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Pradosh Vrat 2025

Pradosh Vrat 2025 Date: भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत कब है? यहां पता करें शुभ मुहूर्त और योग

Pradosh Vrat 2025: भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए भक्तगण हर महीने प्रदोष व्रत रखते हैं। यह पवित्र व्रत प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और चूंकि हर महीने में दो त्रयोदशी तिथियां होती हैं, इसलिए साल में कुल 24 प्रदोष व्रत पड़ते हैं। आइए आपको बताते हैं कि अगस्त महीने में कब-कब यह व्रत रखा जाएगा। साथ ही, पूरे साल की तिथियों के बारे में भी यहां जानकारी लें। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का खास महत्व है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके उनकी कृपा पाने के लिए रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त इस दिन पूरी श्रद्धा से पूजा करते हैं, उन्हें अच्छे फल मिलते हैं। यह व्रत दुखों को दूर करने, अच्छी सेहत और सुख-शांति पाने के लिए बहुत शुभ माना जाता है। भाद्रपद महीना बेहद खास होता है। यह महीना जगत के पालनहार भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वहीं, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्रीजी यानी राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। Pradosh Vrat 2025 इससे पहले शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के अगले दिन गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस शुभ अवसर पर भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इस माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत मनाया जाता है। इस दिन देवों के देव महादेव की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। आइए, भाद्रपद माह के पहले प्रदोष व्रत की सही डेट और शुभ मुहूर्त जानते हैं- Pradosh Vrat 2025 Date: भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत कब है? यहां पता करें शुभ मुहूर्त और योग कब है प्रदोष व्रत? (Pradosh Vrat 2025 Kab Hai) भाद्रपद महीने का पहला प्रदोष व्रत बुधवार के दिन पड़ने वाला है। इसके लिए यह बुध प्रदोष व्रत कहलाएगा। बुध प्रदोष व्रत करने से मचाही मुराद पूरी होती है। साथ ही कारोबार संबंधी परेशानी दूर होती है। साधक श्रद्धा भाव से Pradosh Vrat 2025 प्रदोष व्रत के दिन शिव परिवार की पूजा करते हैं। भाद्रपद महीना बेहद खास होता है। यह महीना जगत के पालनहार भगवान कृष्ण को समर्पित होता है। Pradosh Vrat 2025 इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। वहीं, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर श्रीजी यानी राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat Shubh Muhurat) भाद्रपद महीने का Pradosh Vrat 2025 पहला प्रदोष व्रत 20 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि दोपहर 01 बजकर 58 मिनट पर शुरू होगी और 21 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 44 मिनट पर समाप्त होगी। इस प्रकार 20 अगस्त के दिन बुध प्रदोष व्रत मनाया जाएगा। 20 अगस्त के दिन पूजा का समय शाम 06 बजकर 56 मिनट से लेकर 09 बजकर 07 मिनट तक है। साधक अपनी सुविधा अनुसार समय पर स्नान-ध्यान कर देवों के देव महादेव और जगत की देवी मां पार्वती की पूजा कर सकते हैं। वहीं, प्रदोष काल में महादेव की पूजा- आरती अवश्य करें।  What is effective in Pradosh Vrat:प्रदोष व्रत में क्या खाएं? त्रयोदशी तिथि के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती की विधिपूर्वक पूजा करें और महादेव का ध्यान कर व्रत का संकल्प लें। प्रदोष व्रत के दौरान खानपान (Pradosh Vrat me kya kya khaye) के नियम का पालन करना चाहिए। Pradosh Vrat 2025 व्रत के दौरान संतरा, केला, सेब समेत आदि चीजों का सेवन कर सकते हैं। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है साथ ही दूध, दही, सिंघाड़े का हलवा, साबूदाना की खिचड़ी, कुट्टू के आटे की पूड़ी भी व्रत थाली में शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा नारियल पानी और समा चावल की खीर भी खा सकते हैं। What not to eat during Pradosh fast: प्रदोष व्रत में क्या न खाएं? प्रदोष व्रत के दिन लहसुन और प्याज (Pradosh Vrat me kya nahi khaye) का सेवन करने की सख्त मनाही है। इस दिन मांस मदिरा का सेवन भी नहीं करना चाहिए। इसके अलावा व्रत के दौरान गेहूं, चावल का सेवन करने से करना बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इन चीजों का सेवन करने से व्रत खंडित हो सकता है और जातक को महादेव की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

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Narayana Guru Jayanti

Sree Narayana Guru Jayanti 2025 Date: श्री नारायण गुरु जयंती

Narayana Guru Jayanti: श्री नारायण जयंती केरल का एक राज्य त्योहार है। यह मलयालम कैलेंडर के चिंगम महीने में ओणम के मौसम के दौरान छठयम दिवस पर मनाया जाता है। श्री नारायण गुरु जयंती केरल राज्य में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक अवकाश है। यह नारायण गुरु के जन्मदिन का उत्सव है, जो एक समाज सुधारक और संत थे। जहां उन्होंने आध्यात्मिक उत्थान के लिए ध्यान-साधना में खुद को लीन कर लिया, वहीं उन्होंने केरल में उन लोगों के सशक्तिकरण के लिए भी काम किया, जो जातिगत पूर्वाग्रहों के कारण पददलित थे। Narayana Guru Jayanti श्री नारायण गुरु ने आदि शंकराचार्य के नक्शेकदम पर चलते हुए सांप्रदायिक सद्भाव और सार्वभौमिक भाईचारे को अपनाया और प्रचारित किया। Sree Narayana Guru Jayanti 2025 Date: श्री नारायण गुरु जयंती श्री नारायण गुरु जयंती तिथि: बुधवार, 20 अगस्त 2025 केरल में श्री नारायण गुरु जयंती कैसे मनाई जाती है श्री नारायण जयंती पूरे केरल राज्य में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। Narayana Guru Jayanti यह राज्य श्री नारायण गुरु के मंदिरों से भरा पड़ा है।इस दिन, मंदिरों के साथ-साथ सड़कों के लंबे हिस्सों को विशेष रूप से सूखे नारियल के पत्तों का उपयोग करके पुष्पांजलि से सजाया जाता है। लोग महान गुरु की याद में सामंजस्यपूर्ण जुलूस निकालते हैं। गरीबों और वंचितों पर विशेष जोर देते हुए सामुदायिक दावतों का आयोजन किया जाता है। Narayana Guru Jayanti यहां आम प्रार्थनाएं भी आयोजित की जाती हैं जिनमें जाति या पंथ से परे लोग शामिल होते हैं।शैक्षणिक संस्थानों और अन्य संगठनों में विशेष सम्मेलन या सेमिनार भी आयोजित किए जाते हैं। ये बातचीत और चर्चाएँ लोगों को उनकी शिक्षाओं और दर्शन की याद दिलाती हैं। श्री नारायण जयंती समारोह श्री नारायण जयंती पूरे केरल राज्य में बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। राज्य श्री नारायण गुरु के मंदिरों से भरा पड़ा है। इस दिन, मंदिरों के साथ-साथ सड़कों के लंबे-चौड़े हिस्सों को विशेष रूप से सूखे नारियल के पत्तों से पुष्पांजलि अर्पित करके सजाया जाता है। Narayana Guru Jayanti लोग महान गुरु की स्मृति में सौहार्दपूर्ण जुलूस निकालते हैं। गरीबों और वंचितों के लिए विशेष रूप से सामुदायिक भोज आयोजित किए जाते हैं। Narayana Guru Jayanti इसके अलावा, सामूहिक प्रार्थनाएँ भी आयोजित की जाती हैं जिनमें जाति या धर्म के भेदभाव के बिना सभी लोग शामिल होते हैं। शैक्षणिक संस्थानों और अन्य संगठनों में विशेष सम्मेलन या सेमिनार भी आयोजित किए जाते हैं। ये वार्ताएँ और चर्चाएँ लोगों को उनकी शिक्षाओं और दर्शन की याद दिलाती हैं। अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है श्री नारायण गुरु की विरासत श्री नारायण गुरु का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब केरल के समाज में जाति व्यवस्था व्याप्त थी। एझावा जाति में जन्मे, जिसे निचली जाति माना जाता था, उन्होंने समाज के उच्च जाति वर्ग द्वारा अपने साथ किए जाने वाले भेदभाव का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। मलयालम में उनकी सबसे प्रसिद्ध उक्ति का अनुवाद है, “एक जाति, एक धर्म, सबके लिए एक ईश्वर”। नारायण गुरु ने तथाकथित निम्न जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए राज्य भर में 40 से ज़्यादा मंदिरों का प्राण-प्रतिष्ठा किया। जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ प्रसिद्ध “वैकोम सत्याग्रह” आंदोलन, जो वैकोम स्थित श्री महादेव मंदिर के इर्द-गिर्द केंद्रित था, एक ऊँची जाति के व्यक्ति द्वारा नारायण गुरु को प्रसिद्ध मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर चलने से रोकने के कारण शुरू हुआ था। Narayana Guru Jayanti इसके परिणामस्वरूप अंततः सभी प्रतिबंध हटा दिए गए और सभी को, चाहे उनकी जाति कुछ भी हो, मंदिर की ओर जाने वाले सार्वजनिक रास्तों पर चलने की आज़ादी दी गई। शिवगिरि तीर्थयात्रा 1924 में उनके आशीर्वाद से स्वीकृत हुई और उनके तीन शिष्यों द्वारा आरंभ की गई और आज भी जारी है। गुरु के मार्गदर्शन में, यह तीर्थयात्रा स्वच्छता, शिक्षा, भक्ति, कृषि, हस्तशिल्प और व्यापार के गुणों को बढ़ावा देने के लिए की जाती है। तीन प्रमुख पवित्र ग्रंथों का अनुवाद करने के साथ-साथ उन्होंने मलयालम, तमिल और संस्कृत में अपनी 40 से अधिक कृतियाँ भी प्रकाशित कीं। श्री नारायण गुरु ने आदि शंकराचार्य के पदचिन्हों पर चलते हुए सांप्रदायिक सद्भाव और सार्वभौमिक बंधुत्व को मूर्त रूप दिया और उसका प्रचार किया। केरल का एक अधिक मानवीय और समतावादी समाज के रूप में विकास इन्हीं पदचिन्हों पर आधारित था। श्री नारायण गुरु का देहांत 20 सितंबर 1928 को हुआ। आज, यह दर्शन केरल राज्य के लिए जीवन पद्धति है।

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Aja Ekadashi

Aja Ekadashi 2025 Date And Time: अजा एकादशी अगस्त में कब ? जानें डेट, इस एकादशी को करने से क्या लाभ मिलता है

Aja Ekadashi: हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और अनेक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त होती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस साल अजा एकादशी किस दिन पड़ रही है। Aja Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत व्यक्ति के जीवन से दुख, दोष और संकटों को दूर करके सुख-शांति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। शास्त्रों के अनुसार अजा एकादशी का पालन करने से व्यक्ति को पूर्व जन्मों के पापों से भी मुक्ति मिलती है। इस व्रत को करने से जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और अनेक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त होती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस साल अजा एकादशी किस दिन पड़ रही है।  सत्यनारायण व्रत 2025 में कब-कब रखा जाएगा ? अजा एकादशी 2025 तिथि और मुहूर्त: Aja Ekadashi 2025 Tithi Or Subh Muhurat एकादशी तिथि आरंभ- 18 अगस्त 2025, शाम 5:22 बजेएकादशी तिथि समाप्त- 19 अगस्त 2025, दोपहर 3:32 बजेव्रत पारण का समय (20 अगस्त को): सुबह 5:53 बजे से 8:29 बजे तकधार्मिक मान्यता है कि अजा एकादशी पर उपवास और भगवान विष्णु की भक्ति करने से जीवन के समस्त पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अजा एकादशी व्रत का महत्व: Aja Ekadashi Vrat Ka Mahetwa मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप की उपासना करता है और व्रत कथा का श्रवण करता है, उसे मृत्यु के बाद विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। इस व्रत की कथा सुनने मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल मिलता है। पूजन विधि: Pujan Vidhi

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Janmashtami

Janmashtami 2025 Date: जन्माष्टमी 2025 कब है? जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

जन्माष्टमी 2025 कब है? जानें तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व Janmashtami: हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण दिवस, बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष महत्व है और इसे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति व आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से बाल गोपाल प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। तो आइए जानते हैं जन्माष्टमी 2025 की सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और इससे जुड़े महत्वपूर्ण नियम: Janmashtami 2025 Date and auspicious time:जन्माष्टमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल जन्माष्टमी Janmashtami का पर्व 16 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा। अष्टमी तिथि का आरंभ: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 15 अगस्त को देर रात 11 बजकर 48 मिनट पर आरंभ होगी। अष्टमी तिथि का अंत: अष्टमी तिथि का समापन 16 अगस्त को रात 09 बजकर 35 मिनट पर होगा। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्य रात्रि में हुआ था, इसलिए उनका जन्मोत्सव मध्य रात्रि में ही मनाया जाता है। पूजा का शुभ मुहूर्त: जन्माष्टमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त 16 अगस्त को रात्रि 12:05 से लेकर 12:45 तक रहेगा। निशिता मुहूर्त भी रात 12 बजकर 04 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तक है। शुभ योग: इस साल जन्माष्टमी के दिन सर्वार्थ सिद्धि और अमृत सिद्धि योग भी बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। Janmashtami Ka Dharmik Mahetwa: जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण मथुरा नगरी में राजकुमारी देवकी और उनके पति वासुदेव के आठवें पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल के रूप में उनकी मूर्ति का पूजन करना शुभ होता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति कृष्णजन्माष्टमी Janmashtami का व्रत रखकर पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण की आराधना करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और व्यक्ति को अक्षय पुण्य (कभी न खत्म होने वाला पुण्य) प्राप्त होता है। इस दिन लोग भजन-कीर्तन करते हैं और मंदिरों को विशेष तौर पर सजाया जाता है। महाराष्ट्र में जन्माष्टमी के दिन दही हांडी का आयोजन भी किया जाता है, जो भगवान कृष्ण के बचपन की लीलाओं का प्रतीक है। Janmashtami Vrat ke Niyam or Puja Vidhi: जन्माष्टमी व्रत के नियम और पूजा विधि जन्माष्टमी का व्रत अत्यंत शुभ व फलदायी माना गया है, और इसका पालन नियम पूर्वक करना चाहिए। Janmashtami Vrat Kaise Kare: जन्माष्टमी व्रत कैसे करें 1. व्रत का संकल्प: जन्माष्टमी Janmashtami के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 2. बाल गोपाल का श्रृंगार: इस दिन भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की विधिवत श्रृंगार करें। 3. मध्य रात्रि पूजा: आधी रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा करें। 4. भोग और आरती: भगवान श्रीकृष्ण को मखाने, मिश्री, मक्खन और तुलसी दल का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारें। 5. प्रसाद वितरण और व्रत पारण: परिवारजनों में प्रसाद को वितरित करें और फिर व्रत का पारण करें।     कुछ भक्त व्रत रात 12 बजे तक करते हैं, जबकि कुछ अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत पारण करते हैं। Krishna Janmashtami Vrat Ke Mahetwa Purn Niyam: कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के महत्वपूर्ण नियम ब्रह्मचर्य का पालन: व्रती को कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। अन्न वर्जित: इस दिन अन्न ग्रहण करने की मनाही होती है। दिन में सोना मना: व्रत रखने वालों को दिन में नहीं सोना चाहिए। वाद-विवाद से दूर: इस दिन वाद-विवाद से दूर रहना चाहिए और अपशब्द नहीं बोलने चाहिए। गौ सेवा: इस दिन गौ सेवा करना अत्यंत शुभ माना गया है। दान: व्रत करने वालों को अन्न, धन व वस्त्र का दान करना चाहिए। जन्माष्टमी का पावन पर्व आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाए!

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Kali Jayanti

Kali Jayanti 2025 Date: काली जयंती 2025: माँ काली के पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि

Kali Jayanti 2025 Date: काली जयंती हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास (पूर्णिमा भाद्रपद माह) की कृष्ण अष्टमी के दिन मनाई जाती है। देवी काली दस महाविद्याओं में प्रथम महाविद्या हैं और काली कुल से संबंधित हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार, देवी महाकाली के विभिन्न सौम्य और उग्र रूपों को दस महाविद्याओं के रूप में जाना जाता है। देवी महाकाली भगवान शिव के महाकाल रूप की शक्ति हैं। ब्रह्मनील तंत्र में मिले वर्णन के अनुसार, देवी काली दो रूपों में विद्यमान हैं, लाल और काली। काले रंग की काली को दक्षिणा और लाल रंग की काली को सुंदरी कहा जाता है। देवी का रंग काजल के समान काला होने के कारण, वे काली के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुईं। Kali Jayanti tithi:काली जयन्ती तिथि काली जयन्ती शुक्रवार, अगस्त 15, 2025 कोनिशिता पूजा समय – 12:04 AM से 12:47 AM अगस्त 16अवधि – 00 घण्टे 43 मिनट्स अष्टमी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 15, 2025 को 11:49 PM बजेअष्टमी तिथि समाप्त – अगस्त 16, 2025 को 09:34 PM बजे

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Randhan Chhath

Randhan Chhath 2025 Date: कब है रांधन छठ, जाने शुभ मुहूर्त व तिथि

Randhan Chhath: रांधण छठ एक पारंपरिक गुजराती हिंदू त्योहार है, जो मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह अगले दिन आने वाले शीतला सतम के लिए भोजन पकाने से जुड़ा है। रांधण छठ गुजरात का पारंपरिक त्योहार है, जो रक्षाबंधन से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और अगले दिन यानी श्रावणी पूर्णिमा के लिए पकवान बनाकर पूजा हेतु तैयार करती हैं। 2025 में कब है रांधन छठ? पुराणों में वर्णन मिलता है कि भगवान कृष्ण के जन्म से दो दिन पहले यानि षष्ठी तिथि पर उनके बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। इसी उपलक्ष्य में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष षष्ठी को रांधन छठ या हल छठ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियां अपनी संतान के लिए व्रत रखती हैं, और भगवान बलराम की पूजा करती हैं। Randhan Chhath 2025 Date: रांधण छठ 2025 का शुभ मुहूर्त व तिथि रांधण छठ – 14 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार (भाद्रपद, कृष्ण पक्ष, षष्ठी) Kya hai Randhan Chhath: क्या है रांधण छठ? रांधण छठ भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला एक पारंपरिक पर्व है, जिसे बलराम जयंती, हलछठ, या हर छठ के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने संतान की सुख-समृद्धि, आरोग्य और दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। विशेष रूप से यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिनका जन्म कृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पूर्व हुआ था। Kyo manate hai Randhan Chhath: क्यों मनाते हैं रांधण छठ? यह पर्व भगवान बलराम के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है। बलराम जी को हल और खेती का देवता माना गया है, इसलिए इस दिन विशेष रूप से कृषि संस्कृति, मातृत्व, और संरक्षण का सम्मान किया जाता है। साथ ही यह व्रत स्त्रियों द्वारा संतान सुख, उनकी भलाई व निरोगी जीवन के लिए रखा जाता है। रांधण छठ का महत्व: Randhan Chhath ka Mahetwa कहाँ और कौन से लोग मनाते हैं रांधण छठ? यह पर्व उत्तर भारत, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। खासकर वैष्णव परंपरा, गृहस्थ स्त्रियाँ, और कृषक परिवार इस पर्व को बड़ी आस्था से मनाते हैं। Randhan Chhath Per Kiski Puja Ki Jati Hai: रांधण छठ पर किसकी पूजा की जाती है? इस दिन भगवान बलराम, शीतला माता, और कभी-कभी अन्नपूर्णा देवी या गृह लक्ष्मी की पूजा की जाती है। बलराम जी को हल का प्रतीक माना जाता है, अतः उनकी पूजा में खेती-बाड़ी से जुड़े प्रतीकों का उपयोग होता है। Randhan Chhath Ke Din Puja Kaise Kare: रांधण छठ के दिन पूजा कैसे करें? रांधण छठ के धार्मिक अनुष्ठान Randhan Chhath Manane Ke Labh: रांधण छठ मनाने के लाभ Randhan Chhath Ke Din Kya Karna Chahiye: रांधण छठ के दिन क्या करना चाहिए? Randhan Chhath Ke Din Kya Nahi Karna Chahiye: रांधण छठ के दिन क्या नहीं करना चाहिए?

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Ahilya Utsav

Ahilya Utsav : अहिल्या उत्सव

Ahilya Utsav:अहिल्या उत्सव 18वीं शताब्दी की रानी अहिल्याबाई होल्कर के सम्मान में भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में मनाया जाने वाला एक त्योहार है, जिन्हें साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।अहिल्या उत्सव 18वीं शताब्दी की रानी अहिल्याबाई होल्कर के सम्मान में भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में मनाया जाने वाला एक त्योहार है, जिन्हें साहस और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। क्यों मनाया जाता है अहिल्या उत्सव:Why is Ahilya Utsav celebrated वीरांगना रानी अहिल्या बाई ‘दार्शनिक रानी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, 13 अगस्त 1795 को सत्तर वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। उनकी विरासत अभी भी जीवित है और उनके द्वारा किए गए विभिन्न मंदिर, धर्मशालाएं और सार्वजनिक कार्य महान योद्धा रानी की गवाही के रूप में खड़े हैं। उन्होंने अपना ध्यान विभिन्न परोपकारी गतिविधियों की ओर भी लगाया, जिनमें उत्तर में मंदिरों, घाटों, कुओं, तालाबों और विश्राम गृहों के निर्माण से लेकर दक्षिण में तीर्थस्थलों तक शामिल थे। उनका सबसे उल्लेखनीय योगदान 1780 में प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का नवीनीकरण और मरम्मत था। कैसे मनाया जाता है अहिल्या उत्सव:How is Ahilya Utsav celebrated इंदौर की वीरांगना रानी अहिल्या बाई की पुण्य तिथि के अवसर पर हर वर्ष अहिल्या उत्सव मनाया जाता है। इस दिन सुबह राजवाड़ा पर देवी अहिल्या बाई की मूर्ति मूर्तिपर माल्यार्पण की जाती है। Ahilya Utsav इसके बाद इंद्रेश्वर मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है और शाम को प्रतीकात्मक पालकी यात्रा भी निकाली जाती है। देवी अहिल्योत्सव समिति के कार्यकारी अध्यक्ष द्वारा देवी अहिल्याबाई की जयंती मनाई जाती है। मई महीने में देवी अहिल्याबाई की जन्म दिवस के अवसर पर मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा इंदौर में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है और इसमें संगीत, नृत्य और कविता पाठ जैसे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होते हैं। Ahilya Utsav यह लोगों द्वारा अहिल्याबाई और उनकी विरासत को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है।

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Balarama Jayanti

Balarama Jayanti: बलराम जयंती 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि – जानें सब कुछ !

Balarama Jayanti: बलराम जयंती 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि Balarama Jayanti: हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम जयंती मनाई जाती है। यह एक आध्यात्मिक और आनंदमय पर्व है जो श्रद्धालुओं को भगवान बलराम और श्री कृष्ण की भक्ति में एकजुट करता है। व्रत, पूजा, भजन और प्रसाद के साथ यह दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक समर्पण का प्रतीक बनता है। इस साल 2025 में बलराम जयंती गुरुवार, 14 अगस्त को मनाई जाएगी। षष्ठी तिथि 13 अगस्त 2025 को सुबह 7:56 बजे शुरू होकर 14 अगस्त 2025 को दोपहर 3:24 बजे समाप्त होगी। कुछ स्रोतों के अनुसार, षष्ठी तिथि 14 अगस्त 2025 को सुबह 4:02 बजे शुरू होकर 15 अगस्त 2025 को रात 2:07 बजे समाप्त होगी। पूरे दिन 14 अगस्त 2025 को बलराम जयंती के रूप में मनाया जाएगा। Bhai Dooj 2025: कैसे शुरू हुई भाई दूज मनाने की प्रथा? यमराज और यमुना से जुड़ी है इसकी कथा Who is Lord Balarama Jayanti : कौन हैं भगवान बलराम? भगवान बलराम (Balarama Jayanti), भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई हैं। उन्हें भगवान विष्णु के शेषनाग अवतार के रूप में भी जाना जाता है, जिस पर भगवान विष्णु क्षीर सागर में विश्राम करते हैं। बलराम जी बल, धर्म और कृषि के अद्वितीय प्रतीक हैं। उनका मुख्य शस्त्र ‘हल’ है, जिसके कारण उन्हें ‘हलधर’ भी कहा जाता है। वे धैर्य और सहनशीलता से जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। बलराम जी का जन्म और बाल लीलाएं:Balram ji’s birth and childhood pastimes बलराम जी का जन्म वासुदेव और देवकी की सातवीं संतान के रूप में हुआ था। कंस के भय से, भगवान विष्णु के निर्देश पर योग माया ने देवकी के गर्भ को रोहिणी माता के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया था। इस प्रकार, बलराम जी का जन्म रोहिणी माता के पुत्र के रूप में हुआ और वे ब्रज में नंद बाबा और यशोदा मैया के घर में भगवान कृष्ण के साथ पले-बढ़े। बचपन से ही अत्यंत बलशाली बलराम जी ने अपने भाई कृष्ण के साथ मिलकर कई राक्षसों का वध किया और धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बलराम जयंती का महत्व:Importance of Balarama Jayanti बलराम जयंती कई कारणों से हम सभी के लिए महत्वपूर्ण है: • संतान के लिए सुख-समृद्धि: इस दिन भगवान बलराम Balarama Jayanti का पूजन करने से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है और उन्हें लंबी आयु प्राप्त होती है। • बल की प्राप्ति: भगवान बलराम की पूजा से शारीरिक बल के साथ-साथ मानसिक दृढ़ता और आत्म-नियंत्रण भी प्राप्त होता है। • धर्म की रक्षा: जो लोग धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं और उसकी रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें बलराम जी की पूजा अवश्य करनी चाहिए। • कृषि में सफलता: यदि आप कृषि से संबंधित कोई भी कार्य करते हैं, जैसे खेती या खेती से जुड़ा व्यवसाय, तो बलदाऊ जी की पूजा आपको सफलता दिला सकती है। यह त्यौहार हल की पूजा से भी जुड़ा है। • धैर्य और सहनशीलता: बलराम जी Balarama Jayanti का जीवन हमें धैर्यवान होने और अपनी शक्ति का सदुपयोग करने की प्रेरणा देता है। • पारिवारिक एकजुटता: बलराम जयंती परिवार में प्रेम और भाईचारे के महत्व को भी समझाती है। बलराम जयंती पूजा विधि:Balarama Jayanti Puja Method बलराम जयंती पर भगवान बलराम का पूजन करना बहुत सरल और आसान है: 1. स्नान और संकल्प: भक्त प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान आदि करके व्रत का संकल्प लेते हैं। 2. पूजा सामग्री: पूजा के लिए भगवान कृष्ण और Balarama Jayanti बलराम जी की तस्वीर या मूर्ति (आप भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की तस्वीर भी ले सकते हैं), लकड़ी या मिट्टी का छोटा हल, थोड़ा सा अनाज जैसे गेहूं, जौ, धान, धूप, रोली, चंदन, फल, फूल, नारियल आदि सामग्री एकत्र कर लें। 3. पूजा का स्थान: कुछ स्थानों पर घर में या बाहर दीवार पर भैंस के गोबर से छठ माता का चित्र बनाकर और गोबर से तालाब बनाकर उसमें झर बेरी, पतास और कांसी के पेड़ लगाकर पूजा करते हैं। 4. मूर्तियों का अभिषेक: मूर्तियों को नए वस्त्र और आभूषणों से सजाया जाता है। सबसे पहले गंगाजल से स्नान कराएं, फिर तिलक लगाएं, पुष्प और अक्षत अर्पित करें। 5. मंत्र जाप: अपनी मनोकामनाओं के साथ भगवान बलराम से प्रार्थना करें और “ओम नमो भगवते बलभद्राय नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। 6. कथा श्रवण और आरती: बलराम जयंती से संबंधित पौराणिक कथाएं सुनें और अंत में भगवान बलराम की आरती करें। 7. भोग और प्रसाद: विशेष भोजन बनाकर भोग अर्पित करें और फिर प्रसाद रूप में सभी को वितरित करें। 8. उपवास: उपासक दोपहर तक निर्जला उपवास रख सकते हैं। 9. भजन-कीर्तन: इस दिन भक्तगण भजन, कीर्तन और नृत्य के साथ पूरे उल्लास से उत्सव मनाते हैं। बलराम जयंती पर लें ये तीन संकल्प:Take these three resolutions on Balarama Jayanti बलराम जयंती के दिन आप अपने जीवन को बदलने के लिए ये तीन महत्वपूर्ण संकल्प ले सकते हैं: 1. धन और बल में वृद्धि: संकल्प लें कि आप अपने धन और बल को बढ़ाएंगे। 2. धर्म के मार्ग पर चलना: धर्म के मार्ग पर चलने और धर्म की रक्षा में सदैव योगदान देने का संकल्प लें। 3. परिवार की एकजुटता: अपने परिवार को एकजुट रखने और उसमें प्रेम भाव बनाए रखने का प्रयास करें। इसके अलावा, आप धैर्यवान बनने, कृषि करने वाले लोगों का सम्मान करने, शक्ति का दुरुपयोग न करने और भगवान कृष्ण व बलराम के प्रेम से प्रेरणा लेने का भी संकल्प ले सकते हैं। इन संकल्पों को लेने और उनका पालन करने से आपका जीवन अधिक खुशहाल और सार्थक बन सकता है। तो आइए, इस बलराम जयंती पर भगवान बलराम का पूजन करें और उनकी कृपा प्राप्त करें

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Bhai Dooj 2025: कैसे शुरू हुई भाई दूज मनाने की प्रथा? यमराज और यमुना से जुड़ी है इसकी कथा

भाई दूज 2025: कैसे शुरू हुई यह अनोखी प्रथा? यमराज और यमुना की कहानी Bhai Dooj 2025:दीपावली उत्सव के अंतिम दिन भाई दूज का पवित्र पर्व मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। इस शुभ अवसर पर बहनें अपने भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, भाई अपनी बहन को जीवन में सदैव रक्षा करने का वचन देते हैं। यह दिन यम देवता की पूजा-अर्चना के लिए भी विशेष महत्व रखता है। आइए जानते हैं कैसे शुरू हुई भाई दूज मनाने की यह अनोखी प्रथा, और क्या है इसकी पौराणिक कथा। भाई दूज 2025 कब है? (Bhai Dooj 2025 Shubh Muhurat) 2025 में भाई दूज 23 अक्टूबर (गुरुवार) को मनाया जाएगा । इसे पूरे भारत में राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश के रूप में नामित नहीं किया गया है; हालाँकि, यह व्यापक रूप से मनाया जाता है और कुछ क्षेत्रों में इसे क्षेत्रीय अवकाश माना जा सकता है, जिससे पारिवारिक समारोह और उत्सव मनाने की अनुमति मिलती है। भाई दूज की पौराणिक कथा (Bhai Dooj Ki Pauranik Katha) भाई दूज Bhai Dooj 2025 की कथा भगवान सूर्यदेव के पुत्र यमराज और पुत्री यमुना से जुड़ी है। पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य भगवान की पत्नी संज्ञादेवी थीं, जिनकी दो संतानें थीं – पुत्र यमराज और कन्या यमुना। यमराज अपनी बहन यमुना से बहुत प्यार करते थे, लेकिन अधिक काम होने के कारण वे उनसे मिलने नहीं जा पाते थे। एक बार, यमुना ने यमराज को वचन दिया कि वे कार्तिक माह की शुक्ल द्वितीया तिथि पर उनके घर भोजन करने आएँगे। यमराज को यमुना के घर जाने में थोड़ा संकोच होने लगा, क्योंकि वे लोगों के प्राण हरने का काम करते हैं, तो इस वजह से कौन उन्हें अपने घर बुलाएगा। लेकिन, फिर भी वे यमुना के घर चले जाते हैं। जब यमराज बहन के घर पहुँचे, तो वे उन्हें देखकर बेहद प्रसन्न हुईं और उनकी खूब सेवा की। यमुना ने अपने भाई के लिए कई तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए। बहन की सेवा और सत्कार को देखकर यमराज बहुत खुश हुए और यमुना से कोई वर मांगने के लिए कहा। इसके बाद यमुना ने उनसे वचन लिया कि हर साल कार्तिक माह के शुक्ल द्वितीया तिथि पर वे उनके घर आकर भोजन किया करें। यमराज ने भी उन्हें ‘तथास्तु’ कहते हुए तरह-तरह की भेंट भी दीं। एक अन्य कथा के अनुसार, यमुना ने यह वरदान मांगा कि जो लोग उस दिन बहन के घर भोजन करके मथुरा नगरी स्थित विश्राम घाट पर स्नान करें, वे यमलोक न जाएँ। यमराज ने इस बात को स्वीकार कर लिया और कहा कि जो सज्जन इस तिथि पर बहन के घर भोजन नहीं करेंगे, उन्हें वे यमपुरी ले जाएँगे, और यमुना के जल में स्नान करने वालों को स्वर्ग प्राप्त होगा। मान्यता के अनुसार, तभी से भाई दूज के पर्व को मनाने की शुरुआत हुई। भाई दूज का महत्व और अनुष्ठान (Bhai Dooj Ka Mahatva aur Anushthan) भाई दूज Bhai Dooj 2025 को ‘यम द्वितीया’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन बहनें स्नान-ध्यान के बाद यम देव की पूजा करती हैं। वे अपने भाई के हाथ पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और माथे पर तिलक करती हैं। तिलक करने के बाद बहनें अपने हाथों से भाई को भोजन कराती हैं। इस दौरान भाई दूज की कथा का पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि कथा का पाठ करने से भाई और बहन के रिश्ते में मधुरता आती है, और भाई को लंबी आयु का वरदान प्राप्त होता है। इस दिन भाई-बहन का साथ-साथ यमुना स्नान करना, तिलक लगवाना तथा बहन के घर भोजन करना अति फलदायी माना जाता है। इस पावन अवसर पर भाई द्वारा बहन को श्रद्धाभाव से वस्त्र, मुद्रा आदि भेंट देना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के रिश्ते की गहराई, प्रेम और एक-दूसरे के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

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How to celebrate Diwali according to Premanand Maharaj:प्रेमानंद महाराज के अनुसार दिवाली कैसे मनाये

Diwali: दिवाली: बाहरी उत्सव से आंतरिक प्रकाश की ओर एक यात्रा दीपावली, दिवाली, जुआ, शराब, भक्ति, ज्ञान, नाम जप, आंतरिक दीपावली Diwali: दिवाली, जिसे दीपावली भी कहा जाता है, भारत और दुनिया भर में मनाया जाने वाला एक अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह केवल दीप जलाने और खुशियाँ मनाने का पर्व नहीं है, बल्कि इसका एक गहरा आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व भी है। ऐसा माना जाता है कि यह उत्सव भगवान श्री रामचंद्र जी के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या में चक्रवर्ती सम्राट के रूप में विराजमान होने की खुशी में मनाया गया था, जब पूरी अयोध्या दीपों से प्रकाशित हो उठी थी। दीपावली (Diwali) का वास्तविक अर्थ और हमें क्या नहीं करना चाहिए? आज हम घरों को सजाते हैं, दीपक जलाते हैं, लेकिन क्या हम दीपावली के आंतरिक स्वरूप को समझते हैं? अक्सर देखने में आता है कि लोग दीपावली के शुभ अवसर पर जुआ खेलने लगते हैं। लोग सोचते हैं कि “साल भर नहीं खेलते पर दीपावली को तो खेलें!” लेकिन क्या कहीं ऐसा लिखा है कि आप दीपावली पर वो अपराध करें जिसमें कलियुग का वास रहता है? पूज्य महाराज Maharaj श्री हमें स्पष्ट रूप से बताते हैं कि द्यूत क्रीड़ा (जुआ खेलना), शराब पीना, मांस खाना, परस्त्री गमन (व्यभिचार करना), स्वर्ण चोरी करना, और हिंसा करना – ये सभी कार्य कलियुग के निवास स्थान हैं। इन आसुरी प्रवृत्तियों वाले कार्यों से हमें बचना चाहिए। धर्मराज युधिष्ठिर और महाराज नल दमयंती जैसे बड़े-बड़े पवित्र चरित्र भी द्यूत क्रीड़ा के कारण भारी विपत्तियों में पड़े थे। यह समझना आवश्यक है कि अधर्म के धन से कभी सुख-शांति नहीं मिलती, बल्कि इससे परिवार बिखर जाता है और अशांति पैदा होती है। महाराज जी दृढ़ता से यह संदेश देते हैं कि यदि आप सुख और शांति प्राप्त करना चाहते हैं, तो इन व्यसनों और गंदे आचरणों को छोड़ दें। यह त्याग ही सबसे बड़ा उत्सव है और यह आपको मानसिक शांति और उन्नति प्रदान करेगा। दीपावली पर क्या करें और कैसे जलाएं आंतरिक दीप? तो, दीपावली Diwali पर हमें क्या करना चाहिए? हमें अपने प्रभु का भजन करना चाहिए, अपने प्रिय प्रीतम का या भगवत विग्रह का ध्यान करना चाहिए। दीपक जलाकर, खूब गुरु मंत्र और नाम जप करना चाहिए, विशेषकर रात 12 बजे तक, क्योंकि इससे कई गुना बढ़कर लाभ मिलता है। ठाकुर जी को भोग लगाएं और आरती करें। दीपावली Diwali 2025 का आंतरिक स्वरूप हमारे हृदय में भक्ति के दीप और प्रेम की बाती जलाने से संबंधित है। जैसे घर में दीपक जलाने से बाहरी अंधेरा दूर होता है, वैसे ही हमारे हृदय का अंधकार ज्ञान के प्रकाश से ही मिटेगा। यह भक्ति का दीपक और प्रेम की बाती किसी बाजार में नहीं मिलती, यह साधु संगति (भगवत प्रेमी महात्माओं का संग) से ही प्राप्त होती है। जब यह ज्ञान का प्रकाश हृदय में प्रकट होता है, तब चिंता, शोक, दुख, और मृत्यु आदि का भय नष्ट हो जाता है। हमें यह समझना चाहिए कि हम शरीर नहीं हैं, बल्कि हमारा स्वरूप सच्चिदानंद है, ईश्वर का अंश है। Diwali जब यह बात पता चल जाती है कि मैं कौन हूँ, तो व्यक्ति आनंद से भर जाता है, मस्त हो जाता है और आत्मा राम बन जाता है। यह समझना कि “मैं भगवान का अंश हूँ” और भगवत प्राप्ति करना ही हमारा परम धर्म है, एक गृहस्थ को भी महात्मा बना देता है। अपने अंदर के अंधकार को दूर करने के लिए, हमें नाम जप और भक्ति करनी चाहिए। यह आंतरिक दीपावली यदि जल गई, तो आप जन्म-मृत्यु के भय से मुक्त हो जाएंगे। एक दृढ़ संकल्प लें: पूज्य महाराज Maharaj जी हम सभी से यह भेंट मांगते हैं कि इस दीपावली पर हम सभी गलत आचरण, शराब, मांस, व्यभिचार, जुआ, चोरी और हिंसा को त्यागने का दृढ़ संकल्प लें। यह संकल्प लेना ही अपने आप में सबसे बड़ा उत्सव है, और इससे हमारा समाज एक धार्मिक, शांतिप्रिय और परमानंद में डूबने वाला समाज बनेगा। Diwali श्री कृष्ण स्वयं आपकी सहायता करेंगे और आपको इन व्यसनों को छोड़ने की सामर्थ्य प्रदान करेंगे, क्योंकि वे हर पल आपके साथ हैं

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दिवाली 2025: तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और 5 दिन का संपूर्ण कैलेंडर – अभी से जानें सब कुछ !

दिवाली 2025: तिथि, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त और 5 दिन का संपूर्ण कैलेंडर – अभी से जानें सब कुछ! दिवाली का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है और इसे ‘दीप उत्सव’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘दीपावली’ का अर्थ है ‘दीपों की अवली’ यानी दीपों की पंक्ति। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है और बुराई पर अच्छाई की जीत को भी दर्शाता है। यह त्योहार हर साल कार्तिक अमावस्या के दिन बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्री राम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे, और उनके आगमन की खुशी में लोगों ने घी के दीपक जलाकर उत्सव मनाया था। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है, और ऐसा माना जाता है दिवाली 2025 कि उनकी आराधना से घर में सुख-समृद्धि आती है। दिवाली 2025 मां लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर भ्रमण के लिए निकलती हैं, इसलिए भी इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है। लक्ष्मी जी के साथ भगवान गणेश और कुबेर जी की भी पूजा की जाती है। दिवाली 2025 कब है? (Diwali 2025 Date) 2025 में दिवाली की तिथि को लेकर थोड़ा असमंजस है, क्योंकि कार्तिक अमावस्या तिथि दो दिन पड़ रही है। पंचांग के अनुसार, कार्तिक अमावस्या तिथि का आरंभ 20 अक्टूबर 2025 को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट / 03 बजकर 45 मिनट पर होगा और यह अगले दिन 21 अक्टूबर को शाम 05 बजकर 54 मिनट / 05 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी। अधिकांश ज्योतिष मतों के अनुसार, दिवाली का पर्व 20 अक्टूबर 2025 को ही मनाया जाएगा, क्योंकि इस दिन लक्ष्मी पूजा सूर्यास्त के बाद करने का विधान है, और निशिता काल में पूजा का विशेष महत्व है, जो 20 अक्टूबर को ही है। हालांकि, कुछ मतों के अनुसार, प्रदोष काल में अमावस्या तिथि होने के कारण 21 अक्टूबर को भी देश के कुछ हिस्सों में दिवाली मनाई जा सकती है। दिवाली 2025 लक्ष्मी पूजा मुहूर्त (Diwali 2025 Lakshmi Puja Muhurat) दिवाली पर लक्ष्मी पूजा का समय 20 अक्टूबर 2025 को निर्धारित है। लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त और अन्य महत्वपूर्ण काल इस प्रकार हैं: • लक्ष्मी पूजा का समय: रात 07:08 बजे से रात 08:18 बजे तक।     ◦ अवधि: 1 घंटा 8 मिनट। • प्रदोष काल: शाम 05:46 बजे से रात 08:18 बजे तक / शाम 05:33 बजे से रात 08:08 बजे तक। • वृषभ काल: रात 07:08 बजे से रात 09:03 बजे तक / शाम 06:56 बजे से रात 08:53 बजे तक। • निशिता काल का मुहूर्त: रात 11:41 बजे से 21 अक्टूबर को प्रातः 12:31 बजे तक। • शहर के अनुसार लक्ष्मी पूजा के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। दिवाली 2025 कैलेंडर (5 दिन का त्योहार) दिवाली का त्योहार धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक पाँच दिनों तक चलता है। 2025 के लिए दिवाली का पूरा कैलेंडर इस प्रकार है: • धनतेरस: 17 अक्टूबर 2025 (या कुछ स्रोतों के अनुसार 18 अक्टूबर 2025) • नरक चतुर्दशी: 18 अक्टूबर 2025 (या काली चौदस 19 अक्टूबर 2025) • दिवाली: 20 अक्टूबर 2025 • कार्तिक अमावस्या तिथि समाप्ति: 21 अक्टूबर 2025 (या दिवाली स्नान 21 अक्टूबर 2025) • गोवर्धन पूजा: 22 अक्टूबर 2025 • भाई दूज: 23 अक्टूबर 2025 धनतेरस पर सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त: यदि आप धनतेरस पर सोना खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो 18 अक्टूबर को दोपहर 12:18 बजे से 19 अक्टूबर को सुबह 06:08 बजे तक का समय शुभ माना गया है। 19 अक्टूबर को सुबह 06:08 बजे से दोपहर 01:51 बजे तक भी सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त है। दिवाली के दिन करें ये शुभ काम दिवाली 2025 पर घर में सुख-समृद्धि और मां लक्ष्मी का वास बनाए रखने के लिए कुछ शुभ कार्य करने का विधान है: 1. सजावट: दीवाली के दिन अपने घरों और दुकानों को गेंदे के फूल की लड़ियों और अशोक, आम तथा केले के पत्तों से सजाना शुभ माना जाता है। 2. कलश स्थापना: घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर कलश में नारियल स्थापित करना शुभ माना जाता है। 3. स्वच्छता: दिवाली के दिन सफाई का विशेष महत्व है, क्योंकि लक्ष्मी मां उसी घर में प्रवेश करती हैं जहां साफ-सफाई होती है। 4. लक्ष्मी पूजन विधि: लक्ष्मी पूजा के लिए, पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर, उस पर श्री गणेश और देवी लक्ष्मी की सुंदर मूर्तियों को रेशमी वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित कर स्थापित करें और फिर पूजन करें। 5. दीप प्रज्ज्वलन: शाम को लक्ष्मी पूजा के साथ ही जलते हुए दीपकों की भी पूजा की जाती है। घर और आंगन में सब जगह दीपक लगाएं, क्योंकि दिवाली प्रकाश का पर्व है। यह जानकारी मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। एबीपी लाइव किसी भी तरह की मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।

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Shani Mangal Yuti on Raksha Bandhan : रक्षाबंधन पर शनि-मंगल का महासंयोग, इन 3 राशियों को मिलेगा जबरदस्त लाभ

Shani Mangal Yuti: रक्षाबंधन 9 अगस्त 2025 को भाई-बहन के प्रेम के साथ-साथ एक खास ज्योतिषीय संयोग भी लेकर आ रहा है। इस दिन आकाश में शनि और मंगल का दुर्लभ महा-राजयोग बनेगा, जो कुछ राशियों के लिए बेहद शुभ होगा। इस शुभ संयोग से तीन राशियों को आर्थिक लाभ, नई अवसरों और समृद्धि के योग मिलेंगे। Shani Mangal Yuti: इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व सिर्फ भाई-बहन के प्रेम का उत्सव नहीं रहेगा, बल्कि यह दिन ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन रहा है। 9 अगस्त 2025 को ग्रहों की विशेष स्थिति के चलते शनि और मंगल का संयोग बन रहा है, जिससे ‘नवपंचम राजयोग’ का निर्माण होगा। यह योग अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली माना जाता है, जो जातक के जीवन में सफलता, समृद्धि और नई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है। रक्षाबंधन 2025 के दिन ग्रहों की चाल एक खास खगोलीय संयोग बना रही है। सुबह 08 बजकर 18 मिनट पर मंगल और शनि के बीच 180 अंश की दूरी बनेगी, जिसे ज्योतिष में ‘प्रतियुति’ कहा जाता है। आमतौर पर प्रतियुति को संघर्ष और चुनौतियों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस बार की स्थिति थोड़ी अलग है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, Shani Mangal यह राजयोग कुछ खास राशियों के लिए बेहद शुभ रहने वाला है। जिन राशियों पर इस योग का सीधा प्रभाव पड़ेगा, उनके जीवन में आर्थिक लाभ, करियर में तरक्की और पारिवारिक सुख में वृद्धि के प्रबल योग बनेंगे। Shani Mangal यह समय उनके लिए सौभाग्य, मान-सम्मान और सकारात्मक बदलाव लेकर आएगा। आइए जानें वे कौन सी तीन भाग्यशाली राशियां हैं जिन्हें रक्षाबंधन 2025 पर इस ‘महा-राजयोग’ का विशेष लाभ मिलेगा। आप अपने रिश्ते में सुकून, देखभाल और स्थिरता महसूस करेंगे। इस कार्ड का संकेत है कि आपने इस संबंध में भरोसे और गहराई को मजबूत करने में काफी मेहनत की है। अब आप एक सुरक्षित भावनात्मक ज़ोन में पहुंच चुके हैं Shani Mangal: इन 3 राशियों को मिलेगा जबरदस्त लाभ मेष राशि इस बार रक्षाबंधन मेष राशि वालों के लिए बेहद खास रहने वाला है। नवपंचम महा-राजयोग के प्रभाव से आपके करियर में एक नई रफ्तार आएगी। नौकरीपेशा लोगों को पदोन्नति या नई ज़िम्मेदारी मिल सकती है, वहीं व्यापारियों को बड़ा लाभ होने के संकेत हैं। Shani Mangal आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। अटका हुआ पैसा वापस मिल सकता है और किए गए निवेश से मुनाफा मिलने के योग हैं। इसके अलावा सामाजिक जीवन में आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी और लोग आपके कार्यों की सराहना करेंगे। यह समय आत्मविश्वास और उत्साह से भरपूर रहेगा। वृश्चिक राशि वृश्चिक राशि के जातकों के लिए रक्षाबंधन का यह समय ऊर्जा और मानसिक शांति का प्रतीक बनकर आएगा। लंबे समय से चली आ रही स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में सुधार होगा और आप खुद को पहले से अधिक ऊर्जावान महसूस करेंगे। पारिवारिक जीवन में खुशियों की बहार आएगी। रिश्तों में मधुरता बढ़ेगी और घर में कोई शुभ कार्य भी संपन्न हो सकता है। आत्मविश्वास में बढ़ोतरी के साथ आपके निर्णय लेने की क्षमता भी मजबूत होगी, जिससे आप अपने व्यक्तिगत और पेशेवर लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर सकेंगे। मीन राशि मीन राशि वालों के लिए रक्षाबंधन पर बन रहा यह राजयोग शिक्षा, संबंध और आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में बेहद शुभ रहेगा। विद्यार्थी वर्ग के लिए यह समय अनुकूल है। कठिन परीक्षाओं में सफलता और नए अवसर मिलने के योग बन रहे हैं। सामाजिक दायरा भी बढ़ेगा, जिससे नए और लाभदायक संबंध बन सकते हैं। यात्रा का योग भी बन रहा है, जो न सिर्फ लाभदायक होगी बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी संतुलन प्रदान करेगी। यह समय आपको भीतर से भी मज़बूत और संतुलित बनाएगा। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है।

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