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Vamana Jayanti 2025

Vamana Jayanti 2025 Date: वामन जयंती 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और पूजन विधि – पाएं भगवान विष्णु का आशीर्वाद !

Vamana Jayanti 2025 Date: भगवान विष्णु के पांचवें अवतार वामन देव को समर्पित वामन जयंती 2025 का पावन पर्व गुरुवार, 4 सितंबर 2025 को मनाया जाएगा। इसे वामन द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह उत्सव भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पड़ता है। भक्तों का मानना है कि इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है और आध्यात्मिक योग्यता (पुण्य) में वृद्धि होती है। Vamana Jayanti 2025 Date subh Muhurat: वामन जयंती 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त वामन जयंती Vamana Jayanti 2025 के अवसर पर पूजा-पाठ और व्रत के लिए निम्नलिखित तिथियां और समय अत्यंत शुभ माने जाते हैं: • वामन जयंती तिथि: गुरुवार, 4 सितंबर 2025 • द्वादशी तिथि प्रारंभ: 4 सितंबर, सुबह 4:21 बजे (IST) (एक अन्य स्रोत में 4:20 बजे IST भी दिया गया है) • द्वादशी तिथि समाप्त: 5 सितंबर, सुबह 4:08 बजे (IST) (एक अन्य स्रोत में 4:10 बजे IST भी दिया गया है) यह शुभ दिन श्रवण नक्षत्र में मनाया जाता है, जो 4 सितंबर की रात 11:44 बजे से शुरू होकर 5 सितंबर की रात 11:38 बजे तक रहेगा। क्यों लिया भगवान विष्णु ने वामन अवतार? (वामन अवतार की कथा) हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु ने Vamana Jayanti 2025 वामन अवतार दानव राजा बलि की बढ़ती शक्ति को नियंत्रित करने और देवताओं का इंद्रलोक पर नियंत्रण बहाल करने के लिए लिया था। राजा बलि एक अत्यंत पराक्रमी और दानी राजा थे, जिनके बढ़ते प्रभाव से इंद्रलोक के देवता चिंतित थे। तब भगवान विष्णु ने एक बौने ब्राह्मण (वामन) का रूप धारण किया और राजा बलि के पास भिक्षा मांगने पहुंचे। उन्होंने बलि से तीन पग भूमि का दान माँगा। राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य के मना करने के बावजूद, वामन देव की छोटी सी मांग को सहर्ष स्वीकार कर लिया। अपने दिव्य शक्तियों से, Vamana Jayanti 2025 Date वामन देव ने पहले पग में पूरी पृथ्वी को नाप लिया, और दूसरे पग में पूरे स्वर्ग लोक को। तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर वामन देव के चरणों में रख दिया। यह कथा न्याय, धार्मिकता और धर्म के संरक्षण का प्रतीक है, जो भगवान विष्णु की ब्रह्मांडीय लीला और दिव्य ज्ञान को उजागर करती है। Vamana Jayanti Pujan Vidi: वामन जयंती 2025: पूजन विधि वामन जयंती Vamana Jayanti पर भगवान वामन की पूजा-अर्चना करना और व्रत रखना विशेष फलदायी माना जाता है। • सुबह की पूजा: इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान वामन की पूजा-आराधना करें। • प्रतिमा स्थापना: यदि संभव हो, तो वामन भगवान की स्वर्ण प्रतिमा बनवाकर पंचोपचार पूजा करें। Vamana Jayanti 2025 पूजा की शुरुआत पूर्व दिशा की ओर हरे कपड़े पर वामन देव की मूर्ति या तस्वीर लगाकर की जाती है। • व्रत: भक्त फल-आधारित या सात्विक उपवास रखते हैं। • दान: पूजा के बाद चावल, दही और चांदी जैसी वस्तुओं का दान करना बहुत लाभकारी होता है। • पशु सेवा: अनाज और दही से जानवरों को भोजन कराना भी एक सामान्य अभ्यास है। • मंत्र जाप: विष्णु सहस्रनाम का पाठ और मंत्र जप करना भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए शुभ माना जाता है। • शाम की पूजा और कथा: शाम को, व्रती भगवान की पूजा करते हैं, व्रत कथा सुनते हैं और पूरे परिवार में प्रसाद बांटते हैं। ये सभी अनुष्ठान भगवान विष्णु को प्रसन्न करते हैं और समृद्धि, आध्यात्मिक विकास और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा लाते हैं। राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा…. Vamana Jayanti 2025: वामन जयंती 2025: राशिनुसार करें ये विशेष उपाय अपनी राशि के अनुसार विशेष उपाय करने से भगवान वामन का आशीर्वाद प्राप्त होता है: • मेष: ‘तप रूपाय विद्महे..’ मंत्र का जाप करें। • वृषभ: मिश्री का भोग लगाएं। • मिथुन: घी का दीपक जलाएं। • कर्क: चावल-दही और चांदी का दान करें। • सिंह: चंदन से पूजा करें। • कन्या: तुलसी पत्र और रक्त चंदन का प्रयोग करें। • तुला: खीर चढ़ाएं। • वृश्चिक: ‘तप रूपाय विद्महे..’ मंत्र का जाप करें। • धनु: फलाहार (फल आधारित आहार) का सेवन करें। • मकर: कांसे के दीपक से पूजा करें। • कुंभ: घी का दीपक जलाएं। • मीन: दान-धर्म का कार्य करें। निष्कर्ष: इस वामन जयंती पर, अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ Vamana Jayanti 2025 भगवान वामन की पूजा करें और उनके आशीर्वाद प्राप्त करें। यह दिन आपके जीवन में सुख-समृद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति लाएगा। डिस्क्लेमर: इस लेख की सामग्री विशुद्ध रूप से मान्यताओं पर आधारित है और इसे सामान्य मार्गदर्शन के रूप में लिया जाना चाहिए। व्यक्तिगत अनुभव भिन्न हो सकते हैं। KARMASU.IN प्रस्तुत किसी भी दावे या जानकारी की सटीकता या वैधता की पुष्टि नहीं करता है। यहाँ चर्चा की गई किसी भी जानकारी या विश्वास पर विचार करने या उसे लागू करने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेने की दृढ़ता से सलाह दी जाती है।

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Bhuvaneshvari Jayanti

Bhuvaneshvari Jayanti 2025 Date:भुवनेश्वरी जयंती 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि –जानें देवी भुवनेश्वरी की महिमा

Bhuvaneshvari Jayanti 2025: हिंदू धर्म में, शक्ति स्वरूपा देवी के दस रूप हैं, जिन्हें दश महाविद्या कहा जाता है। इन दस महाविद्याओं में देवी भुवनेश्वरी चौथी महाविद्या हैं। वह अपने भक्तों को अभय सहित अनेक प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं। गृहस्थ लोग संतान प्राप्ति की कामना से देवी भुवनेश्वरी की पूजा करते हैं। Bhuvaneshvari Jayanti माँ भुवनेश्वरी को शक्ति प्रदान करने वाली माँ माना जाता है, जो प्राणियों को पोषण और शक्ति दोनों प्रदान करती हैं। हर साल यह जयंती बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। भुवनेश्वरी जयंती 2025 कब है? (Bhuvaneshvari Jayanti 2025 Date & Time) हिंदू कैलेंडर के अनुसार, Bhuvaneshvari Jayanti भुवनेश्वरी जयंती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी के दिन मनाई जाती है। वर्ष 2025 में, भुवनेश्वरी जयंती गुरुवार, 4 सितंबर 2025 को है। • द्वादशी तिथि प्रारंभ: 04 सितंबर 2025, प्रातः 04:21 बजे से • द्वादशी तिथि समाप्त: 05 सितंबर 2025, प्रातः 04:08 बजे देवी भुवनेश्वरी कौन हैं? (Who is Devi Bhuvaneshvari?) देवी भुवनेश्वरी भुवनेश्वर रुद्र की शक्ति के रूप में वर्णित की जाती हैं। देवी पुराण में वर्णित है कि मूल प्रकृति ही देवी भुवनेश्वरी के रूप में विद्यमान हैं। उन्हें वामा, ज्येष्ठा और रौद्री आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है। देवी स्वयं शताक्षी और शाकंभरी देवी के रूप में विद्यमान हैं। देवी भुवनेश्वरी संपूर्ण सृष्टि की अधिष्ठात्री देवी हैं और वे स्वयं संपूर्ण सृष्टि के रूप में विद्यमान हैं। Bhuvaneshvari Jayanti उन्हें आदि शक्ति के रूप में भी विख्यात किया गया है। माँ भुवनेश्वरी देवी महादेव शिव की लीला-विलास का सहभागी मानी जाती हैं। उन्हें दस सबसे महत्वपूर्ण विद्याओं में से एक माना जाता है। वह तीनों लोकों को धारण करने वाली मानी जाती हैं। भक्तों के बीच वह अपनी अंकुश पाश और अभय मुद्रा धारण करने के लिए भी काफी मान्य हैं। देवी भुवनेश्वरी का स्वरूप (Appearance of Devi Bhuvaneshvari) यूं तो इनके नाम से उन्हें सख्त व क्रूर माना जाता है, लेकिन उनका स्वरूप पूर्णतया कांति व सौम्य है। उनके मस्तक पर चंद्रमा स्वरूप शोभा देखते ही बनती है। देवी भुवनेश्वरी अपने तेज और तीन नेत्रों से युक्त होने के कारण शक्तिशाली भी मानी जाती हैं। Bhuvaneshvari Jayanti उनके वैभव और शक्ति की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती है। माता भुवनेश्वरी पूरी सृष्टि की आराम और ऐश्वर्य की स्वामिनी मानी जाती हैं। उनका वर्ण श्याम तथा गौर माना जाता है, और उनके नख में पूरा ब्रह्मांड समाता है। माता भुवनेश्वरी के मुख का तेज सूर्य के समान लाल है, जो सकारात्मकता का संचार करता है। उनकी एक मुख और चार हाथ हैं, जो उनके यश और तेज की व्याख्या करते हैं। राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा…. देवी भुवनेश्वरी जयंती कथा (Devi Bhuvaneshvari Jayanti Katha) देवी भागवत में वर्णित कथा के अनुसार, एक समय दुर्गम नामक राक्षस ने अपने अत्याचारों से सभी देवी-देवताओं को त्रस्त कर दिया था। दुर्गम राक्षस के अधर्म से व्यथित होकर देवताओं और ब्राह्मणों ने हिमालय पर्वत पर देवी भुवनेश्वरी की आराधना की। Bhuvaneshvari Jayanti देवताओं और ब्राह्मणों की आराधना से प्रसन्न होकर देवी स्वयं बाण, कमल पुष्प, शाक, मूल आदि लेकर वहां प्रकट हुईं। देवी माँ ने अपने नेत्रों से जल की सहस्त्र धाराएँ प्रकट कीं, जिससे पृथ्वी के सभी प्राणी तृप्त हो गए। देवी माँ के नेत्रों से बहते आंसुओं के कारण सभी नदियां और समुद्र अपार जल से भर गए। सभी पेड़-पौधे, जड़ी-बूटियां और औषधियां सिंचित हो गईं। Bhuvaneshvari Jayanti देवी भुवनेश्वरी ने दुर्गमासुर से युद्ध किया और उसे परास्त कर दिया। इस तरह देवताओं पर आए भीषण संकट का समाधान हो गया। दुर्गमासुर का वध करने के कारण देवी भुवनेश्वरी, देवी दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हुईं। दश महाविद्याएँ (Ten Mahavidya Devi) देवी के दस रूप हैं, जिन्हें दश महाविद्या कहा जाता है। ये दस देवियां दिव्य स्त्री (आदि शक्ति) के महान ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती हैं। Bhuvaneshvari Jayanti ये हिंदू धर्म में तांत्रिक पूजा का केंद्र हैं, जो भक्तों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन और शक्ति प्रदान करती हैं। 1. काली 2. तारा 3. त्रिपुर सुंदरी (षोडशी) 4. भुवनेश्वरी 5. भैरवी 6. छिन्नमस्ता 7. धूमावती 8. बगलामुखी 9. मातंगी 10. कमला मां भुवनेश्वरी देवी की पूजा विधि (How to Perform Devi Bhuvaneshvari Puja) माँ भुवनेश्वरी की साधना के लिए कुछ विशेष समय बहुत ही शुभ माने जाते हैं: • रात्रि • ग्रहण • होली • दीपावली • महाशिवरात्रि • कृष्ण पक्ष की अष्टमी • चतुर्दशी आवश्यक सामग्री (Puja Samagri): • लाल रंग के पुष्प • नैवेद्य • चंदन • कुंकुम • रुद्राक्ष की माला • लाल रंग (वस्त्र आदि के लिए) पूजा करने का तरीका: मां भुवनेश्वरी देवी जी की चौकी लाल वस्त्र से सुसज्जित होनी चाहिए। देवी मां की मूर्ति या चित्र स्थापित करके पंचोपचार और षोडशोपचार द्वारा पूजा करनी चाहिए। मां भुवनेश्वरी देवी के मंत्र (Mantras of Devi Bhuvaneshvari) मंत्रों का एक खास महत्व होता है और पूजा को सफल बनाने के लिए इन मंत्रों का जाप करना बहुत आवश्यक है। इन विशेष मंत्रों का जाप करने से मां भुवनेश्वरी देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो आपका जीवन सफल बनाने हेतु बहुत ही सहायक होते हैं। इनके मूल मंत्र हैं: • “ऊं ऐं ह्रीं श्रीं नम:” • “हृं ऊं क्रीं” (त्रयक्षरी मंत्र) • “ऐं हृं श्रीं ऐं हृं” इन सभी मंत्रों का जाप करने से मां के भक्तों को असीम सुखों एवं सिद्धियों की प्राप्ति होती है। पूजा के लाभ (Benefits of Worship) देवी भुवनेश्वरी भक्तों को संतान सुख, धन, विद्या और सौभाग्य आदि प्रदान करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा करने से भक्तों को असीम आराम और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। यह देव चेतनात्मक अनुभूति का आनंद करा सकती है यदि इनकी पूजा पूरे सद्भाव और नियमों से की जाए तो। गायत्री उपासना में भी भुवनेश्वरी जी का भाव है और इसी कारण इनकी उपासना करने का एक विशेष महत्व है।

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Radha Ashtami

Radha Ashtami Vrat Niyam: राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा….

Radha Ashtami Vrat Niyam: हिंदू धर्म में राधा अष्टमी का पर्व अत्यंत पावन और श्रद्धा से भरा हुआ दिन माना जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त और प्रेम स्वरूपा श्री राधा रानी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। Radha Ashtami खासकर ब्रजभूमि, मथुरा और वृंदावन जैसे तीर्थस्थलों पर इस दिन विशेष उत्सव और झांकियों का आयोजन होता है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं, कीर्तन-भजन करते हैं और राधा रानी की विधिपूर्वक पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में प्रेम, सौहार्द और सुख-शांति का वास होता है, और वैवाहिक जीवन में प्रेम बढ़ता है। हालांकि, Radha Ashtami राधा अष्टमी के दिन पूजा-पाठ और व्रत के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना बहुत जरूरी माना गया है। सही विधि से पूजा न करने या कुछ गलतियां करने पर पूजा का फल बाधित हो सकता है। Radha Ashtami इसलिए, इस पावन अवसर पर क्या करना चाहिए और किन बातों से बचना चाहिए, यह जानना आवश्यक है, ताकि श्रद्धा के साथ किया गया पूजन पूर्ण फलदायक हो सके। Radha Ashtami Vrat Niyam: राधा अष्टमी व्रत में इन नियमों का रखें ध्यान, वरना अधूरी रह सकती है पूजा….. Radha Ashtami: राधा अष्टमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त इस वर्ष, वैदिक पंचांग के अनुसार राधा अष्टमी 31 अगस्त 2025, रविवार को मनाई जाएगी। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि आरंभ: 30 अगस्त, रात्रि 10:46 बजे से भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त: 1 सितंबर, देर रात 12:57 बजे तक उदयातिथि के अनुसार: राधा अष्टमी 31 अगस्त को मनाई जाएगी। राधा अष्टमी पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: 31 अगस्त, प्रातः 11:05 बजे से दोपहर 1:38 बजे तक रहेगा। What to do on the day of Radha Ashtami fast: राधा अष्टमी व्रत के दिन क्या करें? राधा रानी की कृपा प्राप्त करने और व्रत का पूर्ण फल पाने के लिए इन बातों का ध्यान रखें: स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर शुद्ध जल से स्नान करें। स्नान के बाद साफ और स्वच्छ कपड़े पहनें ताकि मन और शरीर दोनों पवित्र रहें। तभी व्रत और पूजा का संकल्प लें। ब्रह्मचर्य का पालन: पूरे दिन ब्रह्मचर्य नियम का पालन करना अनिवार्य माना जाता है। इसका मतलब है कि आप न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि मानसिक रूप से भी संयमित और शुद्ध रहें। पवित्र भोग: राधा रानी को केवल ताजी और पवित्र चीज़ें जैसे ताजे फल, दूध, दूध से बने प्रसाद, फूल, इत्यादि ही भोग के रूप में लगाएं। पुरानी या अर्धपकी हुई चीज़ें अर्पित न करें। व्रत कथा पाठ/श्रवण: पूजा के बाद राधा अष्टमी व्रत की कथा का पाठ या श्रवण करें। इससे व्रत की महिमा और धार्मिकता बढ़ती है और मन को आध्यात्मिक शांति मिलती है। शुभ मुहूर्त में पारण: व्रत खोलने का समय खास होता है। शुभ मुहूर्त में ही व्रत का पारण करना चाहिए ताकि पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त हो। जल्दबाजी न करें और समय का सम्मान करें। प्रसाद ग्रहण: व्रत खोलते समय उसी प्रसाद को ग्रहण करें, जिसे पूजा में राधा रानी को भोग लगाया गया था। इससे पूजन की पूर्णता बनी रहती है। दान और गौ सेवा: व्रत खोलने से पहले जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, या धन दान करें। इसके अलावा गौ सेवा भी बहुत शुभ मानी जाती है। इससे पुण्य बढ़ता है और व्रत की सफलता सुनिश्चित होती है। बुजुर्गों का आशीर्वाद: पारण करने के बाद घर के बुजुर्गों या वरिष्ठों का आशीर्वाद लेना आवश्यक होता है। उनका आशीर्वाद आपके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है। Santan Saptami 2025: 29 या 30 अगस्त? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व What not to do on the day of Radha Ashtami fast: राधा अष्टमी व्रत के दिन क्या न करें? इन बातों से बचना चाहिए ताकि व्रत में कोई दोष न लगे और पूजा का फल बाधित न हो भोग को झूठा न करें: पूजा में जो भी भोग राधा रानी को अर्पित किया जाना है, वह पूरी तरह शुद्ध और बिना किसी स्पर्श के होना चाहिए। भोग बनाने के बाद उसे चखना या किसी भी तरह से झूठा करना वर्जित है। दिन में न सोएं: व्रत के दिन दिन में सोना धार्मिक दृष्टि से अनुचित माना गया है। इससे व्रत की तपस्या में बाधा आती है और इसका फल कम हो सकता है। शरीर की कटिंग से बचें: इस शुभ दिन शरीर की कटिंग जैसे बाल, नाखून या दाढ़ी काटना वर्जित होता है। इसे अशुद्धता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इससे बचना चाहिए। काले/गहरे कपड़े न पहनें: इस दिन काले या बहुत गहरे रंग के कपड़े पहनने से परहेज़ करें। राधा रानी को लाल और पीले रंग अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए इन्हीं रंगों के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। सिर ढक कर पूजा करें: पूजा करते समय महिलाओं को बाल बांधकर रखने चाहिए और सिर को चुनरी से ढकना चाहिए। यह श्रद्धा और शुद्धता का प्रतीक होता है। पुरुषों को भी सिर पर रुमाल या कपड़ा रखना चाहिए। बाल न धोएं: राधा अष्टमी की तिथि के दौरान बाल धोना वर्जित माना जाता है। Radha Ashtami यदि बाल धोने की आवश्यकता हो तो यह कार्य अष्टमी शुरू होने से पहले कर लेना चाहिए। निष्कर्ष राधा अष्टमी का व्रत अत्यंत फलदायी होता है, बशर्ते आप श्रद्धा और नियमों के साथ इसका पालन करें। इन नियमों का पालन कर आप राधा रानी की असीम कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को सुख-समृद्धि से भर सकते हैं। आपको राधा अष्टमी 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं..

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Santan Saptami

Santan Saptami 2025: 29 या 30 अगस्त? जानें सही तिथि, पूजा विधि और महत्व

Santan Saptami;प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी का व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए किया जाता है।Santan Saptami 2025 माताएं अपने बच्चों के कल्याण के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं।सनातन धर्म में संतान सप्तमी व्रत का खास महत्व है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने बच्चों की भलाई और सुरक्षा के लिए व्रत रखती हैं। इसके साथ ही शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है। इस बार यह व्रत (Santan Saptami 2025 ) कब रखा जाएगा? इस वर्ष 2025 में, Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी की तिथि को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति है। कई लोग जानना चाहते हैं कि संतान सप्तमी का व्रत 29 अगस्त को रखा जाएगा या 30 अगस्त को। आइए, इस भ्रम को दूर करते हैं और जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि। संतान सप्तमी डेट और पूजा मुहूर्त (Santan Saptami 2025 Date And Puja Time) Santan Saptami 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, सप्तमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त को रात 08 बजकर 21 मिनट पर होगा। वहीं, इसका अंत 30 अगस्त को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। ऐसे में 30 अगस्त को संतान सप्तमी का उपवास रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 05 मिनट से दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। चूंकि उदय तिथि के अनुसार व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, इसलिए Santan Saptami 2025 संतान सप्तमी का व्रत 30 अगस्त 2025, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन सूर्योदय के समय सप्तमी तिथि रहेगी, जो व्रत के लिए सर्वाधिक मान्य है। संतान सप्तमी व्रत का महत्व:Importance of Santan Saptami fast धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संतान सप्तमी का व्रत अपार पुण्य फलदायी होता है। इस व्रत को करने से: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां… संतान सप्तमी 2025: पूजा विधि: Santan Saptami 2025: Puja method संतान सप्तमी के दिन व्रत और पूजा करने की विधि इस प्रकार है: निष्कर्ष संतान सप्तमी का व्रत माता-पिता के लिए उनकी संतान के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। इस वर्ष 30 अगस्त 2025 को श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत को रखें और भगवान शिव और माता पार्वती से अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करें। यह ब्लॉग पोस्ट आपकी वेबसाइट ‘कर्मसु’ के लिए बहुत उपयुक्त है, क्योंकि यह धार्मिक जानकारी को स्पष्ट और व्यवस्थित तरीके से प्रस्तुत करती है, जो पाठकों के लिए उपयोगी है।

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Ganesh Visarjan

Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा, जानें गणेश जी के विसर्जन की तिथियां…

Ganesh Visarjan: हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से गणेश उत्सव का शुभारंभ होता है. यह पर्व दस दिनों तक पूरे भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है, और अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है. गणेश चतुर्थी का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसी दिन विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, प्रथम पूज्य श्री गणेश जी का प्राकट्य हुआ था. यह उत्सव केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष और अब तो विदेशों में भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. सार्वजनिक पंडालों में गणेश जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, Ganesh Visarjan जहां दस दिनों तक अखंड भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ और सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं. गृहस्थ लोग भी बप्पा की कृपा पाने के लिए अपने घर में गणेश जी को स्थापित करते हैं. गणेश चतुर्थी Ganesh Visarjan के दिन बप्पा को घर लाकर विधिवत पूजा करने के साथ उसी दिन या फिर डेढ़, तीन, पांच, सात दिन में, या फिर अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा को जल में विसर्जित करते हैं. Ganesh Visarjan विसर्जन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है. यदि आप भी घर पर गणपति बप्पा को लेकर आए हैं, तो द्रिक पंचांग और हिंदू पंचांग के अनुसार जान लें कि Ganesh Visarjan गणपति बप्पा को किस तिथि और किस समय विदा करना सबसे शुभ है. अनंत चतुर्दशी 2025 की तिथि और विसर्जन मुहूर्त: Anant Chaturdashi 2025 date and immersion time अनंत चतुर्दशी, जो गणेश उत्सव का अंतिम दिन होता है, 6 सितंबर 2025, शनिवार को मनाई जाएगी. • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि प्रारम्भ: 6 सितंबर 2025 को 03:12 ए एम बजे • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि समाप्त: 7 सितंबर 2025 को 01:41 ए एम बजे • उदया तिथि के हिसाब से अनंत चतुर्दशी: 6 सितंबर 2025 को अनंत चतुर्दशी पर गणेश विसर्जन के शुभ मुहूर्त (6 सितंबर 2025, शनिवार) • प्रातः मुहूर्त (शुभ): 07:36 ए एम से 09:10 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:19 पी एम से 05:02 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 06:37 पी एम से 08:02 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 7 सितंबर को 09:28 पी एम से 01:45 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 7 सितंबर को 04:36 ए एम से 06:02 ए एम तक Ganesh Visarjan 2025 date: अनंत चतुर्दशी से पहले इन दिनों में कर सकते हैं बप्पा को विदा अनंत चतुर्दशी से पहले गणेश विसर्जन के अन्य शुभ मुहूर्त:Other auspicious times for Ganesh immersion before Anant Chaturdashi Ganesh Visarjan अगर आप पूरे दस दिनों तक बप्पा को नहीं रख सकते हैं, तो हिंदू पंचांग के अनुसार Ganesh Visarjan गणेश चतुर्थी के दिन, डेढ़ दिन बाद, तीसरे दिन, पांचवें दिन या सातवें दिन भी बप्पा का विसर्जन किया जा सकता है. इन दिनों पर विसर्जन के लिए शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: 1. गणेश चतुर्थी पर गणेश विसर्जन (27 अगस्त 2025, बुधवार): • अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ): 03:35 पी एम से 06:48 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 28 अगस्त को 08:12 पी एम से 12:23 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (लाभ): 28 अगस्त को 03:10 ए एम से 04:33 ए एम तक 2. एक और आधा दिन (डेढ़ दिन) के बाद गणेश विसर्जन (28 अगस्त 2025, बृहस्पतिवार) • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 12:22 पी एम से 03:35 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 05:11 पी एम से 06:47 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (अमृत, चर): 06:47 पी एम से 09:35 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 29 अगस्त को 12:22 ए एम से 01:46 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ, अमृत): 29 अगस्त को 03:10 ए एम से 05:58 ए एम तक 3. तीसरे दिन गणेश विसर्जन (29 अगस्त 2025, शुक्रवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 05:58 ए एम से 10:46 ए एम तक • अपराह्न मुहूर्त (चर): 05:10 पी एम से 06:46 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 12:22 पी एम से 01:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 09:34 पी एम से 10:58 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 30 अगस्त को 12:22 ए एम से 04:34 ए एम तक 4. पांचवें दिन गणेश विसर्जन (31 अगस्त 2025, रविवार): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 07:34 ए एम से 12:21 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 01:57 पी एम से 03:32 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 06:44 पी एम से 10:57 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (लाभ): 1 सितंबर को 01:46 ए एम से 03:10 ए एम तक • उषाकाल मुहूर्त (शुभ): 1 सितंबर को 04:35 ए एम से 05:59 ए एम तक 5. सातवें दिन गणेश विसर्जन (2 सितंबर 2025): • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): 09:10 ए एम से 01:56 पी एम तक • अपराह्न मुहूर्त (शुभ): 03:31 पी एम से 05:06 पी एम तक • सायाह्न मुहूर्त (लाभ): 08:06 पी एम से 09:31 पी एम तक • रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): 3 सितंबर को 10:56 पी एम से 03:10 ए एम तक निष्कर्ष गणेश विसर्जन Ganesh Visarjan का पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में हर चीज़ का एक अंत होता है, Ganesh Visarjan और यह चक्र चलता रहता है. बप्पा को विधिवत विदा करने से वे अगले साल वापस आने का न्यौता स्वीकार करते हैं और आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. अस्वीकरण: यह लेख विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं. हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है. इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं. इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

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Parivartini ekadashi

Parivartini ekadashi 2025:परिवर्तिनी एकादशी पर जरूर करें इन चीजों का दान, सभी संकट होंगे दूर

Parivartini ekadashi: हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर व्रत किया जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि पर परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi 2025) व्रत किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और श्रीहरि की कृपा प्राप्त होती है। Parivartini ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। उपासक पर उनकी कृपा बनी रहती है। प्रत्येक मास में दो एकादशी व्रत आते हैं। हर मास की एकादशियों का खास महत्व माना जाता है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के लिये सो जाते हैं। इसलिये इन चार महीनों को चतुर्मास कहा जाता है और धार्मिक कार्यों, ध्यान, भक्ति आदि के लिये यह समय श्रेष्ठ माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आषाढ़, श्रावण, भादों, आश्विन ये चारों मास धार्मिक रूप से चतुर्मास और चौमासा के रूप में जाने जाते हैं और ऋतुओं में यह काल वर्षा ऋतु का। भगवान विष्णु चार महीनों तक सोते रहते हैं और देवोठनी एकादशी को ही जागृत होते हैं, लेकिन इन महीनों में एक समय ऐसा भी आता है कि सोते हुए भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं। यह समय होता है भादों मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का। इसलिये इसे परिवर्तिनी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है। आइये जानते हैं भादों मास की शुक्ल एकादशी यानि परिवर्तिनी एकादशी के बारे में – परिवर्तिनी एकादशी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Parivartini ekadashi 2025 Muhurat) इस साल 2025 पार्श्व एकादशी बुधवार, 3 सितम्बर 2025 को है। 4 सितम्बर को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय: दोपहर 01:36 से शाम 04:08 बजे तक। पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय: सुबह 10:18 बजे। एकादशी तिथि प्रारम्भ: 3 सितम्बर 2025 को सुबह 03:53 बजे से। एकादशी तिथि समाप्त: 4 सितम्बर 2025 को सुबह 04:21 बजे तक। परिवर्तिनी एकादशी व्रत एवं पूजा विधि? (Parivartini Ekadashi Vrat aur pooja vidhi) स्नान और संकल्प: इस दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। पूजा का संकल्प लेते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें। भगवान विष्णु की पूजा: भगवान विष्णु के वामन अवतार की मूर्ति या तस्वीर को एक साफ स्थान पर स्थापित करें। व्रत का पालन: इस दिन निर्जल या फलाहार व्रत करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। रामायण और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ: दिनभर विष्णु सहस्त्रनाम और रामायण का पाठ करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। परिवर्तिनी एकादशी पूजा सामग्री (Parivartini Ekadashi Pooja Samagri) इस एकादशी पर व्रत रखने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह व्रत पापों का नाश करता है और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत से मानसिक शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सभी दुखों का अंत होता है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्व (Parivartini Ekadashi Mahatav) परिवर्तिनी एकादशी Parivartini ekadashi को पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, जयझूलनी, डोल ग्यारस, जयंती एकादशी आदि कई नामों से जाना जाता है। मान्यता है कि इस एकादशी के व्रत से वाजपेय यज्ञ जितना पुण्य फल उपासक को मिलता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की आराधना की जाती है। जो साधक अपने पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान में जाने-अंजाने किये गये पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं और मोक्ष की कामना रखते हैं उनके लिये यह एकादशी मोक्ष देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा (Parivartini Ekadashi Vrat Katha) परिवर्तनी एकादशी की कथा भगवान विष्णु के वामना अवतार से जुड़ी हुई है। अपने वामनावतार में भगवान विष्णु ने राजा बलि की परीक्षा ली थी। राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया था लेकिन उसमें एक गुण यह था कि वह किसी भी ब्राह्मण को खाली हाथ नहीं भेजता था उसे दान अवश्य देता था। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने उसे भगवान विष्णु की चाल से अवगत भी करवाया लेकिन बावजूद उसके बलि ने वामन स्वरूप भगवान विष्णु को तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया। फिर क्या था दो पगों में ही भगवान विष्णु ने समस्त लोकों को नाप दिया तीसरे पग के लिये कुछ नहीं बचा तो बलि ने अपना वचन पूरा करते हुए अपना शीष उनके पग के नीचे कर दिया। भगवान विष्णु की कृपा से बलि रसातल में पाताल लोक में रहने लगा लेकिन साथ ही उसने भगवान विष्णु को भी अपने यहां रहने के लिये वचनबद्ध कर लिया था। परिवर्तिनी एकादशी पर इन करें चीजों का दान (Parivartini Ekadashi Daan List) परिवर्तिनी एकादशी की पूजा के बाद दान करना शुभ माना जाता है। इस दिन सच्चे मन से अन्न, मिठाई, फल और धन का दान करें। मान्यता है कि इन चीजों का दान करने से पैसों की कमी का सामना नहीं करना पड़ता है। इसके अलावा जीवन के दुख और संकट को दूर करने के लिए परिवर्तिनी एकादशी पर दूध और दही का दान करें। माना जाता है कि ऐसा करने से सभी तरह की परेशानियों का अंत होता है।   अगर आप गृह क्लेश और रोग का सामना कर रहे है, तो ऐसे में परिवर्तिनी एकादशी व्रत करें और जल का दान करें। इससे कुंडली में पितृ और चंद्र दोष का प्रभाव कम होता है। इसके अलावा आर्थिक तंगी दूर होती है। परिवर्तिनी एकादशी के दिन पीले रंग के वस्त्र का दान करना शुभ माना जाता है, क्योंकि विष्णु जी को पीला रंग प्रिय है। ऐसा करने से श्रीहरि प्रसन्न होते हैं।

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Parivartini Ekadashi 2025: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Parivartini Ekadashi 2025: सितंबर माह में आने वाली पहली एकादशी परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) के नाम से जानी जाती है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत शुभ और लाभकारी महत्व बताया गया है, और यह व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में करवट लेते हैं, जिससे इस एकादशी का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। यह व्रत करने से व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। आइए जानते हैं परिवर्तिनी एकादशी 2025 की सही तारीख, इसका महत्व, पूजा विधि और व्रत पारण का समय। Parsva Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025: कब है व्रत, जानें तारीख, महत्व, शुभ मुहूर्त और….. Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी 2025 कब है? वैदिक पंचांग के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी की तिथि इस प्रकार है: • एकादशी तिथि का आरंभ: 3 सितंबर 2025, बुधवार को सुबह 03 बजकर 53 मिनट से होगा। • एकादशी तिथि का समापन: अगले दिन 4 सितंबर 2025, गुरुवार को सुबह 04 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। • व्रत का दिन: ऐसे में, परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 3 सितंबर 2025, बुधवार को रखा जाएगा। यह सितंबर 2025 महीने का पहला एकादशी व्रत होगा। नोट: एकादशी व्रत 2025 की एक सामान्य सूची में परिवर्तिनी एकादशी की तारीख 14 सितंबर 2025 भी दी गई है। हालांकि, नवभारत टाइम्स और लाइव हिंदुस्तान जैसे प्रमुख स्रोतों ने 3 और 4 सितंबर 2025 को परिवर्तिनी एकादशी के रूप में विशेष रूप से विस्तृत जानकारी दी है। इसलिए, अधिक विशिष्ट जानकारी के आधार पर, 3 सितंबर को व्रत रखा जाएगा। Parivartini Ekadashi: परिवर्तिनी एकादशी का महत्व परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi को पद्म एकादशी, पार्श्व एकादशी और जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान योग निद्रा में वास कर रहे भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं। यही वजह है कि इस दिन को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी पर व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है और उसे सभी सुखों की प्राप्ति होती है। अंत में, व्यक्ति वैकुंठ लोक को प्राप्त होता है। भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में धन, धान्य, सुख और समृद्धि आती है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 पूजा विधि परिवर्तिनी एकादशी Parivartini Ekadashi का व्रत विधि-विधान से करने पर शुभ फल प्राप्त होते हैं। यहाँ पूजा विधि के चरण दिए गए हैं: 1. सुबह उठें और संकल्प लें: परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्नान के बाद पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। 2. मंदिर की सफाई और पंचामृत स्नान: इसके बाद भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को प्रणाम करें। पूजा के लिए मंदिर की अच्छी तरह से साफ-सफाई करें और सबसे पहले भगवान विष्णु को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल का मिश्रण) से स्नान कराएं। 3. सामग्री अर्पित करें: स्नान के बाद भगवान विष्णु को पीले फूल, अक्षत (साबुत चावल), सुपारी और तुलसी के पत्ते अर्पित करें। 4. मंत्र जप: इस दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का लगातार जप करते रहें। 5. व्रत कथा और आरती: इसके बाद परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। 6. व्रत पारण: एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में किया जाता है। शुभ योग और पूजन मुहूर्त परिवर्तिनी एकादशी 2025 पर कई शुभ संयोग बन रहे हैं, जिनमें किए गए कार्य शुभ फलदायी होते हैं: • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 30 मिनट से सुबह 05 बजकर 15 मिनट तक। • रवि योग: सुबह 06 बजे से रात 11 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। • अन्य शुभ योग: इस दिन आयुष्मान योग और सौभाग्य योग का भी शुभ संयोग बन रहा है। परिवर्तिनी एकादशी 2025 व्रत पारण का समय व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना चाहिए। परिवर्तिनी एकादशी व्रत का पारण 4 सितंबर 2025, गुरुवार को किया जाएगा। • पारण का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 36 मिनट से शाम 04 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। पारण करने से पहले ब्राह्मणों को भोजन करवाने या अन्न का दान करने का विधान है। एकादशी व्रत के सामान्य नियम एकादशी व्रत के कुछ सामान्य नियम भी हैं जिनका पालन करना महत्वपूर्ण है: • चावल वर्जित: एकादशी के दिन चावल और चावल से बनी चीजों का सेवन वर्जित माना गया है। • सात्विक भोजन: मांस-मदिरा, लहसुन, प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए। • संयम: इस दिन स्त्री-पुरुष को संयम भाव से रहना चाहिए और मन तथा वाणी से किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं रखना चाहिए। • रात्रि जागरण: एकादशी व्रत रखने वाले व्यक्ति के लिए रात्रि में जागरण करके भगवान का ध्यान और भजन करने का भी विधान है। • दान-पुण्य: एकादशी के दिन दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। यह व्रत श्रद्धा और भक्तिभाव से करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है।

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Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय, गणपति बप्पा की कृपा से घर आएगी सुख-समृद्धि

Ganesh Chaturthi 2025 Upay: गणेश चतुर्थी पर कुछ उपायों को करने से जीवन में सुख-शांति व समृद्धि आती है। जानें भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी पर क्या उपाय करना चाहिए। Ganesh chaturthi remedies 2025: भगवान गणेश के जन्मदिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन बुद्धि, समृद्धि व सौभाग्य के देवता गणपति बप्पा की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति या प्रतिमा स्थापित करते हैं। Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः गणेश चतुर्थी का उत्सव 10 दिन तक मनाया जाता है और अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है। Ganesh Chaturthi भगवान गणेश की कृपा या आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लोग इस दिन कई तरह के उपाय करते हैं। मान्यता है कि इस दिन कुछ उपायों को करने से गणपति बप्पा की कृपा से जीवन में धन-संपदा आती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। जानें गणेश चतुर्थी के दिन क्या करें उपाय। Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर करें ये 5 उपाय 1. भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय माने गए हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 2. गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। 3. भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से मनवांछित फल मिलता है और धन-धान्य बढ़ता है। 4. अगर संभव हो सके हो तो, गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्यों की विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। 5. भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन करने चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। Ganesh Chaturthi इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Bhuvaneshwari Jayanti 2025

Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date: भुवनेश्वरी जयंती: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा

Bhuvaneshwari Jayanti: हिंदू धर्म में, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भुवनेश्वरी जयंती मनाई जाती है। यह दिन देवी भुवनेश्वरी की साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन मां भुवनेश्वरी का अवतरण हुआ था। दस महाविद्याओं में से एक, मां भुवनेश्वरी, इस ब्रह्मांड की समस्त शक्ति का आधार हैं। उनका स्वरूप अत्यंत कांतिपूर्ण और सौम्य है, और स्वयं भगवान शंकर ने भी उनके पाठ से समस्त आगमों तथा तंत्रों में विज्ञानी हुए हैं। Bhuvaneshwari Jayanti इस विशेष दिन पर मां भुवनेश्वरी की आराधना करने से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। मां भुवनेश्वरी की महिमा और पूजा का महत्व: मां भुवनेश्वरी को ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, जो सृष्टि के पालन, पोषण और संहार का कार्य करती हैं। गुरु के सानिध्य में, गुरु के मुख से अभ्यास करके, जो मनुष्य शिवालय, शून्य घर या चौराहे पर इनके मंत्र का जप करता है, वह योगी बन जाता है। Bhuvaneshwari Jayanti 2025 Date जो एकाग्रचित्त होकर इसे सदा पढ़ता या सुनता है, Bhuvaneshwari Jayanti वह दीर्घायु और सुखी होता है, उसकी वाणी ओजस्वी हो जाती है। ऐसा व्यक्ति गुरु के चरणों में श्रद्धावान होकर स्त्रियों का प्रिय होता है। दुर्भाग्य और कष्टों से मुक्ति का उपाय: मंत्रमहार्णव के अनुसार, जो नारी दुर्भाग्य, धन-धान्य की कमी, रोग और कष्टों से पीड़ित है, उसे भोजपत्र पर देवी का मंत्र लिखकर अपने बाएं हाथ में बांधना चाहिए। ऐसा करने से उसे सुख और सौभाग्य दोनों प्राप्त होते हैं। पुरुषों को यही मंत्र अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। अतः, यदि आप भी इन सभी चीज़ों को प्राप्त करना चाहते हैं, तो Bhuvaneshwari Jayanti भुवनेश्वरी जयंती के दिन आपको मां भुवनेश्वरी की साधना अवश्य करनी चाहिए। भुवनेश्वरी देवी के मंत्र और पूजा विधि: भुवनेश्वरी देवी का एकाक्षरी मंत्र ‘ह्रीं’ है। उनका विशेष मंत्र है: ‘ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:’। पूजा विधि: इस मंत्र का कम से कम 1100 बार जाप करना चाहिए। किसी भी मंत्र का जितना जाप किया जाता है, उसके जप का 10 प्रतिशत हवन, 10 प्रतिशत तर्पण, 10 प्रतिशत मार्जन और 10 प्रतिशत ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। हवन सामग्री: मां भुवनेश्वरी का होम पीपल, गूलर, पलाश, बरगद की समिधाएं, पीली सरसों, खीर और घी आदि से किया जाता है। मंत्र जाप के बाद आप इनमें से किसी भी एक चीज़ का होम कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti: देवी मां की आराधना से मिलेगा सौभाग्य, राशिनुसार ऐसे करें पूजा राशि अनुसार भुवनेश्वरी जयंती Bhuvaneshwari Jayanti के विशेष उपाय: भुवनेश्वरी जयंती के दिन विभिन्न राशि के जातक अपनी समस्याओं के निवारण और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए विशेष उपाय कर सकते हैं: • मेष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करने के बाद पीपल की समिधा से हवन करें। इससे जीवन में आ रही परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। • वृष राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके दूध-चावल से बनी खीर का होम करें। इससे व्यापार में वृद्धि के लिए आर्थिक मदद मिलेगी। • मिथुन राशि: ब्राह्मी और घी को देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से अभिमंत्रित करके पूरे एक साल तक पिएं। इससे आपमें सुंदर कविता करने की अद्भुत क्षमता आएगी। • कर्क राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके बरगद की समिधा से हवन करें। इससे हर तरह के वाद-विवाद से छुटकारा मिलेगा। • सिंह राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके गूलर की समिधा से होम करें। Bhuvaneshwari Jayanti इससे विरोधियों से छुटकारा मिलेगा और भय दूर होगा। • कन्या राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके पीली सरसों का होम करें। इससे आप किसी को भी अपने वश में करने की क्षमता हासिल कर लेंगे। • तुला राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके घी, मधु और शक्कर से युक्त खीर से होम करें। इससे आपको नौकरी में तरक्की मिलेगी। • वृश्चिक राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके चंदन के जल से युक्त चावल से होम करें। आप जिस भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, आपको उस क्षेत्र में सफलता अवश्य मिलेगी। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि • धनु राशि: सुख-सौभाग्य पाने के लिए, भोजपत्र पर देवी भुवनेश्वरी का एकाक्षरी मंत्र “ह्रीं” लिखकर स्त्रियों को अपने बाएं हाथ में और पुरुषों को अपने दाहिने हाथ में बांधना चाहिए। Bhuvaneshwari Jayanti इससे शीघ्र ही सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होगी और जीवन में कोई अड़चन नहीं आएगी। • मकर राशि: जीवन में खुशहाली के लिए, अपने सामने एक लोटा जल लेकर बैठ जाएं और देवी भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का 21 बार जाप करें। जाप करने के बाद उस जल से अपना अभिषेक करें। ऐसा करने से आपके जीवन में खुशहाली बनी रहेगी. • कुंभ राशि: मां भुवनेश्वरी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” का जाप करके देवी को चंदन, अगर, कपूर और केसर की गंध अर्पित करके, पलाश की समिधा से हवन करें। ऐसा करने से आपको श्रेष्ठ वाणी की प्राप्ति होगी और आप सभी को जल्द ही प्रभावित कर पाने में सफल होंगे। • मीन राशि: शुद्ध जल लेकर, उसे देवी के मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्ये नम:” से इक्कीस बार अभिमंत्रित करना चाहिए और अभिमंत्रित करने के बाद उस जल को पीना चाहिए। इस प्रकार मंत्र से अभिमंत्रित जल का पान करने से आपकी बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होगी। निष्कर्ष: भुवनेश्वरी जयंती (Bhuvaneshwari Jayanti) का यह पावन अवसर मां भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त करने का एक अद्भुत मौका है। ऊपर बताए गए उपायों और मंत्रों का विधि-विधान से पालन करके आप देवी मां को प्रसन्न कर सकते हैं और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सफलता प्राप्त कर सकते हैं। Bhuvaneshwari Jayanti अपनी राशि के अनुसार उपाय करके आप अपनी विशिष्ट इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकते हैं।

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Hartalika Teej

Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम

Hartalika Teej: हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का पावन व्रत मनाया जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इस दिन, सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले मां पार्वती ने ही हरतालिका तीज का व्रत रखकर भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। हरतालिका तीज Hartalika Teej का व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत रखने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कुंवारी कन्याओं के विवाह में आ रही परेशानियां दूर होती हैं, साथ ही उन्हें मनचाहा वर भी मिलता है। Hartalika Teej: ससुराल में भूलकर भी न करें पहला व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और नियम When is Hartalika Teej 2025: हरतालिका तीज 2025 कब है? इस साल हरतालिका तीज का व्रत मंगलवार, 26 अगस्त 2025 को रखा जाएगा। हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रातःकाल हरितालिका पूजा मुहूर्त – सुबह 05:56 बजे से 08:31 बजे तक अवधि – 02 घंटे 35 मिनट पहला हरतालिका तीज का व्रत ससुराल में क्यों नहीं करना चाहिए? हरतालिका तीज का व्रत काफी नियमों के साथ किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान शुभ परिणाम को विपरीत परिणाम में बदल सकता है। हरतालिका तीज को लेकर लंबे समय से एक परंपरा चली आ रही है कि नवविवाहित कन्या के द्वारा यह व्रत अपने मायके में ही शुरू किया जाता है। तीज का पहला व्रत ससुराल से नहीं रखा जाता है। इस दौरान नवविवाहित कन्याएं अपने मायके आती हैं और भगवान भोलेनाथ की पूरे धूमधाम से पूजा-आराधना करती हैं। एक बार मायके से व्रत की शुरुआत करने के बाद, आप ससुराल में हों या मायके में, कहीं भी यह व्रत कर सकती हैं। हरतालिका तीज व्रत का रहस्य- बारहवें सतयुग की कथा Hartalika Teej Puja Method:हरतालिका तीज पूजा विधि हरतालिका तीज Hartalika Teej के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और नए वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर सभी देवी-देवताओं को धूप-दीप दिखाएं और व्रत का संकल्प लें। पूजा के दौरान, महिलाओं को मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनानी चाहिए। माता गौरी ने भी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर ही भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। इसलिए, व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वे गंगा नदी या आसपास के किसी बहते हुए जलाशय से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं। हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा कर सकती हैं। इसके बाद, मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करें। Hartalika Teej हरतालिका तीज व्रत कथा का पाठ करें और सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें और अखंड सौभाग्य की कामना करें। भगवान को भोग भी लगाएं। हरतालिका तीज पूजन सामग्री की सूची:List of Hartalika Teej puja materials मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए पूजा के दौरान इन सामग्री का विशेष ध्यान रखें: फल, फूल, कपूर, घी, दीपक, मिठाई, सुपारी, पान, बताशा, कुमकुम, पूजा-कलश, सूखा नारियल, शमी का पत्ता, धतूरा, शहद, गुलाल, पंचामृत, कलावा, इत्र, चंदन, मंजरी, अक्षत, गंगाजल, दूर्वा, जनेऊ, बेलपत्र, वस्त्र और केले का पत्ता। यह व्रत जीवन भर रखा जाता है, लेकिन अगर किसी कारणवश इसे रख पाना संभव न हो तो इसका उद्यापन अवश्य करना चाहिए। हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए। मिट्टी से बनानी चाहिए भोलेनाथ की प्रतिमा:Bholenath’s statue should be made of clay ज्योतिषाचार्य ने बताया कि तीज करने के दौरान महिलाओं को चाहिए कि वह मिट्टी से भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा बनाएं. उन्होंने बताया कि सबसे पहले माता गौरी ने हरतालिका तीज का व्रत रखा था और उन्होंने मिट्टी की ही प्रतिमा बनाकर भगवान भोलेनाथ की आराधना की थी और भगवान भोलेनाथ को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था. ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाओं को चाहिए कि वह गंगा नदी या आसपास के किसी जलाशय जिसका पानी बह रहा हो वहां से मिट्टी लाकर भगवान भोलेनाथ के प्रतिमा बनाएं. हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ की तस्वीर रखकर भी पूजा करती हैं. ऐसे में हरतालिका तीज के दौरान सभी नियमों का संपूर्ण पालन करना चाहिए.

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Maharishi Dadhichi

Maharishi Dadhichi Jayanti: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा

Maharishi Dadhichi Jayanti Kab hai: दधीचि जयंती 2025: त्याग और बलिदान के प्रतीक महर्षि दधीचि की अविस्मरणीय गाथा Maharishi Dadhichi: हर साल भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को महर्षि दधीचि जयंती पूरे भारत में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह दिन एक ऐसे महान संत के सर्वोच्च त्याग को याद करने का अवसर है, जिन्होंने धर्म और मानवता की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था। वर्ष 2025 में, यह पावन पर्व 31 अगस्त को मनाया जाएगा। आइए, इस विशेष अवसर पर महर्षि दधीचि की प्रेरणादायक कहानी को जानें, जिन्होंने अपने निस्वार्थ बलिदान से देवताओं और संसार की रक्षा की। Maharishi Dadhichi Introduction to a great ascetic: महर्षि दधीचि: एक महान तपस्वी का परिचय महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi प्राचीन काल के सबसे पूज्य और महत्वपूर्ण संतों में से एक माने जाते हैं। वे ऋषि अथर्वा और माता शांति (कुछ मान्यताओं के अनुसार चित्ति) के पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम गभस्तिनी (या कुछ स्थानों पर शांति, जो कर्दम ऋषि की पुत्री थीं) और पुत्र का नाम पिप्पलाद था। महर्षि दधीचि भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उन्होंने अपना पूरा जीवन घोर तपस्या में समर्पित कर दिया था। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या के कारण उन्हें पूरे देश में अत्यंत सम्मान प्राप्त था। An attempt to break the doubts and penance of Devraj Indra: देवराज इंद्र की शंका और तपस्या भंग करने का प्रयास एक पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि दधीचि की घोर तपस्या से तीनों लोकों में भय का माहौल बन गया, और यहां तक कि देवराज इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगा। इंद्र को लगा कि दधीचि उनके इंद्रलोक और सिंहासन को हथियाना चाहते हैं। इस आशंका में, इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सरा रूपवती को भेजा। हालाँकि, Maharishi Dadhichi महर्षि दधीचि अपनी एकाग्रता में अटल रहे और अप्सरा अपने प्रयास में विफल रही। रूपवती ने स्वर्ग लौटकर इंद्र को दधीचि की एकाग्र शक्ति के बारे में बताया, जिसके बाद इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने महर्षि से क्षमा याचना की। वृत्रासुर का आतंक और देवताओं की दुर्दशा: The terror of Vritrasura and the plight of the gods समय बीतने के साथ, वृत्रासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया और सभी देवताओं को देवलोक से बाहर निकाल दिया था। वृत्रासुर इतना बलशाली था कि देवताओं के सभी अस्त्र-शस्त्र उसके सामने निष्प्रभावी हो गए और उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र प्रभावित नहीं कर पा रहा था। देवराज इंद्र सहित सभी देवता भयभीत होकर सहायता के लिए ब्रह्माजी के पास पहुंचे। Brahmaji’s advice and Maharishi’s amazing sacrifice: ब्रह्माजी की सलाह और महर्षि का अद्भुत त्याग ब्रह्माजी ने देवताओं को बताया कि वृत्रासुर का वध केवल महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की अस्थियों से बने विशेष वज्र से ही किया जा सकता है, क्योंकि उनकी हड्डियाँ असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। देवताओं के कल्याण के लिए यही एकमात्र उपाय था। देवराज इंद्र, अपने पूर्व के एक अपमानजनक व्यवहार के कारण महर्षि दधीचि के पास जाने में हिचकिचा रहे थे। (एक कथा के अनुसार, इंद्र ने एक बार दधीचि का अपमान किया था और उनके सिर को धड़ से अलग करने की धमकी दी थी जब महर्षि ब्रह्म विद्या अश्विनीकुमारों को देने वाले थे; अश्विनीकुमारों ने महर्षि के धड़ पर अश्व का सिर लगाकर विद्या प्राप्त की थी, जिसके बाद इंद्र ने उनका असली सिर धड़ से अलग कर दिया था, जिसे बाद में अश्विनीकुमारों ने फिर से जोड़ा था।)। लेकिन वृत्रासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण, उन्हें आखिरकार महर्षि दधीचि के पास जाना पड़ा और अपनी समस्या बताई। महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi ने, बिना किसी संकोच के, देवताओं और संसार के कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान करने का निर्णय लिया। भगवान शिव से प्राप्त वरदान के कारण उनका शरीर और अस्थियां असाधारण रूप से शक्तिशाली थीं। उन्होंने स्वेच्छा से अपने प्राणों का त्याग कर दिया, ताकि उनकी अस्थियों से वृत्रासुर का वध किया जा सके। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि ! Creation of Vajra and killing of Vritrasura:वज्र का निर्माण और वृत्रासुर का वध महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi की पवित्र अस्थियों से देवशिल्पी विश्वकर्मा ने एक शक्तिशाली वज्र का निर्माण किया। देवराज इंद्र ने इसी वज्र का प्रयोग कर वृत्रासुर का वध किया और देवताओं को उसकी आतंक से मुक्ति दिलाई। इस महान बलिदान के कारण, देवताओं और पूरे संसार की रक्षा हुई, और इंद्र की जय-जयकार होने लगी। त्याग की विरासत और पिप्पलाद का जन्म:Legacy of renunciation and birth of Pippalad महर्षि दधीचि Maharishi Dadhichi का यह बलिदान अनुपम है और सदियों से त्याग तथा निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक रहा है। उनकी पत्नी गभस्तिनी को जब इस त्याग का पता चला, तो वह सती होने को तैयार हो गईं। देवताओं ने उन्हें रोका, यह बताते हुए कि वह गर्भवती हैं। तब देवताओं ने उनके गर्भ को निकालकर पीपल के वृक्ष को उसके पालन-पोषण का दायित्व सौंपा। इसी कारण दधीचि के पुत्र का नाम पिप्पलाद ऋषि पड़ा। निष्कर्ष महर्षि दधीचि जयंती हमें निस्वार्थता, त्याग और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा की याद दिलाती है। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि जन कल्याण के लिए सर्वोच्च त्याग भी छोटा होता है। इस पावन दिन पर, हम उन महान ऋषि को नमन करते हैं जिन्होंने अपनी अस्थियों का दान कर मानवता की रक्षा की।

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Durva Ashtami

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Durva Ashtami 2025 Date: दूर्वा अष्टमी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व – पाएं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद! Kab Hai Durva Ashtami: हर साल भाद्रपद मास में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, राधा अष्टमी और अनंत चतुर्दशी प्रमुख हैं। इसी कड़ी में एक और महत्वपूर्ण पर्व है दूर्वा अष्टमी। यह पर्व दूर्वा घास को समर्पित है, जिसका हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। दूर्वा घास को केवल घास नहीं माना जाता, बल्कि इसे अत्यंत पवित्र और शुभ माना जाता है, जिसका प्रयोग लगभग सभी हिंदू अनुष्ठानों में किया जाता है। आइए जानते हैं दूर्वा अष्टमी 2025 की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसके धार्मिक महत्व को विस्तार से। दूर्वा अष्टमी 2025 कब है? (Durva Ashtami 2025 Date) वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 30 अगस्त 2025 को देर रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा। यह तिथि 31 अगस्त 2025 को देर रात 12 बजकर 57 मिनट पर समाप्त होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है, इसलिए दूर्वा अष्टमी का पर्व 31 अगस्त 2025 (रविवार) को मनाया जाएगा। दूर्वा अष्टमी 2025 के शुभ योग (Durva Ashtami 2025 Shubh Yog) दूर्वा अष्टमी के दिन कई शुभ योगों का निर्माण हो रहा है, जो इस पर्व के महत्व को और बढ़ा देते हैं। • अनुराधा नक्षत्र: भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर अनुराधा नक्षत्र का संयोग शाम 05 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। • ज्येष्ठा नक्षत्र: इसके बाद ज्येष्ठा नक्षत्र का संयोग बनेगा। • भद्रावास योग: इस शुभ अवसर पर भद्रावास योग का निर्माण हो रहा है, जो दिन में 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान भद्रा स्वर्ग में रहेंगी, और भद्रा के स्वर्ग में रहने के दौरान पृथ्वी वासियों का कल्याण होता है। दूर्वा अष्टमी का धार्मिक महत्व(Religious significance of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी Durva Ashtami का दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु की भक्ति-भाव से पूजा की जाती है। दूर्वा घास को पवित्रता का प्रतीक माना जाता है और हिंदू धर्म में कई पूजाएं इसके बिना अधूरी मानी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर व्रत रखने और दूर्वा घास की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और रौनक आती है, साथ ही भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ललिता सप्तमी 2025: तिथि, महत्व और संतान सुख व सौभाग्य के लिए संपूर्ण पूजा विधि पौराणिक कथा और दूर्वा घास का महत्व: प्राचीन कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु के सिर से कुछ बाल गिरे थे, जिन्हें दूर्वा घास माना जाता है। यह भी माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूँदें इस पर गिरी थीं, जिससे यह अत्यंत शुद्ध हो गई। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दूर्वा घास का महत्व बताया था। दूर्वा अष्टमी के दिन किए जाने वाले अनुष्ठान(Rituals performed on the day of Durva Ashtami) दूर्वा अष्टमी का त्योहार विशेष रूप से महिलाओं के बीच काफी प्रसिद्ध है। इस दिन किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान इस प्रकार हैं: • स्नान और वस्त्र धारण: महिलाएं इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए वस्त्र धारण करती हैं। • विशेष पूजा: दूर्वा अष्टमी के दिन विशेष प्रकार की पूजा और अन्य रीति-रिवाज किए जाते हैं। • भोग और सामग्री: पूजा में फल, फूल, चावल, धूपबत्ती, दही और अन्य आवश्यक पूजन सामग्री के साथ भोग चढ़ाया जाता है। • व्रत का संकल्प: इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं और ईश्वर को भोग अर्पित करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। दूर्वा अष्टमी और पर्यावरण संरक्षण (Durva Ashtami and environmental protection) Durva Ashtami: दूर्वा अष्टमी का पर्व हमें पर्यावरण को सहेजने का भी महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुड़ी हर एक चीज बहुत महत्वपूर्ण है। दूर्वा घास को घर में भी आसानी से लगाया जा सकता है, और इसे उगाने के लिए विशेष मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती। सबसे बड़ी बात यह है कि दूर्वा घास को घर में लगाने से शुद्धता और पवित्रता का आगमन होता है। यह त्यौहार हमें यह भी याद दिलाता है कि पेड़-पौधे लगाना कितना आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। पंचांग (31 अगस्त 2025 के लिए) • सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 19 मिनट पर • सूर्यास्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट पर • चंद्रोदय – दोपहर 12 बजकर 08 मिनट से… • चंद्रास्त – रात 10 बजकर 52 मिनट तक • ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 03 बजकर 48 मिनट से 04 बजकर 33 मिनट तक • विजय मुहूर्त – दोपहर 01 बजकर 43 मिनट से 02 बजकर 33 मिनट तक • गोधूलि मुहूर्त – शाम 05 बजकर 55 मिनट से 06 बजकर 17 मिनट तक • निशिता मुहूर्त – रात 11 बजकर 14 मिनट से 12 बजे तक दूर्वा अष्टमी का यह पावन पर्व हमें प्रकृति के प्रति आदर और भगवान विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस दिन सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना और व्रत करने से जीवन में सकारात्मकता और खुशहाली आती है। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई है और केवल सामान्य सूचना के लिए है। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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