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Lalita Saptami 2025

Lalita Saptami 2025 Date: ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि !

Lalita Saptami 2025 Date:ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Lalita Saptami 2025: हिंदू धर्म में भाद्रपद मास का विशेष महत्व है, क्योंकि इस माह में जन्माष्टमी, राधा अष्टमी और गणेश उत्सव जैसे कई प्रमुख त्योहार आते हैं। इन्हीं पावन पर्वों में से एक है ललिता सप्तमी, जो श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। ललिता देवी, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी की प्रिय सखी थीं। Lalita Saptami 2025 यह व्रत सुख, सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। आइए जानते हैं साल 2025 में ललिता सप्तमी कब है, इसका महत्व क्या है और पूजा की सही विधि क्या है। ललिता सप्तमी 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त (Lalita Saptami 2025 Date and Muhurat) हर साल ललिता सप्तमी, Lalita Saptami 2025 राधाष्टमी से ठीक एक दिन पहले भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। • ललिता सप्तमी 2025 की तिथि: इस वर्ष ललिता सप्तमी का पावन पर्व 30 अगस्त 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। • सप्तमी तिथि का आरंभ: 29 अगस्त 2025, शुक्रवार को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। • सप्तमी तिथि का समापन: 30 अगस्त 2025, शनिवार को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। • ललिता/संतान सप्तमी की पूजा दोपहर में करने का विधान है। ललिता सप्तमी का महत्व (Significance of Lalita Saptami) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी का त्योहार श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं – श्री राधा, श्री ललिता, श्री विशाखा, श्री चित्रा, श्री इंदुलेखा, श्री चंपकलता, श्री रंग देवी, श्री सुदेवी और श्री तुंगविद्या। इन सभी सखियों में से नंदलाल श्री राधा जी और ललिता जी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। देवी ललिता को राधा जी के प्रति सबसे समर्पित गोपी माना गया है और राधा व कृष्ण के प्रेम और रासलीला में इनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। मान्यता है कि ललिता सप्तमी का व्रत और पूजा करने से सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। Lalita Saptami 2025 इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में पड़ जाते हैं। नवविवाहित जोड़ों को स्वस्थ और सुंदर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद भी मिलता है। इसके अलावा, यह व्रत संतान की अच्छी सेहत और लंबी उम्र के लिए भी रखा जाता है। ललिता सप्तमी पूजा विधि (Lalita Saptami Puja Vidhi) Lalita Saptami 2025: ललिता सप्तमी के दिन विधि-विधान से पूजा करने पर श्री ललिता देवी, राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं। पूजा करते समय इन बातों का ध्यान रखें: 1. स्नान और ध्यान: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें। 2. देवताओं की स्थापना: इसके बाद, देवी ललिता देवी, राधा-कृष्ण या शालिग्राम की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। आप गणेश जी, देवी पार्वती, देवी षष्ठी, कार्तिक और शिव की भी पूजा कर सकते हैं। 3. सामग्री अर्पित करें: घी का दीपक जलाएँ और देवताओं को नारियल, चावल, हल्दी, चंदन, गुलाल, फूल और दूध प्रसाद के रूप में अर्पित करें। 4. भोग लगाएं: मिठाई का भोग लगाएं। इस दिन विशेष रूप से मालपुए का भोग लगाना बेहद शुभ माना गया है। 5. धागा बांधें: पूजा क्षेत्र में एक लाल धागा या मौली रखें। प्रार्थना के बाद, इसे अपने दाहिने हाथ में पहनें। 6. अर्घ्य और प्रार्थना: अंत में, जल का अर्घ्य दें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 7. व्रत का पालन: उपवास सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक होता है, और दिन में केवल एक बार भोजन किया जाता है। 8. विशेष परिस्थितियों में: कामकाजी महिलाओं, पढ़ाई करने वालों और चिकित्सीय समस्याओं वाले लोगों को उपवास नहीं करना चाहिए; उन्हें केवल प्रार्थना करनी चाहिए। 9. व्रत खोलना: अगले दिन सुबह प्रार्थना करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। देवताओं को चढ़ाए गए फल को प्रसाद के रूप में वितरित करें। ललिता सप्तमी व्रत कथा (Lalita Saptami Vrat Katha) ललिता सप्तमी से जुड़ी दो प्रमुख कथाएँ हैं: 1. राधा-कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी की कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण की आठ प्रमुख सखियाँ थीं, जिनमें श्री राधा और श्री ललिता जी प्रमुख थीं। माना जाता है कि श्री कृष्ण इन दोनों से विशेष प्रेम करते थे। ललिता सप्तमी का व्रत श्री कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी को समर्पित है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री Lalita Saptami 2025 ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में लीन हो जाते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ललिता सप्तमी की पूजा करने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है। 2. संतान सप्तमी (ललिता सप्तमी) की पौराणिक कथा: पौराणिक ग्रंथों में ऋषि लोमेश के मुख से संतान सप्तमी (जिसे ललिता सप्तमी भी कहा जाता है) की कथा सुनने को मिलती है। एक कथा के अनुसार, अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती (जो एक ब्राह्मण की पत्नी थी) दोनों में बहुत गहरा प्रेम था। Lalita Saptami 2025 एक बार वे सरयू नदी के तट पर स्नान करने गईं, जहाँ उन्होंने देखा कि बहुत सी स्त्रियाँ संतान सप्तमी का व्रत कर रही थीं। उन स्त्रियों से कथा सुनकर, चंद्रमुखी और रूपमती ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत को करने का निश्चय किया, लेकिन घर आकर वे दोनों इस बात को भूल गईं। कुछ समय बाद, दोनों की मृत्यु हो गई और उन्होंने पशु योनि में जन्म लिया। कई जन्मों के बाद, दोनों ने मनुष्य योनि में फिर से जन्म लिया। इस जन्म में चंद्रमुखी का नाम ईश्वरी और रूपमती का नाम भूषणा था। ईश्वरी राजा की पत्नी बनीं और भूषणा ब्राह्मण की पत्नी थीं, और इस जन्म में भी दोनों में बहुत प्रेम था। Lalita Saptami 2025 इस जन्म में भूषणा को पूर्व जन्म की कथा याद थी, इसलिए उसने संतान सप्तमी का व्रत विधि-विधान से किया, जिसके प्रताप से उसे आठ पुत्र प्राप्त हुए। लेकिन ईश्वरी ने इस व्रत का पालन नहीं किया, इसलिए उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण उसे भूषणा

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Mahalakshmi Vrat

Mahalakshmi Vrat 2025 date:लक्ष्मी व्रत 2025 कब है? पूजा विधि, महत्व और शुभ मुहूर्त

Mahalakshmi Vrat 2025: महालक्ष्मी व्रत 2025: आर्थिक संकटों से मुक्ति और सुख-समृद्धि का अचूक उपाय Mahalakshmi Vrat: क्या आप आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं? क्या धन, सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति के रास्ते बंद नजर आ रहे हैं? यदि ऐसा है, तो महालक्ष्मी व्रत आपके लिए एक बहुत ही कारगर और अचूक उपाय साबित हो सकता है। यह 16 दिवसीय व्रत धन और समृद्धि की देवी, माता महालक्ष्मी को समर्पित है, जिनके प्रताप से कंगाल भी धनवान बन जाता है और आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा की संपूर्ण विधि। महालक्ष्मी व्रत का महत्व ( Significance of Mahalaxmi Vrat) महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि से आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि तक 16 दिनों तक मनाया जाता है। इन 16 दिनों में माता महालक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। Mahalakshmi Vrat मान्यता है कि जो भक्त इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी की असीम कृपा बनी रहती है, Mahalakshmi Vrat और उनके जीवन से सभी दुख-दर्द और आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं। Mahalakshmi Vrat यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो धन संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं और जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। महालक्ष्मी व्रत 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Mahalaxmi Vrat 2025 Date and Muhurat) इस साल, महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 31 अगस्त 2025 से होगी और इसका समापन 14 सितंबर 2025 को होगा। • भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि: 30 अगस्त 2025 को रात 10 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी। • अष्टमी तिथि का समापन: अगले दिन 1 सितंबर 2025 को सुबह 12 बजकर 57 मिनट पर होगा। • चंद्रोदय का समय: दोपहर 1 बजकर 11 मिनट। कुल मिलाकर यह व्रत 16 दिनों का होता है, जिसमें से संपूर्ण व्रत के दिन 15 होते हैं। महालक्ष्मी पूजा विधि (Mahalaxmi Puja Vidhi) महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधिवत रूप से करने पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा भक्तों पर बरसाती हैं। पूजा करते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें: 1. सबसे पहले, भगवान गणेश के साथ मां लक्ष्मी की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करें। 2. मां के सामने गुलाब और कमल के फूल, साड़ी, सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, बिछिया, धूप, दीप और फल अर्पित करें। 3. एक गुलाबी या लाल रंग का धागा लें, उसमें 16 गांठें लगाएं और उसकी भी पूजा करें। यह प्रक्रिया आपको 15 दिनों तक करनी है। 4. इसके बाद, महालक्ष्मी मंत्र का जाप करें और अपनी मनोकामनाएं मांगें। 5. व्रत के अंतिम दिन (आश्विन कृष्ण अष्टमी), मां लक्ष्मी की मूर्ति का विसर्जन कर दें। Mahalakshmi Vrat आप चाहें तो मूर्ति को अपने पूजा घर में भी स्थापित कर सकते हैं। 6. जब व्रत पूरा हो जाए, तो वस्त्र से एक मंडप बनवाएं और उसमें लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें। 7. प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं। 8. सोलह प्रकार से पूजा करें। 9. रात्रि के समय तारागणों को पृथ्वी के प्रति अर्घ्य दें और लक्ष्मी जी की प्रार्थना करें। 10. व्रत रखने वाली स्त्रियाँ ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उनसे हवन करवाएं। हवन में खीर की आहुति दें। 11. चंदन, ताल, पत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल और नाना प्रकार के पदार्थ नए सूप में सोलह-सोलह की संख्या में रखें। 12. फिर दूसरे नए सूप से ढक कर निम्न मंत्र को पढ़कर लक्ष्मीजी को समर्पित करें: क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा। व्रतेनाप्नेन सन्तुष्टा भवर्तोद्वापुबल्लभा।। 13. इसके बाद, चार ब्राह्मण और सोलह ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दक्षिणा देकर विदा करें। फिर घर में बैठकर स्वयं भोजन करें। नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ अगर 16 दिन व्रत न रख पाएं तो क्या करें? (What if you can’t fast for 16 days?) यह व्रत धन और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए किया जाता है। यदि किसी कारणवश आप पूरे 15 दिन का व्रत नहीं रख पाते हैं, Mahalakshmi Vrat तो आप व्रत के शुरुआत के 3 दिन या फिर आखिर के 3 दिन भी व्रत रख सकते हैं। Mahalakshmi Vrat माना जाता है कि ऐसा करने से भी व्रत पूरा हो जाता है और आपको महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार जो भक्त विधि-विधान से महालक्ष्मी व्रत Mahalakshmi Vrat करते हैं, वे इस लोक में सभी सुखों का भोग करते हैं और बहुत काल तक लक्ष्मी लोक में भी सुख पाते हैं। तो, इस साल महालक्ष्मी व्रत का संकल्प लें और अपने जीवन में धन, सुख और समृद्धि का आह्वान करें!

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Daslakshan Parva

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व : आत्मशुद्धि और धर्म की ओर एक आध्यात्मिक यात्रा

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे आत्मा की शुद्धि और धर्म के दस मूल लक्षणों को आत्मसात करने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व आमतौर पर पर्युषण के तुरंत बाद शुरू होता है और लगातार 10 दिनों तक चलता है। इस दौरान जैन अनुयायी आत्म-नियंत्रण, साधना, और तपस्या के माध्यम से अपने भीतर दिव्यता को जाग्रत करने का प्रयास करते हैं। सुगंध दशै – Sugandh Dashain पर्व सुगंध दशै दिन जिनवर पूजै अति हरषाई,सुगंध देह तीर्थंकर पद की पावै शिव सुखदाई ॥ दिगंबर जैन धर्म में सुगंध दशमी का बहुत महत्‍व है। दसलक्षण पर्व के अंतर्गत भाद्रपद शुक्ल पक्ष में आने वाली दशमी के दिन जैन समाज के सभी लोग सुगंध दशमी पर्व मनाते है। Daslakshan Parva इस व्रत को विधिपूर्वक करने से हमारे अशुभ कर्मों का क्षय होकर हमें पुण्‍यबंध, मोक्ष तथा उत्‍तम शरीर प्राप्ति होगी। सुगंध दशमी के दिन पांच पापों यानी हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का त्‍याग करें। सुगंध दशमी के दिन जैन समाज के भक्त जैन मंदिरों में जाकर चौबीस तीर्थंकरों को धूप अर्पित करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं, हे भगवान! मैं आपके नाम का ध्यान धरकर मोक्ष प्राप्ति की कामना करता हूं। इससे वायुमंडल अत्यधिक सुगंधमय व स्‍वच्‍छ हो जाता है। दशमी के दिन खास तौर पर सभी मंदिरों में विशेष साज सज्जा के साथ आकर्षक मंडल विधान सजाएं जाते हैं तथा धर्म के बारे में समझाते हुए झांकियों का निर्माण किया जाता है। रात्रि को मदिरों में सुगंध दशमी कथा का वाचन भी किया जाता है। Daslakshan Parva सुगंध दशै को सुगंध दशमी, धूप दशमी तथा धूप दशै के नाम से भी जाना जाता है। सुगंध दशमी का अर्घ्यसुगंध दशमी को पर्व भादवा शुक्ल में,सब इन्द्रादिक देव आय मधि लोक में ।जिन अकृत्रिम धाम धूप खेवै तहां,हम भी पूजत आह्वान करिकै यहां ॥ क्षमा वाणी दिवस – Kshama Vani Diwas पर्युषण के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाता है। और उसके अगले दिन सभी व्यक्ति एक दूसरे से क्षमा माँगते हैं, यह दिन क्षमा दिवस के नाम से जाना जाता हैं। इसमें सभी जाने अनजाने होने वाली गलतियों के लिए सभी मनुष्य, जीव-जन्तुओ, पशु-पक्षियों से क्षमा मांगता हैं। क्षमा मांगना एवम करना यह दोनों ही धर्मो में श्रेष्ठ माने जाते हैं। Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व 2025 में लगभग 28 अगस्त से शुरू होकर 6–9 सितंबर तक चलेगा (अंतर हो सकता है परंपरा एवं पंचांग के अनुसार)। कृपया सुनिश्चित जानकारी के लिए अपने स्थानीय जैन मंदिर या पंचांग देखें।” गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि क्षमावाणी सन्देश:करबद्ध हैं नमनमित्र सखा सभी जीवंतहो अगर भूल कोई मुझसेतो क्षमाप्रार्थी हूँ मैं सबसेयह अनमोल भेंट देकर मुझेकृतज्ञ करे इस जीवन मैंउत्तम क्षमा दशलक्षण पर्व के दस धर्म लक्षण :Ten religious characteristics of Daslakshan Parva प्रत्येक दिन एक धर्म लक्षण को समर्पित होता है। Daslakshan Parva ये दस लक्षण आत्मा को निर्मल और पवित्र बनाने में सहायक माने जाते हैं पर्व का महत्व :importance of festival दसलक्षण पर्व का इस तरह होता है समापन Dasalakshan festival ends like this अनंत चतुर्दशी के दिन दसलक्षण पर्व Daslakshan Parva का समापन होता है और इस दिन शाम को मंदिर में सभी भक्त जन एक साथ प्रतिक्रमण करते हुए पूरे साल में किये गए पाप और कटू वचन के लिए क्षमा याचना करते हैं। वह हर किसी से दिल से क्षमा मांगते हैं और एक-दूसरे से हाथ जोड कर व गले मिलकर मिच्छामी दूक्कडम कहते हैं, जिसका अर्थ है सबको क्षमा सबसे क्षमा। Daslakshan Parva यहां तक कि उस समय जो लोग उपस्थित नहीं थे, उनसे भी वह दूसरे दिन क्षमा याचना करते हैं। इस तरह दसलक्षण पर्व की समाप्ति होती है।

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Nuakhai

Nuakhai 2025 Date: नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ

Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ परिचय: नुआखाई (Nuakhai) केवल एक त्योहार नहीं है; यह पश्चिम ओडिशा की आत्मा है, जो कृषि समाज में प्रकृति, कृतज्ञता और एकता का प्रतीक है। ‘नुआ’ का अर्थ है नया और ‘खाई’ का अर्थ है खाना। यह नए चावल का त्योहार है, जहाँ किसान अपनी पहली फसल देवताओं को अर्पित करके आभार व्यक्त करते हैं। यह सिर्फ एक क्षेत्रीय उत्सव नहीं है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है। नुआखाई का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व: कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि नुआखाई Nuakhai वैदिक युग से जुड़ा हुआ है, जहाँ नए अन्न को अर्पित करने की परंपरा थी। प्राचीन समय में, राजा भी राज्य की एकता और समृद्धि के लिए इस पर्व को मनाते थे, Nuakhai जिससे यह एक बड़े सामाजिक पर्व के रूप में विकसित हुआ। Nuakhai पश्चिम ओडिशा के संबलपुर, बोलंगीर और कालाहांडी जैसे क्षेत्रों में यह एक महत्वपूर्ण सामूहिक उत्सव है। यह भोजन से कहीं बढ़कर, सम्मान और प्रेम का पर्व है, जहाँ मनुष्य प्रकृति और अपनी परंपराओं से जुड़ता है। नुआखाई 2025 की शुभ तिथि और मुहूर्त: नुआखाई के लिए शुभ मुहूर्त का निर्धारण ज्योतिषियों द्वारा किया जाता है। साल 2025 में, माँ समलेश्वरी को नए अन्न की पहली पेशकश के लिए नुआखाई का लग्न 28 अगस्त, गुरुवार को तय किया गया है। • तिथि: भाद्रव शुक्ल पक्ष पंचमी • शुभ मुहूर्त: सुबह 10 बजकर 33 मिनट से 10 बजकर 55 मिनट के बीच। • लग्न: तुला लग्न, मीन राशि में। Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव Nuakhai नुआखाई यह मुहूर्त संबलपुर के ब्रह्मपुरा मंदिर परिसर में पंडित मंडली द्वारा निर्धारित किया गया था। निर्धारण के बाद, लग्न पत्र ब्रह्मपुरा मंदिर ट्रस्ट कमेटी के सदस्यों द्वारा मंदिर के पुजारियों को प्रदान किया गया, और फिर माँ समलेश्वरी को अर्पित किया गया। इस लग्न के अनुसार, सबसे पहले माँ समलेश्वरी को नया अन्न अर्पित किया जाएगा, जिसके बाद पूरे पश्चिम ओडिशा में नुआखाई मनाया जाएगा। नुआखाई के मुख्य अनुष्ठान और उत्सव: नुआखाई की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। घर की साफ-सफाई की जाती है, पारंपरिक व्यंजन जैसे पीठा बनाए जाते हैं, और नए कपड़े खरीदे जाते हैं। 1. पूजा और अन्न अर्पण (नवाखाई अनुकूल मुहूर्त): निर्धारित शुभ मुहूर्त पर, नया अन्न (नवान्न) सबसे पहले देवी समलेश्वरी सहित अन्य देवताओं को अर्पित किया जाता है। यह कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पवित्र क्षण होता है, जहाँ यह माना जाता है कि देवता इस शुभ क्षण में प्रसाद स्वीकार करते हैं और वर्ष भर समृद्धि बनी रहती है। 2. परिवार का मिलन: देवताओं को भोग लगाने और प्रार्थना करने के बाद, परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर उस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। यह परिवार के लिए एकजुट होने और बंधन का एक महत्वपूर्ण क्षण होता है। 3. नुआखाई जोहार (भेदघाट): प्रसाद ग्रहण करने के बाद, त्योहार का सामाजिक पहलू शुरू होता है, जिसे ‘नुआखाई जोहार’ या ‘भेदघाट’ कहा जाता है। लोग एक-दूसरे के घरों में जाते हैं, दोस्तों और पड़ोसियों को शुभकामनाएँ देते हैं। बच्चे और युवा बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं, जो सम्मान और स्नेह का प्रतीक है। ओडिशा से बाहर भी नुआखाई: यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज की व्यस्त जीवनशैली में भी, नुआखाई की परंपरा को लोग संजो कर रखे हुए हैं। ओडिशा के बाहर, यहाँ तक कि विदेशों में भी, पश्चिम ओडिशा के लोग इस पर्व को मनाते हैं। भुवनेश्वर, बेंगलुरु, दिल्ली, या दुबई में भी लोग पारंपरिक संबलपुरी पोशाक पहनकर, संबलपुरी गीतों पर नाचकर, और ढोल-निशान बजाकर अपनी मिट्टी की खुशबू महसूस करने की कोशिश करते हैं। भले ही उनके पास धान के खेत न हों, लेकिन एकता, आनंद, और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना ही मुख्य है। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि Nuakhai Kaise Manaya Jata:नुआखाई कैसे मनाया जाता है पश्चिमी ओडिशा की देवी, माँ समलेश्वरी को एक नई फसल या नबन्न का भोग लगाया जाता है। मुख्य पुजारी के आवास पर देवी के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है।देवी समलेश्वरी को नबन्न अर्पित करने के बाद, लोगों के बीच भोजन वितरित किया जाता है और वे इसे एक साथ खाते हैं। सभी रस्में पूरी करने के बाद, लोग स्वादिष्ट भोजन तैयार करते हैं और इस त्योहार को बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं।अनुष्ठान पहले क्षेत्र के देवता या ग्राम देवता के मंदिर में देखे जाते हैं। बाद में, लोग अपने-अपने घरों में पूजा करते हैं और अपने घरेलू देवता और हिंदू परंपरा में धन की देवी लक्ष्मी को अनुष्ठान करते हैं। इस दिन, परिवार के प्रत्येक सदस्य नए कपड़े पहनते हैं और वे एक दूसरे को बधाई देते हैं, स्नेह दिखाते हैं और परिवार के बुजुर्ग सदस्यों से आशीर्वाद लेते हैं। इस रस्म को Nuakhai नुआखाई जुहार के नाम से जाना जाता है।लोग रसकेली जैसे पारंपरिक संबलपुरी नृत्य गाते और करते हैं, नुआखाई त्योहार संबलपुरी संस्कृति का प्रतीक है और यह ओडिशा के लोगों को किसी के जीवन में कृषि के महत्व की याद दिलाता है। नुआखाई भारतीय राज्य ओडिशा में एक क्षेत्रीय सार्वजनिक अवकाश है। निष्कर्ष: नुआखाई सिर्फ नया चावल खाने का दिन नहीं है। Nuakhai यह वास्तव में बंधन का एक पर्व है – मिट्टी के साथ मनुष्य का बंधन, परिवार और समाज का बंधन, और अतीत के साथ वर्तमान का बंधन। यह कृतज्ञता और जीवन के उत्सव का एक विचारोत्तेजक त्योहार है। यह हमें उन मूल्यों को याद दिलाता है कि कैसे हम अपने लोगों और प्रकृति के साथ जुड़े रह सकते हैं, खासकर आधुनिक जीवन की दौड़-भाग में।

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Nuakhai

Ganesh Chaturthi August 2025 : गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि

Ganesh Chaturthi: हिंदू धर्म में, भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है, जिनकी पूजा हर शुभ कार्य से पहले की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को उनके जन्मोत्सव के रूप में Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन से 10 दिवसीय गणेश महोत्सव का प्रारंभ होता है, जो अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा के विसर्जन के साथ समाप्त होता है। यह पर्व महाराष्ट्र और गुजरात सहित देश के कई राज्यों में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश की पूजा करने से भक्तों के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही, कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है और आर्थिक संकट भी दूर होते हैं। भगवान गणेश को रिद्धि-सिद्धि के दाता और सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाला माना जाता है। उन्हें विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता भी कहा जाता है, जिससे उनके मंगल प्रवेश से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और मंगल ही मंगल होता है। इस साल, गणेश चतुर्थी 27 अगस्त 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। गणेश स्थापना भी इसी दिन होगी और गणेश विसर्जन 6 सितंबर 2025, शनिवार को होगा। Ganesh Chaturthi 2025: Auspicious time: गणेश चतुर्थी 2025: शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, गणेश चतुर्थी की तिथि और पूजा के लिए शुभ समय इस प्रकार है: • चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: 26 अगस्त 2025 को दोपहर 01 बजकर 54 मिनट पर। • चतुर्थी तिथि का समापन: 27 अगस्त 2025 को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर। • गणेश चतुर्थी का दिन: सनातन धर्म में उदया तिथि का मान होता है, इसलिए Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी 27 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें गणेश पूजा के लिए चौघड़िया अनुसार शुभ मुहूर्त: • अमृत मुहूर्त: सुबह 07:33 से 09:09 के बीच। • शुभ मुहूर्त: सुबह 10:46 से दोपहर 12:22 के बीच। • शाम की पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 06:48 से 07:55 के बीच। • राहु काल: दोपहर 12:22 से 01:59 के बीच। इस समय स्थापना और पूजा करने से बचना चाहिए।   विशेष नोट: गणेश पूजन के लिए वैसे मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11:05:15 से 13:39:46 के बीच है, लेकिन इस बीच राहु काल भी रहेगा, इसलिए चौघड़िया मुहूर्त को प्राथमिकता देना उचित रहेगा। गणेश चतुर्थी 2025 पर बन रहे शुभ योग:Auspicious events are taking place on Ganesh Chaturthi 2025: ज्योतिषियों के अनुसार, Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी 2025 पर कई दुर्लभ शुभ योगों का निर्माण हो रहा है: • शुभ योग: इस योग का संयोग दोपहर तक रहेगा। • शुक्ल योग: यह योग 28 अगस्त को दोपहर 01 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगा। • सर्वार्थ सिद्धि योग: शुक्ल योग के बाद सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी तिथि पर यह योग सुबह 06 बजकर 04 मिनट पर निर्मित होगा। • भद्रावास योग: इस योग का समापन दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर होगा। 27 अगस्त 2025 का पंचांग विवरण: • सूर्योदय: सुबह 06 बजकर 28 मिनट पर। • सूर्यास्त: शाम 06 बजकर 14 मिनट पर। • चंद्रोदय: सुबह 08 बजकर 52 मिनट पर। • चंद्रास्त: शाम 08 बजकर 28 मिनट पर। • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 03 बजकर 58 मिनट से 04 बजकर 43 मिनट तक। • विजय मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 58 मिनट से 02 बजकर 49 मिनट तक। • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 14 मिनट से 06 बजकर 36 मिनट तक। • निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर 28 मिनट से 12 बजकर 13 मिनट तक। Auspicious entry and establishment method of Ganpati ji in the house:गणपति जी का घर में मंगल प्रवेश और स्थापना विधि: गणपति बप्पा को प्रसन्न करने और जीवन में मंगल लाने के लिए उनका घर में विधि-विधान से मंगल प्रवेश करवाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1. स्थान की तैयारी:     श्री गणेश जी के आगमन से पहले घर-द्वार और मंदिर को अच्छी तरह सजाएं।     जिस स्थान पर गणेश जी को स्थापित करना है, उस जगह की साफ-सफाई करें।     उस स्थान पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और हल्दी से चार बिंदियां बनाएं।      एक मुट्ठी अक्षत (चावल) रखें और उस पर एक छोटा बाजोट, चौकी या लकड़ी का पाट रखकर उस पर पीला, लाल या केसरिया वस्त्र बिछाएं।     पूजा और आरती का सारा सामान पहले से ही खरीद कर तैयार रखें। 2. मूर्ति खरीदने के लिए प्रस्थान:      बाजार जाने से पहले नवीन वस्त्र धारण करें, सिर पर टोपी या साफा बांधें और रुमाल भी रखें।      पीतल या तांबे की थाली साथ ले जाएं, या फिर लकड़ी का पाट ले जाएं जिस पर गणेश जी को बैठाकर घर लाना है।      घंटी और मंजीरा भी साथ ले जाएं। 3. गणेश प्रतिमा का चयन:      मूर्ति खरीदते समय ध्यान रखें कि गणेश जी की प्रतिमा बैठी हुई हो।     उनके साथ उनका वाहन चूहा और रिद्धि-सिद्धि भी होनी चाहिए।      प्रतिमा सफेद या सिंदूरी रंग की हो।     सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई हो।      गणेश जी पितांबर या लाल परिधान पहने हुए हों और उनके हाथ में लड्डू का थाल हो। इन बातों का ध्यान रखते हुए ही मूर्ति खरीदना उचित रहता है।     बाजार में गणेश जी की जो भी मूर्ति पसंद आए, उसका मोलभाव न करें। उन्हें आगमन के लिए निमंत्रित करके दक्षिणा दे दें। 4. घर में मंगल प्रवेश      गणेश जी की प्रतिमा को धूमधाम से घर के द्वार पर लाएं।     द्वार पर ही उनकी आरती उतारें।      यदि याद हों तो मंगल गीत गाएं या शुभ मंत्रों का उच्चारण करें।   इसके बाद “गणपति बप्पा मोरया!” के नारे लगाते हुए उन्हें घर के अंदर ले आएं और Ganesh Chaturthi प्रसन्नचित्त होकर पहले से तैयार किए गए स्थान पर विराजित कर दें। गणेश चतुर्थी की पूजा विधि:Worship method of Ganesh Chaturthi मंगल प्रवेश के बाद, विधिवत तरीके से भगवान गणेश की पूजा और आरती करें। भक्तजन अपने घरों पर गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा एवं आरती करते हैं। पूजा में धूप, दीप, फूल, फल, मोदक या लड्डू आदि अर्पित करें। इस तरह से Ganesh Chaturthi गणेश जी का मंगल प्रवेश और स्थापना करने से जीवन के सभी

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Rishi Panchami 2025 Date: कब है ऋषि पंचमी? जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

Rishi Panchami 2025: ऋषि पंचमी व्रत का महत्व हिन्दू धर्म में दोषों से मुक्त होने के लिए किया जाता हैं। यह एक त्यौहार नहीं अपितु एक व्रत हैं, इस व्रत में सप्त-ऋषियों की पूजा-अर्चना की जाती हैं। हिन्दू धर्म में माहवारी के समय, स्त्रियों द्वारा बहुत से नियम नियमों का पालन किया जाता हैं। अगर गलती वश इस समय में कोई चूक हो जाती हैं, तो महिलाओं को दोष मुक्त करने के लिए ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। ऋषि पंचमी 2025: कब है? जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि:Rishi Panchami 2025: When is it? Know the importance, auspicious time and method of worship हिंदू धर्म में, ऋषि पंचमी (Rishi Panchami) का त्योहार एक विशेष महत्व रखता है, खासकर महिलाओं के लिए। यह पर्व भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। हर साल यह पर्व गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन पड़ता है। इस साल, ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह व्रत सप्तऋषियों (वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज) के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए रखा जाता है, जिन्होंने वेदों की शिक्षा दी और सनातन धर्म का मार्गदर्शन किया। Significance of Rishi Panchami: Freedom from sins and happy life: ऋषि पंचमी का महत्व: पापों से मुक्ति और सुखमय जीवन Rishi Panchami ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान यदि किसी महिला से अनजाने या जानबूझकर कोई धार्मिक नियम का उल्लंघन हुआ हो, तो यह व्रत उन दोषों का निवारण करता है और शुद्धता की प्राप्ति होती है। यह व्रत नारी शक्ति के सम्मान और पवित्रता को संजोए रखने का प्रतीक है। इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि ऋषि पंचमी Rishi Panchami का व्रत करने से लोगों को संतान प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है। साथ ही, घर में तुलसी पूजन करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे ऋषियों का आशीर्वाद और पवित्रता प्राप्त होती है। 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें ऋषि पंचमी 2025: शुभ मुहूर्त: Rishi Panchami 2025: Auspicious time हिंदू पंचांग के अनुसार, ऋषि पंचमी की पंचमी तिथि और पूजा का शुभ समय इस प्रकार है: • पंचमी तिथि का आरंभ: 27 अगस्त 2025 को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर। • पंचमी तिथि का समापन: 28 अगस्त 2025 को शाम 5 बजकर 56 मिनट तक। • ऋषि पंचमी का दिन: उदया तिथि के अनुसार, ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025 को ही मनाई जाएगी। • पूजन मुहूर्त: 28 अगस्त 2025 को सुबह 11 बजकर 5 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 39 मिनट तक रहेगा। ऋषि पंचमी पूजन विधि: चरण-दर-चरण:Rishi Panchami Puja Method: Step by Step ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा-अर्चना करने से सभी दोष दूर होते हैं। यहां जानिए पूजन की संपूर्ण विधि: 1. सुबह स्नान और संकल्प: इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 2. मंदिर की सफाई: अपने मंदिर की अच्छी तरह सफाई करें, जिससे ग्रंथों की पवित्रता बनी रहे। 3. देवी-देवताओं को स्नान: सभी देवी-देवताओं को गंगाजल से स्नान करवाएं, जिससे उनका स्थान और भी पवित्र हो जाए। 4. सप्तऋषियों की स्थापना: पूजा स्थल पर मिट्टी का चौकोर मंडल बनाकर, उस पर सप्तऋषियों की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि प्रतिमा न हो, तो सात छोटे पात्रों में जल, चावल, पुष्प और अन्य पूजा सामग्री रखकर उनका प्रतीकात्मक रूप से पूजन कर सकते हैं। उनकी तस्वीर के सामने साफ पानी भरा एक कलश रखें। 5. अभिषेक और पूजन: सप्तऋषियों का गंगाजल, दूध, पंचामृत और शुद्ध जल से अभिषेक करें या छींटे लगाएं। 6. तिलक और धूप-दीप: सप्तऋषियों के माथे पर तिलक लगाएं। फिर धूप और दीपक दिखाएं, ताकि वातावरण पवित्र और शांत बना रहे। 7. पुष्प और सामग्री अर्पित करें: पूजा के दौरान पुष्प, जनेऊ, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। सप्तऋषियों के नाम ध्यान में लेते हुए उन पर पुष्प अर्पित करें। 8. भोग और कथा: पूजा के बाद सप्तऋषियों को मिठाई का भोग लगाएं। 9. व्रत कथा और आरती: अंत में व्रत की कथा सुनें और फिर आरती करें। 10. तुलसी पूजन: इस दिन तुलसी के पौधे के सामने दीप जलाकर उसकी पूजा करें और 108 परिक्रमा करें। ऋषि पंचमी व्रत से प्राप्त होने वाले फल:Results obtained from Rishi Panchami fast ऋषि पंचमी व्रत का पालन करने से जीवन में शुद्धता और सात्विकता की प्राप्ति होती है। जो महिलाएं इस व्रत को करती हैं, उन्हें धार्मिक पवित्रता का लाभ मिलता है और पूर्व जन्मों के दोष भी समाप्त होते हैं। इसके साथ ही, ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

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Hartalika Teej

Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें

Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज का पर्व विशेष महत्व माना जाता है जो माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए एक उत्तम तिथि है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा किया जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं मां पार्वती को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करती हैं जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। Hartalika Teej 2025: हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष महत्व है। साल में कुल 3 तीज पड़ती है, जिसे हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज कहा जाता है। हरियाली तीज श्रावण मास में पड़ती है, तो कजरी और हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास को रखा जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती है। Hartalika Teej 2025 Date इसके साथ ही अविवाहित  महिलाएं अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए इस व्रत को रखने की विधान है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा करने का विधान है। आइए जानते हैं हरतालिका तीज की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, मंत्र और धार्मिक महत्व… Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज हरतालिका तीज मुहूर्त (Hartalika Teej shubh muhurat) भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का प्रारम्भ 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 34 मिनट पर हो रहा है। साथ ही इस तिथि का समापन 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, हरतालिका तीज का पर्व मंगलवार, 26 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन गौरी-शंकर की पूजा का मुहूर्त कुछ इस प्रकार रहने वाला है – हरितालिका पूजा मुहूर्त – प्रातः 5 बजकर 56 मिनट से सुबह 8 बजकर 31 मिनट तक गौरी-शंकर पूजा विधि (Shiv-Parvati Puja) हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के पश्चात् साफ-सुथरे विशेषकर हरे या लाल रंग के वस्त्र पहनें। शुभ मुहूर्त में पूजा स्थान पर चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं और स्वयं द्वारा बनाई गई माता पर्वती, भगवान शिव और गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति स्थापित करें। सबसे पहले गणेश जी का विधिवत पूजन करें और इसके बाद गौरी-शंकर की विधि-विधान से पूजन करें। पूजा में मां गौरी को 16 शृंगार की सामग्री अर्पित करें और हरतालिका तीज व्रत कथा जरूर सुनें। आप पूजा में इन मंत्रों का जप भी कर सकते हैं – हरतालिका तीज पर बन रहे शुभ योग (Hartalika Teej 2025 Shubh Yog) इस साल हरतालिका तीज Hartalika Teej पर काफी शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। इस दिन चंद्रमा मंगल के साथ कन्या राशि में होंगे, जिससे महालक्ष्मी राजयोग बन रहा है। इसके अलावा इस दिन  हस्त नक्षत्र के साथ साध्य, शुभ योग बन रहा है। इसके साथ ही इस दिन सूर्य अपनी स्वराशि सिंह राशि में विराजमान रहेंगे। रतालिका तीज 2025 पर करें इन मंत्रों का जाप (Hartalika Teej 2025 Mantra) देवी पार्वती का मंत्रऊं उमयेए पर्वतयेए जग्दयेए जगत्प्रथिस्थयेए स्हन्तिरुपयेए स्हिवयेए ब्रह्म रुप्नियेए” शिव मंत्रऊं ह्रयेए महेस्ह्अरयेए स्हम्भवे स्हुल् पद्येए पिनक्ध्रस्हे स्हिवये पस्हुपतये महदेवयअ नमह्” हरतालिका तीज व्रत विधि एवं नियम: Hartalika Teej Vrat Vidhi and Niyam हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं। विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम शुद्ध घी का दीपक जलाएं। तत्पश्चात सीधे (दाहिने) हाथ में अक्षत रोली बेलपत्र, मूंग, फूल और पानी लेकर इस मंत्र से संकल्प करें:उमामहेश्वरसायुज्य सिद्धये हरितालिका व्रत महं करिष्ये। इसके बाद कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं। उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका इसके बाद हरतालिका व्रत Hartalika Teej की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है। आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं। भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए:ॐ उमायै नम:ॐ पार्वत्यै नम:ॐ जगद्धात्र्यै नम:ॐ जगत्प्रतिष्ठयै नम:ॐ शांतिरूपिण्यै नम:ॐ शिवायै नम: भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए:ॐ हराय नम:ॐ महेश्वराय नम:ॐ शम्भवे नम:ॐ शूलपाणये नम:ॐ पिनाकवृषे नम:ॐ शिवाय नम:ॐ पशुपतये नम:ॐ महादेवाय नम: हरतालिका व्रत पूजन की सामग्री: Hartalika Vrat Pujan Ki Samgri फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।केले का पत्ता।विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।जनेऊ, नाडा, वस्त्र,।माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं। इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।घी, तेल, दीपक,

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Varaha Jayanti

Varaha Jayanti 2025 date: वराह जयंती 2025: बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव

Varaha Jayanti 2025 date:वराह जयंती भगवान विष्णु के तीसरे अवतार, वराह, के शक्तिशाली वराह रूप का उत्सव है। विष्णु का यह अवतार बुराई पर अच्छाई की अंतिम विजय और ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। प्राचीन इतिहास के अनुसार, भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए वराह रूप धारण किया था, जो राक्षस हिरण्याक्ष द्वारा ब्रह्मांडीय महासागर में डूब गई थी। यह त्योहार केवल इस महान घटना का स्मरणोत्सव ही नहीं है, बल्कि विपत्ति का सामना करने में धर्म, साहस और ईश्वरीय हस्तक्षेप के महत्व का स्मरण भी कराता है। वराह जयंती त्यौहार भगवान विष्णु के तीसरे अवतार का जन्म उत्सव मनाने के लिए होता है । दुनिया को बुराई से बचाने के लिए देवता ने सूअर के रूप में पुनर्जन्म लिया। अपने पुनर्जन्म का उद्देश्य धरती पर धर्म बहाल करना और निर्दोष लोगों को असुर और राक्षसों जैसे विभिन्न बुरी ताकतों से बचाने के लिए था। वराह जयंती की पूर्व संध्या पर कई अनुष्ठान होते हैं। Varaha Jayanti भक्त भगवान विष्णु की पूजा दूसरे दिन शुक्ला पक्ष के माघ महीने में या द्वितिया तीथी में करते हैं। भक्त अच्छे भाग्य से आशीर्वाद पाने और ब्रह्मांड के संरक्षक से आशीर्वाद लेने के लिए भारत भर के कई क्षेत्रों में भगवान विष्णु के सभी अवतारों का जश्न मनाते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं में, ऐसा माना जाता है कि भगवान वराह की पूजा करने से जातक को अत्यधिक धन, स्वास्थ्य और खुशी मिलती है। भगवान विष्णु के अवतार ने आधे मानव और आधे सूअर के रूप में सभी बुराइयों पर विजय प्राप्त की थी और हिरण्यक्ष को हराया था। इसलिए, इस दिन भक्त भगवान वराह की पूजा करते हैं और अपने जीवन से सभी बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। Varaha Jayanti 2025 date: वराह जयंती 2025: बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव Varaha Jayanti Kab Hai: वराह जयंती कब है? वर्ष 2025 में, वराह जयंती सोमवार, 25 अगस्त को पड़ रही है, जिस दिन विभिन्न आध्यात्मिक अनुष्ठानों, प्रार्थनाओं और भक्ति कार्यों का आयोजन किया जाएगा। यह शुभ अवसर भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो ब्रह्मांड की व्यवस्था बनाए रखने में भगवान विष्णु की भूमिका का सम्मान करने के लिए एकत्रित होते हैं। वराह जयंती का महत्व:Importance of Varaha Jayanti वराह जयंती केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अवसर है जिसका भक्तों के लिए अत्यधिक महत्व है। भगवान विष्णु के वराह अवतार के सम्मान में मनाया जाने वाला यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने में धर्म या नैतिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण महत्व को रेखांकित करता है। बुराई पर अच्छाई की विजय: victory of good over evil वराह जयंती Varaha Jayanti का मूल, दुष्ट शक्तियों पर धर्म की विजय का उत्सव है। हिरण्याक्ष नामक राक्षस पर भगवान वराह की विजय की कथा एक सशक्त अनुस्मारक है कि अंधकार की शक्तियाँ चाहे कितनी भी विकराल क्यों न लगें, अंततः धर्म और ईश्वरीय न्याय की ही विजय होगी।साहस, त्याग और धार्मिकता: वराह जयंती की कथा साहस, त्याग और न्याय की स्थापना के लिए अटूट प्रतिबद्धता की शिक्षाओं से भरपूर है। हिरण्याक्ष के विरुद्ध भगवान वराह के महाकाव्य युद्ध ने बुराई के विरुद्ध खड़े होने और व्यापक भलाई की रक्षा के लिए आवश्यक बलिदान देने का महत्व सिखाया है। भक्तगण इन मूल्यों का उत्सव मनाते हैं और इन्हें आत्मसात करते हैं, तथा सत्यनिष्ठा और साहस से भरा जीवन जीने के लिए प्रेरित होते हैं। आध्यात्मिक विकास और परिवर्तन:spiritual growth and transformation वराह जयंती के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान और प्रार्थनाएँ भक्तों को आध्यात्मिक विकास और आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करती हैं। इन पवित्र अनुष्ठानों में संलग्न होकर, भक्तों को संकट के समय ईश्वर की निरंतर उपस्थिति और हस्तक्षेप का स्मरण होता है। इससे आंतरिक परिवर्तन की भावना जागृत होती है और उनकी आध्यात्मिक यात्रा गहन होती है। समुदाय और दान: वराह जयंती समुदाय और दान के मूल्यों पर भी ज़ोर देती है। भक्तजन अनुष्ठानों में भाग लेने, प्रार्थना करने और दयालुता एवं दान के कार्यों में संलग्न होने के लिए एक साथ आते हैं। यह सामूहिक पूजा एकता की भावना को बढ़ावा देती है और एक-दूसरे, विशेषकर ज़रूरतमंदों, की सहायता करने के महत्व पर बल देती है। समृद्धि और प्रचुरता का आशीर्वाद:Blessings of prosperity and abundance अंततः, Varaha Jayanti वराह जयंती को समृद्धि और प्रचुरता का आशीर्वाद पाने के लिए एक शुभ दिन माना जाता है। भक्तों का मानना है कि भक्ति और ईमानदारी से अनुष्ठान करने से भगवान वराह का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उनके जीवन में सुरक्षा, समृद्धि और बाधाएँ दूर होती हैं और भविष्य में शांति और सफलता सुनिश्चित होती है। Where is Varaha Jayanti celebrated: वराह जयंती कहाँ मनाई जाती है? वराह जयंती Varaha Jayanti भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा और आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध तिरुमाला मंदिर में, धूमधाम से मनाई जाती है। प्राचीन हिंदू इतिहास से गहराई से जुड़ा शहर, मथुरा, भगवान विष्णु के वराह अवतार के सम्मान में पारंपरिक अनुष्ठानों और सामुदायिक समारोहों के साथ इस त्योहार को मनाता है। कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका Necessary materials of puja:पूजा की आवश्यक सामग्री वराह जयंती Varaha Jayanti समारोह का मुख्य भाग षोडशोपचार पूजा है, जो एक विस्तृत सोलह चरणों वाली पूजा प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न प्रसाद और अनुष्ठान शामिल हैं। भक्त पंचामृत—जल, दूध, दही, शहद और घी के मिश्रण—से भगवान वराह की मूर्ति का अभिषेक या अनुष्ठानिक स्नान करते हैं। यह अनुष्ठान एक प्रतीकात्मक शुद्धिकरण और श्रद्धा का कार्य है। अभिषेक के बाद देवता को कमल के फूल, चंदन, अक्षत, कुमकुम, पान और मेवे चढ़ाए जाते हैं। भक्त वराह सहस्रनाम (भगवान वराह के एक हजार नाम) या अन्य विष्णु मंत्रों का जाप करते हैं, जिससे आध्यात्मिक रूप से आवेशित वातावरण बनता है। पूजा का समापन आरती से होता है, एक अनुष्ठान जिसमें भक्त भजन गाते हुए देवता के सामने प्रज्वलित दीप लहराते हैं, जो अंधकार और अज्ञानता के नाश का प्रतीक है। Dhan:दान दान-पुण्य वराह जयंती Varaha Jayanti का एक अभिन्न अंग है। भक्तों का मानना है कि ज़रूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या आर्थिक दान देने से न केवल भगवान वराह प्रसन्न होते हैं, बल्कि समृद्धि और सुख का आशीर्वाद भी मिलता

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Kushotpatini Amavasya

Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम और तरीका

Kushotpatini Amavasya 2025 Date: भाद्रपद मास की अमावस्या को अत्यंत शुभ माना गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भाद्रपद मास की कुशोत्पाटिनी अमावस्या क्यों खास है. आइए जानते हैं इस अमावस्या का पौराणिक महत्व और इस दिन क्या करना शुभ रहेगा. Kushotpatini Amavasya 2025: हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को अत्यंत महत्व दिया गया है. अमावस्या ही एकमात्र ऐसी तिथि है जिससे पितृ पक्ष की शुरुआत मानी जाती है. परंपरा के अनुसार, पितृ पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान इत्यादि कर्म किए जाते हैं. भाद्रपद मास की अमावस्या इसलिए भी खास है Kushotpatini Amavasya क्योंकि इस दिन कुश नामक पवित्र घास को साल भर के धार्मिक कार्यों के लिए इकट्ठा किया जाता है. आइए जानते हैं कि इस साल भाद्रपद मास की कुशोत्पाटिनी अमावस्या कब है, क्यों खास है, इस दिन क्या करना शुभ फलदायी होता है. Kushotpatini Amavasya 2025 Date: कुशोत्पाटिनी अमावस्या : कुश घास को एकत्र करने के क्या हैं नियम कब है कुशोत्पाटिनी अमावस्या: Kab Hai Kushotpatini Amavasya दृक पंचांग के अनुसार, इस साल कुशोत्पाटिनी अमावस्या शनिवार 23 अगस्त को पड़ रही है. अमावस्या तिथि की शुरुआत 22 अगस्त को रात 11 बजकर 55 मिनट से शुरू होगी. जबकि, इस तिथि की समाप्ति 23 अगस्त को सुबह 11 बजकर 35 मिनट पर होगी. ऐसे में उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए इस साल कुशोत्पाटिनी अमावस्या शनिवार 23 अगस्त को मनाई जाएगी और इसी दिन पूरे साल भर धार्मिक कार्यों के लिए कुश इकट्ठा किया जाएगा. अमावस्या के दिन शनिवार पड़ने के कारण इसका महत्व और भी अधिक बढ़ गया है.  क्या है कुशोत्पाटिनी अमावस्या का धार्मिक महत्व: What is the religious significance of Kushotpatini Amavasya ? भाद्रपद अमावस्या को हिंदू धर्म में विशेष महत्व है. यह तिथि श्राद्ध पक्ष की शुरुआत का प्रतीक होती है. इस दिन से पितरों की शांति के लिए तर्पण, दान, और जप जैसे कर्म आरंभ किए जाते हैं. Kushotpatini Amavasya इसके अलावा इसी दिन इसी दिन से ‘कुश’ नामक पवित्र घास को धार्मिक कार्यों के लिए भूमि से विधिवत उखाड़ा जाता है. यही कारण है कि इसे कुश पितृणी अमावस्या भी कहा जाता है. पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने कुशा को धार्मिक कर्मों के लिए योग्य और पवित्र घोषित किया था. इसलिए इस दिन तोड़ी गई कुशा का उपयोग श्राद्ध, यज्ञ और तप में विशेष फलदायक होता है. 23 अगस्त को यह अमावस्या क्यों है खास: Why is this Amavasya on 23rd August special? हिंदू पंचांग के अनुसार, साल 2025 में यह अमावस्या शनिवार के दिन पड़ रही है, Kushotpatini Amavasya जिससे इसका स्वरूप शनि अमावस्या भी हो गया है. यह दिन उन लोगों के लिए अत्यंत फलदायी है जो शनि दोष, साढ़ेसाती, या जीवन में बार-बार आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाना चाहते हैं. इस दिन कौन-कौन से कार्य करें: What tasks should be done on this day? श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि, सभी 16 चरणों के सरल वैदिक मंत्रों के साथ कुश उखाड़ने का मंत्र: mantra to uproot kush “कुशाग्रह वस्ते रुद्रा कुश मध्य तू केशवह कुश मुले वसे ब्रह्म कुशानमें देही मेदिनी” कुशा उत्पत्ति कथा: Kusha origin story Kushotpatini Amavasya: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक समय हिरण्यकश्यप के बड़े भाई हिरण्याक्ष ने धरती का अपहरण कर लिया। हिरण्याक्ष पृथ्वी को पताल लोक ले गया राक्षस राज इतना शक्तिशाली था कि उसका कोई विरोध तक ना कर सका। तब धरती को मुक्त कराने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया तथा हिरण्याक्ष का वध कर धरती को मुक्त कराया। तथा पृथ्वी को पुनः अपनी पूर्व अवस्था में स्थापना किया। पृथ्वी की स्थापना करने के बाद भगवान वाराह बहुत भीग गए थे Kushotpatini Amavasya जिसके कारण उन्होंने अपने शरीर को बहुत तेज झटका, झटकने से उनके रोए टूटकर धरती पर जा गिरे जिससे कुशा की उत्पत्ति हुई। कुशा की जड़ में भगवान ब्रह्मा, मध्य भाग में भगवान विष्णु तथा शीर्ष भाग में भगवान शिव विराजते हैं। मान्यातानुसार कुशा को किसी साफ-सुथरे जल श्रोत अथवा पोखर से प्राप्त करना चाहिए। स्वयं को पूर्व की दिशा की तरफ मुंह करना चाहिए तथा अपने हाथ से कुशा को धीरे-धीरे उखाड़ना चाहिए है। ध्यान रहे कि यह साबुत ही रहे ऊपर की नोक भी ना टूटने पाए।

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Pithori Amavasya

Pithori Amavasya: पिठोरी अमावस्या 2025 कब है ?

Pithori Amavasya: पिठोरी अमावस्या 2025 कब है? जानें इस विशेष व्रत की तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा, जो माताएं संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए करती हैं। पिठोरी अमावस्या भाद्रपद मास की अमावस्या को मनाई जाती है। इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए पिठौरियों (छोटे आटे के पुतलों) की पूजा करती हैं। व्रत, कथा और विशेष भोजन का आयोजन होता है। Pithori Amavasya: हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह में पड़ने वाली अमावस्या को पिठोरी अमावस्या कहा जाता है। प्रत्येक माह में अमावस्या तिथि पड़ती है, जिसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है और विशेष महत्व भी होता है। पिठोरी अमावस्या पर पितृ तर्पण आदि धार्मिक कार्यों में कुश का प्रयोग किया जाता है, इसलिए इसे कुश अमावस्या भी कहा जाता है। इस अमावस्या पर पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष से होने वाली परेशानियों से मुक्ति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसके अलावा इस दिन महिलाएं मां दुर्गा की उपासना करती हैं और अपने पुत्रों की लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। Pithori Amavasya: पिठोरी अमावस्या 2025 कब है ? Pithori Amavasya auspicious time and date: पिठोरी अमावस्या शुभ मुहूर्त व तिथि इस दिन के अन्य शुभ मुहूर्त:Other auspicious times of this day Pithori Amavasya Kya Hai:क्या है पिठोरी अमावस्या? पिठोरी अमावस्या भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला एक विशेष व्रत है, जो मुख्य रूप से मातृत्व और संतान सुख से जुड़ा हुआ है। इस दिन महिलाएं विशेष रूप से मां दुर्गा और 64 योगिनियों की पूजा करती हैं। व्रती स्त्रियां आटे से देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाकर विधिपूर्वक पूजन करती हैं, इसी कारण इस पर्व को ‘पिठोरी अमावस्या‘ कहा जाता है — ‘पिठो’ शब्द का अर्थ होता है आटा। Kyo Manai Jati HAi Pithori Amavasya: क्यों मनाई जाती है पिठोरी अमावस्या? पिठोरी अमावस्या का व्रत स्त्रियां अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना से करती हैं। वहीं जो महिलाएं संतान प्राप्ति की इच्छुक होती हैं, वे भी इस दिन व्रत रखकर माता दुर्गा और भगवान शिव की आराधना करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान संबंधी सभी कष्ट दूर होते हैं और मातृत्व सुख प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त इस दिन घर में धार्मिक कार्यों के लिए पवित्र कुशा एकत्र करने की परंपरा भी है, इसलिए यह तिथि कुशोत्पाटिनी अमावस्या या कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी प्रसिद्ध है। Importance of Pithori Amavasya:पिठोरी अमावस्या का महत्व पौराणिक मान्यता के अनुसार पिठोरी व्रत का माहात्म्य स्वयं माता पार्वती ने बताया था, और सर्वप्रथम इस व्रत को इंद्राणी (देवराज इंद्र की पत्नी) देवी शची ने किया था। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें न केवल संतान सुख प्राप्त हुआ, बल्कि सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य का भी वरदान मिला। इस व्रत के माध्यम से स्त्रियां न केवल अपनी संतान की रक्षा के लिए देवी शक्ति का आह्वान करती हैं, बल्कि अपने जीवन में आध्यात्मिक और मानसिक संतुलन भी प्राप्त करती हैं। यह दिन मातृत्व के सम्मान और संतान के कल्याण हेतु समर्पित होता है। Where is Pithori Amavasya celebrated:कहां- कहां मनायी जाती है पिठोरी अमावस्या Pithori Amavasya: पिठोरी अमावस्या देश भर में किसी न किसी रुप में मनायी जाती रही है। उत्तरी भारत में ये पर्व भाद्रपद अमावस्या या कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से मनाया जाता है। वहीं आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, कर्नाटक एवं तमिलनाडु में पिठोरी अमावस्या को पोलाला अमावस्या कहा जाता है। इस दिन दक्षिण भारत में देवी पोलेरम्मा की उपासना की जाती है। देवी पोलेरम्मा को माता पार्वती का एक ही रूप माना जाता है। इसके अलावा इस दिन सप्तमातृकाओं के पूजन की भी परंपरा है। विशेष रूप से ये पूजा दक्षिण भारत में प्रचलित है। सात देवियों, ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, इन्द्राणी, कौमारी, वाराही, चामुण्डा अथवा नारसिंही को ‘मातृका’ कहा जाता है। Pooja material for Pithori Amavasya Puja:पिठोरी अमावस्या पूजा की पूजन सामग्री Whom to worship on Pithori Amavasya:पिठोरी अमावस्या पर किसकी पूजा करें? Rituals of Pithori Amavasya:पिठोरी अमावस्या की पूजाविधि स्नान व संकल्प: प्रातः काल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें – संतान सुख, रक्षा व ऐश्वर्य की कामना के साथ। आटे से मूर्तियां बनाएं: पूजा से पूर्व गेंहू के आटे से मां दुर्गा, भगवान शिव और 64 योगिनियों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाएं। इन्हें चौकी पर पीले वस्त्र बिछाकर स्थापित करें। कलश स्थापना: एक पवित्र कलश में जल भरकर आम या अशोक के पत्ते रखें और नारियल स्थापित करें। पूजन आरंभ करें: सबसे पहले गणेशजी का स्मरण करें। फिर 64 योगिनियों के साथ मां दुर्गा और भगवान शिव की पूजा करें। उन्हें जल, अक्षत, फूल, रोली, हल्दी, मिठाई, धूप-दीप आदि समर्पित करें। व्रत कथा श्रवण करें: पिठोरी अमावस्या व्रत कथा अवश्य पढ़ें या सुनें। इस कथा में देवी शची और माता पार्वती द्वारा व्रत का उल्लेख होता है। आरती करें और प्रार्थना करें: अंत में दीप जलाकर आरती करें और परिवार की रक्षा, संतान की लंबी उम्र व सुखद भविष्य की प्रार्थना करें। प्रतिमाओं का विसर्जन: पूजा के बाद आटे से बनी मूर्तियों का विसर्जन किसी पवित्र स्थान या नदी में करें या उन्हें गऊ माता को अर्पित करें। पिठोरी अमावस्या पर होने वाले अनुष्ठान:Rituals performed on Pithori Amavasya पिठोरी अमावस्या पूजा के लाभ:Benefits of Pithori Amavasya Puja संतान सुख की प्राप्ति: इस व्रत से उन दंपत्तियों को विशेष लाभ मिलता है जो संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं। संतान की रक्षा और दीर्घायु: माताएं यह व्रत अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखद जीवन के लिए करती हैं। पारिवारिक सुख-शांति: इस दिन देवी-देवताओं की पूजा से घर में समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। कर्ज़ और संकटों से मुक्ति: पिठोरी अमावस्या पर की गई पूजा व्यक्ति को पूर्व जन्मों के पापों और वर्तमान जीवन की बाधाओं से राहत दिला सकती है। मनोकामनाओं की पूर्ति: यह व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए तो मनचाही इच्छाएं पूर्ण होती हैं। What should be done on the day of Pithori Amavasya: पिठोरी अमावस्या के दिन क्या करना चाहिए? What not to do on the day of Pithori Amavasya: पिठोरी अमावस्या के दिन क्या न करें? तो यह थी Pithori Amavasya पिठोरी अमावस्या व्रत की संपूर्ण जानकारी। हमारी कामना है कि आपका ये व्रत व पूजा-अर्चना सफल हो, और माता दुर्गा की कृपा आप पर

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Pradosh Vrat 2025

Pradosh Vrat 2025 Date: भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत कब है? यहां पता करें शुभ मुहूर्त और योग

Pradosh Vrat 2025: भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए भक्तगण हर महीने प्रदोष व्रत रखते हैं। यह पवित्र व्रत प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और चूंकि हर महीने में दो त्रयोदशी तिथियां होती हैं, इसलिए साल में कुल 24 प्रदोष व्रत पड़ते हैं। आइए आपको बताते हैं कि अगस्त महीने में कब-कब यह व्रत रखा जाएगा। साथ ही, पूरे साल की तिथियों के बारे में भी यहां जानकारी लें। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का खास महत्व है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके उनकी कृपा पाने के लिए रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त इस दिन पूरी श्रद्धा से पूजा करते हैं, उन्हें अच्छे फल मिलते हैं। यह व्रत दुखों को दूर करने, अच्छी सेहत और सुख-शांति पाने के लिए बहुत शुभ माना जाता है। भाद्रपद महीना बेहद खास होता है। यह महीना जगत के पालनहार भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वहीं, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्रीजी यानी राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। Pradosh Vrat 2025 इससे पहले शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के अगले दिन गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस शुभ अवसर पर भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इस माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत मनाया जाता है। इस दिन देवों के देव महादेव की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। आइए, भाद्रपद माह के पहले प्रदोष व्रत की सही डेट और शुभ मुहूर्त जानते हैं- Pradosh Vrat 2025 Date: भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत कब है? यहां पता करें शुभ मुहूर्त और योग कब है प्रदोष व्रत? (Pradosh Vrat 2025 Kab Hai) भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत बुधवार के दिन पड़ने वाला है। इसके लिए यह बुध प्रदोष व्रत कहलाएगा। बुध प्रदोष व्रत करने से मचाही मुराद पूरी होती है। साथ ही कारोबार संबंधी परेशानी दूर होती है। साधक श्रद्धा भाव से Pradosh Vrat 2025 प्रदोष व्रत के दिन शिव परिवार की पूजा करते हैं। भाद्रपद महीना बेहद खास होता है। यह महीना जगत के पालनहार भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। Pradosh Vrat 2025 इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वहीं, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्रीजी यानी राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat Shubh Muhurat) भाद्रपद महीने का Pradosh Vrat 2025 पहला प्रदोष व्रत 20 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि दोपहर 01 बजकर 58 मिनट पर शुरू होगी और 21 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 44 मिनट पर समाप्त होगी। इस प्रकार 20 अगस्त के दिन बुध प्रदोष व्रत मनाया जाएगा। 20 अगस्त के दिन पूजा का समय शाम 06 बजकर 56 मिनट से लेकर 09 बजकर 07 मिनट तक है। साधक अपनी सुविधा अनुसार समय पर स्नान-ध्यान कर देवों के देव महादेव और जगत की देवी मां पार्वती की पूजा कर सकते हैं। वहीं, प्रदोष काल में महादेव की पूजा- आरती अवश्य करें।  What is effective in Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत में क्या खाएं? त्रयोदशी तिथि के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करें और महादेव का ध्यान कर व्रत का संकल्प लें। प्रदोष व्रत के दौरान खानपान (Pradosh Vrat me kya kya khaye) के नियम का पालन करना चाहिए। Pradosh Vrat 2025 व्रत के दौरान संतरा, केला, सेब समेत आदि चीजों का सेवन कर सकते हैं। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है साथ ही दूध, दही, सिंघाड़े का हलवा, साबूदाना की खिचड़ी, कुट्टू के आटे की पूड़ी भी व्रत थाली में शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा नारियल पानी और समा चावल की खीर भी खा सकते हैं। What not to eat during Pradosh fast: प्रदोष व्रत में क्या न खाएं? प्रदोष व्रत के दिन लहसुन और प्याज (Pradosh Vrat me kya nahi khaye) का सेवन करने की सख्त मनाही है। इस दिन मांस मदिरा का सेवन भी नहीं करना चाहिए। इसके अलावा व्रत के दौरान गेहूं, चावल का सेवन करने से करना बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इन चीजों का सेवन करने से व्रत खंडित हो सकता है और जातक को महादेव की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

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Narayana Guru Jayanti

Sree Narayana Guru Jayanti 2025 Date: श्री नारायण गुरु जयंती

Narayana Guru Jayanti: श्री नारायण जयंती केरल का एक राज्य त्योहार है। यह मलयालम कैलेंडर के चिंगम महीने में ओणम के मौसम के दौरान छठयम दिवस पर मनाया जाता है। श्री नारायण गुरु जयंती केरल राज्य में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक अवकाश है। यह नारायण गुरु के जन्मदिन का उत्सव है, जो एक समाज सुधारक और संत थे। जहां उन्होंने आध्यात्मिक उत्थान के लिए ध्यान-साधना में खुद को लीन कर लिया, वहीं उन्होंने केरल में उन लोगों के सशक्तिकरण के लिए भी काम किया, जो जातिगत पूर्वाग्रहों के कारण पददलित थे। Narayana Guru Jayanti श्री नारायण गुरु ने आदि शंकराचार्य के नक्शेकदम पर चलते हुए सांप्रदायिक सद्भाव और सार्वभौमिक भाईचारे को अपनाया और प्रचारित किया। Sree Narayana Guru Jayanti 2025 Date: श्री नारायण गुरु जयंती श्री नारायण गुरु जयंती तिथि: बुधवार, 20 अगस्त 2025 केरल में श्री नारायण गुरु जयंती कैसे मनाई जाती है श्री नारायण जयंती पूरे केरल राज्य में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। Narayana Guru Jayanti यह राज्य श्री नारायण गुरु के मंदिरों से भरा पड़ा है।इस दिन, मंदिरों के साथ-साथ सड़कों के लंबे हिस्सों को विशेष रूप से सूखे नारियल के पत्तों का उपयोग करके पुष्पांजलि से सजाया जाता है। लोग महान गुरु की याद में सामंजस्यपूर्ण जुलूस निकालते हैं। गरीबों और वंचितों पर विशेष जोर देते हुए सामुदायिक दावतों का आयोजन किया जाता है। Narayana Guru Jayanti यहां आम प्रार्थनाएं भी आयोजित की जाती हैं जिनमें जाति या पंथ से परे लोग शामिल होते हैं।शैक्षणिक संस्थानों और अन्य संगठनों में विशेष सम्मेलन या सेमिनार भी आयोजित किए जाते हैं। ये बातचीत और चर्चाएँ लोगों को उनकी शिक्षाओं और दर्शन की याद दिलाती हैं। श्री नारायण जयंती समारोह श्री नारायण जयंती पूरे केरल राज्य में बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। राज्य श्री नारायण गुरु के मंदिरों से भरा पड़ा है। इस दिन, मंदिरों के साथ-साथ सड़कों के लंबे-चौड़े हिस्सों को विशेष रूप से सूखे नारियल के पत्तों से पुष्पांजलि अर्पित करके सजाया जाता है। Narayana Guru Jayanti लोग महान गुरु की स्मृति में सौहार्दपूर्ण जुलूस निकालते हैं। गरीबों और वंचितों के लिए विशेष रूप से सामुदायिक भोज आयोजित किए जाते हैं। Narayana Guru Jayanti इसके अलावा, सामूहिक प्रार्थनाएँ भी आयोजित की जाती हैं जिनमें जाति या धर्म के भेदभाव के बिना सभी लोग शामिल होते हैं। शैक्षणिक संस्थानों और अन्य संगठनों में विशेष सम्मेलन या सेमिनार भी आयोजित किए जाते हैं। ये वार्ताएँ और चर्चाएँ लोगों को उनकी शिक्षाओं और दर्शन की याद दिलाती हैं। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है श्री नारायण गुरु की विरासत श्री नारायण गुरु का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब केरल के समाज में जाति व्यवस्था व्याप्त थी। एझावा जाति में जन्मे, जिसे निचली जाति माना जाता था, उन्होंने समाज के उच्च जाति वर्ग द्वारा अपने साथ किए जाने वाले भेदभाव का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। मलयालम में उनकी सबसे प्रसिद्ध उक्ति का अनुवाद है, “एक जाति, एक धर्म, सबके लिए एक ईश्वर”। नारायण गुरु ने तथाकथित निम्न जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए राज्य भर में 40 से ज़्यादा मंदिरों का प्राण-प्रतिष्ठा किया। जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ प्रसिद्ध “वैकोम सत्याग्रह” आंदोलन, जो वैकोम स्थित श्री महादेव मंदिर के इर्द-गिर्द केंद्रित था, एक ऊँची जाति के व्यक्ति द्वारा नारायण गुरु को प्रसिद्ध मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर चलने से रोकने के कारण शुरू हुआ था। Narayana Guru Jayanti इसके परिणामस्वरूप अंततः सभी प्रतिबंध हटा दिए गए और सभी को, चाहे उनकी जाति कुछ भी हो, मंदिर की ओर जाने वाले सार्वजनिक रास्तों पर चलने की आज़ादी दी गई। शिवगिरि तीर्थयात्रा 1924 में उनके आशीर्वाद से स्वीकृत हुई और उनके तीन शिष्यों द्वारा आरंभ की गई और आज भी जारी है। गुरु के मार्गदर्शन में, यह तीर्थयात्रा स्वच्छता, शिक्षा, भक्ति, कृषि, हस्तशिल्प और व्यापार के गुणों को बढ़ावा देने के लिए की जाती है। तीन प्रमुख पवित्र ग्रंथों का अनुवाद करने के साथ-साथ उन्होंने मलयालम, तमिल और संस्कृत में अपनी 40 से अधिक कृतियाँ भी प्रकाशित कीं। श्री नारायण गुरु ने आदि शंकराचार्य के पदचिन्हों पर चलते हुए सांप्रदायिक सद्भाव और सार्वभौमिक बंधुत्व को मूर्त रूप दिया और उसका प्रचार किया। केरल का एक अधिक मानवीय और समतावादी समाज के रूप में विकास इन्हीं पदचिन्हों पर आधारित था। श्री नारायण गुरु का देहांत 20 सितंबर 1928 को हुआ। आज, यह दर्शन केरल राज्य के लिए जीवन पद्धति है।

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