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Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की कैसे करें पूजा, पढ़ें मंत्र, विधि और प्रसाद

Devi Brahmacharini Puja Vidhi: देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार , संयम की वृद्धि होती है। जीवन की कठिन समय मे भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता है। देवी अपने साधकों की मलिनता, दुर्गणों व दोषों को खत्म करती है। देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि तथा विजय की प्राप्ति होती है।  Maa Brahmacharini: मां ब्रह्मचारिणी  दूसरे नवरात्र में मां के Devi Brahmacharini ब्रह्मचारिणी एवं तपश्चारिणी रूप को पूजा जाता है। जो साधक मां के इस रूप की पूजा करते हैं उन्हें तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है और जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं उसे पूरा करके ही रहते हैं।  क्या चढ़ाएं प्रसाद  मां भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए मां को शक्कर का भोग प्रिय है। ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। Devi Brahmacharini देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ज्योर्तिमय है। ये मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरी शक्ति हैं। तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इनके अन्य नाम हैं। इनकी पूजा करने से सभी काम पूरे होते हैं, Devi Brahmacharini Puja Vidhi रुकावटें दूर हो जाती हैं और विजय की प्राप्ति होती है। इसके अलावा हर तरह की परेशानियां भी खत्म होती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। Devi Brahmacharini Puja Vidh: ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा विधि देवी ब्रह्मचारिणी Devi Brahmacharini की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर Brahmacharini Puja Vidhi उनका ध्यान करें और  प्रार्थना करते हुए नीचे लिखा मंत्र बोलें। श्लोक दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु| देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा || ध्यान मंत्र वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्। जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥ गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥ परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल,अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें।  देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं।  इसके अलावा कमल का फूल भी देवी मां को चढ़ाएं और इन मंत्रों से प्रार्थना करें। 1. या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। 2. दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। इसके बाद देवी मां को प्रसाद चढ़ाएं और आचमन करवाएं। प्रसाद के बाद पान सुपारी भेंट करें और प्रदक्षिणा करें यानी 3 बार अपनी ही जगह खड़े होकर  घूमें। प्रदक्षिणा के बाद घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। इन सबके बाद क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद बांट दें। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ : हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं।

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Vishwakarma Puja

Vishwakarma Puja 2025 Date And Time: विश्वकर्मा पूजा तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि – जानें सब कुछ

Vishwakarma Puja:हर साल भाद्रपद मास में सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने पर विश्वकर्मा पूजा (Vishwakarma Puja 2025) मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो औजारों, मशीनों, कारखानों और वाहनों से जुड़ा काम करते हैं। इस दिन भगवान विश्वकर्मा, जो दुनिया के पहले इंजीनियर और वास्तुकार माने जाते हैं, की विशेष पूजा की जाती है। आइए जानते हैं विश्वकर्मा पूजा 2025 की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, इसका महत्व और पूजा की विधि के बारे में। विश्वकर्मा पूजा 2025 कब है? (Vishwakarma Puja 2025 Date) हर साल की तरह, इस बार भी विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। यह तिथि तब निर्धारित होती है जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। सूर्य देव 16 सितंबर, मंगलवार की रात 1 बजकर 47 मिनट पर या 17 सितंबर की देर रात 1 बजकर 54 मिनट पर सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करेंगे। सनातन धर्म में उदया तिथि का विशेष महत्व होने के कारण, विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को ही मनाई जाएगी। विश्वकर्मा पूजा 2025 का शुभ मुहूर्त (Vishwakarma Puja 2025 Shubh Muhurat) विश्वकर्मा पूजा के लिए कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं, जिनमें आप अपनी सुविधा के अनुसार पूजा कर सकते हैं: • सबसे उत्तम समय (नवभारत टाइम्स के अनुसार): सुबह 10 बजकर 43 मिनट से शुरू होकर दोपहर के 12 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। • पुण्य काल (जागरण के अनुसार): सुबह 05 बजकर 36 मिनट से लेकर दिन में 11 बजकर 44 मिनट तक है। इस दौरान स्नान-ध्यान और दान-पुण्य किया जा सकता है। • महा पुण्य काल (जागरण के अनुसार): सुबह 05 बजकर 36 मिनट से सुबह 07 बजकर 39 मिनट तक है। यह महा पुण्य काल 2 घंटे 3 मिनट का होगा। • एकादशी तिथि: आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 17 सितंबर को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर शुरू होगी और इसी दिन देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर समाप्त होगी। साधक अपनी सुविधा अनुसार इस दौरान स्नान-ध्यान कर विश्वकर्मा जी की पूजा कर सकते हैं। विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Importance of Vishwakarma Puja) हिंदू धर्म में विश्वकर्मा पूजा Vishwakarma Puja का बेहद विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला इंजीनियर और वास्तुकार कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने ही इंद्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्ग लोक और लंका जैसे स्थानों का निर्माण किया था। इतना ही नहीं, भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र भी तैयार किया था। माना जाता है कि जिन घरों, कारखानों, फैक्ट्री आदि में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है, वहां सदैव माता लक्ष्मी का वास बना रहता है और कारोबार में मुनाफा होता है। जो लोग लैपटॉप या मोबाइल से काम करते हैं, उन्हें भी यह पूजा जरूर करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से काम में तरक्की होती है। इस पूजा से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है और विश्वकर्मा जी की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। विश्वकर्मा पूजा की विधि (Vishwakarma Puja Vidhi) विश्वकर्मा पूजा के दिन विधि-विधान से पूजा करने का खास महत्व है। यहाँ पूजा की सरल विधि दी गई है: 1. स्वच्छता: सुबह उठकर अपनी मशीनों, औजारों और वाहनों को अच्छी तरह साफ कर लें। 2. मशीनों को बंद करें: इसके बाद, सभी मशीनों को बंद कर दें। 3. भगवान की स्थापना: भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या मूर्ति को अपनी मशीन या कार्यस्थल के पास स्थापित करें। 4. संयुक्त पूजा: भगवान विश्वकर्मा और अपनी मशीनों/औजारों की एक साथ विधि-विधान से पूजा करें। 5. वाहन पूजा: अपने वाहनों की पूजा भी अवश्य करें। 6. भोग लगाएं: भगवान विश्वकर्मा को मिष्ठान का भोग और प्रसाद जरूर चढ़ाएं। 7. दान-पुण्य: इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को आवश्यकतानुसार सामान दान करना बहुत शुभ माना जाता है। 8. घरेलू मशीनें: अपने घर की छोटी-छोटी मशीनों की भी पूजा करने का महत्व होता है। शुभ योग (Shubh Yog on Vishwakarma Puja 2025) विश्वकर्मा पूजा के दिन कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इस दिन शिव और परिघ योग के साथ-साथ शिववास योग का भी निर्माण होगा। इन शुभ योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। विश्वकर्मा पूजा बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में धूमधाम से मनाई जाती है। इस पावन अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की कृपा से आपके जीवन में सुख, समृद्धि और उन्नति आए।

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Navratri 2025 2nd Day Maa Brahmacharini Puja : नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी पूजा, जाने पूजा विध, महत्व, मंत्र, भोग और पीले रंग का क्या है महत्व

Navratri 2025 2nd Day Maa Brahmacharini :नवरात्रि का दूसरा दिन है और इस दिन मां भगवती के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तपस्या की थी, उसी तप के कारण माता को ब्रह्मचारिणी कहा गया। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन की पूजा विधि, मंत्र, भोग, महत्व, आरती के बारे में… नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के ‘देवी ब्रह्मचारिणी‘ स्वरूप की पूजा करने का विधान है। माता के नाम से उनकी शक्तियों के बारे में जानकारी मिलती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली ब्रह्मचारिणी को हमन बार बार नमन करते हैं। माता ब्रह्मचारिणी की पूजा अराधना करने से आत्मविश्वास, आयु, आरोग्य, सौभाग्य, अभय आदि की प्राप्ति होती है। माता ब्रह्मचारिणी को ब्राह्मी भी कहा जाता है। मां भगवती की इस शक्ति की पूजा अर्चना कने से मनुष्य कभी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता और सही मार्ग पर चलता है। आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, मंत्र, आरती और स्वरूप के बारे में… This is how the mother was named Brahmacharini:ऐसे पड़ा माता का नाम ब्रह्मचारिणी शास्त्रों में बताया गया है कि मां दुर्गा ने पार्वती के रूप में पर्वतराज के यहां पुत्री बनकर जन्म लिया और महर्षि नारद के कहने पर अपने जीवन में भगवान महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। हजारों वर्षों तक अपनी कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम तपश्चारिणी या Maa Brahmacharini ब्रह्मचारिणी पड़ा। अपनी इस तपस्या की अवधि में इन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर और अत्यन्त कठिन तप से महादेव को प्रसन्न कर लिया। उनके इसी तप के प्रतीक के रूप में नवरात्र के दूसरे दिन इनके इसी रूप की पूजा और स्तवन किया जाता है। ऐसा है माता ब्रह्मचारिणी का स्वरूप:Such is the form of Mata Brahmacharini दधाना कपाभ्यामक्षमालाकमण्डलू।देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।नवदुर्गाओं में दूसरी दुर्गा का नाम ब्रह्मचारिणी है। इनकी पूजा नवरात्र के दूसरे दिन की जाती है। Maa Brahmacharini ब्रह्मचारिणी इस लोक के समस्त चर और अचर जगत की विद्याओं की ज्ञाता हैं। इनका स्वरूप श्वेत वस्त्र में लिप्टी हुई कन्या के रूप में है, जिनके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रह्मचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को यह अपनी सर्वज्ञ संपन्न विद्या देकर विजयी बनाती है। ब्रह्मचारिणी का स्वरूप बहुत ही सादा और भव्य है। अन्य देवियों की तुलना में वह अतिसौम्य, क्रोध रहित और तुरंत वरदान देने वाली देवी है। माता ब्रह्मचारिणी का भोग:Mata Brahmacharini’s offering नवरात्र के इस दूसरे दिन मां भगवती को चीनी का भोग लगाने का विधान है। ऐसा विश्वास है कि चीनी के भोग से उपासक को लंबी आयु प्राप्त होती है और वह नीरोगी रहता है तथा उसमें अच्छे विचारों का आगमन होता है। साथ ही माता पार्वती के कठिन तप को मन में रखते हुए संघर्ष करने की प्रेरणा प्राप्त होती है। नवरात्रि के दूसरे दिन पीले रंग का महत्व:Importance of yellow color on the second day of Navratri नवरात्रि के दूसरे दिन पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा अर्चना करनी चाहिए क्योंकि माता Mata Brahmacharini ब्रह्मचारिणी को पीला रंग बहुत प्रिय है। साथ ही माता को पीले रंग के वस्त्र, पीले रंग के फूल, फल आदि अवश्य अर्पित करना चाहिए। भारतीय दर्शन में पीला रंग पालन-पोषण करने वाले स्वभाव को दर्शाता है और यह रंग सीखने, उत्साह, बुद्धि और ज्ञान का संकेत है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा निम्न मंत्र के माध्यम से की जाती है- दधाना करपद्माभ्याम्, अक्षमालाकमण्डलू।देवी प्रसीदतु मयि, ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। अर्थात् जिनके एक हाथ में अक्षमाला है और दूसरे हाथ में कमण्डल है, ऐसी उत्तम ब्रह्मचारिणी रूपा मां दुर्गा मुझ पर कृपा करें। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम: दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।। माता ब्रह्मचारिणी पूजा विधि:Mata Brahmacharini puja method माता ब्रह्मचारिणी की पूजा पहले दिन की तरह ही शास्त्रीय विधि से की जाती है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत होकर पूजा स्थल पर गंगाजल से छिड़काव करें और पूरे परिवार के साथ मां दुर्गा की उपासना करें। Maa Brahmacharini माता ब्रह्मचारिणी की पूजा में पीले रंग के वस्त्र का प्रयोग करें और पीले रंग की चीजें ही अर्पित करें। माता का पंचामृत से स्नान कराने के बाद रोली, कुमकुम अर्पित करें। इसके बाद अग्यारी करें और अग्यारी पर लौंग, बताशे, हवन सामग्री आदि चीजें अर्पित करें, जैसा आपके घर पर होता हो। मां ब्रह्मचारिणी Maa Brahmacharini की पूजा में पीले रंग के फल, फूल आदि का प्रयोग करें। माता को दूध से बनी चीजें या चीनी का ही भोग लगाएं। इसके साथ ही मन ही मन माता के ध्यान मंत्र का जप करें और बीच बीच में पूरे परिवार के साथ माता के जयकारे लगाते रहें। इसके बाद पान-सुपारी भेंट करने के बाद प्रदक्षिणा करें। फिर कलश देवता और नवग्रह की पूजा करें। इसके बाद घी के दीपक व कपूर से माता की आरती करें। फिर दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती आदि का पाठ करें। पूजा पाठ करने के बाद फिर माता के जयकारे लगाएं। साथ ही शाम के समय भी माता की आरती करें। माता ब्रह्मचारिणी की आरती:Aarti of Mata Brahmacharini जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।जय चतुरानन प्रिय सुख दाता। ब्रह्मा जी के मन भाती हो।ज्ञान सभी को सिखलाती हो।ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।जिसको जपे सकल संसारा। जय गायत्री वेद की माता।जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता। कमी कोई रहने न पाए।कोई भी दुख सहने न पाए। उसकी विरति रहे ठिकाने।जो तेरी महिमा को जाने। रुद्राक्ष की माला ले कर।जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर। आलस छोड़ करे गुणगाना।मां तुम उसको सुख पहुंचाना। ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।पूर्ण करो सब मेरे काम। भक्त तेरे चरणों का पुजारी।रखना लाज मेरी महतारी।बोल सांचे दरबार की जय, जय माता दी।

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Lalita Panchami 2025 Date And Time: ललिता पंचमी 2025: तिथि,महत्व और उपांग ललिता व्रत की संपूर्ण जानकारी

Lalita Panchami: हिंदू धर्म में, ललिता पंचमी का त्योहार देवी ललिता को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस विशेष दिन को ‘उपांग ललिता व्रत’ के नाम से भी जाना जाता है, जिसे भक्तजन अपनी देवी के सम्मान में रखते हैं। यह पर्व विशेष रूप से गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों में अत्यधिक लोकप्रिय है। आइए, 2025 में Lalita Panchami ललिता पंचमी कब है, इसका क्या महत्व है और इसे कैसे मनाया जाता है, इसकी विस्तृत जानकारी प्राप्त करते हैं। Lalita Panchami 2025 kab Hai: ललिता पंचमी 2025 कब है? साल 2025 में Lalita Panchami ललिता पंचमी शुक्रवार, 26 सितंबर को मनाई जाएगी। यह दिन शारदीय नवरात्रि के पांचवें दिन पड़ता है, जब देवी दुर्गा के पांचवें स्वरूप देवी स्कंदमाता की भी पूजा की जाती है। महत्वपूर्ण तिथियां और मुहूर्त:Important dates and auspicious times: • ललिता पंचमी 2025: 26 सितंबर, शुक्रवार • पंचमी तिथि प्रारंभ: 26 सितंबर, सुबह 09:33 बजे • पंचमी तिथि समाप्त: 27 सितंबर, दोपहर 12:04 बजे • सूर्योदय (उज्जैन के अनुसार): 26 सितंबर, सुबह 06:20 बजे • सूर्यास्त (उज्जैन के अनुसार): 26 सितंबर, शाम 06:15 बजे Who is Goddess Lalita: कौन हैं देवी ललिता? देवी ललिता Lalita Panchami को दस महाविद्याओं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण देवी माना जाता है। उन्हें ‘षोडशी’ और ‘त्रिपुर सुंदरी’ के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी ललिता को देवी दुर्गा या शक्ति का अवतार माना जाता है। उन्हें ‘पंच महाभूतों’ (पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश) से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक कथाएं: • एक मान्यता के अनुसार, देवी ललिता का प्राकट्य ‘भंडा’ नामक राक्षस का वध करने के लिए हुआ था, जो कामदेव की राख से उत्पन्न हुआ था। इसलिए ललिता पंचमी को देवी ललिता की ‘जयंती’ या प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। • एक अन्य कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी द्वारा छोड़े गए चक्र से पाताल लोक समाप्त होने लगा और संपूर्ण पृथ्वी धीरे-धीरे जलमग्न होने लगी, तब सभी ऋषि-मुनियों ने माता ललिता देवी की उपासना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं और इस विनाशकारी चक्र को थाम लिया, जिससे सृष्टि को नवजीवन मिला। • पुराणों में यह भी वर्णित है कि जब सती अपने पिता दक्ष द्वारा अपमानित होकर अपने प्राण त्याग देती हैं, तो भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाकर चारों दिशाओं में घूमने लगते हैं। इस महाविपत्ति को देखकर भगवान विष्णु अपने चक्र से सती की देह को विभाजित कर देते हैं। तत्पश्चात भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर इन्हें ललिता के नाम से पुकारा जाने लगा। • कालिका पुराण जैसे विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों में देवी ललिता के महत्व का वर्णन मिलता है। देवी ललिता गौर वर्ण की हैं, दो भुजाएं धारण करती हैं, और लाल कमल पर विराजमान हैं। ललिता पंचमी का महत्व और उपांग ललिता व्रत के लाभ:Importance of Lalita Panchami and benefits of Upang Lalita Vrat ललिता पंचमी Lalita Panchami का व्रत ‘उपांग ललिता व्रत’ के नाम से जाना जाता है और इसे अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन देवी की पूजा और व्रत करने से भक्तों को immense शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त होता है। यह व्रत रखने के कई लाभ बताए गए हैं: • सुख, ज्ञान और धन की प्राप्ति: माना जाता है कि देवी की पूजा और व्रत से जीवन में सुख, ज्ञान और धन की वृद्धि होती है। • समस्त कष्टों का निवारण: देवी ललिता के दर्शन मात्र से या उनकी पूजा से जीवन के सभी व्यक्तिगत और व्यावसायिक कष्ट तुरंत दूर हो जाते हैं। • शक्ति और सामर्थ्य: यह व्रत भक्तों को अपार शक्ति और ऊर्जा प्रदान करता है। • संतोष और खुशी: देवी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को संतोष और खुशी का आशीर्वाद देती हैं। • समृद्धि: देवी ललिता की पूजा से समृद्धि की प्राप्ति होती है। उपांग ललिता व्रत और पूजा विधि:Upang Lalita fast and worship method ललिता पंचमी के दिन भक्त पूरी श्रद्धा के साथ देवी ललिता का व्रत रखते हैं और पवित्र अनुष्ठान करते हैं। पूजा के प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं:The major rituals of puja are as follows: 1. व्रत और उपवास: भक्तजन इस दिन कठोर व्रत और उपवास का पालन करते हैं। 2. देवी ललिता के साथ अन्य देवताओं की पूजा: देवी ललिता के साथ-साथ भगवान शिव और स्कंदमाता की भी शास्त्रानुसार पूजा की जाती है। 3. विशेष पूजा और मंत्र पाठ: देवी के सम्मान में विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाते हैं। देवी ललिता को समर्पित वैदिक मंत्रों का पाठ या जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 4. सामुदायिक पूजा और मेले: कुछ स्थानों पर सामुदायिक पूजाएं आयोजित की जाती हैं, जहाँ सभी महिलाएं एक साथ प्रार्थना करती हैं। कई जगहों पर भव्य मेलों का आयोजन भी किया जाता है, जहाँ हजारों श्रद्धालु बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ भाग लेते हैं। 5. ललिता सहस्रनाम और ललिता त्रिशती का पाठ: गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, देवी ललिता की पूजा देवी चंडी के समान ही ‘ललिता सहस्रनाम’, ‘ललितोपाख्यान’ और ‘ललिता त्रिशती’ जैसे पूजा अनुष्ठानों के साथ की जाती है। 6. षोडषोपचार विधि: भक्तगण इस दिन षोडषोपचार विधि से मां ललिता का पूजन करते हैं। देशभर में ललिता पंचमी का उत्सव:Celebration of Lalita Panchami across the country ललिता पंचमी का त्योहार पूरे भारतवर्ष में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र में इसकी लोकप्रियता विशेष रूप से अधिक है। इस दिन देवी ललिता के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो दूर-दूर से पूजा अनुष्ठानों में भाग लेने आते हैं। निष्कर्ष ललिता पंचमी 2025, एक बार फिर देवी ललिता की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने का एक शुभ अवसर लेकर आएगी। यह दिन न केवल आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामुदायिक सद्भाव और सांस्कृतिक उत्सवों का भी प्रतीक है। सच्चे मन और श्रद्धा से देवी की आराधना करने से जीवन में सुख, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है।

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Durga Panchami

Durga Panchami 2025 Start Date: दुर्गा पूजा 2025: कब से शुरू होगी यह महापर्व, जानें शुभ तिथियां और महत्व !

Durga Panchami: हिंदू धर्म में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। यह एक प्रमुख त्योहार है जो शारदीय नवरात्रि के दौरान मनाया जाता है और दुर्गोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। विशेष रूप से पूर्वी भारत, जैसे बंगाल, ओडिशा, असम, त्रिपुरा, बिहार और झारखंड में इसे बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। साल 2025 में दुर्गा पूजा कब से शुरू होगी, विसर्जन कब होगा, और इसके प्रमुख अनुष्ठान क्या हैं, आइए जानते हैं इस विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में। Durga Puja 2025 Start date shubh muhurat : दुर्गा पूजा 2025 का शुभारंभ और समापन साल 2025 में दुर्गा पूजा का पर्व 27 सितंबर, शनिवार को पंचमी तिथि से शुरू होगा और 2 अक्टूबर, गुरुवार को विजयादशमी के साथ समाप्त होगा। यह छह दिवसीय उत्सव होगा, जिसमें देवी दुर्गा की आराधना और सांस्कृतिक उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। Importance of Shardiya Navratri 2025 and Mahalaya:शारदीय नवरात्रि 2025 और महालया का महत्व दुर्गा पूजा का आरंभ महालया के साथ होता है, जो पितृ पक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है। 2025 में, महालया 21 सितंबर को मनाया जाएगा। इस दिन चंडी पाठ और भक्ति गीतों के साथ वातावरण में एक दिव्य उत्साह भर जाता है। शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर 2025, सोमवार से शुरू होकर 1 अक्टूबर 2025, बुधवार तक चलेगी। इस वर्ष नवरात्रि 10 दिनों की होगी क्योंकि तृतीया तिथि दो दिन रहेगी। Important dates and rituals of Durga Puja 2025: दुर्गा पूजा 2025 की महत्वपूर्ण तिथियां और अनुष्ठान आइए जानते हैं दुर्गा पूजा 2025 के प्रत्येक महत्वपूर्ण दिन की तिथि और उसके विशेष अनुष्ठान: पंचमी (27 सितंबर 2025, शनिवार): बिल्व निमंत्रण दुर्गा पूजा की शुरुआत बिल्व निमंत्रण के साथ होती है। इस दिन देवी दुर्गा को अनुष्ठानों के साथ पृथ्वी पर आमंत्रित किया जाता है। षष्ठी (28 सितंबर 2025, रविवार): कल्पारंभ और अकाल बोधन षष्ठी तिथि के दिन दुर्गा पूजा का विधिवत आरंभ होता है। Durga Panchami इस दिन मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना की जाती है। कल्पारंभ अनुष्ठान के बाद अकाल बोधन होता है, जो देवी के आह्वान का प्रतीक है। इस दिन बिल्व निमंत्रण और पंडाल सजाने की परंपरा भी निभाई जाती है। मूर्ति स्थापना के लिए सुबह 06:08 बजे से 10:30 बजे तक का समय उत्तम मुहूर्त रहेगा। सप्तमी (29 सितंबर 2025, सोमवार): कोलाबौ पूजा इस दिन दुर्गा सप्तमी मनाई जाती है। कोलाबौ पूजा एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें एक छोटे केले के पौधे को साड़ी पहनाकर भगवान गणेश की पत्नी के रूप में पूजा जाता है। इसे दुर्गा पूजा का सबसे पवित्र भाग माना जाता है। अष्टमी (30 सितंबर 2025, मंगलवार): महा अष्टमी, कुमारी पूजा और संधि पूजा महा अष्टमी दुर्गा पूजा का सबसे शुभ दिन माना जाता है। इस दिन भक्त कुमारी पूजा करते हैं, जिसमें युवा लड़कियों को देवी के अवतार के रूप में पूजा जाता है। Durga Panchami अष्टमी और नवमी के संधिकाल में (रात्रि 07:36 से 08:24 बजे तक) संधि पूजा की जाती है। यह समय मां दुर्गा के चामुंडा रूप की आराधना के लिए अत्यंत विशेष होता है, जिसमें 108 दीपों और 108 कमल पुष्पों से मां की पूजा की जाती है। नवमी (1 अक्टूबर 2025, बुधवार): महा नवमी और नवमी होम महा नवमी के दिन, महिषासुर पर दुर्गा के युद्ध के अंतिम दिन का स्मरण किया जाता है। इस दिन नवमी होम (पवित्र अग्नि अनुष्ठान) और दुर्गा बलिदान बड़ी श्रद्धा के साथ किए जाते हैं। दशमी (2 अक्टूबर 2025, गुरुवार): विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन यह दुर्गा पूजा का अंतिम दिन है। Durga Panchami इस दिन सिंदूर उत्सव होता है, जहां विवाहित महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं का नदियों और तालाबों में विसर्जन किया जाता है। यह देवी के अपने स्वर्गीय निवास पर लौटने का प्रतीक है। Durga Panchami:देवी दुर्गा का आगमन और प्रस्थान 2025 Durga Panchami देवी दुर्गा का धरती पर आगमन देवी पक्ष के पहले दिन होता है और दुर्गा विसर्जन के दिन वह प्रस्थान करती हैं। Durga Panchami मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान वाले दिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि यह आने वाले समय का अनुमान लगाने में सहायक होते हैं। आगमन: 2025 में देवी दुर्गा हाथी पर सवार होकर आएंगी, जिसे अत्यधिक शुभ माना जाता है, Durga Panchami क्योंकि यह समृद्धि और अच्छी फसल का प्रतीक है। प्रस्थान: वह “नर” (मनुष्य) पर प्रस्थान करेंगी, जो आगे आने वाले संघर्षों और चुनौतियों का संकेत देता है, लेकिन उन्हें दूर करने के लिए मानवीय शक्ति को भी दर्शाता है। Why is Durga Puja celebrated: दुर्गा पूजा क्यों मनाई जाती है? दुर्गा पूजा देवी दुर्गा की महिषासुर नामक राक्षस राजा पर विजय का उत्सव है। Durga Panchami यह बुराई पर अच्छाई की जीत और स्त्री शक्ति के सर्वोच्च स्वरूप का प्रतीक है। धार्मिक भक्ति से परे, दुर्गा पूजा कला, संस्कृति, सामुदायिक बंधन, भोजन और आनंद का त्योहार भी है। निष्कर्ष दुर्गा पूजा 2025 एक बार फिर पूरे देश में भक्ति, अनुष्ठानों, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक उत्सवों के साथ छह दिनों तक मनाई जाएगी। Durga Panchami महालया से लेकर विजयादशमी तक, प्रत्येक अनुष्ठान का गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जो इस त्योहार को परंपरा और उत्सव का एक अद्भुत मिश्रण बनाता है। जैसे-जैसे गिनती शुरू हो रही है, भारत और दुनिया भर के भक्त खुशी, समृद्धि और शांति के लिए प्रार्थनाओं के साथ मां दुर्गा के आगमन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं

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Ekadashi Vrat Niyam

Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें और क्या नहीं

Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी का व्रत इस साल सितंबर के महीने में पितृ पक्ष के दौरान पड़ रहा है। इंदिरा एकादशी व्रत के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना अति आवश्यक है। जानिए इस दिन क्या करें, क्या नहीं… Indira Ekadashi 2024 : हर साल में इंदिरा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत प्रभु विष्णु जी को समर्पित है। इंदिरा एकादशी का व्रत इस साल आश्विन मास की कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि पर रखा जाएगा। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन विष्णु भगवान के भक्त जन व्रत रख विधि-विधान के साथ पूजा करते हैं। एकादशी का व्रत काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत के कुछ नियम हैं, जिनका पालन करना अति आवश्यक है। आइए जानते हैं इंदिरा एकादशी के दिन किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या करें  Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन शुभ मुहूर्त में विष्णु भगवान की पूजा करें। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन व्रत न रखा हो तो सात्विक भोजन करने की कोशिश करें। व्रत रखने से पूर्व व्रत रखने का संकल्प जरूर लें। व्रत के सभी नियमों का पालन करें। पारण सूर्योदय के पाश्चात्य करना उत्तम रहेगा। इस दिन भजन-कीर्तन भी किया जाता है।  Indira Ekadashi Vrat Niyam: इंदिरा एकादशी के दिन क्या न करें मास-मदिरा- इंदिरा एकादशी के दिन मास-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। Ekadashi Vrat Niyam इस दिन तामसिक भोजन का सेवन करने से भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं। चावल- इंदिरा एकादशी के दिन चावल का सेवन करने की मनाही है। मान्यता है इंदिरा एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से दोष लगता है। तुलसी– तुलसी की पत्तियां विष्णु भगवान को बेहद प्रिय हैं, जिसके बिना भगवान को भोग नहीं लगाया जाता है। इसलिए इंदिरा एकादशी के दिन तुलसी की पत्तियों को न तो स्पर्श करना चाहिए और न ही इन्हें तोड़ना चाहिए। Ekadashi Vrat Niyam मन्यताओं के अनुसार, इस दिन तुलसी जी व्रत रखती हैं। इसलिए इन्हें सर्ष करने से बचना चाहिए।  काले वस्त्र– धर्मिक मान्यताओं के अनुसार, इंदिरा एकादशी के दिन काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा दृष्टि बनाए रखने के लिए इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ रहेगा। Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

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Indira Ekadashi

Indira Ekadashi 2025 Date And Time: कब और क्यों मनाई जाती है इंदिरा एकादशी? यहां जानें धार्मिक महत्व

Indira Ekadashi: हिंदू धर्म में, एकादशी तिथि का विशेष महत्व है, और जब बात पितृपक्ष में आने वाली एकादशी की हो, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। Indira Ekadashi पितृपक्ष में आने वाली इस एकादशी को Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है, जिसे अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत और पुण्य कर्म करने से पितरों को मुक्ति मिलती है। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम इंदिरा एकादशी 2025 की सही तिथि, इसका धार्मिक महत्व और पितरों की शांति व मोक्ष के लिए किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इंदिरा एकादशी 2025 कब है? जानें शुभ मुहूर्त : When is Indira Ekadashi 2025? Know the auspicious time पंचांग के अनुसार, Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी 2025 आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। इस वर्ष, यह शुभ तिथि 17 सितंबर 2025 को पड़ रही है। एकादशी तिथि का आरंभ और समापन इस प्रकार होगा:The beginning and end of Ekadashi Tithi will be as follows एकादशी तिथि का आरंभ: 17 सितंबर 2025 को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर (यानी 16 सितंबर की रात)। कुछ स्रोतों में यह 16 तारीख की रात 12 बजकर 23 मिनट भी दिया गया है। एकादशी तिथि का समापन: 17 सितंबर 2025 को देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर। कुछ स्रोतों में यह 17 तारीख की रात 11 बजकर 40 मिनट भी दिया गया है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी तिथि का व्रत उस दिन किया जाता है, जिस दिन सुबह के समय एकादशी तिथि रहती है। इसलिए, 17 सितंबर को ही इंदिरा एकादशी का व्रत और श्राद्ध किया जाएगा। इस दिन एक विशेष संयोग भी बन रहा है: गौरी योग। चंद्रमा अपनी स्वराशि कर्क में विराजमान रहेंगे, जिससे यह शुभ गौरी योग बनेगा। ऐसे में व्रत और श्राद्ध कर्म करने वालों को विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होगी। ज्योतिषियों का मत है कि इन शुभ योग में पूजा करने से साधक पर लक्ष्मी नारायण जी की कृपा बरसती है और पितरों को नवजीवन प्राप्त होता है। इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व: पितरों को मिलता है मोक्ष:Importance of Indira Ekadashi fast: Ancestors get salvation इंदिरा एकादशी का हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्व बताया गया है, विशेषकर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए। पितरों को मुक्ति और मोक्ष: यह माना जाता है कि इस दिन व्रत करने और पुण्य कार्य करने से पितरों को मुक्ति मिलती है Indira Ekadashi और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इंदिरा एकादशी के दिन पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से तीन पीढ़ी के पूर्वजों का उद्धार होता है। पापों का नाश: इंदिरा एकादशी के दिन व्रत और तर्पण करने से पितरों के पापों का नाश हो जाता है। नरक से मुक्ति: यदि किसी कारण से पितर नरक में पड़े हैं, तो इस व्रत को करने से उन्हें भी मुक्ति मिल जाती है। Indira Ekadashi बुरे कर्म करने वाले पूर्वजों को प्रेतयोनि में लंबे समय तक भटकना पड़ सकता है, और उनके लिए श्राद्ध और पिंडदान अनिवार्य है। वैकुंठ धाम की प्राप्ति: इस व्रत को करने से व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु के शरण में रहने वाले साधकों को सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति: जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं, Indira Ekadashi उन्हें सुख, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। पितरों की शांति के लिए इंदिरा एकादशी पर क्या करें:What to do on Indira Ekadashi for the peace of ancestors Indira Ekadashi: इंदिरा एकादशी पर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं: 1. व्रत और पूजन: इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत अवश्य करें। अगर आप व्रत नहीं रख पा रहे हैं, तब भी भगवान विष्णु की पूजा अवश्य करनी चाहिए। 2. तर्पण और पिंडदान: इंदिरा एकादशी पितृपक्ष में आती है, इसलिए इस दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करना बेहद फलदायी होता है। इससे पितरों की आत्मा तृप्त होती है और उन्हें उच्च गति प्राप्त होती है। 3. काले तिल से तर्पण: यदि आप व्रत नहीं कर रहे हैं, तो भगवान विष्णु की पूजा के साथ काले तिल से तर्पण अवश्य करें। इतना करने से भी आपके पितरों को शांति मिलेगी। 4. दान-पुण्य: इस दिन पितरों के नाम से दान-पुण्य अवश्य करना चाहिए। पितृ पक्ष 2025: एक महत्वपूर्ण संदर्भ:Pitru Paksha 2025: An Important Context Indira Ekadashi: इंदिरा एकादशी पितृ पक्ष के दौरान मनाई जाती है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पितृ पक्ष रहता है। इस दौरान रोजाना पितरों का तर्पण किया जाता है। इस साल पितृ पक्ष 07 सितंबर से लेकर 21 सितंबर तक है। पितरों के तर्पण और पिंडदान की पूरी विधि गरुड़ पुराण में बताई गई है। सर्व पितृ अमावस्या 2025: हर साल आश्विन अमावस्या के दिन सर्व पितृ का तर्पण किया जाता है। इस दिन ही पितर अपने लोक लौट जाते हैं। इस वर्ष 21 सितंबर को सर्व पितृ अमावस्या है।

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Sharadiya Navratri

Sharadiya Navratri 2025 Start Date: कब से शुरू हैं शारदीय नवरात्रि, पहले दिन इन मंत्रों का करें जप, माता शैलपुत्री की बरसेगी कृपा….

Sharadiya Navratri 2025 date and time:इस साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। नवरात्रि में विधिवत 9 दिन की दुर्गा देवी की पूजा करने से सुख, धन व सौभाग्य बढ़ता है। kab se shuru hai Sharadiya Navratri 2025: हर साल पितृपक्ष समाप्त के बाद शारदीय नवरात्रि मनाई जाती है। नवरात्रि 9 दिनों का पावन पर्व है, जो मां दुर्गा देवी को समर्पित है। इस साल आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो रहे हैं। इन नौ रात्रियों एवं दस दिनों में देवी दुर्गा के 9 भिन्न-भिन्न रूपों की विधिवत आराधना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। इस उत्सव के दसवें दिन को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है, जिसे दशहरा कहते हैं। इस साल की शारदीय नवरात्रि का समापन 2 अक्टूबर को होगा। Sharadiya Navratri नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना कर पूजा की शुरुआत होगी। आइए जानते हैं शारदीय नवरात्रि कब से शुरू हो रहे हैं- कब से शुरू हैं शारदीय नवरात्रि, जानें डेट व मुहूर्त:When does Sharadiya Navratri start, know the date and auspicious time प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ – सितम्बर 22, 2025 को 01:23 ए एम बजे प्रतिपदा तिथि समाप्त – सितम्बर 23, 2025 को 02:55 ए एम बजे हिन्दू पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि का पहला दिन 22 सितंबर 2025 को है। इसी दिन कलश स्थापना की जाएगी। घटस्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि पर है। घटस्थापना मुहूर्त – 06:09 ए एम से 08:06 ए एम अवधि – 01 घण्टा 56 मिनट्स घटस्थापना अभिजित मुहूर्त – 11:49 ए एम से 12:38 पी एम अवधि – 00 घण्टे 49 मिनट्स कैसा है मां शैलपुत्री का स्वरुप:What is the nature of Mother Shailputri? Sharadiya Navratri नवरात्रि के पहले दिन पूजा जाने वाली देवी मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत शांत, सरल, सुशील और दया से पूर्ण है। मां का रूप दिव्य और आकर्षक है। उनके दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प शोभायमान है, Sharadiya Navratri जो उनके अद्भुत और शक्ति से भरे स्वरूप का प्रतीक है। मां की सवाली वृषभ है । मां शैलपुत्री का तपस्वी रूप बहुत ही प्रेरणादायक है, उन्होंने घोर तपस्या की है और समस्त जीवों की रक्षिका हैं। नवरात्रि के पहले दिन का व्रत और पूजा विशेष रूप से कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है। विपत्ति के समय में मां शैलपुत्री अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और Sharadiya Navratri उनकी सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। मां शैलपुत्री साधक के मूलाधार चक्र को जागृत करने में भी सहायक होती हैं। मूलाधार चक्र हमारे शरीर का वह ऊर्जा केंद्र है, Sharadiya Navratri जो हमें स्थिरता, सुरक्षा और मानसिक शांति प्रदान करता है। इस चक्र के जागरण से जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि का प्रवाह होता है। मां शैलपुत्री पूजा विधि:Maa Shailputri puja method Sharadiya Navratri मां शैलपुत्री की पूजा विधि देवी भागवत पुराण में विस्तार से दी गई है। Sharadiya Navratri शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा विधि इस प्रकार है:सुबह जल्दी उठें: नवरात्रि के पहले दिन पूजा का आरंभ ब्रह्म मुहूर्त में करें। Sharadiya Navratri इस समय वातावरण शुद्ध और आध्यात्मिक होता है।स्नान और शुद्ध वस्त्र पहनें: पूजा से पहले स्नान करके शुद्ध और स्वच्छ कपड़े पहनें।मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें: एक चौकी पर गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध करें और फिर उस पर मां शैलपुत्री की मूर्ति, तस्वीर या फोटो स्थापित करें।कलश स्थापना: पूरे परिवार के साथ विधिपूर्वक कलश की स्थापना करें। यह कार्य नवरात्रि पूजा का प्रमुख हिस्सा होता है।ध्यान और मंत्र जप: कलश स्थापना के बाद, मां शैलपुत्री का ध्यान मंत्र ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः, वंदे वाञ्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्, वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्, या देवी सर्वभूतेषु मां शैलपुत्री रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः जप करें। साथ ही, नवरात्रि व्रत का संकल्प लें।षोड्शोपचार पूजा विधि: मां शैलपुत्री की पूजा षोड्शोपचार विधि से करें। इसमें सभी नदियों, तीर्थों और दिशाओं का आह्वान किया जाता है।माता को फूल और कुमकुम अर्पित करें: सफेद, पीले या लाल फूल मां शैलपुत्री को अर्पित करें। साथ ही, कुमकुम का तिलक भी करें।धूप और दीप जलाएं: मां के समक्ष धूप और दीपक जलाएं। साथ ही, पांच देसी घी के दीपक भी जलाएं ताकि सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो।आरती करें: इसके बाद मां शैलपुत्री की आरती उतारें। मां की आरती करने से व्यक्ति को उनकी कृपा प्राप्त होती है।माता की कथा, दुर्गा चालिसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ: श्रीदुर्गासप्तश्लोकी Sharadiya Navratri पूजा के बाद, मां शैलपुत्री की कथा, दुर्गा चालिसा, दुर्गा स्तुति या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। Sharadiya Navratri इससे मां की आशीर्वाद प्राप्ति होती है।जयकारे लगाएं: परिवार के साथ “जय माता दी” के जयकारे लगाएं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।भोग अर्पित करें: अंत में, मां शैलपुत्री को भोग अर्पित करें।शाम की पूजा: शाम के समय भी पूजा करें। इस समय भी मां की आरती उतारें और मंत्र जप करके ध्यान लगाएं।मां शैलपुत्री का भोग Sharadiya Navratri मां शैलपुत्री की पूजा में विशेष रूप से सफेद रंग का महत्व है, Sharadiya Navratri जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए सफेद रंग की सामग्री का अर्पण करना आवश्यक होता है। मां शैलपुत्री को सफेद रंग के फूल अर्पित करें। पूजा में मां को सफेद मिठाई, जैसे खीर, खाजा, या सफेद लड्डू अर्पित करें। सफेद रंग की अन्य सामग्री जैसे दूध और दही भी अर्पण कर सकते हैंमां शैलपुत्री की पूजा से लाभ: मां शैलपुत्री का मंत्र वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम् ।कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम् ॥या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:। मां शैलपुत्री व्रत कथा:Maa Shailputri fast story देवी सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ आयोजित किया, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया, सिवाय अपनी बेटी सती और उनके पति भगवान शिव के।सती को यज्ञ में भाग लेने की तीव्र इच्छा थी, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि शायद उन्हें जानबूझकर यज्ञ में नहीं बुलाया गया है। भगवान शिव से सती को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन सती अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं। आखिरकार, भगवान शिव ने उन्हें

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Vishwakarma Jayanti

Vishwakarma Jayanti: विश्वकर्मा पूजा 2025: कब है भगवान विश्वकर्मा जी की जयंती? जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि !

Vishwakarma Jayanti: सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का पहला वास्तुकार (आर्किटेक्ट) और शिल्पकार माना जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, इन्होंने भगवान ब्रह्मा के सातवें पुत्र के रूप में ब्रह्मांड के निर्माण में उनकी सहायता की थी। Vishwakarma Jayanti यह पर्व मुख्य रूप से कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने औजारों और मशीनों की पूजा करके भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह त्योहार उस दिन मनाया जाता है जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है, जिसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है। आइए, जानते हैं विश्वकर्मा पूजा 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजा विधि के बारे में। Vishwakarma Jayanti 2025 date and auspicious time:विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा पूजा हर साल कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है, जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर करते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, विश्वकर्मा पूजा 2025 इस दिन मनाई जाएगी: विश्वकर्मा पूजा 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 Vishwakarma Jayanti ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य देव 17 सितंबर 2025 को देर रात 01 बजकर 54 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 01 बजकर 55 मिनट पर) सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करेंगे। सनातन धर्म में उदया तिथि का मान होता है, इसलिए 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। Auspicious time of puja:पूजा के शुभ मुहूर्त विश्वकर्मा Vishwakarma Jayanti पूजा के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जिनमें पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। • पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से दिन में 11 बजकर 44 मिनट तक • महा पुण्य काल: सुबह 05 बजकर 36 मिनट से सुबह 07 बजकर 39 मिनट तक (अवधि: 02 घंटे 03 मिनट) • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजकर 18 मिनट से 03 बजकर 07 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 24 मिनट से शाम 06 बजकर 47 मिनट तक • निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक Vishwakarma Puja 2025 Rahukaal Timings:विश्वकर्मा पूजा 2025 राहुकाल का समय Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन राहुकाल का समय दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से 01 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राहुकाल में पूजा या कोई भी शुभ कार्य करने से शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए इस समय से पहले या बाद में पूजा करना चाहिए। विश्वकर्मा पूजा पर बन रहे शुभ योग Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा के दिन शिव और परिघ योग समेत कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। परिघ योग के बाद शिव योग का संयोग बनेगा, और इसके साथ ही शिववास योग का भी निर्माण होगा। इन शुभ योगों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विश्वकर्मा पूजा का महत्व (Significance) सनातन धर्म में भगवान विश्वकर्मा की पूजा का विशेष महत्व है: • सृष्टि के निर्माता: भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला वास्तुकार और शिल्पकार माना जाता है। Vishwakarma Jayanti उन्होंने ब्रह्मांड के निर्माण में ब्रह्मा जी की सहायता की थी। • सुख और सौभाग्य: धार्मिक मान्यता है कि शिल्पकार विश्वकर्मा जी की पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। • सभी सुखों की प्राप्ति: भगवान विश्वकर्मा की कृपा से जीवन में सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। • कार्य बाधाओं से मुक्ति: उनकी आराधना करने से काम में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं। • कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा: ऐसा माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा से कार्यस्थल पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। • व्यापार में तरक्की: उनकी कृपा से कारोबार में तरक्की मिलती है। • घर-परिवार में खुशहाली: भगवान विश्वकर्मा की पूजा से घर-परिवार में खुशहाली आती है। •औजारों और मशीनों की पूजा: यह त्योहार कारीगरों, शिल्पकारों, इंजीनियरों और औद्योगिक मजदूरों द्वारा अपने औजारों और मशीनों की पूजा करने के लिए मनाया जाता है, ताकि वे निर्बाध रूप से कार्य कर सकें। विश्वकर्मा पूजा 2025 पूजन विधि (Puja Vidhi) भगवान विश्वकर्मा की पूजा विधिपूर्वक करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है: 1. प्रातःकाल स्नान: पूजा करने से पहले, व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करना चाहिए। 2. सफाई: स्नान के बाद, अपने घर, कार्यस्थल, औजारों और मशीनों की अच्छी तरह से सफाई करें। 3. मूर्ति/चित्र स्थापना: एक चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। 4. पूजन सामग्री अर्पित करें: भगवान को फूल, धूप, दीप, चंदन, फल और प्रसाद अर्पित करें। 5. मंत्र जाप: भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद पाने के लिए उनके मंत्र ‘ॐ विश्वकर्मणे नमः’ का जाप अवश्य करें। मान्यता है कि इस मंत्र का जाप करने से पूजा का फल और अधिक बढ़ जाता है। 6. प्रसाद वितरण: पूजा समाप्त होने के बाद, प्रसाद सभी में बांटकर स्वयं भी ग्रहण करें। निष्कर्ष Vishwakarma Jayanti विश्वकर्मा पूजा 2025 शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन न केवल हमारे औजारों और मशीनों के प्रति आदर भाव जगाता है, बल्कि हमें कार्य में कुशलता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने में भी मदद करता है। Vishwakarma Jayanti विधि-विधान से पूजा करके हम भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन में सफलता तथा खुशहाली ला सकते हैं। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

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Indira Ekadashi

Indira Ekadashi 2025 Date: इंदिरा एकादशी पितरों को मोक्ष और जीवन में सुख-समृद्धि दिलाने वाला पावन व्रत

Indira Ekadashi: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, और इनमें इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi 2025) का स्थान अत्यंत पवित्र है। यह व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली यह एकमात्र एकादशी है, जो इसे पितरों के उद्धार और मोक्ष के लिए समर्पित एक खास अवसर बनाती है। Indira Ekadashi इस दिन भगवान लक्ष्मी नारायण जी की विधिवत पूजा करने और व्रत रखने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि पितरों को भी नरक की यातनाओं से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए, इंदिरा एकादशी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व को विस्तार से जानते हैं। इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त:Date and auspicious time of Indira Ekadashi 2025 वैदिक पंचांग के अनुसार, इंदिरा एकादशी 2025: इंदिरा एकादशी 2025 की तिथि: बुधवार, 17 सितंबर 2025 एकादशी तिथि प्रारंभ: 17 सितंबर को देर रात 12 बजकर 21 मिनट पर (कुछ स्रोतों में 16 सितंबर 2025 को मध्य रात्रि 12:21 बजे से शुरू होने का भी उल्लेख है) एकादशी तिथि समाप्त: 17 सितंबर को देर रात 11 बजकर 39 मिनट पर सनातन धर्म में उदया तिथि मान्य है, जिसके अनुसार सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसलिए, Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी 17 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी। पूजा के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of puja • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 33 मिनट से सुबह 05 बजकर 20 मिनट तक • लाभ मुहूर्त (सुबह): सुबह 05:32 बजे से 07:04 बजे तक • अमृत मुहूर्त (सुबह): सुबह 07:04 बजे से 08:36 बजे तक • शुभ मुहूर्त (दोपहर): सुबह 10:08 बजे से 11:40 बजे तक • विजय मुहूर्त: दोपहर 02:18 बजे से दोपहर 03:07 बजे तक • लाभ मुहूर्त (शाम): शाम 04:15 बजे से 05:47 बजे तक • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:24 बजे से शाम 06:47 बजे तक (अन्य स्रोत में 05:45 बजे से 06:10 बजे तक) • चर मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 10:11 बजे से 11:40 बजे तक • निशिता मुहूर्त (मध्यरात्रि): रात 11:16 बजे से 12:03 बजे तक इंदिरा एकादशी पारण का समय:Time of Indira Ekadashi Paran • इंदिरा एकादशी का पारण 18 सितंबर 2025 को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: सुबह 06 बजकर 07 मिनट से सुबह 08 बजकर 34 मिनट तक (अन्य स्रोत में 05:33 बजे से 07:04 बजे तक) इस दौरान साधक स्नान-ध्यान कर लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करें और अन्न व धन का दान कर व्रत खोलें। इंदिरा एकादशी का महत्व: Significance of Indira Ekadashi सनातन धर्म में Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का खास महत्व है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और पितृ पक्ष में पड़ने के कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। • पितरों को मोक्ष: धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल साधक की मनोकामनाएं पूरी होती हैं, बल्कि उनके पितरों को भी मोक्ष की प्राप्ति होती है और उन्हें नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। • पितृ दोष का निवारण: जिन व्यक्तियों की कुंडली में पितृ दोष होता है, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है, क्योंकि यह दोष को शांत करने में मदद करता है। इसे श्राद्ध एकादशी भी कहा जाता है, और इस दिन पितरों का श्राद्ध व तर्पण अत्यंत शुभ माना गया है। • पापों से मुक्ति: नारद मुनि ने राजा इंद्रसेन को बताया था कि यह व्रत न केवल पितरों को मुक्ति दिलाता है, बल्कि व्रत करने वाले के स्वयं के पापों का भी नाश करता है। • सुख-समृद्धि: मान्यता है कि इस व्रत को करने से साधक को जीवन में सुख-समृद्धि मिलती है और सभी सुखों को भोगकर वह बैकुंठ धाम को जाता है। • अश्वमेध यज्ञ के समान फल: शास्त्रों में कहा गया है कि Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। • अकाल मृत्यु से मुक्ति: मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों को भी मुक्ति मिल जाती है। इंदिरा एकादशी की पूजा विधि:Puja Vidhi of Indira Ekadashi इंदिरा एकादशी Indira Ekadashi का व्रत दशमी तिथि से ही शुरू हो जाता है और द्वादशी तिथि तक चलता है। 1. दशमी तिथि के दिन: • एक समय भोजन: दशमी के दिन भक्त केवल एक समय सात्विक भोजन करते हैं। मांसाहारी भोजन, प्याज, लहसुन और तामसिक भोजन से पूरी तरह परहेज किया जाता है। • ब्रह्मचर्य का पालन: दशमी की रात से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। • पितृ तर्पण (वैकल्पिक): यदि संभव हो तो दशमी के दिन दोपहर में नदी या पवित्र सरोवर में पितरों के लिए तर्पण किया जा सकता है। इसमें जल और काले तिल से पितरों को अर्घ्य दिया जाता है। • घर की शुद्धि: घर और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें। 2. एकादशी तिथि के दिन • प्रातःकाल स्नान: सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान करें। • व्रत का संकल्प: स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु के सामने हाथ जोड़कर व्रत का संकल्प लें। संकल्प लेते समय कहें कि “मैं इंदिरा एकादशी का व्रत अपने पितरों को मोक्ष दिलाने और अपने पापों का नाश करने के लिए कर रहा/रही हूं।” • भगवान शालिग्राम की पूजा: भगवान शालिग्राम (विष्णु का एक रूप) या भगवान विष्णु की मूर्ति/चित्र स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से स्नान कराएं। पीले वस्त्र, पीले फूल, तुलसी दल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य (फल, मिठाई) अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम या ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। • इंदिरा एकादशी व्रत कथा श्रवण: एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें। • पितृ तर्पण: इस दिन दोपहर में पितरों के लिए विशेष तर्पण और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। Indira Ekadashi इसमें जल, दूध, काले तिल और कुश से पितरों को तर्पण दिया जाता है। • ब्राह्मण भोजन: यदि संभव हो, तो ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दान-दक्षिणा दें। • रात्रि जागरण: रात में जागरण कर भगवान विष्णु के भजन-कीर्तन करें और उनकी कथाएं सुनें। 3. द्वादशी तिथि के दिन (पारण) • प्रातःकाल पूजा: सुबह स्नान कर भगवान विष्णु की पुनः पूजा करें। • ब्राह्मण को भोजन और दान: पारण से पहले ब्राह्मणों को भोजन कराएं

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Matra Navami

Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों को प्रसन्न करने के अचूक उपाय

Matra Navami: मातृ नवमी पितृ पक्ष के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन होता है, विशेषकर उन माताओं, बहुओं और बेटियों के लिए जिनका निधन सुहागिन के रूप में हुआ हो। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का इंतजार साल भर किया जाता है, क्योंकि यह पितरों की आत्मा की शांति के लिए सबसे पवित्र समय माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। आइए, वर्ष 2025 में मातृ नवमी Matra Navami की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों के बारे में विस्तार से जानें ताकि आप अपने दिवंगत पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें। Matra Navami 2025 Date: मातृ नवमी तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पितरों When isMatra Navami 2025: मातृ नवमी 2025 कब है? हिंदी पंचांग के अनुसार, मातृ नवमी हर वर्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। साल 2025 में, मातृ नवमी श्राद्ध पूजा 15 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। • नवमी तिथि का प्रारम्भ: 15 सितंबर 2025 को सुबह 03 बजकर 06 मिनट पर। • नवमी तिथि की समाप्ति: 16 सितंबर 2025 को सुबह 01 बजकर 31 मिनट पर। मातृ नवमी 2025 के शुभ मुहूर्त:Auspicious time of Matra Navami 2025 श्राद्ध कर्म के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। मातृ नवमी पर आप इन शुभ मुहूर्तों में पूजा-पाठ कर सकते हैं: • अपराह्न काल पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 03 बजकर 58 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 02 घण्टे 28 मिनट। • रोहिणी नक्षत्र में पूजा का शुभ मुहूर्त: दोपहर 12 बजकर 41 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक।     पूजा की कुल अवधि: 00:49 मिनट। हालांकि, यह भी मान्यता है कि मातृ नवमी का श्राद्ध दोपहर 12 बजे से पहले करना शुभ माना गया है। मातृ नवमी का महत्व:Importance of Matra Navami पितृ पक्ष में Matra Navami मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन दिवंगत माताओं, बहुओं और बेटियों का पिंडदान करने के लिए समर्पित है जिनकी मृत्यु सुहागिन के रूप में हुई थी। • आत्मा की शांति और आशीर्वाद: ऐसी मान्यता है कि इस दिन विधि पूर्वक पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। • सुख-समृद्धि और सौभाग्य: मातृ नवमी का श्राद्ध करने से परिवार में सुख-समृद्धि आती है। जिस घर की महिला इस दिन पूजा-पाठ और व्रत रखती है, उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। दिवंगत माताओं का श्राद्ध करने से उनकी कृपा पूरे घर पर बनी रहती है। • विशेष विधान: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में सौभाग्यवती माताओं और स्त्रियों के श्राद्ध की तिथि Matra Navami मातृ नवमी को अलग से बताया गया है। पितृपक्ष में माताओं की पूजा की जाती है और माताओं तथा सुहागिन स्त्रियों के लिए श्राद्ध और तर्पण का विधान है। मातृ नवमी श्राद्ध पूजा विधि:Matra Navami Shraddha Puja Method मातृ नवमी Matra Navami पर पितरों को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए निम्नलिखित विधि से श्राद्ध कर्म करें: 1. सुबह का स्नान और संकल्प: मातृ नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर दैनिक क्रियाओं से निवृत हो जाएं। स्नान आदि करने के बाद सफेद और साफ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें। 2. चौकी स्थापित करें: एक लकड़ी की चौकी को अपने घर के दक्षिण दिशा में रखें। उस चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर अपने पूर्वज मातृ पितरों की फोटो या प्रतीक के रूप में स्थापित करें। 3. तर्पण और पूजन: फोटो पर फूल माला चढ़ाएं, काले तिल का दीपक जलाएं, धूपबत्ती जलाकर इत्र आदि लगाएं। तस्वीर पर तुलसी की पत्तियां अवश्य अर्पित करें। 4. श्रीमद्भागवत गीता का पाठ: इस दिन श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। 5. भोजन तैयार करें और गाय को खिलाएं: घर पर जो भी भोजन तैयार किया जाता है, उसमें से कुछ भोजन सबसे पहले गायों को खिलाना चाहिए। 6. पितरों के लिए भोजन: जिन पितरों का श्राद्ध करना है, उनके लिए भी भोजन निकालकर अपने घर के बाहर जाकर दक्षिण दिशा में साफ-सुथरी जगह पर रखें। 7. तुलसी पूजन: इस दिन घर में तुलसी के पौधे अवश्य लगाएं और उनकी पूजा-अर्चना करें। तुलसी के पास एक दीपक भी अवश्य जलाएं। 8. सूर्य देव को अर्घ्य और तर्पण: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान के बाद सूर्यदेव को जल का अर्घ्य देना चाहिए। इसके बाद किसी पवित्र नदी में तर्पण करना चाहिए, इससे पितृ प्रसन्न होते हैं। 9. पितरों को भोग: पितृ पक्ष के दौरान सात्विक भोजन बनाकर सबसे पहले पितरों को धूप दान करें। इसके बाद दोनों हाथ जोड़कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें और उन्हें भोजन का भोग लगाएं। 10. पशु-पक्षियों को भोजन: मातृ नवमी के दिन बनाए गए भोजन में से कुत्ते, कौवे और गाय को खिलाएं, ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। 11. ब्राह्मणों को भोजन और दान: इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और अपनी श्रद्धा अनुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए। मातृ नवमी के दिन पितरों को खुश करने के खास उपाय: Special ways to please the ancestors on the day of Matra Navami पितृ पक्ष में मातृ नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यह दिन पितरों की आत्मा की शांति और उनको प्रसन्न करने का उत्तम दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों को खुश करने के लिए ये खास उपाय जरूर करें: • सुबह माता तुलसी की पूजा करें और उन्हें धूप-दीप जलाएं। • किसी भी गरीब और जरूरतमंद सुहागिन महिला को सुहाग का सामान जैसे – लाल साड़ी, कुमकुम, सिंदूर, चूड़ियां, अनाज, जूते-चप्पल आदि का दान जरूर करें। मातृ नवमी पर न करें ये भूल, वरना आ सकती है दरिद्रता:Do not make this mistake on Matra Navami , otherwise poverty may come. मातृ नवमी पर विशेष सावधानी रखनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन कुछ गलतियाँ करने से बचना चाहिए: • श्राद्ध न करना: गरुड़ पुराण और शकुन शास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि सौभाग्यवती माता का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करने के बजाय नवमी तिथि को न किया जाए, तो पितृ प्रेत योनि में भटकते

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Surya Gochar 2025

Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज !

Surya Gochar 2025: सनातन धर्म में संक्रांति का विशेष महत्व है, और जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस दिन को संक्रांति कहा जाता है। वर्ष 2025 में, कन्या संक्रांति तब मनाई जाएगी जब सूर्य देव अपनी सिंह राशि को छोड़कर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। यह दिन धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि इस वर्ष Surya Gochar 2025 कन्या संक्रांति के साथ ही विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाएगी, जिससे इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, इस दिन इंदिरा एकादशी भी मनाई जाएगी, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को और बढ़ा देती है। Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति कब है तिथि, शुभ मुहूर्त और जानें किन राशियों….. कन्या संक्रांति 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त ज्योतिषियों के अनुसार, साल 2025 में कन्या संक्रांति की तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: • संक्रांति प्रवेश: 17 सितंबर 2025, देर रात 01:54 बजे • पुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से दोपहर 11:44 बजे तक • महापुण्य काल: सुबह 05:36 बजे से 07:39 बजे तक • सूर्योदय: 05:36 AM • सूर्यास्त: 05:51 PM • ब्रह्म मुहूर्त: 04:02 से 04:49 बजे • विजय मुहूर्त: 01:46 से 02:35 PM • गोधूलि बेला: 05:51 से 06:15 PM • निशीथ काल: 11:20 से 12:07 AM कन्या संक्रांति का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व Surya Gochar 2025: कन्या संक्रांति वह दिन है जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। यह घटना न केवल ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से भी विशेष मानी जाती है। कन्या राशि में सूर्य का गोचर बुद्धि, सेवा, व्यवस्था और कर्म का प्रतीक माना जाता है। यह दिन सकारात्मक ऊर्जा, आत्मशुद्धि और कर्मयोग की भावना को बढ़ाने वाला होता है। सनातन शास्त्रों के अनुसार, कन्या संक्रांति के दिन शिल्पकार विश्वकर्मा जी का अवतरण हुआ था, इसलिए हर साल कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा भी मनाई जाती है। Surya Gochar 2025 विशेष रूप से इंजीनियरिंग, तकनीकी और निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए यह दिन अत्यंत पवित्र और फलदायक होता है। जो लोग मशीनरी, तकनीकी या कारीगरी से जुड़े हैं, Surya Gochar 2025 उनके लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। पूजन एवं दान विधि कन्या संक्रांति के शुभ अवसर पर सूर्य देव की कृपा प्राप्त करने और पुण्य कमाने के लिए इन विधियों का पालन करें: • प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। • पूर्व दिशा की ओर मुख कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें। • अपने पूजा स्थल और कार्यस्थल को स्वच्छ करके दीपक और पुष्प अर्पित करें। • लाल वस्त्र, तिल का तेल, घी, गुड़ आदि का दान करें। • आध्यात्मिक मंत्रों का जप करें, जैसे – “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”। • परिवार सहित सात्विक भोजन बनाएं और जरूरतमंदों में बांटें। • इस दिन क्रोध, विवाद और अहंकार से दूर रहें। सूर्य गोचर 2025: इन राशियों को मिलेगी करियर में गुड न्यूज! Surya Gochar 2025 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, 17 सितंबर 2025 को सूर्य देव के सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर करने से कुछ राशियों के जातकों को करियर में विशेष लाभ और मानसिक तनाव से मुक्ति मिल सकती है। आइए जानते हैं उन राशियों के बारे में: मेष राशि (Aries) सूर्य देव के राशि परिवर्तन से मेष राशि के जातकों को काफी हद तक लाभ मिलता दिख रहा है। सूर्य देव की दृष्टि षष्ठ भाव में होने से आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आपके शत्रुओं में आपका भय रहेगा, और आप कई मामलों में कठोर निर्णय ले सकते हैं। आपके भाग्य में वृद्धि होगी, लेकिन आपको धर्म पथ पर चलना होगा और माता-पिता का सम्मान करना होगा। आप न्यायप्रिय होंगे, जिससे समाज में आपकी लोकप्रियता बढ़ेगी। करियर और कारोबार में मनमुताबिक सफलता मिलेगी, और आप कुछ नया करने की योजना भी बना सकते हैं। धनु राशि (Sagittarius) सूर्य देव के कन्या राशि में गोचर करने से धनु राशि के जातकों को भी विशेष फायदा हो सकता है। सूर्य देव की दृष्टि आपके करियर भाव में रहेगी, जिससे आपको अनुकूल परिणाम मिल सकते हैं। Surya Gochar 2025 आपकी बुद्धि और प्रगाढ़ होगी, जिससे आप जीवन में कई सही फैसले ले पाएंगे। आपमें नेतृत्व करने की क्षमता बढ़ेगी और आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होगी, जिससे आप बड़ी सफलता पाने में सफल होंगे। पिता के साथ संबंध मधुर रहेंगे और सरकारी तंत्र से आपको सम्मान मिल सकता है। कई जातकों को सरकारी नौकरी से संबंधित कोई बड़ी खुशखबरी भी मिल सकती है। Surya Gochar 2025 आपके व्यवहार से लोग प्रभावित हो सकते हैं। माता का विशेष ख्याल रखने की सलाह दी गई है। निष्कर्ष कन्या संक्रांति 2025 एक अत्यंत शुभ और फलदायक तिथि है, खासकर जब यह विश्वकर्मा पूजा और इंदिरा एकादशी के साथ पड़ रही है। इस दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और सूर्य देव का आशीर्वाद मिलता है। यह गोचर कई राशियों के लिए करियर और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक बदलाव लाएगा। September 2025 Vrat Tyohar List: ये है सितंबर के व्रत की लिस्ट, जानिए कब से शुरू हो रहे हैं शारदीय नवरात्र ?

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