करते हैं और राधा रानी की विधिपूर्वक पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में प्रेम, सौहार्द और सुख-शांति का वास होता है, और वैवाहिक जीवन में प्रेम बढ़ता है। हालांकि, Radha Ashtami राधा अष्टमी के दिन पूजा-पाठ और व्रत के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना बहुत जरूरी माना गया है। सही विधि से पूजा न करने या कुछ गलतियां करने पर पूजा का फल बाधित हो सकता है। Radha Ashtami इसलिए, इस पावन अवसर पर क्या करना चाहिए और किन बातों से बचना चाहिए, यह जानना आवश्यक है, ताकि श्रद्धा के साथ किया गया पूजन पूर्ण फलदायक हो सके। Radha Ashtami Vrat Niyam: राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा….. Radha Ashtami: राधा अष्टमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त इस वर्ष, वैदिक पंचांग के अनुसार राधा अष्टमी 31 अगस्त 2025, रविवार को मनाई जाएगी। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि आरंभ: 30 अगस्त, रात्रि 10:46 बजे से भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त: 1 सितंबर, देर रात 12:57 बजे तक उदयातिथि के अनुसार: राधा अष्टमी 31 अगस्त को मनाई जाएगी। राधा अष्टमी पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: 31 अगस्त, प्रातः 11:05 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा। What to do on the day of Radha Ashtami fast: राधा अष्टमी व्रत के दिन क्या करें? राधा रानी की कृपा प्राप्त करने और व्रत का पूर्ण फल पाने के लिए इन बातों का ध्यान रखें: स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें। स्नान के बाद साफ और स्वच्छ कपड़े पहनें ताकि मन और शरीर दोनों पवित्र रहें। तभी व्रत और पूजा का संकल्प लें। ब्रह्मचर्य का पालन: पूरे दिन ब्रह्मचर्य नियम का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। इसका मतलब है कि आप न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी संयमित और शुद्ध रहें। पवित्र भोग: राधा रानी को केवल ताजी और पवित्र चीज़ें जैसे ताजे फल, दूध, दूध से बने प्रसाद, फूल, इत्यादि ही भोग के रूप में लगाएं। पुरानी या अर्धपकी हुई चीज़ें अर्पित न करें। व्रत कथा पाठ/श्रवण: पूजा के बाद राधा अष्टमी व्रत की कथा का पाठ या श्रवण करें। इससे व्रत की महिमा और धार्मिकता बढ़ती है और मन को आध्यात्मिक शांति मिलती है। शुभ मुहूर्त में पारण: व्रत खोलने का समय खास होता है। शुभ मुहूर्त में ही व्रत का पारण करना चाहिए ताकि पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त हो। जल्दबाजी न करें और समय का सम्मान करें। प्रसाद ग्रहण: व्रत खोलते समय उसी प्रसाद को ग्रहण करें, जिसे पूजा में राधा रानी को भोग लगाया गया था। इससे पूजन की पूर्णता बनी रहती है। दान और गौ सेवा: व्रत खोलने से पहले जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, या धन दान करें। इसके अलावा गौ सेवा भी बहुत शुभ मानी जाती है। इससे पुण्य बढ़ता है और व्रत की सफलता सुनिश्चित होती है। बुजुर्गों का आशीर्वाद: पारण करने के बाद घर के बुजुर्गों या वरिष्ठों का आशीर्वाद लेना आवश्यक होता है। उनका आशीर्वाद आपके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है। Santan Saptami 2025: 29 या 30 अगस्त? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व What not to do on the day of Radha Ashtami fast: राधा अष्टमी व्रत के दिन क्या न करें? इन बातों से बचना चाहिए ताकि व्रत में कोई दोष न लगे और पूजा का फल बाधित न हो भोग को झूठा न करें: पूजा में जो भी भोग राधा रानी को अर्पित किया जाना है, वह पूरी तरह शुद्ध और बिना किसी स्पर्श के होना चाहिए। भोग बनाने के बाद उसे चखना या किसी भी तरह से झूठा करना वर्जित है। दिन में न सोएं: व्रत के दिन दिन में सोना धार्मिक दृष्टि से अनुचित माना गया है। इससे व्रत की तपस्या में बाधा आती है और इसका फल कम हो सकता है। शरीर की कटिंग से बचें: इस शुभ दिन शरीर की कटिंग जैसे बाल, नाखून या दाढ़ी काटना वर्जित होता है। इसे अशुद्धता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इससे बचना चाहिए। काले/गहरे कपड़े न पहनें: इस दिन काले या बहुत गहरे रंग के कपड़े पहनने से परहेज़ करें। राधा रानी को लाल और पीले रंग अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इन्हीं रंगों के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। सिर ढक कर पूजा करें: पूजा करते समय महिलाओं को बाल बांधकर रखने चाहिए और सिर को चुनरी से ढकना चाहिए। यह श्रद्धा और शुद्धता का प्रतीक होता है। पुरुषों को भी सिर पर रुमाल या कपड़ा रखना चाहिए। बाल न धोएं: राधा अष्टमी की तिथि के दौरान बाल धोना वर्जित माना जाता है। Radha Ashtami यदि बाल धोने की आवश्यकता हो तो यह कार्य अष्टमी शुरू होने से पहले कर लेना चाहिए। निष्कर्ष राधा अष्टमी का व्रत अत्यंत फलदायी होता है, बशर्ते आप श्रद्धा और नियमों के साथ इसका पालन करें। इन नियमों का पालन कर आप राधा रानी की असीम कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को सुख-समृद्धि से भर सकते हैं। आपको राधा अष्टमी 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं..

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Santan Saptami 2025: 29 या 30 अगस्त? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व

Santan Saptami;प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए किया जाता है।Santan Saptami 2025 माताएं अपने बच्चों के कल्याण के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं।सनातन धर्म में संतान सप्तमी व्रत का खास महत्व है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने बच्चों की भलाई और सुरक्षा के लिए व्रत रखती हैं। इसके साथ ही शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। इस बार यह व्रत (Santan Saptami 2025 ) कब रखा जाएगा? इस वर्ष 2025 में, Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी की तिथि को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है। कई लोग जानना चाहते हैं कि संतान सप्तमी का व्रत 29 अगस्त को रखा जाएगा या 30 अगस्त को। आइए, इस भ्रम को दूर करते हैं और जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि। संतान सप्तमी डेट और पूजा मुहूर्त (Santan Saptami 2025 Date And Puja Time) Santan Saptami 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, सप्तमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। वहीं, इसका अंत 30 अगस्त को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। ऐसे में 30 अगस्त को संतान सप्तमी का उपवास रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 05 मिनट से दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। चूंकि उदय तिथि के अनुसार व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, इसलिए Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी का व्रत 30 अगस्त 2025, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि रहेगी, जो व्रत के लिए सर्वाधिक मान्य है। संतान सप्तमी व्रत का महत्व:Importance of Santan Saptami fast धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत अपार पुण्य फलदायी होता है। इस व्रत को करने से: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां… संतान सप्तमी 2025: पूजा विधि: Santan Saptami 2025: Puja method संतान सप्तमी के दिन व्रत और पूजा करने की विधि इस प्रकार है: निष्कर्ष संतान सप्तमी का व्रत माता-पिता के लिए उनकी संतान के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस वर्ष 30 अगस्त 2025 को श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत को रखें और भगवान शिव और माता पार्वती से अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करें। यह ब्लॉग पोस्ट आपकी वेबसाइट ‘कर्मसु’ के लिए बहुत उपयुक्त है, क्योंकि यह धार्मिक जानकारी को स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करती है, जो पाठकों के लिए उपयोगी है।

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Ganesh Visarjan

Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां…

Ganesh Visarjan: हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश उत्सव का शुभारंभ होता है. यह पर्व दस दिनों तक पूरे भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है, और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है. गणेश चतुर्थी का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसी दिन विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, प्रथम पूज्य श्री गणेश जी का प्राकट्य हुआ था. यह उत्सव केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष और अब तो विदेशों में भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, Ganesh Visarjan जहां दस दिनों तक अखंड भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ और सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं. गृहस्थ लोग भी बप्पा की कृपा पाने के लिए अपने घर में गणेश जी को स्थापित करते हैं. गणेश चतुर्थी Ganesh Visarjan के दिन बप्पा को घर लाकर विधिवत पूजा करने के साथ उसी दिन या फिर डेढ़, तीन, पांच, सात दिन में, या फिर अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा को जल में विसर्जित करते हैं. Ganesh Visarjan विसर्जन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है. यदि आप भी घर पर गणपति बप्पा को लेकर आए हैं, तो द्रिक पंचांग और हिंदू पंचांग के अनुसार जान लें कि Ganesh Visarjan गणपति बप्पा को किस तिथि और किस समय विदा करना सबसे शुभ है. अनंत चतुर्दशी 2025 की तिथि और विसर्जन मुहूर्त: Anant Chaturdashi 2025 date and immersion time अनंत चतुर्दशी, जो गणेश उत्सव का अंतिम दिन होता है, 6 सितंबर 2025, शनिवार को मनाई जाएगी. • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ: 6 सितंबर 2025 को 03:12 ए एम बजे • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि समाप्त: 7 सितंबर 2025 को 01:41 ए एम बजे • उदया तिथि के हिसाब से अनंत चतुर्दशी: 6 सितंबर 2025 को अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन के शुभ मुहूर्त (6 सितंबर 2025, शनिवार) • प्रातः मुहूर्त (शुभ): 07:36 ए एम से 09:10 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:19 पी एम से 05:02 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 06:37 पी एम से 08:02 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 7 सितंबर को 09:28 पी एम से 01:45 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 7 सितंबर को 04:36 ए एम से 06:02 ए एम तक Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा अनंत चतुर्दशी से पहले गणेश विसर्जन के अन्य शुभ मुहूर्त:Other auspicious times for Ganesh immersion before Anant Chaturdashi Ganesh Visarjan अगर आप पूरे दस दिनों तक बप्पा को नहीं रख सकते हैं, तो हिंदू पंचांग के अनुसार Ganesh Visarjan गणेश चतुर्थी के दिन, डेढ़ दिन बाद, तीसरे दिन, पांचवें दिन या सातवें दिन भी बप्पा का विसर्जन किया जा सकता है. इन दिनों पर विसर्जन के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: 1. गणेश चतुर्थी पर गणेश विसर्जन (27 अगस्त 2025, बुधवार): • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ): 03:35 पी एम से 06:48 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 28 अगस्त को 08:12 पी एम से 12:23 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 28 अगस्त को 03:10 ए एम से 04:33 ए एम तक 2. एक और आधा दिन (डेढ़ दिन) के बाद गणेश विसर्जन (28 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार) • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:22 पी एम से 03:35 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 05:11 पी एम से 06:47 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (अमृत, चर): 06:47 पी एम से 09:35 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 29 अगस्त को 12:22 ए एम से 01:46 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ, अमृत): 29 अगस्त को 03:10 ए एम से 05:58 ए एम तक 3. तीसरे दिन गणेश विसर्जन (29 अगस्त 2025, शुक्रवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 05:58 ए एम से 10:46 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर): 05:10 पी एम से 06:46 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 12:22 पी एम से 01:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 09:34 पी एम से 10:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 30 अगस्त को 12:22 ए एम से 04:34 ए एम तक 4. पांचवें दिन गणेश विसर्जन (31 अगस्त 2025, रविवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 07:34 ए एम से 12:21 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 01:57 पी एम से 03:32 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 06:44 पी एम से 10:57 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 1 सितंबर को 01:46 ए एम से 03:10 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ): 1 सितंबर को 04:35 ए एम से 05:59 ए एम तक 5. सातवें दिन गणेश विसर्जन (2 सितंबर 2025): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 09:10 ए एम से 01:56 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 03:31 पी एम से 05:06 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 08:06 पी एम से 09:31 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 3 सितंबर को 10:56 पी एम से 03:10 ए एम तक निष्कर्ष गणेश विसर्जन Ganesh Visarjan का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में हर चीज़ का एक अंत होता है, Ganesh Visarjan और यह चक्र चलता रहता है. बप्पा को विधिवत विदा करने से वे अगले साल वापस आने का न्यौता स्वीकार करते हैं और आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. अस्वीकरण: यह लेख विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं. हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है. इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं. इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

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Parivartini ekadashi

Parivartini ekadashi 2025:परिवर्तिनी एकादशी पर जरूर करें इन चीजों का दान, सभी संकट होंगे दूर

Parivartini ekadashi: हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर व्रत किया जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि पर परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi 2025) व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है। Parivartini ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। उपासक पर उनकी कृपा बनी रहती है। प्रत्येक मास में दो एकादशी व्रत आते हैं। हर मास की एकादशियों का खास महत्व माना जाता है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के लिये सो जाते हैं। इसलिये इन चार महीनों को चतुर्मास कहा जाता है और धार्मिक कार्यों, ध्यान, भक्ति आदि के लिये यह समय श्रेष्ठ माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आषाढ़, श्रावण, भादों, आश्विन ये चारों मास धार्मिक रूप से चतुर्मास और चौमासा के रूप में जाने जाते हैं और ऋतुओं में यह काल वर्षा ऋतु का। भगवान विष्णु चार महीनों तक सोते रहते हैं और देवोठनी एकादशी को ही जागृत होते हैं, लेकिन इन महीनों में एक समय ऐसा भी आता है कि सोते हुए भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं। यह समय होता है भादों मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का। इसलिये इसे परिवर्तिनी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है। आइये जानते हैं भादों मास की शुक्ल एकादशी यानि परिवर्तिनी एकादशी के बारे में – परिवर्तिनी एकादशी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Parivartini ekadashi 2025 Muhurat) इस साल 2025 पार्श्व एकादशी बुधवार, 3 सितम्बर 2025 को है। 4 सितम्बर को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय: दोपहर 01:36 से शाम 04:08 बजे तक। पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय: सुबह 10:18 बजे। एकादशी तिथि प्रारम्भ: 3 सितम्बर 2025 को सुबह 03:53 बजे से। एकादशी तिथि समाप्त: 4 सितम्बर 2025 को सुबह 04:21 बजे तक। परिवर्तिनी एकादशी व्रत एवं पूजा विधि? (Parivartini Ekadashi Vrat aur pooja vidhi) स्नान और संकल्प: इस दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा का संकल्प लेते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें। भगवान विष्णु की पूजा: भगवान विष्णु के वामन अवतार की मूर्ति या तस्वीर को एक साफ स्थान पर स्थापित करें। व्रत का पालन: इस दिन निर्जल या फलाहार व्रत करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। रामायण और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ: दिनभर विष्णु सहस्त्रनाम और रामायण का पाठ करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी पूजा सामग्री (Parivartini Ekadashi Pooja Samagri) इस एकादशी पर व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह व्रत पापों का नाश करता है और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत से मानसिक शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सभी दुखों का अंत होता है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्व (Parivartini Ekadashi Mahatav) परिवर्तिनी एकादशी Parivartini ekadashi को पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, जयझूलनी, डोल ग्यारस, जयंती एकादशी आदि कई नामों से जाना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्य फल उपासक को मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की आराधना की जाती है। जो साधक अपने पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान में जाने-अंजाने किये गये पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं और मोक्ष की कामना रखते हैं उनके लिये यह एकादशी मोक्ष देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा (Parivartini Ekadashi Vrat Katha) परिवर्तनी एकादशी की कथा भगवान विष्णु के वामना अवतार से जुड़ी हुई है। अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली थी। राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था उसे दान अवश्य देता था। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की चाल से अवगत भी करवाया लेकिन बावजूद उसके बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया। फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने अपना वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया। भगवान विष्णु की कृपा से बलि रसातल में पाताल लोक में रहने लगा लेकिन साथ ही उसने भगवान विष्णु को भी अपने यहां रहने के लिये वचनबद्ध कर लिया था। परिवर्तिनी एकादशी पर इन करें चीजों का दान (Parivartini Ekadashi Daan List) परिवर्तिनी एकादशी की पूजा के बाद दान करना शुभ माना जाता है। इस दिन सच्चे मन से अन्न, मिठाई, फल और धन का दान करें। मान्यता है कि इन चीजों का दान करने से पैसों की कमी का सामना नहीं करना पड़ता है। इसके अलावा जीवन के दुख और संकट को दूर करने के लिए परिवर्तिनी एकादशी पर दूध और दही का दान करें। माना जाता है कि ऐसा करने से सभी तरह की परेशानियों का अंत होता है।   अगर आप गृह क्लेश और रोग का सामना कर रहे है, तो ऐसे में परिवर्तिनी एकादशी व्रत करें और जल का दान करें। इससे कुंडली में पितृ और चंद्र दोष का प्रभाव कम होता है। इसके अलावा आर्थिक तंगी दूर होती है। परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीले रंग के वस्त्र का दान करना शुभ माना जाता है, क्योंकि विष्णु जी को पीला रंग प्रिय है। ऐसा करने से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं।

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Parivartini Ekadashi 2025: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Parivartini Ekadashi 2025: सितंबर माह में आने वाली पहली एकादशी परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) के नाम से जानी जाती है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत शुभ और लाभकारी महत्व बताया गया है, और यह व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में करवट लेते हैं, जिससे इस एकादशी का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। यह व्रत करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। आइए जानते हैं परिवर्तिनी एकादशी 2025 की सही तारीख, इसका महत्व, पूजा विधि और व्रत पारण का समय। Parsva Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और….. Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025 कब है? वैदिक पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी की तिथि इस प्रकार है: • एकादशी तिथि का आरंभ: 3 सितंबर 2025, बुधवार को सुबह 03 बजकर 53 मिनट से होगा। • एकादशी तिथि का समापन: अगले दिन 4 सितंबर 2025, गुरुवार को सुबह 04 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। • व्रत का दिन: ऐसे में, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 3 सितंबर 2025, बुधवार को रखा जाएगा। यह सितंबर 2025 महीने का पहला एकादशी व्रत होगा। नोट: एकादशी व्रत 2025 की एक सामान्य सूची में परिवर्तिनी एकादशी की तारीख 14 सितंबर 2025 भी दी गई है। हालांकि, नवभारत टाइम्स और लाइव हिंदुस्तान जैसे प्रमुख स्रोतों ने 3 और 4 सितंबर 2025 को परिवर्तिनी एकादशी के रूप में विशेष रूप से विस्तृत जानकारी दी है। इसलिए, अधिक विशिष्ट जानकारी के आधार पर, 3 सितंबर को व्रत रखा जाएगा। Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी का महत्व परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi को पद्म एकादशी, पार्श्व एकादशी और जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान योग निद्रा में वास कर रहे भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं। यही वजह है कि इस दिन को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी पर व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे सभी सुखों की प्राप्ति होती है। अंत में, व्यक्ति वैकुंठ लोक को प्राप्त होता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में धन, धान्य, सुख और समृद्धि आती है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 पूजा विधि परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi का व्रत विधि-विधान से करने पर शुभ फल प्राप्त होते हैं। यहाँ पूजा विधि के चरण दिए गए हैं: 1. सुबह उठें और संकल्प लें: परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्नान के बाद पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। 2. मंदिर की सफाई और पंचामृत स्नान: इसके बाद भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को प्रणाम करें। पूजा के लिए मंदिर की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें और सबसे पहले भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण) से स्नान कराएं। 3. सामग्री अर्पित करें: स्नान के बाद भगवान विष्णु को पीले फूल, अक्षत (साबुत चावल), सुपारी और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। 4. मंत्र जप: इस दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का लगातार जप करते रहें। 5. व्रत कथा और आरती: इसके बाद परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। 6. व्रत पारण: एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में किया जाता है। शुभ योग और पूजन मुहूर्त परिवर्तिनी एकादशी 2025 पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जिनमें किए गए कार्य शुभ फलदायी होते हैं: • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 30 मिनट से सुबह 05 बजकर 15 मिनट तक। • रवि योग: सुबह 06 बजे से रात 11 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। • अन्य शुभ योग: इस दिन आयुष्मान योग और सौभाग्य योग का भी शुभ संयोग बन रहा है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 व्रत पारण का समय व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना चाहिए। परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण 4 सितंबर 2025, गुरुवार को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 36 मिनट से शाम 04 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। पारण करने से पहले ब्राह्मणों को भोजन करवाने या अन्न का दान करने का विधान है। एकादशी व्रत के सामान्य नियम एकादशी व्रत के कुछ सामान्य नियम भी हैं जिनका पालन करना महत्वपूर्ण है: • चावल वर्जित: एकादशी के दिन चावल और चावल से बनी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है। • सात्विक भोजन: मांस-मदिरा, लहसुन, प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। • संयम: इस दिन स्त्री-पुरुष को संयम भाव से रहना चाहिए और मन तथा वाणी से किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं रखना चाहिए। • रात्रि जागरण: एकादशी व्रत रखने वाले व्यक्ति के लिए रात्रि में जागरण करके भगवान का ध्यान और भजन करने का भी विधान है। • दान-पुण्य: एकादशी के दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। यह व्रत श्रद्धा और भक्तिभाव से करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

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