2025

Vat Savitri Vrat Katha Hindi: इस कथा के बिना अधूरा है वट सावित्री व्रत,वट वृक्ष का क्या है महत्व जान लीजिए ?

Vat Savitri Vrat Katha in Hindi: वट सावित्री व्रत कथा में बरगद के पेड़ का विशेषतौर पर उल्लेख मिलता है। सुहागिनें वट सावित्री व्रत कथा वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ के नीचे सुनती हैं। इसके अलावा वट वृक्ष की पूजा भी की जाती है। आइए, जानते हैं वट सावित्री व्रत कथा में बरगद का महत्व क्या है। वट सावित्री पर सुहागिनें अपने पति की लम्बी आयु के लिए व्रत रखती हैं। वट सावित्री पर वट सावित्री के वृक्ष के साथ सत्यवान और सावित्री की पूजा भी की जाती है। साथ ही ही विधि-विधान के साथ पूजा करके वट सावित्री व्रत वट वृक्ष के नीचे कथा सुनी और सुनाई जाती है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि Vat Savitri Vrat Katha Hindi वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ का बहुत महत्व होता है। आइए, जानते हैं वट सावित्री व्रत कथा में वट वृक्ष का क्या महत्व होता है। Vat savitri vrat katha in hindi Vat Savitri Vrat Katha Hindi पुराणों में वर्णित सावित्री की कथा इस प्रकार है- राजा अश्वपति की अकेली संतान का नाम था सावित्री। सावित्री ने राजा द्युमत्सेन के बेटे सत्यवान को से विवाह किया। विवाह से पहले उन्हें नारद जी ने बताया कि सत्यवान के आयु कम है, तो भी सावित्री अपने फैसले से डिगी नहीं। वह सत्यवान के प्रेम में सभी राजसी वैभव त्याग कर  उनके परिवार की सेवा करते हुए वन में रहने लगीं। Vat Savitri Vrat Katha Hindi जिस दिन सत्यवान के महाप्रयाण का दिन था, उस दिन वह लकड़ियां काटने जंगल गए।  वहां मू्च्छिछत होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। तीन दिन से उपवास में रह रही सावित्री उस घड़ी को जानती थीं, अत: बिना परेशान हुए  यमराज से सत्यवान के प्राण वापस देने की प्रार्थना करती रही, लेकिन यमराज नहीं माने। तब सावित्री उनके पीछे-पीछे ही जाने लगीं। Vat Savitri Vrat Katha Hindi कई बार मना करने पर भी वह नहीं मानीं, तो सावित्री के साहस और त्याग से यमराज प्रसन्न हुए और कोई तीन वरदान मांगने को कहा। Vat Savitri Vrat Katha Hindi सावित्री ने सत्यवान के दृष्टिहीन  माता-पिता के नेत्रों की ज्योति मांगी, उनका छिना हुआ राज्य मांगा और अपने लिए 100 पुत्रों का वरदान मांगा। तथास्तु कहने के बाद यमराज समझ गए कि सावित्री के पति को साथ ले जाना अब संभव नहीं। इसलिए उन्होंने सावित्री को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया और सत्यवान को छोड़कर वहां से अंतर्धान हो गए। Vat Savitri Vrat Katha Hindi उस समय सावित्री अपने पति को लेकर वट वृक्ष के नीचे ही बैठी थीं।इसीलिए इस दिन महिलाएं अपने परिवार और जीवनसाथी की दीर्घायु की कामना करते हुए वट वृक्ष को भोग अर्पण करती हैं, उस पर धागा लपेट कर पूजा करती हैं।   Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट वट वृक्ष की पूजा करने से यमराज और त्रिदेवों की मिलती है कृपा (By worshiping banyan tree one gets blessings of Yamraj and Trinity.) वट सावित्री व्रत कथा बरगद के पेड़ के नीचे की जाती है। इसका कारण यह है मान्यतानुसार वट सावित्री के दिन बरगद के पेड़ पर यमराज निवास करते हैं। इससे विवाहित स्त्रियां अपने पति की लम्बी आयु के लिए यमराज से प्रार्थना करती है। साथ ही बरगद के पेड़ पर त्रिदेव भी निवास करते हैं। ऐसे में माना जाता है कि जिस व्यक्ति के सिर पर त्रिदेव का हाथ होता है, उसका मृत्यु भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। बरगद पेड़ की छाल में भगवान विष्णु, जड़ में ब्रह्मा और इसकी शाखाओं में भगवान शिव वास करते हैं। ​यमराज ने वटवृक्ष के नीचे लौटाए थे सत्यवान के प्राण (Yamraj had returned Satyavan’s life under the banyan tree) जब सावित्री के पति सत्यवान के प्राण यमराज ने हर लिए थे, तो सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण लौटाने के लिए प्रार्थना की थी। पौराणिक मान्यता है कि तब यमराज ने वट वृक्ष के नीचे ही सत्यवान के प्राण लौटाकर सत्यवती को पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था। यमराज ने बरगद की जड़ों में सत्यवान के प्राण को जकड़कर रखा हुआ था। यमराज के प्राण लौटाए जाने के बाद से सुहाग की दीर्घायु के लिए वट वृक्ष के नीचे प्रार्थना की जाती है। ​वट वृक्ष में कलावा बांधने से टल जाती है अकाल मृत्यु (​Untimely death is averted by tying Kalawa to the banyan tree) वट सावित्री व्रत कथा के बाद वट वृक्ष में 7 बार कलावा लपेटकर बांधा जाता है। वट वृक्ष की 7 परिक्रमा करने को पति-पत्नी के सात जन्मों के सम्बधों से जोड़कर देखा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि बरगद के पेड़ में कलावा बांधने से अकाल मृत्यु भी टल जाती है। ​वट वृक्ष की पूजा करने से शनि की पीड़ा से मिलती है मुक्ति (By worshiping banyan tree one gets relief from the pain of Saturn) वट सावित्री के दिन शनि जयंती भी है। Vat Savitri Vrat Katha Hindi ऐसे में वट सावित्री का महत्व और भी बढ़ जाता है। वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार शनि की साढ़े साती की वजह से ही सत्यवान के प्राण शनिदेव के भाई यमराज ले गए थे, इसलिए वट सावित्री के दिन वट वृक्ष की पूजा करने से शनिदेव की वक्री दृष्टि से भी मुक्ति मिलती है। शनिदेव की कृपा पाने के लिए भी वट सावित्री पर बरगद की पूजा की जाती है। ​बरगद का पेड़ औषधीय गुणों से भरपूर होता है(Banyan tree is full of medicinal properties) Vat Savitri Vrat Katha Hindi बरगद के पेड़ का धार्मिक महत्व ही नहीं बल्कि बरगद का पेड़ औषधीय गुणों से भी भरपूर है। इसके पत्तों से निकलने वाले दूध को चोट, मोच या सूजन पर दिन में दो से तीन बार लगाकर मालिश करने से चोट पूरी तरह से ठीक हो जाती है। आयुर्वेद में भी बरगद के पेड़ के औषधीय गुण बताए गए हैं।

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Vat Savitri Vrat 2025 Date: वट सावित्री का व्रत कैसे रखें कब किया जाएगा वट सावित्री व्रत ? अभी नोट करें डेट और पूजा सामग्री लिस्ट

Vat Savitri Vrat 2025 Date:ज्येष्ठ महीने की अमावस्या तिथि को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इस अमावस्या पर वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat 2025) किया जाता है। इस पर्व के आने का सुहागिन महिलाएं बेसब्री से इंतजार करती हैं। Vat Savitri Vrat 2025 Date:यह त्योहार वट यानी बरगद के पेड़ से जुड़ा है। इस दिन सुहागिन महिलाओं को भूलकर भी काले कपड़े नहीं पहनने चाहिए। साथ ही व्रत के नियम का पालन करना चाहिए। Vat Savitri 2025 date : हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है. ऐसी मान्यता है कि यह व्रत करने से पति की आयु लंबी होती है और जीवन में सुख-समृद्धि (sukh samridhi) बनी रहती है. इस साल वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि यानी 26 मई दिन सोमवार को रखा जाएगा. ऐसे में आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत (vat savitri vrat kab hai ) का मुहूर्त और पूजा (vat savitri puja vidhi) विधि.  Vat Savitri vrat 2025 : वट सावित्री का व्रत कैसे रखें जानिए यहां पर विधि और मुहूर्त कब है वट सावित्री – when is Vat Savitri Vat Savitri Vrat 2025 Date:इस साल आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत का मुहूर्त और पूजा विधि.  ज्येष्ठ माह के अमावस्या तिथि यानी 26 मई 2025 को दोपहर 12 बजकर 11 मिनट पर शुरु होगी, जो मई 27 को रात 8 बजकर 31 मिनट पर समाप्त होगी. उदयातिथि के अनुसार, वट सावित्री का व्रत 26 मई दिन सोमवार को रखा जाएगा. पंचांग (panchag) सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 27 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 07 बजकर 11 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 03 मिनट से 04 बजकर 44 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 36 मिनट से 03 बजकर 31 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 07 बजकर 16 मिनट से 07 बजकर 36 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर से 58 मिनट से 12 बजकर 39 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त- 11 बजकर 52 मिनट से लेकर 12 बजकर 48 मिनट तक वट सावित्री व्रत कैसे रखें – How to keep Vat Savitri fast इस दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और फिर सूर्य को अर्घ्य दीजिए. इसके बाद व्रती महिलाएं श्रृंगार करके वट वृक्ष के नीचे साफ-सफाई करके और पूजा की शुरूआत करें. अब आप धूप, अगरबत्ती जलाएं और वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें और Vat Savitri Vrat 2025 Date वट सावित्री व्रत का पाठ करिए. इसके बाद भोग लगाइए, अंत में गरीब लोगों में अन्न और धन का दान करिए, इससे शुभ फल की प्राप्ति होती है. वट सावित्री व्रत के दौरान किसी से वाद-विवाद न करिए और किसी के बारे में गलत न सोचिए और न ही अपमान करिए.  वट सावित्री व्रत के लिए (Vat Savitri Vrat samagri List) आप देसी घी, भीगा हुआ काला चना, मौसमी फल, अक्षत, धूपबत्ती, वट वृक्ष की डाल, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, सिंदूर, हल्दी और मिठाई शामिल करिए.   वट सावित्री व्रत सामग्री लिस्ट (Vat Savitri Vrat Samagri List) Vat Savitri Vrat 2025 Date:देसी घी, भीगा हुआ काला चना, मौसमी फल, अक्षत, धूपबत्ती, वट वृक्ष की डाल, गंगाजल, मिट्टी का घड़ा, सुपारी, पान, सिंदूर, हल्दी और मिठाई आदि। वट सावित्री व्रत पूजा विधि (Vat Savitri Vrat Puja Vidhi) Vat Savitri Vrat 2025 Date:इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। Vat Savitri Vrat 2025 Date इसके बाद शृंगार करें। अब वट वृक्ष के पेड़ की सफाई कर पूजा की शुरुआत करें। धूप, अगरबत्ती आदि जलाएं। वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा लगाएं। Vat Savitri Vrat 2025 Date व्रत कथा का पाठ करें। आरती कर भोग लगाएं। आखिरी में मंदिर या गरीब लोगों में अन्न और धन समेत आदि चीजों का दान करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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शीतला माता मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

Sheetla Mata Mandir:शीतला माता का यह मंदिर “शीतला माता वाटरफॉल “के नाम से भी जाना जाता है। Sheetla Mata Mandir:शीतला माता मंदिर इंदौर से 55 किमी की दूरी पर मानपुर के रामपुरिया बुजर्ग गांव में स्थित है शीतला माता मंदिर। इस मंदिर से केवल 3 किमी की दूरी पर है शीतला माता जलप्रपात। जो भक्त यहाँ माता के दर्शन करने आते हैं। वह दर्शन के साथ साथ प्रकृति का भी आनंद लेते हैं। माता का यह मंदिर अति प्राचीन है और यह हजारों फ़ीट नीचे खाई में एक गुफा में स्थित है। शीतला माता का यह मंदिर “शीतला माता वाटरफॉल “के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास शीतला माता मंदिर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। मंदिर के स्थापत्य की कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु ऐसा कहा जाता है कि माता की प्रतिमा स्वयं से प्रकट हुई हैं। यह प्रतिमा 1000 साल पुरानी है। किदवंती यह भी है कि इस मंदिर का जीर्वोद्धार सन् 1857 में किया गया था। मंदिर का महत्व इस मंदिर कि ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर माता के दर्शन करने के लिए शेर आता है और वह माता के दर्शन करके चला जाता है। कहा जाता है कि माता भक्तों के दुःख और मुसीबतों को दूर करती हैं। इस स्थान पर तीन खूबसूरत गुफाएं भी हैं और यह भी माना जाता है कि होल्कर राज्य के पिंडारी यहीं छिपे थे। स्कंद पुराण के अनुसार शीतला माता चेचक रोग की देवी हैं, जो सभी भक्तों के चेचक रोग को हर लेती हैं। मंदिर की वास्तुकला मंदिर की वास्तुकला की बात करें तो मंदिर बहुत ही प्राचीन है और यह एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है। इस कारण यहाँ पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं हो सकता है। वहीं पाषाण रूप में शीतला माता विराजित है। उनका रंग सिंदूरी है। गुफा में प्रवेश करने पर आप माता के दर्शन कर सकते है। मंदिर के पास ही बहुत खूबसूरत झरनें भी है। मंदिर में भगवान शिव की पिंडी भी विराजित हैं। साथ ही नंदी जी भी विराजमान हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव का यह रूप नेपाल के पशुपतिनाथ के जैसा ही है। मंदिर का समय शीतला माता मंदिर खुलने का समय 08:00 AM – 05:00 PM मंदिर का प्रसाद मंदिर में चना चिरौंजी ,लड्डू का भोग लगाया जाता है। आप माता को चुनरी भी चढ़ा सकते है। पुष्प भी अर्पण किये जाते है।

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Matsya Stotram:मत्स्य स्तोत्रम्

Matsya Stotram मत्स्य स्तोत्रम्: मत्स्य पुराण में देवताओं और असुरों के बीच निरंतर युद्ध की कहानी बताई गई है। देवता हमेशा असुरों को हरा देते थे। अपमानित होकर, असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने असुरों को अजेय बनाने के लिए मृत्युंजय स्तोत्र या मंत्र प्राप्त करने के लिए शिव के पास जाने का फैसला किया। इस बीच, उन्होंने असुरों से अपने पिता भृगु के आश्रम में शरण लेने के लिए कहा। देवताओं ने शुक्राचार्य की अनुपस्थिति को एक बार फिर असुरों पर हमला करने का सबसे उपयुक्त समय पाया। भृगु स्वयं दूर थे, इसलिए असुरों ने उनकी पत्नी की मदद मांगी। अपनी शक्तियों का उपयोग करके, उसने इंद्र को स्थिर कर दिया। बदले में, Matsya Stotram इंद्र ने भगवान विष्णु से उससे छुटकारा पाने की अपील की। ​​विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काटकर उसकी इच्छा पूरी की। जब ऋषि भृगु ने देखा कि उनकी पत्नी के साथ क्या हुआ है, तो उन्होंने श्राप दिया कि विष्णु पृथ्वी पर कई बार जन्म लेंगे और सांसारिक जीवन के कष्टों को भोगेंगे। इसलिए, विष्णु ने अवतारों के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया। मत्स्य स्तोत्रम एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “स्तुति, स्तुति या स्तुति का भजन”। यह भारतीय धार्मिक ग्रंथों की एक साहित्यिक शैली है जिसे मधुरता से गाया जाता है, शास्त्रों के विपरीत जो सुनाए जाने के लिए रचे जाते हैं। ब्रह्मांड के नवीनतम पुनर्निर्माण से पहले जलप्रलय के दौरान, ब्रह्मा द्वारा पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक चार वेद (पवित्र शास्त्र) गहरे पानी में डूब गए थे। भगवान विष्णु ने पवित्र शास्त्रों को पुनः प्राप्त करने के लिए एक मछली का रूप धारण किया। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, अपने मत्स्य अवतार में विष्णु ने मनु (प्रत्येक सृष्टि में मानव जाति के पूर्वज) को एक विशाल नाव बनाने और उसमें सभी प्रजातियों के नमूने इकट्ठा करने का निर्देश दिया। फिर मत्स्य स्तोत्रम ने जलप्रलय और बाढ़ के बीच जहाज को सुरक्षित निकाला ताकि ब्रह्मा पुनर्निर्माण का काम शुरू कर सकें। एक महान जलप्रलय की कहानी पृथ्वी भर में कई सभ्यताओं में पाई जाती है। Matsya Stotram यह अक्सर बाढ़ और नूह के जहाज़ की उत्पत्ति कथा से संबंधित है। मछली की आकृति और शास्त्रों को राक्षस से बचाना हिंदू कथा में जोड़ा गया है। प्राचीन सुमेर और बेबीलोनिया, ग्रीस, अमेरिका के माया और अफ्रीका के योरूबा की कहानियों में भी बाढ़ के ऐसे ही मिथक मौजूद हैं। मत्स्य स्तोत्रम के लाभ उनकी पूजा करने से, उनकी कृपा से आम तौर पर व्यक्ति को स्वास्थ्य, धन, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है और मत्स्य स्तोत्रम् विशेष रूप से व्यक्ति दुर्लभ त्वचा रोगों से ठीक हो जाता है Matsya Stotram और प्रचुर धन प्राप्त करता है। जहाँ भी भगवान श्री मत्स्यनारायण की उपस्थिति होती है, वहाँ सभी वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं। किसको इस स्तोत्रम का पाठ करना चाहिए जो लोग त्वचा रोगों से पीड़ित हैं, गरीबी का सामना कर रहे हैं और वास्तु दोष से प्रभावित हैं, Matsya Stotram उन्हें इस मत्स्य स्तोत्रम का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। मत्स्य स्तोत्रम् हिंदी पाठ Matsya Stotram in Hindi श्रीगणेशाय नमः । नूनं त्वं भगवान् साक्षाद्धरिर्नारायणोऽव्ययः ।अनुग्रहायभूतानां धत्से रूपं जलौकसाम् ॥ १ ॥ नमस्ते पुरुषश्रेष्ठ स्थित्युत्पत्यप्ययेश्वर ।भक्तानां नः प्रपन्नानां मुख्यो ह्यात्मगतिर्विभो ॥ २ ॥ सर्वे लीलावतारास्ते भूतानां भूतिहेतवः ।ज्ञातुमिच्छाम्यदो रूपं यदर्थं भवता धृतम् ॥ ३ ॥ न तेऽरविन्दाक्षपदोपसर्पणंमृषा भावेत्सर्व सुहृत्प्रियात्मनः ।यथेतरेषां पृथगात्मनां सतां-मदीदृशो यद्वपुरद्भुतं हि नः ॥ ४ ॥ ॥ इति मत्स्य स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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Mangal Chandika Stotram:मंगल चण्डिका स्तोत्र

Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र: मंगल चंडिका स्तोत्र की सहायता से विवाह और कार्य बाधा दूर करने के लिए यह स्तोत्र मांगलिक जातकों के लिए मंगल के कारण विवाह, कार्य संबंधी बाधाओं को दूर करने का एक अनिवार्य उपाय है। मंगल चंडिका स्तोत्र का वर्णन ब्रह्मवर्त पुराण में मिलेगा। मंगल चंडिका स्तोत्र पूर्णतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। मंगल चंडिका स्तोत्र का एक लाख बार जाप करने से उस व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। चंडिका देवी को महात्म्य की सर्वोच्च देवी माना जाता है। दुर्गा सप्तशती में चंडिका देवी को चामुंडा या माता दुर्गा कहा गया है। चंडिका देवी महाकाली, महा लक्ष्मी और महा सरस्वती का मिश्रित रूप हैं। जो व्यक्ति नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का जाप करता है, उसे धन, व्यापार, आवास आदि की समस्या नहीं होती है। जिस व्यक्ति के विवाह में समस्या आ रही हो, कहा जाता है कि नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का जाप करने से विवाह संबंधी परेशानी दूर होती है। मंगल चंडिका स्तोत्र सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने मां चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने और उनसे सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा था। Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने मां चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने और उनसे सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पढ़ा था। मंगल चंडिका स्तोत्र के लाभ: कर्ज से मुक्ति पाने के लिए या कर्ज के जाल में फंसने से बचने के लिए। लक्ष्मी स्थिर रखने और अपनी आर्थिक स्थिति को स्थिर बनाने के लिए और कभी भी धन की कमी का सामना न करने और भौतिक कष्टों का सामना किए बिना संतुष्ट और खुशहाल जीवन जीने के लिए। घरेलू कलह को दूर करें और परिवार के भीतर बहस, लड़ाई, मतभेद और असहमति से बचें। Mangal Chandika Stotram मंगल चंडिका स्तोत्र किसी भी तरह के पति-पत्नी के विवाद को दूर करने में बहुत प्रभावी है। घर, जमीन और संपत्ति से जुड़े किसी भी तरह के विवाद को टालने के लिए। Mangal Chandika Stotram घर से वास्तु दोष को दूर करने और अन्य हानिकारक और बुरी ऊर्जाओं को बाहर निकालने तथा घर के माहौल को खुशहाल और समृद्ध बनाने के लिए। विवाह में बाधा या देरी पैदा करने वाली किसी भी बाधा या समस्या को दूर करें। मंगल चंडिका स्तोत्र विशेष रूप से मांगलिक दोष को दूर करने में प्रभावी है, जो विवाह योग्य आयु के किसी भी लड़के या लड़की के लिए उपयुक्त वर को समाप्त करने में गंभीर बाधा उत्पन्न करता है। पारंपरिक भारतीय और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ मंगल के हानिकारक प्रभावों को दूर करने के लिए मंगल चंडिका स्तोत्र की उपासना सबसे अधिक लाभकारी है। Mangal Chandika Stotram:किसको करना चाहिए यह स्तोत्र का पाठ: विवाह या किसी भी विवाहेतर संबंध में समस्याओं का सामना करने वाले व्यक्ति को नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। मंगल चण्डिका स्तोत्र हिंदी पाठ:Mangal Chandika Stotra in Hindi ‘चण्डी’ शब्द का प्रयोग ‘दक्षा’ (चतुरा) के अर्थ में होता है Mangal Chandika Stotram और ‘मंगल′शब्द कल्याण का वाचक है। जो मंगल-कल्याण करने में दक्ष हो, वही “मंगल-चण्डिका” कही जाती है। ‘दुर्गा’ के अर्थ में भी चण्डी शब्द का प्रयोग होता है और मंगल शब्द भूमि-पुत्र मंगल के अर्थ में भी आता है। अतः जो मंगल की अभीष्ट देवी है, उन देवी को ‘मंगल-चण्डिका’ कहा गया है। मनुवंश में ‘मंगल′नामक राजा थे। सप्त-समुन्द्र पर्यन्त पृथ्वी उनके शासन में थी। उन्होंने इन देवी को अभीष्ट देवता मानकर पूजा की थी। इसलिए भी ये ‘मंगल-चण्डी’ नाम से विख्यात हुई। जो मूलप्रकृति भगवती जगदीश्वरी ‘दुर्गा’ कहलाती हैं, Mangal Chandika Stotram उन्हीं का यह रुपान्तर है। ये देवी कृपा की मूर्ति धारण करके सबके सामने प्रत्यक्ष हुई हैं। स्त्रियों की ये इष्टदेवी हैं। Mangal Chandika Stotram:मंगल-चण्डिका-स्तोत्र मन्त्र – ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके ऐं क्रू फट् स्वाहा ॥  (२१ अक्षर)(देवीभागवत,नवम स्कन्ध, अध्याय 47 के अनुसार मन्त्र इस प्रकार है – ॥ ॐ ह्रीं श्रीम क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। हूं हूं फट् स्वाहा ॥ ध्यान – देवीं षोड्शवष यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम् ।सर्वरुपगुणाढ्यां च कोमलांगीं  मनोहराम् ॥ श्वेतचम्पकवर्णाभा चन्द्रकोटि-समप्रभाम् ।वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम् ॥ बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम् ।विम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम् ॥ ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोत्पललोचनाम् ।जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम् ॥ संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे ।देव्याश्च द्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने ।प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः ॥ ‘अर्थात’ सुस्थिर यौवना भगवती मंगल-चण्डिका सदा सोलह वर्ष की ही जान पड़ती है। ये सम्पूर्ण रुप-गुण से सम्पन्न, कोमलांगी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पा के समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओं के तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। Mangal Chandika Stotram ये अग्नि-शुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणों से विभूषित है। मल्लिका पुष्पों से समलंकृत केशपाश धारण करती हैं। बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्काल के प्रफुल्ल कमल की भाँति शोभायमान मुखवाली Mangal Chandika Stotram मंगल-चण्डिका के प्रसन्न वदनारविन्द पर मन्द मुस्कान की छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमल के समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करने वाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागर से उबारने में जहाज का काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ। शंकर उवाच – रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि  मंगलचण्डिके ।हारिके विपदां राशेर्हर्ष-मंगल-कारिके ॥ हर्ष–मंगल–दक्षे चहर्ष-मंगल-चण्डिके ।शुभे मंगल-दक्षे च शुभ-मंगल-चण्डिके ॥ मंगले मंगलार्हे चसर्व-मंगल-मंगले ।सतां मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये ॥ पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट-दैवते ।पूज्ये मंगल-भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ॥ मंगलाधिष्ठातृदेविमंगलानां च मंगले ।संसार-मंगलाधारे मोक्ष–मंगल-दायिनी ॥ सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् ।प्रतिमंगलवारे च पूज्ये च मंगलप्रदे ॥ स्तोत्रेणानेनशम्भुश्चस्तुत्वा मंगलचण्डिकाम् ।प्रतिमंगलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः ॥ देव्याश्च मंगल-स्तोत्रं यं श्रृणोति समाहितः ।तन्मंगलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमंगलम् ॥ ॥ इति मंगल चण्डिका स्तोत्र सम्पूर्णंम् ॥ (ब्रह-वैवर्त्त-पुराण। प्रकृतिखण्ड। ४४। २०-३६) महादेवजी ने कहा – ‘जगन्माता भगवती Mangal Chandika Stotram मंगल-चण्डिके! तुम सम्पूर्ण विपत्तियों का विध्वंस करने वाली हो एवं हर्ष तथा मंगल प्रदान करने को सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और Mangal Chandika Stotram मंगल देनेवाली हर्ष-मंगल-चण्डिके! तुम शुभा, मंगलदक्षा, शुभमंगल-चण्डिका, मंगला, मंगला तथा सर्व-मंगल-मंगला कहलाती हो।

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Vrat 2025 :Mohini Ekadashi जीवन में नहीं चाहते कोई कमी? तो मोहिनी एकादशी के दिन करें इन चीजों का दान

Mohini Ekadashi:आपको बता दें कि एकादशी का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाले सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है. आप 8 मई को पड़ने वाली मोहिनी एकादशी के दिन विधिवत रूप से तुलसी की पूजा करते हैं, तो इससे आपको धन-समृद्धि का आशीर्वाद मिल सकता है. हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की सभी तिथि को बेहद खास माना जाता है, जिनमें एकादशी तिथि भी शामिल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi 2025) का व्रत करने से साधक को सभी पापों से छुटकारा मिलता है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। Mohini Ekadashi 2025 : हिन्दू धर्म के मानने वालों के लिए एकादशी व्रत का विशेष महत्व होता है. यह व्रत महीने में दो बार आता है यानी 1 साल में 24 एकादशी व्रत रखा जाता है. वहीं, अगर अधिकमास होता है तो 26 एकादशी पड़ती है. आपको बता दें कि एकादशी का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाले सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है. आप 8 मई को पड़ने वाली मोहिनी एकादशी के दिन विधिवत रूप से तुलसी की पूजा करते हैं, तो इससे आपको धन-समृद्धि का आशीर्वाद मिल सकता है. मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है और विशेष दान चीजों का दान भी जरूर करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि Mohini Ekadashi मोहिनी एकादशी के दिन दान करने से आर्थिक तंगी से छुटकारा मिलता है और धन लाभ के योग बनते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि मोहिनी एकादशी के दिन किन चीजों का दान करना चाहिए? Bada Mangal 2025 Mai Kab Hai: कब शुरू होगा बड़ा मंगल? जानें इसका महत्व, पूजा विधि और डेट मोहिनी एकादशी पर कैसे करें तुलसी की पूजा- How to worship Tulsi on Mohini Ekadashi इन बातों का रखें ख्याल(take care of these things) आप इस दिन तुलसी के पौधे में जल जरूर अर्पित करिए. हालांकि धार्मिक मान्यता है कि तुलसी में जल अर्पित करने से व्रत खंडित हो सकता है क्योंकि तुलसी देवी निर्जला व्रत रखती हैं.  मोहिनी एकादशी पारण का समय 2025 – Mohini Ekadashi Parana Time 2025 मोहिनी एकादशी व्रत के पारण का समय 09 मई, 2025 को रखा जाएगा. पारण का शुभ मुहूर्त सुबह 5:34 मिनट से सुबह 8:16 मिनट तक रहेगा. इस दौरान आप भगवान विष्णु का ध्यान करके व्रत खोल सकते हैं.  बनी रहेगी मां लक्ष्मी की कृपा(Goddess Lakshmi’s blessings will remain) धार्मिक मान्यता के अनुसार, Mohini Ekadashi मोहिनी एकादशी के दिन गरीब लोगों में कपड़ों का दान करने का खास महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इस एकादशी तिथि पर कपड़ों का दान करने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। घर में बनी रहेगी सुख-शांति(There will be peace and happiness in the house) सनातन धर्म में तुलसी का पौधा पूजनीय है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस पौधे में धन की देवी मां लक्ष्मी का वास होता है। ऐसे में तुलसी को मोहिनी एकादशी के दिन दान कर सकते हैं। तुलसी दान करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है। Mohini Ekadashi साथ ही साधक पर मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है। हमेशा पैसों से तिजोरी भरी रहेगी। वैवाहिक जीवन होगा खुशहाल(Married life will be happy) अगर आप वैवाहिक जीवन में खुशियों का आगमन चाहते हैं, तो मोहिनी एकादशी की पूजा के दौरान मां लक्ष्मी को सिंदूर, बिंदी और चूड़ियां समेत आदि चीजों का दान करें। इसके बाद इन चीजों को किसी सुहागिन महिलाओं को दान में दें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मोहिनी एकादशी के दिन इन चीजों का दान करने से वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और साथ पति-पत्नी के रिश्ते मजबूत होते हैं। साल की सभी एकादशी का नाम – Name of all Ekadashi of the year तुलसी मंत्र(Tulsi Mantra)

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Baglamukhi Jayanti Stotra 2025:आज बगलामुखी जयंती पर करें इस विशेष स्तोत्र का पाठ, पाएं चमत्कारी फल

Baglamukhi Jayanti Stotra 2025:बगलामुखी जयंती इस साल 5 मई, सोमवार के दिन पड़ रही है। इस दिन माता पार्वती के बगलामुखी स्वरूप की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मां बगलामुखी की पूजा से नकारात्मकता दूर हो जाती है और व्यक्ति में शक्ति का संचार होता है। इसके अलावा, मां बगलामुखी की पूजा के दौरान उनके स्तोत्र का पाठ करना भी बहुत लाभकारी माना जाता है। ऐसे में आइये जानते हैं ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स से कि मां बगलामुखी के स्तोत्र और उससे मिलने वाले लाभों के बारे में विस्तार से। Baglamukhi Jayanti 2025: हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बगलामुखी जयंती का आयोजन किया जाता है. इस वर्ष यह जयंती 5 मई 2025, सोमवार को मनाई जा रही है. Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 बगलामुखी जयंती देवी बगलामुखी की पूजा का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. यह दिन तंत्र साधना, शत्रुओं का नाश और विजय प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. बगलामुखी देवी दस महाविद्याओं में आठवीं शक्ति के रूप में जानी जाती हैं, जिन्हें “स्तंभन शक्ति” का स्वरूप माना जाता है. इनकी पूजा से शत्रुओं का नाश, वाणी में प्रभाव और जीवन में विजय की प्राप्ति होती है. Baglamukhi Jayanti 2025: मां बगलामुखी की आराधना से नकारात्मकता समाप्त होती है और व्यक्ति में ऊर्जा का संचार होता है. इसके अतिरिक्त, मां बगलामुखी की पूजा के समय उनके स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है. Baglamukhi Jayanti Stotra 2025:बगलामुखी जयंती 2025 मां बगलामुखी स्तोत्र का पाठ इस पावन अवसर पर यदि “बगलामुखी स्तोत्र” का श्रद्धा भाव से पाठ किया जाए, Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 तो साधक को अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं. नीचे प्रस्तुत है एक प्रभावशाली स्तोत्र, जिसका जयंती पर पाठ अवश्य करना चाहिए: Baglamukhi Chalia:बगलामुखी चालीसा बगलामुखी स्तोत्र (संक्षिप्त रूप) (Bagalamukhi Stotra (short form)) मां बगलामुखी की आराधना से नकारात्मकता समाप्त होती है और व्यक्ति में ऊर्जा का संचार होता है. इसके अतिरिक्त, मां बगलामुखी की पूजा के समय उनके स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है. बगलामुखी जयंती आज, इस शुभ मुहूर्त में करें पूजा (Baglamukhi Jayanti today, worship at this auspicious time) ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भयजिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा. देवि सर्वे भवेत्‍वाम् शरणं प्रपन्‍नाः.शत्रुन्मुखे वाणीं तव प्रभावेन स्तम्भय.न्यायालये विवादे, रणभूमौ वा समराङ्गणे.जयं दत्वा रक्ष मां, स्तम्भय शत्रूनसङ्गमे॥ पीताम्बरा धारिणीं, वज्र-नख-कटाक्षिणीम्.स्तम्भिनीं शत्रुहन्त्रीं, बगलां शरणं व्रजे॥ Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 भक्तों को इस स्तोत्र का पाठ स्नान के बाद, पीले वस्त्र धारण करके, Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 हल्दी की माला से पीले आसन पर बैठकर करना चाहिए. देवी को पीले फूल, चने की दाल, और हल्दी से निर्मित प्रसाद अर्पित करें. बगलामुखी जयंती के अवसर पर इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक के जीवन से भय, विघ्न और शत्रुओं की बाधाएं समाप्त होती हैं. वाणी में सिद्धि, निर्णयों में विजय और आत्मबल की वृद्धि होती है. देवी बगलामुखी की कृपा से साधक को जीवन में उन्नति, सुरक्षा और शक्ति प्राप्त होती है. मां बगलामुखी की पूजा क्यों है फायदेमंद (Why is worship of Maa Baglamukhi beneficial?) Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 इस दिन की उपासना विशेष रूप से वकील, राजनेता, अधिकारी और न्याय संबंधी क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती है. ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः — इस मंत्र का 108 बार जप अवश्य करें. हिंदू धर्म में बगलामुखी माता का महत्व (Importance of Baglamukhi Mata in Hinduism) Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 बगलामुखी माता की पूजा अक्सर भक्त विपरीत परिस्थितियों से रक्षा, वाक् और बुद्धि पर नियंत्रण, तथा शत्रु बाधाओं को दूर करने के लिए करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को भी मां बगलामुखी की साधना करने को कहा था ताकि वे विजय प्राप्त कर सकें और उनके शत्रुओं का अंत हो। पांडवों ने बगलामुखी माता की पूजा की भी थी। बगलामुखी माता की पूजा विधि (Method of worship of Baglamukhi Mata) बगलामुखी जयंती के दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ पीले वस्त्र भक्तों को धारण करने चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल पर पीला आसन बिछाकर मां बगलामुखी की मूर्ति या चित्र को वहां स्थापित करना चाहिए। पूजा में पीले फूल, हल्दी, पीले फल, चने की दाल और मिठाई का प्रयोग आपको करना चाहिए। धूप, दीपक और कपूर दिखाकर आपको माता की पूजा करनी चाहिए। इस दिन पूजा के समय माता के मंत्र- “ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय, जिह्वां कीलय, बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा।” का कम से कम 108 बार जप करें।  Baglamukhi Jayanti Stotra 2025 इसके बाद बगलामुखी चालीसा का पाठ और आरती भी आपको करनी चाहिए। यदि संभव हो तो रात में साधना करें, क्योंकि यह समय मां की कृपा पाने के लिए अधिक शुभ और प्रभावशाली माना जाता है। बगलामुखी जयंती पर माता की पूजा के लाभ (Benefits of worshiping Mother Goddess on Baglamukhi Jayanti) बगलामुखी माता की पूजा करने से शत्रु बाधाओं से मुक्ति मिलती है वाद-विवाद व न्यायिक मामलों में भी आप सफल होते हैं  आत्मबल, साहस व आत्मविश्वास की वृद्धि होती है जिससे समाज में आपका मान-सम्मान बढ़ता है मानसिक शांति व आध्यात्मिक शक्ति भी माता की पूजा करने से आपको प्राप्त होती है।

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मंगला गौरी स्तोत्र:Mangla Gauri Stotram

मंगला गौरी स्तोत्र:Mangla Gauri Stotram ॐ रक्ष-रक्ष जगन्माते देवि मङ्गल चण्डिके ।हारिके विपदार्राशे हर्षमंगल कारिके ॥ हर्षमंगल दक्षे च हर्षमंगल दायिके ।शुभेमंगल दक्षे च शुभेमंगल चंडिके ॥ मंगले मंगलार्हे च सर्वमंगल मंगले ।सता मंगल दे देवि सर्वेषां मंगलालये ॥ पूज्ये मंगलवारे च मंगलाभिष्ट देवते ।पूज्ये मंगल भूपस्य मनुवंशस्य संततम् ॥ मंगला धिस्ठात देवि मंगलाञ्च मंगले ।संसार मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम् ॥ देव्याश्च मंगलंस्तोत्रं यः श्रृणोति समाहितः ।प्रति मंगलवारे च पूज्ये मंगल सुख-प्रदे ॥ तन्मंगलं भवेतस्य न भवेन्तद्-मंगलम् ।वर्धते पुत्र-पौत्रश्च मंगलञ्च दिने-दिने ॥ मामरक्ष रक्ष-रक्ष ॐ मंगल मंगले । ॥ इति मंगला गौरी स्तोत्र सम्पूर्णं ॥ Mangla Gauri Stotram:मंगला गौरी स्तोत्र विशेषताए Mangla Gauri Stotram:मंगला गौरी स्तोत्र के साथ-साथ यदि शिव परद गौरी गनेशकि पुजा कि जाए तो, इस स्तोत्र का बहुत लाभ मिलता है, यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाते है| यदि साधक इस स्तोत्र  का पाठ प्रतिदिन करने से बुराइया खुद- ब- खुद दूर होने लग जाती है साथ ही सकरात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है| अपने परिवार जनों का स्वस्थ्य ठीक रहता है और लम्बे समय से बीमार व्यक्ति को इस स्तोत्र का पाठ सच्चे मन से करने पर रोग मुक्त हो जाता है| यदि मनुष्य जीवन की सभी प्रकार के भय, डर से मुक्ति चाहता है तो वह इस स्तोत्र का पाठ करे|

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Mangal Stotram:मंगल स्तोत्र

Mangal Stotra मंगल स्तोत्र: मंगल एक आक्रामक ग्रह है। यह मेष और वृश्चिक राशियों का स्वामी है। मकर राशि में मंगल उच्च और कर्क राशि में नीच का होता है। यह सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति के साथ मित्रवत है। यह शुक्र, शनि और राहु के साथ सम है। बुध और केतु मंगल के शत्रु हैं। सूर्य और बुध के गोचर के दौरान मंगल शुभ परिणाम देता है। Mangal Stotra सूर्य और शनि के गोचर के दौरान मंगल अशुभ परिणाम देता है। राहु से प्रभावित होने पर मंगल कमजोर होता है। खगोल विज्ञान के अनुसार, मंगल हमारे सौरमंडल का चौथा ग्रह है, जो हमारी पृथ्वी के बाद दूसरा ग्रह है। ज्योतिष में, मंगल अन्य चीजों के अलावा साहस, शक्ति, घर, ज़मीन-जायदाद और दुश्मनों का प्रतिनिधित्व करता है। चिकित्सा ज्योतिष में, मंगल रक्त संबंधी समस्याओं, रक्तचाप और दुर्घटनाओं सहित अन्य चीजों को नियंत्रित करता है। Mangal Stotra भगवान मंगल भी क्षत्रिय हैं और मेढ़े पर विराजमान हैं। मंगल को एक सुंदर युवक के रूप में चित्रित किया गया है जिसका कद छोटा है और उसकी 4 भुजाएँ हैं, जिनमें से 2 में गदा और एक त्रिशूल है। उनका शरीर पतला और युवा जैसा है तथा उनकी रक्त-लाल आँखें भयंकर रूप से जलती हैं। संस्कृत में मंगल का अर्थ भौम होता है। वे युद्ध के देवता हैं तथा ब्रह्मचारी हैं। वे स्वभाव से तमस गुण वाले हैं तथा ऊर्जावान क्रिया, अहंकार और आत्मविश्वास का प्रतिनिधित्व करते हैं। मंगल युद्ध के देवता हैं तथा ब्रह्मचारी हैं। Mangal Stotra वे वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी हैं तथा गुप्त विद्याओं के शिक्षक हैं। ज्योतिष के अनुसार, मंगल या मंगल शक्ति, पराक्रम, साहस और आक्रामकता का ग्रह है। ज्योतिष की दृष्टि से मंगल को क्रूर ग्रह माना जाता है। स्वभाव से मंगल ऊर्जावान और कामुक, साहसी, क्रोधी और उदार है। मंगल अत्यंत क्रोधी हैं तथा अपने भक्तों के अहंकार के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। वे वित्तीय लाभ प्रदान करते हैं तथा अपने भक्तों की सभी कठिनाइयों, विशेषकर बीमारी, ऋण और शत्रुओं से मुक्ति दिलाते हैं। Mangal Stotra वे भूमि-संपत्ति, कार्य में समृद्धि आदि के अधिग्रहण में सहायक होते हैं। वैदिक ज्योतिष में, मंगल को मंगल, अंगारक और कुज के नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत में इन नामों का अर्थ है, “शुभ, जलता हुआ कोयला, और निष्पक्ष”। मंगल स्तोत्र के लाभ मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ मन की शांति देता है और आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है Mangal Stotra और आपको स्वस्थ, धनी और समृद्ध बनाता है।इस शक्तिशाली और प्रभावशाली मंगल स्तोत्र में जीवन की सभी इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति है। मंगल स्तोत्र किसी भी तरह के कर्ज को दूर करता है और आपको भगवान मंगल के सकारात्मक कंपन के साथ जोड़ता है।मंगल की विशेषताओं में दृढ़ संकल्प, विवेक और इच्छा शक्ति शामिल हैं। Mangal Stotra यद्यपि सूर्य सार्वभौमिक शक्ति का स्रोत है, वह उस शक्ति की ओर से कार्य करने वाली कार्यकारी शाखा है, यही कारण है कि वह कल्याण का वाहक है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो लोग घरेलू उद्देश्यों के कारण उदासीन स्थितियों और तनावों के कारण मन की शांति खो देते हैं, उन्हें मंगल स्तोत्र का जाप करना चाहिए। मंगल स्तोत्र हिंदी पाठ:Mangal Stotra in Hindi रक्ताम्बरो रक्तवपु: किरीटी चतुर्मुखो मेघगदी गदाधृक् ।धरासुत: शक्तिधरश्र्वशूली सदा मम स्याद्वरद: प्रशान्त: ।। 1 ।। ॐमंगलो भूमिपुत्रश्र्व ऋणहर्ता धनप्रद: ।स्थिरात्मज: महाकाय: सर्वकामार्थसाधक: ।। 2 ।। लोहितो लोहिताऽगश्र्व सामगानां कृपाकर: ।धरात्मज: कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दन: ।। 3 ।। अऽगारकोतिबलवानपि यो ग्रहाणंस्वेदोदृवस्त्रिनयनस्य पिनाकपाणे: ।आरक्तचन्दनसुशीतलवारिणायोप्यभ्यचितोऽथ विपलां प्रददातिसिद्धिम् ।। 4 ।। भौमो धरात्मज इति प्रथितः प्रथिव्यांदुःखापहो दुरितशोकसमस्तहर्ता ।न्रणाम्रणं हरित तान्धनिन: प्रकुर्याध: पूजित: सकलमंगलवासरेषु ।। 5 ।। एकेन हस्तेन गदां विभर्ति त्रिशूलमन्येन ऋजुकमेण ।शक्तिं सदान्येन वरंददाति चतुर्भुजो मंगलमादधातु ।। 6 ।। यो मंगलमादधाति मध्यग्रहो यच्छति वांछितार्थम् ।धर्मार्थकामादिसुखं प्रभुत्वं कलत्र पुत्रैर्न कदा वियोग: ।। 7 ।। कनकमयशरीरतेजसा दुर्निरीक्ष्यो हुतवह समकान्तिर्मालवे लब्धजन्मा ।अवनिजतनमेषु श्रूयते य: पुराणो दिशतु मम विभूतिं भूमिज: सप्रभाव: ।। 8 ।। ॥ इति मंगल स्तोत्र संपूर्णम्‌ ॥

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इस्कॉन मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश , भारत

ISKCON Temple:इस्कॉन को एक और नाम से जाना जाता है, हरे कृष्णा आंदोलन। ISKCON Temple: Bhopal, Madhya Pradesh, India:मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल को वैसे तो झीलों का शहर कहा जाता है, लेकिन इस शहर में कई ऐसे मंदिर हैं, जोकि आस्था का केंद्र बनते जा रहे हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक है पटेल नगर स्थित इस्कॉन मंदिर। इस्कॉन को एक और नाम से जाना जाता है, हरे कृष्णा आंदोलन। पूरा आंदोलन श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित है। मंदिर से हरे कृष्णा मंत्र का प्रचार प्रसार किया जाता है। मंदिर में आध्यात्म की शिक्षा दी जाती है। यह मंदिर आधुनिक सभ्यता के लोगों के लिए एक मॉडल की तरह भी है कि कैसे बिना सुख सुविधाओं के वैदिक सभ्यता में रहा जाता है। मंदिर में बिजली का प्रयोग न के बराबर होता है। पूरे परिसर में कहीं भी कूलर, पंखा या एसी नहीं लगा है। मंदिर आने वाले भक्तों को श्रीमद्भगवद्गीता, शास्त्रों व भगवान के बारें में ज्ञान मिलता है। आध्यात्मिक शांति के लिए यहां दूर-दूर से लोग आते हैं। Iskcon Temple:मंदिर का इतिहास इस्कॉन को पूरा नाम है इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शसनेस, यानी अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ। परम पूज्य ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने साल 1966 में न्यूयॉर्क शहर में पहले इस्कॉन मंदिर की स्थापना की थी, जिसके बाद इस मंदिर की श्रृंखला बढ़ती चली गई। उन्होंने 11 साल में ही पूरे विश्व में 108 इस्कॉन मंदिर स्थापित कर दिए थे। वर्तमान समय में विश्व में 500 से अधिक इस्कॉन मंदिर हैं। भोपाल में इस्कॉन मंदिर की स्थापना 2018 में की गई। हालांकि, कम समय में ही इस मंदिर से बड़ी संख्या में भक्त जुड़ गए हैं। पुरी की तर्ज पर भोपाल में इस साल इस्कॉन मंदिर द्वारा भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भी निकाली गई थी। मंदिर का महत्व माना जाता है कि हरे कृष्णा मंत्र से कलयुग के कलमस से बचा जा सकता है। इस्कॉन मंदिर से जुड़े लोगों को 4 नियमों का पालन करना पड़ता है। जैसे- अवैध स्‍त्री संग संबंध न रखना, मांसाहार न करना, नशा से दूर रहना व जुआ न खेलना। ऐसा माना जाता है कि यह 4 पाप के स्तंभ होते हैं। इन कार्यों को करने से मनुष्‍य भगवान से दूर होता है। माना जाता है कि मंदिर के जरिए भगवान से जुड़ने का रास्ता मिलता है, इसी वजह से देश ही नहीं विदेशों में भी बड़ी संख्या में इस्कॉन के भक्त मिलते हैं। इस्कॉन मंदिर के भक्त सिर्फ चीजों को अपना धर्म मानते हैं- दया, तपस्या, सत्य और शुद्ध मन। मंदिर की वास्तुकला 3 एकड़ भूमि पर इस्कॉन मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। इसका प्रथम भाग बनकर तैयार हो चुका है। इसे बनाने में सबसे ज्यादा लकड़ी का प्रयोग किया गया है। मंदिर में रहने वाले शिष्यों के लिए साथ ही अन्य कमरे लकड़ी से बनाए गए हैं। भगवान के प्रसाद व भोजन तैयार करने के लिए मिट्टी के चूल्हे का प्रयोग किया जाता है। मंदिर में मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की भक्ति की जाती है। मंदिर में प्रवेश करते ही एक बड़ा हॉल है, जहां भगवान राधा-कृष्ण की प्रतिमा विराजमान है। हॉल की छत भी लकड़ी की बनाई गई है। मंदिर परिसर में रसोई घर व शिष्यों व धर्मगुरुओं के रहने के लिए कमरे बनाए गए हैं। इस्कॉन गौड़ीय-वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है, जोकि वैदिक या हिंदू संस्कृति में एक एकेश्वरवादी परंपरा है। हर जीव की वास्तविक चेतना को जागृत करना, मनुष्यों को श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा देना, भक्ति क्या है? भगवान कौन हैं? हम कौन हैं? हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? हमारा भगवान का संबंध क्या है? भगवान श्रीकृष्ण से कैसे संबंध को स्थापित किया जाए, यह इस्कॉन मंदिर का मुख्य उद्देश्य है। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 04:00 AM – 01:00 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:30 PM मंगल आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM तुलसी आरती का समय 05:00 AM – 05:30 AM उत्थापन आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM संध्या आरती का समय 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में भगवान राधा कृष्ण को लगने वाला भोग मंदिर में ही तैयार किया जाता है। भक्त अपनी श्रृद्धा अनुसार दानपात्र में राशि दान करते हैं।

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खटलापुरा मंदिर:भोपाल, मध्यप्रदेश, भारत

यह राम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, यहां मुख्य रूप से भगवान हनुमानजी विराजमान हैं। मध्यप्रदेश के भोपाल शहर में छोटा तालाब के किनारे स्थि​त प्राचीन खटलापुरा मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह राम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि, यहां मुख्य रूप से भगवान हनुमानजी विराजमान हैं। मंदिर का ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सुखद अहसास की अनुभूति कराता है। हर साल मंदिर में लगने वाला डोल-ग्यारस का मेला एक और मुख्य आकर्षण है। खटलापुरा मंदिर में भगवान राम, शिव, गणेशजी, लक्ष्मण व माता सीता की प्रतिमा भी स्थापित है। हनुमान जयंती पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर के पिछले हिस्से में एक घाट है, जहां हर साल पितृपक्ष में लोग विधि विधान से पिंड दान करते हैं और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण करते हैं। तालाब किनारे बना यह मंदिर किसी के भी मन को मोह लेता है। इसी कारण यह स्थल आस्था के साथ साथ पिकनिक स्पॉट भी बनता जा रहा है। Khatlapura Mandir:मंदिर का इतिहास इस मंदिर का इतिहास अयोध्या से जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि मंदिर की स्थापना 1840 में अयोध्या से आए संतों ने की थी। साल 1969 में उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर में सबसे पहले हनुमानजी को स्थापित किया गया था। मंदिर विस्तार के बाद यहां अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गईं। मंदिर के पुजारी बाबा प्रेमदासजी बताते हैं कि मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था के लिए अखाड़ा बनाया गया था। हालांकि, अब अखाड़े की जगह बजरंग व्यायाम शाला संचालित की जाती है। मंदिर का महत्व हनुमान जयंती पर बजरंगबली के दर्शन से हर कष्ट दूर होते हैं। माना जाता है कि मंदिर में विराजमान हनुमानजी की पूजा अर्चना से भक्तों पर भगवान राम की कृपा बरसती है। नवरात्रि व गणेश चतुर्थी पर भी खटलापुरा मंदिर में विषेष पूजा-अर्चना होती है। भाग्योदय के लिए इस मंदिर में दर्शन करने की मान्यता भी है। मंदिर की वास्तुकला तालाब के किनारे बना खटलापुरा मंदिर मन को शांति की अनुभूति कराता है। मंदिर को वास्तुदोष को देखते हुए बनाया गया है। यहां मुख्य रूप से भगवान हनुमान जी की बड़ी प्रतिमा विराजमान है। इनके साथ मंदिर में शीतला माता, मां दुर्गा, शिवलिंग, राम दरबार, श्रीगणेश, सांई बाबा की प्रतिमा के भी दर्शन होते हैं। परिसर में वर्षों पुराना एक विशालकाय पीपल का पेड़ है। ​मंदिर के पिछले हिस्से में तालाब किनारे एक घाट बना है, जहां हर वर्ष भारी संख्या में गणेश व दुर्गा विसर्जन होता है। मंदिर का समय सुबह मंदिर में होने वाली आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM खटलापुरा मंदिर प्रतिदिन 24 घंटे खुला रहता है 12:00 AM – 12:00 PM मंदिर का प्रसाद खटलापुरा मंदिर में मुख्य रूप से विराजमान हनुमान जी को बेसन के लड्डू व दूध से बने पेड़े का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त मंदिर में विराजमान अन्य देवी-देवताओं को नारियल, मिश्री, बताशा, फूल आदि अर्पित किया जाता है।

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Sankashti Chaturthi Vrat Katha:संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

Sankashti Chaturthi Vrat Katha:संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा एक समय की बात है कि विष्णु भगवान का विवाह लक्ष्‍मीजी के साथ निश्चित हो गया। विवाह की तैयारी होने लगी। सभी देवताओं को निमंत्रण भेजे गए, परंतु गणेशजी को निमंत्रण नहीं दिया, कारण जो भी रहा होअब भगवान विष्णु की बारात जाने का समय आ गया। सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आए। उन सबने देखा कि गणेशजी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब वे आपस में चर्चा करने लगे कि क्या गणेशजी को न्योता नहीं गया है ? या स्वयं गणेशजी ही नहीं आए हैं? सभी को इस बात पर आश्चर्य होने लगा। तभी सबने विचार किया कि विष्णु भगवान से ही इसका कारण पूछा जाए| विष्णु भगवान से पूछने पर उन्होंने कहा कि हमने Sankashti Chaturthi Vrat Katha गणेशजी के पिता भोलेनाथ महादेव को न्योता भेजा है। यदि गणेशजी अपने पिता के साथ आना चाहते तो आ जाते, अलग से न्योता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थीं। दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए। यदि गणेशजी नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं। दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना-पीना अच्छा भी नहीं लगता। इतनी वार्ता कर ही रहे थे कि किसी एक ने सुझाव दिया- यदि गणेशजी आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की याद रखना। Sankashti Chaturthi Vrat Katha आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे। यह सुझाव भी सबको पसंद आ गया, तो विष्णु भगवान ने भी अपनी सहमति दे दी। होना क्या था कि इतने में गणेशजी वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा-बुझाकर घर की रखवाली करने बैठा दिया। बारात चल दी, तब नारदजी ने देखा कि गणेशजी तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं, तो वे गणेशजी के पास गए और रुकने का कारण पूछा। Sankashti Chaturthi Vrat Katha गणेशजी कहने लगे कि विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है। नारदजी ने कहा कि आप अपनी मूषक सेना को आगे भेज दें, तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनके वाहन धरती में धंस जाएंगे, तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा। अब तो गणेशजी ने अपनी मूषक सेना जल्दी से आगे भेज दी और सेना ने जमीन पोली कर दी। Sankashti Chaturthi Vrat Katha जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए। लाख कोशिश करें, परंतु पहिए नहीं निकले। सभी ने अपने-अपने उपाय किए, परंतु पहिए तो नहीं निकले, बल्कि जगह-जगह से टूट गए। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। तब तो नारदजी ने कहा- आप लोगों ने गणेशजी का अपमान करके अच्छा नहीं किया। यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और यह संकट टल सकता है। Sankashti Chaturthi Vrat Katha शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे गणेशजी को लेकर आए। गणेशजी का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया, तब कहीं रथ के पहिए निकले। अब रथ के पहिए निकल को गए, परंतु वे टूट-फूट गए, तो उन्हें सुधारे कौन?पास के खेत में खाती काम कर रहा था, उसे बुलाया गया। खाती अपना कार्य करने के पहले ‘श्री गणेशाय नम:’ कहकर गणेशजी की वंदना मन ही मन करने लगा। देखते ही देखते खाती ने सभी पहियों को ठीक कर दिया। वह खाती कहने लगा कि हे देवताओं! Sankashti Chaturthi Vrat Katha आपने सर्वप्रथम गणेशजी को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन की होगी इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है। हम तो मूरख अज्ञानी हैं, फिर भी पहले गणेशजी को पूजते हैं, उनका ध्यान करते हैं। आप लोग तो देवतागण हैं, फिर भी आप गणेशजी को कैसे भूल गए? अब आप लोग भगवान श्री गणेशजी की जय बोलकर जाएं, तो आपके सब काम बन जाएंगे और कोई संकट भी नहीं आएगा। ऐसा कहते हुए बारात वहां से चल दी और विष्णु भगवान का लक्ष्मीजी के साथ विवाह संपन्न कराके सभी सकुशल घर लौट आए। हे गणेशजी महाराज! आपने विष्णु को जैसो कारज सारियो, ऐसो कारज सबको सिद्ध करजो। बोलो गजानन भगवान की जय।

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